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25.4.15

एक मौत पर हजार शर्मनाक सियासत
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में सरेआम फांसी लगाने वाले गजेन्द्र की मौत एक मुद्दा बन गई है। कितनी अजीब बात है कि हजारों लोगों के सामने एक शख्स रफ्ता-रफ्ता भाषणबाजियों के बीच अपनी सांसों की डोर को तोड़कर मौत की चौखट पर चला जाता है ओर सब मौत का लाइव तमाशा देखते हैं। कथित ईमानदार पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस व लोकतंत्र का चौथा खंबा मीडिया भी मुस्तैदी से उस वक्त मौजूद था। इंसानियत की गिरावट का शायद यह सबसे निचला पायदान है या दूसरे शब्दोें में कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत। क्योंकि गजेन्द्र के साथ इंसानियत का भी सरेआम जनाजा निकला। गजेन्द्र अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी मौत एक बड़ा मुद्दा ओर सवाल है। राजनीति, संवेदनाओं के साथ ही वादों का सिलसिला भी चलता रहेगा, लेकिन उसके परिवार का दुःख शायद ही कम हो। 
तेजी से मुकाम हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी ने प्रचार के बाद हजारों की भीड़ जुटाई। रैली का मकसद खुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित करना था। विपक्षियों की नीतियों पर सवाल उठाना था। तीखे प्रहार करना था। पूर्व में कई पार्टियों से ताज्लुक रखकर एमएलए का चुनाव लड़ चुका गजेन्द्र भी इसमें शामिल हुआ। राजस्थान के दौसा जिले के नांगल झामरवाड़ा गांव में रहने वाला गजेन्द्र का परिवार आर्थिक सम्पन्न है। गांव में उसका रसूख था। उसकी हालत कृषि प्रधान देश के उन अन्नदाताओं जैसी कतई नहीं थी जो फसल बर्बादी पर खून के नीर बहाकर मुआवजे की आस लगाए हैं। वह रैली में खुद ही आया या बुलाया गया? यह अभी स्पष्ट नहीं है अलबत्ता उत्साही गजेन्द्र ‘आप’ का चुनाव चिन्ह् झाड़ू लेकर पेड़ पर चढ़ गया। उसके पास एक सफेद गमछा भी था। गजेन्द्र सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसको देखकर नहीं लगता था कि कुछ समय बाद वह शख्य लाश में तब्दील हो जायेगा। ऐसे उत्साहियों की भी कमी नहीं थी कि जो उसे देखकर इशारेबाजियां कर रहे थे। कार्यकर्ताओं से लेकर मंच पर बैठे दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल तक जानते थे कि पेड़ पर वह है। किसी ने उसे नीचे आने की सलाह तक नहीं दी। एक झटके में गजेन्द्र झूल गया। खबर मंच तक पहुंची, लेकिन राजनीति में इंसानियत की मौत हो चुकी थी। भाषणबाजी जारी नहीं। आरोप-प्रत्यारोप और किसानों के हितैषी होने के खोखले दावे। घटिया राजनीति का शायद यह गजेन्द्र की मौत जैसा लाइव सबूत था। 
गजेन्द्र की मौत पूरे देश की सुर्खियां बन गई। पूरे देश ने ‘आप’ को जिम्मेदार ठहराया। मौत के बाद भी जारी रही उनकी भाषणबाजी को शर्मिंदा करने वाला बताया, लेकिन इस भूल को मानने को कोई तैयार नहीं था। आप नेता आशुतोष का शर्मनाक बायान देखिए- ‘अगली बार ऐसा होगा, तो मैं मुख्यमंत्री जी से कहूंगा कि वह पेड़ पर खुद चढ़े और उस आदमी को आत्महत्या करने से रोकें।’ जिस दल को जनता ने उम्मीदों से सत्ता दी हो क्या उससे इस तरह की संवेदनहीनता की उम्मीद की जा सकती है। गजेन्द्र की मौत की खबर पर उसके परिवार को विश्वास ही नहीं हुआ। गजेन्द्र के परिजन मौत के लिए केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि वह आप के कहने पर ही दिल्ली गया था। वह सवाल उठा रहे हैं कि यदि केजरीवाल का कोई अपना होता, तो क्या तब भी भाषणबाजी जारी रखते? माहौल खिलाफ हुआ, तो केजरीवाल 43 घंटे बाद सामने आये ओर मीडिया पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि मीडिया मामले को तूल दे रहा है। उन्होंने माफी भी मांगी कि उनसे गलती हुई है। उनसे गलत हुई इतना समझने में भी एक मुख्यमंत्री को 43 घंटे लग गए। जिस बात को 10 साल का बच्चा भी समझ रहा था वही नहीं समझ पाए यह ओर भी आश्चर्य में डालने वाला है। उन्हें आपत्ति इस बात पर थी कि मीडिया गजेन्द्र की खबरें क्यों दिखा रहा है। यदि यही गलती किसी अन्य पार्टी में हुई होती, तो केजरीवाल के लिए स्थिति दूसरी होती तब वह मीडिया की बहुत सराहना करते। सवाल उठाए जा रहे हैं कि केजरीवाल बहुत जल्दी भूल गए जब शपथ ग्रहण के दौरान उन्होंने गाकर कहा था कि ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा।’ वह किस भाईचारे की बात कर रहे थे। चुनाव से पहले ये तो तार काटने बिजली के खंबें पर चढ़ गए थे, लेकिन अब चुनाव जीत चुके हैं इसलिए पेड़ पर नहीं गए। सोशल मीडिया पर भी आम आदमी पार्टी शिकार बन रही है। कॉमेंट यहां तक हैं कि ‘कॉमेडी, ड्रामा, फाईट ओर इमोशन ‘आप’ के पास सबकुछ है।’ 
मामला चाहे जो भी हो, आम आदमी पार्टी ने हर मामले में बहुत जल्दी प्रगति की है। ईमानदारी के उनके अपने खुद के दावे हैं, लेकिन आपसी फूट व जनता की नाराजगी नीतियों से लेकर वादों तक भी सवाल खड़े करती हैं। ‘मुफ्त’ के सपनों की चुनौती से भी वह जूझ रही है। जनतंत्र को चुनाव में वह उम्मीदों के जहाज पर सवार कर चुकी है। यह अच्छे संकेत नहीं हैं जब लोग दिए हुए चंदे को भी वापस मांगने लगें। गजेन्द्र अब कभी वापस नहीं आयेगा, लेकिन सियासत और जांच दोनों साथ-साथ चलेंगी। उसकी मौत शर्म भी है और सबक भी। सवाल अब भी वही है कि गजेन्द्र की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है? अकेले ‘आप’ ‘हम’ या ‘सब’? 

30.12.12

माफ करना दामिनी! हम भी गुनाहगार हैं!


रूह कंपा देने वाली दरिंदगी का शिकार हुई दामिनी आखिर इस दुनिया से रूखसत हो गई। वह भी तक जब वह जीना चाहती थी। उसने लिखकर कहा था-‘माँ मैं जीना चाहती हूं।’ दुःख व गुस्से का गुबार हर भारतीय के दिल में है। पूरी घटना कोढ़ग्रस्त इंसानियत की ऐसी नंगी हकीकत है, जो हमेशा शर्मसार करती रहेगी। कड़वी हकीकत है कि लड़कियां महफूज नहीं हैं और लोग बेटियां पैदा करने से भी डरते हैं। आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर वाले भारत में हालात ज्यादा शर्मनाक हैं। ऐसी घटनाओं पर अरब के सख्त कानून की जरूरत याद आती है। दुनिया में सबसे कम अपराध वहीं होते हैं। इस हकीकत का स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऐसे लोगों को कानून का खौफ नहीं है?  कोई दोराय नहीं कि घटना ने युवा क्रांति की एक बड़ी अलख जगायी। पुलिस की दमनकारी प्रवृत्ति और सरकार की लीपापोती को सभी ने बहुत नजदीक से देखा। सवाल खड़े हैं क्या कानून बदलेगा? फिर किसी के साथ दरिंदगी नहीं होगी? लड़कियां सुरक्षित हो गईं? देखिए वक्त क्या जवाब देता है। दामिनी हमें माफ करना! बेहद दुःख के साथ सभी की तरफ से भावपूर्ण श्रृंद्वाजली!

14.6.11

दिल्ली का कफन

बाग का सुख चैन सब खोने लगा है।
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
ग्रीष्म मेँ बदहाल, वर्षा मेँ चुभन है।
चीखता, चिल्ला रहा मेरा वतन है।
किन शहीदोँ की शहादत का असर है?
अब कहाँ वैसी जवानी, बाँकपन है।
स्वर्ग से रवि का पतन होने लगा है।
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
लफ्ज क्या थे? आबरु का जोश ही था।
एक नगमा सुन जगत मदहोश ही था।
ख्याल था, ख्यालात मिलते थे सभी के।
जो रहा बाकी उसे अफसोस ही था।
किन दरख्तोँ को यहाँ बोने लगा है?
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?
खो गया सब, अब यहाँ बाकी नहीँ है।
मयख्वार हैँ, मय है मगर साकी नहीँ है।
फिर विलायत से मँगाया हाँथ तूने।
पूर्वजोँ की देश मेँ थाती नहीँ है।
यह कौन दिल्ली का कफन ढोने लगा है?
किस ओर जीवन और जन होने लगा है?

26.2.10

६ रु. में दिल्ली घूमिये

6 रु. में दिल्ली घूमने के लिए यहां चटका लगायें।

1.4.09

कनाट प्लेस और कबूतर

इस रविवार कनाट प्लेस पर दोपहर से दर रात तक घूमता रहा। कई लोगों से मिलना-जुलना था और थोड़ी मस्ती भी करनी थी। साथ में था कैमरा। वोल्गा बार में एक बीयर गटकने के बाद जब बाहर निकला तो कबूतरों को दाना चुगते देखा। तुरंत कैमरा आन किया। दिल्ली-6 में मटकअली मसककली के दर्शन के बाद इन्हें जरा यहां भी देख लीजिए.....:)


19.9.08

कोशिश तो करो

हमारे देश का दुर्भाग्य कहे या फिर देश की नियती जैसे हम ईन राजनेताओ के बंधुआ गुलाम है जब जो चाहे वैसा बयान दे कर चला जाता है और हम उसके पीछे भेड की तरह दौडते चले जाते है| हमारे गृह मंत्री जी को ही देख लीजिये, हम मानते है महोदय की किसी का कपडा बदलना उसका अपना नीजी मामला होता है लेकिन ईसके साथ ही आप ईस बात से भी ईन्कार नही कर सकते की आप देश के सबसे असफल गृहमंत्री है| शायद अभी काश्मीर की आग आपने बुझाई भी नही थी की उडीसा मे पिकनीक मनाने पहुच गये और फिर अचानक दिल्ली से बुलावा आ गया| आखिर आप कर क्या रहे है क्या आप उनलोगो को बताने का कष्ट करेंगे जो आपके कपडो के पीछे पडे है|
काश्मीर
शायद आपको ये नही पता के किसी भी राज्य को धारा ३५५ और ३५६ के तहत धमकी दे देने से कुछ नही होता, आपको उसके साथ वहाँ की परिस्थितियाँ भी देखनी पडेंगी, क्या ऐसा लगता है की वहा पर हमारे देश का संविधान असुरक्षित है शायद कोई भी नही कहेगा, आखिर क्यो ईसाईयो की संख्या लगातार बढती जा रही है ग्राहम स्टेंस की हत्या के बाद क्या क्या हुआ था किसी से छिपा नही है| लेकिन सबसे बुरी बात उनका माओवादियो और नक्सलियो से गठजोड है जो सामने आई है| ये सारी बाते एक तरफ लेकिन धर्म परिवर्तन आखिर होता हि क्यो है और होता भी है तो आदिवासियो और नीचे तबके के लोगो का ही क्यो? कही न कही ईसाई समुदाय भी बराबर के जिम्मेवार है ईन सभी के लिये|
उडीसा
आप अब वीरप्पा मोईली जी को देखीये गृहमंत्री से दो कदम आगे बढ गये वो राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने की बात करते है उन्हे पता नही ये उनके हद की बाहर की चीज है प्रतिबंध तो दुर की बात है अगर आपने ईसे छेडा भी तो बुरी तरह फस जायेंगे| आप लोग काश्मीर और उडीसा को ही सम्हाल लो तो बेह्तर है| मै मानता हुँ की कई चीजे बुरी है राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ मे पर अभी ये वक्त नही उन्हे छेडने का|
दिल्ली

