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अपने विषय में आपकी राय पता चली... भड़ास की खासियत यह है कि यहॉं राय सामने पता चलती है... बाकी चोखेरबालियों से सालों पहले से हम आपके बीच ब्लॉगिंग कर रहे हैं इसलिए पहचान का यह वर्णित प्रवाह हैरान करने वाला है।
पूरा वीडियो यूट्यूब की सीमा से बड़ा है इसलिए अपलोड नहीं हो पा रहा वरना आप फिर से देखकर अनुमान करते कि क्या कहा गया
बाकि इसे अकारण भड़ास के खिलाफ माना जा रहा है हमें तो शक है जैसा कि हमने कार्यक्रम के दौरान ही कहा भी कि ये तो एनडीटीवी द्वारा भड़ास का विज्ञापन सा किया जा रहा था।
एंकर लगातार कहलवाना चाह रहे थे कि लॉग में भड़ासपन खतरा है उसे रोकना चाहिए हमें ऐसा नहीं लगता...भड़ासों का अपना प्रकार्य होता है तथा इनसे कोई खतरे होते हैं तो उनका इंतजाम खुद प्राद्योगिकी व सामूहिक विवेक कर लेता है।
-मसिजीवी (http://masijeevi.blogspot.com/)
Posted by masijeevi to भड़ास at 2/5/08 3:53 PM
2.5.08
इसे अकारण भड़ास के खिलाफ माना जा रहा है--masijeevi
25.2.08
मसिजीवी जी माफ करें !!!
मसिजीवी जी ने जो आरोप लगाया था, उसमें एक सीधा सरल सवाल था कि क्या मनीषा हिजड़ा व मनीषा पांडेय दो अलग अलग शख्सीयतें हैं या मनीषा पांडेय को बदनाम करने के लिए मनीषा हिजड़ा नामक कोई काल्पनिक चरित्र भड़ासियों ने यशवंत सिंह के नेतृत्व में गढ़ लिया?
और, अगर किसी को भी इस दुर्योग के कारण शक होता है तो उसे सवाल पूछना ही चाहिए। मसिजीवी जी ने वही किया। मैं उनकी तारीफ करता हूं जो उन्होंने अपने मन में पैदा हुए भ्रम को भड़ास पर आकर खुद अपने नाम से एक टिप्पणी करके पूछ लिया। मैंने उसी क्रम में ये अनुरोध किया कि भई, मसिजीवी जी को अपनी भड़ासी साथी मनीषा हिजड़ा की वास्तविकता सत्यापित करा दीजिये।
साथी मनीषा हिजड़ा ने अपनी पोस्ट लिखकर जो बात कही है उससे उनकी सत्यता स्थापित होती है या नहीं, ये तो मसिजीवी जी बतायेंगे। जहां तक मुझे पता है, आदरणीय डा. रूपेश जी का जो बहुआयामी कार्यक्षेत्र व सामाजिक सरोकार हैं, उसमें कई ऐसे हिजड़े साथी भी उनके दोस्त हैं, शिष्य हैं जिनकी दिक्कतों के लिए डा. रूपेश लड़ते रहते हैं। इन साथियों की दिक्कतों को समझ सकने वाले डा. रूपेश ने मनीषा हिजड़ा को सजेस्ट किया कि वो ब्लाग के जरिए अपने समुदाय की दिक्कतों, दुविधाओं, सुख-दुख को बाकी दुनिया तक पहुंचाये। इसके लिए मनीषा राजी हुईं तो डाक्टर साहब ने ब्लाग बनवाने में उनकी बखूबी मदद की और मुझे सूचित भी किया। उनकी शुरुवाती पोस्टें इस बात का प्रमाण हैं कि मनीषा का जिक्र वे उस समय से भड़ास पर करते रहे हैं जब मनीषा पांडेय विवाद शुरू भी नहीं हुआ था। मसिजीवी जी को थोड़ी गलफहमी हुई थी, पर उन्होंने साफ दिल से पूछ लिया, इसके लिए मैं उन्हें वाकई बहादुर और नेक दिल इंसान मानूंगा।
