लेखक कहता हैः- " ये मेरी अंतिम पोस्ट और अंतिम पत्र है क्योंकि, अब मैं जीना नहीं चाहता, जिस वक़्त आप मेरा ये अंतिम पत्र यह पढ़ रहे होंगे, मैंने आत्मघात कर लिया होगा, अलविदा दोस्तों..!!"
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/05/blog-post_30.html
अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिये, मन हल्का हो जाएगा...
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Markand Dave
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Labels: आत्महत्या, ज़िंदगी, ब्लॉगर, मार्कण्ड दवे, मौत
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह बात अब केवल किताबों में ही सीमित रह गयी है। कृषि प्रधान देश का झुनझुना बजता रहता है। किसान आत्महत्या करते रहते हैं। खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं। देश वासियों की थाली से आज दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। और देश के कृषि मंत्री जी के पास अभी तक कृषि से सम्बंधित कोई नीति नहीं बनी है। दरअसल किसी नेता की पहचान उसके कार्य कलापों से होती है। केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी इसके अपवाद नहीं हैं। महाराष्ट्र की राजनीति के चतुर खिलाड़ी , राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार का मतलब क्रिकेट, शक्कर कारखाने और जमीन तक सीमित रह गया है। और इसी में उनकी रुचि है। यही वजह है की कृषि और किसान उनके चछु से ओझल हैं। अगर वाकई पवार अपना पावर (ताकत) कृषि विभाग पर लगाते तो आज किसान आत्म ह्त्या नहीं करते। जिस तरह रोम जलाता रहा और सम्राट नीग्रो बेफिक्र बासुरी बजाते रहे। वैसे ही शरद पवार भी गेंद-बल्ला और राजनीति में इतने उलझे हुए हैं कि किसानो के प्रति हितैषी नीति बनाने के लिए उनके पास फुरसत ही नहीं मिलती महाराष्ट्र के अलावा अन्य राज्यों में भी किसानो ने आत्म हत्या की है। बुंदेलखंड में तो सूखा पीड़ित किसानो को २५-३० रुपये के चेक देकर उनकी असहायता का माखौला उड़ाया गया है। महाराष्ट्र के कपास ,संतरा उत्पादक किसानो की अत्यन्त दुर्दशा हुई है। कर्ज के बोझ और अपमान जनक तकाजों से तंग आकर हजारों किसानो ने मौत को गले लगाना बेहतर समझा । जबकि पवार को यह देखने का मौका ही नहीं मिला कि किसानो के घर में चूल्हा जला या नहीं। जब ज्यादा मुसीबत आयी तो विदेश से घटिया गेहूं मंगा लिया । जिसे जानवर भी खाए तो मर जाए और इंसानों को परोस दिया। इतने सालों से पवार ने अभी तक ऐसी कोई कृषि नीति नहीं बनायी है जिससे दलहन और तिलहन का उत्पादन बढाया जा सके। आज लोगों की थाली से दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। शक्कर के दाम अनाप शनाप हैं। यह गोरख धंधा पवार भी जानते हैं। कृषि मंत्री जी को केवल गन्ना और अंगूर उत्पादक किसान ही नजर आते हैं। कपास उत्पादक किसानो की और वो नहीं देखते।और विदर्भ के किसानो की ओर देखना पसंद ही नहीं करते। अगर अंगूर से बनने वाली शराब को बढ़ावा दिया जा सकता है तो क्या पवार साहब विदर्भ के आदिवासी क्षेत्रों में महुए से मदिरा को बढावा देना क्या ग़लत है? पवार जी को केवल बारामती जिले में ही पूरा देश नज़र आता है। अब यक्ष सवाल ये उठाता है की आख़िर किसानो को राहत कब मिलेगी। क्या जनता ने गलती कर दिया जो चुनकर भेज दिया ? या फ़िर पवार साहब जानते ही न हों की कृषि क्या बला है?
