इस बार मथुरा वृंदावन की यात्रा अपनी कार से की। एक मित्र के साथ। सूंय सूंय करते हुए 120 की स्पीड में। रास्ते में रुकते, खाते, चबाते, गाल बजाते....पता ही नहीं चला कब पहुंच गए। दो दिन बाद वहां से आज दिल्ली पहुंचा तो नोएडा, सेक्टर 12-22 के पास रूका। यहां मेट्रो हर्ट हास्पिटल है, बगल में दारू शाप है, थोड़ी दूर पर आंटी की मशहूर नानवेज शाप है, बड़ा सा पार्क है, पराठे वाली की लजीज दुकान है....माने यह जगह मेरी प्रिय जगहों में से एक है। मयूर विहार फेज थ्री वाले अपने घर से निकलने के बाद दाएं बाएं कहीं निकलने का मन होता है तो इसी अड्डे पर पहले पहुंचता हूं। सुबह के वक्त पहुंचने पर लजीज पराठे खाने के बाद पार्क में देह सीधा कर लेटने में बड़ा आनंद आता है। यहां ढेर सारे लोग सोते व गपियाते मिल जाएंगे।
आज जब दिल्ली पहुंचे तो घऱ पहुंचने से पहले इसी अड्डे पर रुका। पराठे खाया। पान खाया। पार्क में थोड़ी देर के लिए बैठ लिया। गपियाने बतियाने के बाद जब चलने को हुए तो फिर पान खाने के लिए दुकान पर रुके। बगल में हिजड़े साथियों की हलचल दिखाई दी। कोई आ रहा है तो कोई जा रहा है। मेरी उत्सुकता बढ़ी। दाएं बाएं नजर दौड़ाने पर पता चला कि दो गाड़ियां फुल हैं इन साथियों से। दोनों गाड़ियों में एक एक ढोलक। साड़ी और सलवार सूट पहने इन हिजड़ा साथियों को देखते हुए पहले तो डा. रूपेश श्रीवास्तव की शिष्या मनीषा याद आईं जिन्हें आजकल डाक्टर साहब ब्लागिंग सिखा रहे हैं। फिर मुझे वो शब्द याद आया जिसे डा. रूपेश इन लोगों के लिए यूज करते हैं, लैंगिक विकलांग। यह शब्द वाकई सही शब्द है जो इनकी स्थिति को हू ब हू अभिव्यक्त करता है।
पर यह क्या? इन दोनों गाड़ियों पर तो प्रेस लिखा है !! कहीं ये हिजड़े प्रेस वाले तो नहीं....?? या कहीं प्रेस वाले हिजड़े तो नहीं हो गए ?? माजरा क्या है ?? मैंने अपनी उत्सुकता अपने साथी को बताई तो उन्होंने मेरी बात पर हंस दिया। बोले, बड़ा जोरदार है यह वाक्य....कहीं प्रेस वाले हिजड़े तो नहीं, कहीं हिजड़े प्रेस वाले तो नहीं ??
कुछ यूं भी कहा जा सकता है....प्रेस की जो हालत है भइया, उसमें तो अब हिजड़े भी प्रेस वाले बन गए हैं...या प्रेस की हालत ये है कि प्रेस के काम के लिए हिजड़े भर्ती किए जा रहे हैं....या प्रेस इतना आसान है कि अब हिजड़े भी प्रेस में घुस जा रहे हैं....
