बहुत दिनों बाद भड़ास पर लिखने को मजबूर हुआ हूं। राम, धर्म, हिंदु, मुस्लिम, आतंकवाद, धर्मनिरपेक्षता, विहिप, भाजपा, संघ.... को लेकर लगातार लोग अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं और उनके विचार के प्रतिवाद में विचार आ रहे हैं। मैं यहां कौन सही कौन गलत का भाषण देने नहीं आया क्योंकि इस विषय पर बुद्धिमान से बुद्धिमान भी चाहे जो बोल ले, जो जिसे मानता है वो मानेगा ही और उसके पक्ष में तर्क या कुतर्क देगा ही। आपका तर्क मेरे लिए कुतर्क हो सकता है और मेरा तर्क आपके लिए कुतर्क। इन बहसों से देश का भला तो नहीं ही हुआ है, नुकसान भले हो गया हो। इस बहाने राजनेता और समाज व धर्म के ठेकेदार अपना ठेका लगातार रिन्यू कराके चला रहे हैं और वे चाहते हैं कि ये सब चीजें बहस का विषय बनी रहें ताकि उनका ठेका चलता रहा।
मुस्लिम ज्यादा कट्टरपंथी हो गए हैं, हिंदु उदार रहे हैं या हिंदुओं को अब कट्टरपंथी हो जाना चाहिए और मुसलमानों को सबक सिखाकर उन्हें औकात में लाना चाहिए....जैसे विषयों पर ढेर सारे लोग अपने अपने बुद्धि सीमा में अपने अपने घरों, ब्लागों, महफिलों, मंचों पर बातें करते रहते हैं। करते रहिए, शुक्रिया, थैंक्यू, जय श्री राम, अल्ला हो अकबर....पर हम लोगों को यहां छोड़ दीजिए, अपने सड़ांध में मस्त रहने के लिए। किसी बेरोजगार को रोजगार देने न जय श्री राम आता है और न पैगंबर मोहम्मद। किसी भूखे को रोटी देने न भाजपा आती है और न ही सिमी के लोग आते हैं। किसी गरीब के पक्ष में न कांग्रेस आती है और न भाजपा और न हिंदुस्तान और न पाकिस्तान। ये सब चोंचलेबाजों की चोंचलेबाजी हैं जिसमें हम फंसे हुए हैं या यों कहिए कि फंसाए गए हैं। भड़ास मंच इन चूतियापों से हटकर बना था, पर पिछले दिनों इस पर भड़ास कम, अपनी बौद्धिक त्वरा ज्यादा दिखाई जा रही थी। रजनीश हों या हृदयेश या धीरेंद्र....सभी अपने जगह पर सही हैं लेकिन आप अपने विचार अपने ब्लागों पर रखिए, अपनी महफिलों पर रखिए, अपने मंचों पर रखिए, यहां काहें बात रहे हैं कि मुस्लिम आतंकवादी हैं या हिंदु महान हैं या श्रीराम खराब हैं या पैगंबर मोहम्मद अच्छे है या तुम अच्छे या हम अच्छे।
हृदयेश और धीरेंद्र को भड़ास से हटाने का निर्णय भड़ास संचालक मंडल का है, न कि रजनीश का। हम भड़ासी सभी भगवानों को वो चाहे राम हों या अल्ला हों या गुरु नानक हों या ईसा मसीह हों, सभी को एक बराबर मानते हैं और सबसे बड़ी बात कि हम इनमें से किसी को नहीं मानते।
हां, हम इनमें से किसी को नहीं मानते। जब हम नहीं मानते तो हम इनमें से किसी का कोई लिहाज भी नहीं करते। हम गालियां देंगे तो सबको देंगे किसी एक को नहीं देंगे। किसी एक को दे रहे हैं तो इसका मतलब यही है कि सबको दे रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा क्या उखड़ जाएगा अपन लोग का। सर कलम करवा दोगे। करवा दो। इससे क्या उखाड़ लोगे। एक दो चार दस पांच हजार दस हजार को कटवा दोगे तो इससे तुम्हार अल्ला या राम या रहीम या नानक या मसीह बड़ा नहीं हो जाएगा और न छोटा बन जाएगा बल्कि तुम यही साबित करोगे कि जिन लोगों को प्रतीक बनाकर पूरी दुनिया में धन, धर्म और हथियार का कारोबार चल रहा है उसे बढ़ावा देने में तुम सभी हम सभी मददगार हैं।