30.5.08

गरीबी से मरते हैं लोग, अपने दिल्ली में

आज सुबह सुबह अखबार पर पहली निगाह मारने के दौरान उसी खबर पर निगाह टिकी जहां गरीबी, मां और मौत के बारे में लिखा गया था। दिल्ली में आर्थिक तंगी से मां व बेटे ने जान दे दी।


ऐसी घटनाएं तो होती रहती हैं पर जब भी होती हैं, अंदर से हिला जाती हैं। इस बाजार के हमले ने उन लोगों को बिलकुल फटेहाल बना दिया है, जिनके पास दंद फंद नहीं है, जिनके पास नौकरी नहीं है, जिनके पास शिक्षा नहीं है। ऐसे लोग जो तीन पांच करके नहीं जी सकते, आखिर किस तरह ईमानदारी से जी सकते हैं। क्या इनकी मौत ही इनकी नियति है।


क्या सरकारों को भयंकर बाजार के इस दौर में हर व्यक्ति को रोजगार और हर परिवार को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देनी चाहिए?

पर सवाल वही है कि जब हर कोई अपना नोट और वोट बनाने में लगा हो तो जनता और उसके जीवन से जुड़े सवालों पर भला कौन सोच सकता है।


जय भड़ास
यशवंत

24.5.08

दिल्ली में एक बरसः जैसे कई सदियों को जी लिया, जैसे बहुत थक गया

29 मई को दिल्ली आए एक साल पूरे हो जाएंगे।

आज जब सोच रहा हूं तो लग रहा है जैसे एक बरस नहीं, दस बरस से जी रहा हूं दिल्ली में। जैसे लग रहा है कितना कुछ कर लिया दिल्ली में, जैसे कितना थक गया दिल्ली में।

दसियों तूफान, झंझावात, खतरे, आरोप, बदनामियां, नाकामियां, कमजोरियां आईं, खड़ी हुईं, प्रभावित कीं, पीड़ित हुआ, कठघरे में खड़ा हुआ, सफाई दी....और आगे बढ़ा।

इन दिनों फिर मुश्किलों के ऐसे भंवर में फंसा हूं।

ऐसे में हर बार लगता है सब छोड़छाड़ कर गांव ही चला जाए। कुछ महीने सुकून से वहां गुजारने के बाद फिर नोकरी चाकरी तलाशी जाए या कहीं पंसारी की दुकान खोलकर हींग तेल नून बेंचा जाए या फिर कोई धंधा शुरू किया जाए।

ऐसी मनःस्थिति इस एक साल में दसियों बार आई पर जाने क्या है अंदर कि हर मुश्किल के बाद अंदर का मनुष्य कुछ ज्यादा पक्कावाला और कुछ ज्यादा चुनौती कबूलने के लिए तैयार हुआ लगता है।

मजेदार ये कि मेरा कोई दुश्मन नहीं रहा, मैं खुद ही अपना दुश्मन बना। किसी दुश्मन ने दुश्मनी नहीं की, दोस्तों ने दगा दिया। किसी और ने झटका नहीं दिया, अपनों ने धोखा किया।

पर उम्मीद तो उम्मीद है, जिसके बल पर हर कोई जीता है, मैं भी। और ये उम्मीद है बेहतरी के दिन आने के, अच्छे दिन आने के, सपने पूरे होने के......व्यक्ति के रूप में, समाज के हिस्से के रूप में और देश के नागरिक के रूप में...तीनों रूपों में ही बस एक ख्वाब....सब सुंदर, सरल और सहज हो

वो सुबह कभी तो आएगी.....
...और
तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर....

संक्षेप में ये कि इस एक साल ने मुझे जितनी प्रसिद्धि और कुख्याति दिलाई है, उतना किसी और बरस में नहीं मिली। या तो खुशियों के शिखर पर रहा या फिर दुखों के गर्त में पहुंचा। बीच में कभी नहीं रहा। बीच वाला जीवन कभी जिया ही नहीं। साहस और दुस्साहस, बस यही दो छोर पकड़े रहे मुझे। जकड़े रहे मुझे।

समाजसेवा और दोस्ती-यारी निभाने की प्रवृत्ति के चलते ढेरों झटके खाए। अब भी खा रहा हूं। पर जाने क्या है कि तब भी मुझे अकल नहीं आती। लगा रहता हूं अपना छोड़ परायों को अपना बनाने में, उनकी दिक्कतें हल करने में, उनको उबारने में। और यह सब करते करते खुद डूबने लगता हूं। इन परायों की मुश्किलें खत्म हो या कम हो, पर बदले में मुझे मिलता है मझधार, भंवर, अकेलापन, तनहाई, शर्मिंदगी, अवसाद और बदनामी।

क्या करूं....बचपना गया नहीं, अकल आई नहीं।

मेरी कमजोरियां,
मेरी बदमाशियां,
मेरी आवारगी,
मेरा देहातीपना,
मेरी अराजकताएं,
मेरे चूतियापे,
मेरी नशाखोरी....

दर्जनों बुराइयां हैं जिनके साथ न चाहते हुए भी जीता रहता हूं। चाहता हूं कि ये सब बुराइयां एक एक कर खत्म हो जाएं और मैं किसी परम संत की तरह मेरे व्यक्तित्व में केवल सदगुण ही रह जाएं। केवल अच्छाई ही रह जाए पर मेरे अंदर का राक्षस है कि मरता ही नहीं। मेरे अंदर का देवता है कि वो मजबूत होता ही नहीं। दोनों बराबर बराबर जीते रहते हैं और अपने लिए और भी ज्यादा हक व विस्तार की मांग करते रहते हैं।

कहीं इन दोनों की जंग में मैं खुद नष्ट न हो जाऊं। नष्ट होने, मरने से नहीं डरता मैं लेकिन न चाहते हुए जो बदनामियां आ जाती हैं, उनका क्या करूं। उनके साथ कैसे जिऊं। उनसे कैसे उबरूं। कैसे खुद को अकेला कर पहाड़ की खोह में तपस्या करने के लिए डाल दूं ताकि न रहेंगे आसपास मनुष्य और न करनी होगी अच्छाई और न करनी होगी बुराई।

पर क्या ऐसा संभव है। मजबूरी है कि जीना इसी समाज के बीच में है। इन्हीं हालात में है जहां बुराई भी अच्छाई भी है। वो बुरा भी है अच्छा भी है। हम सब बुरे भी हैं और अच्छे भी हैं। लेकिन वो हम और आप अपने बुरे को पूरी तरह क्यों नहीं मार पाते, किल कर पाते, निप इन द बड कर पाते....।

पता नहीं क्यों। पर आज तो सिर्फ इतना भर कहने को जी हो रहा है कि....

किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है
बंदे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है

उपरोक्त लाइनें हर मुश्किल में किसी ताकत की तरह मेरे साथ खड़ी हो जाती हैं। देखते हैं, ये बुरा दिन कब खत्म होता है और कब नीके दिन आते हैं।

अभी तो बस केवल डिप्रेशन है, केवल हवा-हवाई मिशन है, केवल टेंशन और टेंशन है और ढेर सारा सस्पेंसन है।

ऐसे बुरे दिनों में मैं उन सभी मित्रों का आभारी हूं जिन्होंने चमत्कारिक तरीके से मेरे संग खड़े होकर साथ दिया। उन सभी का भी आभारी हूं जिन्होंने कठघरे में खड़ा किया, फांसी पर चढ़वाया, मुझे नष्ट किया, मुझे बदनाम किया....।

शायद ये दुनिया बच्चों सा खेल तमाशा है, तभी तो चचा ग़ालिब ने कहा है ...

बाजीचएअतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबो रोजो तमाशा मेरे आगे।
गो हाथ में जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है,
रहने दो मेरे साथ सागरो मीना मेरे आगे
(कुछ शब्द छूट रहे हैं, भूल रहे हैं या गलत लिख गए हैं, माफ करिएगा...)

और बच्चों की इस दुनिया में सबकी अपनी अपनी भूमिकाएं हैं और हर कोई किसी एक भूमिका को पकड़कर उसी में जिंदगी खपा लड़ा देने के लिए आमदा है, भले ही उससे किसी और का कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए। दूसरों का नफा नुकसान सोचने की फुर्सत किसे है, सब अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग अलापने में लगे हैं।

हे ईश्वर, उन्हें माफ करो, वो नहीं जानते उन्होंने क्या किया
हे ईश्वर, मुझे माफ करो, मैं नहीं जानता मैंने क्या किया

बस, न मरने की ठानी है, न हारने की मानी है, हालात चाहें जितने प्रतिकूल हों, उससे उबरने और आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखूंगा, जिंदगी से बस इतनी भर ही सीख ली है। समय का पहिया घूमेगा और फिर अच्छे दिन आएंगे।

मुझको कदम कदम पर भटकने दो वाइजों,
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूं.....।
ठुकराओ चाहे प्यार करो, मैं नशे में हूं....।
जो चाहे मेरे यार करो, मैं नशे में हूं....।

देखते हैं, दिल्ली का दूसरा साल कैसा होता है......मैं तो ये मानकर चल रहा हूं कि...

इक बरहमन ने कहा है, ये साल अच्छा है

जय भड़ास
यशवंत

11.4.08

दिल्ली : शहर दर शहर

पंकज राग का काम इधर चर्चा में रहा। उनकी पुस्तक धुनों की यात्रा' एक यादगार कृति के रूप में दर्ज की जा रही है। जाहिर है कि ये काम भूलतः नहीं हैं पर पंकज मूलतः कवि हैं। इतिहास के अध्येता पंकज की इस लम्बी कविता में इतिहास और कविता की जुगलबंदी को देखना दिलचस्प होगा। to padhiye pankaj rag ki kvita...mgr dhire-dhre, hadbade ke nhi, nhi to mja nhi aaega...is kvita me dilli ka jra-jra hai...dekho mgr pyar se..kvita psnd aaye to rag sab ko message kr do...fon no. shayad yhi hai-09822039772



खुश हो लें कि आप दिल्ली में हैं

खुश हो लें कि आप मर्कज में हैं

बिना खतों के लिफाफों में

आपके पते बहुत साफ नहीं

फिर भी आप मजमून बना लेंगे

क्योंकि आप दिल्ली में हैं।



आंखों की पुतलियों पर ठहरती नहीं है दिल्ली

हाथ के आईने में रुकते नहीं हैं लोग

फिर भी , दिल्ली जब जब बुलाती है लोग दौड़े चले आते हैं।

सवाल कई उठते हैं

क्या दिल्ली एक आवाज है

क्या दिल्ली की गलियां पुकारती हैं ?