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जितेन्द्र सिंह यादव
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: आत्महत्या, पत्रकार, भड़ास, भड़ास4मीडिया, सूचना

लखनऊ के पत्रकार शीलेश ने राष्ट्रपति से 26 जनवरी के दिन जान देने की जो अनुमति मांगी है, वह कहीं से अनुचित नहीं। उनकी जगह हम-आप होते तो शायद यही करते, या फिर इसके उलट, जिसे कानून गैरकानूनी मानता है।
शीलेश में कमियां हो सकती हैं, वो हमारे आप में भी है। पर उन अफसरों और ब्यूरोक्रेटों की कमियों से तो शतांश कम है, जो मौका मिलने पर अपना ईमान और कानून तो क्या, प्रदेश और देश को ही बेच दें। और बेचा है। जितने बड़े घोटाले और घपले पता चलते हैं, पकड़े जाते हैं, छापे पड़ते हैं, उसमें कौन फंसता है। यही, हमारे लोकतंत्र के कथित आंख-नाक-कान, जो फाइलों और नोटों के अंबार पर गांड़ मोटा करके बैठे हुए हैं। ये टाई-कोट वाले आधुनिक गोरे सत्ता बदलने के साथ किस तरह रंग बदलते हैं और किस तरह हर रीढ़ वाले को खऱीदते हैं, या न बिकने पर कानून के जंजाल में फंसा देते हैं, ये किस्से अब सबको पता है।
अगर गड़बड़ी की पोल खोलते हुए कोई रिपोर्ट कोई पत्रकार या संपादक छाप देता है, और वो पत्रकार व संपादक किसी बड़े मीडिया हाउस का नौकर होने की बजाय खुद द्वारा निकाली गई मैग्जीन का हो, तो क्या सत्ताधारियों के आगे कत्थक करने वाले इन वरिष्ठ ब्यूरोक्रेटों को यह छूट मिल जाती है कि वो उनके खिलाफ लिखने वाले पत्रकार शीलेश, उनके बच्चों, उनकी पत्नी का जीना हराम कर दें, हर क्षण गुंडागर्दी करें, हर वक्त आतंकित रखें, अपहरण करने की साजिश करें, घर से उठाकर ले जाएं और इनकाउंटर करने की धमकी देकर झुकने को कहें, डराने धमकाने के बाद सत्ता के आगे गिड़गिड़ाकर माफी मांगने को कहे, हर पल साये की तरह पीछे करें, गली सड़क चौराहे कहीं भी अभद्रता शुरू कर दे.....उफ्फ...पर यह सच है, बकौल शीलेश।
सत्ता किसी को किस तरह प्रताड़ित या परेशान कर सकता है, इसका अंदाजा पत्रकार शीलेश से बात करके होता है।
दद्दा अनिल सिन्हा ने लखनऊ और कानपुर शहरों में शीलेश प्रकरण की गहराई से छानबीन कराई और शीलेश का मोबाइल नंबर भी पता किया। सारी सूचनाएं मुझे दीं। मैंने शीलेश से उनके मोबाइल नंबर पर आज देर तक बात की। उन्होंने जो हालत बयां किया, उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। शीलेश से हुई बातचीत के कुछ अंश यहां दे रहा हूं।
आप पढ़ें और मैं चाहूंगा कि इस पोस्ट के अंत में दिये गये मोबाइल नंबर पर, जो शीलेश का है, फोन कर उन्हें खुद की तरफ से व भड़ास की तरफ से संबल प्रदान करें। साथ में अगर आप शीलेश के लिए कुछ कर सकते हैं, तो बतायें। मैंने शीलेश से दिल्ली आने और मिलने का अनुरोध किया ताकि कुछ करा जा सके।
शीलेश ने जो बताया...
... जीना मुश्किल हो गया है भाई साहब। एक महीने पहले कुछ लोग रात में एकाएक घर आए और मुझे उठा ले गए। पूरी रात घुमाते रहे, गाड़ी में बिठाकर, इस शहर, उस शहर। धमकाते रहे। कहते रहे- तुम्हारा इनकाउंटर करने का आदेश है पर हम दया बरत रहे हैं, तुम चलो पैर पकड़ लो। माफी मांग लो। हाईकोर्ट से याचिका वापस ले लो। माफ कर देंगे वो तुम्हें। तुम जाने हो कि नहीं कि वे कितने बड़े लोग हैं। हम लोगों से कह दिया गया है कि पहले समझाओ, न माने तो निपटा दो।....
