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2.4.11

कुंजी बोर्ड की निरर्थक व्यंग-आत्मकथा ।

कुंजी बोर्ड की निरर्थक व्यंग-आत्मकथा ।

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post.html
" मन मोनिटर  की  साइज़,  क्यों काट रहा है बंदे?
 सकल समस्या अपने हिस्से, क्यों  बाँछ रहा है बंदे?"


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प्यारे दोस्तों,

मैं कम्प्यूटर का,`Key Board-की-बोर्ड` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

आप सब लोग, आप के परिवार के साथ जितना समय व्यतित नहीं करते ,उससे  कहीं ज्यादा समय आप मेरे संग बिताते हैं, इस बात के लिए मैं  आपका धन्यवाद करता हूँ ।

लेकिन..!!

आप ज़रा सा समय निकालकर सोचे,क्या आप ये सही कर रहे हैं?  मैं  तो तन और  मन दोनों स्वरूप में जड़ पदार्थ  हूँ , फिर भी आप मुझे हर वक़्त  अपनी गोद में लेकर, मेरे साथ दिन-रात खेलते रहते हैं।

मगर सच कहूँ, आप जब, आपके साथ खेलने के लिए आए हुए , आपके  नन्हे मुन्ने बेटे-बेटी पर गुस्सा करके उन्हें  भगा देते हैं, और फिर मेरी कुंजीओं को, आप अपनी उंगली से, बड़े प्यार के साथ फिर से सहलाने लगते हैं तब मुझे अनहद दुःख होता है ।

मैं कम्प्यूटर का `Key Board-की-बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

कभी-कभी तो मेरी समझ में कुछ नहीं आता की, इन्सानी फितरत पर गुस्सा होना चाहिए, हँसना या रोना चाहिए? कुण्ठित एवं बौने सोच वाली आदम जात, अपने मन में समाये, लोभ, लालच, काम, क्रोध, मोह, माया और अभिमान जैसे, जाने माने दुर्गुणों के `Virus - वायरस` को प्रमुख जड़ से नेस्त नाबूद करने  के बजाय, मेरी `Hard Disk - हार्डडिस्क`, में  घुसते अनजान, `Virus - वायरस` को बार-बार, `SCANNING - स्कैनिंग ` करके  मिटाने की, सतर्कता बरतता  है । आगे क्या बताएं..!! ज़रुरत पड़ने पर, मेरे मन की,`Hard Disk - हार्डडिस्क`,में फैले  हुए, नुकसानदेह, `Virus - वायरस` को, `Format - फ़ॉर्मेट` करके मेरे मन को सदैव साफ सुथरा,शुद्ध रखता है ।

आदम जात को, मन में व्याप्त दुर्गुणों की वजह से पीड़ा सताती है तब, वह अपने मन में समाये, लोभ, लालच, काम, क्रोध, मोह, माया और अभिमान जैसे, जाने माने दुर्गुणों के `Virus - वायरस` फैलाने की ज़िम्मेदारी दूसरों पर  थोप देता है ।

मैं कम्प्यूटर का  `Key Board-की बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

कभी-कभी मैं भी तो आदम जात के साथ रात-दिन रहकर उब जाता हूँ  ।  इस बात का मैं गवाह हूँ की, मेरे साथ बैठे-बैठे ही, अनचाहे लोगों के साथ, फोन पर इन्सान दिन रात कितने सारे झूठ बोलता रहता है..!! मुझे  लगता है अनचाहे लोगों से,`Escape - ऍस्केप`, करके पीछा छुड़ाने की, ये कला कहीं, उसने मेरी, `Escape - ऍस्केप`, कुंजी से तो नहीं सीखी होगी?  वैसे कुछ उसूल के पक्के इन्सान भी मैंने देखें हैं, जो `Escape - ऍस्केप`, कुंजी का उपयोग यदाकदा ही करते हैं ।

पर, आप सभी दोस्तों से मैं एक बात अवश्य कहूँगा, धन्य हैं ये आदम जात..!! शायद उसे कब-कहाँ-कैसे,`Escape - ऍस्केप`, करना भले ही न आता हो, मगर जहाँ उसे अपना ज़रा सा भी लाभ दिखाई देता है, वहाँ  अपना आत्माभिमान गिरवी रखकर भी, छद्मवेष धर कर,चोरी छिपे, सँभाल कर, सही जगह पर,`Enter - ऍन्टर` कैसे करना है, ये कला अच्छी तरह जानता है ।

मैं कम्प्यूटर का `Key Board-की-बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

बात आदमजात के अनैतिक संबंध की हो या फिर, उसे होने वाले नुकशान के अग्रिम संकेत की..!! ऐसी परिस्थिति में किसी दूसरे को होनेवाले नुकसान की परवाह किए बिना ही, यही दोगला इन्सान, ऐसे अनैतिक- उकताऊ संबंध से ,`Back Space - बेकस्पेस`दबाकर (दूम दबाकर), उसे `Delete -  डीलीट`, करने में ज़रा भी देर नहीं करता ।

मैं नें तो यहाँ तक मार्क किया है की, कुछ बेवकूफ इन्सान को छोड़कर, बाकी  के  सारे  चतुर इन्सान, भविष्य के लिए नुक़सानदायक संबंध में, आज से और अभी से, कितना अंतर बरतना है,यह तय करके,`Space bar - स्पॅसबार` का  बख़ूबी उपयोग कर लेते हैं ।

संक्षिप्त में कहें तो, अपने दुर्गुणों के,`Virus - वायरस` को ही अपना हथियार बनाकर, अनेकविध संबंधों के बीच दायें-बाँये; उपर-नीचे,`Shift - शिफ्ट`, करके, किसी कुशल नटेश्वर की भाँति, संतुलन बनाए रखना भी आ गया है। 

मैं कम्प्यूटर का `Key Board-की-बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

अब ये भी बता देता हूँ की, जैसे आजकल हमारे, `की-बॉर्ड-Key Board` की जात में वायरलेस,`की-बॉर्ड-Key Board`भी फ़ैशन में हैं, वैसे ही अपने आप को, दूसरे लोगों से सर्वाधुनिक मानने वाले अभिमानी,समाज में मान सम्मान पाने के भूखे,  मगर स्वभावगत मूर्ख के बड़प्पन को, कुछ स्वार्थी, चतुर लोग,`Caps Lock - कॅप्सलोक ; Shift - शिफ्ट`, की  तरकीब आज़मा कर,`Capital letters - कैपिटल लेटर्स`, जैसा बड़ा बनाकर, उस मूर्ख के अहम को सहलाते हैं  और थोड़े समय के लिए ही सही, उनको, समाज में बड़ा स्थान देकर, अपने निजी स्वार्थ को बड़ी चतुराई के साथ, साध लेतें हैं ।

हालाँकि, अपना मलिन इरादा पुरा हो जाने के बाद, ऐसे स्वार्थी लोग,`Tab - टॅब`, का सहारा लेकर, ऐसे झूठे संबंध से आज़ादी पाने के लिए, संबंध के,  `Courser - कर्सर` को,  उन सम्मान के भूखे-मूर्ख लोगों से इतना दूर  भाग जाते हैं की फिर वह, `Recycle - रिसायकिल बीन` में ढ़ूंढने पर भी  नहीं  मिलते  हैं ।  

मैं कम्प्यूटर का `Key Board-की-बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

पता नहीं ये आदम जात ऐसा क्यों करती होगी..!! मेरी कुंजी के ज़रिए, ये लोग न जाने विश्व भर में कैसी - कैसी,`Window - विडोज़`, में  दृष्टि-भ्रमण कर आते हैं, लेकिन ताज्जुब की बात हैं..!! आदमी,  खुद की नज़रों से सिर्फ एक फूट की दूरी पर स्थित, हृदय की विन्डो में, एक क्षण के लिए,  झाँकना ज़रुरी नहीं समझता?
सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा देनेवाले आत्मा की आवाज़, ऐसे इन्सानों के हृदय की ,`Window - विन्डो`, के भीतर प्रवेश करें, ये बात उन्हें मंज़ूर नहीं होती । शायद इसीलिए, अपनी सच्ची-अच्छी भावनाओं को ये लोग,` Num Lock - नम लॉक`, के उपयोग द्वारा जड़ और चेतना शून्य कर देते हैं, इतना ही नहीं, अपने अलावा दूसरे किसी आदमी को ग़लती से भी समाज में महत्व प्राप्त न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए,`Upper Case - अपर केस`, को ये इर्षालु लोग कभी हाथ भी नहीं लगाते ।

कम्प्यूटर का `Key Board-की-बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ ।

कुछ  चालाक लोग, खुद कुछ नहीं करते मगर  उनके  ज़रूरतमंद आश्रित व्यक्तिओं  का  बड़ी  होशियारी से, `Alt - ऑल्ट; Ctrl - कंट्रोल` अपने पास रखकर ` F1 - एफ 1 से F12 एफ १२`, जैसे  विविध तरीके आज़मा कर, एक ही तीर से कई सफल निशाने लगाते हैं । ऐसे इन्सान अपनी ज़ुबान पर सारी दुनिया के,`Word processing programs - शब्द संसाधन प्रोग्रामों` की मधुमिश्रित शब्द मायाजाल में इतनी ढ़ेर सारी मिठास,`Insert -इन्सर्ट` कर देते हैं की उसके प्रभाव में आने वाले व्यक्ति को मधुमेह की बीमारी ही लग जाए..!!

