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26.7.08

वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार गौतम के दुख को महसूस करिए


इस दुनिया में दोस्त तभी तक हैं जब तक आप स्वस्थ, खुशहाल और तरक्की की राह पर हों। जिस दिन आप अकेले हो जाते हैं, किसी भी तरह पीड़ित हो जाते हैं, संघर्ष की स्थिति में होते हैं, परेशान और दुख से भरे होते हैं.....उन दिनों में आपका साया भी आपका पीछा छोड़ जाता है। ये बातें कोई नई नहीं हैं पर हम अक्सर इसे भूल जाते हैं और अपने पद-पैसे के गुरुर में अपनों को भूल जाते हैं। भड़ास हमेशा से ऐसे लोगों के साथ चट्टान की तरह खड़ा हुआ है जो परेशानहाल हैं।


करुणाकर की मुहिम अभी भड़ास के मोर्चे का मुख्य एजेंडा बना हुआ है तभी एक और दुख भरी खबर हम लोगों तक पहुंचती है। सुनील कुमार गौतम दैनिक हिंदुस्तान, पटना में डिप्टी न्यूज एडीटर हैं लेकिन वे इस कदर परेशान हैं कि उनकी पीड़ा को संभवतः कोई समझ ही नहीं सकता। एक वरिष्ठ पत्रकार का पिछले चार वर्षों से जीवन सिर्फ अस्पतालों में बीत रहा है। तरह तरह के इलाज करवा रहे हैं। पर फायदा कोई नहीं। सुनील कुमार गौतम चार वर्षों से अल्सरेटिव कोलाइटिस नामक पेट की बीमारी से पीड़ित हैं। वे अब तक बीएचयू मेडिकल कालेज बनारस, एसजीपीजीआई लखनऊ, आईजीआईएमएस और पीएमसीएट पटना के अतिरिक्त कई निजी गैस्ट्रो क्लीनिकों में इलाज करवा चुके हैं। पर उनकी स्थिति सुधर नहीं रही। इस दौरान सुनील जी के उपचार पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।


अब वे इलाज के लिए एम्स दिल्ली में आ रहे हैं। इलाज कराते कराते सुनील जी का परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है। वे जो कुछ कर रहे हैं सब व्यक्तिगत स्तर पर कर रहे हैं। वे दिल्ली भी खुद के खर्चे पर इलाज कराने आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि एम्स में उनका तीन चरणों में आपरेशन होगा जिसमें करीब 5 लाख रुपये खर्च आएंगे। अन्य खर्चे अलग से।


सुनील जो को अब सामाजिक, सामुदायिक और सरकारी मदद मिलनी चाहिए। समाज के जाग्रत लोगों और बुद्धीजिवियों से अनुरोध है कि वे एक वरिष्ठ पत्रकार के दुख में शामिल हों और उन्हें स्वस्थ कराने के लिए आगे आएं। जरूरी नहीं कि आप सिर्फ आर्थिक मदद करें तभी मदद कही जाएगी, आप का भावनात्मक सपोर्ट भी एक दुखी को खुशियां प्रदान कर सकता है। जैसा कि हमारे डाक्टर रूपेश ने पिछले दिनों करूणाकर के मामले में कर दिखाया। मुंबई से दिल्ली आकर 48 घंटे तक मरीज के साथ रहकर उन्हें करुणाकर के चेहरे पर वो मुस्कान ला दी जिसे उसका परिवार देखने को कई महीनों से तरस रहा था।


फिलहाल मैं खुद यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि सुनील जी की मदद हम लोग किस तरह कर सकते हैं। करुणाकर के मामले में आर्थिक मदद की अपील बहुत प्रभावी नहीं रही इसलिए अब आर्थिक मदद की अपील करने से बचना चाह रहा हूं।


इस बार मैं सभी भड़ासियों और सभी प्रबुद्ध साथियों पर छोड़ रहा हूं कि वो खुद बतायें कि हम लोग इस मामले में क्या करें।