हमें नहीं रहना किसी के साथ। अपने भगवान को अपने घर में पूजो। हमारे भगवान तो वो इंसान हैं जो परेशान हैं और जिनके किसी काम आ जाएं तो लगता है कि हम अपने भगवान को पूज लिए। जो लोग जीते जागते इंसान को हिकारत से देखते हैं और अदृश्य सत्ताओं को पूजते हैं वो दरअसल एक तरह से पाखंड और असहिष्णुता को ही बढ़ावा देते हैं।
हम भड़ासी दिल से आप सभी हृदयेश, धीरेंद्र, रजनीश, कुमारेंद्र...सभी से माफी मांगते हैं कि प्लीज, हमें माफ कर दो। आप अपने घरों में चैन से रहो, हमें चैन से रहने दो। न चले भड़ास, न चले ये ब्लाग। पर हम अपने जीवन के उद्येश्य जो हमारे फक्कड़पन में, हमारे कबीरानापन में, हमारे सूफियाने में, हमारे मस्तमौलापन में, हमारे मानवतावाद में निहित है, को जी लेना चाहते हैं। जी लेने दो इस पल को, कल की देखेंगे कल को। तो भई, गूगल ने ब्लाग बनाने की फ्री सुविधा दी है। सब लोग बनाएं। अपने अपने पर लिखें। भड़ास का एक समय काल था, जब यह शुरु हुआ और हिट हुआ। हो सकता है इसका बुरा वक्त आ रहा हो। आने दीजिए। हर एक चीज का एक समय होता है। उसके चरम पर जाने का वक्त और उसके पतन शुरू होने का वक्ता। हो सकता है भड़ास का खराब समय आ गया है लेकिन हम अपने खराब समय में भी खुश रहेंगे क्योंकि हम जो हैं सो हैं। आप सभी लोग सही हो सकते हो, हम गलत हो सकते हैं। क्योंकि हम भड़ासी शुरू से ही गलत रहे हैं। हम गांव, देहात के लोग हैं जो शहर के चूतियापे में आकर जिंदगी की एबीसीडी सीख रहे हैं। हम तो वैसे ही दोयम और गए गुजरे लोग हैं। हमें नहीं पता कि धर्म क्या है, मस्जिद क्या है, मंदिर क्या है, राम क्या है, मोहम्मद क्या है, ईसा क्या है। हमको तो ये पता है कि घुरहू का दुख क्या है, विवेक की परेशानी क्या है, तौफीक की पीड़ा क्या है, जसवंत की जरूरत क्या है......। इन नामों से धर्म पहचानने वाले, जाति पहचानने वाले, क्षेत्र पहचानने वाले कभी बड़ा नहीं बन सकते, वो चाहें जितना दावा करें लेकिन हम ये कह सकते हैं कि हम बिलकुल बड़े नहीं हैं। हम चूतिया थे, हैं और रहेंगे।
प्लीज, बंद करिए ये कोसना, आरोप लगाना और अपने को श्रेष्ठ साबित करना।
दुनिया का पहला ऐसा ब्लाग है भड़ास जहां कोई भी सदस्य बनकर सीधे अपनी बात कह सकता है। जिसने भी अब तक जो बात कही है उसकी बात को डिलीट नहीं किया गया है। ये भले हो सकता है कि बाद में सदस्यता खत्म कर दी गई हो लेकिन किसी ब्लाग से किसी की सदस्यता खत्म कर देने का क्या मतलब होता है। कोई मतलब नहीं होता। ब्लाग एक फ्री सुविधा है जहां योनि पर विवेचना करने से लेकर नंगी नंगी फोटो छापने और भगवान व आदर्शों पर चर्चा करने तक की छूट है। लोग कर रहे हैं। ऐसे में किसी के आने या जाने, किसी के बनने या निकाले जाने को कोई मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। देश और समाज में वैसे ही बहुत दुख हैं कम से कम इस मंच पर इन दुखों की काली परछाई मत लाइए।
उसी ईश्वर के वास्ते, उसी अल्लाह के वास्ते, उसी नानक और ईसा मसीह के वास्ते, जो कभी रहे होंगे तो इसलिए बड़े हुए क्योंकि उन्होंने सबकी पीड़ा समझी और सबको साथ लेकर चलने का माद्दा कायम किया। उनके जाने के बाद उनको पेर पेर करके गलत सलत अर्थ निकालने के बाद अपनी अपनी दुकान चलाने वाले इनके पैरोकर क्या समझेंगे भगवान और खुदा के मायने। इसीलिए हम इन भगवानों और खुदाओं से दूर रहना चाहते हैं क्योंकि इन्हीं भगवान और खुदा के नाम पर दुनिया में मनुष्य का सबसे ज्यादा खून बहा है और इन्हीं भगवान और खुदा के वास्ते होने वाले जंग में हथियार बेचकर सबसे ज्यादा धन कमाया गया है।
