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11.4.11

आधुनिक बोधकथाएँ- ०३ `रम डॅ;अगन डे;सयाने कपिल-डे ।

आधुनिक बोधकथाएँ- ०३ `रम डॅ;अगन डे;सयाने कपिल-डे ।

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_11.html




(courtesy-Google images)
 
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एक स्पष्टता - यह व्यंगात्मक बोध कथा का,` लोक पाल बील एपिसोड` से किसी भी प्रकार का कोई लेना देना  या `स्नान,सूतकाशौच` का भी  संबंध नहीं है । कृपया इसे किसी भी वर्तमान घटना के साथ न जोड़े । वैसे भी, किसी ने वर्ल्ड कप  कि अद्भुत सिद्धि का जश्न भी ठीक से मनाने नहीं दिया..!!
 
अन्य  फ़ालतू  बातों से, देश के सारे लोगों का, कितने दिनो से, ऐसे ही भेजा फ्राय हो रहा है..!! अब हम, दूसरी किसी भी बात पर, अपना भेजा फ़्राय  करवाने को कतई तैयार नहीं है ।
 
वैसे, ये बोध कथा लिखते वक़्त, मैंने भी अपने भेजे का सदुपयोग ज़रा सा भी नहीं किया है । इसे पढ़ते समय आप 
भी भेजा ट्राय (फ़्राय ) मत करना,अन्यथा आपके स्वास्थ्य को महा क्षति पहुंचने का गंभीर ख़तरा है..!!
 
( हे प्रभु, मैंने सब को सचेत करके मेरी ज़िम्मेदारी निभाई है, अब सब सलामत की आपकी बारी..!!)
 
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आधुनिक बोध कथा-`रम डॅ;अगन डॅ;सयाने कपिल-डॅ ।
 
किसी एक जंगल में `रम-डॅ` और `अगन-डॅ` नामक, दो ख़ूँख़ार बिल्ले अपने-अपने तय किये हुए इलाके की खोलीयों में निवास करते थे ।
 
आजतक दोनों बिल्लों ने अनगिनत चूहे मार कर, संसार पर वैराग्य आने के कारण, दोनों ने भगवा वस्त्र धारण करके सन्यस्त अंगिकार कर लिया था ।
 
रम-डॅ और अगन-डॅ, उनकी खोली के पास से आने जाने वाले लोगों को, नीति शास्त्र का ज्ञान बांटने की सदैव कोशिश करते थे,पर कुछ जम नहीं रहा था ।
 
रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्लों ने, अपनी सत्संग सभा में प्रर्याप्त भीड़ इकट्ठा करने के लिए, जंगल राज के,`जोलीवुड`फिल्मउद्योग की फ़ालतू फिल्मों मे,आलतु-फ़ालतू अभिनय करके,नाम पाने वाले कई कलाकार टारझन,टारझणी,मुगलीओं,मुंगेरी और,` बारात में  न कोई पहचाने पर ,मैं दूल्हा की बुआ` जितना लं..बा उपनाम धारण करनेवाली, कुछ उन्मत्त टल्ली,मल्ली,शेख़चिल्ली के अतिरिक्त, मन ही मन प्रसिद्धि पाने के लिये तरसते रहते, दूसरे कई बाबू-बेबीओं को, दोनों बिल्लोंने अपने मंच पर आमंत्रित करके भी आज़मा लिया, पर अंत में सभी हथकंडे बेअसर ही रहे..!!
 
ऐसा नहीं था की लोग इकट्ठा न होते थे,लोगों का तो क्या है? कहीं भी ज़रा सी भीड़ देखी की जमा हो जाते हैं..!! 

रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों की सत्संग सभा में भी लोग आते थे,पर अजीब से बेकार,अंटसंट सवाल पूछ कर, दोनों बिल्लों के नाक से दम निकाल देते थे ।   इतना ही नहीं, सही उत्तर न मिलने पर लोग, दोनों बिल्लों को,`Bloody Indian Dog` की गाली देकर,बिल्लों के सामने खुद ही भोंकना शुरू कर देते थे ?
 
ऐसे में एक दिन,दोनों बिल्लोंने देखा की, ` मंतर,हो जा छूमंतर` नामक प्रसिद्ध मैदान में, समाज के माने हुए, स्वैच्छिक - अवेतन समाज सेवक, श्री पन्ना पगारे (बिना वेतन लिए?) अपनी नजरों  के सामने, थाली में पड़े हुए,`जाँचपड़ताल` कंपनी के आटा से बने, एक बड़े से ब्रैड से (डबल रोटी) नाराज़ हो कर, ९५ मिनट के `आमरणांत अनसन`जाहिर करके, ब्रैड को, `TO DO (eat) OR NOT TO DO(eat)?` जैसा कुछ  गहन सोच विचार कर रहे थे ।
 
बस फिर तो क्या था? मौका पाते ही, रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्लों ने, उस  ब्रैड को,श्री पन्ना पगारेजी की थाली से, चोरी छिपे उड़ा लिया..!!
 
अब दोनों बिल्लों को बहुत बड़ा जेकपोट ब्रैड के रूप में हाथ तो लग गया, मगर अपने असली स्वभाव के चलते, पूरा ब्रेड खुद अकेले ही हज़म करने के चक्कर में, दोनों बिल्ले आपस में झगड़ने लगे..!!  रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्लों का झगड़ा, बढ़ते-बढ़ते, इतना बढ़ गया की, उस ब्रैड़ को बाज़ू छोड़कर, दोनों एक दूसरे के साथ, सचमुच हाथापाई पर उतर आए..!!
 
रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्ले, लड़-झगड़ कर जब, थक-हार गए,तब किसी की तालियों की आवाज़ सुनकर उन्होंने उपर देखा..!! उन्होंने देखा की, पास के ही एक वृक्ष की सब से उँची शाखा पर बैठ कर, `कपि-डॅ` नाम का बंदर, ना जाने कब से, उनकी लड़ाई, तमाशे का आनंद उठा रहा था..!!
 
रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों ने आपस में कुछ सलाह मशवरा करके, सयाने `कपि-डॅ` बंदर को बड़े ही नम्र भाव से बिनती की..!!
 
" हाय..कपि-डॅ भैया..!! सब से उंचे स्थान पर बैठकर,आप पिछले ९५ मिनट से हमारी लड़ाई देख रहे हैं? आप को यह शोभा नहीं देता..!! कृपया नीचे उतर आईए और ज़रा इस ब्रैड को, हम दोनों के बीच बराबर-बराबर बांट कर हमारा न्याय कीजिए  ना..प्ली..झ..!!"
 
