8.7.08
शुक्रिया भास्कर, धर्मेंद्र की संवेदना को इंदौर वालों तक पहुंचाने के लिए
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यशवंत सिंह yashwant singh
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11.6.08
ब्रेकिंग न्यूज....बिल्लो रानी !
यशवंत जी
ये तस्वीरें बतातीं हैं कि कैसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया ख़बरों के अकाल के कारण लोगों को कचरा परोस रहा है. आप ख़ुद ही देखिये कि आख़िर कैसी-कैसी ख़बरों को ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर लोगों को दिखाया गया. भडास के पाठकों के लिए ये तस्वीरें अगर पोस्ट कर सकते हैं, तो मीडिया का एक ग़लत पक्ष भी दिखाने कि भडास कि प्रतिबद्धता सामने आएगी

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यशवंत सिंह yashwant singh
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24.5.08
मेरा पहला साक्षात्कारः और मैं हारे हुए जुवारी की तरह दफ्तर से निकल आई
प्रतिभा कुशवाहा पत्रकार हैं, बड़ा पत्रकार बनने का सपना लेकर दिल्ली आई हुई हैं, स्ट्रगल कर रही हैं, दिल्ली को सीख रही हैं, दिल्लीवालों समझ रही हैं, तरह तरह के खट्टे- मीठे अनुभवों के जरिए अपनी सोच समझ को विस्तार दे रही हैं।
वे उन आम हिंदी पत्रकारों की तरह ही हैं जिनका पत्रकारिता में कोई गाडफादर नहीं है, कोई चाचा, पापा काका या भाई संपादक नहीं है।
जो कुछ करना है, खुद से करना है। जो कुछ पाना है, खुद की मेहनत से पाना है। सेल्फ मेड हैं प्रतिभा।
उन्होंने मुझे एक मेल भेजकर इस रचना को भड़ास पर डालने का अनुरोध किया है। वे इस रचना को व्यंग्य रचना बताती हैं पर मुझे तो ये हिंदी पत्रकारिता का सच नजर आता है। पढ़िए और प्रतिभा का साहस बढ़ाइए ताकि दिल्ली के दुखों को जल्द पारकर एक ठीकठाक मुकाम तक पहुंच जाएं।
-यशवंत
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मेरा पहला साक्षात्कार
-प्रतिभा कुशवाहा-
पत्रकार बनने का भूत सवार हुआ। सभी ने मुझे बहुत समझाया-पत्रकारिता में क्या रखा है, भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। लेकिन मैने पूरे जोश से पैरोकारी की समाज सेवा की दुहाई दी। बड़े से बड़े पत्रकारों के नाम लिए लेकिन सब बेकार आखिर मैने भी मूढ़ लोगों की बात न मानते हुए बगावत का बिगुल बजा दिया और झटपट पत्रकारिता के क्षेत्र में टांग अड़ा दी।
पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद जंगे मैदान में आ डटी। मैने अपनी कलम चारों दिशाओं में भांजी और कहा अब समाज के दुश्मनों की छुट्टी हो जाएगी और पूरे जोश के साथ पत्रकारिता के मदिंरों (समाचार पत्र के दफ्तरों) में माथा टेकने लगी। प्रसाद और आर्शिवाद की उम्मीद लिए मुझे कही-कही दर्शन मिलना भी मुश्किल हो गया।
परेशान होकर मैने अपने कुछ पत्रकार मित्रों (जो अब तक पत्रकार रूपी जीव बन गए थे)से सम्पर्क साधा, पूछा- बंधुवर! ये बताइए कि मुझे कब इन समाचारायल में प्रवेश मिलेगा?
मेरी बात सुनकर वे थोड़ा मुस्कराएं, फिर सगर्व बोले- तुम्हारी कोई जान पहचान है?