मैं कम्प्यूटर का `Key Board-की-बोर्ड ` हूँ ।
आज मैं आपको मेरी `निरर्थक व्यंग्य-आत्मकथा` सुनाना चाहता हूँ । 

आप को पता है? आजकल ईश्वर के दरबार में, सभी मानव के अच्छे-बुरे कामों की,`History - हिस्ट्री`, दर्ज करने के लिए, चित्रगुप्त भी,`Key Board - की बोर्ड`,का उपयोग करने लगे हैं..!! याद रखना, जब  भगवान के आदेश पर, चित्रगुप्त आपके बुरे कामों की,`History - हिस्ट्री`,की लं..बी `Print - प्रिंट`, निकालकर उसे, `Scroll Lock - स्क्रोल लॉक`, (गुप्त अहवाल?) के रुप में,आपके हाथ में थमा देंगे तब, अपने ही कुकर्मों का कच्चा चिठ्ठा पढ़कर, आप सर से पाँव तक, `Hang - हेंग `, मत हो जाना..!!

आज के दिन बस इतना ही, मुझे लगता है, मैं  एक नाचीज़ सा,`Key Board - की बोर्ड`हूँ,फिर भी आत्मकथन के नाम पर मैंने, मेरी हैसियत से ज्यादा निरर्थक प्रलाप किया है । अंत में, सिर्फ  एक  बात  कहना  चाहता  हूँ, मैं तो सदैव आपका साथी रहूँगा ही, मगर मेरा ग़लत उपयोग करके, मन के,`Monitor -मोनिटर`, पर दुर्गुणों की,`Porn site  - पोर्न साइट` जैसी गंदकी मत फैलने देना ।  अब आपसे उम्मीद करता हूँ की, मेरे चारों , `Arrows - ऍरो`,  की सहायता से आपके सात्विक विचारों को, सही दिशा प्रदान करके, इन्सानियत को याद रखकर, जैसे `सुबह का भूला,शाम को घर लौट आता है ।` वैसे ही, आप भी सही सलामत वापस अपने,`Home -हॉम` कैसे  लौट आएं, ये बात अच्छी तरह से सीख लें ।                                                                             

वैसे कम्प्यूटर के, १४,१७,१९, और उसके उपर की साइज़ के मोनिटर, साइज़ कम होते-होते सिकुडकर मोबाईल फोन की साइज़ के हो गये हैं, मगर ज़रा अपने मन के मोनिटर की साइज़ दिनोंदिन चौड़ी करते रहना, उसे सिकुडने मत देना, क्योंकि, इन्सान की सही पहचान ही अपने मन के बड़पन से होती है । 
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`ANY COMMENT`                  

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०२-अप्रैल-२०११.

15.11.10

व्यंग्य -माल संस्कृति जिंदाबाद


रतन जैसवानी, जांजगीर
नया
युग आ गया है, अरे भई पुराना जब और पुराना होगा तो नया नया युग तो आएगा ही, नए पैंतरे, नया दांव, नई उठापटक, और तरीके भी नए-नए। पुराने दौर में फिल्मों की नायिका गाती थी फूल तुम्हें भेजा है खत में ...क्या ये तुम्हारे काबिल है, अब की हीरोईन डांस कम एक्सरसाईज करते हुए सीधे किस पर आ जाती है, ओ बाबा लव मी, ओ बाबा किस मी। न फूल ढूंढने की जरूरत न खत लिखने की झंझट, मैगी नूडल्स की तरह, फटाफट तैयार, बस दो मिनट। बीच में न आशिक से मिलने के सपने न ही बाबुल से कोई बहानेबाजी, कि मैं तुझसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने। पहले बाग-बगिया, खेत-खलिहान, छत के चैबारे और गलियों के फेरे गुलजार थे। अब पब, रेस्तरां, डांस फ्लोर, पार्क और माॅल में यह जलवा रौषन होता है। सब कुछ नया-नया है, तुरंत, फटाफट। किशोर कुमार का गाना तब की बजाय अब तर्कसंगत लगता है नाच मेरी जान फटाफट-फट, ये जमाना है दीवाना नया फटाफट-फट। नया युग और भी ज्यादा खुला-खुला सा है। क्यों न हो लोकतंत्र में जब खुलापन बढ़ता जा रहा है तो ज्यादा खुला होना सुहाता भी है। पब, रेस्तरां, माॅल हर जगह खुलापन है। खुलापन का मतलब गलत नहीं समझना, मेरे लिखने का मतलब स्वतंत्रता है। अब लोग इंसाफ के नाम पर गाली गलौज और अश्लील टिप्पणियां सुनने में ज्यादा आनंद महसूस करते हैं, जैसा राखी का इंसाफ में दिखता है। हाॅट स्वीटीज और हैंडसम ब्वायज को खिलखिलाते हुए माॅल में देखकर दिल तो जलता ही है न, कि कहां वो जमाना जब हम सुबह से रात तक अपने दिल की प्यास मिटाने, दीदार को तरसते थे और उसके घर के सामने से कई फेरे लगाते थे और दिल गुनगुनाता था बिन फेरे हम तेरे। अब नया जमाना देखिए मोबाईल उठाया मैसेज किया, कि फलां माॅल में इतने बजे मिलेंगे। न माशूक के बाप को पता, न ही किसी भाई-बंधु को खबर और इठलाती हुई माशूक टाप-स्कर्ट में नियत समय पर माॅल में उपलब्ध, जैसे आंगनबाड़ी का रेडी टू ईट, यानि सबकुछ तैयार। न कोई डर न कोई भय। लोकलाज का जमाना ही नहीं रहा, क्योंकि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।एक दिन हमें भी मिल गया माॅल जाने का मौका, पहुंचे तो विशाल इमारत में रौनक शुरू थी, लोग आ रहे थे जा रहे थे, कुछ हसीन चेहरे हर दो तीन मिनट में नजर आ ही जाते थे। टाप-स्कर्ट, लेगीज-कुर्ता, सलवार सूट, जींस-टी शर्ट आदि-आदि में लकदक हुस्नो-हसीनाएं और मजनूओं की जमात यहां-वहां तफरीह करते हुए टहल रहे थे। कुछ लोग एक दूसरे को छेड़ते हुए चल रहे थे। अरे यार, वो तेरी वाली अभी तक नहीं आई। मैसेज तो किया था न। यस माई डियर, मैसेज तो किया था, पर वो बोल रही थी कि कहीं और भी पार्टी में जाना था, अरे वो देखो आ रही है। हम भी उनकी बातों का मजा ले रहे थे। साथ ही सोच रहे थे कि हमारे जमाने में कितना संघर्ष करना पड़ता था प्रियतमा की एक झलक पाने को। ऐसे में बीस बरस पहले जन्म लेना अखर रहा था। अब पैदा होते तो हम भी मजे ही करते। हे भगवान, तूने ये कैसी बेइंसाफी की मेरे साथ। फिलहाल हमने भी माल में अपना दिल बहलाया, क्या करते, मर्द और घोड़ा कभी बूढ़ा तो होता नहीं, यही सोचकर खुद को तसल्ली दी। उसके बाद माल के रेस्टोरेन्ट में एक हल्के अंधेरे वाले कोने की सीट पर बैठकर उन्हीं युवा जोड़ों ने क्या-क्या किया, यह लिखने में मुझे शर्म आ रही है, अरे भाई आखिर मुझमें तो थोड़ी-बहुत शर्म बाकी तो है न। लेकिन समझ जाईए कि उन लोगों ने जवानी का भरपूर आनंद लिया। लौटते वक्त बस यही खयाल आ रहा था कि जिस खुलेपन के लोग हिमायती होने लग गए हैं, उससे परिवार के सदस्यों के बीच की मर्यादा शून्य तो हो रही है। टीवी चैनल्स पर परोसी जा रही अश्लीलता अब शर्म का विषय रही नहीं, इसलिए मां-बाप, बच्चे साथ में बैठकर कुछ भी देख सकते हैं, देखते ही हैं। क्योंकि हमारे मशहूर फिल्म अभिनेता आमिर खान ने भी 3 इडियट में बलात्कार शब्द का इतनी बार प्रयोग करवाया कि फिल्म देखने वाले 8-10 बरस के बच्चे भी इससे वाफिक होने लगे हैं। आखिर उन्हें भी मालूम होना चाहिए कि जिस देश में लोग खुलेपन के नाम पर संस्कृति से बलात्कार करने में लगे हुए हैं, वह चीज क्या है। इस उम्र में जान जाएंगे तभी तो भविष्य में सोच समझकर कदम उठाएंगे। सोच में डूबा हुआ मैं अचानक ही धरना दे रहे हड़तालियों की तरह चिल्ला पड़ा, माल संस्कृति जिंदबाद, माल संस्कृति जिंदाबाद। बाईक चला रहा मित्र हड़बड़ाया अरे क्या कर रहा है यार, पागल हो गया है क्या। सच तो यही है कि नए युग की नित नई संस्कृति, संस्कृति की दुहाई देने वाले हम जैसों को पागल करके ही छोड़ेगी।