भगवा वस्त्रधारी दोनों बिल्लों द्वारा, अति नम्र भाव से की गई इस बिनतीने, कपि-डॅ बंदर को वृक्ष की उँची शाखा से, नीचे ज़मीन पर आने पर मजबूर कर दिया..!! 

नीचे आकर कपि-डॅ बंदर ने सब से पहले,जंगल राज के राजा श्री मोकहसिंह को मोबाईल लगाया और रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों की समस्या के निवारण हेतु,उनका मार्गदर्शन माँगा ।
 
जब कपि-डॅ बंदर का फोन आया तब, जंगल राज के प्रामाणिक राजा श्रीमोहकसिंहजी अपनी फटीं हुई  सी  रहे  थे..!! ` फटीं चप्पल` टाँकने का काम बाज़ू रखकर, श्रीमोहकसिंहजी ने, बड़े ही विनम्र स्वर में, दूसरे फोन पर, ना जाने किससे बात की,पर बात ख़तम होने पर, वह अपना चिरकाल मनमोहक अंदाज़ त्याग कर, बड़े मायूस से लग रहे थे..!!
 
अपना मनमोहक अंदाज़ त्याग कर, जंगल राज के राजा श्रीमोहकसिंहने,फोन पर, उस कपि-डॅ बंदर को, बहुत खरी- खोटी सुनाते हुए कहा..!!

" अबे साले, दो कौड़ी के बंदर, आज फिर से, तुने उपर से, मुझे डांट खिलाई ना? क्या तुझे अपने बाप-दादा के समय का ऐसा ही एक वाक्या याद नहीं है? जिस में, ऐसे ही एक ब्रेड के लिए लड़ रही, दो बिल्लीओं का न्याय करने का ढोंग रचा कर, तेरे दादा ने, उन दो बिल्लीओं का पूरा ब्रेड चटकाया था? अगर तुम्हें ये बात याद न हों तो,उपर से आदेश आया है की,जंगल राज से तेरा मंत्री पद का,पोर्टफोलियो वापस लिया जाए..!!
 
मजबूर राजा श्रीमोहकसिंह की, यह बात सुनकर बंदर कपि-डे क्षुब्ध हो गया, उसने सोचा, "बड़ी मुश्किल से हाथ लगे पोर्टफोलियो, मेरे हाथ से कहीं  छीन ना जाए, उससे तो अच्छा यही है की, कुछ भी तिकड़म करके, मैं ये दोनों बिल्लों का ब्रैड ही क्यों न छीन लूँ?"
 
अपने विचार पर अमल करते हुए, कपि-डे बंदर ने, तुरंत अपने`दिमाग` नामक झोली में से, `चर्चा; वार्ता` नामक  तराजू  झट  से  बाहर निकाला..!!
 
कपि-डॅ बंदर, अपना सच्चा और तटस्थ न्याय अवश्य करेगा, यही विचार मन में धर कर, रम-डॅ और अगन-डॅ, बिल्ले ,बड़ी ही उम्मीद भरी नज़रों से, कपि-डॅ बंदर की ओर देखने लगे ।
 
कपि-डे ने,`जाँचपड़ताल` कंपनी के आटे से बनाए गए बड़े से ब्रैड को अपने दोनों हाथ से पकड़ कर, उसके एक सरीखा दश टुकड़ा किया और फिर `चर्चा; वार्ता` कंपनी के तराजू के, `दांयी समिति-बांयी समिति` नामक दो पलड़ों में, ब्रैड के पांच-पांच टुकड़े रख दिए..!!
 
जैसे ही, कपि-डे ने, सही तोल-वजन करने के लिए तराज़ू उठाया, "ये बंदर तोल-माप सही कर रहा है या नहीं?", ये देखने के बजाय, रम-डे और अगन-डे बिल्ले आपस में फिर से बहस करने लगे..!!
 
बिल्ले अगन-डॅ ने, रम-डॅ की ओर घूरते हुए कहा," रम-डॅ, दो-चार सालों से, सब के सामने, तुम बहुत बकवास कर रहे होना? आज देख लेना, जंगल राज के, ये सच्चे जवान मर्द, कपि-डॅ बंदर का सच्चा न्याय..!! अगर तेरे हिस्से में, `जाँचपड़ताल` ब्रैड का एक निवाला भी आया तो मैं, `प्रशांत` महासागर में डूब कर अपनी जान देने का वचन देता हूँ?"
 
अगन-डॅ की ऐसी कड़वी बात सुनकर, रम-डॅ बिल्ला तिल-मिला गया और बोला," अच्छा? अगर तेरे हिस्से में ब्रैड का एक भी टूकडा हाथ आएगा तो, मैं तुझे `कुल भूषण` का खिताब देकर, तेरा सार्वजनिक बहुमान करुंगा?"

थोड़ी ही देर में,दोनों बिल्लों के बीच, `तु-तु;में में` से आरंभ हुए झगड़ेने, फिर से भयंकर आग पकड़ ली और रम-डॅ; अगन-डॅ, दोनों में फिर से भयंकर झगड़ा शुरु हो गया..!!

इस बार तो ना जाने क्यों, झगड़ा इतना बढ़ गया की, दोनों बिल्ले उछल-उछल कर एक दूजे के शरीर को नोंचने लगे? दोनों बिल्ले के झगड़े की बात सारे जंगल में तुरंत फैल गई और उन दोनों में सुलह-संप कराने के उद्देश्य से,` मंतर,हो जा छूमंतर` मैदान में, सैंकड़ो कुल-भूषण, समझदार, बुद्धिजीवी  नागरिक,`शांति`दूत बनकर, भरी दोपहर में, सूरज की उपस्थिति के बावजूद, हाथ में सुलगती हुई मोमबत्तीयाँ लेकर, उस मैदान में जमा हो गए..!!
 