क्या दिल्ली की रातों में आत्माएं भटकती हैं ?

दिल्ली , जो हमेशा से शहर कहलाती रही

वह कहीं टिकती क्यों नहीं ?

यह हमेशा की बेचैनी कैसी ?

बार बार इलाके बदलने की यह कैसी उत्कंठा ?

बदलते मौसमों का यह शहर

क्या पिघलते मौसमों का भी शहर रहा है ?



जवाब सीधे नहीं हैं ,

सीधे जवाब गलत हो जाएंगे

वैसे ही जैसे दिल्ली भी कई बार गलत हो चुकी है

उसका इतिहास गलत हो चुका है

उसके ख्वाब फिर गलतियां कर रहे हैं

यह भूल कर कि

फतह और शिकस्त के जाहिराना सिरों के बीच भी

कितनी ही बूंदों ने लगातार टपक कर जगह तलाशी है

इन जगहों का कोई तूर्यनाद नहीं हुआ

पर वे स्वप्नचित्रा भी नहीं

सैकड़ों वर्षों से उन जगहों पर वक्त चला है ,

दिन ढले हैं ,

तकलीफ में भी नींद मौजूं रही है

और सुबहें कभी कभी सादिक की तरह धुली धुली भी लगी हैं।

उन्हीं जगहों पर इबादत हुई है , खुदा को कोसा भी गया है

होड़ में लोग दौड़े हैं , हताशा में मन बैठा भी है

फि भी रहा है , कोफ्त भी हुई है

शगल भी रहे हैं , बीमारी भी

फरामोशी भी हुई है , वफादारी भी।

बदलते इलाकों में भी यह सब बदस्तूर जारी रहा है

जैसे जन्म और मृत्यु

और उनके बीच कायदों से बंधती , उसे तोड़ती

कभी झूलती , कभी झुलाती

पूरी की पूरी जिन्दगी।



दिल्ली को खोजना है तो ऐसी जगहों पर भी जाना होगा

शहर सिर्फ महामहिम नहीं , बहुत से मामूली लोग भी बसाते हैं

दिल्ली , शहर दर शहर, सिर्फ निगहबानों की नहीं

इंसानों की भी कहानी है।





1.

सूरजकुंड को बने हजार बरस बीत गये

जब वह बना उस वक्त भी बीत चुका था बहुत कुछ

और दूर हो गये थे मौर्य काल के पहले से चली आ रही बसाहटों के अवशेष।

यह अरावली के उत्तर की हवा थी

जिसे तोमर वंश ने अपने गुणगान के लिये रोक रखा था

यह पगड़ियों का जमाना था

जिनके पास पगड़ियां थीं

उनके पास रास्ते थे

रास्तों पर तिलक , चंदन, पूजा और मंदिर की शोभा थी

लगान और लगाम से कसी हुई भीड़ थी

जो सूरजकुंड के पास बने सूर्य मंदिर में बहुत कुछ मांगा करती थी

वही सूर्य मंदिर जो अब नहीं है

धूल और मिट्टी , पत्थर और द्रव्य

कुछ बहे , कुछ रहे

जो उडे+ उनके पास टोलियां थीं

जो पिसे उनके पास घोंसले थे

लाल कोट का पत्थर लाल था

पर चौहानों के आगे पीला पड़ गया

लड़ना व्यावहारिक था , इसलिए धर्म भी था

लाल और पीले टीके चलते रहे

पृथ्वीराज के किला राय पिथौरा में भी जीतना शुभ था

और शुभ ईश्वर था।

समुद्र नहीं था , जानने की ख्वाहिश भी नहीं थी

ख्वाहिशें पगड़ियों के रंगों में सिमटी थीं

और उनसे बाहर जो कुछ भी था

वह तुच्छ था , वह कर्मों का फल था।



वैसे बच्चे उस वक्त भी कहानियां सुन कर सोते होंगे

कुछ बेचारे यूं भी सो जाया करते थे

उनका बचपन सच था कहानी नहीं

सुनने का शौक बड़ों को अधिक था

खास तौर पर अपनी कहानियां

जिनका झूठ भी सत्य था

और सत्य हमेशा वीर था।



ऐसी कहानियां सुनाने वाले हर सदी में रहते और पनपते हैं

अरावली की हवा वाली उस दिल्ली में भी फूले फले चारण और भाट

- पृथ्वीराज की तलवार और ढाल

संयोगिता का रूप बेमिसाल

मुहम्मद गोरी का आतंक

या चंदबरदाई की प्रशस्ति

- इन सब का आप जो चाहें मतलब निकाल सकते हैं

लेकिन आपके सभी मतलब अधूरे ही रहेंगे

क्योंकि गोरी के गुलाम सुल्तान बने पर उनके भी गुलाम थे

कवातुल इस्लाम मस्जिद बनी पर उसके खम्भे मंदिरों के थे

कुतुब मीनार ने सर उठाया पर चंद्रगुप्त का लौह स्तम्भ भी खड़ा रहा।

वे तुर्की के मुसलमान ही थे

चाहे कुतबुद्दीन ऐबक हो , या अल्तमश

या फिर गैर तुर्की गुलाम से प्यार करने वाली

और तुर्की चहलगानी से लड़ने वाली रजिया हो

पर दिल्ली न हिन्दू थी न मुसलमान

वह उसी राजसी खेल के नये पैंतरे देखने वाली दिल्ली थी

जो इजलास में हंसी मजाक की पाबंदगी पर हैरान भी होती थी और फिर

खुदा की परछाईं बने बल्बन पर

पीछे पीछे हंस भी लेती थी

जो नस्ली अभिजात्य के बड़बोलेपन से खौफजदा भी थी

और तुर्की अमीरजादों को सजदा और पैबोस में झुका देख

अपना डर थोड़ा कम भी कर लेती थी

जो मेवाती लुटेरों के डर से मुक्ति पाकर राहत की सांस भी भरती थी

और हलाकू के पोते के साथ आये हजारों मंगोलों के

शहर में बसने से आक्रांत भी हो जाती थी।



पगड़ियां बदलने लगी थीं

बांधने के तरीके भी

आदमी किसी और आदमी को देख रहा था

आदमी किसी और आदमी से लड़ रहा था

और आदमी किसी और आदमी से मिल भी रहा था

आदमी और कुछ और आदमी मिल कर बना रहे थे

मिले जुले आदमी

यह भी एक जिन्दगी थी

जो तमाम राजसी खेलों के समानांतर बड़ी तेजी से चल रही थी

और दिल्ली जी रही थी।



२.

सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह चल रहा था

और वहीं बाहर की कार पार्किंग में एक स्विस महिला के साथ बलात्कार

भीड़ अंदर थी , बाहर सन्नाटा था

और वैसे भी दिल्ली की भीड़ ऐसे मौकों पर अलग ही पायी जाती है

वह जल्दी टोकती नहीं

वह चलती है , चलने देती है

उसे अचरज भी नहीं होता

जैसे उस दिन भी नहीं जब अलाउद्दीन खिलजी ने कुतुब छोड़

अपनी राजधानी सीरी को बनाया।

नयी जगह थी , नये अमीर थे

तुर्की अमीरजादों की कमर तोड़ कर और बुलंद था शाही फरमान

विरोध मना था , षडयंत्रा पर नजर थी

हौजखास से जमातखाना मस्जिद तक फैला था शहर

इमारतों के गुम्बद अब और चौडे+ थे

अमीर उमरा के नस्ली आधार की तरह

लेकिन सीरी में दरख्तों के बीच जगह कम थी

अमीरी का फैलना शक में डालता था

शायद इसलिये दिल्ली में दावतें खुशनसीब नहीं थीं।



दिल्ली को अभी बहुत कुछ देखना था

अभी तो साम्राज्यवाद का पहला डंका था

जो मलिक कफूर के साथ दक्कन तक बजा

अब कुल का नहीं ताकत और लूट का अभिजात्य था

जिसके आगे जौहर में जल गये कुलीनता के ढोये तकाजे

पता नहीं अलाउद्दीन ने किसी पद्मिनी को देखा भी या नहीं

पर रणथम्भोर और चित्तौड़ ने देख लिया इस नये तेवर की दिल्ली को

जिसकी इमारतों में मंगोल कारीगरों ने पहली बार

पद्म की कलियां बनायी थीं

और बनाये थे सच्चे मेहराब

बिना यह समझे कि उसके ऊपर बैठा था हुकूमत का एक ऐसा सच

जो लूटता था पर बांटता नहीं

जो हिस्सा मांगने पर मंगोलों का खून पानी की तरह बहा सकता था

और उस पानी को अपने हौज ए खास में इकट्ठा कर

दिल्ली वालों को पिला सकता था।



साम्राज्यवाद चाहे छुपा हो या बेबाक

मध्यकालीन हो या नवीन

उसकी जड़ों में कहीं न कहीं पोशीदा रहता है बाजार।

मानों दिल्ली से निकली सेनाओं के हुजूम में बैठे थे तीन जादूगर

- अलाउद्दीन के बनाये तीन बाजार

लगान को बढ़ा कर गल्ले की शक्ल दी गयी

इस शक्ल को मुकद्दमों से बदल कर

दोआब के नये आमिलों की कठोर भंगिमा दी गयी

और इस शक्ल को सीधी वसूली से पाला पोसा

एक ऐसा वयस्क शरीर दिया गया

जिसके आगे बच्चों की तरह मचलती कीमतों ने दम तोड़ दिया।



यह सामंतवादी साम्राज्यवाद की हुंकार थी

जहां घोड़े और गुलामों के दाम भी बंधे थे

और विदेशी कपड़ों का सलीका भी नियंत्रिात था

जहां सैनिक और अमीर अभी वैसी पहाड़ी नदियां थे

जो घाट तोड़ नहीं पातीं

और जहां बरनी अमलदारी के अहाते में वजू के लिये हौज की तलाश में

गंगा जमुना को देख नहीं पाता था

लेकिन गंगा भी बह रही थी और जमुना भी

दोनों के पानी से अलग अलग भी स्वर निकलते थे

और साथ साथ भी

अमीर खुसरो की हिंदवी की तरह

जो कभी रबाब के हल्के तरंगों पर

ऐमन और सनम जैसी फारसी रागदारियों के साथ

महफिलों की शमादानों को जलाती थी

तो कभी बिल्कुल अपनी सी बन कर

निजामुद्दीन औलिया और बख्तियार काकी के इर्द गिर्द फैले

तमाम जातियों और मजहबों के हुजूम को

प्रेम का मधवा पिलाती थी।

पनघट की डगर अभी भी कठिन थी

और कई पहेलियां समझ में भी नहीं आती थीं

फिर भी मटकियां जमुना से भरी जा सकती थीं

रात में थक कर लौटने के लिये घर सलामत थे

जिनके अंदर जिहाले मिस्कीं मकुन तगाफुल की दिल्ली

नैना जुड़ाती थी और बतियां बनाती थी।



३.