इस प्रश्न पर मुझे आश्चर्य कम गुस्सा अधिक आ रहा था क्योकिं मेरी पुश्तों में किसी ने पत्रकारिता का नाम तक नहीं सुना था और ये परिचय की बात कर रहे हैं। अत: मैने ‘न’ में सिर हिलाया।
इस सिर हिलाऊ उत्तर पर उसने भी फिल्मी डाक्टर की तरह आजू-बाजू सिर हिलाकर बोले-‘तब तो तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता’। और मै मनमोहन सिंह की तरह खून का घूट पी कर रह गयी।
खैर, इस घटना के बाद मै बिल्कुल निराश नहीं हुयी और एक राजनीतिक पार्टी की भातिं मैने तुरंत दावा किया कि इस बार मेरी ही सरकार बनेगी। और पूरे जोशोखरोश के साथ अपने अभियान में लग गयी। आखिर एक दिन मोनालिसा की मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी क्योंकि काफी जद्दोजहद के बाद मुझे एक मंदिर में दर्शन के लिए बुला लिया गया। मै पूरे साजो-सामान के साथ सम्पादक महोदय के सामने उपस्थित हुई और तुरंत ही अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया।
मैने कहा, ‘श्री मन् मैं लिखती हूं, जो थोड़ा बहुत यहां-वहां छपता रहता है’ यह कहते हुए मैने अपने कार्य कौशल की थाथी उनके मेज पर खिसका दी।
लेकिन यह क्या?
उन्होंने किसी अछूत कन्या की तरह मेरी फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और सीधे सवाल दाग दिया। ‘आपने अभी तक क्या सीखा है?’
मैं भी कहां चुप रहने वाली, एक भाट की तरह अपने सारे छोटे-बड़े गुणों का बखान कर दिया।
लेकिन यह क्या? आफताब शिबदसानी की तरह उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आए।
उन्होंने मुझसे दूसरा सवाल किया, ‘आप किस बीट पर काम करना चाहेगी।’
मैंने तुरंत ही कहा, समाजिक एवं सांस्कृतिक।
‘तब तो आप ऐश-अभिषेक की न्यूज ला सकती है’ उन्होंने पूछा।
मैने कहा, श्रीमन्! यह तो किसी के निजी जीवन में दखलंदाजी है।
उन्होंने तीसरा प्रश्न किया, ‘आप कोई स्टिंग आपरेशन कर सकती है।’
मैने कहा, नहीं! श्रीमन्, यह झूठ और फरेब पर आधारित है, सच्ची पत्रकारिता के विरूद्घ है।
‘आप शिल्पा-गिरे जैसे प्रकरण की फोटो ला सकती है।’ उन्होंने चौथा प्रश्न किया।
मैने कहा, श्रीमन्! ‘यह कैसे हो सकता है? यह तो आप के पालिसी के विरूद्घ है।’
इस पर वे आंखे निकालते हुए बोले, अब तुम हमें हमारी पालिसीज के बारे में बताओगी। महोदया! आप में पत्रकार वाले एक भी गुण नहीं है। जाइए, पहले कुछ सीखिए, फिर आइए।
और एक हारे हुए जुआरी की तरह मै दफ्तर से निकल आयी। बाहर आने के बाद मैने अपनी हार का ठीकरा अपने पत्रकारिता इंस्टीट्यूट के ऊपर फोड़ दिया। जहां हमें गलत तरीके की शिक्षा दी गयी थी। अत: अब मैने दफ्तरों के चक्कर लगाने बंद कर दिए है। मै अब ऐसे इंस्टीट्यूट की तलाश में हूं जहां मुझे सच्चा पत्रकार बनने के वास्तविक गुणों की शिक्षा दी जाए।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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दिल्ली में एक बरसः जैसे कई सदियों को जी लिया, जैसे बहुत थक गया