फिर तो क्या था? जैसे शक्कर की बड़ी सी गाँठ पर,बिना निमंत्रण दिए, सैंकड़ो मख्खीयां उड़ आ बैठती है,ऐसे ही हजारों लोगों को इकट्ठा होते देखकर, कई सारी न्यूज़ चैनल के संवाददाता, हाथ में माइक और कैमरा उठाकर, पागल की भाँति दौड़ते चले आए । आते ही  सारे संवाददाता, पास मे खड़ा, छोटा-बड़ा, जो भी हाथ लग जाए, उनको अंटसंट सवाल पूछ कर, खानापूर्ति साक्षात्कार करने में जुट गए ।
 
थोड़ी ही देर में, देश की सारी न्यूज़ चैनल पर,दोनों भगवा वस्त्रधारी बिल्ले, रम-डॅ और अगन-डॅ, के बीच हो रहे `LIVE`झगड़े की खबर,` ब्रेकिंग न्यूज़` के रूप में टीवी पर, फ्लैश होते ही, `कहीं हम भी पिछे न रह जाए?`, सोचकर, प्रिंट मीडिया के सारे अखबारवालोंने भी, अपने सभी कर्मचारीओं को,`दोपहर` की अतिरिक्त आवृत्ति छापने के धंधे पर लगा दिए..!!
 
इधर, लगातार शांति बनाए रखने की अपील करने के बावजूद, इन दो मूर्ख बिल्लों की वजह से, मचे भारी बवाल के कारण, अपने सारे किए कराए पर पानी फिरता हुआ देखकर, समाज के माने हुए, स्वैच्छिक-अवेतन समाज सेवक, श्री पन्ना पगारे ने ,` मंतर, हो जा छूमंतर` नामक प्रसिद्ध मैदान के सार्वजनिक मंच से, अपने ही क्रांतिकारी साथीदारों पर नाराज़ होकर, एक बार फिर, ९५ मिनट का `आमरणांत अनसन`घोषित कर दिया..!!
 
वैसे, ये घोषणा  अवश्य सार्थक हुई.!! समाज सेवक, श्री पन्ना पगारे की, इस कठोर घोषणा से, सारा माहौल धीरे-धीरे, एकदम शांत हो गया ।

दोनों बिल्लों का लड़ने-झगडने का जुनून उतर जाने पर,उसी वक़्त थक-हार कर शांत हुए, रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों ने, अपने अपने हिस्से का `जाँचपडताल` ब्रांड  ब्रैड  पाने के लिए जब, कपि-डॅ बंदर को ढूंढा तब उन्होंने क्या देखा..!!

कपि-डॅ बंदर, `चर्चा-वार्ता` ब्रांड के तराज़ू के,`दांयी-बांयी समिति` नामक दोनों पलडों मे से, `जाँचपड़ताल` कंपनी का पूरा ब्रैड, खुद ही खाकर,`चर्चा-वार्ता`तराजू को फिर से अपने `दिमाग` की झोली में डालकर, कपि-डॅ बंदर उस वृक्ष की सबसे उंची शाखा के, अपने उंचे सिंहासन पर पहुंच चुका था ।
 
वहाँ बैठकर कपि-डॅ बंदर, बड़े ही मन-मोहक अंदाज़ और भरपेट, तृप्त स्वर में जंगल राज के प्रामाणिक राजा श्रीमोहकसिंह को, आज के एपिसोड का पूरा आंखोदेखा ब्यौरा सुना रहा था..!!
 
"हाँ जी सर, अब चिंता की कोई बात नहीं है..!!  हमारे दोस्त, गोरे अँग्रेज़ बंदर की,सिखाई हुई, `फूट डालो,राज करो`, नीति को, हमारी काले अँग्रेज़ों की भाषा में मिला कर, उन सब आंदोलनकारीओं के बीच सफलतापूर्वक, मैंने फूट डाल दी है..!! `जाँचपड़ताल` कंपनी का ब्रैड भी, अब हमारे कब्ज़े में (मेरे पेट में) सलामत हैं । अब थोडे दिनों तक हमें शांति ही शांति है..!! हाँ,सर एक बात कहना तो भूल ही गया? समाज के माने हुए, स्वैच्छिक-अवेतन सेवक, श्री पन्ना पगारे ने ,` मंतर,हो जा छूमंतर` मैदान से, अपने ही क्रांतिकारी साथीओं पर नाराज़ होकर,फिर से, ९५ मिनट का कठोर,`आमरणांत अनसन` घोषित किया है..!! मगर इसके साथ हमारा कोई लेना देना नहीं है ? सर, अब मैं फोन रखूँ? सर, मेरा पोर्टफोलियो ज़रा मुझ से कहीं छीन न जाए, थोड़ा ध्यान रखना साहब..!!"   

आधुनिक बोध- व्यक्तिगत अहम से, हमेशा देश हित सर्वोपरि होता है, यह बात सभी देशवासीओं को ज्ञात होना चाहिए ।

(खास करके, अन्य ज्ञान पिपासुओं को,रात-दिन उपदेश देने वाले साधु-संत के लिए यह ज्ञान खास आवश्यक है?)

॥ ॐ शांति शांति शांति..ही..ही..ही..ही..ही..॥

मार्कण्ड दवे । दिनांक- ११/०४/२०११.

11.2.09

मुझे सपरिवार इच्छा मृत्यु की इजाजत दो!

कुलदीप द्वारा मौत मांगने के एक साल मार्च महीने में पूरे होंगे। उन्हें अब तक न तो 'मौत' मिली और न जीने लायक छोड़ा गया। भारतीय लोकतंत्र के स्तंभों-खंभों ने उन्हें कोमा-सी स्थिति में रख छोड़ा है। कुलदीप मीडियाकर्मी हैं। इंदौर में हैं। 'नई दुनिया' से जुड़े रहे हैं। प्रबंधन ने कुलदीप से इस्तीफा देने को कहा था। उन्होंने नई नौकरी न ढूंढ पाने की मजबूरी बताई थी। प्रबंधन ने उनका तबादला कर दिया। बीमार पिता को छोड़ दूसरे शहर में नौकरी करने जाने में असमर्थ रहे कुलदीप। सो, कुलदीप ने रहम की गुहार लगाई।

प्रबंधन को किसी गुहार या बीमार से क्या मतलब! थक हार कर कुलदीप ने 30 मार्च 2008 को राष्ट्रपति को पत्र लिखा। सपरिवार इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी। जाहिर है, पत्र लिखने से पहले कुलदीप ने कई महीने ऐसे हालात झेले जिससे उन्हें मृत्यु वरण करने के लिए मंजूरी मांगने को मजबूर होना पड़ा। ये हालात पैदा किए 'नई दुनिया' प्रबंधन ने। राष्ट्रपति को चिट्ठी भेजने से बस इतना हुआ कि एक पुलिस वाला आया और 'क्यों मरना चाहते हो' सवाल का जवाब कुलदीप के मुंह से सुनकर बयान दर्ज कर ले गया। कुलदीप मामले को लेबर कोर्ट में ले गए तो वहां जाने किसके इशारे पर सिर्फ सुनवाई की तारीख दर तारीख तय हो रही है, हो कुछ नहीं रहा है।

