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25.4.15

एक मौत पर हजार शर्मनाक सियासत
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में सरेआम फांसी लगाने वाले गजेन्द्र की मौत एक मुद्दा बन गई है। कितनी अजीब बात है कि हजारों लोगों के सामने एक शख्स रफ्ता-रफ्ता भाषणबाजियों के बीच अपनी सांसों की डोर को तोड़कर मौत की चौखट पर चला जाता है ओर सब मौत का लाइव तमाशा देखते हैं। कथित ईमानदार पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस व लोकतंत्र का चौथा खंबा मीडिया भी मुस्तैदी से उस वक्त मौजूद था। इंसानियत की गिरावट का शायद यह सबसे निचला पायदान है या दूसरे शब्दोें में कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत। क्योंकि गजेन्द्र के साथ इंसानियत का भी सरेआम जनाजा निकला। गजेन्द्र अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी मौत एक बड़ा मुद्दा ओर सवाल है। राजनीति, संवेदनाओं के साथ ही वादों का सिलसिला भी चलता रहेगा, लेकिन उसके परिवार का दुःख शायद ही कम हो। 
तेजी से मुकाम हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी ने प्रचार के बाद हजारों की भीड़ जुटाई। रैली का मकसद खुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित करना था। विपक्षियों की नीतियों पर सवाल उठाना था। तीखे प्रहार करना था। पूर्व में कई पार्टियों से ताज्लुक रखकर एमएलए का चुनाव लड़ चुका गजेन्द्र भी इसमें शामिल हुआ। राजस्थान के दौसा जिले के नांगल झामरवाड़ा गांव में रहने वाला गजेन्द्र का परिवार आर्थिक सम्पन्न है। गांव में उसका रसूख था। उसकी हालत कृषि प्रधान देश के उन अन्नदाताओं जैसी कतई नहीं थी जो फसल बर्बादी पर खून के नीर बहाकर मुआवजे की आस लगाए हैं। वह रैली में खुद ही आया या बुलाया गया? यह अभी स्पष्ट नहीं है अलबत्ता उत्साही गजेन्द्र ‘आप’ का चुनाव चिन्ह् झाड़ू लेकर पेड़ पर चढ़ गया। उसके पास एक सफेद गमछा भी था। गजेन्द्र सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसको देखकर नहीं लगता था कि कुछ समय बाद वह शख्य लाश में तब्दील हो जायेगा। ऐसे उत्साहियों की भी कमी नहीं थी कि जो उसे देखकर इशारेबाजियां कर रहे थे। कार्यकर्ताओं से लेकर मंच पर बैठे दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल तक जानते थे कि पेड़ पर वह है। किसी ने उसे नीचे आने की सलाह तक नहीं दी। एक झटके में गजेन्द्र झूल गया। खबर मंच तक पहुंची, लेकिन राजनीति में इंसानियत की मौत हो चुकी थी। भाषणबाजी जारी नहीं। आरोप-प्रत्यारोप और किसानों के हितैषी होने के खोखले दावे। घटिया राजनीति का शायद यह गजेन्द्र की मौत जैसा लाइव सबूत था। 
गजेन्द्र की मौत पूरे देश की सुर्खियां बन गई। पूरे देश ने ‘आप’ को जिम्मेदार ठहराया। मौत के बाद भी जारी रही उनकी भाषणबाजी को शर्मिंदा करने वाला बताया, लेकिन इस भूल को मानने को कोई तैयार नहीं था। आप नेता आशुतोष का शर्मनाक बायान देखिए- ‘अगली बार ऐसा होगा, तो मैं मुख्यमंत्री जी से कहूंगा कि वह पेड़ पर खुद चढ़े और उस आदमी को आत्महत्या करने से रोकें।’ जिस दल को जनता ने उम्मीदों से सत्ता दी हो क्या उससे इस तरह की संवेदनहीनता की उम्मीद की जा सकती है। गजेन्द्र की मौत की खबर पर उसके परिवार को विश्वास ही नहीं हुआ। गजेन्द्र के परिजन मौत के लिए केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि वह आप के कहने पर ही दिल्ली गया था। वह सवाल उठा रहे हैं कि यदि केजरीवाल का कोई अपना होता, तो क्या तब भी भाषणबाजी जारी रखते? माहौल खिलाफ हुआ, तो केजरीवाल 43 घंटे बाद सामने आये ओर मीडिया पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि मीडिया मामले को तूल दे रहा है। उन्होंने माफी भी मांगी कि उनसे गलती हुई है। उनसे गलत हुई इतना समझने में भी एक मुख्यमंत्री को 43 घंटे लग गए। जिस बात को 10 साल का बच्चा भी समझ रहा था वही नहीं समझ पाए यह ओर भी आश्चर्य में डालने वाला है। उन्हें आपत्ति इस बात पर थी कि मीडिया गजेन्द्र की खबरें क्यों दिखा रहा है। यदि यही गलती किसी अन्य पार्टी में हुई होती, तो केजरीवाल के लिए स्थिति दूसरी होती तब वह मीडिया की बहुत सराहना करते। सवाल उठाए जा रहे हैं कि केजरीवाल बहुत जल्दी भूल गए जब शपथ ग्रहण के दौरान उन्होंने गाकर कहा था कि ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा।’ वह किस भाईचारे की बात कर रहे थे। चुनाव से पहले ये तो तार काटने बिजली के खंबें पर चढ़ गए थे, लेकिन अब चुनाव जीत चुके हैं इसलिए पेड़ पर नहीं गए। सोशल मीडिया पर भी आम आदमी पार्टी शिकार बन रही है। कॉमेंट यहां तक हैं कि ‘कॉमेडी, ड्रामा, फाईट ओर इमोशन ‘आप’ के पास सबकुछ है।’ 
मामला चाहे जो भी हो, आम आदमी पार्टी ने हर मामले में बहुत जल्दी प्रगति की है। ईमानदारी के उनके अपने खुद के दावे हैं, लेकिन आपसी फूट व जनता की नाराजगी नीतियों से लेकर वादों तक भी सवाल खड़े करती हैं। ‘मुफ्त’ के सपनों की चुनौती से भी वह जूझ रही है। जनतंत्र को चुनाव में वह उम्मीदों के जहाज पर सवार कर चुकी है। यह अच्छे संकेत नहीं हैं जब लोग दिए हुए चंदे को भी वापस मांगने लगें। गजेन्द्र अब कभी वापस नहीं आयेगा, लेकिन सियासत और जांच दोनों साथ-साथ चलेंगी। उसकी मौत शर्म भी है और सबक भी। सवाल अब भी वही है कि गजेन्द्र की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है? अकेले ‘आप’ ‘हम’ या ‘सब’? 