रजनीश जी भड़ास के संयोजक हैं। वे दो तरह की भूमिकाएं इस ब्लाग पर निभा रहे हैं। एक भड़ास के प्रतिनिधि के रूप में। दूसरा एक निजी मनुष्य के रूप में। निजी मनुष्य के रूप में श्री राम और सीता को लेकर जो कुछ कहा उन्होंने, ये उनका निजी विचार था और है। उससे भड़ास ब्लाग के सहमत असहमत होने का उसी तरह कोई मतलब नहीं है जिस तरह हृदयेश और धीरेंद्र के लिखे पोस्टों से सहमत असहम होने का भड़ास से कोई मतलब नहीं है। रजनीश ने भड़ास के प्रतिनिधि के रूप में भड़ास संचालक मंडल द्वारा लिए गए फैसले को सब तक पहुंचा रहे हैं और आगे भी पहुंचाते रहेंगे। वे अच्छे हैं या बुरे हैं, इससे फरक इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि वे दिल से एक सच्चे इंसान हैं और सच्चे भड़ासी हैं, इसका परीक्षण कई बार हो चुका है।
हदयेश, धीरेंद्र और डा. कुमारेंद्र से अपील है कि वो अन्यथा न लें। इन लोगों ने स्वयं अपने ब्लाग बनाए हुए हैं। उनके विचारों से हम भले असहमत हों लेकिन एक मनुष्य के रूप में इऩ लोगों के व्यक्तित्व का हम हमेशा आदर करेंगे। हां, हम लोग आप लोग जैसे विचारवान और हर मुद्दे के विशेषज्ञ नहीं हैं। क्योंकि हम किसी विषय पर सरलीकृत राय देने के बजाय उस विषय पर आने वाले प्रतिवाद या दूसरे मत पर भी उदारता से विचार करते हैं। इसी का प्रतीक है कि इस मंच पर कोई कठमुल्ला हो या उदारवादी, कोई कम्युनिस्ट हो या कोई संघी, सबका स्वागत किया जाता है। सबको सदस्यता दी जाती है। क्योंकि हम ये मान कर चलते हैं कि यहां जो आएगा वो दूसरों को ज्ञान पेलकर पढ़ाने की बजाय अपने व्यक्तित्व की कमियों व अच्छाइयों को भड़ास के रूप में उजागर करेगा। मैं खुद अपने को गलतियों और कमियों का पुतला मानता हूं। मैं अपने आपको आज तक नहीं समझा पाया कि मैं किसी को सिखा सकता हूं या उसे कोई दिशा दे सकता हूं क्योंकि मैं अपने आप को भटका हुआ और एक निरा बेवकूफ प्राणी पाता हूं जो अपने मूड और मिजाज के हिसाब से हर पल बदलता रहता है और उसी के हिसाब से जिंदगी के खट्टे बुरे अच्छे कड़वे अनुभवों को जीता रहता है।
मैं शायद सफाई देने के लिए नहीं आया हूं। बस यह याद दिलाने आया हूं कि अपने को कुत्ता, चूतिया, लोफर, आवारा, बेईमान, हरामजादा, सूअर, चूतिया जो नहीं कह सकता वो सच्चा भड़ासी नहीं हो सकता क्योंकि इस चरम पतन के दौर में महानता का दावा करने वाला हमेशा ढोंगी ही होगा। ये हो सकता है कि वो महानता आपको दूर से दिखती हो लेकिन पास जाएंगे तो वो महान आत्मा आपसे ज्यादा गिरी हुई और खून से सनी होगी।
फिलहाल इतना ही। जिन लोगों की सदस्यता खत्म की गई है अगर वो दुबारा सदस्यता के लिए अपील करें तो उन्हें फिर से सदस्यता दी जा सकती है। हम कोई कठोर कानून चलाने बनाने वाले लोग नहीं हैं। अपने घर के लोगों को समझाने के लिए कभी कभी कुछ कड़े निर्णय लेने पड़ते हैं पर घर वाले तो घर वाले ही होते हैं। उन्हें हम उतना ही प्यार करते हैं जितना किसी अन्य से करते हैं।
