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25.3.08

क्या औरत जिंस है?

((प्रिय यशवंत जी,
नमस्कार.
मेरा नाम प्रभाकर मणि तिवारी है. मैं बीते 17 वर्षों से जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में हूं. लंबे अरसे तक पूर्वोत्तर में काम करने के बाद बीते सात-आठ वर्षों से कोलकाता में हूं. आपके ब्लाग का नियमित पाठक भी हूं. खासकर तकनीकी चुनौतियों से जूझने में मजा आता है. अभी मैंने भड़ास पर पढ़ा कि क्रूतिदेव को यूनीकोड में कैसे बदले. किन्हीं सुनील साव के लेख के संदर्भ में. मैं यहां एक लिंक भेज रहा हूं. माइक्रोसाफ्ट के बनाए इस टीबीआईएल डाटा कनवर्टर (लगभग सात एमबी की जिप फाइल है) को नीचे दिए गए लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है. इससे बहुत से फांट्स को यूनीकोड में बदला जा सकता है. नमूने के तौर पर मैंने सुनील जी के लेख को यूनीकोड में बदल दिया है. इस मेल की सूचना को आप भड़ास पर डाल सकते हैं. लेकिन निजी जानकारियों व मोबाइल नंबरों को कृपया अपने तक ही सीमित रखें.
सादर,
प्रभाकर मणि तिवारी
((prabhakarmani@gmail.com))

To Download TBIL DATA CONVERTER Pls go this site.
http://www.bhashaindia.com))

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सुनील साव का मूल लेख इस प्रकार है, जिसे कृतिदेव से यूनीकोड में प्रभाकर जी ने तब्दील कर भड़ास के लिए भेजा है.....

उस दिन रविवार का दिन था । सुबह देर से उठने के बाद मैं चाय की दुकान की ओर चाय पीने के लिए चल पड़ा । मैं चाय की दुकान की ओर जा ही रहा था, कि मेरी मुलाकात मेरी एक महिला मित्र से हुई । वह भी मेरे साथ चल पड़ी । इस दौरान हमारी बातचीत होने लगी । बातों - बातो मे मुझे मालूम हुआ कि उसके पति ने उसे छोड़ दिया है और वो परेशान है। इस बात की चर्चा से ही वह भावुक हो गई। मैने उसे सांत्वना भरे दो शब्द कहे। कहा जाता है कि खाने को गुड़ मत दो लेकिन गुड़ की तरह बात बोल दो । इस सांत्वना भरे शब्द ने उसका विश्वास मेरे उपर और बढ़ा दिया। और उसने मुझे सारी बातें बताई। जिसे सुनने के बाद मुझे बहुत दुख हुआ। जब हम चाय पीने के बाद चलने लगे, तो उसने मुझसे एक सवाल पूछ दिया कि क्या औरत जिंस है। जिसका जबाव शायद उस समय मेरे पास नही था। इसके बाद मैने उस बारे में कभी दोबारा नही सोचा,लेकिन वो बात मेरे दिमाग में कही घर कर गयी थी, कि क्या औरत एक जिंस है। जिसे इस्तेमाल करने के बाद फेंक दिया जाता है। हजारों महिलाएं हर दिन इस पुरूष प्रधान समाज में प्रताड़ित की जाती है। हर मिनट एक औरत या लड़की का बलात्कार होता है, लेकिन उनकी बारे में शायद ही कोई सोचता है। प्यार के नाम पर कितनी लड़कियां रोज हजारो पुरूषों के हवस का शिकार बनती हैें। समाज में स्त्री सिर्फ और सिर्फ पुरूषों के हाथो का एक खिलौना बन कर रह गयी है। जिसे कोई भी आदमी सिर्फ जिंस की तरह इस्तेमाल करता है और फिर फेंक देता है। नारी के लिए स्वावलंबी,निडर,स्वाभीमानी और पता नही क्या क्या शब्द इस्तेमाल किये जाते हैं । लेकिन वास्तविकता यह है, कि प्रतिदिन कॉल सेंटरों में,सड़को पर हजारो महिलायों के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है।