17.12.08

मेरे सामने तो शर्म भी आकर शर्म से डूब मरेः जार्ज बुश

पत्रकार- सुना है आप पर जूता फैंका गया है?

बुश - देखिए, मैं अमेरिका का राष्‍ट्रपति हूं। दुनिया के सबसे बेशर्म-कमीने-गलीज़ अपराधियों का सरगना। मुझे इन छोटी-मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।

पत्रकार - लेकिन फिर भी क्‍या यह आपके लिए शर्मनाक घटना नहीं है?

बुश - अगर शर्म ही करनी होती तो मैं राजनीति में ही क्‍यों आता और वैसे भी मैंने इतना झूठ बोला है, इराक-अफगानिस्‍तान-फिलीस्‍तीन से लेकर दुनिया के हर हिस्‍से में इतने नरसंहार करवाये हैं कि मेरे सामने तो शर्म भी आकर शर्म से डूब मरे।

पत्रकार - आप पर जूता क्‍यों फेंका गया?

बुश - लोकतंत्र की वजह से। देखिये मुक्‍त समाजों में ही ऐसा संभव है। इससे साबित होता है कि इराक में लोकतंत्र जड़ें जमा चुका है।

पत्रकार - क्‍या आपको डर नहीं लग रहा?

बुश - (ऑफ द रिकार्ड) सच बताऊं, डर के मारे तो मेरी हालत खराब है लेकिन क्‍या करुं। ये सीट ही ऐसी है, जी कड़ा करके, नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा हूं।

पत्रकार - आखिरी सवाल, इस घटना का अमेरिका पर क्‍या असर पड़ेगा?

बुश - देखिये आजकल पूरी दुनिया में मंदी चल रही है। हमारे देश में सबसे ज्‍यादा हालत पतली है। मैंने इन सड़े जूतों को संभाल कर अपने पास रख लिया है। मैं इन्‍हें अमेरिका ले जाकर फुटवियर उद्योग को बेलआऊट पैकेज में दे दूंगा। हमारी अर्थव्‍यवस्‍था में इनसे थोड़ा सुधार जरूर आएगा।

(यह इंटरव्यू मेल के जरिए लोगों में खूब वितरित हो रहा है। एक पत्रकार साथी ने मुझे भी फारवर्ड किया तो सोचा, भड़ासी साथियों को भी पढ़ा दूं। यशवंत)

30.5.08

चार दिन से रेल की पटरियां जाम है!

प्रतिभा कुशवाहा
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चार दिन से रेल की पटरियां जाम है! कूड़े के ढेर से नहीं बल्कि लाशों से। लाशें किसी गैरों की नहीं अपनों की। मरूभूमि की तपिश ही इन लाशों का दाह-संस्कार कर रही है क्योकिं पुलिस इन्हें अपनों को नहीं सौंप रही है। उनकी मां, बहनें, पत्नियां रो-रोकर छाती पीट रही है, इस समय उनके दिमाग में कही भी कोई मांग नहीं है। बस एक गुजारिश है कि यह खेल बंद किया जाए। उनके गालों पर सूखे हुए आंसू एवं रूंधा गला खुदा से अपने प्रिय के प्राण वापस चाहती है।

रेल की पटरियों के समान कभी भी मानवता एवं राजनीति नहीं मिलती है। बस साथ-साथ चलती है, दोनों एकदूसरे के सहयोग नहीं कर पाते क्योकिं कुछ लोग ऐसा नहीं चाहते। वह नहीं चाहते कि राजनीति का ‘मुखड़ा’ सुंदर हो। उन्होंने राजनीति को सभी प्रकार की विकृतियों का अखाड़ा बना दिया है। बड़े गर्व से कहते है कि आओ, ‘इस अखाड़े में अपने-अपने करतब दिखाओ। और देखना कि मूर्ख, अनपढ़ लोग कैसे हमारे तमाशों पर ताली पीटते ...। किलविसी मुस्कान के साथ उनके दिमाग के किसी कोने पर यह विकृति आती है कि ‘इस तरह बारी-बारी से अपने करतब दिखा कर हम अपना पेट पालते रहेगे और साथ ही कई पीढीयों तक का जुगाड़ भी कर लेगे।’

चार दिन से रेल की पटरियां जाम है! कुछ फालतू के लोग आने-जाने के लिए मरे जा रहे है। यह नहीं कि इतनी गर्मी में यात्रा करना सेहत के लिए हानिकारक है। अरे! रोजी-रोटी के लिए हमें जाना है। ‘क्यों, घास की रोटियां खतम हो गई, जो हमारे राजा ने खाई थी।’ हमारा बच्चा बीमार है! क्या इस देश की जनसंख्या कुछ कम है? रोज तो रेल चलती है दो-चार दिन नहीं चलेगी तो क्या...। कमबख्त, भिकमंगे कहीं के! रेल से यात्रा करेगें। चार दिन से रेल की पटरियां जाम है! अभी उच्चाधिकारियों की मीटिंग चल रही है, सभी बड़े मुद्दो पर व्यस्त है। कार्यवाही चल रही है, देखिए क्या नतीजे निकलते है। सब कुछ अपनी गति से हो रहा है, कब तक होगा पता नहीं। हर बड़े काम में समय तो लगता है।

अभी-अभी खबर है कि पटरियों पर पड़ी लाशें एक-एक कर गायब हो रही। विपक्ष का दावा है कि सत्ता वाले ऐसा काम कर रहे है क्योकिं हम लाश पर राजनीति कर रहे थे, वह नहीं कर पा रहे है। इसी जलन के चलते वे ऐसा कर रहे है। अत: हम मांग करते है कि लाशों के गायब होने पर सीबीआई जांच करवाई जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम और लाशें गिरा देगे। तभी एक बच्ची फुसफुसा कर कान में कहती है, ‘एक काला-मोटा, भैंस पर सवार आदमी (यमराज) सभी लाशें ले गया है।’ लगता है उन्होंने अपनाधंधा-पानी बदल लिया है। और बदले भी क्यों न, उनके पेट पर हमने जो लात मार दी है! लाशों के ढेर लगाकर।

(प्रतिभा कुशवाहा ने इस व्यंग्य को भड़ास पर प्रकाशित करने के लिए मेल किया था। उन्हें धन्यवाद।)

24.5.08

मेरा पहला साक्षात्कारः और मैं हारे हुए जुवारी की तरह दफ्तर से निकल आई

प्रतिभा कुशवाहा पत्रकार हैं, बड़ा पत्रकार बनने का सपना लेकर दिल्ली आई हुई हैं, स्ट्रगल कर रही हैं, दिल्ली को सीख रही हैं, दिल्लीवालों समझ रही हैं, तरह तरह के खट्टे- मीठे अनुभवों के जरिए अपनी सोच समझ को विस्तार दे रही हैं।

वे उन आम हिंदी पत्रकारों की तरह ही हैं जिनका पत्रकारिता में कोई गाडफादर नहीं है, कोई चाचा, पापा काका या भाई संपादक नहीं है।

जो कुछ करना है, खुद से करना है। जो कुछ पाना है, खुद की मेहनत से पाना है। सेल्फ मेड हैं प्रतिभा।

उन्होंने मुझे एक मेल भेजकर इस रचना को भड़ास पर डालने का अनुरोध किया है। वे इस रचना को व्यंग्य रचना बताती हैं पर मुझे तो ये हिंदी पत्रकारिता का सच नजर आता है। पढ़िए और प्रतिभा का साहस बढ़ाइए ताकि दिल्ली के दुखों को जल्द पारकर एक ठीकठाक मुकाम तक पहुंच जाएं।

