Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label पत्रकार. Show all posts
Showing posts with label पत्रकार. Show all posts

9.6.12

टुकड़ैल हैं सारे पत्रकार


बीकानेर के पत्रकारों ने नई बनी पत्रकार कॉलोनी में विकास कार्य करवाए जाने की मांग को लेकर अरबन इंप्रूवमेंट ट्रस्‍ट की ओर से नीलामी रुकवा दी। इससे नाराज यूआईटी के अधिशासी अभियंता ने सभी पत्रकारों को टुकड़ैल घोषित कर दिया। इससे नाराज पत्रकारों ने आज कलक्‍ट्री ऑफिस के सामने धरना लगा दिया। बाद में दोषी अधिकारियों की शिकायत राज्‍य के मुख्‍य सचिव एवं मुख्‍यमंत्री से किए जाने तथा कार्रवाई के आश्‍वासन के बाद धरना खत्‍म किया गया है। इसके साथ ही पत्रकारों को अपील की गई है कि सोमवार सुबह तक कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में एक बार फिर धरना शुरू कर दिया जाएगा। 
बीकानेर में यूआईटी ने पत्रकारों को सरकारी रियायती दर पर जो जमीन आवंटित की है। यह जमीन हाइ टेंशन पावर लाइन के नीचे है और जमीन में बड़े बड़े गड्ढे हैं। यूआईटी ने सालों तक प्रयास किया, लेकिन जमीन नहीं बिकी। बाद में पत्रकारों को स्‍वर्ण जयंती नगर योजना के नाम से यहां प्‍लाट काटकर दे दिए गए। जब बीकानेर में जमीनों के भाव आसमान छू रहे हैं, तब इस कॉलोनी की जमीनों के भाव रेंग रहे हैं। इसके बावजूद पत्रकारों ने धैर्य रखा और जिला प्रशासन से कई बार आग्रह किया कि कॉलोनी में विकास कार्य करवाए जाएं। लेकिन प्रशासन ने नहीं सुनी। इसी कॉलोनी में अब सामान्‍य लोगों को भी प्‍लाट काटकर देने की योजना शुरू की गई है। पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों ने नीलामी स्‍थल पर पहुंचकर अपने रसूख से नीलामी रुकवा दी। इससे नाराज यूआईटी अधिकारियों ने पत्रकारों को बुरा भला कहा। बात तब बिगड़ गई जब उन्‍होंने सभी पत्रकारों को टुकड़ैल घोषित कर दिया। इससे बीकानेर के सभी पत्रकार संगठनों ने एक छत के नीचे आकर इसका विरोध किया। पत्रकारों ने जिला प्रशासन को दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 24 घंटे का समय दिया, लेकिन अधिकारी चैन की बंसी बजाते रहे। आखिर आज सुबह ग्‍यारह बजे संयुक्‍त संघर्ष समिति ने जिला कलक्‍टर कार्यालय के आगे धरना लगा दिया। अपरान्ह साढ़े तीन बजे जिला कलक्‍टर पृथ्‍वीराज ने पत्रकारों को सभाकक्ष में बुलाकर बातचीत की और निजी तौर पर अधिकारियों के रैवेये के लिए माफी मांग ली। पत्रकार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर डटे रहे। कलक्‍टर ने आला अधिकारियों को इसकी सूचना देने और कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया है। इसके बाद धरना स्‍थगित कर दिया गया है। अब अगर सोमवार तक कार्रवाई होगी तो धरना खत्‍म कर दिया जाएगा, वरना अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा। 

स्‍थानीय अखबारों को भेजी गई रिपोर्ट

पत्रकारों की एकता के आगे झुकी सरकार 
सभी संगठनों ने दिखाई सामूहिक एकता 
दोनों अधिकारियों के नही हटाने पर अनिश्चिितकालीन धरने की चेतावनी
बीकानेर 8 जून। पत्रकारों के साथ अभद्रता से पेश आए न्यास सचिव सुदर्शन भयाना और अभियंता भंवरू खां को पद से हटाने की मांग को लेकर शुक्रवार को यहां कलक्ट्रेट में पत्रकार संगठनों की संयुक्त संघर्ष के धरने से प्रशासन में हलचल सी मची रही। धरना स्थल पर जिलेभर से पहुंचे पत्रकारों समेत राजनैतिक और गैर राजनैतिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधि भी समर्थन देने पहुंचे और न्यास सचिव तथा अभियंता द्वारा पत्रकारों के साथ किये गये अपमान जनक रवैये की निंदा कर विरोध जताया।
संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक श्याम मारू और अपर्णेश गोस्वामी ने इस मौके पर अभद्रता से पेश आने वाले न्यास सचिव और अभियंता को जब तक पदों से नहीं हटाया जायेगा हमारा आंदोलन जारी रहेगा। धरना स्थल पर पत्रकारों ने अपने आंदोलन की आगामी रणनीति पर भी मंथन किया। इधर पत्रकारों के समर्थन में आज भी कई संगठनों ने मुख्यमंत्री समेत उच्च प्रशासनिक अफसरों को ज्ञापन प्रेषित किए। यंहा पर साथ देने के लिए बीकानेर के कई वरिष्ठ पत्रकार भी पहुंचे। पत्रकारों के शिष्टमंडल ने देर अपरान्ह जिला कलक्टर के मार्फत मुख्यमंत्री को अपना ज्ञापन भेजा।
दोपहर बाद करीब 4 बजे जिला कलैक्टर ने राज्य सरकार के आदेशानुसार सभी पत्रकारेां को वार्ता के लिए बुलाया। जिसमें उन्होने बताया कि राज्य के मुख्य सचिव ने टेलीफोन पर आश्वस्त किया कि संबधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। इसलिए धरने को समाप्त कर दिया जाए लेकिन पत्रकार अपनी मांग पर अड़े रहे और सेामवार सुबह 10 बजे तक यदि किसी प्रकार की कार्रवाई नही होती है तो 10.30 बजे से अनिश्चिितकालीन समय के लिए धरना दिया जाएगा।
जिला कलैक्टर ने आदोंलनकारी पत्रकारेां से वार्ता करने बाद बताया कि नगर विकास न्यास सचिव सुदर्शन भयाना व अधिशाषी अभियंता भंवरु खां के रवैये के खिलाफ मुख्यमंत्री के प्रमुख शासन सचिव को पत्र लिखकर कार्रवाई कराने की अनुशंषा की है। इसके बाद सभी ने सामूहिक रुप से बैठक कर सोमवार को धरने पर बैठने की रणनीति बनाई। धरना स्थल पर समर्थन देने के लिए पहुंचने वालों में जिला देहात कांग्रेस अध्यक्ष लक्ष्मण कड़वासरा, महामंत्री श्याम तंवर, भाजयुमो पूर्व संभाग प्रभारी सुरेन्द्रसिंह शेखावत, भाजपा नेता मोहन सुराणा, जे.पी व्यास, शारीरिक शिक्षक संघ प्रदेशाध्यक्ष नानूसिंह सांखला, समाजवादी पार्टी के शिक्षक सभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय त्यागी, शहर जिला कांग्रेस कमेटी डी ब्लॉक के अध्यक्ष श्रीलाल व्यास, प्रवक्ता नितिन वत्सस, भारतीय ग्रामीण पत्रकार संघ के अध्यक्ष प्रकाश पुगलिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष कोहिनूर हर्ष, प्रदेश संगठन मंत्री बालमुकुंद व्यास, अखिल भारत वर्षीय समाचार पत्र संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मदनगोपाल तिवाड़ी, देहात भाजपा महामंत्री कुंभाराम सिद्ध, देहात मंत्री अशोक भाटी, शहर भाजपा उपाध्यक्ष अशोक तिवाड़ी, कर्मचारी महासंघ लोकतांत्रिक के प्रदेश संगठन मंत्री रमेश तिवाड़ी, वरिष्ठ कर्मचारी नेता सत्यनारायण पंवार, अरबन का-ऑपरेटिव बैंक एम्पलाइज यूनियन के अशोक शर्मा, जन किसान पंचायत के संरक्षक जयनारायण व्यास, माकपा के अंजनि शर्मा, वाम मोर्चा के सरजू गहलोत, जीव रक्षा विश्नोई सभा के शिवराज विश्नोई,स्वामी केशवानंद कृषि विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह शेखावत सहित अनेक संगठनेां ने समर्थन दिया।
यह पत्रकार थे धरना स्थल पर मौजूद
पत्रकार संगठनों की संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले आज कलक्ट्री में दिए गए धरने में राजस्थान जर्नलिस्ट यूनियन के जिलाध्यक्ष अपर्णेश गोस्वामी, राजस्थान पत्रकार संघ जार के प्रदेश उपाध्यक्ष भवानी जोशी व राजस्थान पत्रकार परिषद के विक्रम जागरवाल, वरिष्ठ पत्रकार लूणकरण छाजेड़, के.के. गौड़, सुरेश बोड़ा, भवानीशंकर जोशी, मोहम्मद अली पठान, अरविन्द व्यास, जयनारायण बिस्सा, बाबूसिंह कच्छावा, मुकेश पूनिया, राकेश आचार्य, पीयूष लखपत, राजेन्द्र सैन, रामस्वरूप भाटी, सूरज पारीक, के.के.सिंह, रवि विश्नोई, आदर्श शर्मा, नासिर जैदी, मुकेश आचार्य, ओम दैया, रामकिशन गोयतान, बृजमोहन रामावत, सुजानसिंह, नरेश मारू, आर.सी. सिरोही, उमाशंकर आचार्य, मोहम्मद अयूब, श्रीगोपाल व्यास, दिनेश गुप्ता, आनंद जोशी, विनोद जोशी, मोहन कड़ेला, रोहित शर्मा, सिद्धार्थ जोशी, नीरज जोशी, किशनसिंह, अक्षय आचार्य, विमल छंगाणी, शिवकुमार भादाणी,सुजानसिंह राठोड़,महेंद्र मेहरा,अरविंद व्यास, विजय कल्ला, मोहम्मद जमा, पवन भोजक, अजमल हुसैन, जाकिर हुसैन आदि मौजूद थे।
राज्यमंत्री मंजू ने कहा कि सीएम से बात करूंगी 
बीकानेर दौरे पर आई महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री श्रीमती मंजू मेघवाल के यहां सर्किट हाउस पहुंचने पर जब उन्हें पत्रकारों से जुड़े इस प्रकरण और धरने की जानकारी मिली तो उन्होंने जिला कलैक्टर से बातचीत की। बाद में संवाददाताओं से रूबरू हुई मंजू मेघवाल ने कहा कि अगर अधिकारियों ने पत्रकारों को ठेस पहुंचाई है तो उनके खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रकरण को लेकर सीएम से बात करूंगी।

10.7.09

पत्रकारों का स्टिंग करा रही है मायावती सरकार

डीएनए, लखनऊ में प्रथम पेज पर प्रकाशित रिपोर्ट

8.7.09

झंडा और डंडा

(वुसतुल्लाह ख़ान, पाकिस्तान के रहनेवाले हैं और बीबीसी उर्दू सेवा के एक वरिष्ट पत्रकार हैं पिछले दिनो ख़ान साहब भारत दर्शन(भारत के दौरे पर) के लिए आए हुए थे तब से इनके आलेख बीबीसी हिन्दी की साइट पर आ रही है.
हाल मे खान साहब ने अपने एक ब्लॉग मे एक सीख दी है भारत और पाकिस्तान की सरकार को। आइए पढ़ें, क्या है वो सलाह.......)


