
आप पढ़े-लिखे हैं, विचारवान हैं, लेखक हैं, ईमानदार व सीधे-साधे हैं तो पत्रकारिता की बात छोड़िए, इस दुनिया में जीने में आपका दम निकलेगा। दुखों के दंश से गुजरना होगा। दर्द को दवा मानकर जीना होगा। कुछ यही हाल आशुतोष का है। वे पटना के पत्रकार हैं। मनुष्यों की नगरी में मनुष्यों द्वारा मिला दुख जब बढ़ जाता है तो वो गैर-मनुष्यों के पास चले जाते हैं। उनकी प्रिय गिल्लो रानी न सिर्फ उनका स्वागत करती हैं बल्कि उनके देह पर कूद-फांद कर दुख-दर्द हर लेती हैं। आशुतोष बिहार के एक रीजनल टीवी न्यूज चैनल के पटना आफिस में कई बरस से स्ट्रिंगर हैं। पिछले दिनों उनकी सेकेंड हैंड बाइक आफिस के नीचे से चोरी चली गई। तब आशू झोला टांगकर पैदल ही रिपोर्टिंग पर निकलने लगे।
जितनी खबर चलेगी, उतना पैसा मिलेगा के फंडे पर जीने वाले स्ट्रिंगरों में से एक आशुतोष के लिए पैदल चलना मुश्किल न था पर खबरें वो बहुत कम कवर कर पाते। बाद में उन्हें नजदीक के एसाइनमेंट दिए जाने लगे। ज्यादा पैदल चलने से देह में जो दर्द शुरू होता, उससे निजात पाने के लिए आशुतोष गांधी मैदान के पास स्टेट बैंक के क्षेत्रीय हेडक्वार्टर की बिल्डिंग के बगल के पीपल के पेड़ के नीचे बैठ जाते। पीपल पर रहने वाली गिलहरियां अनजान पथिक को देर से बैठे देख सूंघते-सरकते नीचे आने लगीं। कुछ दिनों तक दूर से चौकन्ने होकर निहारने के बाद अब सरक कर करीब पहुंचने लगीं। शून्य में निगाह गड़ाए आशुतोष की नजर जब इन पर गई तो भावुक हो गए। पुचकारने और पुकारने लगे, आहिस्ते-आहिस्ते, हौले-हौले। गिलहरियां बेजुबान भले थीं पर बेअक्ल नहीं। वैसे भी, मनुष्यों को पहचानने के मामले में ये बड़ी तेज होती हैं। उन्हें पता होता है आदमियों के हरामीपने, सो उन्होंने आशुतोष पर एकदम से यकीं नहीं किया। पास आती गईं, दूरियां सिमटती गई पर फासले कुछ न कुछ बने रहे।
प्यार और मनुष्यता को जीने वाले आशू ने जिद ठान ली इन गिलहरियों के प्यार की परीक्षा में सफल होने की। आशुतोष जब खुद चाय पीते तो गिलहरियों को बिस्कुट के टुकड़े तोड़कर खिलाने लगे। आशुतोष जब आते तो गिल्लो रानी उन्हें देखते ही पूरे कुनबे के साथ उपर से नीचे सरक आतीं और दूर से निहारते हुए इठलातीं, बलखातीं और चंचल-शोख हसीना की माफिक मुस्कातीं। आशू इन्हें जब प्यार से अपने बिस्कुट का टुकड़ा डालते तो वे फटाक से आगे बढ़कर चुग तो लेतीं पर फिर सतर्क अंदाज में पीछे आ जातीं। आखिर वो घड़ी आ ही गई जब आशू-गिल्लो के बीच का फासला मिट गया। अब जब आशू आते तो दो दर्जन से ज्यादा गिलहरियां खुशी के बोल बोलते उनकी देह पर चढ़ने लग जातीं और उन्हें सहलाने-पुचकारने में जुट जातीं।
आसपास के चायवालों के लिए यह दृश्य शुरू में कुछ अनोखा था लेकिन बाद में इन लोगों ने आशुतोष को बेचारा मानकर 'पेड़, गिलहरी, आदमी और प्यार' के इस अजीब दृश्य को रूटीन में शामिल मान लिया। तभी तो पेड़ के पास के चाय वाले दुकानदार कन्हैया राय कहते हैं- ये गिलहरियां उनके न आने पर इंतजार करती हैं और जब देर से आते हैं तो वे गुस्सा दिखाती हैं। बगल के पाने वाले दुकानदार कहते हैं कि हम लोग इन्हें ज्यादा तो नहीं जानते लेकिन इनकी हरकत देखकर लगता है कि ये बेचारे अच्छे आदमी हैं। आशुतोष की इच्छा इन गिलहरियों पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की है पर पास में फूटी कौड़ी नहीं सो ढेर सारे सपनों के बीच ये सपना भी फिलहाल आर्काइव हो चुका है।
इस वक्त ईटीवी, पटना के कंट्रोल रूम में स्क्राल उर्फ टिकर (टीवी स्क्रीन पर नीचे की तरफ खबरों की चलने वाली पट्टी) डेस्क पर कार्यरत आशू का सात महीने से जो अफेयर गिल्लो रानी से चल रहा है, इसके चर्चे दूर-दूर तक होने लगे हैं। आई-नेक्स्ट, पटना में जब गिलहरियों को बिस्कुट खिलाते आशुतोष की तस्वीर प्रकाशित हुई तो आशुतोष चर्चित आदमी हो गए। अब तो दोस्तों के पूछने पर कि कहां जा रहे हो, आशुतोष मुस्करा कर कहते हैं, मेरी दो दर्जन गर्ल फ्रेंड मेरा इंतजार कर रही हैं, चलोगे उनसे मिलने!