दिल्ली की धूप

हमेशा से तीखी

जैसे हर इच्छा , आकांक्षा, विश्वास या सनक के पीछे एक जीवंतता हो।

पहले दिल्ली की गर्मी में चिपचिपाहट नहीं थी

जो भी था वह ठोस ठोस था

जैसे तुगलकाबाद को छोड़ बनाया गया मुहम्मद बिन तुगलक का जहांपनाह

धूसर पत्थरों की किलानुमा इमारतों का सिलसिला

वही खुरदुरापन इतना ज्यादा

कि ढलान वाली दीवारों के बावजूद सुल्तानी दम्भ फिसले नहीं।



इसका कोई तुक नहीं कि मुहम्मद तुगलक के जहांपनाह

की दीवारों के दक्षिण में आज आई.आई.टी. की इमारत है

अतीत की नीरसता और भविष्य की यांत्रिाकी के बीच

एक सीधी रेखा खींचने पर लोग ऐतराज करेंगे

यंत्राचलित विश्व आगे भागता है पीछे नहीं

और गियासुद्दीन तुगलक के मकबरे को भले ही

दारुल अमन का नाम दे दिया गया हो

पर उससे उसके मौत की दुर्घटना शांत नहीं हो पायी।

मध्यकालीन दिल्ली थी

अफवाहों की गलियां थीं

आज की तरह ही बढ़ा चढ़ा कर सच बताने की दलीलें

होड़ कम पर विश्वास अधिक

तब सतपुल के नीचे पानी ठहरा नहीं था

और निजामुद्दीन औलिया के ÷ अभी दिल्ली दूर है' के कथन की चर्चा

आक्रांत भी करती थी और रोमांचित भी

सूफियाना कव्वालियों की मदमस्ती की तरह

वह एक अलग दुनिया थी

वह भी दिल्ली थी

वहां एक दूसरा जहांपनाह था

उसके मुरीद थे , उसके गरीब थे

जो खुदा को रोज छूते थे , उसमें मिल जाते थे

मिलने की खुशी में अमीर हो लेते थे

पर उसके बाद फिर से गरीब थे

अंधेरा था , फिर भी रोशन थी चिराग दिल्ली।



मालवीय नगर से कालकाजी जाने वाली सड़क पर

शाम के धुंधलके में चलने भर से

उस जमाने की दिल्ली की पर्तें खुलती जाएंगी , ऐसा भी नहीं है।

पर्तें ही सीधी कहां होती हैं

और धूसर इमारतों का धुंधलके में मिल जाने का खतरा

तो हमेशा से ही रहा है।

मुहम्मद तुगलक सूफी नहीं था

पर उसके योगियों और जैनियों से मिलने पर

उसे यौक्तिक और तार्किक कह कर गालियां कइयों ने दीं

दिल्ली से हटा कर देवगिरि को अपनी राजधानी बना कर

दौलताबाद नाम देना यदि राजनीति थी

तो दिल्ली के अफसरान , बड़े लोगों और खुदा से मिलने वाले सूफियों को

दिल्ली छोड़ उस अनदेखे दौलत की ओर

जबरन ले चलने पर मजबूर करने को

जुल्म की शक्ल दी गयी।

बड़े लोग तब भी दिल्ली नहीं छोड़ना चाहते थे

पर विचारों का तिलिस्म बनाने वाले वे ही तब भी थे

शायद इसीलिये इतिहास में कैद नहीं है

दिल्लीवालों के लिये इतने सारे सूफियों के जाने का अफसोस या

बड़े बड़े लोगों से विमुक्त उनकी राहत भरी सांस।

सूफियाना हवाएं दक्कन पहुंचीं या मुहम्मदी फतह कांगड़ा पहुंची

इससे उन्हें क्या

उनकी अनुभूतियों की चादर अभी भी उनकी अपनी थी

और वैसे भी दिल्लीवालों को दिल्ली से बाहर कुछ दिखा ही कब है!

होती रहे चांदी की कमी दुनिया में ,

उनकी कल्पना की दिल्ली तो खुद चांदी थी

यह चांदी थोड़ी धूमिल हो सकती थी

बहुतेरे सूफियों के जाने के मलाल से

या दौलताबाद से पानी की कमी के कारण लौटे अमीर उमरा को लेकर

पर इसका रसूख मस्तिष्क की कई तहों तक फैला था

इसीलिए जहांपनाह के कांसे के सिक्के चल नहीं पाये।

कुछ बरस बाद भी जब मौत की प्लेग चल निकली

और तुगलक बादशाह भी दिल्ली छोड़ स्वर्गद्वारी चल पड़े

तो भी दिल्ली बैठी नहीं ,

मर कर जिन्दा हुई उसी जहांपनाह में

और उसी वक्त जब दोआब में फसल सुधार का सुल्तानी प्रयोग

करों की क्रूर संरचना के कारण दम तोड़ रहा था।

ढांचा तो नहीं बदला

पर कभी कभी शाम के उसी ढलान पर

बिना बामुलाहिजा होशियार

दिल्ली जीतती रही।



४.

तुम मुझे फीरोजी बना दो

दिल्ली की उस मध्यमवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा

कोटला फीरोजशाह के स्लेटी खंडहरों के बीच

उस लड़के का उत्तर फंस सा गया

फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ

वैसे ही जैसे फीरोजाबाद का भी कुछ न हो सका

मानों कुलीनों और उलेमा को मनाते मनाते थक कर

फीरोजशाह शिकार पर निकल गया हो

शहर से दूर- जोर बाग और करोलबाग में

वहीं जहां कुलीन बसते हैं और जहां कुलीन नहीं बसते हैं।



फीरोजाबाद में ही कुलीनता वंशानुगत हुई

फीरोजाबाद की औरतों को फकीरों की मजारों पर जाने की मनाही हुई

फीरोजाबाद के सिपाहियों को तनख्वाह नहीं , गांवों की लगान का हक मिला

और फीरोजाबाद के घोड़ों को ताकत से नहीं रिश्वत से तौला गया

पर हौजखास से पीर गैब तक फैले इस शहर में हवा फिर भी बहती रही

सिर्फ जमुना के किनारे से निकाली नहरों के पास ही नहीं

बल्कि खैराती अस्पतालों , मदरसों

और सरकारी दहेज से ब्याही विपन्न बेटियों के पास भी।

फिर चीजों के दाम कम थे ,

इसलिए मुफलिसी भी पल ही गयी

वैसे देखा जाये तो इससे हवा को क्या फर्क पड़ता

कि फीरोजशाह ने उलेमा से डर कर

अपने महल की चित्राकारी खुद खुरचवा दी

या कि फीरोजशाह की बनवायी इमारतों से

अधिक सराही गयीं बेगमपुरी और खिड़की मस्जिद जैसी

उसके वजीर खान ए जहान जूनां शाह की सात मस्जिदें

पर दिल्ली को हमेशा फर्क लगा है

खुशामदगी के उलझते धागों को दिल्ली

न कभी सुलझा पायी और न बांध ही पायी

वह बस फीरोज की तरह कुतुब मीनार की मंजिलें बढ़वाती रह गयी।

जिस अशोक स्तम्भ को फीरोज शाह ने

अम्बाले से लाकर कुश्क ए फीरोज में लगाया

उसका रंग तो और भी स्याह था

एक लाख अस्सी हजार गुलामों को छूकर बहते बहते

हवा भी फीरोजी न रही

और अंदर ही अंदर सीझते शहर की मौत तक शिकारगाहें भी पस्त हो चली थीं।



फीरोज अपनी मुश्किलों के साथ हौजखास में दफ्न हुआ

कोटला फीरोज शाह की आलीशान जामी मस्जिद में नमाज सशंकित सी रही

वही मस्जिद जिसके खंडहरों में बैठे जोड़ों की कहानी आज भी आगे नहीं बढ़ पाती

दिल्ली उन्हें ठुकराती नहीं

पर बेसलीके ही सही उनकी उलझनों को किनारे कर

समय आते ही आगे निकल जाती है।



५.

वह छोटी सी थी पर उसे भूलिएगा नहीं

- अठकोण और चौकोर मकबरों की दिल्ली को

सय्‌यद और लोदी सामंतों की दिल्ली को

तैमूर की रूह के ऊपर धड़कती उस दिल्ली को

जो शहर बनते बनते रह गयी।



मुबारकाबाद की गलियों की दबी दबी पदचापों की तरह

जिन्दगी फिर भी चलती है।

शिल्पकारों के बिना , कारीगरों के बिना भी

पेड़ फल फूल लेते हैं

बेलें और पत्तियां बगीचे बना देती हैं

शाखों के बीच से तब भी झांका ही था दिल्ली का छोटा आकाश

अफगानी सल्तनत की चुनौतियों , अभिराधन, शमन और दमन के बीच

फिर भी झलकती ही रही वही पुरानी हिन्दुस्तानी जहांदारी

ऐसी झलकों के सहारे ही पुख्ता रही हैं शाखें

खरक , केंदु, अशोक और महुए की तमाम गंधों के साथ

जिनके बीच दिल्ली आज भी लोदी गार्डेन में टहलने जाती है।



६.

पुराने किले में कम भीड़ रहती है

जिन्होंने पांडवों की तलाश वहां कर ली , उनके कदम भी चुक गये

जिन्होंने प्रगति के साथ मैदान जोड़ा वे दोनों को ही ढूंढ रहे होंगे

शायद अंततः वे अप्पूघर और चिड़ियाघर को खोज कर खुशी भी जाहिर कर दें

वैसे भी नाम में क्या रखा है

यहां हुमायूं का शहर था दीनपनाह जो अब नहीं है

जब था तब भी क्या वह दीन की पनाह था

या जहांपनाह की मुगलाई शान का एक मजमा

जिनके साथ अपने तख्त के सहारे हुमायूं गणित और रहस्यवाद का खेल खेलता था।

वैसे भी उसके पत्थर सीरी के वही पुराने खिलजी पत्थर थे

जिनकी जड़ें कमजोर थीं

इतनी कि हुमायूं की पूरी शानो शौकत ढह गयी

और जब वापस आयी

तब तक शेरशाह तो न था ,

पर उसके अपने पत्थर जम चुके थे

पुराने किले की दीवारों पर , किला ए कोहना मस्जिद की मेहराबों पर

और शेर मंडल की सीढ़ियों पर

- वही सीढ़ियां जिन पर चढ़ कर हुमायूं अपने पुस्तकालय में जाता था

और वही जिनसे नमाज के लिये उतरते हुए वह लुढ़क कर खुदा को प्यारा हुआ।

तालीम और खुदा के रिश्ते को बहुत गाढ़ा करना

उस वक्त भी खतरनाक था

दिल्लीवालों ने इस बात को ठहर ठहर कर समझा है

फिर भी थोड़ी कमी रह ही गयी है ,

शायद इसीलिए जमुना पुराने किले से दूर खिसक गयी है।



७.