-यशवंत

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मेरा पहला साक्षात्कार
-प्रतिभा कुशवाहा-

पत्रकार बनने का भूत सवार हुआ। सभी ने मुझे बहुत समझाया-पत्रकारिता में क्या रखा है, भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। लेकिन मैने पूरे जोश से पैरोकारी की समाज सेवा की दुहाई दी। बड़े से बड़े पत्रकारों के नाम लिए लेकिन सब बेकार आखिर मैने भी मूढ़ लोगों की बात न मानते हुए बगावत का बिगुल बजा दिया और झटपट पत्रकारिता के क्षेत्र में टांग अड़ा दी।

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद जंगे मैदान में आ डटी। मैने अपनी कलम चारों दिशाओं में भांजी और कहा अब समाज के दुश्मनों की छुट्टी हो जाएगी और पूरे जोश के साथ पत्रकारिता के मदिंरों (समाचार पत्र के दफ्तरों) में माथा टेकने लगी। प्रसाद और आर्शिवाद की उम्मीद लिए मुझे कही-कही दर्शन मिलना भी मुश्किल हो गया।

परेशान होकर मैने अपने कुछ पत्रकार मित्रों (जो अब तक पत्रकार रूपी जीव बन गए थे)से सम्पर्क साधा, पूछा- बंधुवर! ये बताइए कि मुझे कब इन समाचारायल में प्रवेश मिलेगा?

मेरी बात सुनकर वे थोड़ा मुस्कराएं, फिर सगर्व बोले- तुम्हारी कोई जान पहचान है?

इस प्रश्न पर मुझे आश्चर्य कम गुस्सा अधिक आ रहा था क्योकिं मेरी पुश्तों में किसी ने पत्रकारिता का नाम तक नहीं सुना था और ये परिचय की बात कर रहे हैं। अत: मैने ‘न’ में सिर हिलाया।

इस सिर हिलाऊ उत्तर पर उसने भी फिल्मी डाक्टर की तरह आजू-बाजू सिर हिलाकर बोले-‘तब तो तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता’। और मै मनमोहन सिंह की तरह खून का घूट पी कर रह गयी।

खैर, इस घटना के बाद मै बिल्कुल निराश नहीं हुयी और एक राजनीतिक पार्टी की भातिं मैने तुरंत दावा किया कि इस बार मेरी ही सरकार बनेगी। और पूरे जोशोखरोश के साथ अपने अभियान में लग गयी। आखिर एक दिन मोनालिसा की मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी क्योंकि काफी जद्दोजहद के बाद मुझे एक मंदिर में दर्शन के लिए बुला लिया गया। मै पूरे साजो-सामान के साथ सम्पादक महोदय के सामने उपस्थित हुई और तुरंत ही अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया।

मैने कहा, ‘श्री मन् मैं लिखती हूं, जो थोड़ा बहुत यहां-वहां छपता रहता है’ यह कहते हुए मैने अपने कार्य कौशल की थाथी उनके मेज पर खिसका दी।

लेकिन यह क्या?

उन्होंने किसी अछूत कन्या की तरह मेरी फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और सीधे सवाल दाग दिया। ‘आपने अभी तक क्या सीखा है?’

मैं भी कहां चुप रहने वाली, एक भाट की तरह अपने सारे छोटे-बड़े गुणों का बखान कर दिया।

लेकिन यह क्या? आफताब शिबदसानी की तरह उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आए।

उन्होंने मुझसे दूसरा सवाल किया, ‘आप किस बीट पर काम करना चाहेगी।’

मैंने तुरंत ही कहा, समाजिक एवं सांस्कृतिक।

‘तब तो आप ऐश-अभिषेक की न्यूज ला सकती है’ उन्होंने पूछा।

मैने कहा, श्रीमन्! यह तो किसी के निजी जीवन में दखलंदाजी है।

उन्होंने तीसरा प्रश्न किया, ‘आप कोई स्टिंग आपरेशन कर सकती है।’

मैने कहा, नहीं! श्रीमन्, यह झूठ और फरेब पर आधारित है, सच्ची पत्रकारिता के विरूद्घ है।

‘आप शिल्पा-गिरे जैसे प्रकरण की फोटो ला सकती है।’ उन्होंने चौथा प्रश्न किया।

मैने कहा, श्रीमन्! ‘यह कैसे हो सकता है? यह तो आप के पालिसी के विरूद्घ है।’

इस पर वे आंखे निकालते हुए बोले, अब तुम हमें हमारी पालिसीज के बारे में बताओगी। महोदया! आप में पत्रकार वाले एक भी गुण नहीं है। जाइए, पहले कुछ सीखिए, फिर आइए।

और एक हारे हुए जुआरी की तरह मै दफ्तर से निकल आयी। बाहर आने के बाद मैने अपनी हार का ठीकरा अपने पत्रकारिता इंस्टीट्यूट के ऊपर फोड़ दिया। जहां हमें गलत तरीके की शिक्षा दी गयी थी। अत: अब मैने दफ्तरों के चक्कर लगाने बंद कर दिए है। मै अब ऐसे इंस्टीट्यूट की तलाश में हूं जहां मुझे सच्चा पत्रकार बनने के वास्तविक गुणों की शिक्षा दी जाए।

26.2.08

धन्य हो लोकतंत्र, धन्य हो बाजार

दिल्ली-मथुरा रोड पर ठीक अगल बगल दो विज्ञापनों के मजमून..

...यहां शराब पीने के लिए हाल में बैठने की व्यवस्था है
(शराब की दुकान के ठीक सामने काफी मोटे मोटे अक्षरों में लिखा हुआ)

...पापा, शराब पीना छोड़े दो, बच्चों से नाता जोड़ लो
(मद्यनिषेध विभाग द्वारा जनहित में प्रसारित)

---अपन का तो यही कहना है कि भइया पहले बिठाकर पिलाते हो, फिर बच्चों की दुहाई देकर, इमोशनली ब्लैकमेल करके छुड़वाते हो...धन्य हो अपन देश का लोकतंत्र...
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दिल्ली-मथुरा रोड पर ही दो और विज्ञापनों के मजमून

....खूब बातें करें, बातें खत्म कर देती है फासलों की दीवार, जीभर करें बातें

....अनचाही काल को रोक दें, बस कुछ रुपये महीने में यह सविधा उपलब्ध है


----अपन का तो कहना है भइया पहले तो खूब बातें करवाकर पैसे बटोरे, और जब इस दौरान फासलों की दीवार टूटने पर लड़ाई हो जाए तो पैसे लेकर उसकी काल रोक दो...धन्य हो इस लोकतंत्र का बाजार...
जय भड़ास
यशवंत

22.2.08

सृजनगाथा : प्रसंगवश

कितना उचित है उपजाऊ भूमि पर उद्योग लगाना - तनवीर जाफ़री

यह आलेख अपने चार भाइयों के साथ सृजन गाथा में मौजूद है ।

इस आलेख पर मेरी टिप्पणी है:-"इसी लिए लोग बंजर ज़मीन को भी नही छोड़ते "

12.2.08

निपटा दो साले को !!!

तगड़ी घेराबंदी


चौतरफा धावा


हुआ हलाल


....आइए हम सब इस बेचारे की आत्मा की शांति के लिए कामना करें।

तस्वीरें साभारः फनएंडफनवनली डाट नेट और याहू ग्रुप

लगे रहोओओ... !!!

तलाशिए, आप कहां हैं इसमें?



फोटो साभारः फनएंडफनवनली डाट नेट और याहू ग्रुप

भड़ास एक्सक्लूसिव जब संजू बाबा शादी के बाद



भड़ास एक्सक्लूसिव

मान्यता से संजय दत्त ने शादी क्या किया बहनों ने घर से निकाल दिया, बस पैदल ही चल पड़े कहाँ वो तो पता नही। मिडिया जुटी थी, टीवी की दुनिया में सिर्फ भड़ास के पास है यह एक्सक्लूसिव फोटो।





हा हा हा हा हा..........



कैसा लगा फोटू, जैसा लगा अपने मन की बात तो बता दें.

9.2.08

सेल्समैन हो गए हैं आज के पत्रकार !! ...कुछ खबरें

पहले कुछ सूचनाएं, पत्रकारों की आवाजाही से संबंधित....