अगर एक महिला के साथ बलात्कार हो जाता है, तो वह महिला एक मुकदमा कराने में भी हिचकिचाती है। रर्इ्रसजादे महिलायों को सिर्फ अपनी जरूरतों को पुरा करने के लिए इस्तेमाल करते हैें।आज भी गॉंवो में महिलायों का शोषण किया जाता हैें।बड़े महानगरो मे काम दिलाने का लालच देकर ठेकेदार उनका शारीरिक शोषण करते हैैं। लेकिन शायद हमें गलतफहमी मे जीने की आदत सी हो चली है। कहा जाता है कि भ्रम का कोई इलाज नही होता है।तो इसे हम इसे भ्रम माने या सच्चाई कि महिलाएं स्वावलंबी और स्वाभीमानी हो गयी है।आज के दौर मे महिलायों का इस्तेमाल ठीक उसी प्रकार हो रहा है ,जिस प्रकार एक व्यक्ति एक कपड़ा जैसे जिंस का इस्तेमाल उस समय तक ही करता है जब तक वह जिंस पुराना ना हो जाए या फिर फट न जाए । क्या नारी ठीक ऐसी ही होती जा रही है।

सुनील कुमार साव

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(सुनील जी, देखा आपने। प्रभाकर भाई ने आपकी रचना को यूनीकोड में बदलकर मेरे पास भेजा और मैंने उसे यहां डाल दिया। इसे कहते हैं असली दोस्ती। हम तीनों अजनबियों के बीच एक रिश्ता है तभी हम एक दूसरे को बिना जाने बिना पहचाने मदद करने में लगे हुए हैं। यही है हमारे देश व हमारे समाज की ताकत। सुनील जी, आप लगातार लिखते रहिए। कोशिश करिए यूनीकोड में ही लिखने का। यूनीकोड में लिखने को लेकर भड़ास में बाईं तरफ भड़ासी बनिए वाले कालम में एक लिंक होगा हिंदी में लिखने के बारे में, उसे क्लिक करने पर आपको ढेर सारे तरीके पता चलेंगे कि कैसे हिंदी में लिखा जा सकता है। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। प्रभाकर भाई, आपको शुक्रिया कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। बस, आपका प्यार बना रहना चाहिए, ये हम भड़ासियों की इच्छा है। सुनील जी, आप प्रभाकर जी को prabhakarmani@gmail.com पर मेल करके थैंक्यू जरूर बोल दीजिएगा। और हां, सुनील जी, आपने जो कुछ लिखा है, वो वाकई बेहद कड़वा सच है और एक गंभीर सवाल है जिस पर हम सभी को सोचना चाहिए। औरतों के प्रति नजरिया बदलने की सख्त जरूरत है, अगर नहीं बदलेंगे तो काफी दिक्कत होगी। आप लिखना जारी रखें। जय भड़ास, यशवंत)

3 comments:

Rohit Tripathi said...

Hamesha aurto ke peeche hi kyon pade rahte ho, pareshaniya purusho ko bhi hai, ho sakta hai aapko na ho... sabhi ke sath samasya hai... hamesha nari jaikar na karte rahah karo.

Rohit

Rohit Tripathi said...

aur ek baat, aap log ek insaan ki problem ko puri jat se kyon jod dete hai(aakhir media wale hai na kya kare asar jata hi nahi hai) ho sakta hai ki woh pareshan ho kyonki pareshani kisi ke sath bhi ho sakti hai. aur haan aaj blog likhte hue 1½ saal hone wala hai aur tab kahi jakar total 4 ya 5 comments aate hai, Aur kisi aurat ke blog par jakar dekhiyega bharmaar hogi waha comments ki

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

दादा,या तो मैं ही बड़ा वाला ढक्कन हूं या कुछ और ही समस्या होगी क्योंकि रवि रतलामी के बताने पर मैंने भी इस टीबीआईएल डाटा कनवर्टर को लेकर कबड्डी खेली लेकिन हाथ में आया क्या.....बहुत सारे डिब्बे और अजीब से गुचुड़-पुचुड़ संकेत ,लेकिन इन भाई साहब की किस्मत अच्छी है पक्का काम हो जाएगा ।