ढेर सारे कुतर्क गढ़े जा सकते हैं लेकिन एक बात तो सच है कि प्रेस शब्द का गाड़ियों पर जिस कदर गैर प्रेस वाले लोग इस्तेमाल करते हैं, वो सरासर गलत है। सिर्फ इसलिए कि पुलिस वाले रोकेंगे नहीं, ट्रैफिक वाले टोकेंगे नहीं, चोर-उचक्के झांकेंगे नहीं, इस कारण हर कोई प्रेस लिखा लेता है गाड़ी पर।
मेरे साथ थोड़ा उलटा रहा है। 12 वर्ष के पत्रकारीय जीवन में कभी अपनी गाड़ी पर प्रेस नहीं लिखवाया। कभी एकाध बार स्टीकर चिपकवा लिया हो, चुनाव या दंगे के समय तो अलग बात है वरना पता नहीं क्यों प्रेस लिखवाना कभी पसंद नहीं आया। इसके पीछे एकमात्र वजह शायद यही है कि असली प्रेस कर्मी को कभी अपनी पहचान बताने के लिए प्रेस कार्ड नहीं दिखाना पड़ता और प्रेस शब्द नहीं लिखाना पड़ता। पत्रकारिता अगर आपकी आत्मा और देह में हैं तो वो आपके चेहरे व शब्दों व बोली से भी टपकती है, दिखती है।
खैर, माफ करना, अगर किसी को हिजड़े व प्रेस में तुलना करने पर बुरा लगा हो क्योंकि ये तुलना करने का मामला नहीं बल्कि प्रेस शब्द के दुरुपयोग का मामला है।
वैसे मेरे दिल से पूछेगे तो यही कहूंगा कि हिजड़े जितने इमानदार व साहसी होते हैं, प्रेस में 90 फीसदी से ज्यादा लोग उस लेवल के नहीं होंगे। बोले तो अगर प्रेस वाले हिजड़ों जितना मिशनरी, साहसी व इमानदार व दमदार हो जाएं तो प्रेस का कल्याण हो जाए। पर यहां तो तेलुओं, चमचों, क्लर्कों, चारणों, भाटों, बलात्कारियों, व्यभिचारियों, बौद्धिक दिवालियों, दलालों, अशिक्षितों, छिछोरों, बेवकूफों... का ही जमावड़ा है जो प्रेस के नाम पर हर वो गलत काम कर रहे हैं जो प्रेस वाले को न करने के लिए कहा गया है, बताया गया है, समझाया गया है।
लगे रहो .....
जय भड़ास
यशवंत
28.2.08
हिजड़े प्रेस में हैं या प्रेस वाले हिजड़े हैं ???
25.2.08
मसिजीवी जी माफ करें !!!
मसिजीवी जी ने जो आरोप लगाया था, उसमें एक सीधा सरल सवाल था कि क्या मनीषा हिजड़ा व मनीषा पांडेय दो अलग अलग शख्सीयतें हैं या मनीषा पांडेय को बदनाम करने के लिए मनीषा हिजड़ा नामक कोई काल्पनिक चरित्र भड़ासियों ने यशवंत सिंह के नेतृत्व में गढ़ लिया?
और, अगर किसी को भी इस दुर्योग के कारण शक होता है तो उसे सवाल पूछना ही चाहिए। मसिजीवी जी ने वही किया। मैं उनकी तारीफ करता हूं जो उन्होंने अपने मन में पैदा हुए भ्रम को भड़ास पर आकर खुद अपने नाम से एक टिप्पणी करके पूछ लिया। मैंने उसी क्रम में ये अनुरोध किया कि भई, मसिजीवी जी को अपनी भड़ासी साथी मनीषा हिजड़ा की वास्तविकता सत्यापित करा दीजिये।
साथी मनीषा हिजड़ा ने अपनी पोस्ट लिखकर जो बात कही है उससे उनकी सत्यता स्थापित होती है या नहीं, ये तो मसिजीवी जी बतायेंगे। जहां तक मुझे पता है, आदरणीय डा. रूपेश जी का जो बहुआयामी कार्यक्षेत्र व सामाजिक सरोकार हैं, उसमें कई ऐसे हिजड़े साथी भी उनके दोस्त हैं, शिष्य हैं जिनकी दिक्कतों के लिए डा. रूपेश लड़ते रहते हैं। इन साथियों की दिक्कतों को समझ सकने वाले डा. रूपेश ने मनीषा हिजड़ा को सजेस्ट किया कि वो ब्लाग के जरिए अपने समुदाय की दिक्कतों, दुविधाओं, सुख-दुख को बाकी दुनिया तक पहुंचाये। इसके लिए मनीषा राजी हुईं तो डाक्टर साहब ने ब्लाग बनवाने में उनकी बखूबी मदद की और मुझे सूचित भी किया। उनकी शुरुवाती पोस्टें इस बात का प्रमाण हैं कि मनीषा का जिक्र वे उस समय से भड़ास पर करते रहे हैं जब मनीषा पांडेय विवाद शुरू भी नहीं हुआ था। मसिजीवी जी को थोड़ी गलफहमी हुई थी, पर उन्होंने साफ दिल से पूछ लिया, इसके लिए मैं उन्हें वाकई बहादुर और नेक दिल इंसान मानूंगा।