--भरत कपाड़िया जागरण व टीवी 18 के नए हिंदी बिजनेस डेली के सीईओ व मैनेजिंग एडीटर होंगे। ये खबर एक साइट से चार दिन पहले ही मिली पर इसे डाल नहीं पाया।
--वीर सिंघवी की बेआबरू होकर विदाई तो पुरानी खबर हो गई है पर दूर दराज के भड़ासियों को बता दें कि एक नए न्यूज चैनल को लांच करने की जिम्मेदारी लेकर गए वीर सिंघवी को प्रबंधन ने चैनल लांच से पहले ही बहरिया दिया। बाद में एक प्रेस कांफ्रेंस कर दोनों पक्षों ने इसे सम्मानपूर्ण विदाई और जाने क्या क्या कहकर विवाद शांत करने की कोशिश की पर मार्केट में इससे पहले हल्ला तो फैल ही चुका था।
--दैनिक जागरण, नोएडा में सेंट्रल डेस्क के इंचार्ज विष्णु त्रिपाठी अब तरक्की पाकर सह संपादक बन गए हैं। सीनियर जर्नलिस्ट विष्णु त्रिपाठी इससे पहले आईबीएन 7 व उससे पहले दैनिक जागरण लखनऊ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।
--पूजा प्रसाद ने आईएनएस छोड़कर अब हिंदी सर्च इंजन और न्यूज पोर्टल रफ्तार डाट काम को बतौर असिस्टेंट कंटेंट एडीटर ज्वाइन कर लिया है।

((उपरोक्त कई सूचनाएं आपमें से कइयों को पता भी होंगी। अगर पत्रकारों की आवाजाही व तरक्की डिमोशन की सूचना आपके पास भी हो तो आप इसे भड़ास पर डायरेक्ट पोस्ट कर सकते हैं। बस ये ध्यान रखें, सूचना पक्की हो और आप अपने ओरिजनल नाम से ही पोस्ट करें।))
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फ्रस्टेशन और उल्लास का मौसम है पत्रकारों के लिए
एक खबर ये है कि इनक्रीमेंट व प्रमोशन के पिछले महीने का रिजल्ट इस महीने आते ही प्रिंट मीडिया जगत में भूचाल आया हुआ है। कोई रो रहा है, कोई गा रहा है, कोई चुपचाप है, कोई स्तब्ध है, कोई शून्य में निहार रहा है, कोई घर बैठ गया है, कोई नये शहरों की यात्रा पर निकल चुका है, कुछ ने पुराने संबंधों को जिंदा करना शुरू कर दिया ....। मतलब, जिसकी जैसी गोटी बैठी, वैसी मुख मुद्रा बनाए है। कई साथियों के फोन मेरे पास आए। दहाड़े मार रहे थे। बास को इतना तेल लगाया लेकिन साले ने क्या रिजल्ट दिया, कुच्छ नहीं पैसा बढ़ा। दो हजार रुपये का बढ़ना भी कोई बढ़ना होता है। फ्रस्टेशन इतना है भाईसाहब की अभी कोई नौकरी मिले तो छोड़ दूं.....। आप अपने में मन में झांकिए, और देखिए। बताइए आप किस स्थिति में है। वैसे, मुझे याद आता है कि इन सब चूतियापों को लेकर पहले मैं भी बहुत पजेसिव हुआ करता था, उसका इतना क्यों बढ़ गया और मेरा इतना क्यों रह गया, उसका पद क्यों बढ़ गया मेरा क्यों नहीं बढ़ा.....पर ये सब चूतियापा है, आपको एक छोटे खांचे, सांचे में सोचने व जीने को मजबूर करने वाला।

क्या आजकल के पत्रकार वाकई सेल्समैन हो गए हैं, जैसा कि प्रभाष जोशी कहते हैं....
आप संपादक हो जाएं या सह संपादक या सहायक संपादक या उप संपादक.....ये शब्द आपके साथ नहीं जाने वाले। कल ही तो दिल्ली पुस्तक मेले में प्रभाष जोशी ने कहा कि आज के पत्रकार सेल्समैन हो गए हैं और मीडिया हाउस पूंजी इकट्ठा करने वाली दुकानें। तो भई, सेल्समैनी में पद व पैसे की मार तो होनी ही चाहिए, इसी के लिए जीना मरना होना चाहिए। .....पर हममें से कई सारे दिल से सेल्समैन नहीं हैं। ऐसे लोगों को ज्यादा कष्ट होता है, कि किस तरह सेल्समैन प्रमोट होकर मैनजर हो रहे हैं और एक असली पत्रकार को चूतिया व स्लो व पिछड़ा बताकर पीछे रहने के लिए, फ्रस्टेट होने के लिए छोड़ दिया जाता है। ऐसे सच्चे दिल पत्रकारों को सलाह है कि वे वाकई इस सेल्समैनी वाली पत्रकारिता को बाय बाय कह दें और जब सेल्समैनी ही करनी है तो अपनी सेल्समैनी करिए, अपना धंधा करिए, अपनी कंपनी खड़ी करिए, अपना कोई काम कीजिए......। जितना पैसा इस वक्त पा रहे हैं, अपने काम को करने में इससे ज्यादा पाएंगे, ये मेरी गारंटी है। चूतियों की फौज में खामखा फ्रस्टेट हो रहे हो। अगर कोई दिक्कत हो तो मुझे बताओ, मेरे पास तो खुद का कामधाम शुरू करने संबंधी इस वक्त ढेर सारे नुस्खे हैं.....।

याद रखिए, धूमिल की लाइनें हैं जिससे भाव ये निकलता हैं...पार्टनर, अगर ज़िंदगी जीने के पीछे कोई तर्क नहीं है तो रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों से पैसा आता है.....

मतलब, ज़िंदगी के एक-एक दिन किसी तार्किक चूतियापे में नष्ट करते रहने के बजाय ज्यादा अच्छा है भटकिए और भोगिए।

फिर मिलते हैं...
जय भड़ास
यशवंत

28.1.08

भड़ास तुम्हारे हवाले, मैं चला समझदारी के गीत गाने...

कई दिनों से ब्लाग पर नहीं था, आगे भी यही इरादा है। घर पर बच्चों ने लैपटाप पर इस कदर काम (ब्लागिंग)करते देख ताना मारना शुरू कर दिया था.....
..पापा...मान जाओ प्लीज, बंद कर दो लैपटाप, इतने देर तक काम करोगे, तो पागल हो जाओगे।
...पापा, क्या ये तुमको होमवर्क मिलता है आफिस से?
....पापा, बहुत देर से चार्ज हो रहा है लैपटाप, अब बंद भी कर दो वरना गर्म होकर ये ब्लास्ट हो जायेगा,
.....पापा, अब तो लगता ही नहीं कि तुम घर पर हो, इससे अच्छा है कि आफिस में ही रहते, तुम न बात करते हो, न साथ में कार्टून देखते हो, न घुमाने ले जाते हो, न कोई कहानी सुनाते हो.....
...पापा, तुम्हारा दिमगवा जो है न, वो इक दिन ब्लास्ट हो जायेगा, देखो..कितना गरम है।
...पापा, तु्म्हारी आंखें खराब हो जाएंगी, तुम ही कहते हो न, लगातार टीवी नहीं देखते, तो तुम क्यों लगातार लैपटाप खोले रहते हो।
......

और श्रीमती जी क्या कहतीं, पूछिए न....एक बानगी सुनिये...

...एजी, इ का बवाल आफिस से ले आए, ओहरे रख देते, पहले थोड़ा घर पर हंस बोल लेते थे, अब तो जब देखो इहे लैपटाप खोले और चश्मा लगाए बैठे घूरते रहते हैं, चलो ठीक है, भड़ास है, पर क्या इसे भरसांय बना देंगे कि इसकी आंच से परान निकल जाए....