क्या आपने तिरंगा ग़ौर से देखा है, ज़रूर देखा होगा। लेकिन कभी आप ने ये सोचने की तकलीफ़ उठाई कि कपड़े के तीन विभिन्न पट्टियों को क्यों जोड़ा गया था और फिर बीच में अशोक चक्र क्यों बना दिया गया.

जब पिंगली वेंकैया साहेब ने ये तिरंगा डिज़ाइन किया तो उन्होंने नारंगी पट्टी यह सोचकर ड्राइंग बोर्ड पर बिछाई होगी कि भारत का हर व्यक्ति अपने ज़मीर का जवाबदेह होते हुए बहादुरी के साथ हर तरह की क़ुर्बानी के लिए तैयार होगा।

लेकिन वेंकैया साहेब को क्या मालूम था कि नारंगी रंग का ये मतलब लिया जाएगा कि अपने ज़मीर के ख़ंजर से बहादुरी के साथ दूसरे को क़ुर्बान कर डालो।

फिर वेंकैया साहिब ने नारंगी पट्टी के साथ सफ़ेद पट्टी जोड़ी। उनका ख़्याल था कि सफ़ेद रंग सच्चाई और पवित्रता की निशानी है. पर उन्हें क्या मालूम था कि इस सफ़ेद पट्टी की छाँव में इतना झूठ फैलाया जाएगा कि वो सच लगने लगेगा.

फिर उन्होंने उस सफ़ेद पट्टी में 24 डंडों वाला नीला अशोक चक्र ये समझकर लगाया होगा कि हर व्यक्ति 24 घंटे ईमानदारी के साथ अपना काम निपटाकर खुद को और देश को आगे बढ़ाएगा। पर उन्हें क्या पता था कि उनके बाद के लोग इस अशोक चक्र को घनचक्र के तौर पर चलाएंगे.

फिर वैंकया साहिब ने हरी पट्टी यह सोचकर जोड़ी होगी कि सब इस तिरंगे के साए में फले फूलेंगे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस तिरंगे के साए में सिर्फ़ ताक़तवर फलेंगे और कमज़ोर सिर्फ़ फूलेंगे.

इसी तरह सीमा पार अमीरूद्दीन क़िदवई ने जब पाकिस्तान का परचम डिज़ाइन किया होगा तो वेंकैया साहेब की तरह क़िदवई साहिब के भी बड़े पवित्र ख़्यालात रहे होंगे। जैसे ये कि इस झंडे में अस्सी फ़ीसदी रंग हरा होना चाहिए जिससे ये मालूम हो कि इस मुल्क में बहुसंख्या मुसलमानों की है. मगर बेचारे क़िदवई साहिब को अंदाज़ा ही नहीं था कि इस हरे झंडे के तले मुसलमान से ज़्यादा सुन्नी, शिया, वहाबी, देवबंदी, बरेलवी और तालेबान फले फूलेंगे.

क़िदवई साहेब ने इस हरे रंग पर चाँद और तारा भी चढ़ा दिया। ताकि इस झंडे को उठाने वालों का सामूहिक विकास पूरी दुनिया चाँद सितारों की रौशनी की तरह देख सके. मगर क़िदवई साहेब को ख़बर नहीं थी कि जो क़ौम रमज़ान के चाँद पर एकमत न हो सकी वो विकास के चाँद को कैसे देख सकेगी.

क़िदवई साहेब ने हरे झंडे में एक पतली-सी सफ़ेद पट्टी का भी इज़ाफ़ा किया। जिससे शायद उनकी मुराद ये थी कि इस मुल्क में अल्पसंख्यक अमन-सकून के साथ रह सकेंगे. लेकिन क़िदवई साहिब ने जो झंडा डिज़ाइन किया उसमें एक कमी यह रह गई कि ये झंडा सफ़ेद पट्टी में डंडा दिए बग़ैर लहराया नहीं जा सकता. इस कमी का हर सरकार ने बहुत ख़ूब फ़ायदा उठाया.

कहने का मतलब ये है कि भारत और पाकिस्तान को अपने झंडे अब दोबारा डिज़ाइन करने चाहिए ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें।

(साभार:बीबीसीहिन्दी.com)

12.6.09

एक पत्रकार का सुसाइड नोट

एक पत्रकार पुलिस, नेता और अपराधियों से इतना तंग आ जाता है कि उसे शर्मिंदगी के मारे आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ता है। युवा पत्रकार संवेदनशील था। उसकी चमड़ी मोटी नहीं थी। उसे दुनिया के दंद-फंद नहीं आते थे। वह तो केवल मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई और साहस जानता था। उसे इसका 'फल' मिला। झूठे मामलों में उसे पिटवाया गया। उसे प्रताड़ित किया गया। इस युवा पत्रकार के पिता भी पत्रकार हैं। बेटे को लगा कि इस लोकतंत्र में कहीं से कोई न्याय नहीं मिलने वाला है तो उसने न्याय पाने के लिए खुद को दांव पर लगा दिया। मरने से पहले जो सुसाइड नोट लिखा, उसमें उसने दोषियों के नाम साफ-साफ लिख डाले थे। इस सुसाइड नोट पर क्लिक कर आप इसे बड़ा कर पूरा पढ़ सकते हैं।
क्या हम लोग वाकई अब उस असभ्यता की ओर बढ़ चले हैं जहां ईमानदारी, सच्चाई और साहस के साथ जीने का मतलब होता है हत्या या आत्महत्या? सोचने और फिर सड़क पर उतरने का वक्त है यह दोस्तों वरना हमारी पीढ़ियां हम लोगों को माफ नहीं करेंगी। वे कहेंगी कि तुम लोगों ने ऐसा समाज हमारे लिए छोड़ा जिसमें सच की कोई साख ही नहीं थी......।


संबंधित खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें...

  1. उत्पीड़न से परेशान युवा पत्रकार ने जान दी
  2. मैं सन्नी खन्ना मरने से पहले ...

30.4.09

अंग भारत पब्लिकेशन को भागलपुर में चाहिए पत्रकार

Company Name: Ang Bharat publication
Job title : Sr.sub editor/sub editor/compositor
Qul: Must know hindi typing & be familiare qurakXpress(Both require)
Location: Bhagalpur (Bihar)
Contact persons: Mr. Uday shankar khaware, Excuetive editor
Mail Id: angbharat@gmail.com
Phone number: 09386258783
salary: negatioble
Company provide house/room for all outside candidate.
(भड़ास तक मेल के जरिए भेजी गई जानकारी पर आधारित)

23.1.09

दैनिक भास्कर की संवेदनशीलता?

हिन्दी का सबसे बड़ा अखबार होने का यह तो मतलब नहीं होता कि सबसे ज़्यादा संवेदनशील भी हो? भास्कर जब ऐसे दावे करता है तो गुस्सा आता है। परसों रात एक फ़ोन आया कि क्या जयपुर में चल रहे लिट्रेचर फेस्टिवल में विक्रम सेठ ने मंच पर शराब पी है? मैंने कहा, पता नहीं-मैंने देखा नहीं-और पी ली तो क्या गुनाह हो गया? फ़ोन करने वाले मित्र ने कहा, यह कल के भास्कर का बड़ा मुद्दा बन रहा है। मैंने कहा, बनने दो यार, भास्कर को अख़बार बेचने के लिए ऐसी शोशेबाजी करने की बीमारी है। पिछले बरस भास्कर के एक पत्रकार को आयोजकों ने खाना नहीं खिलाया तो उसने वितंडा मचवा दिया और हम से भी बयान दिलवा दिया। हो सकता है इस बार भास्कर का कोई कंठीधारी फेस्टिवल में पहुँच गया हो, जिसे विक्रम सेठ की किताबों के नाम भी ना पता हों, और वो संस्कृति का वैसे ही स्वयम्भू ठेकेदार बन गया हो, जैसे वैलेंटाइन डे पर शिव सैनिक और बजरंग दली बन जाते हैं। मैंने अपने अति-उत्साही मित्र को शांत रहने के लिए कहा, और सलाह दी कि गुस्सा कम करने के लिए दो पैग लगा लो यार। मैं भी यही कर रहा हूँ।सुबह के भास्कर में फ्रंट पेज पर विक्रम सेठ की हाथ में रेड वाइन की बोतल थामे फोटो थी और शुद्धता-शुचिता वादी लेखकों के गुस्साए हुए बयानों से भरे दो पेज। मेरी पत्नी ने कहा, यह क्या बकवास है? ज़्यादातर लेखक-पत्रकार तो शराब पीते ही हैं, इसमें इतना ऊधम मचाने की क्या बात है? उसने कहा, राजस्थान की परम्परा तो सदियों से पीने-पिलाने की रही है, 'भर ल्या ऐ कल्हाली दारू दाखां री...पधारो म्हारे देस' । फ़िर फोन पर फोन आने लगे, फोनिक बहस में मैंने कहा, दुनिया के महानतम लेखकों में से ऐसे पाँच लेखकों के नाम बता दीजिये, जिन्होंने शराब नहीं पी हो।लेकिन भास्कर में कुछ कमाल ऐसे होते हैं कि आपको या तो मज़ा आ जाता है या, रोना आता है। तो साहब, इस बार कमाल यह हुआ कि दम्भी-बड़बोले सम्पादक कल्पेश याग्निक, जिन्हें मुख्य पृष्ठ पर विशेष सम्पादकीय लिखने की बीमारी है, ने लेखक की संवेदनशीलता को लेकर फ़िर एक विशेष सम्पादकीय पेल डाला। इस बार उन्होंने मेयो कोलेज की एक छात्रा की मानसिक उथल-पुथल की कल्पना कर लिखा, 'वह मेयो कोलेज से सिर्फ़ अपने सपनों के लेखक को देखने आई थी। लेकिन बाद में उसकी घबराहट देखने लायक थी। उसने मासूमियत से पूछा: क्या विक्रम सेठ ऐसे हैं?' अब इन्हें कौन बताये कि मेयो में पढने वाले विद्यार्थी करोड़पति घरों के होते हैं, जिनके लिए ऐसे वाकये बेहद सामान्य होते हैं। और अगर संवेदना कि बात करें तो भैये, भास्कर की संवेदनशीलता का तो आलम यह है कि यहाँ, यानी भास्कर में काम करने वाले साहित्यकारों को भी बड़ी बे-इज्ज़ती के साथ बाहर का रास्ता दिखाया गया है। विश्वास न हो तो भाई राम कुमार सिंह का ब्लॉग पढ़ लीजिये, लिंक इसी पोस्ट पर मिल जायेगा। और लेखकों से मुफ्त में विमर्श करवाने वाला भास्कर, किस संवेदनशीलता की बात करता है, जब वो लवलीन जैसी महान लेखिका की मौत की ख़बर भी छापने लायक नहीं समझता, श्रद्धांजलि देना तो बहुत दूर की बात है। क्या लवलीन की मौत की ख़बर भी इसलिए नहीं छपी कि वो सिगरेट और शराब पीती थी? वैसे भास्कर के एक पूर्व-कर्मचारी के मुताबिक, भास्कर में सम्पादकों की कोई मीटिंग बिना शराब के नहीं होती। और भास्कर कानक्लेव में तो कहते हैं, नदियाँ बहती हैं।बहरहाल, नैतिकता, शुचिता, शुद्धता और आदर्श की बात करने वाले लेखकों से भी सवाल करना चाहता हूँ कि यूरोप में पुनर्जागरण लेखक, चिंतकों के बल पर ही तो आया था। कभी वक्त मिले तो मोपासां को पढ़ लेना, नैतिकता के सारे सवाल हल हो जायेंगे। लेखक ख़ुद नए आदर्श बनाता है और वक्त के साथ उन्हें स्वीकार भी किया जाता है। दो कोडी के अनपढ़, बद-दिमाग पत्रकार उसकी मर्यादा तय नहीं कर सकते। क्या तोल्स्तोय को इसलिए खारिज कर दिया जाए कि उन्होंने अपनी नौकरानी से अवैध सम्बन्ध बनाए और एक औलाद भी पैदा कर दी। मुंशी प्रेमचंद के बारे में गोयनका आज तक ऐसी बकवास करते हैं, लेकिन प्रेमचंद की प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आई।मुझे उम्मीद थी कि इस ख़ास ख़बर और सम्पादकीय का ज़बरदस्त असर होगा, भास्कर अपने जिला दफ्तरों में आदर्शवादी लेखकों को बुलाएगा और इस कथित सांस्कृतिक अपमान को लेकर आग उगलते बयान छपेंगे, कई तुक्कड़ कवि कवितायें लिखेंगे, जिन्हें शान से प्रकाशित किया जायेगा। लेकिन ऐसा नही हुआ, संघी पत्रकार तरुण विजय से विशेष लेख लिखवाया गया, अब वो तो संस्कृति की रक्षा के पुराने सिपाही हैं, सो उन्हें तो यही लिखना था। मैं पूछना चाहता हूँ तरुण विजय से कि जब अटल बिहारी वाजपेयी 'सदा-ऐ-सरहद' लेकर लाहौर गए थे, तो पाक-सीमा में उनका स्वागत पूरे सैन्य सम्मान से हुआ था, और पूरे देश ने टीवी पर देखा था, वाजपेयी जी के हाथ में शैम्पेन या बीयर का बड़ा सा ग्लास था। तब भारतीय संस्कृति क्या आराम करने चली गई थी भाई साहब?कल शाम प्रख्यात पत्रकार तरुण तेजपाल ने भीड़ भरे लॉन में अपनी एक महिला मित्र का लिप-लोंक चुम्बन लिया, उस दृश्य को कैमरे में क़ैद करने के लिए कोई प्रेस फोटोग्राफर नहीं था। अब कल्पेश याग्निक, तरुण विजय और तमाम आदर्शवादी लोग क्या तरुण तेजपाल से भी इस बारे में सवाल करेंगे?