सोचिए, मसिजीवी जी अपना सवाल अनाम बनकर भी कर सकते थे, जैसा कि ढेर सारे कायर लोग ब्लागिंग में करते हैं। वे किसी और अनाम आईडी से अपना सवाल उठा सकते थे। वे अपने ब्लाग पर ही भड़ास व मुझे गरियाते हुए इस मनीषा नाम से हुई दुविधा को सच मानते हुए लिख सकते थे। पर उन्होंने शराफत का परचिय दिया। भड़ास पर आकर अपने नाम से ही उन्होंने अपनी शंका का इजहार कर दिया।
पर उन्हें भड़ासी साथियों ने जिस तरह उत्तर दिया है, उससे मुझे दुख पहुंचा है। भई, हम भड़ासी वाकई लंठ लोग हैं जो किसी को भी किसी बात पर गरिया देते हैं, उसकी ऐसी तैसी कर देते हैं? कहीं हम लोगों की छवि ब्लागिंग के बाहुबल वाले लोगों की जो बन रही है, उसके पीछे यही वजह तो नहीं है? क्या हम सवाल करने वाले को दुश्मन मानने लगते हैं? क्या हम लोकतांत्रिक देश में रहते हुए अपने सामंती व्यक्तित्व को नहीं बदल पाये हैं (जो कि मेरे अंदर भी है) और किसी के सवाल करने को अपना अपमान मान लेते हैं (ऐसा मेरे अंदर भी है)? हम अपने दिमाग का डेमोक्रेटाइजेशन करने में अक्षम रहे हैं लेकिन क्या हम हिंदी वाले इसके लिए कोशिश नहीं कर सकते? अगर कोई आलोचना करता है या उंगली उठाता है तो उसे पराया या दुश्मन मानने के बजाय निंदक नियरे राखिए वाली लाइन को याद करते हुए सम्मान नहीं दे सकते हैं?
इन सवालों का जवाब मैं खुद से तलाश रहा हूं। इसके पीछे वजह सिर्फ इतना भर है कि मसिजीवी जी के बारे में मैं जितना जानता हूं उतना उन्हें एक अच्छा व नेक इंसान कहने के लिए पर्याप्त है। वे अपनी सोच, अपने व्यक्तित्व व अपने रहन सहन में वाकई एक सहज सरल व लोकतांत्रिक शख्सीयत हैं। उन्होंने हमेशा गलत चीजों का खुलकर विरोध किया है, और इसी तेवर के चलते उन्होंने जो भी चीज महसूस किया, उसे आकर भड़ास पर कहा। यह बहस अलग है कि उन्होंने जो समझा वह उचित था या अनुचित।
मैं अपने भड़ासी साथियों के तरफ से मसिजीवी जी से इस बात के लिए माफी मांगता हूं कि अगर उन्हें मनीषा हिजड़ा व मनीषा पांडेय नाम के साम्य के कारण उठाए गए उनके सवाल के बाद भड़ास पर अगर साथियों के लेखों-टिप्पणियों से किसी प्रकार का दुख पहुंचा हो तो वे हमें नासमझ मानकर माफ कर दें।
दरअसल भड़ासी साथी दिल के सच्चे हैं इसलिए वे अक्सर भावुक हो जाया करते हैं। यह भावुकता ही है जो हमें जिलाए और बचाए हुए है वरना बौद्धिकता का रास्ता कहां लेकर इस देश व समाज को गया है, यह हम सब देख रहे हैं। हम बौद्धिकता के विरोधी नहीं हैं पर हम सहज बौद्धिकता चाहते हैं, हम व्यावहारिक बौद्धिकता चाहते हैं, हम वैज्ञानिक बौद्धिकता चाहते हैं। हम कतई हिप्पोक्रेसी नहीं चाहते। हम ट्रांसपैरेंसी चाहते हैं और ट्रांसपैरेंसी जीते भी हैं।
उम्मीद है, इस पोस्ट के बाद सभी भड़ासी मसिजीवी जी को सवाल उठाने के लिए थैंक्यू कहते हुए उनसे भड़ास के प्रति अपने स्नेह के यथावत कायम रखने का अनुरोध करेंगे।