सुनील जी से संपर्क के लिए आप उनसे उनके मोबाइल नंबर 09431080582 पर फोन कर सकते हैं या उनके घर के लैंडलाइन फोन 0612-2578113 पर काल कर सकते हैं। सुनील जी का बैक एकाउंट नंबर भी भड़ास के पास भेजा गया है जो इस प्रकार है - bank account no - 2201050040687 HDFC bank।

पटना के एक भड़ास के शुभचिंतक साथी ने सुनील जी के मामले को भड़ास तक पहुंचाया, इसके लिए मैं उनका दिल से आभारी हूं।


जिस तरह करूणाकर के इलाज व देखरेख का जिम्मा एक भड़ासी साथी व पत्रकार अमित द्विवेदी ने उठा रखा है, उसी तरह अगर कोई साथी सुनील जी के मामले में आगे आए तो कोई पहल की जा सकती है।
फिलहाल तो मैं सुनील जी के दुख में खुद को शामिल कर रहा हूं। हम सब मिलकर सोचते हैं कि हमें क्या करना चाहिए।

दिल्ली के पत्रकार यूनियनों, सरकार के मंत्रियों, बुद्धिजीवियों आदि से हम किस तरह संपर्क कर सुनील जी के लिए कुछ कर सकते हैं, इस बारे में आप सभी के विचार आमंत्रित हैं।

25.3.08

क्या औरत जिंस है?

((प्रिय यशवंत जी,
नमस्कार.
मेरा नाम प्रभाकर मणि तिवारी है. मैं बीते 17 वर्षों से जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में हूं. लंबे अरसे तक पूर्वोत्तर में काम करने के बाद बीते सात-आठ वर्षों से कोलकाता में हूं. आपके ब्लाग का नियमित पाठक भी हूं. खासकर तकनीकी चुनौतियों से जूझने में मजा आता है. अभी मैंने भड़ास पर पढ़ा कि क्रूतिदेव को यूनीकोड में कैसे बदले. किन्हीं सुनील साव के लेख के संदर्भ में. मैं यहां एक लिंक भेज रहा हूं. माइक्रोसाफ्ट के बनाए इस टीबीआईएल डाटा कनवर्टर (लगभग सात एमबी की जिप फाइल है) को नीचे दिए गए लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है. इससे बहुत से फांट्स को यूनीकोड में बदला जा सकता है. नमूने के तौर पर मैंने सुनील जी के लेख को यूनीकोड में बदल दिया है. इस मेल की सूचना को आप भड़ास पर डाल सकते हैं. लेकिन निजी जानकारियों व मोबाइल नंबरों को कृपया अपने तक ही सीमित रखें.
सादर,
प्रभाकर मणि तिवारी
((prabhakarmani@gmail.com))

To Download TBIL DATA CONVERTER Pls go this site.
http://www.bhashaindia.com))

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सुनील साव का मूल लेख इस प्रकार है, जिसे कृतिदेव से यूनीकोड में प्रभाकर जी ने तब्दील कर भड़ास के लिए भेजा है.....