10.1.09

लवलीन हुई अनंत में लीन


हिन्दी साहित्य की अद्भुत कथाकार लवलीन नहीं रहीं। 6 जनवरी की सुबह उन्होंने जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में अन्तिम साँस ली। लवलीन अभी पचास की भी नहीं हुई थी कि अपने दोस्तों में से अशोक शास्त्री, संजीव मिश्र, रघुनन्दन त्रिवेदी और कुमार अहस्कर जैसे दुनिया से जल्दी कूच कर जाने वाले मित्रों के बीच पहुँच गई। यह भी अजीब संयोग है कि संजीव मिश्र और रघुनन्दन त्रिवेदी की तरह लवलीन भी नया साल शुरू होते ही याने जनवरी में हमसे बिछुडी।हिन्दी साहित्य में लवलीन 'हंस' में 'चक्रवात' कहानी से चर्चित हुई। लेकिन इस से पहले वह राजस्थान में एक जागरूक और साहसी महिला पत्रकार के रूप में खासी चर्चित हो चुकी थी। जब प्रभाष जोशी रूपकंवर काण्ड में सतीसमर्थकों के साथ खड़े थे लवलीन राजस्थान जैसे सामंती प्रदेश में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक यौद्धा पत्रकार की तरह लड़ रही थी। लवलीन के उस दौर की एक झलक आप उसकी किताब 'प्रेम के साथ पिटाई' में देख सकते हैं।लवलीन ज़िन्दगी में पता नही कितने स्तरों पर लड़ती रही? अवसाद की बिमारी ने उसका पूरा घर छीन लिया॥ दो भाई अवसाद में भरी जवानी में चले गए। और वो ख़ुद इस अवसाद से लड़ती हुई लिखकर ही जीती रही... वह कहती थी लिखना मेरे लिए जीने का दूसरा नाम है, नहीं लिखूंगी तो मर जाउंगी मैं...और उसने लिखा भी तो कितना सा? पहली किताब थी 'सलिल नागर कमीशन आया', जिस पर उसे पहला 'अंतरीप' सम्मान मिला, कहानियों की दूसरी किताब थी 'चक्रवात'। ज्ञानपीठ से आया उपन्यास 'स्वप्न ही रास्ता है', स्त्री विमर्श पर 'प्रेम के साथ पिटाई'। कहानियों की एक और किताब आने वाली है 'सुरंग पार की रौशनी'। एक उपन्यास उसने एक साल पहले पूरा कर लिया था लेकिन बीमारी की वज़ह से उसका आखिरी हिस्सा नहीं लिख पाई थी... आखिरी दिनों में वह अपनी आत्मकथा को उपन्यास का रूप दे रही थी। उसकी कविताओं की भी एक किताब आने वाली थी...लिखने और जीने की अद्भुत जिजीविषा वाली हमारी इस लाडली लेखिका की 'नया ज्ञानोदय' में जो डायरी छपी है, उस से उसकी रचनात्मकता का अनुमान लगाया जा सकता है।लेकिन अफ़सोस हिन्दी के सबसे बड़े कहे जाने वाले अखबार यानी 'दैनिक भास्कर' ने इस प्रतिभाशाली साहित्यकार-पत्रकार की मृत्यु की ख़बर को छापने लायक भी नहीं समझा। जो अखबार लेखकों से मुफ्त में 'विमर्श' करवाता है, उसे कम से कम किसी लेखक की मृत्यु को तो ख़बर समझना चाहिए... पी.टी.आई.ने दिन के दो बजे ख़बर जारी कर दी, दूरदर्शन, ई.टी.वी.ने ख़बर चला दी, लेकिन जयपुर में बैठे भास्कर के करता-धर्ताओं को प्रेस विज्ञप्ति भेजने के बावजूद लवलीन की मौत का कोई ग़म नहीं हुआ... भास्कर के नक्कारखाने में लवलीन जैसी लेखिका की मृत्यु की आवाज़ का भले ही कोई महत्त्व ना हो, लवलीन के दोस्त-पाठक उसे हमेशा याद करेंगे... तभी तो उसकी मृत्यु के तीसरे दिन उसकी श्रधांजलि सभा में सैकड़ों लोग आए, उन में हिन्दी के साहित्यकार, चित्रकार, पत्रकार ही नही सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी भी शामिल थे। और यह श्रद्धांजलि सभा भी लवलीन के दोस्तों ने ही की...लवलीन की स्मृति को शत-शत नमन..

4.12.08

पत्रकार विनोद कुमार के लिए प्रश्न?

भाई विनोद कुमार पत्रकार हैं, और टोटल टी वी के अपराध संवाददाता भी। भड़ास फॉर मीडिया पर उन्होंने टी वी पत्रकारिता के बारे में प्रश्न किए हैं, वस्तुतः ये प्रश्न ना होकर खबरिया चैनल के पत्रकार की व्यथा ज्यादा लगती है। भाई विनोद का कहना है की समाज उनकी अच्छाइयों को स्वीकारने के बजाय चैनल पर दोषारोपण करते हैं और अखबार जगत इनके सुर में सुर मिलाती हैं, मगर इन व्यथाओं के बीच में इन्होने खुली चुनोती भी कर दी की मुझे पढो और मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, सो चलिए इनको भी निबटाते चलते हैं। वैसे भी जनता जिस तरह से राजनेता के ख़िलाफ़ हो गयी है और इस भगदड़ में राजनेता आंय बांय बयान दे रहे हैं, खतरे की घंटी पत्रकारों के लिए ही तो है, क्यौंकी राजनेता की तरह लोग पत्रकारिता से भी उब ही तो चुके हैं, घरों में लोग बिग बॉस और सास बहु सरीखे को तवज्जो देते हैं बनिस्पत खबरिया चैनल के और इसका प्रमाण टी आर पी की वोह रेटिंग है जो निरंतर बता रही है की लोगों की रुची समाचारों के चैनलों में कम होती जा रही है।

भाई विनोद के ढेरक प्रश्न हैं
  • मुंबई पर हमले की जानकारी ज्यादातर लोगों को टीवी न्यूज चैनलों से ही क्यों मिली? ,
    क्यों अमिताभ बच्चन पिस्तौल रखकर सोए?
    क्यों सुरों की सरताज लता मंगेशकर तीन दिन में तीन सौ बार रोईं?
    क्यों तीन दिन तक उन्होंने टीवी बंद नहीं किया?
    क्यों शिल्पा शेट्टी को जैसे ही हमले का फोन आया तो उन्होंने तुरंत टीवी आन किया?

हर कोई कहता दिखा कि हमला भयावह था, ये किस आधार पर कह रहा था? सिर्फ सुनकर या पढ़कर। (जी नहीं, टीवी चैनल की स्क्रीन पर एके 47 लिए खड़े आतंकी को देखकर, गोलियों की आवाज और स्टेशन पर मची अफरातफरी को देखकर। जलता ताज देखकर। सैंकड़ों की तादाद में कमांडो देखकर।)
भाई आपके प्रश्न बेहतरीन हैं, लाजवाब और आपके दर्द को भी बयां करता है मगर आपके सभी प्रश्न का उत्तर क्या सिर्फ़ इतना नही की व्यावसायिकता की दौड़ में आप तमाम लोगों ने पत्रकारिता का बलात्कार कर दिया है, निसंदेह कर रहे हैं। अयोध्या हो या गोधरा, बम के धमाके हों या मुंबई पर आतंकी हमला, आरुशी काण्ड हो या मोनिंदर काण्ड, आप सिर्फ़ एक प्रश्न के उत्तर दीजिये की क्या आपने और आपके जैसे तमाम लोगों ने, बड़ी बड़े पत्रकारों ने, पत्रकारिता के भीष्म ने सिर्फ़ पत्रकारिता की या निर्णयकर्ता बन गए ? प्रश्न सिर्फ़ टी वी पत्रकारिता से नही है अपितु अखबारों से भी।

मुम्बई का आतंकी हमला भारत पर हमला था और ख़बर में जैसा की आपने लिखा अमिताभ बच्चन, लता मंगेशकर, शिल्पा शेट्टी, यानी की बम के हादसे में भी टी वी की चमक दमक को भुनाने की लिए सितारे का सहारा, माफ़ कीजिये और याद कीजिये बहुत से नाम आपने छोर दिए हैं?