शायद, ब्लागिंग का पागलपन जिसे लग जाए वो उस प्रेमी जैसा हो जाता है जिसे चाहे कंकड़ मारो या पत्थर, वो लैला लैला कहता रहेगा। वो शूली चढ़ जाएगा, जान दे देगा, राज्य और राष्ट्र से द्रोह कर लेगा पर आशिकी न छोड़ेगा। इसी तरह ब्लागिंग है, आफिस में माहौल खिलाफ बन जाए, नौकरी चली जाए, धंधा मंदा हो जाए, परिवार नाराज हो जाए, बच्चे-बीबी त्रस्त हो जाएं....पर ब्लागिंग न जाये। पहले तो सीमित था। जब तक दैनिक जागरण में था, आफिस से ब्लागिंग करता रहा, विरोधों और आरोपों के बावजूद। जब दैनिक जागरण से निकाला गया तो घर पर कंप्यूटर न होने की वजह से साइबर कैफे में ब्लागिंग करता रहा, सैकड़ों रुपये खर्च करने के बाद एक दिन इस चूतियापे को खत्म कर देने की ठानी। और ऐसे महान फैसले हमेशा दारू की अभिन्न शिवत्व की अवस्था में ही लिये जाते हैं। सो ले लिया। उस ब्लाग को डिलीट कर दिया, जिस ब्लाग के कारण इतनी गालियां मिलीं आफिस में, इतनी गालियां मिलीं विरोधी ब्लागरों से।

पर भड़ास ने, मेरी एक पहचान तो बना ही दी थी, बुरी ही सही। नई नौकरी में ब्लागिंग को न सिर्फ प्रमोट किया गया बल्कि भड़ास को फिर से बनाने व चलाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। सो अब भड़ास पहले से ज्यादा तेवर और ज्यादा भड़ासियों के साथ हाजिर हुआ। भड़ास डिलीट करने के बाद से दिल में एक अपराधबोध था, दोस्त व सीनियर ब्लागर साथियों के समझाने का असर था व भड़ासियों की दुआ थी, सो भड़ास फिर उसी जैसा जन्म गया। एक ऐसा पुर्नजन्म जिसमें पुरानी यादें सारी ताजा हों। सो, भड़ास के फिर आने के बाद से मेरे दिल से बोझ उतर गया। आफिस ने जो लैपटाप दिया उससे घर पर बैठकर ब्लागिंग करता रहा। पिछले सालभर में कुल जितनी पोस्टें लिखी गईं भड़ास में, इसी महीने उतनी संख्या में भड़ासियों द्वारा पोस्टें लिख दी गईं। भड़ासियों का जनबल भी 184 पर पहुंच चुका है। मीडिया में ब्लागिंग के साथ भड़ास भी खूब छाया हुआ है। मतलब....बल्ले बल्ले है भड़ास और भड़ासियों के। अभी परसों ही तो, नवभारत टाइम्स में रविवार के फोकस पेज पर दो तिहाई पेज में ब्लागिंग पर कवरेज था और उसमें जिन चार ब्लागों के माडरेटरों से बातचीत थी, उसमें भड़ास ब्लाग भी था। और अपुन की फोटू भी। चलो, जीते जी अपन का छपा हुआ फोटो देख लिया अखबार में, जाने मरने पर लगे ना लगे...:):O:

तो मैं कहना ये चाह रहा था कि पिछले तीन रोज लैपटाप आफिस के हवाले कर घर पर खुल्ला खुल्ला रहा तो लगा फिर से ज़िंदगी लौट आई। खूब खाए, पकाए, घूमे-घुमाए। फिल्म, कार्टून और सीरियल देखे। बच्चों संग खेला। लगा, ब्लागिंग से जो ज़िंदगी चली गई थी, वो लौट आई। इसमें गलती लैपटाप की या मेरी या घर की या आफिस की नहीं, अतिवाद का है, जो मेरे व मेरे जैसा साथियों के साथ दिक्कत है। जो भी करेंगे इतना करेंगे कि उसकी गांड़ में घुस जायेंगे और परान दे देंगे।

जो समझदार लोग होते हैं, संतुलित लोग होते हैं, दुनियादार होते हैं, विजनरी होते हैं, दृष्टि वाले होते हैं...हर काम उतना ही करते हैं जितना जरूरी होता है। पर अपन तो ठहरे भुच्च देहाती। भावना वाले। दिल वाले। इमोशन वाले। पार्टी अच्छी लगी तो चल दिए क्रांति करने। सेक्स उफान मारने लगा तो एकदम से हां कर दिया बियाह के लिए, बिना लड़की देखे। मां के आंसू देखे तो चल दिए नौकरी करने, झोला उठाकर। पत्रकारिता शुरू की तो लगे तेल लगाने जीभरकर। जब मन भर गया व तेल गाने से उबकाई आने लगी तो लगे तेल उतारने, जिनको जिनको लगाया उनसे उनसे हिसाब बराबकर करके तेल निकाल। सारा तेल वापस ले लिया, मय सूद के। इसी तरह ब्लाग शुरू किया तो ऐसा किया कि अपनी ही गांड़ में ब्लाग घुसा दिया और खुद हो गए पैदल....। और अब दुबारा ब्लागिंग शुरू की तो फिर घर में मुसीबत। मतलब, हरामीपने की हद है। जो करेंगे तो इतना की या तो सामने वाला बांय बांय चिल्लाकर डर के मारे भागने लगे या गरियाने लगे या खुद की अपनी ही फट जाए।

तो ये जो अतिवादी आदत है, उसे बदलने की कोशिश करनी होगी। इसी के तहत ब्लागिंग से एक समझदार दूरी बनाना चाह रहा हूं। हालांकि शायद ये अतिवादी आदत ही सच बोलने पर मजबूर करती है, भड़ास निकालने और भड़ास चलाने को कहती है, वरना समझदार और मध्यमार्गी लोग तो सब कुछ इतना स्ट्रेटजिक करते हैं कि पता ही नहीं चलता कब तीर निशान पर जाकर लग गया और वे एकदम से इस्टाइल में चौंकते हुए बोल पड़ेंगे....अच्छा, गुड, मुझे तो पता ही नहीं चला कि तीर कब छूटा था और तीर कब लक्ष्य भेद गया। हालांकि मन में भड़ास वो भी भरे रहते हैं लेकिन निकालते नहीं और एक दिन बस उनका इकट्ठा परान ही निकलता है, भड़ास की जगह। हर्ट अटैक आयेगा, समझदार लोगों को लो जाएगा। लेकिन जो भी हो, मैं तो समझदार बनना चाहता हूं, हर्ट अटैक आएगा तो देखा जाएगा।

समझदारों के गीत गाओ। समझदारों की तरह जियो। समझदारों की संगत करो। कहां भड़ास और भड़ासियों के बीच फंसे हो आप लोग। अनगढ़ लोगों की जमात है। देहातियों का बकवास है। असफल लोगों की बात है।


अपने डा. रुपेश जी हैं, जिद्दी हैं, समझाने पर भी नहीं मानते हैं, पेले रहते हैं, हम्ही लोगों को समझाते हैं, क्रांति के लिए उकसाये रहते हैं। अब तो उनके सपने भी आने लगे हैं। डंडा लिये खड़े हैं सिर पर, कह रहे हैं....

...
बोलो यशवंत बोले, क्रांति का मंच है कि नहीं भड़ास, और मैं चिल्ला कर कह रहा हूं...बस, मेरी मारना नहीं, मेरी लेना नहीं, बाकी जो कहोगे, कहूंगा, जैसे कहोगे, चलाऊंगा। और वो अट्टाहस करके हंस रहे हैं...देखा, साला कितना पोंकू है, डंडा देखते ही पोंकने लगा। थूं....तुम जैसे फट्टू भड़ासी पर।


तो भई भड़ासियों, अब भड़ास तुम्हारे हवाले, मैं चला समझदारी के गीत गाने। लेकिन जाते जाते कुछ हिसाब क्लीयर करना है, कुछ लोगों से। एक एक कर हिसाब क्लीयर करता हूं...


पहला हिसाब विनीत कुमार डीयू वाले शोधार्थी से ...
बच्चा, बहुत सच्चा-सच्चा लिखते हो, ऋचा आईबीएन-7 वाली चाहे जो करे लेकिन वो तुमको याद जरूर रखेगी, अगर कभी गए आईबीएन इंटरव्यू देने और उसने तुम्हे देख लिया तो डंडा डंडा मारेगी और दरबानों से उठवाकर फेंकवा देगी, सो उधरे शोध वोध करके मास्टरी करने की सोचना, अब टीवी में तो तुमको नौकरी नहीं मिलेगी.....:) सच कहने की कुछ तो सजा मिलनी चाहिए तुम्हें....।


दूसरा हिसाब पीडी भाई टेक्नोक्रेट से ...
पीडी भइया, दिल्ली की गर्मी गांड़ फाड़े है और आप फगुवा रहे हैं। मेरे बुरे सपनों के बारे में सबको बताकर काहें मेरी चड्ढी उतार रहे हैं। सपने तो साले ऐसे आते हैं, आते हैं, और आते रहेंगे कि अगर वो लिख दिया जाए तो सबकी फट जाएगी क्योंकि दरअसल सच्ची कहें तो सपने और भड़ास यही दो हैं जहां आदमी हलका होता है, जो नहीं कर पाता है कर लेता है, जो नहीं कह पाता है कह लेता है। अगर ये न हों तो आदमी साला पत्थर की मूर्ति बन जाए जिस पर कुक्कुर आकर मुत्ती कर दे और वो चूं तक न कर सके। ....लेकिन आपने याद दिलाकर अच्छा किया, भौजी की खोज वाली बात तो मैं भूल ही चुका था। ढेर सारी महिला ब्लागर हैं मैदान में, वो जिन महिलाओं ने भड़ास को खास भाव नहीं दिया है, उनमें से ही किसी को घोषित कर देंगे भड़ास की भौजी। दूसरा यह भी हो सकता है कि भड़ास की भौजी के लिए इस समय जितनी महिला ब्लागर हैं, उनके नाम पर भड़ासियों से वोट करा लिया जाए। जिसे ज्यादा वोट मिले, उसे घोषित कर दिया जाए।