29 मई को दिल्ली आए एक साल पूरे हो जाएंगे।
आज जब सोच रहा हूं तो लग रहा है जैसे एक बरस नहीं, दस बरस से जी रहा हूं दिल्ली में। जैसे लग रहा है कितना कुछ कर लिया दिल्ली में, जैसे कितना थक गया दिल्ली में।
दसियों तूफान, झंझावात, खतरे, आरोप, बदनामियां, नाकामियां, कमजोरियां आईं, खड़ी हुईं, प्रभावित कीं, पीड़ित हुआ, कठघरे में खड़ा हुआ, सफाई दी....और आगे बढ़ा।
इन दिनों फिर मुश्किलों के ऐसे भंवर में फंसा हूं।
ऐसे में हर बार लगता है सब छोड़छाड़ कर गांव ही चला जाए। कुछ महीने सुकून से वहां गुजारने के बाद फिर नोकरी चाकरी तलाशी जाए या कहीं पंसारी की दुकान खोलकर हींग तेल नून बेंचा जाए या फिर कोई धंधा शुरू किया जाए।
ऐसी मनःस्थिति इस एक साल में दसियों बार आई पर जाने क्या है अंदर कि हर मुश्किल के बाद अंदर का मनुष्य कुछ ज्यादा पक्कावाला और कुछ ज्यादा चुनौती कबूलने के लिए तैयार हुआ लगता है।
मजेदार ये कि मेरा कोई दुश्मन नहीं रहा, मैं खुद ही अपना दुश्मन बना। किसी दुश्मन ने दुश्मनी नहीं की, दोस्तों ने दगा दिया। किसी और ने झटका नहीं दिया, अपनों ने धोखा किया।
पर उम्मीद तो उम्मीद है, जिसके बल पर हर कोई जीता है, मैं भी। और ये उम्मीद है बेहतरी के दिन आने के, अच्छे दिन आने के, सपने पूरे होने के......व्यक्ति के रूप में, समाज के हिस्से के रूप में और देश के नागरिक के रूप में...तीनों रूपों में ही बस एक ख्वाब....सब सुंदर, सरल और सहज हो
वो सुबह कभी तो आएगी.....
...और
तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर....
संक्षेप में ये कि इस एक साल ने मुझे जितनी प्रसिद्धि और कुख्याति दिलाई है, उतना किसी और बरस में नहीं मिली। या तो खुशियों के शिखर पर रहा या फिर दुखों के गर्त में पहुंचा। बीच में कभी नहीं रहा। बीच वाला जीवन कभी जिया ही नहीं। साहस और दुस्साहस, बस यही दो छोर पकड़े रहे मुझे। जकड़े रहे मुझे।
समाजसेवा और दोस्ती-यारी निभाने की प्रवृत्ति के चलते ढेरों झटके खाए। अब भी खा रहा हूं। पर जाने क्या है कि तब भी मुझे अकल नहीं आती। लगा रहता हूं अपना छोड़ परायों को अपना बनाने में, उनकी दिक्कतें हल करने में, उनको उबारने में। और यह सब करते करते खुद डूबने लगता हूं। इन परायों की मुश्किलें खत्म हो या कम हो, पर बदले में मुझे मिलता है मझधार, भंवर, अकेलापन, तनहाई, शर्मिंदगी, अवसाद और बदनामी।
क्या करूं....बचपना गया नहीं, अकल आई नहीं।
मेरी कमजोरियां,
मेरी बदमाशियां,
मेरी आवारगी,
मेरा देहातीपना,
मेरी अराजकताएं,
मेरे चूतियापे,
मेरी नशाखोरी....