शायद आपको याद हो आपने आरुशी के पिता को आरुशी का हत्यारा साबित कर दिया था।

प्रिन्स का गढ्ढे में होने से निकालने तक आपकी तत्परता हमने टी वी में देखी है, या फ़िर यूं कहिये की देश ने झेली है, चलिए अब पत्रकारिता पर आ जाते हैं, ज्यादा पुरानी बात नही है जब पत्रकारिता ने व्यावसायिक रूप नही लिया था। पत्रकारिता के आधार स्तम्भ कहीं से पत्रकारिता पढ़ लिख कर नही आए, नाम मैं नही कहूंगा क्यौंकी आप ख़ुद जानते हैं। जो पढ़ लिख कर नही आए उन्होंने पत्रकारिता को जिया है, पत्रकारिता के लिए एक आयाम कायम किया है क्यौंकी वोह लाला जी के हाथों की कठपुतली नही हुआ करते थे, उनके पत्रकारिता में व्यावसायिकता नही हुआ करती थी, जो खंती पत्रकार हुआ करते थे और (वरिष्ट पत्रकार स्वर्गीय गजेन्द्र नारायण चौधरी के शब्दों में पत्रकारिता कभी पढ़ लिख कर नही आ सकती क्यौंकी ये वो शय है जो लहू में दौड़ती है, जब एक पत्रकार साँस लेता है तो वोह पत्रकारिता से भरी होती है। आँखें खुलती है तो पत्रकारिता दिखता है, मगर इस के लिए पत्रकार होना जरुरी है और मॉस कॉम तथा जर्नलिजम करके आप व्यावसायिकता सीख सकते हें पत्रकारिता नही) ना की धंधेबाज, व्यावसायिक पत्रकार को इस से बेहतर शब्द नही मिल सकते।

भाई आप तो अपराध संवाददाता हैं, पत्रकार भी क्या आपको पता है की
  • जस्टिस आनंद सिंह कौन हैं?
  • क्या किसी टी वि चैनल पर आपने इन्हें देखा है?
  • क्या किसी जज को पाँच साल की सजा मिलती है वोह मीडिया नजर से दूर हो सकता है?
    बाईज्जत रिहा होने के बाद एक जज को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नही होने दिया जाता है आपको ख़बर है?

शायद आप जवाब दें ?


सेना का गुणगान करने वाली ये ही मीडिया अभी कुछ दिनों पूर्व मालेगाव कांड पर साध्वी के साथ सेना को जम कर कोस रही थी क्यौंकी ये ही तो पत्रकारिता है?


आज हमारा लोकतंत्र अपने चारो पाये से भले ही जर्जर हो चुका हो मगर हमारे देश के लोग एक हैं और हमारी एकता आज दुनिया देख रही है।


न्यायपालिका, व्यव्हारपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता के शोषण और दोहन से आजिज लोगों का एक होकर इन चरों जरजर पाये का मरम्मत करना तय है।


जाति-पाती, कॉम धर्म, प्रान्त क्षेत्र, भाषा बोली से ऊपर एक भारतीयता का बिगुल बज चुका है,
बस और बस............................


15.11.08

पत्रकारिता का निष्ठा, पत्रकार के नाम.

बचपन से पत्रकार और पत्रकारिता को देखता आया हूँ। बहुत छोटा सा था जब पटना से प्रकाशित और हिन्दुस्तान के कुछ सबसे पुराने और प्रतिष्ठित अखबार के अन्ग्रेज़ी संस्करण "दी इंडियन नेशन" के सम्पादक मेरे एक नाना जी हुआ करते थे, बड़ा हुआ तो घर में मीडिया संस्थान से जुड़े लोगों की बाढ़ सी आ गयी, कोई सम्पादकीय में तो कोई विज्ञापन में सर्कुलेशन से लेकर प्रोडक्शन तक में मेरे घर के लोग आ चुके थे पत्रकारिता और राजनीति का चोली दमन का साथ होता है सो हमारे घर में भी था। बताता चलूँ की मैं अपने ननिहाल की बात कर रहा हूँ क्यौंकी मेरा बचपन ननिहाल में ही बीता है।
नाना जी का इंडियन नेशन और इसी का हिन्दी संस्करण आर्यावर्त हमेशा से मेरा पसंदीदा रहा कारण साफ़ है की अपने कंटेंट ने सर्चलाइट पब्लिशिंग को हमेशा प्रतिष्ठा में बनाये रखा। मेरी अखबारों में रूचि और उसका विश्लेषण करना मेरे नाना जी को हमेशा भाता रहा और ये ही कारण था की वो हमेशा चाहते थे की मैं पत्रकारिता में आऊं। मगर बाद के पीढी के मीडिया में आने और उस से बने मीडिया की छवि ने हमारे घर के माहोल को बदला और सभी मेरे ख़िलाफ़ की मैं पान की दूकान कर लूँ मगर इस क्षेत्र में मुझे ना जाने दिया जायेगा।
यानि की निष्ठा पर प्रश्न, पत्रकार की निष्ठा पर प्रश्न, पत्रकारिता की निष्ठा पर प्रश्न, मीडिया की व्यवसायीकता में कुचले पत्रकारिता की निष्ठां पर प्रश्न। मैंने बड़े करीब से इसे देखा और इस प्रश्नचिन्ह को स्वीकार भी किया।
माफ़ी चाहूँगा शायद कुछ ज्यादा ही लिख गया जो शब्दों को जाया करना हो सकता है, बहरहाल चर्चा एक घटना मात्र की करूंगा जिसे मैंने देखा और बस देखता रहा, ऊपर की जो मेरी अभिव्यक्ती है को इस तरह के घटनाक्रम ने हमेशा बल दिया और आज मुझे ये कहने से कोई गुरेज नही की सभी जगह से समाप्त निष्ठां का लोकतंत्र के चौथे खम्भे ने प्रचार प्रसार की ठिकेदारी तो ली मगर अपने निष्ठा का चीरहरण ख़ुद किया है।
कुछ महीने पूर्व मुंबई में था, रोज ही वाशी स्टेशन से परेल तक दुपहरी में जाता और गए रात वापस आता था। ये ऐसा समय था जब अमूमन पत्रकार लोग भी ट्रेन में ही होते हैं। अपने आप में मस्त गेट से खड़ा होकर जब रेल में सफर करता तो आस पास पत्रकारों के टोली की बातें आकर्षित करती थी मगर अपने धुन में रहने वाला इन से सम्पर्कित होने के प्रयास से इतर ही रहा।
खैर चर्चा सिर्फ़ एक घटना की करूंगा जिसने मेरे अंतरात्मा तक को हिला कर रख दिया। वापसी में लगभग रोज ही परेल स्टेशन पर एक युवा जोड़ी मुझे दिखता जो साथ ही एक ही डब्बे में वाशी तक आता था। ना सुनने की इच्छा के बावजूद इतना कह सकता हूँ की दोनों ही अलग अलग अखबार में काम करने वाले शायद दम्पति थे। कभी कभी बैठने के कारण इतना जान पाया की दोनों हिन्दुस्तान के दो बड़े ही प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार थे।
एक रात का ये हादसा है जब हम बैठे हुए थे आमने सामने, दोनों में से एक ने वहां का एक स्थानीय अखबार निकाला, अपने जिज्ञासा पर दोनों ने बहस किया, अखबार का मजाक उडाया और अंत में दंपत्ति ने, पत्रकार दंपत्ति ने, पत्रकारों की जोड़ी ने उस अखबार को चलती हुई ट्रेन से यूँ फेंका मानो कचरे के डब्बे से कचड़ा बीने वाले के हाथ गंदगी से भी ज्यादा गंदा हाथ में आ गया हो।
जहाँ पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ हो, पत्रकार लोक की आवाज और निष्ठां के प्रति जवाबदेह भी, मगर जब एक पत्रकार अपने पत्रकारिता के प्रति निष्ठित ना हो, अपने धर्म के प्रति निष्ठित न हो अपने कर्म के प्रति निष्ठित न हो, व्यावसायिकता की अंधी दौड़ में मेरा अखबार बढिया बाकी सभी औने पौने के साथ लाला जी की चाकरी करता हो, मगर अहम् का दंभ सबसे ज्यादा
सबको निष्ठा की सीख देने वाला क्या अपने प्रति निष्ठित है, अपने धर्म के प्रति निष्ठित है।
प्रश्न इसलिए क्यूंकि जिम्मेदारी और संवेदना से भरा हुआ है। मगर बदलते दौर के साथ बदलती पत्रकारिता में व्यवसायिकता का रस ने पत्रकारों से जिम्मेदारी और निष्ठा समाप्त कर दिया है। हमें कोई ऐतराज नही यदि आप व्यवसायिक पत्रकार हैं, मगर कहना सिर्फ़ इतना की आप व्यावसायिक हैं तो समाज का आइना मत बनिए। लाला जी का चाकर हमारा चौथा खम्भा कभी नही हो सकता।

14.8.08

हैदराबाद में शायद ही ऐसा दिन होगा जिस दिन हम नहीं रोये हों

भड़ास4मीडिया डाट काम (WWW.BHADAS4MEDIA.COM) से फुर्सत निकालकर भड़ास पर आकर लिखना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है पर मेरा पहला प्यार तो ये ब्लाग भड़ास ही है। भड़ास4मीडिया उस सौतन की तरह है जो नई आई और छा गई लेकिन ओल्ड इज गोल्ड को कैसा भुला देंगे। तो चलिए, बहुत दिन बाद, दो बातें आप तक पहुंचाता हूं। भड़ास4मीडिया को लेकर मेरे पास रोजाना 50 से 60 मेल आती हैं। इसमें ज्यादातर मेलों में भड़ास4मीडिया जैसा पोर्टल लांच करने के लिए मुझे बधाई दी गई होती है। उसी में से एक मेल आपके सामने रख रहा हूं।

दूसरी मेल एक पत्रकार की दास्तान है। किस तरह उसे प्रताड़ित किया जाता रहा है। मतलब, पत्रकारिता में अब शरीफों का गुजारा नहीं। आपको या तो बदमाश बनना होगा या फिर बदमाशी में शामिल होना होगा।