तीसरा हिसाब अपने डा. रुपेश श्रीवास्वत जी से......
डाग्डर साहेब। आपसे बहुते उम्मीद है। एक डाग्डर साहेब लोहिया जी रहेन। जिनके चेले आजतक डाग्डर साहब का नाम लेकर अक्सर भांजने लगते हैं। दूसरे आप हैं, कम से कम मैं तो आपका चेला बन ही गया हूं। पर क्या बात है, आप कुछ नाराज हैं क्या, आपको मैंने एक पत्र भेजा था, मेल से। जवाब नहीं आया। अगर फुरसत मिले तो मुझे फोनिया लीजिएगा। आपका ब्लाग देखा, फाड़ू है। उसे आगे बढ़ाइए। मैं कमेंट नहीं कर पाया, बुरा न मानियेगा।

...चौथा हिसाब हिंदी मीडियाकर्मी साथियों से....
भड़ास में दोबारा वो कालम शुरू किया था, कनबतियां मीडिया जगत वाला, चल चला चल नाम से, उससे पहले बढ़ते जाना रे। लेकिन उसे लोगों ने रिस्पांस ठीक नहीं दिया। सूचनाएं मिल नहीं रहीं थीं, सो उसे बंद कर दिया। अब वो कालम इसलिए भी नहीं चलाना चाहता कि उससे अपुन का तो कोई फायदा नहीं, टाइम अलग से लगाना पड़ता था। दूसरे, कई ब्लागर साथी पत्रकारों की आवाजाही से संबंधित कालम चलाने लगे हैं, सो उसकी जरूरत पूरी होती रहेगी। मुझे मुक्ति भी मिल गई। आप लोगों से अनुरोध है कि ये कालम बंद करने के लिए माफ करेंगे और बोल हल्ला ब्लाग पर चल रहे इस कालम में सूचनाएं देकर उसे अपडेट रखेंगे।

अंत में....एक सूचना, हरिद्वार में ब्लागर मिलन होगा......
कल से हरिद्वार हूं, हफ्ते भर के प्रवास पर। वहां दो ब्लागरों से मिलने का प्रोग्राम है, डा. अजीत तोमर जी और डा. बुधकर जी। वहां से लौटकर जरूर अपने अनुभवों के बारे में आप लोगों से शेयर करूंगा।

फिलहाल इतना ही, अब देखो कब मिलते हैं, जय भड़ास
यशवंत सिंह
yashwantdelhi@gmail.com

24.1.08

घर में चूहे, देना होगा टैक्स

घर में चूहे, देना होगा टैक्स

दिल्लीवासियों सावधान! यदि आपके घर में चूहे या छिपकली हो तो आपको टैक्स देना पर सकता है। भले ही यह आपको एक मजाक लगे, लेकिन दिल्ली सरकार इस मामले पर विचार कर रही है। दिल्ली सरकार कई चरण में इस योजना को लागू करने जा रही है। पहले चरण में सरकार ने दिल्ली में भैस, गाय, घोडा पालने वालों पर टैक्स लगाया है।

सरकार की योजना के मुताबिक, भैस पालने वालों को अब ढाई हजार रूपये, गाय पालने वालों को दो हजार रुपये, घोडा, खच्चर, गधा से चार पहिया वाहन चलाने वालों को दो हजार और दो पहिया चलाने वालों को एक हजार टैक्स ठोंक दिया है।इसे जल्द ही विधानसभा में पेश किया जाना है।

सूत्रों कि माने तो जल्द ही सरकार घरों में चूहों, बिल्ली, छिपकली, मक्खी, मछ्द पालने वालों पर टैक्स लगायेगी। बताया जाता है कि इस बार यदि लोगों का विरोध नही हुआ तो घर के किचन में काकरोच पाए जाने पर भी टैक्स लगाय्गी।

यहाँ बात कर लगाने के नहीं है, बल्कि गरीबों को दिल्ली से दूर करने की है। पहले झुग्गी झोपडी हटाई गयी। सड़क पर पैदल चलने वालों ko प्रतिबंधित किया गया। चान्दिनी चौक इलाका men रिक्शा चलने पर रोक लगाई गयी। दक्षिणी दिल्ली में रिक्शा चलाने पर पहले से प्रतिबंध है।

आमजन कि समस्या से दूर, सरकार हर महीने ऐसे कानून बनाती है, जिससे गरीब और गरीब रहे और अमीर के दिल्ली ही दिल्ली के दिल में बसे।

कानून जमकर बनाओ शीलाजी, लेकिन जरा घर में रहने वाले चूहों, छिपकली, मकरी और हाँ गली में रहने वाले कुत्ता जैसे जानवर से भी निजात दिलाओ। सरकार को चाहिऐ कि पूरी दिल्ली के हर घर की तलाशी ले, और जिस घर में चूहे मिलें उसे दस हजार रूपये का जुर्माना, छिपकली मिले तो पन्द्रह हजार रूपये ....
हाँ, शीलाजी घबराए नही, मेनका गांधी कुछ नही बोलेंगी, क्योंकि यहाँ उन्हें वोट नही मिलेगा।

ख़त्म हुआ टनाटन, घोषित हुआ भारत रत्न

ख़त्म हुआ टनाटन, घोषित हुआ भारत रत्न
विनीत उत्पल
आखिरकार भारत रत्न की घोषणा हो ही गयी। इतना वाद-विवाद होने के इतर यह सम्मान ऐसे शख्सियत को दिया गया, जिसने देश में ऐसा काम किया जिससे पिछले पंद्रह साल में किसी भी राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को लीक से हटने नही दिया। सरकार द्वारा दौउद इब्राहीम को भारत रत्न से सम्मानित करने के फैसले के बाद सभी नेताओं और अभिनेताओं के मुहं पर ताला लग गया है। सूत्रों के मुताबिक इस बात भारत रत्न की होड़ में जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी, ज्योति बसु, काशीराम, बाला साहेब ठाकरे सहित ऐरे-गेरे नेता इसे पाने की होड़ में शामिल हो गए थे कि समिति को इस के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। बताया जाता है कि इस बार गाजर-मुली की तरह प्रधानमंत्री के पास नेताओं के अनुरोध को देखते हुए केन्द्र सरकार के पास अत्मसंकट की समस्या आ गयी थी। जानकारों के अनुसार, इस बार इन टूट पुन्ज्ये नेताओं को छोड़ ऐसे व्यक्ति को दी गई, जिसने सही मायने में देश के सेवा की। इस क्रम में छोटा राजन, अबु सलेम सहित और भी कई नामों पर विचार-विमर्श हुआ। बैठक में वीरप्पन के नाम पर भी चर्चा हुई, लेकिन अहिन्दी भाषी होने के कारण और उसके मर जाने के कारण समिति सदस्यों ने इस नाम पर गंभीर नही huve। समिति सदस्यों ने बताया कि दौउद ने ना सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में अमन और चैन का रास्ता दिखाया है। १९९२ ऐसा मुम्बई बम विस्फोट के बाद सिर्फ गुजरात में दंगा हुआ, नही तो पहले हर साल पूरे देश में अक्सर दंगा होता रहता था। दौउद का आतंक इस कदर रहा कि अमेरिका भी उसे खोजने में लगी रही। वह तो पाकिस्तान का भला हो जिसने उसके रहने-खाने की व्यवस्था कर दी। माना जा रहा है कि जिस तरह भगत सिंह, चन्द्रशेखर सहित को अंग्रेज आतंकवादी मानती थी उसी तरह दौउद को अभी तक की सभी सरकार आतंकी मानती रही है। सरकार के सूत्रों का मानना है की जल्द ही दौउद, छोटा राजन सहित दुसरे समाज सेवी की जीवनी पाठ्य पुस्तक में पढ़ने को मिलेगी। उनकी आदमकद तस्वीर संसद में भी लगाने पर भी विचार किया जा रहा है।

16.1.08

गरीबों को पार्किंग में आरक्षण मिले!!!