आशुतोष ने बिहार के आरा जिले के वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया है और पटना विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा का कोर्स किया हुआ है। वर्ष 2002 से 2004 तक जनसत्ता, हिंदुस्तान और जागरण जैसे अखबारों के लिए लिखते रहे। प्रभाष जोशी को अपना आदर्श मानने वाले आशुतोष वर्ष 2004 में बतौर स्ट्रिंगर ईटीवी में भर्ती हुए और आज भी स्ट्रिंगर बने हुए हैं। आप गिल्लो रानी तक कोई संदेश पहुंचाना चाहते हैं तो 09431813609 या 09905908187 के जरिए आशू के कान में फूंक मार सकते हैं। मेल से उनसे संपर्क ashutosh_etv@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है।
साभार - भड़ास4मीडिया डाट काम
16.3.09
गिल्लो रानी, कहो तो अभी जान दे दूं....उर्फ एक स्ट्रिंगर का दर्द
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: कहानी, जर्नलिज्म, टीवी, भड़ास, भड़ास4मीडिया, मानवीयता, सरोकार
2.5.08
इसे अकारण भड़ास के खिलाफ माना जा रहा है--masijeevi
masijeevi has left a new comment on your post "NDTV INDIA पर जय जय भड़ास":
अपने विषय में आपकी राय पता चली... भड़ास की खासियत यह है कि यहॉं राय सामने पता चलती है... बाकी चोखेरबालियों से सालों पहले से हम आपके बीच ब्लॉगिंग कर रहे हैं इसलिए पहचान का यह वर्णित प्रवाह हैरान करने वाला है।
पूरा वीडियो यूट्यूब की सीमा से बड़ा है इसलिए अपलोड नहीं हो पा रहा वरना आप फिर से देखकर अनुमान करते कि क्या कहा गया
बाकि इसे अकारण भड़ास के खिलाफ माना जा रहा है हमें तो शक है जैसा कि हमने कार्यक्रम के दौरान ही कहा भी कि ये तो एनडीटीवी द्वारा भड़ास का विज्ञापन सा किया जा रहा था।
एंकर लगातार कहलवाना चाह रहे थे कि लॉग में भड़ासपन खतरा है उसे रोकना चाहिए हमें ऐसा नहीं लगता...भड़ासों का अपना प्रकार्य होता है तथा इनसे कोई खतरे होते हैं तो उनका इंतजाम खुद प्राद्योगिकी व सामूहिक विवेक कर लेता है।
-मसिजीवी (http://masijeevi.blogspot.com/)
Posted by masijeevi to भड़ास at 2/5/08 3:53 PM
टीवी पर भड़ास...भड़ास...भड़ास
एनडीटीवी पर भड़ास...भड़ास...भड़ास
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....जाने क्यों लोग मुझसे डरते हैं
.....जाने क्यों लोग प्यार करते हैं
...जाने क्यूं
....जाने क्यूं
........जाने क्यूं!
एनडीटीवी पर रात दस बजे। औरों के बीच चर्चित कवि विष्णु खरे भी। गनीमत रही कि रमणीय स्त्री-विमर्श वाले राजेंद्र यादव नमूदार न हुए। और मुंबई से अजय ब्रह्मात्मज। एंकर की चिंता बच्चन से शुरू होकर बच्चन तक जिस सवाल पर टकटकाती रही, उससे कोई सहमत नहीं दिखा। बीच में मोहल्ला वाले अविनाश महाराज भी सस्वर और विदेह टपका मार गए। खेल के पीछे असली खिलाड़ी वही थे। निशाने पर था भड़ास। बुद्धू बक्से की इस पंचाट में रोकते-छेंकते भी एक जनाब के मुंह से निकल ही गया...भड़ाआआआआआआस!
ऊपर भड़ास,
नीचे भड़ास,
आगे भड़ास,
पीछे भड़ास ...