दर्जनों बुराइयां हैं जिनके साथ न चाहते हुए भी जीता रहता हूं। चाहता हूं कि ये सब बुराइयां एक एक कर खत्म हो जाएं और मैं किसी परम संत की तरह मेरे व्यक्तित्व में केवल सदगुण ही रह जाएं। केवल अच्छाई ही रह जाए पर मेरे अंदर का राक्षस है कि मरता ही नहीं। मेरे अंदर का देवता है कि वो मजबूत होता ही नहीं। दोनों बराबर बराबर जीते रहते हैं और अपने लिए और भी ज्यादा हक व विस्तार की मांग करते रहते हैं।
कहीं इन दोनों की जंग में मैं खुद नष्ट न हो जाऊं। नष्ट होने, मरने से नहीं डरता मैं लेकिन न चाहते हुए जो बदनामियां आ जाती हैं, उनका क्या करूं। उनके साथ कैसे जिऊं। उनसे कैसे उबरूं। कैसे खुद को अकेला कर पहाड़ की खोह में तपस्या करने के लिए डाल दूं ताकि न रहेंगे आसपास मनुष्य और न करनी होगी अच्छाई और न करनी होगी बुराई।
पर क्या ऐसा संभव है। मजबूरी है कि जीना इसी समाज के बीच में है। इन्हीं हालात में है जहां बुराई भी अच्छाई भी है। वो बुरा भी है अच्छा भी है। हम सब बुरे भी हैं और अच्छे भी हैं। लेकिन वो हम और आप अपने बुरे को पूरी तरह क्यों नहीं मार पाते, किल कर पाते, निप इन द बड कर पाते....।
पता नहीं क्यों। पर आज तो सिर्फ इतना भर कहने को जी हो रहा है कि....
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है
बंदे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है
उपरोक्त लाइनें हर मुश्किल में किसी ताकत की तरह मेरे साथ खड़ी हो जाती हैं। देखते हैं, ये बुरा दिन कब खत्म होता है और कब नीके दिन आते हैं।
अभी तो बस केवल डिप्रेशन है, केवल हवा-हवाई मिशन है, केवल टेंशन और टेंशन है और ढेर सारा सस्पेंसन है।
ऐसे बुरे दिनों में मैं उन सभी मित्रों का आभारी हूं जिन्होंने चमत्कारिक तरीके से मेरे संग खड़े होकर साथ दिया। उन सभी का भी आभारी हूं जिन्होंने कठघरे में खड़ा किया, फांसी पर चढ़वाया, मुझे नष्ट किया, मुझे बदनाम किया....।
शायद ये दुनिया बच्चों सा खेल तमाशा है, तभी तो चचा ग़ालिब ने कहा है ...
बाजीचएअतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबो रोजो तमाशा मेरे आगे।
गो हाथ में जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है,
रहने दो मेरे साथ सागरो मीना मेरे आगे
(कुछ शब्द छूट रहे हैं, भूल रहे हैं या गलत लिख गए हैं, माफ करिएगा...)
और बच्चों की इस दुनिया में सबकी अपनी अपनी भूमिकाएं हैं और हर कोई किसी एक भूमिका को पकड़कर उसी में जिंदगी खपा लड़ा देने के लिए आमदा है, भले ही उससे किसी और का कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए। दूसरों का नफा नुकसान सोचने की फुर्सत किसे है, सब अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग अलापने में लगे हैं।
हे ईश्वर, उन्हें माफ करो, वो नहीं जानते उन्होंने क्या किया
हे ईश्वर, मुझे माफ करो, मैं नहीं जानता मैंने क्या किया
बस, न मरने की ठानी है, न हारने की मानी है, हालात चाहें जितने प्रतिकूल हों, उससे उबरने और आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखूंगा, जिंदगी से बस इतनी भर ही सीख ली है। समय का पहिया घूमेगा और फिर अच्छे दिन आएंगे।
मुझको कदम कदम पर भटकने दो वाइजों,
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूं.....।
ठुकराओ चाहे प्यार करो, मैं नशे में हूं....।
जो चाहे मेरे यार करो, मैं नशे में हूं....।
देखते हैं, दिल्ली का दूसरा साल कैसा होता है......मैं तो ये मानकर चल रहा हूं कि...
इक बरहमन ने कहा है, ये साल अच्छा है
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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