दोनों पत्रों इस तरह हैं....(पत्र लेखकों के नाम बदल दिए गए हैं ताकि वे जहां काम कर रहे हैं वहां उन्हें कोई दिक्कत न हो)

----------------

यशवंत जी,
भड़ास4मीडिया इतना लोकप्रिय हुआ है कि अंग्रेजीदां लड़कियां भी इस े निहारती रहती है। ऑफिस आने पर सबसे पहला काम होता है भड़ास4मीडिया खोलना। वजह साफ है कि इसकी विषय वस्तु इतनी सटीक और रिपोर्टिंग इतनी सख्त होती है कि बड़े-2 सूरमा कांप उठे हैं।मुझे लगती है इसकी रोजाना हिट्स 20-30 हजार तो जरुर होगी। इधर कुछ मीडियाकर्मी अपनी तारीफ भी सुनने को इच्छुक हो गए हैं या कईयों को लगता है कि उनके काम की तारीफ न होकर सिर्फ उनके सहकर्मी के काम की तारीफ हुई है। कुलमिलाकर कहने का मतलब ये कि इस साईट ने जितनी जल्दी मीडियाकर्मियों के बीच अपनी जगह बनाई है वो वाकई काबिले
तारीफ है। मुझे लगता है कि आनेवाले वक्त में इस साईट पर और भी अभिनव प्रयोग किये जाएंगे और इसको और भी प्रासंगिक बनाया जाएगा।
धन्यवाद सहित
विक्रांत


----------------------------

yashwant sir

mai copy editor hu. pichle mahine etv chodkar delhi me ek news channel ko join kar liya hai.

sir etv me mere saath bahut bura saluk kiya gaya. mai apne anubhav ko aapke ssath batna chata hu ki kaise juniour ke saath seniour behave karte hai.

sir, hyderabad me sayad hi aaisa din hoga jis din hum nahi roye the. ek loby ke sikhar hum ho gaye kyonki hum shirf apne kam se matlab rakhte the, kisi ki siykayt karna ya sunna mujhe pasand nahi.

sir rojana meri sikayat ki jati thi. manager bhi meri baat nahi sunte the. meri 8 mahine tak night shift laga di gai.office aane ke bad bhi meri 20 dino ki salery absent dikha kar kat di gai.sir mere saath aaisa kiyo kiya gaya yah sawal aaj tak mere kano me gunj raha hai, hame jawab chahiya , kya aake pass hai jawab?

aabhi bhi mere siniours chahte hai ki kisi tarah meri job chli jaye.

aapka

anil

1.8.08

पत्रकार की ह्त्या

आज वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक भाष्कर रीवा के ब्यूरो चीफ श्री दीपक मिश्रा कि ह्त्या कर दी गयी, ह्त्या का खुलासा रीवा के भडासी मित्र करेंगे. दीपक जी के इस आसमयिक निधन पर भडास परिवार शोक संतप्त है और मिश्रा जी के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उनके इस दुखद पल में साथ है.

संग ही प्रशाशन से इस ह्त्या कि जांच और तत्काल आपराधियों के गिरफ्तारी कि माग करता है और इस निंदनीय कृत की तीव्र भ्रत्सना करता है.

बारिश में पतंग मत उड़ाओ सोमकुंवर (संदर्भ: पत्रकार जुबैर कुरैशी पर बेबुनियाद आरोप)

अवधेश बजाज
त्वरित टिप्पणी

सच कहते हैं तो बुरा मानते हैं लोग
और रो-रो कहने की आदत नहीं हमारी
इस अशआर से प्रेरित होकर राज एक्सप्रेस के अपराध संवाददाता ने राज एक्सप्रेस में गुरुवार को एक खबर लिखी। खबर का शीर्षक था ‘अधीक्षक के सामने आईएसओ जेल में कैदियों से क्रूरता’। इस खबर से भोपाल के जेल अधीक्षक पीडी सोमकुंवर इतने बौखलाए कि उन्होंने जुबैर कुरैशी पर प्रतिबंधित संगठन सिमी से ताल्लुकात का आरोप मढ़ दिया। इस तारतम्य में सोमकुंवर ने राज एक्सप्रेस के मैनेजमेंट को एक पत्र भी लिखा है।

दरअसल इसमें सोमकुंवर की गलती नहीं है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था के अर्थतंत्र की गलती है। सत्ता के साकेत में बैठे दल्ले ऐसे सोमकुंवर पैदा करते हैं, जिनकी प्रेस वालों पर उंगली उठाने की हिम्मत होती है। सत्ताई अर्थतंत्र के आंगन की सदा सुहागन सोमकुंवर क्या है, उनका चरित्र और उनकी आर्थिक सेहत किसी से छुपी नहीं है। उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके स्थानांतरण को रूकवाने के लिए दो सांसद, पांच मंत्री और भाजपा के दो राष्ट्रीय महामंत्रियों ने लाबिंग की थी। इसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूं। सोमकुंवर सत्ताई दल्लों के संरक्षण में गदरा रहे हैं। वे राजनीतिज्ञों को खरीद सकते हैं, लेकिन मीडियाकर्मियों को नहीं।

जुबेर कुरैशी मुस्लिम है। लिहाजा उस पर सिमी से संबंध का आरोप लगाने का उपक्रम सोमकुंवर जैसे मानसहीन लोग ही कर सकते हैं। सवाल यह उठता है कि हमारी तंत्र व्यवस्था में सोमकुंवरों का जन्म कैसे होता है, एक ही पद पर ये नौ-नौ साल कैसे जमे रहते हैं? दरअसल ये हमारी अफसरशाही के नव सामंत हैं, जो राजनीतिज्ञों के संरक्षण में बेलगाम हो रहे हैं। मीडियाकर्मियों को एकजुटता के साथ ऐसे बेलगाम मानसहीन सोमकुंवर को करारा जवाब देना चाहिए। आज एक जुबैर कुरैशी के खिलाफ एक अफसर बेबुनियाद, मिथ्या आरोप लगा रहा है। कल आपकी बारी आ सकती है।
--------------------------------------------------------
(लेखक अवधेश बजाज मध्य प्रदेश केंद्रित लोकप्रिय मीडिया पोर्टल बिच्छू डाट काम के प्रधान संपादक होने के साथ-साथ प्रदेश के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार हैं)

26.7.08

वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार गौतम के दुख को महसूस करिए


इस दुनिया में दोस्त तभी तक हैं जब तक आप स्वस्थ, खुशहाल और तरक्की की राह पर हों। जिस दिन आप अकेले हो जाते हैं, किसी भी तरह पीड़ित हो जाते हैं, संघर्ष की स्थिति में होते हैं, परेशान और दुख से भरे होते हैं.....उन दिनों में आपका साया भी आपका पीछा छोड़ जाता है। ये बातें कोई नई नहीं हैं पर हम अक्सर इसे भूल जाते हैं और अपने पद-पैसे के गुरुर में अपनों को भूल जाते हैं। भड़ास हमेशा से ऐसे लोगों के साथ चट्टान की तरह खड़ा हुआ है जो परेशानहाल हैं।


करुणाकर की मुहिम अभी भड़ास के मोर्चे का मुख्य एजेंडा बना हुआ है तभी एक और दुख भरी खबर हम लोगों तक पहुंचती है। सुनील कुमार गौतम दैनिक हिंदुस्तान, पटना में डिप्टी न्यूज एडीटर हैं लेकिन वे इस कदर परेशान हैं कि उनकी पीड़ा को संभवतः कोई समझ ही नहीं सकता। एक वरिष्ठ पत्रकार का पिछले चार वर्षों से जीवन सिर्फ अस्पतालों में बीत रहा है। तरह तरह के इलाज करवा रहे हैं। पर फायदा कोई नहीं। सुनील कुमार गौतम चार वर्षों से अल्सरेटिव कोलाइटिस नामक पेट की बीमारी से पीड़ित हैं। वे अब तक बीएचयू मेडिकल कालेज बनारस, एसजीपीजीआई लखनऊ, आईजीआईएमएस और पीएमसीएट पटना के अतिरिक्त कई निजी गैस्ट्रो क्लीनिकों में इलाज करवा चुके हैं। पर उनकी स्थिति सुधर नहीं रही। इस दौरान सुनील जी के उपचार पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।


अब वे इलाज के लिए एम्स दिल्ली में आ रहे हैं। इलाज कराते कराते सुनील जी का परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है। वे जो कुछ कर रहे हैं सब व्यक्तिगत स्तर पर कर रहे हैं। वे दिल्ली भी खुद के खर्चे पर इलाज कराने आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि एम्स में उनका तीन चरणों में आपरेशन होगा जिसमें करीब 5 लाख रुपये खर्च आएंगे। अन्य खर्चे अलग से।


सुनील जो को अब सामाजिक, सामुदायिक और सरकारी मदद मिलनी चाहिए। समाज के जाग्रत लोगों और बुद्धीजिवियों से अनुरोध है कि वे एक वरिष्ठ पत्रकार के दुख में शामिल हों और उन्हें स्वस्थ कराने के लिए आगे आएं। जरूरी नहीं कि आप सिर्फ आर्थिक मदद करें तभी मदद कही जाएगी, आप का भावनात्मक सपोर्ट भी एक दुखी को खुशियां प्रदान कर सकता है। जैसा कि हमारे डाक्टर रूपेश ने पिछले दिनों करूणाकर के मामले में कर दिखाया। मुंबई से दिल्ली आकर 48 घंटे तक मरीज के साथ रहकर उन्हें करुणाकर के चेहरे पर वो मुस्कान ला दी जिसे उसका परिवार देखने को कई महीनों से तरस रहा था।


फिलहाल मैं खुद यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि सुनील जी की मदद हम लोग किस तरह कर सकते हैं। करुणाकर के मामले में आर्थिक मदद की अपील बहुत प्रभावी नहीं रही इसलिए अब आर्थिक मदद की अपील करने से बचना चाह रहा हूं।


इस बार मैं सभी भड़ासियों और सभी प्रबुद्ध साथियों पर छोड़ रहा हूं कि वो खुद बतायें कि हम लोग इस मामले में क्या करें।


सुनील जी से संपर्क के लिए आप उनसे उनके मोबाइल नंबर 09431080582 पर फोन कर सकते हैं या उनके घर के लैंडलाइन फोन 0612-2578113 पर काल कर सकते हैं। सुनील जी का बैक एकाउंट नंबर भी भड़ास के पास भेजा गया है जो इस प्रकार है - bank account no - 2201050040687 HDFC bank।

पटना के एक भड़ास के शुभचिंतक साथी ने सुनील जी के मामले को भड़ास तक पहुंचाया, इसके लिए मैं उनका दिल से आभारी हूं।


जिस तरह करूणाकर के इलाज व देखरेख का जिम्मा एक भड़ासी साथी व पत्रकार अमित द्विवेदी ने उठा रखा है, उसी तरह अगर कोई साथी सुनील जी के मामले में आगे आए तो कोई पहल की जा सकती है।
फिलहाल तो मैं सुनील जी के दुख में खुद को शामिल कर रहा हूं। हम सब मिलकर सोचते हैं कि हमें क्या करना चाहिए।

दिल्ली के पत्रकार यूनियनों, सरकार के मंत्रियों, बुद्धिजीवियों आदि से हम किस तरह संपर्क कर सुनील जी के लिए कुछ कर सकते हैं, इस बारे में आप सभी के विचार आमंत्रित हैं।

17.6.08

Owner's side said there should be no Interim Relief

June 16, 2008
Dear friends,

The hearing for recommending the rates of Interim Relief were held for two days by the Wage Boards and at the end of the hearing proposals for the quantum of Interim Relief were made but no decision could be arrived at. The Chairman adjourned the meeting and the declared that the next meeting would be held after 15 days.