...जाने क्यूं....जाने क्यूं........जाने क्यूं!
ये भड़ास-भड़ास क्या है भई! य़शवंत सिंह पूछो। वही बताएंगे कि-
जाने क्यों लोग मुझसे डरते हैं
जाने क्यों लोग प्यार करते हैं
जाने क्यूं
जाने क्यूं
जाने क्यूं!
एनडीटीवी से ब्लॉग जगत का सबसे बड़ा सवाल-
इतने मशहूर और लोकप्रिय ब्लॉगर यशवंत का नाम एक बार भी किसी की जुबां पर क्यों नहीं आया, जब मत्थे पर पूरे टाइम भड़ास का बैनर झूलता रहा, साथ में बेहया.ब्लागस्पॉट.कॉम की ताजा पोस्ट की पंक्तियां.....छापो-छापो नंगी नारी....
वैसे कुल मिला कर अव्वू-गब्बू का खेल अच्छा रहा।
प्रस्तुतकर्ता भोजवानी पर 12:02 AM
(saabhar: http://mainbhojpuriya.blogspot.com)
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VARUN ROY has left a new comment on your post "NDTV INDIA पर जय जय भड़ास":
मैंने एन डी टी वी इंडिया पर वो कार्यक्रम देखा था रूपेश भाई परन्तु कुछ कारणों से रात में ही मैं पोस्ट नहीं कर पाया. एक बात शायद आपने नोट किया होगा कि सबसे भयभीत ख़ुद प्रस्तुतकर्ता महोदय लग रहे थे. वो बार बार इशारा कर रहे थे कि कोई खुल कर भड़ास के विरुद्ध कुछ बोले परन्तु सिवा विजेंद्र चौहान जो ख़ुद एक ब्लॉगर हैं किसी ने भड़ास के विरुद्ध बोलना उचित नही समझा.चौहान साहब ने भी इतना कहकर ही संतोष कर लिया कि ब्लोग्वाणी पर भड़ास को नहीं दिखाया जाता है. उन्हें या तो अलेक्सा की रेटिंग का पता नहीं था या जानबूझ कर बताना नहीं चाह रहे थे . भड़ास पर मीडिया से संबंधित हो रहे हमले से प्रस्तुतकर्ता खौफजदा मालूम पड़ रहे थे.स्क्रीन पर जेपीनारायण जी का 'छापो-छापो नंगी नारी' को बार बार दिखा कर खुछ कहने की कोशिश की जा रही थी क्योंकी ये उन्हें अपने ऊपर सीधा हमला लग रहा था. मुझे लगता है अब आएगा खेल का मजा. या तो भड़ास की मेहरबानी से मीडिया में कुछ आत्मावलोकन होगा या भड़ास के विरुद्ध हमला तेज होगा.
जय जय भड़ास
वरुण राय
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VARUN ROY has left a new comment on your post "एन डी टी वी पर ब्लॉग चर्चा":
क्या रूपेश भाई, इशारों को अगर समझो, राज को राज रहने दो. कुछ और लोगों को भी इसी बहाने शब्दकोष पलटने का मौका तो मिले.
और हाँ रजनीश भाई,
मुझे तो लगता है भाई लोग अब रोज भड़ास को उलट-पलट कर देखेंगे कि आज किसकी बारी है. किसका तिया-पांचा होने वाला है भड़ास पर. एक बात और जैसे जैसे भड़ास की लोकप्रियता बढेगी इसपर हमले भी बढेंगे. हमें उसके लिए भी तैयार रहना है.
जय जय भड़ास
वरुण राय
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) has left a new comment on your post "NDTV INDIA पर जय जय भड़ास":
वरुण भाई,क्या आप जानते हैं कि विजेन्द्र चौहान कौन हैं? ये साधारण मानव नहीं हैं हम और आप रोटी दाल चावल पर जीवित रहते हैं ये स्याही पर जीवित रहते हैं इस लिये "मसिजीवी" कहलाते हैं। ब्लागवाणी की मैने कैसी बैंड बजायी थी इन बेखबर सज्जन को नहीं पता है क्या? ये सब मुंहचोर किस्म के लोग हैं, आपको एक और रहस्य बता दूं कि ये चोखेरबालियों के कुनबे के "नर" हैं। ये लोग शुतुरमुर्ग की तरह से मिट्टी में मुंडी घुसा कर सोचते हैं कि मुसीबत टल गयी,इन्हें नहीं पता कि अगर मुसीबत भड़ास के रूप में है तो वो दिन ब दिन बढ़ने ही वाली है।
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हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा has left a new comment on your post "NDTV INDIA पर जय जय भड़ास":
रूपेश दादा,चोखेरबाली वो ही बाई लोग हैं जिन्होने यशवंत दादा को चुपचाप अपने ब्लाग से निकाल दिया था तो फिर अगर ये नर भी उन्ही मादाओं के कुनबे का है तो इसे कैसे पता होगा कि भड़ास क्या है(उल्लू कहीं का)उल्लू इस लिये कि इस पक्षी को सूरज नहीं दिखता और ब्लागवाणी तो उल्लुओं का कोटर ही है, मुझे याद है आपने लिखा था"ब्लागवाणी का सर्वनाश हो" जिससे इन चमगादड़ों और उल्लुओं ने खूब फड़फड़ाहट करी थी
जय जय भड़ास
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suresh neerav has left a new comment on your post "दिल्ली वालों का दिल अंग्रेजी से उखड़ रहा है, टीओआ...":
यशवंतजी,
भड़ास अब मीडिया की चर्चाओं की चर्चा में है, यह सार्थक, सुखद और संभावनावान संकेत है। ओर निष्पक्ष अभिव्यक्ति के जयघोष का उत्सव भी। आपको इस सात्विक उपलब्धि हेतु अनेक बधाइयां।
पं. सुरेश नीरव
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Arpit has left a new comment on your post "Aaj tv waalo ko b blog walo ki yaad aa gai. Aaj 10...":
Miss kar diya bhai..