कुलदीप ने जिन दिनों राष्ट्रपति को पत्र लिखा, उनके पिता गंभीर रूप से बीमार हुआ करते थे। आर्थिक तंगी से परेशान कुलदीप पिता के इलाज के लिए दर-दर भटके। एक-एक रुपये इकट्ठा किया। बेहतर इलाज कराने की कोशिश की। पर पिता को बचा न सके। पिता गुजर गए। पिता रेवेन्यू डिपार्टमेंट में पटवारी थे। उनकी पेंशन अब कुलदीप की मां को मिलने लगी है। कुलदीप का इकलौता बेटा 12वीं में है। मां को मिलने वाली पेंशन की रकम से कुलदीप समेत चार जनों का खाना-खर्चा चल रहा है। नून-तेल-साबुन खरीदा जा रहा है। बच्चे की फीस भरी जा रही है।

बरस बीत गए पर दुख-दर्द जस के तस हैं। सिस्टम न्याय करने का भरपूर 'प्रयास' करता दिख रहा है पर हो नहीं पा रहा है। न्याय होगा कब, यह नहीं पता। प्रबंधन से जुड़े लोग दिन दूना रात चौगुना तरीके से फल-फूल रहे हैं। भांति भांति के बहानों से जगह-जगह सम्मानित-सुशोभित हो रहे हैं। पर कुलदीप को कौन पूछे? कुलदीप को न तो लटके-झटके आते हैं और न दांव-पेंच। कुलदीप न तो दंदफंदी हैं और न धंधेबाज। कुलदीप न तो बेइमान बन पाए हैं और न रीढ़ निकाल पाए हैं। कुलदीप में वो सारी खामियां हैं जो इन दिनों के सिस्टम को स्वीकार्य नहीं है क्योंकि सिस्टम केवल एक सिद्धांत से चलता है, और वो है- तुम मुझे लाभ दो, मैं तुम्हें लाभान्वित करूंगा।

कुलदीप पहले दैनिक भास्कर, इंदौर में थे। नई दुनिया ने उनके आवेदन पर उन्हें अपने यहां प्रूफ रीडर के बतौर रखा और छह माह में संपादकीय विभाग का हिस्सा बना देने का वादा किया पर वो छह माह दस साल बाद भी नहीं आया। प्रूफ रीडर पद जब अखबारों में खत्म किए जाने लगे तो नई दुनिया प्रबंधन को कुलदीप भी अतिरिक्त खर्चे की तरह आंखों में खटकने लगे। लाभ कमाने में यकीन रखने वाला मीडिया हाउसों का प्रबंधन घाटे का सौदा भला कितनी देर तक बर्दाश्त करता। कुलदीप से पहले तो सीधे कहा गया कि इस्तीफा दो। कुलदीप ने मना किया तो तबादला कर दिया गया। फिर शुरू हुआ कुलदीप के मुश्किलों का दौर जिसे जीते-जीते लगभग दो वर्ष गुजार चुके हैं।

कुल मिलाकर कुलदीप अभी मरे नहीं हैं, यह एक भौतिक सच है लेकिन अंदर से कुलदीप ने खुद को मरते-जीत कितनी बार देख लिया है, ये उनका दिल जानता है। हर दो महीने बाद आने वाले तीज-त्योहार में खुद को गुम-सुम और बेबस पाने वाले कुलदीप को शिकायत किसी से नहीं है। शायद, गरीब के लिए दुखों-शिकायतों-पीड़ाओं की अति ही इनसे मुक्ति का माध्यम है। इसी मुक्ति के सुबकते अवसादी मनोभाव में कुलदीप ने राष्ट्रपति को जो कुछ लिखकर चिट्ठी के रूप में भेज दिया, उसे हम यहां हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि कृपया पढ़ने के बाद थोड़ी देर दुखी होकर फिर अपने-अपने काम में लग जाएं क्योंकि मंदी काल में ऐसे ढेरों कुलदीप-सुलदीप-प्रदीप मिलेंगे जिनके घर-परिवार का दीया बड़ी मुश्किल से जल रहा है। आखिर किस-किस को राहत देंगे आप। वैसे भी, राहत आजकल वो पाने को उत्सुक हैं जिनके पेट भरे-फूले हैं। गरीब को राहत देना लोक कल्याणकारी राज्य और इसकी लाडली कंपनियों का फर्ज नहीं रहा। लोक कल्याण का काम भी बाजार के हवाले है। बाजार तो बाजार है। इसे सिर्फ रोबोट चाहिए, नोट कमवाने वाले कुशल, पेशेवर और दक्ष रोबोट चाहिए। किसी संवेदनशील, ईमानदार और विचारवान मनुष्य की कतई जरूरत नहीं!

कुलदीप द्वारा राष्ट्रपति को भेज गए पत्र को पढ़ने के लिए क्लिक करें- मुझे मौत चाहिए

11.11.08

क्या मेरी पहेली अधूरी ही रहेगी?

एक तस्वीर का साथ प्रश्न किया था, तो क्या गुनाह कर लिया, इतने सारे पत्रकार, धाँसू धाँसू पत्रकार, पढने वालों की ये जमात बड़े से लेकर छोटे तक की जमात, मगर किसी ने मेरे प्रश्न का उत्तर नही दिया, मेरे पहेली को न बुझा।
ये पहेली नही थी मित्रों बल्की हमारे लोकतंत्र का आइना था, आपने उत्तर ना बता कर अपनी तस्वीर आईने में देखी है, और नि:संदेह अपने तस्वीर से रूबरू हो गए होंगे।
बहरहाल ये अनुत्तरित प्रश्न एक बार फ़िर से आपके सामने है, कुछ टिप्स का साथ.......
शायद इस बार आप एक बार फ़िर से उत्तर देने का प्रयास करें और सफल भी हों?
ज्यादा नही सिर्फ़ इतना की इन्होने सुप्रीम कोर्ट में रिट दाखिल किया, और कोर्ट ने, सुप्रीम कोर्ट ने उस रिट पर याचिकाकर्ता द्वारा वापस लेने की बात कह रिट खारिज कर दी, जबकी याचिकाकर्ता को कोर्ट में प्रवेश तक नही करने दिया गया।
क्या ये अपराध नही है? और क्या इस अपराध में कोर्ट बराबर की शरीक नही है?
क्यौंकी जिस न्यायधीश ने इस रिट को खारिज किया बाकायदा सरकार द्बारा पुरस्कार से नवाजे गए। यदि पता हो तो उस पुरस्कार का नाम भी बता दें।