The employee's side proposed 65% of the basic pay, and the owner's side said there should be no Interim Relief but a proposal for 25% was brought up by the member secretary and was supported by another independent member.

Thus, therefore there are three proposals before the board. An informal attempt for an agreement was made from the employees' side but the chairman was keen on postponing the meeting for two weeks. The matter rests there.

As for as NUJ(I) is concerned it made very impressive power point presentation through a team of Shri Rajendra Prabhu and Shri Ashok Malik. No other organization before the board presented such a detailed and well documented case.

This is all for your information and sharing it with other friends.

With best wishes



(Dr N K Trikha)
In charge, International Affairs, NUJ(I) &
Member, Wage Board for Working Journalists



(भड़ास के लिए आई प्रेस विज्ञप्ति ताकि देश भर के सभी पत्रकार इस मामले के लैटेस्ट अपडेट से अवगत रहें....यशवंत)

6.6.08

विजय रियल पत्रकार लगता है, बिल्कुल दबा कुचला, पैर में चप्पल पहने, जनता की बात करने वाला

बग्गा जी कहते हैं उर्फ़ रियल पत्रकार की छवि

मैं जिस संस्थान में काम करता हूँ वहाँ एक बग्गा जी हैं जितेन्द्र बग्गा। क्राइम रिपोर्टर हैं. मेरे बारे में अक्सर वह कहतें हैं की विजय रियल पत्रकार लगता है. बिल्कुल दबा कुचला, पैर में चप्पल पहने जनता की बात करने वाला. वो ये बात मेरे लिए क्यों कहतें हैं मुझे पता है और यह मेरे लिए नया भी नहीं है. इससे पहले मैं भाषा में भी कुछ दिन रहा. वंहा के संपादक कुमार आनंद को भी मेरी यह छवि पसंद नहीं आई. उन्होंने इसे कस्बाई पत्रिकाओं वाली छवि करार दिया. उनके सामने भी जब मैं पहली बार गया था तो बिल्कुल उसी गेटअप में जैसे मैं हमेशा रहता हूँ. शर्ट बाहर किए, पैर में चप्पल पहने और पार्टी कांग्रेस में मिला जुट वाला बैग लिए हुए.

संपादक महोदय ने इसे कस्बाई छवि वाला पत्रकार का नाम दिया और साथ ही हिदायत भी की, यह नही चलेगा. खैर मेरी यह छवि संसद मार्ग पर बने उस बड़े से आफिस से बिल्कुल ही मेल नहीं खाता था. लेकिन हरकतों में बहुत बदलाव नहीं आया और मुझे वंहा आगे काम कराने का मौका भी नहीं मिला.

मौजूदा संस्थान के संपादक से मैं पहली दफा बिल्कुल उसी गेटअप में मिला. बात करते करते वह कई बार मुझे ऊपर से नीचे तक देखें. मेरे झोले को देखें. इसलिए जब बग्गा जी यह बात कहते हैं तो मुझे कतई यह बुरा नहीं लगता. बस कुछ सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ की वास्तव में रियल पत्रकार की छवि क्या उसके कपडे और चप्पलें तय करतीं हैं. फ़िर मैं आपने ब्लॉग को खोलकर उन पत्रकारों की कहानी पढ़ता हूँ जिन्हें पुलिस माओवादी बता कर गिरफ्तार किया है. क्या उनकी भी यही छवि रही होगी. आख़िर आज आदमी का गेटअप क्यों यह तय कराने लगा है की वह कैसा होगा.

आज जब हम आम आदमी की बात करतें हैं तो आधिकंश लोगों इसे अजीब तरह से लेतें हैं. इस बने बनाये खाके से अलग हट कर कुछ करना चाहों तो यह व्यवस्था तुरंत आपको मावोवादी या नक्सली करार देती हैं. मीडिया में आकर कई अच्छे लोग भी मज़बूरी में या व्यवस्था से न लड़ पाने के कारन उसी के होकर रह जातें हैं. लेकिन अभी भी कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस व्यवस्थ में रह कर भी इससे लड़ रहें हैं और ख़ुद को जिंदा रखें हैं.

मेरे सामने एक इसे भी पत्रकार का उदाहरण हैं. अनिल चमडिया ऐसे ही एक पत्रकार हैं जो शायद आने वाली पीढ़ी के हम जैसे युवा पत्रकारों का आदर्श बन सकतें हैं. जो ख़ुद भी ऐसे तमाम अनुभवों से गुजरें हैं. उनके यह अनुभव ही मुझमे यह साहस भरतें हैं की व्यवस्था से लड़ना कठिन तो है, नामुमकिन नहीं. इसके लिए बस तय करना होगा की आप किस तरफ़ बहना चाहतें हैं नदी के साथ या उसके विपरीत.

((विजय प्रताप के ब्लाग जंतर-मंतर http://jantarmantarloktantantar.blogspot.com/ से साभार। इस ब्लाग का मैं भी सदस्य बना हूं, पिछले दिनों। विजय भाई, शानदार लिखा है। शानदार जिया है। धारा के विपरीत जीने में ही मजा है। अगर हम सिस्टम के खिलाफ जीते हुए इंज्वाय करने लगे तो फिर जो भी मुश्किलें आती हैं, वो जानी पहचानी सी लगती हैं। ....यशवंत))

30.5.08

चार दिन से रेल की पटरियां जाम है!

प्रतिभा कुशवाहा
----------------
चार दिन से रेल की पटरियां जाम है! कूड़े के ढेर से नहीं बल्कि लाशों से। लाशें किसी गैरों की नहीं अपनों की। मरूभूमि की तपिश ही इन लाशों का दाह-संस्कार कर रही है क्योकिं पुलिस इन्हें अपनों को नहीं सौंप रही है। उनकी मां, बहनें, पत्नियां रो-रोकर छाती पीट रही है, इस समय उनके दिमाग में कही भी कोई मांग नहीं है। बस एक गुजारिश है कि यह खेल बंद किया जाए। उनके गालों पर सूखे हुए आंसू एवं रूंधा गला खुदा से अपने प्रिय के प्राण वापस चाहती है।

रेल की पटरियों के समान कभी भी मानवता एवं राजनीति नहीं मिलती है। बस साथ-साथ चलती है, दोनों एकदूसरे के सहयोग नहीं कर पाते क्योकिं कुछ लोग ऐसा नहीं चाहते। वह नहीं चाहते कि राजनीति का ‘मुखड़ा’ सुंदर हो। उन्होंने राजनीति को सभी प्रकार की विकृतियों का अखाड़ा बना दिया है। बड़े गर्व से कहते है कि आओ, ‘इस अखाड़े में अपने-अपने करतब दिखाओ। और देखना कि मूर्ख, अनपढ़ लोग कैसे हमारे तमाशों पर ताली पीटते ...। किलविसी मुस्कान के साथ उनके दिमाग के किसी कोने पर यह विकृति आती है कि ‘इस तरह बारी-बारी से अपने करतब दिखा कर हम अपना पेट पालते रहेगे और साथ ही कई पीढीयों तक का जुगाड़ भी कर लेगे।’

चार दिन से रेल की पटरियां जाम है! कुछ फालतू के लोग आने-जाने के लिए मरे जा रहे है। यह नहीं कि इतनी गर्मी में यात्रा करना सेहत के लिए हानिकारक है। अरे! रोजी-रोटी के लिए हमें जाना है। ‘क्यों, घास की रोटियां खतम हो गई, जो हमारे राजा ने खाई थी।’ हमारा बच्चा बीमार है! क्या इस देश की जनसंख्या कुछ कम है? रोज तो रेल चलती है दो-चार दिन नहीं चलेगी तो क्या...। कमबख्त, भिकमंगे कहीं के! रेल से यात्रा करेगें। चार दिन से रेल की पटरियां जाम है! अभी उच्चाधिकारियों की मीटिंग चल रही है, सभी बड़े मुद्दो पर व्यस्त है। कार्यवाही चल रही है, देखिए क्या नतीजे निकलते है। सब कुछ अपनी गति से हो रहा है, कब तक होगा पता नहीं। हर बड़े काम में समय तो लगता है।

अभी-अभी खबर है कि पटरियों पर पड़ी लाशें एक-एक कर गायब हो रही। विपक्ष का दावा है कि सत्ता वाले ऐसा काम कर रहे है क्योकिं हम लाश पर राजनीति कर रहे थे, वह नहीं कर पा रहे है। इसी जलन के चलते वे ऐसा कर रहे है। अत: हम मांग करते है कि लाशों के गायब होने पर सीबीआई जांच करवाई जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम और लाशें गिरा देगे। तभी एक बच्ची फुसफुसा कर कान में कहती है, ‘एक काला-मोटा, भैंस पर सवार आदमी (यमराज) सभी लाशें ले गया है।’ लगता है उन्होंने अपनाधंधा-पानी बदल लिया है। और बदले भी क्यों न, उनके पेट पर हमने जो लात मार दी है! लाशों के ढेर लगाकर।

(प्रतिभा कुशवाहा ने इस व्यंग्य को भड़ास पर प्रकाशित करने के लिए मेल किया था। उन्हें धन्यवाद।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश माथुर का निधन




वरिष्ठ पत्रकार राजेश माथुर का गुरुवार को निधन हो गया।

68 वषीय माथुर को पिछले कुछ समय से फेफड़ों में तकलीफ थी। उनके परिवार में दो पुत्र व एक पुत्री है।

20 जनवरी 1940 को उज्जैन में जन्मे राजेश माथुर ने दैनिक नवयुग से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। 1962 से 1992 तक वे राजस्थान पत्रिका में रहे। इस दौरान उन्होंने मिडलची के नाम से `मझधार में´ कॉलम लिखा। मध्यमवर्ग की समस्याओं पर माथुर का यह कॉलम व्यंग्य पर आधारित था। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में माथुर की कई व्यंग्य रचनाएं प्रकाशित हुई। माथुर को पत्रकारिता के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार भी मिला।



भड़ास की तरफ से राजेश जी को श्रद्धांजलि।



(साभारः http://shuruwat.blogspot.com/)