((सही है। जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कलाकार और कवि। कलाकार की कल्पना के इतने प्यारे शेड्स। देखिए, आपको भी बिना मुस्कराए नहीं रह सकते। अपने बुजुर्ग भड़ासी (उम्र में नहीं, भड़ास की सदस्यता के लिहाज से) और बहुमुखी प्रतिभा के धनी अंकित माथुर को उनके किसी बंगलोर वाले मित्र ने ये कार्टून मेल किया था। उन्हें मजा आया और भड़ासियों को पढ़ाना चाहा और पढ़ाया भी पर उसमें एक झमेला यह था कि ये कार्टून इतने छोटे छोटे दिख रहे थे कि बिना क्लिक किए और बिना इनलार्ज किए इसका आनंद उठा पाना नामुमकिन था। सो, आज इसे बड़े साइज में डाल रहा हूं ताकि आप लोग भी मजे लें। और मेरी निजी राय है कि ये जो कार्टून हैं, वो नैनो पर अब तक की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। अंकित को भी नहीं पता कि किस कलाकार ने इतनी कल्पनाशीलता और चुटीले अंदाज में ये सब रचा पर जो भी हों, उन्हें हम लोगों की तरफ से दिली बधाई। अगर अंकित कलाकार का नाम पता कर सकें तो उन्हें हम लोग विश कर सकें। --जय भड़ास, यशवंत))

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सारी, आप लोगों को इस लाजवाब कार्टून को देखने के लिए इस पर क्लिक करना होगा। यह बड़े साइज में पोस्ट किए जाने के बावजूद छोटा दिख रहा है क्योंकि दरअसल ढेर सारे कार्टून को मिलाकर एक जेपीजी तस्वीर तैयार कर दी गई है और उसे लार्ज साइज में पोस्ट करने पर भी बेहद छोटा, रिड्यूस्ड शेप में दिख रहा है। मेरे खयाल से एक जोरदार मुस्कान के लिए आप उपरोक्त कार्टून पर क्लिक जरूर करेंगे।
यशवंत

11.1.08

बरम बाबा को तो छेड़ ही दिया बच्चा, अब बचो !!!

एक हिंदुस्तानी ने अपनी डायरी लिखते समय गलती कर दी। जी हां, बात कर रहे हैं अनिल जी की। इन्होंने अपनी ताजा पोस्ट में जब लिखने को कुछ नहीं मिला तो बरम बाबा का अपमान कर दिया। मतलब कि भड़ास और भड़ासियों का अपमान कर दिया। बरम बाबा से बच के निकल जाने की सोची थी लेकिन उन्होंने गलती कर दी। बरम बाबा खुद किसी को परेशान नहीं करते। सब पर उनका हाथ रहता है। लेकिन कोई उन्हें जान बूझकर छेड़े तो बरदाश्त भी नहीं करते।

सबके सामने। सरेआम। अपमान। नादान। किस बात पर गुमान। कहां गया ईमान। बेईमान। आएगा तूफान। तू मान या न मान। पकड़ ले कान। बंद कर ई कलम स्याही की दुकान। वरना न बचेगी आन बान शान। बरम बाबा ने लिया है ठान। लायेंगे तूफान... बच....गान मान खान जान कान फान फूं कूं ठूं लुकेदू चुकेदू ठुकेदू हुच्च फुच्च कूच्च ह्हीं क्रीं ठ्रीं झ्वाहा ठ्याहां देवाई खियाए प्वारो झो को तू दो.....हो फो ठो....


लो, बाबा ने दे दिया सराप।

अब तो बरम बाबा आयेंगे। उपर आयेंगे। चाहें डागडर को दिखायें या वैद को। बाबा छोड़ेंगे नहीं। चढ़ावा दिये बिना निकल लिये। और तो और, अपमान भी किया।

अब दिल थरथरा रहा है। कांप रहे हो। पहले काहे ना सोचे। काहे को कह दिया कि किलो किलो भर लिखते हैं। आतंकित करते हैं। जाने और क्या-क्या मन में था। हम बूझ रहे हैं। पाप है मन में पाप। किलो भर पाप। अब तो छोड़ेंगे नहीं।

विश्वास न हो तो इनके घरवालों, गांववालों, ब्लागवालों पढ़ लो, इ का लिखे हैं बरम बाबा लोग के बारे में...

...अब ब्लॉगरों की सबसे खतरनाक बरम बाबा वाली श्रेणी, जिनसे पास भी फटकने से मैं बचता हूं। इनमें से कुछ लोगों की खासियत है कि वे लोग दिन भर में किलो-किलो लिखते हैं और कुछ दूसरी वजहों से आतंकित करते हैं। पीपीएन, भड़ास, अविनाश वाचस्पति, पंकज अवधिया, अफलातून, अरुण पंगेबाज, जनमत, दखल की दुनिया आदि-इत्यादि के लिखे से मैं भयभीत रहता हूं। इंकलाब वाले सत्येंद्र भी इतनी लंबी पोस्ट लिखते हैं कि उन्हें भी मैं बरम बाबा की श्रेणी में रखता हूं। ऐसे कुछ और भी हैं जिनके ब्लॉग पर जाकर मैं घबरा जाता हूं और दोबारा वहां जाने की हिम्मत नहीं पड़ती।..


मतलब कि एक तो बरम बाबा के यहां जाते भी हैं और घबराते भी हैं। जब घबराहट होती है तो जाते काहें को है। पर जब चले गए और डर गए तो फिर तो बाबा पीछे पड़ गए।

उनका पूरा लिखा आपो पढ़ सकते हो, अपने चूहा में उंगली कर आगे वाले वाक्य पर तीर धंसाने के बाद....हिंदी ब्लागिंग के डीह बाबा, ब्रह्म और करैले

तो बच्चा, बचिये। ब्लागिंग के बरम बाबा हों या गांव के, जब आते हैं तो बहुते नाच नचाते हैं। क्योंकि बाबा लोग चाहें जहां वाले हो, सोचते समझते और सताते एक ही तरह से हैं।

इ सब हाल देख, कहानी सुन परिवार वाले गरियाते हैं, पीड़ित के चेहरे पर बेना डोलाते हुए...

...कहे रहे कि न छेड़ो इनको, पर इ मानता कहां है, उंगली करने की आदत है जो। पहले तो बचपना था, अब सयाना हो गया तो भी बुद्धि वही की वही रही। अउर लिख भी रहा है कि बुद्धि उंगली करने वाली आजो है। जाने का पढ़ाई किया है इहां से उहां तक। सब पइसा बोर दिया। और कहता है कि जाने बंबई में कउन सा बड़का नोकरी कर रहा है। अरे, होंगे सहर में बड़े बाबू, इहां तो बरमे बाबा के परताप से गांव जवार चलता है। उनहीं के पीछे पड़ गया ई। जय हो बरम बाबा, बच्चा नदान था, है और लगता है रहेगा भी। इसे सदा के लिए माफ कर दो। अगले मंगल को ताई चढ़ायेंगे और नटवा के इहां से असली वाली मिरचइया पियायेंगे। जय हो बरम बाबा। माफ करो। गलती हो गई है।


अनिल जी, रात बिरात जब नींद उचट जाये तो सोचियेगा जरूर, गौर से देखियेगा दरो दीवार को। आपको बरम बाबा अगल बगल सनसनाते हुए निकलते नजर आयेंगे। चुप्पी मारकर हवा के साथ दीवार पर चिपके नजर आयेंगे। जब लच्छन दिखे तो समझियेगा, बाबा का परकोप शुरू हो गया है...माथा में हरदम टेंशन रहेगा। दिल भारी भारी महसूस करेगा, काम करने में मन नहीं लगेगा। हंसने के वक्त रोने का और रोने के वक्त हंसने का मन करेगा। जो आनलाइन होंगे वो मित्र लगेंगे, जो घर में होंगे वो शत्रु से दिखेंगे। हर आदमी पर शंका करेंगे। अड़ोस पड़ोस वाले तोहरे पर शंका करेंगे। उलटी करने को मन करेगा, भूख लगेगी तो खाने का मन नहीं करेगा, खाना सामने हो तो भूख नहीं लगेगी। पेट झरेगा तो कुछ निकलेगा नहीं, और कुछ निकलेगा तो वो पेट झरने वाले कैटेगरी का नहीं होगा।

तो बरम बाबा का उपरोक्त सराप अब शुरू हो चुका है। नादानी नादान उमर में ठीक है लेकिन इ जो बड़े बुजुर्ग के उमर में जो किये हैं उसकी कोई माफी नहीं है। चाहें ताई चढ़ावें या गाजा। अब एक्के उपाय है, इहां ताई और गांजा से बात तो बनने वाली नहीं, एगो कमेंट लिखकर बाबा को शांत कर सकते हैं। और कोई तरीका नहीं है।

तो, सोच का रहे हैं, लिखिये कमेंटवा या फिर जगाय दें हम संप्रदाय के बाकी बरम लोगों को...:):)

जय भड़ास
यशवंत सिंह