वैसे आप लाख बिगाड़ लें पर दिल्ली की जो हवा है

वह इलाकों की चाल से ही बहेगी

और उसमें जो पुश्तैनी गंध है

वह उन बस्तियों से आज भी उठ लेगी

जिसे अगर आप आंख बंद कर महसूस करें

तो आप भी शायद उसे शाहजहांनाबाद ही कहें।



क्योंकि शाहजहांनाबाद सिर्फ शाहजहां का नहीं था

करीब अस्सी बरस बाद बनी राजधानी की शक्ल में एक रवायत थी

जो तख्ते ताऊस की बुलंदी को

दीवाने खास के संगमरमरी बहिश्त को

बादशाही हमाम की खुशबू को

या मीना बाजार की बेगमों की हंसी को

अपने हिसाब से कभी खुल कर

या कभी रहस्य भरी सरगोशी के साथ

लाल किले की छनछनाती उतार से छान कर

सड़क के बीचों बीच

अंधेरे उजाले का खेल खेलती

झिलझिलाती हुई एक चांदनी चौक बनाती थी।

वह कुछ खुशफहमियों का जमाना था

सीताराम बाजार की बड़ी हवेलियों का जमाना

जिसके दरीचे बाहर कम

अंदर के विशाल आंगन की ओर अधिक खुलते थे।

रसोई घर की थी , बातें बाहर की

- सरपरस्ती के साथ साथ चुगलियों की चटनी

जब रसोई की गंध थम जाती थी

तो अपच बदगुमानी बन दरवाजे से बाहर

गलियों की हवा खाने से बाज नहीं आती थी।

नीचे गलियां , कटरे और मुहल्ले

पेशेवर नाम , पेशेवर किस्से, कुछ पेशेवर फि भी

जिनकी हदों से अलग

जहालत और जिल्लत की बू से

खुद ही मरती कुछ बस्तियां

जिनके पेशे गरीबी से भी बदतर थे।

ऊपर जामा मस्जिद की मीनारें

खुदपरस्ती की खुदाई उड़ान

हवाई उड़ान के नशे में मस्त भागते

गोले और काबुली कबूतर

उन्हें उड़ा कर और भिड़ा कर बादशाहत का भ्रम पालता

एक बहुत बड़ा वर्ग

जो नीचे देखना नहीं चाहता था ,

जो नीचे देखने से डरता था।



यूं भी दिल्ली के इन इलाकों में ही मिलते हैं भिखमंगे और पागल

और उनसे हमेशा से एक अलग गंध आती रही है

जो न शाहजहां के फरमानों के आगे दबी

न ही जहांआरा की सवारी की कस्तूरी खुशबू के आगे

जिसे कहवाघरों की जमात तब न दबा पायी

जिसे वातानुकूलित गाड़ियों का हुजूम अब भी न कुचल सका

उनसे बचने के लिये ऊपर ही ऊपर उड़ता रहा शाहजहांनाबाद

चाहे दरबारी मिर्जे , सेठ, सौदागर, दुकानदार हों

या इल्म और हुनर के कलाकार

- कुछ बहुत ऊपर, कुछ थोड़ा ऊपर

लेकिन सभी ऊपर , बेशक ऊपर।

परवाजों की ये कहानियां आज तक गाहे बगाहे सुनायी पड़ती हैं

दिल्ली के इन इलाकों में

जिनके नसीब में आगे जमीनी हकीकतों का सिलसिला हो

वे ऐसी कहानियों को बडे+ प्यार से पालपोस कर बड़ा करते हैं

साथ में हाय हाय भी लगी रहती है

गिरने की हाय ,

गिर कर न उठ पाने का अफसोस

अंदर के खोखलेपन को न मान कर इधर उधर की वजहें तलाशने की उत्कंठा

औरंगजेब की कट्टरता के बढे+ चढे+ किस्से

रोशनआरा की उच्छृंखलता के कारनामे

फरूखसियर के दोगलेपन के चर्चे

बरहा भाइयों की नमकहरामी पर लानत

लालकुंअर की खूबसूरत चालबाजियों पर तौबा

या अदारंग और सदारंग के खयालों में डूबे

मुहम्मद शाह रंगीले की शराबों पर लाहौल।



दिल्ली बतकहियों का शहर बन गया

चांदनी चौक के बीचोंबीच बहता पानी गंदलाता गया

पानी के कीटाणु तो दिल्ली की तीखी चाट ने मार डाले

पर नादिरशाही जुल्म का खून ऐसा जमा

कि झिलमिलाती चांदनी लाल नजर आने लगी

उस दिन से लाल किले के पत्थर कुछ स्याह नजर आने लगे

जाटों , मराठों और रोहिलों के घुड़सवारों के बीच

बादशाही नजर पथरा गयी

शाहआलम की इन्हीं आंखों को फोड़ा था रोहिलों ने

तहजीब के पास घोड़े नहीं थे

हिनहिनाते कैसे ?

अंगरखों में सिकुड़ कर बैठ गया दिल्लीपन

जीनतुल मस्जिद में

शहरे आशोब लिखा नहीं गया , महसूस किया गया

दीवान ए खास की शमां आखिरी शमां थी

इसकी रोशनी में चमकने के लिये न कोहेनूर था न रत्नों की पेटियां

रोशनी गालिब , जौक और मोमिन से होकर

अंततः बहादुरशाह जफर पर ठहर कर थरथरा जाती थी

मानो बल्लीमारान की गलियों से निकल कर

हजारों ख्वाहिशें लाल किले की सिमटी बारादरियों में दम तोड़ रही हों

मानो मौत के साथ चलने का इंतजार हो

फिर भी बादशाहत के पास होने की खुशी ऐसी

कि पास कोई दूसरा तो नहीं।



किले की दीवारें बेनूर सही

अभी भी दीवारें तो थीं

शहर उस पार था

जिससे अभी भी कुछ दूर थीं इस पार की शामें

और जिनके सहारे सारे दिन महफूजियत के कुछ भ्रम

उस पार भी फैलाये जा सकते थे

दरियागंज की उन हवेलियों के बीच भी जहां फिरंगी रहने लगे थे

जहां आक्टरलोनी को लूनी अख्तर कह कर दिल्लीपन की इंतहा मानी जा सकती थी

जहां विलियम फ्रेजर के हरम को अपनी तहजीब की अगली कड़ी समझा जा सकता था

जहां गदर के सिपाहियों को सामंती तहजीब के पैमाने से

कुछ लुच्चे उत्पातियों की शक्ल दी जा सकती थी

जहां सब्जीमंडी की आर पार की लड़ाई से

जितना खून खौला , जितना खून बहा

उतना ही पतला भी रहा

जिस दिन खूनी दरवाजे पर मुगलिया सल्तनत के खून का आखिरी कतरा गिरा

उस दिन भी दिल्ली शांत ही रही

कोतवाली के पास फांसियों की कतार के बीच भी कोई हलचल नहीं हुई

घंटेवालान की मिठाइयां बनती रहीं

निहारी के कबाब बिकते रहे

परिन्दे उड़ते रहे

तमाम प्यार , मुहब्बत, फि और तकरीर के बावजूद

दिल्लीपन अंततः एक शब्द साबित हुआ

अधिक से अधिक एक जुमला

जो तमाम पुरानी गंधों के बीच

आंखें खोल कर देखने पर

आपके चारों तरफ इस तरह उछलेगा

जैसे भीड़ भरे बाजार की होड़ में ललचाता एक ब्रांड नेम।



८.