24.5.08

मेरा पहला साक्षात्कारः और मैं हारे हुए जुवारी की तरह दफ्तर से निकल आई

प्रतिभा कुशवाहा पत्रकार हैं, बड़ा पत्रकार बनने का सपना लेकर दिल्ली आई हुई हैं, स्ट्रगल कर रही हैं, दिल्ली को सीख रही हैं, दिल्लीवालों समझ रही हैं, तरह तरह के खट्टे- मीठे अनुभवों के जरिए अपनी सोच समझ को विस्तार दे रही हैं।

वे उन आम हिंदी पत्रकारों की तरह ही हैं जिनका पत्रकारिता में कोई गाडफादर नहीं है, कोई चाचा, पापा काका या भाई संपादक नहीं है।

जो कुछ करना है, खुद से करना है। जो कुछ पाना है, खुद की मेहनत से पाना है। सेल्फ मेड हैं प्रतिभा।

उन्होंने मुझे एक मेल भेजकर इस रचना को भड़ास पर डालने का अनुरोध किया है। वे इस रचना को व्यंग्य रचना बताती हैं पर मुझे तो ये हिंदी पत्रकारिता का सच नजर आता है। पढ़िए और प्रतिभा का साहस बढ़ाइए ताकि दिल्ली के दुखों को जल्द पारकर एक ठीकठाक मुकाम तक पहुंच जाएं।

-यशवंत

-----------------------

मेरा पहला साक्षात्कार
-प्रतिभा कुशवाहा-

पत्रकार बनने का भूत सवार हुआ। सभी ने मुझे बहुत समझाया-पत्रकारिता में क्या रखा है, भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। लेकिन मैने पूरे जोश से पैरोकारी की समाज सेवा की दुहाई दी। बड़े से बड़े पत्रकारों के नाम लिए लेकिन सब बेकार आखिर मैने भी मूढ़ लोगों की बात न मानते हुए बगावत का बिगुल बजा दिया और झटपट पत्रकारिता के क्षेत्र में टांग अड़ा दी।

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद जंगे मैदान में आ डटी। मैने अपनी कलम चारों दिशाओं में भांजी और कहा अब समाज के दुश्मनों की छुट्टी हो जाएगी और पूरे जोश के साथ पत्रकारिता के मदिंरों (समाचार पत्र के दफ्तरों) में माथा टेकने लगी। प्रसाद और आर्शिवाद की उम्मीद लिए मुझे कही-कही दर्शन मिलना भी मुश्किल हो गया।

परेशान होकर मैने अपने कुछ पत्रकार मित्रों (जो अब तक पत्रकार रूपी जीव बन गए थे)से सम्पर्क साधा, पूछा- बंधुवर! ये बताइए कि मुझे कब इन समाचारायल में प्रवेश मिलेगा?

मेरी बात सुनकर वे थोड़ा मुस्कराएं, फिर सगर्व बोले- तुम्हारी कोई जान पहचान है?

इस प्रश्न पर मुझे आश्चर्य कम गुस्सा अधिक आ रहा था क्योकिं मेरी पुश्तों में किसी ने पत्रकारिता का नाम तक नहीं सुना था और ये परिचय की बात कर रहे हैं। अत: मैने ‘न’ में सिर हिलाया।

इस सिर हिलाऊ उत्तर पर उसने भी फिल्मी डाक्टर की तरह आजू-बाजू सिर हिलाकर बोले-‘तब तो तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता’। और मै मनमोहन सिंह की तरह खून का घूट पी कर रह गयी।

खैर, इस घटना के बाद मै बिल्कुल निराश नहीं हुयी और एक राजनीतिक पार्टी की भातिं मैने तुरंत दावा किया कि इस बार मेरी ही सरकार बनेगी। और पूरे जोशोखरोश के साथ अपने अभियान में लग गयी। आखिर एक दिन मोनालिसा की मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी क्योंकि काफी जद्दोजहद के बाद मुझे एक मंदिर में दर्शन के लिए बुला लिया गया। मै पूरे साजो-सामान के साथ सम्पादक महोदय के सामने उपस्थित हुई और तुरंत ही अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया।

मैने कहा, ‘श्री मन् मैं लिखती हूं, जो थोड़ा बहुत यहां-वहां छपता रहता है’ यह कहते हुए मैने अपने कार्य कौशल की थाथी उनके मेज पर खिसका दी।

लेकिन यह क्या?

उन्होंने किसी अछूत कन्या की तरह मेरी फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और सीधे सवाल दाग दिया। ‘आपने अभी तक क्या सीखा है?’

मैं भी कहां चुप रहने वाली, एक भाट की तरह अपने सारे छोटे-बड़े गुणों का बखान कर दिया।

लेकिन यह क्या? आफताब शिबदसानी की तरह उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आए।

उन्होंने मुझसे दूसरा सवाल किया, ‘आप किस बीट पर काम करना चाहेगी।’

मैंने तुरंत ही कहा, समाजिक एवं सांस्कृतिक।

‘तब तो आप ऐश-अभिषेक की न्यूज ला सकती है’ उन्होंने पूछा।

मैने कहा, श्रीमन्! यह तो किसी के निजी जीवन में दखलंदाजी है।

उन्होंने तीसरा प्रश्न किया, ‘आप कोई स्टिंग आपरेशन कर सकती है।’

मैने कहा, नहीं! श्रीमन्, यह झूठ और फरेब पर आधारित है, सच्ची पत्रकारिता के विरूद्घ है।

‘आप शिल्पा-गिरे जैसे प्रकरण की फोटो ला सकती है।’ उन्होंने चौथा प्रश्न किया।

मैने कहा, श्रीमन्! ‘यह कैसे हो सकता है? यह तो आप के पालिसी के विरूद्घ है।’

इस पर वे आंखे निकालते हुए बोले, अब तुम हमें हमारी पालिसीज के बारे में बताओगी। महोदया! आप में पत्रकार वाले एक भी गुण नहीं है। जाइए, पहले कुछ सीखिए, फिर आइए।

और एक हारे हुए जुआरी की तरह मै दफ्तर से निकल आयी। बाहर आने के बाद मैने अपनी हार का ठीकरा अपने पत्रकारिता इंस्टीट्यूट के ऊपर फोड़ दिया। जहां हमें गलत तरीके की शिक्षा दी गयी थी। अत: अब मैने दफ्तरों के चक्कर लगाने बंद कर दिए है। मै अब ऐसे इंस्टीट्यूट की तलाश में हूं जहां मुझे सच्चा पत्रकार बनने के वास्तविक गुणों की शिक्षा दी जाए।

15.5.08

अशोक शास्त्री की याद में ...

क्लब में वो शीशम का वो पेड़ तो पहले ही कट चुका था जिसके साये में अशोक जी की महफिल जमती थी