....अब तो घर भी नहीं जाता क्योंकि जब भी वो लोग मुझे देख लेते हैं, मेरे पीछे लग जाते हैं। और मेरे कारण मेरे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि वो लोग मेरे बच्चों से गाली गलौज और अभद्रता करते हैं। सिविल वर्दी में कई दरोगा मेरे फिराक में घर के आसपास रहते हैं। जब उनसे पूछो कि कार्ड कहां है तुम्हारे पास तो वो बदतमीजी और गुंडागर्दी पर उतारू हो जाते हैं। अब तो मैं बच बच के यहां वहां रह रहा हूं ताकि घरवाले तो कम से कम शांति से रह सकें। मेरे कारण मेरे बच्चों और पत्नी तक से बदतमीजी से पेश आया जा रहा है। मैं अपना दिन रात यहां वहां भटककर गुजारता हूं। ....
....भाई साहब, भड़ास में मेरी तरफ से यह संदेश प्रकाशित करियेगा कि पत्रकार साथियों, जो जो शीलेश के साथ हुआ है, अगर वो तुम सभी के साथ होता तो अब तक शायद आत्महत्या कर लेते। मैं तो फिर भी जी रहा हूं और इस सत्ता से लड़ने की ताकत बटोर रहा हूं। लेकिन कभी कभी जो जलालत की ज़िंदगी जी रहा हूं और जिस तरह से हर चीज मेरे खिलाफ होती नजर आ रही है, उसमें मर जाने का मन करता है। इसीलिए मैंने राष्ट्रपति महोदय से 26 जनवरी को जान देने की अनुमति मांगी है ताकि पत्रकार संपादक बनने से सत्ता द्वारा दिये जाने वाले दुख को न सह पाने की कहानी पूरी पत्रकार बिरादरी को पता चले और कोई आगे से किसी अफसर के खिलाफ पोल खोलने वाली रिपोर्ट न लिख सके। ....
...वे लोग जानबूझकर लखनऊ के इस मामले को कानपुर कोर्ट ले गए, बाद में धांधली करके हाईकोर्ट के एक आदेश को मेरे वकील तक पहुंचने ही नहीं दिया। ढेरों ऐसी चीजें हो रही हैं जिसको देखते हुए समझ नहीं पा रहा कि आखिर ये लोग क्या मुझे पागल करके छोड़ेंगे, या आत्महत्या करने देने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अगर ऐसा ही है तो मुझे पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लेना चाहिए क्योंकि मैं जब अपने परिवार को सुरक्षा नहीं दे और दिला सकता और वे भय में जीने को मजबूर हैं तो फिर इस नरक को भोगने से अच्छा है खुशी खुशी जान दे दिया जाये।
उन लोगों का मैं दिल से आभारी हूं, जो मेरा दर्द समझ पा रहे हैं, मेरी दिक्कतें को महसूस कर पा रहे हैं। ढेर सारे मित्र ऐसे हैं जो इस आड़े वक्त में अपना मुंह फेरे हुए हैं। बस, आप लोगों से गुजारिश है कि आप लोग इस मामले को अपने अपने स्तर से उठाएं ताकि मुझे खत्म करने की मंशा पाले लोगों को मेरे मरने के बाद भी तो यह एहसास हो सके कि एक पत्रकार संपादक चाहें मरे या जिये, उसकी लिखी बात, उसकी कही बात, कभी नहीं मरती। सोचता हूं, यार इतना क्यों परेशान कर रहे हो, मार दो गोली, कर दो खत्म काम। इससे ज्यादा आखिर तुम क्या कर लोगे।....(इतना कहकर शीलेश रुवांसे हो जाते हैं)