उस दिन रविवार का दिन था । सुबह देर से उठने के बाद मैं चाय की दुकान की ओर चाय पीने के लिए चल पड़ा । मैं चाय की दुकान की ओर जा ही रहा था, कि मेरी मुलाकात मेरी एक महिला मित्र से हुई । वह भी मेरे साथ चल पड़ी । इस दौरान हमारी बातचीत होने लगी । बातों - बातो मे मुझे मालूम हुआ कि उसके पति ने उसे छोड़ दिया है और वो परेशान है। इस बात की चर्चा से ही वह भावुक हो गई। मैने उसे सांत्वना भरे दो शब्द कहे। कहा जाता है कि खाने को गुड़ मत दो लेकिन गुड़ की तरह बात बोल दो । इस सांत्वना भरे शब्द ने उसका विश्वास मेरे उपर और बढ़ा दिया। और उसने मुझे सारी बातें बताई। जिसे सुनने के बाद मुझे बहुत दुख हुआ। जब हम चाय पीने के बाद चलने लगे, तो उसने मुझसे एक सवाल पूछ दिया कि क्या औरत जिंस है। जिसका जबाव शायद उस समय मेरे पास नही था। इसके बाद मैने उस बारे में कभी दोबारा नही सोचा,लेकिन वो बात मेरे दिमाग में कही घर कर गयी थी, कि क्या औरत एक जिंस है। जिसे इस्तेमाल करने के बाद फेंक दिया जाता है। हजारों महिलाएं हर दिन इस पुरूष प्रधान समाज में प्रताड़ित की जाती है। हर मिनट एक औरत या लड़की का बलात्कार होता है, लेकिन उनकी बारे में शायद ही कोई सोचता है। प्यार के नाम पर कितनी लड़कियां रोज हजारो पुरूषों के हवस का शिकार बनती हैें। समाज में स्त्री सिर्फ और सिर्फ पुरूषों के हाथो का एक खिलौना बन कर रह गयी है। जिसे कोई भी आदमी सिर्फ जिंस की तरह इस्तेमाल करता है और फिर फेंक देता है। नारी के लिए स्वावलंबी,निडर,स्वाभीमानी और पता नही क्या क्या शब्द इस्तेमाल किये जाते हैं । लेकिन वास्तविकता यह है, कि प्रतिदिन कॉल सेंटरों में,सड़को पर हजारो महिलायों के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है।

अगर एक महिला के साथ बलात्कार हो जाता है, तो वह महिला एक मुकदमा कराने में भी हिचकिचाती है। रर्इ्रसजादे महिलायों को सिर्फ अपनी जरूरतों को पुरा करने के लिए इस्तेमाल करते हैें।आज भी गॉंवो में महिलायों का शोषण किया जाता हैें।बड़े महानगरो मे काम दिलाने का लालच देकर ठेकेदार उनका शारीरिक शोषण करते हैैं। लेकिन शायद हमें गलतफहमी मे जीने की आदत सी हो चली है। कहा जाता है कि भ्रम का कोई इलाज नही होता है।तो इसे हम इसे भ्रम माने या सच्चाई कि महिलाएं स्वावलंबी और स्वाभीमानी हो गयी है।आज के दौर मे महिलायों का इस्तेमाल ठीक उसी प्रकार हो रहा है ,जिस प्रकार एक व्यक्ति एक कपड़ा जैसे जिंस का इस्तेमाल उस समय तक ही करता है जब तक वह जिंस पुराना ना हो जाए या फिर फट न जाए । क्या नारी ठीक ऐसी ही होती जा रही है।

सुनील कुमार साव

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(सुनील जी, देखा आपने। प्रभाकर भाई ने आपकी रचना को यूनीकोड में बदलकर मेरे पास भेजा और मैंने उसे यहां डाल दिया। इसे कहते हैं असली दोस्ती। हम तीनों अजनबियों के बीच एक रिश्ता है तभी हम एक दूसरे को बिना जाने बिना पहचाने मदद करने में लगे हुए हैं। यही है हमारे देश व हमारे समाज की ताकत। सुनील जी, आप लगातार लिखते रहिए। कोशिश करिए यूनीकोड में ही लिखने का। यूनीकोड में लिखने को लेकर भड़ास में बाईं तरफ भड़ासी बनिए वाले कालम में एक लिंक होगा हिंदी में लिखने के बारे में, उसे क्लिक करने पर आपको ढेर सारे तरीके पता चलेंगे कि कैसे हिंदी में लिखा जा सकता है। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। प्रभाकर भाई, आपको शुक्रिया कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। बस, आपका प्यार बना रहना चाहिए, ये हम भड़ासियों की इच्छा है। सुनील जी, आप प्रभाकर जी को prabhakarmani@gmail.com पर मेल करके थैंक्यू जरूर बोल दीजिएगा। और हां, सुनील जी, आपने जो कुछ लिखा है, वो वाकई बेहद कड़वा सच है और एक गंभीर सवाल है जिस पर हम सभी को सोचना चाहिए। औरतों के प्रति नजरिया बदलने की सख्त जरूरत है, अगर नहीं बदलेंगे तो काफी दिक्कत होगी। आप लिखना जारी रखें। जय भड़ास, यशवंत)