प्रेमचन्द गां¡धी

कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन पर कभी यकीन नहीं आता यह जानते हुए भी कि यही सच है। अशोक शास्त्री नहीं रहे विश्वास नहीं होता। बार-बार जेहन में मिर्जा गालिब का एक शेर गूंजता है-थी वो इक शख्स के तसव्वुर सेअब वो रानाई-ए-ख़याल कहा¡सचमुच उस शख्स में एक जादू था जिसमें बं¡धकर हर कोई खिंचा चला आता था। उस जादू को आखिर क्या नाम दिया जाये? गौरवर्ण, मेधा और ज्ञान से दिपदिपाता चेहरा, कपड़ों से झां¡कती सादगी भरी नफासत और वाणी के माधुर्य में घुले शब्दों से झलकती विद्वता किसी को भी एक पल में ही बां¡ध लेने के लिए काफी थी। हरदम अपनी वाग्मिता और ज्ञान की चुटकियों से चमत्कृत करने वाले अशोक शास्त्री आज हमारे बीच नहीं हैं। जयपुर की साहित्यिक-सांस्कृतिक बिरादरी में एक कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा छाया हुआ है।अशोक शास्त्री अलवर से जयपुर आने वाले पत्रकारों की उस पीढ़ी के नायक थे जिसने राजस्थान की पत्रकारिता में अपना एक खास मुकाम बनाया है। अशोक शास्त्री, जगदीश शर्मा और ईशमधु तलवार की एक तिकड़ी थी और इस तिकड़ी में जगदीश शर्मा और ईशमधु तलवार जयपुर आने वाले शुरुआती पत्रकार थे। अशोक शास्त्री इनके बाद जयपुर आये। अलवर में अशोक शास्त्री ने पत्रकारिता के क्षेत्र में जो काम किया, वह आज एक इतिहास बन चुका है। इतिहास इस रूप में कि पत्रकारिता में अब वैसा दौर शायद कभी नहीं लौट सकेगा। अशोक शास्त्री ने तरुण अवस्था में वो काम किया जिसे बड़े-बड़े लोग नहीं कर पाते। दैनिक ‘अरानाद’ के युवा सम्पादक अशोक शास्त्री ने स्थानीय जरुरतों के लिहाज से पाठकों की अपेक्षा और आकांक्षाओं की पूर्ति करते हुए अलवर के इतिहास का उस जमाने में एक ऐसा लोकप्रिय अखबार निकाला जिसकी अलवर शहर में प्रसार संख्या उस वक्त प्रदेश के सबसे बड़े अखबार से भी ज्यादा थी। ‘अरानाद’ एक सहकारी प्रयास था जिसमें कर्मठ और प्रतिबद्ध लोगों की थोड़ी-थोड़ी पूं¡जी लगी हुई थी। लेकिन बड़ी पूं¡जी के आगे आखिर कब तक यह सहकारी प्रयास टिक सकता था? आखिरकार जब सारी पूं¡जी खत्म हो गई तो मास्टर बंशीधर जी ने अपने प्रेस में अखबार को इस तिकड़ी के कहने पर तीन दिन और छापा। बंषीधर जी कवि ऋतुराज और लेखक सुरेश पंडित के ससुर थे।अशोक शास्त्री एक प्रयोग की असफलता से घबराने वाले नहीं थे। कुछ अरसे बाद उन्होंने एक और प्रयास किया तो साप्ताहिक ‘कुतुबनामा’ का आगाज हुआ। तीखे राजनैतिक तेवर और गहरी साहित्यिक-सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न इस साप्ताहिक ने जल्दी ही प्रान्तीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी। इस प्रयोग में प्रदेश के अनेक युवा पत्रकार जुड़े। लेकिन एक-एक कर तीनों मित्रों के जयपुर आने से ‘कुतुबनामा’ को भी इतिहास में दर्ज होना पड़ा। अशोक शास्त्री जयपुर आये तो राजस्थान पत्रिका और इतवारी पत्रिका में सम्पादकीय दायित्वों के तहत इन पत्रों को अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पूरित कर एक नयी दृष्टि दी। यह अशोक शास्त्री की कोशिशों का ही नतीजा था कि पूरे प्रान्त की सृजनात्मक प्रतिभाओं को राजस्थान पत्रिका प्रकाशनों के माध्यम से एक राज्यव्यापी मंच मिला। इतवारी पत्रिका को राष्ट्रीय स्तर पर एक गम्भीर दृष्टिसम्पन्न साप्ताहिक के रूप में पहचाना गया। उस वक्त राजस्थान पत्रिका और इतवारी पत्रिका में लिखने वाले लेखक-पत्रकार आज देश के शीर्षस्थ लेखकों में गिने जाते हैं मसलन ओम थानवी, राजकिशोर और प्रयाग शुक्ल।पढने और नये-नये विषयों में यूं तो अशोक शास्त्री की रूचि बहुत पहले से थी लेकिन इन्हीं दिनों अशोक शास्त्री की दिलचिस्पयों में साहित्य शीर्ष पर आया। वे सामान्य पत्रकारिता से हटकर गम्भीर साहित्य की ओर उन्मुख हुए। कृष्ण कल्पित, सत्यनारायण, संजीव मिश्र, विनोद पदरज, राजेन्द्र बोहरा, मनु शर्मा, मन्जू शर्मा, लवलीन, अजन्ता और सीमन्तिनी राघव के सम्पर्क से राजस्थान विश्वविद्यालय में अशोक शास्त्री जल्द ही एक लोकप्रिय व्यक्ति बन गये। राजस्थान पत्रिका के साथ-साथ विश्वविद्यालय भी उनकी बैठकबाजी का नया केन्द्र बन गया था। यहीं महान साहित्यकार रांगेय राघव की कवयित्री पुत्री सीमन्तिनी से उनकी मैत्री विवाह सम्बन्ध में बदली।यह अशोक शास्त्री के जीवन का नया दौर था जिसमें उन्हें कुछ असाधारण काम करने थे। सबसे पहले उन्होंने उस परिवार का दायित्व सं¡भाला जिससे जुड़कर उनके भीतर के रचनात्मक पत्रकार को गहरा सुकून मिलना था। अशोक शास्त्री ने स्वर्गीय रांगेय राघव के प्रकाशित-अप्रकाशित लेखन को खोजा- ढू¡ढा और सम्पादित कर व्यवस्थित रूप से प्रकाशित कराया। रांगेय राघव की मृत्यु के बाद उनके साहित्य को प्रकाश में लाने का जितना श्रेय श्रीमती सुलोचना रांगेय राघव का है उतना ही अशोक शास्त्री का भी। अशोक जी चाहते थे कि रांगेय राघव को प्रत्येक माध्यम में ले जाया जाये। इसलिये जब ‘कब तक पुकारू¡’ पर टीवी धारावाहिक बनाने की बात आई तो कृति के साथ एक माध्यम में अन्याय न हो इसी वजह को ध्यान में रखते हुए अशोक शास्त्री ने स्वयं पटकथा लिखने की ठानी। आज भारतीय टेलीविजन इतिहास के कुछ अविस्मरणीय धारावाहिकों में ‘कब तक पुकारूं’ का नाम अशोक शास्त्री की प्रतिभा और परिश्रम के कारण भी है। इन दिनों अशोक शास्त्री रांगेय राघव के उपन्यास ‘पथ का पाप’ पर एक फीचर फिल्म की स्क्रिप्ट को अन्तिम रूप दे रहे थे। सम्भवत: वे यह फिल्म गोविन्द निहलानी के लिए लिख रहे थे।अशोक शास्त्री जितना पढाकू लेखक-पत्रकार देश भर में ढू¡ढना मुश्किल है। उनके अध्ययन में कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण और आलोचना जैसी साहित्यिक विधाएं ही नहीं बल्कि धर्म, दर्शन, पुराण, उपनिषद, अध्यात्म, चित्रकला, सिनेमा, संगीत, जादू-टोना, भूत-प्रेत और विश्व साहित्य की विख्यात और कमख्यात कृतियों से लेकर दुनिया भर की लोक कथाएं भी शामिल थीं। एक इतालवी लोक कथा उन्होंने रंगकमीZ साबिर खान को सुनाई तो एक नाट्य कार्यशाला में उस पर राजस्थान का मशहूर नाटक तैयार हुआ ‘और रावण मिल गया’ जिसे अशोक राही ने लिखा था।अशोक शास्त्री की एक खासियत थी कि वे जितना पढते थे उसे सहज-सरल शब्दों में रोज शाम अपने दोस्तों के बीच सुनाते भी थे। इस तरह उन्होंने जयपुर में पता नहीं कितने मित्रों को विश्व साहित्य की महानतम कृतियों से परिचित कराया। पिंकसिटी प्रेस क्लब में एक दौर में उनकी शाम की महफिलों में आने वाले दोस्तों के लिए ताजा पढ़ी-लिखी रचना का परिचय देना जरुरी हो गया था। एक दफा तो उन्होंने शाम को नया शेर सुनाने की परम्परा ही डाल दी थी। इस तरह उनकी शाम की महफिलें केवल बतौलेबाजी की ही नहीं ज्ञान और अध्ययन की भी महफिलें थीं। अनेक लेख-पत्रकार रोज नये शेरों से लैस होकर आते थे। बहुत कम लोगों को पता है कि अशोक शास्त्री सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अद्भुत योजनाकार भी थे। उनके द्वारा बनाये गये डिजाइन पर जयपुर में दो अविस्मरणीय कार्यक्रम हुए। कवि ऋतुराज को `पहल सम्मान दिये जाने के अवसर पर कार्यक्रम में आये अतिथि रचनाकारों के लिए जयपुर के लेखक-पत्रकार-कलाकारों की ओर से एक शानदार पार्टी आयोजित की गई थी। ....इसी तरह जब कट्टरपंथियों ने मकबूल फिदा हुसैन के सरस्वती चित्र पर हल्ला मचाया तो अशोक जी ने अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में एक अनूठा विरोध-प्रदर्शन डिजाइन किया। इसमें शहर के हृदय स्थल स्टेच्यू सकिZल पर एक दिन का धरना दिया गया। धरने में चित्रकारों के साथ लेखक, पत्रकार, रंगकर्मीZ और बुद्धिजीवियों के साथ आम लोगों ने भी शिरकत की थी। हुसैन के सरस्वती चित्र की ढेरों प्रतिया¡ बां¡टी गई। चित्रकारों ने चित्र बनाए, कवियों ने कविताएं सुनाईं, कलाकारों ने गीत गाये और एक बड़े कैनवस पर हुसैन के समर्थन में हस्ताक्षर किये गये। इस विरोध-प्रदर्शन में यू¡ तो सभी संगठनों के लोग शामिल थे लेकिन अशोक जी चाहते थे कि इसे किसी संगठन विशेष या समूह के बजाय सामूहिक सांस्कृतिक प्रतिरोध की तरह जाना जाये। वे हुसैन का समर्थन सांस्कृतिक और संवैधानिक धरातल पर आमजन के साथ किये जाने के पक्षधर थे। उस रोज पुलिस-प्रशासन और गुप्तचर विभाग के लोग दिन भर पूछते रहे कि आखिर इस धरने की आयोजक संस्था और उसके पदाधिकारी कौन हैं। बकौल अशोक जी उस दिन एक नई फाइल खुली होगी जिसमें इतने ज्वलन्त मुद्दे पर व्यापक जनभागीदारी को रेखांकित किया गया होगा। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इन दोनों आयोजनों के लिए खुद अशोक जी ने भी चन्दा इकट्ठा किया था। प्रेस क्लब में एक बार उन्होंने नये निर्माण के लिए पेड़ काटे जाने के खिलाफ जबर्दस्त आन्दोलन चलाया। उस आन्दोलन के चलते प्रेस क्लब चुनावों में वोटों की राजनीति की एक विचित्र शुरुआत हुई, जिसे आज हम फलता-फूलता देख रहे हैं। ....इसे सिवा दुर्भाग्य के क्या कहा जाये कि हमारे यहा¡ दिवंगतों को श्रद्धांजलि देने का भी लोगों में सलीका नहीं है। जिस प्रेस क्लब को अशोक जी बुद्धिजीवियों का केन्द्र बनाने का प्रयास कर रहे थे, वहीं आयोजित शोक सभा में लोगों ने मृत्यु के कारणों की चर्चा के बहाने अशोक शास्त्री की तमाम उपलब्धियों को नकारते हुए सारी चर्चा क्लब और मदिरापान पर केन्द्रित कर दी। इस किस्म के त्वरित मूल्यांकनों से कभी सही नतीजों पर नहीं पहु¡चा जा सकता, क्योंकि कल लोगों के खान-पान में सिगरेट-जर्दा-पान-सुपारी-मीठा-नमकीन-दूध-चाय-कॉफी जैसे बहानों को मृत्यु का कारक मान लिया जाएगा।आज इण्डियन कॉफी हाउस और प्रेस क्लब की वो जगहें खामोश हैं जहा¡ कभी अशोक जी के ठहाके गू¡जते थे या ज्ञान की सरिता बहती थी। क्लब में वो शीशम का वो पेड़ तो पहले ही कट चुका था जिसके साये में अशोक जी की महफिल जमती थी। अपने आखिरी दिनों में उन्होंने क्लब में अपने लिए छत चुनी थी वो भी शायद मजबूरी में क्योंकि उस छत से भी वो हाहाकारी बाजार दिखता था जिसे अशोक जी सख्त नापसंद करते थे। आज उस शख्स की गैर मौजूदगी में ना प्रेस क्लब जाने का मन करता है और न ही उन किताबों को देखने का जिन पर उन्होंने लिखा था – प्रे च के लिए : अ शा। अपने आखिरी दिनों में अशोक जी ने मुझसे इरविंग स्टोन की ‘लस्ट फॉर लाइफ ‘का हिन्दी अनुवाद जयपुर में तलाश करने के लिए कहा था। जीवन के प्रति ऐसी उत्कट अभिलाषा लिए खूबसूरत खयालों वाला शख्स आज हमारे बीच नहीं है तो लगता है कि मिर्जा गालिब ने यह शेर अशोक जी जैसे लोगों के लिए ही लिखा था:थी वो इक शख्स के तसव्वुर सेअब वो रानाई-ए-खयाल कहां¡।
Posted by Poet from Pinkcity

http://prempoet.blogspot.com/

12.5.08

शहीद पत्रकार को श्रधांजलि

मित्रों बड़ी दुखद घटना है, आतंक के निशाने पे कोई भी कहीं भी........
श्री अशोक सोढी जो कि कश्मीर से प्रकाशित अंग्रेजी "दैनिक एक्स्सल्सर" के छायाकार थे कल वो कश्मीर में आतंकी हमले को कवर कर रहे थे, और इसी कार्य के दौरान आतंकवादियों के गोलियों का निशाना बन गए. हम भडास परिवार आतंकी गतिविधियों कि भर्त्सना करते हैं और भाई अशोक के आत्मा कि शांति के लिए इश्वर से प्राथना करते हैं. हमारी गहरी संवेदना अशोक भाई के परिवार के साथ है, इश्वर उनके परिवार को इस विपत्ति से लड़ने कि शक्ति दे.
जय जय भडास