यहां यह साफ तौर पर कहना चाहूंगा कि भड़ास कोई राजनीतिक मंच नहीं है। भड़ास कोई धर्म की स्थापना का मंच नहीं है। भड़ास अपनी कमियों, कुंठाओं, दिक्कतों को सुंदर शब्दों का रूप देकर प्रकट करने का मंच है ताकि हम अपने अंदर के आवेग से सबको परिचित कराकर खुद को संतुष्ट कर पाएं, खुद को मुक्त कर पाएं, खुद को हलका कर पाएं, खुद को सहज कर पाएं।
प्लीज, देखिए और लोगों को, कितने दिल से वो भड़ासी बने हुए हैं। अपने गोयल जी की जानलेवा चुटकियां भड़ास पर चार चांज लगाती हैं। अपने कई साथी बहुत अच्छा लिख रहे हैं लेकिन दिक्कत क्या है कि हम जब लिखने बैठते हैं तो लगते हैं बड़ी बड़ी बात ठोंकने। अमां यार, सामने वाले बेवकूफ नहीं हैं। सब पढ़े लिखे हैं। धर्म को मानना कोई बड़ी चीज नहीं है, धर्म से मुक्त होकर एक पूर्ण मनुष्य बनना बड़ी चीज है। दरअसल धर्म बने ही इसलिए कि मनुष्य संपूर्ण हो सके लेकिन यही धर्म मनुष्य को जानवर बनाने के काम आने लगे हैं। ऐसे में इन धर्मों का बहिष्कार ही सबसे बड़ी सफलता है। जिसने अपना घर न छोड़ा, अपना परिवार न छोड़ा, संघर्ष न किया, दूसरे के दुखों में न डूबा, प्रेम न किया, दुख न सहा.....वो क्या धर्म पर बात कर सकता है। धर्म एक अपढ़ आदमी का अंतिम हथियार है जहां वह अपने को टिकाकर जीने का रास्ता पाता है लेकिन जो पढ़ा लिखा है उसे धर्म के आगे जाकर मनुष्य को दुखों से मुक्त करने के बारे में सोचना चाहिए। और इसी सोचने के क्रम में बुद्ध पैदा होते हैं, नानक पैदा होते हैं, राम पैदा होते हैं, पैगंबर पैदा होते हैं, ईसा पैदा होते हैं। लेकिन चालाक व चतुर लोग इन दुख हरने वालों को ही बेच खाए और इनके नाम पर क्या करें क्या न करें की दुकान सजा कर माल बेचने बैठ गए। हम आप जैसे चढ़ावा चढ़ाने वाले लोग बहुत हैं, सो दुकान इनकी चलती रहती है। 21वीं सदी में बात इस पर होनी चाहिए कि आखिर क्यों सब कुछ के बाद भी सड़क पर भीख मांगता बूढ़ा दिख जाता है, कूड़ा उठाता बच्चा दिख जाता है, तन बेचती लड़की दिख जाती है, भूख से मरते मनुष्य दिख जाते है। सैकड़ों आयोग बने हैं, चूतियापे के लेकिन क्यों नहीं भूख आयोग बनाया जाता है ताकि कोई भूखा भूख के मारे जान देने से पहले भूख आयोग से भोजन के लिए गुहार कर सके। क्यो नहीं रोजगार आयोग बनता है ताकि कोई बेरोजगार हथियार उठाने से पहले अपने हाथ में दो जून की रोटी के लिए काम मांगने के लिए अपील कर सके। ये सब नहीं बनेगा क्योंकि इसके लिए आवाज उठाने का हमारे पास वक्त नहीं। इनके पास सोचने और लिखने के लिए हमारे पास दिमाग नहीं। हम तो फंस हैं वहीं पे जहां से चले थे। वही भगवान श्री राम, अल्ला हो अकबर, गुरु नानक, ईसा मसीह.....। अमां यार, जाने भी दो इनको। अपना देखो। अपने समय को देखो। अपने समाज को देखो और कुछ करो। या फिर चुप रहो। भाषण न पेलो। बहुत सुने हैं नेताओं के भाषण। हिंदुत्व पे सुने हैं। धर्मनिरपेक्षता पे सुने हैं। मुस्लिमों के पक्ष में सुने हैं। मुस्लिमों के विरोध में सुने हैं। जाति के हिसाब से सुने हैं। क्षेत्र के लिए सुने हैं। पर इनके कोई मायने नहीं भाई। ये सब हरामजादे लोग हैं जो हमको आपको इनमें फंसाकर अपनी गोटी सेट करना चाहते हैं। पूरी दुनिया में