डा. रुपेश जी से अनुरोध करूंगा कि डाक्टर साहब अपने जो कुछ लिखा है, कहा है, मैं उसके पीछे के दर्द व भावना को समझ सकता हूं। आप भड़ास के माडरेटर हैं, इसलिए आप जो भी कहेंगे, लिखेंगे, उस हम भड़ासी सिर माथे रखेंगे पर हम लोग भी अपनी राय इसी मंच पर रखते रहेंगे। जाहिर सी बात है, हमारे आप में लोगों को असहमतियां दिखेंगी पर रास्ते अलग अलग होने के बावजूद हम नदियों की मंजिल तो वही सागर ही है ना, जहां वो पहुंचती हैं और जहां हमें भी पहुंचना है।
और आखिर में साथी मनीषा हिजड़ा से, आप बिलकुल हतोत्साहित न हों। ये जो शुरुवाती मुश्किलें होती हैं, वो हमें अंदर से मजबूत करती हैं और लंबे सफर के लायक बनाती हैं सो आप अपना काम जारी रखें। मसिजीवी जी सदा आपके साथ हैं, भड़ास सदा आपके साथ है। प्लीज, आप लिखना जारी रखें।
जय भड़ास
यशवंत
24.2.08
मसिजीवी को ऐसा लगता है...
((मसिजीवी जी, मैं कभी छुप के वार नही करता और न इस खेल में मेरा यकीं हैं. जिस हिजडे मनीषा ने अपने ब्लॉग लांच की ख़बर भड़ास पे पोस्ट की है, मैं उन्हें नही जानता. जैसे ढेर सारे लोग ब्लॉग मेंबर हैं और मैं उन्हें नही जानता, उसी तरह मनीषा को भी मैं नही जानता. मैं मनीषा से, वो जो भी हैं, जहाँ की भी हैं, अपील करना चाहूँगा की वो अगर वाकई हिजडा हैं और उन्होंने अपना ब्लॉग बनाया है तो वो अपनी पहचान साबित करने के वास्ते प्रमाण पेश करें जिससे मसीजिवी का शक दूर किया जा सके और भड़ास पर लगा संगीन आरोप दूर किया जा सके. ये प्रमाण मोबाइल नम्बर, तस्वीर, निवास का पता आदि हो सकता हैं. जय भड़ास, यशवंत))
मसिजीवी ने ये आरोप भड़ास पे मनीषा हिजडे की पोस्ट पे कमेन्ट के रूप में लिखकर लगाए हैं...
(मूल पोस्ट को आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं ...."हम हिजड़ों की तो सुनो")
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मित्रवर/मित्रगण
भड़ास पर कम टिप्पणियॉं करता हूँ इसलिए नहीं कि शुचितावादी हूँ (नारद के शुचिताकाल में ही जब भड़ास बच्चा था तब ही इसकी संभावनाओं को इंगित कर पूरी पोस्ट लिखी थी) पर कहना होगा कि ये पोस्ट बदमजा है- पोस्ट के इतिहास से अपरिचय नहीं है, मनीषा की राय भी पढ़ी थी आपकी उससे असहमति हो सकती है इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है पर असहमति के लिए इस तरीके के इस्तेमाल में केवल हिंसा है विचार नहीं है...व्यंग्य भी नहीं हे बस मुझे लगता है केवल विद्रूपता है। फिर आप बाकायदा भड़ासी हैं तब क्यों मनीषा (जिस भी लैंगिकता के साथ) नई आईडी बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। बेनाम होने के अधिकार का हम सम्मान करते हैं पर इस तरह अपमानित करने के प्रयास के लिए इसका प्रयोग हो इसके हामी नहीं।
एक सवाल यशवंत से भी, मित्र इस तरह एक नए भड़ासी आईडी को और जोड़ दिया गया..आप दो सौ पचास से इक्यावन गिने जाएंगे :)) क्या सच की संख्या कैसे पता चले ? :))
Posted by masijeevi to भड़ास at 23/2/08 7:26 PM