25.7.13

किसानों को 2-3 रूपये का मुआवजा चेक

-2 रूपये में कैसे संवरेगी किसानों की तकदीर?
-ऐसी मदद पर कैसे गर्व किया जाये?
 ‘जय जवान, जय किसान’ वाले देश में बाढ़ पीढ़ित गरीब किसानों को मुआवजे के तौर पर 2 व 3 रूपये के चेक भी मिल रहे हैं। चौंकना लाजमी है। इतने रूपये में किसानों की तकदीर संवरेगी या वह अपनी बर्बाद फसल की भरपाई कर लेंगे यह मुमकिन तो नहीं है, लेकिन सरकार के हिसाब से है तभी वह कर भी रही है। यह मुआवजा उन किसानों को है जिनकी फसल प्राकृतिक आपदा के चलते खराब हो गई थी। मुआवजे के लिये किसानों ने 1 साल का लम्बा इंतजार भी किया। प्रकरण
हरियाणा प्रान्त के झज्जर जिले का है। कृषि प्रधान देश में किसानों की ऐसी मदद पर कैसे गर्व किया जा सकता है? शर्म भी आती है इस व्यवस्था पर। किसान हाथ में चेक लेकर हक्के-बक्के हैं क्योंकि वह समझ ही नहीं पा रहे कि चेक का क्या करें। चेक सरकारी बैंक के होते तो भी ठीक था। यह चेक प्राईवेट एक्सिस बैंक के हैं। अब जिन किसान का खाता नहीं है वह यदि इस बैंक में खाता खुलवाने पहुंच जाये तो उसे पांच हजार खाता खुलवाने के लिये चाहिए। 2 रूपये का चेक किसान तक पहुंचते हुए कितने खर्च हो गए
होंगे? क्या फायदा ऐसी राहत का? हां कागजी तौर पर एक कारनामा जुड़ गया कि हमने मदद की। यह घिनौने मजाक से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। शुक्र कीजिए देश के बाशिंदे आज भी जय जवान-जय किसान बोलते हैं ओर बोलते रहेंगे। हमें अपने किसानों पर गर्व है।