3.11.08

यूपी एसटीएफ के नए शिकार, नुरुल

नाम - नुरुल हसन
उम्र - 62 से ज्यादा
निवासी - गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

हसन नुरुल हज जाने के लिए कुछ जरुरी कागजातों सिलसिले में गुरुवार को लखनऊ गए हुए थे. लेकिन हर दाढ़ी- टोपी वाले में आतंक का निशां खोज रही उत्तर प्रदेश एस टी एफ के चंगुल में फंस गए. दो दिन की पुछ्ताझ के बाद अब हाजी साहब की यह हालत यह है की वह अब हज छोड़, खुदा से अपने को उठा लेने की दुआ मांग रहे हैं. उत्तर प्रदेश में पीयूएचआर के लोगो के बाद हाजी साहब एस टी एफ के नए शिकार हैं. हसन को भी उसी दिन एस टी एफ ने उठाया था जिस दिन पीयूएचआर के अन्य लोगो को गायब किया था. इसी दिन आजमगढ़ से दिल्ली जा रहे दो युवकों को कैफियत एक्स्स्प्रेस से अगवा करने का प्रयास किया था. लेकिन पीयूएचआर के लोगो के हस्तक्षेप से वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकी थी. एक ही दिन उठाए गए इन लोगों के मामले अब खुल के सामने आ रहे हैं. गाजीपुर के कासिमाबाद कसबे के रहने वाले नुरुल हसन उत्तर प्रदेश रोडवेज के सेवानिवृत कर्मचारी हैं. 24 अक्टूबर को हसन साहब अपने हज जाने के कागजो को दुरुस्त करने के लिए गाजीपुर से लखनऊ के लिए रवना हुए थे. लखनऊ में वह जैसे ही बस स्टैंड पर उतरे एस टी एफ के लोगो ने उन्हें घेर लिए और एक गाड़ी में बैठ वहां से करीब २० मिनट की दुरी पर स्थित किसी मकान में ले गए, वहां पुछ्ताझ के लिए उन्हें काफी प्रताडित किया. दो दिनों तक एक खंभे से बाँध कर रखा गया. उनकी दाढ़ी नोची गई और कई तरह से प्रताडित किया गया. एस टी एफ उनसे बार-बार एक ही सवाल पूछती रही - " तुम्हारा आजमगढ़, सरायमीर और संजरपुर से क्या ताल्लुकात हैं. कौन-कौन रिश्तेदार वंहा रहते हैं, क्या करते हैं," इन सभी सवालों का जवाब नुरुल हसन के पास अभी भी है. वह आतंकित से अब इन सवालों का जवाब ख़ुद से ही पूछ रहे हैं.तीन दिनों तक पीटने के बाद भी इसका जवाब नहीं मिला तो एस टी एफ ने २७ अक्टूबर उन्हें इस हिदायत के साथ सड़क किनारे फेक दिया कि " किसी को कुछ नहीं बताना." बाद में रोडवेज के ही एक परिचित कर्मचारी ने उन्हें मऊ के फातिमा हॉस्पिटल में भरती कराया. वहां भी दो दिनों बाद अचानक अस्पताल वालो ने उन्हें अस्पताल से निकल दिया. फिलहाल नुरुल हसन ने गाजीपुर में मामला दर्ज कराया है. दैनिक हिंदुस्तान और कुछ उर्दू के अखबारों ने इस खबर को प्रकाशित किया लेकिन अन्य किसी अखबार में नुरुल हसन को जगह नसीब नहीं हुई. शायद इस लिए की एस टी एफ ने उन्हें मीडिया के सामने एक आतंकी के रूप में नहीं पेश किया, और सड़क किनारे फेक दिया.अगर नुरुल को भी एस टी एफ आतंकी सिद्ध कर उनके रिश्ते आजमगढ़ से जोड़ती तब मीडिया की आँख खुलती क्योंकि आज की आम मीडिया पुलिस की प्रेस ब्रिफिन्गों के आधार पर चलने की आदी होती जा रही है.एक ही दिन ( 24 अक्टूबर, 08) में उत्तर प्रदेश की 'तेजतर्रार' एंटी टेरिरिस्ट फोर्स द्वारा लोगो को अगवा कर प्रताडित करने की तीसरी घटना है. उस दिन लखनऊ से उठाए पीयूएचआर नेता अभी भी जेल में हैं, पीयूएचआर से जुड़े शाहनवाज़ आलम, राजीव यादव लक्ष्मण प्रसाद अभी भी इनके निशाने पर हैं. इनके फोन लगातार टेप किए जारहे हैं. यंहा के 'माया राज' में उत्तर प्रदेश में सच बोलने वाले और अल्पसंख्यक सरकारों और सुरक्षा एजंसियों के निशाने पर है.

पीपुल्स यूनियन फॉर ह्यूमन राइट्स की ओर से जारी

शाहनवाज़ आलम 09415254919
राजीव यादव 09452800752
लक्ष्मण प्रसाद 09889696888
विजय प्रताप 09982664458
ऋषि कुमार सिंह 09911848941

( विजय प्रताप vijai.media@gmail.com द्वारा भड़ास पर प्रकाशनार्थ प्रेषित)

3.7.08

डाकुओं पर हाईकोर्ट की अंगुली

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर बैंच ने केंद्र और राज्य सरकार समेत देश के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को निर्देशित किया है कि वे डकैतों का महिमा मंडन कतई न करें और न होने दें। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि भावी पीढ़ी डकैतों के जघन्य अपराधों से प्रेरित न हो। मुख्य न्यायाधीश एके पटनायक और न्यायामूर्ति एके गोहिल की युगलपीठ ने यह निर्देश शर्मा फार्म रोड चार शहर का नाका निवासी विशन सिंह की जनहित याचिका की सुनवाई पर दिया। यह याचिका तब दायर की गई जब निर्भय सिंह के आत्मसमर्पण की योजना चल रही थी।

28.6.08

करुणाकर मौत के मुहाने पे है, पिता जेल में हैं, कौन बचाएगा? कौन इन्हें मिलाएगा?