दिल्ली के अनवरत रेंगते टै्रफिक में

जब कॉकटेल्स की छलकती रंगीनियां सूखने लगती हैं

और हयात या शांगरीला से निकले

कार्पोरेट मल्टीनेशनल धनाढ्यों की भाषा को हिचकियां आने लगती हैं

उस वक्त रेडियो मिर्ची या एफ.एम. से जो ÷ हिंगलिश' का

लटकेदार प्रलाप होता है

वह उतना बेमानी भी नहीं जितना आप समझते हैं

वह नव साम्राज्यवाद का आलाप है

जहां अर्थहीनता का ही अर्थ है

आप झुंझलायें नहीं , व्यवस्था को गाली न दें

आप एक खिलखिलाती नवयौवना से होलीडे पैकेज ,

आइटम गर्ल्स , हॉलीवुड की चमक और

वॉलीवुड के सितारों की बातें सुन कर समय का सदुपयोग करें

और खुश हो लें कि आप भी ग्लोबल हो गये हैं।



भाषा की अपनी सत्ता होती है

हमेशा से रही है

उस वक्त भी थी जब माल रोड पर टहलते सिविल लाइंस के

अंग्रेजों को देख देख

दिल्लीवालों ने मुगलिया यादें छोड़ अंग्रेजी सीखना शुरू किया।

कश्मीरी गेट पर , १८५७ के मैगजीन विस्फोट के स्थल के

बिल्कुल पास शुरू हुए सेंट स्टीफेंस और हिन्दू कॉलेज

और १८५७ की दहशत को मन में लिये

उत्तर की ओर दूर दूर फैलता गया

एक प्रजातीय अलगाव

सिविल लाइंस के बंगलों की शक्ल में

जहां हेलीबरी से निकले

नये ब्रिटिश राज्य के इंडियन सिविल सर्विस ने

स्टील फ्रेम की तरह एक नयी दिल्ली बसायी।

स्टील फ्रेम में जकड़ी दिल्ली कांपती रही

मिर्जां गालिब अपनी पेंशन के लिये भटकते रहे

सूरज चमकता रहा

चांद टटोलता रहा रास्ते

मेडेन्स की दूधिया दीवारों के बीच , लुडलो कासल के पोर्च के दरम्यान

जिसके अंदर के ठंडे बरामदों पर

जिन और टॉनिक के बीच

ईश्वर सम्राट को बचाता रहा।



दिल्ली में अब नौबतखाना नहीं था , भीड़ भाड़ की वह चटख रंगत भी नहीं

पहलूनशीं होने का वह जमाना भी गया

चहलकदमी के नये अंदाज थे

नसीमे सहर विलायत से चली थी ,

गुनगुनी शाम कश्मीरी गेट में होती थी

और चांदनी चौक उसे नीमनिगाही से देखता था।



कनखियों के इस खेल से दिल्ली बहुत मुफीद होकर निकली

बंगाल की गर्म हवाओं की तुलना में

ठंडे ठंडे लगे यहां के बंगले

राजधानी दिल्ली को फिर बनना ही था

साम्राज्यवाद बहुत जटिल था

और उतना ही ठोस

रस्मी दिल्ली से बहुत अलग

कागजों की सभ्यता के आगे दम तोड़ते आचार और व्यवहार के अदब

कचहरियों की नयी जमात

कारकूनों की नयी कतारें

जमीन और मिल्कियत की नयी हकीकत

जिसके आगे बदतमीज लगते थे उर्दू के अफसाने

और सुरों से भटकता था गजलों का रियाज।



महफिलों का नहीं कैम्पों का जमाना था वह

कैम्प भी शहर बन सकते थे

जैसे जॉर्ज के दरबार का किंग्सवे कैम्प

जिसकी शान के आगे झुके झुके थे हमारे सैकड़ों हुक्मबरदार

वफादारी से गलगलाये ,

नजरानों की बौछार में लिजलिजे

कुछ और तोप दगवाने की इनायत से गदगद।



यह बंगाल नहीं दिल्ली थी

यहां कोई स्वदेशी आंदोलन नहीं था

यहां कालीबाड़ी के आगे शपथ लेते नौजवान नहीं थे

और अभी भी मजलिसे रक्सो सरोद की यादों के मातमी बादल तो थे

पर बारिश नहीं थी।

इसलिए दिल्ली को फिर से राजधानी बनाना

लाट साहबों के लिये तो महफूज था

पर दिल्ली अचकचा गयी।



अचकचा कर उठने वालों के दिल अक्सर धड़कते हैं

दिल्ली भी धड़की

जब हार्डिंज पर सरे बाजार बम फेंका गया

पर अपने बाजारों में सड़क के दोनों तरफ चलना

दिल्ली वालों ने कभी नहीं छोड़ा है

लाला हरदयाल का गदर आंदोलन बहुत दूर था

और अब तो बाजार बढ़ रहे थे

उपनिवेशवाद तिजोरियों में नहीं

पूरी दुनिया की तिजारतों , बैंकों और पूंजी के साथ

नये नये रूप धर कर आ रहा था

जिन्हें सम्भालते सम्भालते चांदनी चौक का चेहरा भी बदलने लगा था।



दिल्ली एक बार फिर कई चेहरों के साथ थी

प्रथम विश्वयुद्ध की मार से कराहते चेहरे एक ओर

तो रायसीना की पहाड़ी की तरफ फैलती नयी राजधानी की ओर

उत्सुकता से लगी ठेकेदारी की कल्पनाएं दूसरी तरफ

नयी दिल्ली बनी तो ऐसी बनी जैसे

सूरज कभी ढलेगा ही नहीं

वह सिर्फ लुटयेंस और बेकर का वास्तुशास्त्रा लेकर नहीं आयी

वह भव्यता का सदियों पुराना शास्त्रा लेकर आयी

जहां नये वाइसराय निवास की किलेनुमा दीवारों से लेकर

विशालकाय बंगलों तक के सिलसिलों में कुछ भी सूफियाना न था

अब ढेर सारे बल्बन थे , कितने ही अलाउद्दीन

और मुंह में चुरुट दबाये , एड़ियां खटखटाते

ऊंचे खम्भों वाले कनाट प्लेस में

पृथ्वी की तरह गोल गोल घूमते

ताजमहल को भी बर्तानिया ले जाने के सपने देखते

कई कई शाहजहां।



औपनिवेशिक रोमांस में भी औरतें आ सकती हैं

जैसे माउंटबैटन का एडविना को दिल्ली में प्रपोज करना

पर वह पुराने वाइसराय निवास की बातें थीं

जहां अब विश्वविद्यालय था

इसलिए वे बातें भी शायद किताबी थीं।

उपनिवेशों में प्रेम हमेशा उपयोगी होना चाहिए

मुनाफे के लिये ऊपर के होंठ को कड़ा रखना चाहिए

साम्राज्यवाद पूर्णतः मर्द होता है

और दिल्ली के हुनर बाजार नहीं , बूढ़ी तवायफों के कोठे थे।



वैसे मुनाफे का हमेशा से कुछ हिस्सा दिल्ली वालों के हाथ भी लगता ही रहा है

अबकी बार ठेकों से उपजी नयी रईसी थी

जिसके खुले बंगलों को विदेशी शिष्टाचार की बयार सम्भ्रांत बनाती थी

यहां बंद कमरे न थे

लेकिन जहां थे वहां कानाफूसी से शुरू होकर बातें बढ़ने लगी थीं

और बढ़ते बढ़ते चौराहों तक भी आने लगी थीं

विदेश ने देश को पहचान दी थी ,

और इस पहचान में जो प्रेम उमड़ा था

वह सूखे सख्त होठों से नहीं

तरल और ऊष्म आवाजों से ओत प्रोत था।

अभ्यावेदनों की दुनिया से हट कर दिल्ली खिलाफत के नये शब्द सीख रही थी

असहयोग , बहिष्कार, सत्याग्रह और सविनय अविज्ञा

लोगों को संगठित करने के नये तरीके

अपने और पराये के भिन्न प्रतीक

मानों विशिष्ट और साधारण के बीच की गहराई को

पाटने के लिये बनाये जा रहे हों कई कई पुल

और बताया जा रहा हो लगातार

कि इन्हें पार करके ही पाओगे तुम श्वेत , शुभ्र लिबास

धारण किये हुए उस गरिमामय औरत की गोद

जो तुम्हारी मां है।

उल्लास के बार बार उठते कई हुजूम थे

सड़कों पर सुबह दोपहर शाम सभी उजले उजले थे

गांधी टोपियों और खादी के कुर्तों और साड़ियों की तरह

जो उमंग की हवाओं से फड़फड़ाते हुए

बार बार यह भूल जाते थे कि सेण्ट्रल असेम्बली के बम के पीछे

उजले कपड़ों की नहीं बिना कपड़ों के मजदूरों की भी बातें थीं

और कि दिल्ली में बिना दरारों के पुल और बिना गढ्ढों

की सड़क कभी नहीं बन पाये हैं।



इसलिए जब आजादी आयी

तो वह किसी करिश्माई गुब्बारे के मानिन्द न थी जो खुले आकाश में उड़ा ले जाता

वह कोई व्यक्ति भी नहीं जो सिर्फ अपने नाम से पहचान लिया जाता

आजाद मुल्क की राजधानी की पहली सुबह को

जिन अहसासों के साथ आना चाहिए था वैसा हुआ नहीं

कुछ तो आदमी हमेशा से खुद अपना दुश्मन रहा ही है

कुछ विभेदों के पूरी तरह मिटने की आशा भी संशकित सी थी

और खुशी के उस दिन भी कुछ काले बादल छाये ही रहे।

एक बहुत बड़ा हिस्सा जो अपना था वह अपना न रहा

रोटियां टुकड़ों में बंट गयीं

दस्तरखान सिमट गये

बरसात की उस टूटी टूटी धूप में

कितनों से इलाके ही नहीं , पूरी की पूरी दिल्ली छूट गयी

मिट्टी की गंध तो ले गये , पर मिट्टी धरी रह गयी।



दिल्ली फिर से सवालों का शहर था

दंगाइयों का खून भी अगर दिल्ली के उन्हीं गली कूचों से निकला था

तो वह कत्ल हुए बाशिंदों से अधिक मजहबी कैसे हो गया ?

पाकिस्तान के इबादतखाने क्या दिल्ली की जामा मस्जिद से अधिक पुख्ता थे ?

लाहौर में कबूतर दिल्ली से ज्यादा करतबी कब से हो गये ?

महात्मा गांधी हे राम बोल कर क्यों मरे ?

वह कौन सा हिन्दू था जिसने उन्हें मार डाला ?

क्या शरणार्थिंयों के कैम्पों की जिल्लत और रंज से ही दिल्ली

कुछ कट्टर हो चली है ?

क्या अंग्रेज सचमुच चले गये ?

तो फिर नयी दिल्ली के उन बंगलों और क्लबों में

हमें घुसने क्यों नहीं दिया जाता ?



ऐसे कई सवाल थे जिनसे दिल्ली आक्रांत रही है

कई अभ्युक्तियां भी कहीं न कहीं अब सवाल ही थीं

जैसे लाल किले पर तिरंगा साल दर साल फहराता रहा

करोल बाग , पटेल नगर और पंजाबी बाग की बड़ी बड़ी कोठियों में शरणार्थियों ने

एक अनूठे जीवट का अध्याय भी लिखा

कॉफी हाउस में नये फलसफे और नयी कहानियों के बीच

ढेर सारी सुलगायी सिगरेटों को अधभरे प्यालों में मसल कर बुझाया गया

कॉलेजों में दुनिया को बदलने की हवा भी चली

नेहरू का शांतिवन विचारधारा का विश्वविद्यालय बन खलबलाता रहा

राष्ट्रीयकरण के सपनीले दौर में नार्थ ब्लाक और साउथ ब्लाक भी खींचते रहे

अदब का एक बहुत बड़ा संसार बांये चला

फिर दिल्ली के बढ़ते यातायात के दबाव में धीरे धीरे

यातायात के नियम तोड़ता गया

तुर्कमान गेट की बस्ती आपातकाल के दौरान तोड़ी गयी

पालिका बाजार वहीं बना जहां पहले कॉफी हाउस था

एशियन गेम्स के समय दिल्ली में रंगीन टी.वी. का आना बड़ी बात बन गयी

सिख दंगों के दौरान कनाट प्लेस और करोलबाग में भी सन्नाटा छाया रहा

इससे भी बड़ा सन्नाटा पूरी दिल्ली की सड़कों पर तब छाया जब

हर हफ्ते रामायण सीरियल दिखाया गया

दिल्ली में जगराते भी इसी दौरान बड़ी तेजी से बढे+

दिल्ली भी उतनी ही तेजी से बढ़ी है

पहाड़गंज में जहां १८०३ में लार्ड लेक ने मराठों को हराया था

वहां मराठे नहीं बिहारी अधिक रहते हैं

दिल्ली के मिस्त्राी , रिक्शेवाले, चौकीदार अब सब के सब पुरबिया हैं

दिल्ली में फूलवालों की सैर अब भी बख्तियार काजी की दरगाह से जोगमाया मंदिर जाती है

पर उससे अधिक भीड़ छठ के समय घाटों पर

और दशहरा के दौरान रामलीला मैदान में रहती है।



दिल्ली में उमस बहुत बढ़ गयी है

बहुत सारे लोगों ने अब शीशे चढ़ा रखे हैं

अंदर पूंजी का सामंतवाद बहता है

जो दिमाग को ठंडा रखता है

और जिसे गर्मी महसूस होने पर

खरीदा और बेचा जा सकता है

डी.एल.एफ. के बड़े बड़े शापिंग माल्स में

बड़े बड़े मल्टीनेशनल पे पैकेजों के सहारे

बार्बी डॉल्स की तरह

जिनकी गुड़ियों सी शादी नहीं होती

और जो विचारशून्यता की अंतर्राष्ट्रीय खुशी में

माचो मर्दों से लिपट लिपट कर क्रेजी किया करती हैं।



सुनते हैं कि दिल्ली अब एक फैलता हुआ शहर नहीं दुनिया है

वैसे ही जैसे भारत अब देश नहीं , विश्व हो रहा है

दिल्ली में रहने वाले भी अब विश्व देख रहे हैं

विदेशी कम्पनी वाले , यू.एन.डी.पी. और यहां तक कि भारतीय नौकरशाह भी

उन्हें बता रहे हैं

कि अट्टालिकाओं में जो वैश्वी सोना इकठ्ठा हो रहा है

उसका द्रव्य रिस रिस कर नीचे ही गिरेगा

और यह दिल्ली पर है कि वह सवालों की कैद से बाहर आकर

उसे कितनी तेजी से अपनी हथेलियों में लपक लेती है।



इसी रेलमपेल में भाग रही है दिल्ली

सांसें फुुलाते हुए , आसमान की ओर देखती

हवाओं से दुनिया खींच कर मुट्ठियों में बंद करने को व्याकुल

लेकिन गाड़ियों की बेतहाशा बढ़ती कतारों के इस वक्त में

जब सड़क पार करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो

हर शाम हजारों चलने वालों के लिये

दिल्ली फिर एक शहर हो जाती है

पसीने से लस्त ऐसे लोगों का शहर

जिन्हें थोड़ी देर के लिये रात का सन्नाटा चाहिए ,

थोड़ी नींद चाहिए

और छोटे छोटे सपने चाहिए

जिसमें विश्व नहीं ,

उनकी ही कदकाठी की

उनकी ही जुबान बोलती

सीधी सादी , सच्ची आंखों वाली शरीके हाल सी दिल्ली हो।

10.2.08

"निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है"



"निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है"


***राजीव तनेजा***

माना कि...
अपनों के बीच... अपने शहर में
चलती तेरी बड़ी ही धाक है

सही में...
विरोधियों के राज में भी तू. ..
गुंडो का सबसे बडा सरताज है ...