महामंदी छाई है। आई है। गहराई है। भाजपा हो या कांग्रेस या कम्युनिस्ट, सब साले चुप हैं। कोई बोलता भी है तो इसलिए बोलता है ताकि जो सत्ता में है उसकी कुर्सी जाए और वो कुर्सी पर आ जाए। वो आ जाएगा तो वो भी यही सब आर्थिक नीतियां चलाएगा क्योंकि ये नीतियां राजनेताओं से नहीं बनती, ये बनाते हैं दुनिया के चलाने वाले चंद अमीर लोग जिनके हाथों में दुनिया की असली सत्ता है। नेता और सत्ताधारी इनके नुमाइंदे भर होते हैं जो धर्म और जाति जैसी बातें करके हम लोगों को बांट करके पारी पारा सत्ता में आते रहते हैं।
समझे। नहीं समझे तो न समझें लेकिन शांत रहें और हमें भी शांत रहने दें।
जो गए, उनका शुक्रिया, जो हैं उनका तहेदिल से शुक्रिया, जो जाएंगे उनका और ज्यादा शुक्रिया, जो न जाएंगे उनका बहुत बहुत शुक्रिया.....। हल हाल में हर मनुष्य का शुक्रिया।
ये मान कर चलिए कि ये भड़ास भी बस कुछ दिनों का ही मेहमान है क्योंकि अगर लोग इसी तरह इस पर आकर चूतियापों का स्यापा करते रहेंगे तो एक दिन ये भी अन्य चूतियापे के ब्लागों जैसा हो जाएगा तब इसे चलाने के बजाय इसे बंद करने में मेरी रुचि ज्यादा होगी क्योंकि करना वही चाहिए जो मन को भाए, जो न भाए उसे ढोते रहने से अच्छा है उसे नमस्कार कर दिया जाए।
फिलहाल तो आप सभी से नमस्कार
जय भड़ास
यशवंत
12.10.08
ये मान कर चलिए कि ये भड़ास भी बस कुछ दिनों का ही मेहमान है
2.5.08
इसे अकारण भड़ास के खिलाफ माना जा रहा है--masijeevi
masijeevi has left a new comment on your post "NDTV INDIA पर जय जय भड़ास":
अपने विषय में आपकी राय पता चली... भड़ास की खासियत यह है कि यहॉं राय सामने पता चलती है... बाकी चोखेरबालियों से सालों पहले से हम आपके बीच ब्लॉगिंग कर रहे हैं इसलिए पहचान का यह वर्णित प्रवाह हैरान करने वाला है।
पूरा वीडियो यूट्यूब की सीमा से बड़ा है इसलिए अपलोड नहीं हो पा रहा वरना आप फिर से देखकर अनुमान करते कि क्या कहा गया
बाकि इसे अकारण भड़ास के खिलाफ माना जा रहा है हमें तो शक है जैसा कि हमने कार्यक्रम के दौरान ही कहा भी कि ये तो एनडीटीवी द्वारा भड़ास का विज्ञापन सा किया जा रहा था।
एंकर लगातार कहलवाना चाह रहे थे कि लॉग में भड़ासपन खतरा है उसे रोकना चाहिए हमें ऐसा नहीं लगता...भड़ासों का अपना प्रकार्य होता है तथा इनसे कोई खतरे होते हैं तो उनका इंतजाम खुद प्राद्योगिकी व सामूहिक विवेक कर लेता है।
-मसिजीवी (http://masijeevi.blogspot.com/)
Posted by masijeevi to भड़ास at 2/5/08 3:53 PM
28.1.08
भड़ास तुम्हारे हवाले, मैं चला समझदारी के गीत गाने...
कई दिनों से ब्लाग पर नहीं था, आगे भी यही इरादा है। घर पर बच्चों ने लैपटाप पर इस कदर काम (ब्लागिंग)करते देख ताना मारना शुरू कर दिया था.....
..पापा...मान जाओ प्लीज, बंद कर दो लैपटाप, इतने देर तक काम करोगे, तो पागल हो जाओगे।
...पापा, क्या ये तुमको होमवर्क मिलता है आफिस से?
....पापा, बहुत देर से चार्ज हो रहा है लैपटाप, अब बंद भी कर दो वरना गर्म होकर ये ब्लास्ट हो जायेगा,
.....पापा, अब तो लगता ही नहीं कि तुम घर पर हो, इससे अच्छा है कि आफिस में ही रहते, तुम न बात करते हो, न साथ में कार्टून देखते हो, न घुमाने ले जाते हो, न कोई कहानी सुनाते हो.....