भड़ासियों, फिर आ पड़ी है किसी के काम आने की बेला

दूसरों के दुखों से आंख फिराकर खुद के लिए अपार सुख तलाशने वाले हम कथित सुसभ्य शहरियों के लिए अमित द्विवेदी की दो पोस्टें आइना दिखाने वाली हैं। इसी दिल्ली - नोएडा में रह रहा एक पत्रकार अमित द्विवेदी किस तरह एक दूसरे शख्स की पीड़ा के साथ खुद को जोड़े हुए है, उसके साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रहा है, लड़ रहा है.....वो जानने के बाद मैं खुद पर शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं। कहने को हम सब इतने मीडिया वाले भड़ास पर हैं, ब्लागिंग में हैं, अखबार में हैं पर किसी जेनुइन की मदद करने का माद्दा नहीं जुटा पाते क्योंकि इसमें समय खर्च होगा, पैसा खर्च होगा और मिलेगा कुछ नहीं। हां, कुछ नहीं मिलेगा पर जो लोग जीने का मतलब और मकसद तलाशते हैं उन्हें बहुत कुछ मिलेगा। हम भड़ासियों के लिए यह मुद्दा जीवन मरण का मुद्दा है। कुछ उसी तरह जिस तरह कानपुर के भड़ासी साथी शशिकांत अवस्थी ने एक बिछुड़ी मां को उसके बेटों से मिलवाया और उसके घर पहुंचाया, उसी तरह हम करुणाकर नामक छात्र जो बस्ती के हरैया तहसील के गांव का रहने वाला है और गरीब घर का है लेकिन पढ़ने में बेहद प्रतिभावान है, अपनी जिंदगी के बचे हुए पांच छह महीने जियेगा और उसके बाद यह दुनिया छोड़कर चला जाएगा। दुख तो यह कि इन बचे हुए छह महीनों में डाक्टरों की सलाह के मताबिक उसे मां बाप के साथ रहने का सुख भी नहीं नसीब हो सकेगा क्योंकि उसके पिता को कुछ प्रभावशाली लोगों ने जेल भिजवा रखा है। उसके पिता को और खुद करुणाकर को यह नहीं पता कि करुणाकर की उम्र अब छह महीने है। यह बात केवल अमित द्विवेदी को पता है जो करुणाकर के साथ सिर्फ भावना और मनुष्यता के नाम पर जुडे़ हैं, उनका इलाज कराने में मदद कर रहे हैं, उन्हें आज सुबह एम्स के डाक्टर ने बताया कि इस करुणाकर की उम्र बस छह महीने बची है। इन दिनों को वो अपने परिजनों के संग गुजारे। कुछ नहीं हो सकता अब।

पूरा मामला इस तरह है---


उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हरैया तहसील के एक गांव के गरीब ब्राह्मण ओंकार का बेटा करुणाकर पढ़ाई में इतना तेज था कि वो हर एक्जाम में ब्रिलियेंट पोजीशन पाता। उसकी रुचि और इच्छा को देखते हुए ओंकार ने बेटे को करुणाकर को पढ़ाने के लिए नोएडा के एक इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला दिला दिया। इसके लिए खेत बेचकर पैसे दिए। बेटा जब यहां पढ़ने लगा तो उसे दर्द वगैरह हुआ और कई चरण की जांच पड़ताल के बाद उसके फेफड़े में कैंसर पाया गया। डाक्टरों ने कह दिया है कि वो अब जिंदा नहीं बचेगा, जीवन के जो कुछ दिन शेष हैं, उसे घर में परिजनों के साथ गुजारे।

उधर, उसके पिता ओंकार मिश्रा इन दिनों जेल में है। उन्होंने अपने गांव में किसी बुजुर्ग की खूब सेवा की और उस बुजुर्ग ने अपने नौ दस बीघे खेत ओंकार के नाम लिख दिए। बुजुर्ग की मृत्यु के बाद उनके कथित चाहने वालों ने पैसे के बल पर ओंकार को जल भिजवा दिया, यह आरोप लगाते हुए कि उन्होंने चार सौ बीसी करके जमीन अपने नाम लिखवा लिया है। इन दिनों वो गोंडा जेल में बंद हैं। पिता को नहीं पता कि उनका लाडला और तेज तर्रार बेटा अब कुछ दिनों का मेहमान है।

जैसे इस परिवार पर आफत का पहाड़ ही टूट पड़ा हो। पिता जेल में, बेटा मृत्यु शैय्या पर। घर में फूटी कौड़ी नहीं। मामला हाइकोर्ट में है। लखनऊ में करुणाकर के एक मामा रहते हैं सोहन तिवारी। वे ओंकार के मामले में पैरवी कर रहे हैं।

इस मामले में मैं हिंदी दुनिया के सभी साथियों, दोस्तों, दुश्मनों, परिचितों, अपिरिचितों से अपील करूंगा कि वे जो कुछ बन पड़े इस मामले में करने के लिए आगे आए।

कुछ तथ्य यहां और दे रहा हूं....

-करुणाकर ने आरकुट पर अपनी प्रोफाइल भी बना रखी है। उसका लिंक अमित द्विवेदी मुझे मुहैया कराने वाले हैं।

-करुणाकर की तस्वीर और उनके गांव घर के डिटेल अमित द्विवेदी मुझे जल्द ही मेल करने वाले हैं।

-करुणाकर के मामा सोहन तिवारी जो लखनऊ में हैं और करुणाकर के पिता ओंकार के जेल में होने के मामले में छुड़ाने के लिए पैरवी कर रहे हैं, उनका मोबाइल नंबर मेरे पास अमित ने भिजवा दिया है।

-लखनऊ के एक बड़े अखबार के स्थानीय संपादक और एक नेशनल न्यूज चैनल के लखनऊ स्थित मुख्य रिपोर्टर को इस मामले के बारे में मैंने जानकारी दे दी है। दोनों लोगों ने इस मामले को मीडिया में फ्लैश कर इस पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने का वादा किया है। जल्द ही दोनों लोगों तक इस मामले के सारे डिटेल मेल के जरिए पहुंचा दूंगा।

अपील
-अगर आप मीडिया में हैं और इस पोजीशन में हैं कि गोंडा, बस्ती और इलाहाबाद में वकील, अफसर, नेता के जरिए दबाव बनाकर पिता ओंकार को जेल से रिहा करा सकें तो कृपया इस दिशा में पहल करें। मुझे रिंग कर सकते हैं -09999330099 पर। मुझसे डिटेल ले सकते हैं yashwantdelhi@gmail.com पर मेल करके।