23.7.09

पवार का पावर गुल

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह बात अब केवल किताबों में ही सीमित रह गयी है। कृषि प्रधान देश का झुनझुना बजता रहता है। किसान आत्महत्या करते रहते हैं। खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं। देश वासियों की थाली से आज दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। और देश के कृषि मंत्री जी के पास अभी तक कृषि से सम्बंधित कोई नीति नहीं बनी है। दरअसल किसी नेता की पहचान उसके कार्य कलापों से होती है। केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी इसके अपवाद नहीं हैं। महाराष्ट्र की राजनीति के चतुर खिलाड़ी , राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार का मतलब क्रिकेट, शक्कर कारखाने और जमीन तक सीमित रह गया है। और इसी में उनकी रुचि है। यही वजह है की कृषि और किसान उनके चछु से ओझल हैं। अगर वाकई पवार अपना पावर (ताकत) कृषि विभाग पर लगाते तो आज किसान आत्म ह्त्या नहीं करते। जिस तरह रोम जलाता रहा और सम्राट नीग्रो बेफिक्र बासुरी बजाते रहे। वैसे ही शरद पवार भी गेंद-बल्ला और राजनीति में इतने उलझे हुए हैं कि किसानो के प्रति हितैषी नीति बनाने के लिए उनके पास फुरसत ही नहीं मिलती महाराष्ट्र के अलावा अन्य राज्यों में भी किसानो ने आत्म हत्या की है। बुंदेलखंड में तो सूखा पीड़ित किसानो को २५-३० रुपये के चेक देकर उनकी असहायता का माखौला उड़ाया गया है। महाराष्ट्र के कपास ,संतरा उत्पादक किसानो की अत्यन्त दुर्दशा हुई है। कर्ज के बोझ और अपमान जनक तकाजों से तंग आकर हजारों किसानो ने मौत को गले लगाना बेहतर समझा । जबकि पवार को यह देखने का मौका ही नहीं मिला कि किसानो के घर में चूल्हा जला या नहीं। जब ज्यादा मुसीबत आयी तो विदेश से घटिया गेहूं मंगा लिया । जिसे जानवर भी खाए तो मर जाए और इंसानों को परोस दिया। इतने सालों से पवार ने अभी तक ऐसी कोई कृषि नीति नहीं बनायी है जिससे दलहन और तिलहन का उत्पादन बढाया जा सके। आज लोगों की थाली से दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। शक्कर के दाम अनाप शनाप हैं। यह गोरख धंधा पवार भी जानते हैं। कृषि मंत्री जी को केवल गन्ना और अंगूर उत्पादक किसान ही नजर आते हैं। कपास उत्पादक किसानो की और वो नहीं देखते।और विदर्भ के किसानो की ओर देखना पसंद ही नहीं करते। अगर अंगूर से बनने वाली शराब को बढ़ावा दिया जा सकता है तो क्या पवार साहब विदर्भ के आदिवासी क्षेत्रों में महुए से मदिरा को बढावा देना क्या ग़लत है? पवार जी को केवल बारामती जिले में ही पूरा देश नज़र आता है। अब यक्ष सवाल ये उठाता है की आख़िर किसानो को राहत कब मिलेगी। क्या जनता ने गलती कर दिया जो चुनकर भेज दिया ? या फ़िर पवार साहब जानते ही न हों की कृषि क्या बला है?