...पापा, तुम्हारा दिमगवा जो है न, वो इक दिन ब्लास्ट हो जायेगा, देखो..कितना गरम है।
...पापा, तु्म्हारी आंखें खराब हो जाएंगी, तुम ही कहते हो न, लगातार टीवी नहीं देखते, तो तुम क्यों लगातार लैपटाप खोले रहते हो।
......
और श्रीमती जी क्या कहतीं, पूछिए न....एक बानगी सुनिये...
...एजी, इ का बवाल आफिस से ले आए, ओहरे रख देते, पहले थोड़ा घर पर हंस बोल लेते थे, अब तो जब देखो इहे लैपटाप खोले और चश्मा लगाए बैठे घूरते रहते हैं, चलो ठीक है, भड़ास है, पर क्या इसे भरसांय बना देंगे कि इसकी आंच से परान निकल जाए....
शायद, ब्लागिंग का पागलपन जिसे लग जाए वो उस प्रेमी जैसा हो जाता है जिसे चाहे कंकड़ मारो या पत्थर, वो लैला लैला कहता रहेगा। वो शूली चढ़ जाएगा, जान दे देगा, राज्य और राष्ट्र से द्रोह कर लेगा पर आशिकी न छोड़ेगा। इसी तरह ब्लागिंग है, आफिस में माहौल खिलाफ बन जाए, नौकरी चली जाए, धंधा मंदा हो जाए, परिवार नाराज हो जाए, बच्चे-बीबी त्रस्त हो जाएं....पर ब्लागिंग न जाये। पहले तो सीमित था। जब तक दैनिक जागरण में था, आफिस से ब्लागिंग करता रहा, विरोधों और आरोपों के बावजूद। जब दैनिक जागरण से निकाला गया तो घर पर कंप्यूटर न होने की वजह से साइबर कैफे में ब्लागिंग करता रहा, सैकड़ों रुपये खर्च करने के बाद एक दिन इस चूतियापे को खत्म कर देने की ठानी। और ऐसे महान फैसले हमेशा दारू की अभिन्न शिवत्व की अवस्था में ही लिये जाते हैं। सो ले लिया। उस ब्लाग को डिलीट कर दिया, जिस ब्लाग के कारण इतनी गालियां मिलीं आफिस में, इतनी गालियां मिलीं विरोधी ब्लागरों से।
पर भड़ास ने, मेरी एक पहचान तो बना ही दी थी, बुरी ही सही। नई नौकरी में ब्लागिंग को न सिर्फ प्रमोट किया गया बल्कि भड़ास को फिर से बनाने व चलाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। सो अब भड़ास पहले से ज्यादा तेवर और ज्यादा भड़ासियों के साथ हाजिर हुआ। भड़ास डिलीट करने के बाद से दिल में एक अपराधबोध था, दोस्त व सीनियर ब्लागर साथियों के समझाने का असर था व भड़ासियों की दुआ थी, सो भड़ास फिर उसी जैसा जन्म गया। एक ऐसा पुर्नजन्म जिसमें पुरानी यादें सारी ताजा हों। सो, भड़ास के फिर आने के बाद से मेरे दिल से बोझ उतर गया। आफिस ने जो लैपटाप दिया उससे घर पर बैठकर ब्लागिंग करता रहा। पिछले सालभर में कुल जितनी पोस्टें लिखी गईं भड़ास में, इसी महीने उतनी संख्या में भड़ासियों द्वारा पोस्टें लिख दी गईं। भड़ासियों का जनबल भी 184 पर पहुंच चुका है। मीडिया में ब्लागिंग के साथ भड़ास भी खूब छाया हुआ है। मतलब....बल्ले बल्ले है भड़ास और भड़ासियों के। अभी परसों ही तो, नवभारत टाइम्स में रविवार के फोकस पेज पर दो तिहाई पेज में ब्लागिंग पर कवरेज था और उसमें जिन चार ब्लागों के माडरेटरों से बातचीत थी, उसमें भड़ास ब्लाग भी था। और अपुन की फोटू भी। चलो, जीते जी अपन का छपा हुआ फोटो देख लिया अखबार में, जाने मरने पर लगे ना लगे...:):O:
तो मैं कहना ये चाह रहा था कि पिछले तीन रोज लैपटाप आफिस के हवाले कर घर पर खुल्ला खुल्ला रहा तो लगा फिर से ज़िंदगी लौट आई। खूब खाए, पकाए, घूमे-घुमाए। फिल्म, कार्टून और सीरियल देखे। बच्चों संग खेला। लगा, ब्लागिंग से जो ज़िंदगी चली गई थी, वो लौट आई। इसमें गलती लैपटाप की या मेरी या घर की या आफिस की नहीं, अतिवाद का है, जो मेरे व मेरे जैसा साथियों के साथ दिक्कत है। जो भी करेंगे इतना करेंगे कि उसकी गांड़ में घुस जायेंगे और परान दे देंगे।
जो समझदार लोग होते हैं, संतुलित लोग होते हैं, दुनियादार होते हैं, विजनरी होते हैं, दृष्टि वाले होते हैं...हर काम उतना ही करते हैं जितना जरूरी होता है। पर अपन तो ठहरे भुच्च देहाती। भावना वाले। दिल वाले। इमोशन वाले। पार्टी अच्छी लगी तो चल दिए क्रांति करने। सेक्स उफान मारने लगा तो एकदम से हां कर दिया बियाह के लिए, बिना लड़की देखे। मां के आंसू देखे तो चल दिए नौकरी करने, झोला उठाकर। पत्रकारिता शुरू की तो लगे तेल लगाने जीभरकर। जब मन भर गया व तेल गाने से उबकाई आने लगी तो लगे तेल उतारने, जिनको जिनको लगाया उनसे उनसे हिसाब बराबकर करके तेल निकाल। सारा तेल वापस ले लिया, मय सूद के। इसी तरह ब्लाग शुरू किया तो ऐसा किया कि अपनी ही गांड़ में ब्लाग घुसा दिया और खुद हो गए पैदल....। और अब दुबारा ब्लागिंग शुरू की तो फिर घर में मुसीबत। मतलब, हरामीपने की हद है। जो करेंगे तो इतना की या तो सामने वाला बांय बांय चिल्लाकर डर के मारे भागने लगे या गरियाने लगे या खुद की अपनी ही फट जाए।
तो ये जो अतिवादी आदत है, उसे बदलने की कोशिश करनी होगी। इसी के तहत ब्लागिंग से एक समझदार दूरी बनाना चाह रहा हूं। हालांकि शायद ये अतिवादी आदत ही सच बोलने पर मजबूर करती है, भड़ास निकालने और भड़ास चलाने को कहती है, वरना समझदार और मध्यमार्गी लोग तो सब कुछ इतना स्ट्रेटजिक करते हैं कि पता ही नहीं चलता कब तीर निशान पर जाकर लग गया और वे एकदम से इस्टाइल में चौंकते हुए बोल पड़ेंगे....अच्छा, गुड, मुझे तो पता ही नहीं चला कि तीर कब छूटा था और तीर कब लक्ष्य भेद गया। हालांकि मन में भड़ास वो भी भरे रहते हैं लेकिन निकालते नहीं और एक दिन बस उनका इकट्ठा परान ही निकलता है, भड़ास की जगह। हर्ट अटैक आयेगा, समझदार लोगों को लो जाएगा। लेकिन जो भी हो, मैं तो समझदार बनना चाहता हूं, हर्ट अटैक आएगा तो देखा जाएगा।
समझदारों के गीत गाओ। समझदारों की तरह जियो। समझदारों की संगत करो। कहां भड़ास और भड़ासियों के बीच फंसे हो आप लोग। अनगढ़ लोगों की जमात है। देहातियों का बकवास है। असफल लोगों की बात है।
अपने डा. रुपेश जी हैं, जिद्दी हैं, समझाने पर भी नहीं मानते हैं, पेले रहते हैं, हम्ही लोगों को समझाते हैं, क्रांति के लिए उकसाये रहते हैं। अब तो उनके सपने भी आने लगे हैं। डंडा लिये खड़े हैं सिर पर, कह रहे हैं....
...
बोलो यशवंत बोले, क्रांति का मंच है कि नहीं भड़ास, और मैं चिल्ला कर कह रहा हूं...बस, मेरी मारना नहीं, मेरी लेना नहीं, बाकी जो कहोगे, कहूंगा, जैसे कहोगे, चलाऊंगा। और वो अट्टाहस करके हंस रहे हैं...देखा, साला कितना पोंकू है, डंडा देखते ही पोंकने लगा। थूं....तुम जैसे फट्टू भड़ासी पर।
तो भई भड़ासियों, अब भड़ास तुम्हारे हवाले, मैं चला समझदारी के गीत गाने। लेकिन जाते जाते कुछ हिसाब क्लीयर करना है, कुछ लोगों से। एक एक कर हिसाब क्लीयर करता हूं...
पहला हिसाब विनीत कुमार डीयू वाले शोधार्थी से ...