-अगर आपके परिवार, दोस्त, जानकारी में कोई इलाहाबाद में ठीकठाक वकील हों, बस्ती और गोंडा में प्रशासनिक अफसर या नेता हों तो उन्हें इस मामले में पहल करने के लिए अनुरोध करें। यह सिर्फ और सिर्फ मनुष्यता का मामला है। घनघोर स्वार्थ के इस दौर में अगर हम थोड़ी सी पहल करके किसी का भला करा सकते हैं तो हमें करना चाहिए।

-अगर आपकी जानकारी में कोई डाक्टर ऐसा हो जो फेफड़े के कैंसर का इलाज करने में सक्षम हो तो ओंकार को दुबारा उन डाक्टरों से दिखवाने की पहल करें।

-प्लीज, करुणाकर हमारी आपकी तरह है। उसके पिता हमारे आपके पिता की तरह हैं। हम अलग अलग शरीर भले ही धारण किए हुए हैं पर हमारे होने की पहचान एक दूसरे को मदद देने, एक दूसरे को बेहतर बनाने से है, इसलिए इस मामले में आगे आइए।

- अगली पोस्ट में भड़ास पर करुणाकर की तस्वीर और उससे जुड़े सारे तथ्य डिटेल में डालूंगा। अमित द्विवेदी से अनुरोध है कि वे शीघ्र सारी जानकारियों को मेल करके मुझ तक पहुंचाएं।

(उपरोक्त जानकारियां अमित द्विवेदी से फोन पर हुई बातचीत पर आधारित है)

भड़ास के सदस्य और पत्रकार साथी अमित द्विवेदी ने इस मामले में जो दो पोस्टें भड़ास पर डाली हैं, उन्हें आप जरूर पढ़िए.... (यह ध्यान रखिए कि अमित अभी हफ्ते भर भी नहीं हुए, भड़ास के मेंबर बने हैं, और आनलाइन हिंदी लिखना सीख रहे हैं, इसके चलते गूगल ट्रांसलेशन वाले सिस्टम से लिखने में कई शब्द अशुद्ध रूप से हिंदी में अनुवादित हुए हैं, इसलिए इन शब्द व व्याकरण के दोषों को नजरअंदाज करके पढ़ें.....)

पहली पोस्ट
एक कहानी जो जारी है

दूसरी पोस्ट
उसकी जिंदगी अंतिम पड़ाव पर आ गई

जय भड़ास
यशवंत

18.1.08

टीवी न्यूज चैनल की पायल, अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद और लखनऊ के पत्रकार शीलेश

ये तीन घटनाक्रम हैं। तीनों बेहद गंभीर। क्या करा जाये? क्या किया जा सकता है? उम्मीदें तो लोग बहुत पालते हैं लेकिन पहल कोई नहीं करता। बकचोदी तो बहुत सारे लोग करते हैं, लेकिन जब कर दिखाने का दौर आता है तो सब अपने अपने आरामदायक खोल में छिपे रहते हैं, कोई आगे आकर मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता। पर हम अपने खोल में रहकर भी कुछ चीजें कर सकते हैं। और, वही मैंने आज किया। भड़ास में इन तीनों मुद्दों को देखने के बाद मैंने तो पहले अपने कर्तव्य के बारे में चिंतन किया, फिर जुट गया। फिलहाल सब फोन पर और मौखिक है, लेकिन इससे एक नींव सी बनती दिख रही है, बशर्ते बाकी साथी भी थोड़ा थोड़ा कर्तव्य निभा दें।

मैंने ये तीन काम किये--

पहला काम--
एक टीवी न्यूज चैनल की रिपोर्टर पायल सिंह के सड़क हादसे में घायल होने को उस मीडिया हाउस ने अगर पत्रकारिता पर हमला बना दिया, तो यह बेहद शर्मनाक और निंदनीय है। इस सच्चाई को बयान करने वाले भड़ासी आशीष जैन को ढेर सारी बधाइयां, जो उन्होंने साहस के साथ इस बात को सबके सामने उजागर किया। आशीष की बहादुरी तो देखिए कि उन्होंने ये बातें कहते हुए अपनी मेल आईडी और मोबाइल नंबर भी भड़ास पर डाल दिया है। है किसी माइ के लाल में यह गूदा? पत्रकारिता में बड़े बड़े चारण भाट टाइप के लोग सिद्धांत इसलिए बघारते हैं क्योंकि उनके मुंह में बवासीर का मर्ज होता है और जय जय इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें तेल लगाते हुए गांड़ मराते हुए आगे बढ़ना होता है।

आशीष जैसी नई उम्र की पौध विश्वास बंधाती है कि इस बेहद गंधियाये, गोबरियाये और हगियाये हुए माहौल में भी सच को पूरे सच के साथ कहने वाले लोग हैं। भई, अपन तो इस लौंडे को दिल से सलाम कहते हैं, साथ में निवेदन की अपने को संभालकर रखना मेरी जान, बड़े कीमती हो।

मैंने आशीष को उनके मोबाइल नंबर पर फोन कर बधाई दिया, और संपर्क में रहने अनुरोध किया, भविष्य में किसी दिक्कत या मुसीबत में हर क्षण उपलब्ध होने का भरोसा दिया। साथ ही, थोड़ी नसीहत भी कि जोश के साथ होश बनाए रखना और सच कहने के साथ सच के पक्ष में तथ्य जुटाए रखना भी जरूरी है ताकि कल को किसी स्थिति में अपने सच्चाई के पक्ष में सुबूत भी दिखा सकें।


दूसरा काम--

अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद सिंह को जो त्रासदी झेलनी पड़ रही है, उसे उजागर करते हुए डा. रुपेश जी ने जो कुछ लिखा, वह सराहनीय है। उन्होंने अपनी पोस्ट में एक मोबाइल नंबर भी दिया है, जो अंगद सिंह जी के सबसे छोटे भाई का है। इस नंबर पर एसएमएस कर उनकी मुहिम में साथ होने का अनुरोध किया है। डाक्टर साहेब के आदेशों का पालन करते हुए मैंने एसएमएस करने के बजाय सीधे फोन किया और मैंने जज साहब के छोटे भइया से कहा कि दिल्ली आवें, तो जरूर बतायें। हम लोग आपके साथ हैं। पूरा भड़ास आपके न्याय के युद्ध में आपका हिस्सा बना रहेगा। उन्होंने दिल से शुक्रिया अदा किया और लगातार संपर्क में रहने की बात कही।

