त सत्य के साथ होता है। जब कुछ गलत किया ही नहीं तो क्यों सामने आकर गिरफ्तारी नहीं दे दी? यदि झूठ होगा तो सामने आ जायेगा। सत्य को सामने लाने से किसी भी जांच से परहेज भी नहीं करना चाहिए। हकीकत यह है कि जिसका जो काम है वह कर ही नहीं रहा बाकी में टांग उड़ाकर खुद को महान बना रहा है। बाबा खुद को भगवान समझते हैं उनके भक्त भी यही मानते हैं। सत्य जानिए ऐसे लोग असाधारण तो हो सकते हैं परन्तु भगवान नहीं। हमारी तरह हाड़-मांस के पुतले हैं एक दिन पंचतत्व में विलीन भी हो जायेंगे। लोगों के दिलों में आदर के साथ बसने वाले बाबाओं द्वारा जनता की भावनाओं को छलने का सिलसिला पुराना है। कलयुग की आश्चर्यजनक हकीकत यह है कि जिनके ऊपर सभ्यता, संस्कृति की जिम्मेदार है वही उसे खंडित भी कर रहे हैं। लोगों को भोग-विलास से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन जीने की शिक्षा देने वाले क्या स्वयं वास्तव में ऐसे हैं? एक साधारण व्यक्ति भी इसका जवाब ना में ही देगा। ऐसा क्यों? आश्रम सिर्फ नाम के होते हैं सुविधाए फाइव स्टार होटल से कहीं ज्यादा होती हैं। धरती की जन्नत आश्रमों में ही बसती है। देश के बाबा धर्म के नाम पर धंधा करने से संभल जाये तो ही अच्छा है वरना वह दिन भी दूर नहीं होता जब जनता उन्हें ढूंढकर इलाज करेगी। यह भी सच है कि अतिमहत्वाकांक्षा ओर बड़बोलेपन के घोड़े पर सवार होने वाले एक दिन गिरते जरूर हैं।
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23.8.13
आसाराम बापू जी विश्वास को खंडित न करें!
त सत्य के साथ होता है। जब कुछ गलत किया ही नहीं तो क्यों सामने आकर गिरफ्तारी नहीं दे दी? यदि झूठ होगा तो सामने आ जायेगा। सत्य को सामने लाने से किसी भी जांच से परहेज भी नहीं करना चाहिए। हकीकत यह है कि जिसका जो काम है वह कर ही नहीं रहा बाकी में टांग उड़ाकर खुद को महान बना रहा है। बाबा खुद को भगवान समझते हैं उनके भक्त भी यही मानते हैं। सत्य जानिए ऐसे लोग असाधारण तो हो सकते हैं परन्तु भगवान नहीं। हमारी तरह हाड़-मांस के पुतले हैं एक दिन पंचतत्व में विलीन भी हो जायेंगे। लोगों के दिलों में आदर के साथ बसने वाले बाबाओं द्वारा जनता की भावनाओं को छलने का सिलसिला पुराना है। कलयुग की आश्चर्यजनक हकीकत यह है कि जिनके ऊपर सभ्यता, संस्कृति की जिम्मेदार है वही उसे खंडित भी कर रहे हैं। लोगों को भोग-विलास से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन जीने की शिक्षा देने वाले क्या स्वयं वास्तव में ऐसे हैं? एक साधारण व्यक्ति भी इसका जवाब ना में ही देगा। ऐसा क्यों? आश्रम सिर्फ नाम के होते हैं सुविधाए फाइव स्टार होटल से कहीं ज्यादा होती हैं। धरती की जन्नत आश्रमों में ही बसती है। देश के बाबा धर्म के नाम पर धंधा करने से संभल जाये तो ही अच्छा है वरना वह दिन भी दूर नहीं होता जब जनता उन्हें ढूंढकर इलाज करेगी। यह भी सच है कि अतिमहत्वाकांक्षा ओर बड़बोलेपन के घोड़े पर सवार होने वाले एक दिन गिरते जरूर हैं।
Posted by
Nitin Sabrangi
1 comments
Labels: आरोप, आसाराम बापू, बलात्कार, बाबा, भगवान, मुकदमा, रेप
30.12.12
माफ करना दामिनी! हम भी गुनाहगार हैं!
रूह कंपा देने वाली दरिंदगी का शिकार हुई दामिनी आखिर इस दुनिया से रूखसत हो गई। वह भी तक जब वह जीना चाहती थी। उसने लिखकर कहा था-‘माँ मैं जीना चाहती हूं।’ दुःख व गुस्से का गुबार हर भारतीय के दिल में है। पूरी घटना कोढ़ग्रस्त इंसानियत की ऐसी नंगी हकीकत है, जो हमेशा शर्मसार करती रहेगी। कड़वी हकीकत है कि लड़कियां महफूज नहीं हैं और लोग बेटियां पैदा करने से भी डरते हैं। आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर वाले भारत में हालात ज्यादा शर्मनाक हैं। ऐसी घटनाओं पर अरब के सख्त कानून की जरूरत याद आती है। दुनिया में सबसे कम अपराध वहीं होते हैं। इस हकीकत का स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऐसे लोगों को कानून का खौफ नहीं है? कोई दोराय नहीं कि घटना ने युवा क्रांति की एक बड़ी अलख जगायी। पुलिस की दमनकारी प्रवृत्ति और सरकार की लीपापोती को सभी ने बहुत नजदीक से देखा। सवाल खड़े हैं क्या कानून बदलेगा? फिर किसी के साथ दरिंदगी नहीं होगी? लड़कियां सुरक्षित हो गईं? देखिए वक्त क्या जवाब देता है। दामिनी हमें माफ करना! बेहद दुःख के साथ सभी की तरफ से भावपूर्ण श्रृंद्वाजली!
19.12.12
कानून के खौफ की सख्त जरूरत
दिल्ली की बस में एक युवती के साथ हुई शर्मनाक घटना जैसी घटनाओं पर अरब का कानून याद आता है। समाज से लेकर सरकार तक कहीं भी इस बाबत शाब्दिक सहानुभूति से आगे कोई अर्थपूर्ण चिंता दूर-दूर तक नजर नहीं आती। लड़कियां कहीं भी खुद को सुरक्षित नहीं पातीं। आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर वाले भारत में हालात शायद सबसे शर्मनाक हैं। छेड़छाड़ के मामलों में तो देश के अधिकांश हिस्सों में हालात एक जैसे हैं। इस पीड़ा को नजदीक से महसूस करना है, तो उन कामकाजी महिलाओं व लड़कियों से बात करिये जो प्रतिदिन सफर से लेकर कार्यालय तक में मानसिक यंत्रणा सहती हैं। कोई एक कारण नहीं है बल्कि बड़े सामाजिक मंथन की जरूरत है। जरूरत कानून के खौफ की? क्योंकि कानून लचीला है। मामलों की जल्द सुनवाई के साथ ही सख्त सजाएं ही डर पैदा करती हैं। स्वार्थपूर्ण मुद्दों पर चीखने-चिल्लाने वाले संगठनों को भी इसके लिये आगे आना चाहिए। जो हालात हैं उसमें ज्यादा प्रतिशत लोग बेटियां पैदा करने से डरेंगे ही। इस हकीकत का स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऐसे लोगों को कानून का खौफ नहीं है?
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