बच्चा, बहुत सच्चा-सच्चा लिखते हो, ऋचा आईबीएन-7 वाली चाहे जो करे लेकिन वो तुमको याद जरूर रखेगी, अगर कभी गए आईबीएन इंटरव्यू देने और उसने तुम्हे देख लिया तो डंडा डंडा मारेगी और दरबानों से उठवाकर फेंकवा देगी, सो उधरे शोध वोध करके मास्टरी करने की सोचना, अब टीवी में तो तुमको नौकरी नहीं मिलेगी.....:) सच कहने की कुछ तो सजा मिलनी चाहिए तुम्हें....।
दूसरा हिसाब पीडी भाई टेक्नोक्रेट से ...
पीडी भइया, दिल्ली की गर्मी गांड़ फाड़े है और आप फगुवा रहे हैं। मेरे बुरे सपनों के बारे में सबको बताकर काहें मेरी चड्ढी उतार रहे हैं। सपने तो साले ऐसे आते हैं, आते हैं, और आते रहेंगे कि अगर वो लिख दिया जाए तो सबकी फट जाएगी क्योंकि दरअसल सच्ची कहें तो सपने और भड़ास यही दो हैं जहां आदमी हलका होता है, जो नहीं कर पाता है कर लेता है, जो नहीं कह पाता है कह लेता है। अगर ये न हों तो आदमी साला पत्थर की मूर्ति बन जाए जिस पर कुक्कुर आकर मुत्ती कर दे और वो चूं तक न कर सके। ....लेकिन आपने याद दिलाकर अच्छा किया, भौजी की खोज वाली बात तो मैं भूल ही चुका था। ढेर सारी महिला ब्लागर हैं मैदान में, वो जिन महिलाओं ने भड़ास को खास भाव नहीं दिया है, उनमें से ही किसी को घोषित कर देंगे भड़ास की भौजी। दूसरा यह भी हो सकता है कि भड़ास की भौजी के लिए इस समय जितनी महिला ब्लागर हैं, उनके नाम पर भड़ासियों से वोट करा लिया जाए। जिसे ज्यादा वोट मिले, उसे घोषित कर दिया जाए।
तीसरा हिसाब अपने डा. रुपेश श्रीवास्वत जी से......
डाग्डर साहेब। आपसे बहुते उम्मीद है। एक डाग्डर साहेब लोहिया जी रहेन। जिनके चेले आजतक डाग्डर साहब का नाम लेकर अक्सर भांजने लगते हैं। दूसरे आप हैं, कम से कम मैं तो आपका चेला बन ही गया हूं। पर क्या बात है, आप कुछ नाराज हैं क्या, आपको मैंने एक पत्र भेजा था, मेल से। जवाब नहीं आया। अगर फुरसत मिले तो मुझे फोनिया लीजिएगा। आपका ब्लाग देखा, फाड़ू है। उसे आगे बढ़ाइए। मैं कमेंट नहीं कर पाया, बुरा न मानियेगा।
...चौथा हिसाब हिंदी मीडियाकर्मी साथियों से....
भड़ास में दोबारा वो कालम शुरू किया था, कनबतियां मीडिया जगत वाला, चल चला चल नाम से, उससे पहले बढ़ते जाना रे। लेकिन उसे लोगों ने रिस्पांस ठीक नहीं दिया। सूचनाएं मिल नहीं रहीं थीं, सो उसे बंद कर दिया। अब वो कालम इसलिए भी नहीं चलाना चाहता कि उससे अपुन का तो कोई फायदा नहीं, टाइम अलग से लगाना पड़ता था। दूसरे, कई ब्लागर साथी पत्रकारों की आवाजाही से संबंधित कालम चलाने लगे हैं, सो उसकी जरूरत पूरी होती रहेगी। मुझे मुक्ति भी मिल गई। आप लोगों से अनुरोध है कि ये कालम बंद करने के लिए माफ करेंगे और बोल हल्ला ब्लाग पर चल रहे इस कालम में सूचनाएं देकर उसे अपडेट रखेंगे।
अंत में....एक सूचना, हरिद्वार में ब्लागर मिलन होगा......
कल से हरिद्वार हूं, हफ्ते भर के प्रवास पर। वहां दो ब्लागरों से मिलने का प्रोग्राम है, डा. अजीत तोमर जी और डा. बुधकर जी। वहां से लौटकर जरूर अपने अनुभवों के बारे में आप लोगों से शेयर करूंगा।
फिलहाल इतना ही, अब देखो कब मिलते हैं, जय भड़ास
यशवंत सिंह
yashwantdelhi@gmail.com