तीसरा काम

लखनऊ के पत्रकार शीलेश की जो दास्तां भड़ास पर उजागर हुई है, उसके बाद आगे की कार्रवाई के लिए मैं मैंने अपने कानपुर आईनेक्स्ट के दद्दा और सीनियर मीडिया मैन अनिल सिन्हा जी से बात की। उनसे अनुरोध किया कि जिस तरह उन्होंने कानपुर में आईनेक्स्ट के पत्रकार पर हमले के दौरान पूरे भड़ास को तथ्यों और घटनाओं से अवगत कराया, उसी तरह इस मामले में थोड़ी सी पहल करें और शीलेश के प्रकरण के तथ्य जुटाकर भड़ास पर प्रेषित करें ताकि हम आगे की कार्रवाई कर सकें।

शीलेश का अगर मोबाइल नंबर मिल जाए, वो अफसर जो उड्डयन विभाग में सर्वोच्च पद पर तैनात है, उसका नाम और मोबाइल नंबर आदि मिल सके तो फिर हम लोग कुछ समुचित कार्रवाई की दिशा में बढ़ सकें।

दादू अनिल सिन्हा जी ने वादा किया कि वे आज आफिस पहुंचते ही इस मामले को देखेंगे।


अंत में...डा. मांधाता सिंह से अनुरोध करूंगा कि वो भी अपने संपर्कों संबंधों के जरिये इस मामले के तथ्यों का पता करें। लखनऊ के भड़ासी साथियों और अन्य संवेदनशील बंधुओं से अनुरोध है कि वो शीलेश के मामले के लैटेस्ट अपडेट्स से हमें अवगत करायें। वे खुद पहल करते हुए शीलेश से संपर्क साधें। ताजा डेवलपमेंट क्या है, प्रशासन ने क्या स्टैंड लिया है, बाकी पत्रकार बंधु क्या कर रहे हैं, इस सब के बारे में बतायें।

फिलहाल इतना ही,
जय भड़ास
यशवंत

17.1.08

शीलेश की ज़िंदगी के लिए हम सब एकजुट हैं

लखनऊ के शीलेश के बारे में जो खबर भड़ास पर आई है, दरअसल वो नई नहीं है। जिन हालात में हम हिंदी पत्रकार जी रहे हैं, उनमें तनिक भी रिस्क लेने वाले की हालत यही होती है। डा. मांधाता सिंह ने शीलेश के बारे में जो खबर दी है, उसे पढ़कर पहले पहल तो सदमा लगा लेकिन बाद में एहसास हुआ कि क्या हम हिंदी मीडिया वाले इतने मर चुके हैं कि किसी हरामजादे, कुत्ते, सूअर टाइप के अफसर से निपटने में पूरी तरह अक्षम हो गए हैं। इन भ्रष्ट अफसरों के बारे में कौन नहीं जानता, पहले पहल तो ये चाहते हैं कि पत्रकार ही भ्रष्ट हो जाए, बाद में जब मालूम होता है कि पत्रकार भ्रष्ट नहीं होना चाहता तो उसे वह दरकिनार करना शुरू करते हैं, जब पत्रकार उसके खिलाफ कुछ तथ्यपरक लिखता है तो उसे वह भुगत लेने की धमकी देता है और कई बार कर भी दिखाता है। लगता है, इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है, पर सच्चाई जानने की हम प्रतीक्षा करेंगे। पत्रकारिता के सिद्धांतों में एक यह भी है कि दोनों पक्षों की सुनी जाय। लखनऊ और कानपुर के मित्रों से अनुरोध है कि अगर वो शीलेश का मोबाइल नंबर मुझे उपलब्ध करा दें, तो महती कृपा होगी।

शीलेश के मामले में अगर डा. मांधाता सिंह की सूचना पर भरोसा करें तो शीलेश उड्डयन विभाग के किसी अफसर से त्रस्त होकर आत्महत्या करना चाहते हैं। पहले पहल तो हम शीलेश से अनुरोध करेंगे कि वो न्याय के लिए अकेले जंग लड़ने की बजाय अपने पत्रकार दोस्तों-साथियों को इकट्ठा करें। भड़ास उनके संग है। दिल्ली आएं और हम सब मिलकर कुछ कर गुजरा जाए। दोस्तों-साथियों-शुभचिंतकों को एकजुट किया जाये। कई तरीके हैं न्याय पाने के। अगर न्याय नहीं मिल रहा तो पहले खुद क्यों मरे, उसे निपटा दिया जाये, परेशान किया जाये, खबरदार किया जाये, जिससे दिक्कत है। बाद में जो होगा देखा जायेगा।

भड़ास में ही एक साथी ने डर नामक एक पोस्ट में इस लोकतंत्र की जो हालत बयां की है, उसे पढ़कर मैं सचमुच सिहर गया। मैंने वहां कमेट भी लिखा। कई बार ब्लागिंग करते हुए लगता है कि दरअसल अकेले-अकेले जीने से हम समझदार और ईमानदार और संवेदनशील लोग जो कुछ खो रहे हैं, शायद वे सब एक मंच पर आकर हासिल कर सकने की सोच सकते हैं।

मेरा हिंदी मीडिया के सभी पत्रकार मित्रों के अनुरोध है कि वे इस मामले पर संजीदगी दिखाएं। खासकर लखनऊ वाले पत्रकार साथियों से यह कहना चाहूंगा कि वे शीलेश को लेकर दिल्ली आ सकें तो हम यहां उनके साथ एक नई रणनीति बनाकर न्याय पाने की जंग छेड़ेंगे। भड़ास इस मुहिम में साथ है। बस, देर केवल इस बात की है कि जब तक इस लोकतंत्र के पायों को हिलाया न जाये, न्याय नहीं मिल सकता। भड़ास के लिए शीलेश की ज़िंदगी एक चुनौती है। हमें इस भाई और साथी को बचाना होगा।

लखनऊ कानपुर के अपने सभी साथियों दोस्तों से अनुरोध करूंगा कि वे इस मामले की अद्यतन रिपोर्ट भड़ास में प्रेषित करें। आगे की समुचित कार्रवाई जल्द की जायेगी।

जय भड़ास
जय शीलेश

यशवंत