हाँ सच!...
तू तो अपने ठाकरे का ही 'राज' है...
सुना है!...
समूची मुम्बई पे चलता तेरा ही राज है


अरे!...
अपनी गली में तो कुता भी शेर होता है...
आ के देख मैदान ए जंग में...
देखें कौन. ..कहाँ... कैसे ढेर होता है

सुन!...
सही है...सलामत है...चूँकि मुम्बई में है...
आ यहाँ दिल्ली में...
बताएँ तुझे ...
निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है

हाँ! ...
निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है

***राजीव तनेजा***



नोट: अविनाश वाचस्पति जी को समर्पित

2.2.08

सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल...सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता का अंतिम भाग

(मुझे अब तक की सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता जो लगी, उसका पहला पार्ट कल आप लोगों ने पढ़ा होगा, हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने शीर्षक से। जिन लोगों ने नहीं पढ़ा हो, उपरोक्त शीर्षक को क्लिक कर पढ़ लें, फिर आज दूसरा और अंतिम पार्ट पढ़ें, जो नीचे दे रहा हूं। कवि का नाम है, हरेप्रकाश उपाध्याय। मैं इनसे मिला नहीं हूं, इनके बारे में कोई खास जानकारी नहीं रखता पर इन इस एक कविता को पढ़कर मैं इनका फैन हो गया। भई वाह, क्या लिखा है। उन शुद्धतावादियों, परंपरावादियों, यथास्थितिवादियों, पोंगापंथियों....को इस कविता को जरूर पढ़ना चाहिए और सोचना चाहिए कि उनके इस सिस्टम में सहज चीजें सहज तरीकें से क्यों नहीं मिल पातीं। अगर कोई भी भड़ासी साथी हरेप्रकाश उपाध्याय जी के बारे में कुछ जानता हो तो वो जरूर जानकारी दे। इतना बता दूं कि ये कविता इससे पहले कई मैग्जीनों में भी प्रकाशित हो चुकी है...जय भड़ास, यशवंत)


सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल
जब थक गए पांव
झूठ बोलकर हमने मांगी मदद जो मिली
झूठे कहलाए बाद में
झूठ ने किया पहले काम आसान
आत्महत्या से बचाया हमें उन छोरियों के प्रेम ने
जो बुरी मानी गईं अक्सर
हमारे समाज ने बदचलन कहा जिन्हें
बुरी स्त्रियों और सबसे सतही मुंबइया फिल्मों ने
सिखाया करना प्रेम
बुरे गुरुओं ने सिखाया
लिखना सच्चे प्रेम पत्र
दो कौड़ी के लेमनचूस के लालच में
पड़ जाने वाले लौंडों ने
पहुंचाया उन प्रेम-पत्रों को
सही मुकाम तक

जब परेशानी, अभाव, भागमभाग
और बदबूदार पसीने ने घेरा हमें
छोड़ दिया गोरी चमड़ी वाली उन
खुशबूदार प्रेमिकाओं ने साथ

बुरी औरतों ने थामा ऐसे वक्त में हाथ
हमें अराजक और कुंठित होने से बचाया
हमारी कामनाओं को किया तृप्त

बुरी शराब ने साथ दिया बुरे दिनों में
उबारा हमें घोर अवसादों से
स्वाभिमान और हिम्मत की शमा जलाई
हमारे भीतर के अंधेरों में
दो कौड़ी की बीड़ियों को फूंकते हुए
चढ़े हम पहाड़ जैसे जीवन की ऊंचाई
गंदे नालों और नदियों का पानी का आया वक्त पर
बोतलों में बंद महंगे मिनरल वाटर नहीं
भूख से तड़पते लोगों के काम आए
बुरे भोजन

कूड़े पर सड़ते फल और सब्जियां
सबसे सस्ते गाजर और टमाटर
हमारे एकाकीपन को दूर किया
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में
और जल्दी ही भुला देने के इस दौर में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं
उस कसबे के लोग
जहां से भागकर आया हूं
दिल्ली !


--हरेप्रकाश उपाध्याय

(यह कविता का दूसार व अंतिम पार्ट है। इससे पहले की कविता पढ़ने के लिए क्लिक करें....हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने)

1.2.08

हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने

(हरिद्वार प्रवास में दिल्ली के एक कवि की एक ऐसी कविता पढ़ने को मिली, जिसे कहने को मन हो रहा है कि ये अब तक की सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता है, जिसे हम सब महसूस कर सकते हैं, समझ सकते हैं, जीते रहते हैं, अगल-बगल होते हुए, घटित होते हुए, फलित होते हुए देखते हैं....शायद घोर कलयुग का असर है पर ये सच है, बुरे लोगों ने किस तरह जिंदगी को जीना सिखाया है क्योंकि बुरे लोगों की बनाई दुनिया और बुरे लोगों द्वारा चलाई जा रही दुनिया और बुरे लोगों के लिए चल रही दुनिया है ये...सो आइये इसे बाचें, पढ़ें, गुनें, सुनें, महसूसें और कोसें भी कि ऐसे वक्त में क्यों जी रहे हैं जहां बुरी सीख से ज़िंदगी जीने का मतलब सीख पाते हैं और इसी के सहारे कुछ अच्छा कर पाते हैं क्योंकि दुनिया सहज, सरल और सरस नहीं है। कहने को बहुत कुछ गद्द में कहा जा सकता है लेकिन दिल्ली के इस कवि ने अपनी लंबी कविता में जो कुछ कहा है उसे गद्द में कतई नहीं कहा जा सकता है, इस कवि का नाम मैं अगली पोस्ट में खोलूंगा, उससे पहले चाहूंगा कि लंबी कविता के इस पहले पार्ट को आप लोग ध्यान से पढ़ें और अपनी राय दें....जय भड़ास, यशवंत)

कृपया बुरा न मानें
इसे बुरे समय का प्रभाव तो कतई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हकीकत है
कि काम नहीं आई
बुरे वक्त में अच्छाइयां

ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीजें
बुरे लोग, बुरी बातें और बुरे दोस्तों ने बचाई जान अक्सर
उंगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीजों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने
बुरे समय में
अक्सर साथ छोड़ दिया
बचपन से ही
काम आती रहीं बुराइयां

बुरी माओं ने पिलाया हमें अपना दूध
थोड़ा बहुत अपने बच्चों से चुराकर
बुरे मर्दों ने खरीदी हमारे लिए अच्छी कमीजें
मेले हाटों के लिए दिया जेब खर्च

गली के हरामजादे कहे गए वे छोकरे
जिन्होंने बात-बात पर गाली-गलौज
और मारपीट से ही किया हमारा स्वागत
उन्होंने भगाया हमारे भीतर का लिजलिजापन
और किया बाहर से दृढ़

हमें नपुंसक होने से बचाया
बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने
हमें सिखाया लड़ना और अड़ना

बुरे लोगों ने पढ़ाया
ज़िंदगी का व्यावहारिक पाठ
जो हर चक्रव्यूह में आया काम हमारे
हमारी परेशानियों ने
किया संगठित हमें


(जारी)

3.12.07

"मैडम जी आप कहाँ थी?"

"मैडम जी आप कहाँ थी?"

***राजीव तनेजा***


"अब क्या मुँह लेकर अपना हाल ब्याँ करे ये राजीव?"

"मैँ खुद ही तो तारीफों के पुल बाँधा करता था उनके"...

"हाँ!..उन्हीं के"....

"जिनकी वजह से तो आज मेरा ये हाल है"...

"आज अगर मेरा काम-धन्धा...मेरा घरबार...

सब टूट की कगार पर है तो सिर्फ उन्हीं के कारण"


"दोराहे पे खडा आज मैँ सोच रहा हूँ कि किस ओर जाऊँ?"...

"इस ओर...या फिर उस ओर"...

"जाऊँ तो जाऊँ कहाँ...बता है दिल...कहाँ है मेरी मंज़िल?"



"कौन ऐसा नहीं होगा जो...मेरा मज़ाक...

मेरी खिल्ली नहीं उडाएगा?"....


"सब के सब यही कहेंगे कि बडा अपना 'टीन-टब्बर' सब उखाड ले गया था पानीपत कि..

अब तो वहीं सैट होना है"...

"वही मेरी कॉशी...वही मेरा मक्का"


"आ गए मज़े?"...

"ले लिए वडेवें?"...

"हर जगह अपनी ही चलाता था"...

"अब पता चला बच्चू को कि मंडी में आलू क्या भाव बिकता है?"जैसे ताने बारम्बार मेरे कानों के पर्दों को बेंध ना डालेंगे?"


"उनका भी क्या कसूर?"


"मैँ खुद ही जो छाती ठोंक बडे-बडॆ दावे करता था कि...

'मेरी दिल्ली मेरी शान'...

'दिल्ली पैरिस बन के रहेगी'...


"माँ दा सिरर बन्न के रहेगी"...

"ढेढ साल में तो कुछ हुआ नहीं"....

"अब वैसे भी वक्त ही कितना बचा है मैडम जी के पास?"

"खेल सर पे तैयार खडे हैँ होने को और मैडम जी अभी 'फ्लाईओवर' भी पूरे नहीं बनवा पाई हैँ"...


"पिछले ढेढ साल में और अब में कितना फर्क पड गया है?"...


"टट्टू जितना भी नहीं"


"दावे तो लम्बे चौडे कर रही है मैडम जी खुद और उनका लाव लश्कर भी लेकिन ...

हालात तो अभी भी जस के तस ही हैँ"...


"वही आँखे मूंद!..बेतरतीब दौडती भीड"....

"वही हमेशा!..दुर्घटनाएँ करती बेलगाम ब्लू लाईन बसें"....

"वही उनकी!..रोज़ाना की अन्धी भागमभाग"...

"वही उनकी!..लफूंडरछाप दादागिरी"...


"कुछ भी तो नहीं बदला है"


"वही सरे आम!..अवाम को ठगते-एंठते ऑटो-टैक्सी वाले"...

"वही केंचुए की चाल!..रेंगता ट्रैफिक"

"वही बिजली के!..लम्बे-लम्बे कट"..

और वही जम्बो जैट के माफिक!..बिजली के तेज़ दौडते मीटर"


"कुछ बदला भी है कहीं?"...


"हाँ!..बदला है अगर कुछ...तो वो है आम आदमी का मायूस चेहरा"...

"हाँ!..मायूस कहना ही सही रहेगा"...


"इनके मायूसियत लिए मासूम चेहरे के पीछे ज़रा ठीक से झांक कर तो देखो मैडम जी"

"कैसे मर-मर जीने की चाह में जिए चले जा रहे हैँ ये"

"लेकिन पराई पीड आप क्या जानो?"...

"आपका क्या है?"..

"कौन सा आपको भाग कर बस या गाडी पकडनी है?"...

"कौन सा आपको बिजली,पानी और मोबाईल के बिल भरने हैँ?"...


"कौन सा आपके मकान,दुकान या फैक्ट्री पे हथोडा बजाया जा रहा है?"


"कौन सा आपकी दुकान या बिल्डिंग को 'सील'लग रही है?"...


"दिल्ली 'पैरिस' बने ना बने लेकिन इतना तो सच है ...कि आपके घर ....

ऊप्स!...घर कहाँ हुए करते हैँ आपके?"...

"सॉरी!..घर तो हम जैसे मामूली लोगों के होते हैँ"...

"आप लोग तो बँगलो में रहा करते हैँ"...


"हैँ ना!...?"...


"आपके बँगले बनेंगे...ज़रूर बनेंगे लेकिन हम लोगों की जेबों के दम पर"..


"यही सच है ना?"...


"पैरिस क्या...फ्राँस क्या...और लंदन क्या...

दुनिया के हर देश...हर शहर..हर मोहल्ले की पॉश कालोनियों में बनेंगे"

"और!...वो भी एक से एक टॉप लोकेशन पर"


"हाँ!...हमीं लोगों की जेबों की कीमत पर"मेरा ऊँचा स्वर मायूस हो चला था


"पता नहीं कैसे पाई-पाई जोड कर हमने अपना ये छोटा सा आशियाना बनाया"..

"सालों साल एडियाँ रगड-रगड कर अपना रोज़गार जमाया"...

"जब कुछ खाने कमाने लायक हुए तो मैडम जी कहती हैँ कि...

"चलो!..भागो यहाँ से"...

"टॉट का पैबन्द हो तुम दिल्ली के नाम पर"..

"धब्बा हो दिल्ली की शान में"


"सील कर देंगे हम तुम्हारी ये दुकाने. ..ये फैक्ट्रियाँ"...

"तोड देंगे तुम्हारे ये फ्लैट..ये मकान"...

"नाजायज़ कब्ज़ा जमा रखा है तुमने"...