koi youtube pe upload kar do.. plz
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अबरार अहमद has left a new comment on your post "NDTV INDIA पर जय जय भड़ास":
रूपेश भाई सही कहा आपने। हम नित नए आयाम गढ रहे हैं। ब्लागिंग का दूसरा नाम भडास ही समझा जा रहा है। हर किसी की जुबान पर भडास का ही नाम है। इससे पहले की पोस्ट पर जैसे ही रजनीश भाई की पोस्ट से इस बात की जानकारी मिली तो मत पूछिए कितनी खुशी हुई। साथ ही इस बात का मलाल भी रह गया कि मैने इस कार्यक्रम को मिस कर दिया। यह हम सब भडासियों की ताकत ही है जो हम इस मुकाम तक पहुंचे हैं। भडास बोलना जानता है और बोल रहा है और आगे और भी बोलेगा। क्योंकि हम सब सच बोलते हैं वही बोलते हैं जो बोलना है क्योंकि वह भडास हम पचा नहीं सकते क्योंकि हमने इसे निकालना सीख लिया है। भडास ने सभी को एक मंच दिया है। लिखना सीखाया है। बोलना सीखाया है अपना हक छीनना सीखाया है। जरूरत है इस सम्मान को बरकरार रखने की। हम समाज का वह चेहरा दिखाते हैं जो लोग देखना नहीं चाहते, वह बातें सुनाते हैं जो बंद कमरों में तो लोग सुन सकते हैं मगर बाहर बरदाश्त नहीं कर सकते। हम अपनी मुहिम जारी रखेंगे। जो दिल में आएगा उगलेंगे। क्योंकि इसे उगले बिना नींद नहीं आएगी। हमे उन लोगों को नंगा करना है जो सफेद कपडा पहन कर शरीफ होने का दावा तो करते हैं लेकिन हैं नहीं। हमें बोलना है क्योंकि हमें समाज की गंदगी साफ करनी है। हमें लिखना है क्योंकि हमे तस्वीर बदलनी है। रूपेश भाई वह दिन दूर नहीं जब भडास अंतरराष्टीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना लेगा और इंसा अल्लाह बीबीसी लंदन पर अब इसकी चरचा सुनेंगें।
इनकलाब भडास
लडते रहो, बढते रहो
उगल डालो, जो भी मन मे हो
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अबरार अहमद has left a new comment on your post "एन डी टी वी पर ब्लॉग चर्चा":
कोई बात नहीं। यह तो सदियों से चली आ रही परम्परा है। इसमें बदलाव की हम सोच भी नहीं सकते। कडवा सच कोई भी बरदाश्त नहीं कर सकता। हां इस बात के लिए सभी साथियों को बधाई अवश्य देना चाहूंगा कि दायरा बढ रहा है। भडास की ताकत को लोग पहचानने लगे हैं और वह लोग डरने भी लगे हैं जो यह जानते हैं कि यहां सिर्फ सच बोला जाता है, उगली जाती है समाज की गंदगी और नंगा किया जाता है उन सफेदपोश समाजियों को जो वाकई में समाज को गंदा कर रहे हैं। बेबाक लिखने की ताकत ही हमें औरों से जुदा बनाती है और यही हमारा लक्ष्य है। तो साथियों उगल डालो जो भी हो मन में, गले में, दिमाग में क्योंकि हमें कुछ अलग करना है। हमें अपनी भडास निकालनी है चाहे कोई इसे पसंद करे या न करे। इतिहास वही रचते हैं जो भीड से हटकर चलते हैं।
इनकलाब भडास
लडते रहो, बढते रहो
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यशवंत सिंह yashwant singh
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