"अरे!...काहे का नाजायज़ कब्ज़ा?"..

"पूरे गिन के करारे-करारे नोट खर्चा किए थे हमने"


"पता भी है तुम्हें कि कितने सालों से?"...

"क्या-क्या जतन करके...कहाँ-कहाँ अँगूठा टेक के पैसा इकट्ठा कर हमने ये छोटा सा दो कमरों का मकान खरीदा और...

अब आप ये कहने चली हैँ कि ये ग्राम सभा की सरकारी ज़मीन है...या फिर एक्वायर की हुई ज़मीन है"...


"हमें कुछ नहीं पता कि ग्राम सभा क्या होती है और एक्वायर किस बिमारी का नाम है?"


"हमें तो बस इतना पता है कि ये दुकान..ये मकान हमारा है"


"चलो माना कि आप सच ही कह रही होंगी सोलह आने कि ये ग्राम सभा की ज़मीन है...

माने सरकारी ज़मीन लेकिन...

तब आपके मातहत कहाँ गए हुए थे जब पैस ए ले-ले यहाँ खेतों में धडाधड कलोनियाँ बसाई जा रही थी?"

"तब क्यों नहीं रोका था हमें?"

"तब क्यों नहीं अन्दर किए थे कॉलोनाईज़र और प्रापर्टी डीलर?"

"वो भी तो पैसे ले कर इधर-उधर हो गए थे"मैँ खुद से बातेँ करता हुआ बोला


"उस वक्त तो पाँच हज़ार रुपए पर 'शटर' के हिसाब से...

नकद गिन के धरवा लिए थे सरकारी बाबुओं ने चिनाई चालू होने से पहले ही कि...


"हाँ!...दल दो हमारे सीने पे दाल"..

"हम पत्थर दिल हैँ"...

"हमें कोई फर्क नहीं पडता"..


"ठीक उनके दफतर के सामने ही तो निकाली थी तीन दुकाने मैंने"...

"कोई रोकने वाला...कोई टोकने वाला नहीं था...

नोटों भरा जूता जो मार चुका था पहले ही" ..


"ये तो बाद में पता चला कि सालों ने पैसे भी डकार लिए और पीठ पीछे कंप्लेंट कर छुरा भी भौँक डाला सीने में"...

"सालों!..को अपनी कुर्सी जो प्यारी थी"

"सो!...बेदाग बचाने को सारी कसरतें की जा रही थी"...

"ऊपर दफतर में खिला-पिला के मेरे केस की फाईल दबवा दी कि कुछ भी हो साल दो साल ऊपर उभरने तक ना देना"...

"बाद में अपने आप निबटता रहेगा खुद ही"..

"वाह!...क्या सही तरीका छांटा है पट्ठों ने"...

"जेब की जेब भरी रही और कुर्सी की कुर्सी बची रही"


"कहने को तो जनता के सेवक हैँ"...

"सेवा करना इनका धर्म है...तनख्वाह मिलती है इन्हें इसकी"..


"अजी छोडो ये सब!...काहे के जनता-जनार्दन के सेवक?"...


"सेवा-पानी तो उल्टे अपनी ये करवाते हैँ हमसे"

"लानत है ऐसे जीवन पर"...

"इनकी सेवा भी करो और इनका पानी भी भरो"


"मैडम जी!...आपका डिपार्टमैंट कहता है कि सिर्फ दिल्ली जल बोर्ड का पानी ही पिएँ"..

"अरे!...पहले ठीक से घर-घर पहुँचाओ तो सही इसे"...

"फिर हम ना पिएँ तो कहना"


"वैसे एक बात बताएँगी आप सच्ची-सच्ची?"

"आपने कभी खुद भी पी के देखा है इसे?"....

"कैसे सडाँध मारता है ना कई बार?"


"है ना?"...


"इसका मटमैला रंग देख तो उबकाई भी आने से मना कर देती है"..


"ठीक है!...माना कि आप सिर्फ और सिर्फ फिल्टरड पानी ही इस्तेमाल करती हैँ....

नहाने के लिए भी और *&ं%$# के लिए भी"...


"किसी से सुना तो ये भी है कि आपके कुत्ते तक भी बिज़लरी के अलावा दूजा सूँघते तक नहीं हैँ"...

"अल्सेशियन जो ठहरे"

"अरे!...हमें उनसे भी गया गुज़रा तो ना बनाएँ आप"

"प्लीज़!..विनती है हमारी आपसे कि...

ढंग से बाल्टी दो बाल्टी पीने का पानी ही म्यस्सर करवा दिया करें"


"तब कहाँ गई थी मैडम जी आप?"

"जब पुलिस वाले बीट आफिसर बारम्बार मोटर साईकिल पे चक्कर काट काट अपना हिस्सा ले जा रहे थे और...

बाद में चौकी इंचार्ज को भेज दिया था कि जाओ तुम भी कर आओ मुँह मीठा"..

"हो जाएगी तुम्हारी भी दाढ गीली"


"आप कहती हैँ कि हमने अवैध कंस्ट्रक्शन की हुई है तो...

आप ये बताएं कि किसने नहीं किया है ये तथाकथित अवैध निर्माण?"

"क्या आप नेताओं के निर्माण दूध के धुले हैँ?"

"कुछ अनैतिक नहीं है उनमें?"

"क्या आपको ज़रूरत हो सकती है अतिरिक्त स्पेस की...हमें नहीं?"

"क्या आपकी ज़रूरतें जायज़ हो सकती हैँ...हमारी नहीं?"


"अच्छा किया जो आपने बुल्डोज़र चला हमारा आशियाँ मटियामेट कर दिया...ध्वस्त कर दिया लेकिन...

क्या आपके अपने अवैध निर्माणों की तरफ आप ही के बुल्डोज़र ने निगाह करना भी गवारा समझा?"

"उचित समझा?"


"नहीं ना!...?...


"किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव ...जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है"

"रेत के ढेर पे तुम भी खडे हो और हम भी पडे हैँ"...

"ना तुम सही हो...ना हम ही सही हैँ"


"अरे!..हमारा दिल देखो....हमारा जिगरा देखो"...

"आपने हथोडा बजाया"...

"कोई बात नहीं"...

आपने सील लगाई"...

"कोई बात नहीं"

"लेकिन इतना तो ज़रूर पूछना चाहूँगा आपसे कि...

अगर हमारे यहाँ से हथोडों की धमाधम आवाज़ें हमारे दिल ओ दिमाग को बेंधे जा रही थी तो

कम से कम आपके वहाँ से हथोडी की महीन सी ...बारीक सी आवाज़ भी हमें तसल्ली दे जाती कि ..

कानून सबके वास्ते एक है"...


"हम चुपचाप संतोष कर अपने रोते हुए दिल को शांत कर लेते कि...

"कोई छोटा...कोई बडा नहीं है कानून की नज़र में"

"वो सबको एक आँख से देखता है"

"लेकिन अफ्सोस!...जो हुआ...जैसा हुआ...

उस से तो लगता है कि इससे तो अच्छा था कि कानून की एक आँख भी ना ही होती"...

"यूँ भेदभाव तो नहीं कर पाता वो"..


"कहने को हम लोकतंत्र में जी रहे हैँ"..

"अगर ये भ्रम मात्र है हमारा तो प्लीज़...इसे भ्रम ही रहने दें"

"करो ना यूँ ज़मीनोदाज़ हमारे आशियाँ...जवाब तुम्हें ऊपर भी देना है"


"तब कहाँ चली जाती हैँ मैडम जी आप?...

जब चौक पे खडे हो ड्यूटी बजाने के बजाए आपके ट्रैफिक हवलदार झाडियों के पीछे छुप...

पहले तो आम आदमी को कानून तोडने के लिए प्रेरित करते हैँ और फिर...

चालान से सरकारी खजाना भरने से पहले अपनी जेब भरने को बाध्य करते हैँ"...


"ठीक है!...माना कि खर्चे बहुत हैँ सरकार के...कोई सीधे-सीधे दे के राज़ी नहीं है लेकिन...

ये कहाँ का इंसाफ है कि सीधे तरीके से जब घी ना निकले तो सरकार भी अपनी उँगलियाँ टेढी कर ले?"


"चालान तो आपने वही रखा सौ रुपए का ही लेकिन...टैक्स के नाम पर पाँच सौ का फटका अलग से लगा दिया"...

"वाह री शीला!...देख लिया तेरा इंसाफ"

"ज़ोर का झटका...सचमुच बडी ज़ोर से लगा दिया ना?"...


"आप कहती हैँ कि इससे तो गाडे-घोडे वालों को ही फर्क पडेगा...आम आदमी को नहीं"...

"ये तो बताओ मैडम जी कि ये फालतू का खर्चा कहाँ से ओटेंगे वो बेचारे?"


"किराए बढा दिए जाएँगे...आटा...दाल-चावल...कपडा-लत्ता सब मँहगा हो जाएगा"

"कुछ खबर भी है आपको?"


"एक तो पहले से ही बढे हुए कम्पीटीशन से कमाई में कमी...

ऊपर से सीलिंग और मँहगाई की मार"...


"वाह मैडम जी...देखा तेरा पलटवार"

"अरे!...अगर खर्चे ही पूरे करने हैँ तो अपने मातहतों की जेबें...उनके बैंक एकाउंट...

उनके बँगले...उनकी जायदादें आदि...सब खंगाल मारो"...

"गारैंटी है कि उम्मीद से दुगना क्या...चौगुना क्या और सौ गुना भी मिल जाए तो कम होगा"

"क्यों ठिठक के रुक क्यों गयी आप?"...

"अपनों के लपेटे में आने का डर सता रहा होगा?"


"ये कहाँ की भलमनसत है कि उन्हें बक्श..आम आदमी को चौ तरफी मार मारें आप?"


"एक तरफ सीलिंग का डंडा"...

"मँहगाई की मार".. .

"हर समय घरोंदो के टूटने-बिखरने का सताता डर"


"आप ही के मुँह से सुना है कि आप दिल्ली को इंटरनैशनल लैवल का बनाने जा रही हैँ"...

"आप कहती हैँ कि मैट्रो दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बन रही है लेकिन...

फिर भी आम जनता बसों में बाहर तक लटकी क्योँ नज़र आ रही है?"


"आप कहती हैँ कि मॉल रातोंरात ऊँचे पे ऊँचे हुए जा रहे रहे हैँ लेकिन...

फिर भी छोटे अनाअथोराईज़्ड कॉलोनियों में बाज़ार अभी भी भीड से क्योँ अटे पडे हैँ?...क्योँ भरे पडे हैँ?"..


"आप कहती हैँ कि सडकों की लम्बाई-चौडाई बढ रही है लेकिन...

फिर भी रेहडी-पटरी वाले अभी भी जस के तस सडकों पे कब्ज़ा जमाए क्योँ जमे खडे हैँ?"


"आप कहती हैँ कि फ्लाईओवर बन रहे हैँ ..बनते चले जा रहे है लेकिन...

फिर भी सडको से जाम क्योँ खुलने का नाम नहीं ले रहे हैँ?"


"कहने को...लिखने...बहुत कुछ है बाकी था ए राजीव लेकिन...

बोल बोल के...सोच सोच के थक चुके मेरे विचारों ने...

मेरा साथ छोड नींद का दामन थामने का ऐलान कर दिया है ...

सो बाकी की अगली बार उगल देंगे"....

"फिलहाल चलता हूँ....लौट के जल्दी ही मिलता हूँ"...

"जय हिन्द"...

"मेरी दिल्ली मेरी शान"


***राजीव तनेजा***