सोचिए, मसिजीवी जी अपना सवाल अनाम बनकर भी कर सकते थे, जैसा कि ढेर सारे कायर लोग ब्लागिंग में करते हैं। वे किसी और अनाम आईडी से अपना सवाल उठा सकते थे। वे अपने ब्लाग पर ही भड़ास व मुझे गरियाते हुए इस मनीषा नाम से हुई दुविधा को सच मानते हुए लिख सकते थे। पर उन्होंने शराफत का परचिय दिया। भड़ास पर आकर अपने नाम से ही उन्होंने अपनी शंका का इजहार कर दिया।
पर उन्हें भड़ासी साथियों ने जिस तरह उत्तर दिया है, उससे मुझे दुख पहुंचा है। भई, हम भड़ासी वाकई लंठ लोग हैं जो किसी को भी किसी बात पर गरिया देते हैं, उसकी ऐसी तैसी कर देते हैं? कहीं हम लोगों की छवि ब्लागिंग के बाहुबल वाले लोगों की जो बन रही है, उसके पीछे यही वजह तो नहीं है? क्या हम सवाल करने वाले को दुश्मन मानने लगते हैं? क्या हम लोकतांत्रिक देश में रहते हुए अपने सामंती व्यक्तित्व को नहीं बदल पाये हैं (जो कि मेरे अंदर भी है) और किसी के सवाल करने को अपना अपमान मान लेते हैं (ऐसा मेरे अंदर भी है)? हम अपने दिमाग का डेमोक्रेटाइजेशन करने में अक्षम रहे हैं लेकिन क्या हम हिंदी वाले इसके लिए कोशिश नहीं कर सकते? अगर कोई आलोचना करता है या उंगली उठाता है तो उसे पराया या दुश्मन मानने के बजाय निंदक नियरे राखिए वाली लाइन को याद करते हुए सम्मान नहीं दे सकते हैं?
इन सवालों का जवाब मैं खुद से तलाश रहा हूं। इसके पीछे वजह सिर्फ इतना भर है कि मसिजीवी जी के बारे में मैं जितना जानता हूं उतना उन्हें एक अच्छा व नेक इंसान कहने के लिए पर्याप्त है। वे अपनी सोच, अपने व्यक्तित्व व अपने रहन सहन में वाकई एक सहज सरल व लोकतांत्रिक शख्सीयत हैं। उन्होंने हमेशा गलत चीजों का खुलकर विरोध किया है, और इसी तेवर के चलते उन्होंने जो भी चीज महसूस किया, उसे आकर भड़ास पर कहा। यह बहस अलग है कि उन्होंने जो समझा वह उचित था या अनुचित।
मैं अपने भड़ासी साथियों के तरफ से मसिजीवी जी से इस बात के लिए माफी मांगता हूं कि अगर उन्हें मनीषा हिजड़ा व मनीषा पांडेय नाम के साम्य के कारण उठाए गए उनके सवाल के बाद भड़ास पर अगर साथियों के लेखों-टिप्पणियों से किसी प्रकार का दुख पहुंचा हो तो वे हमें नासमझ मानकर माफ कर दें।
दरअसल भड़ासी साथी दिल के सच्चे हैं इसलिए वे अक्सर भावुक हो जाया करते हैं। यह भावुकता ही है जो हमें जिलाए और बचाए हुए है वरना बौद्धिकता का रास्ता कहां लेकर इस देश व समाज को गया है, यह हम सब देख रहे हैं। हम बौद्धिकता के विरोधी नहीं हैं पर हम सहज बौद्धिकता चाहते हैं, हम व्यावहारिक बौद्धिकता चाहते हैं, हम वैज्ञानिक बौद्धिकता चाहते हैं। हम कतई हिप्पोक्रेसी नहीं चाहते। हम ट्रांसपैरेंसी चाहते हैं और ट्रांसपैरेंसी जीते भी हैं।
उम्मीद है, इस पोस्ट के बाद सभी भड़ासी मसिजीवी जी को सवाल उठाने के लिए थैंक्यू कहते हुए उनसे भड़ास के प्रति अपने स्नेह के यथावत कायम रखने का अनुरोध करेंगे।
डा. रुपेश जी से अनुरोध करूंगा कि डाक्टर साहब अपने जो कुछ लिखा है, कहा है, मैं उसके पीछे के दर्द व भावना को समझ सकता हूं। आप भड़ास के माडरेटर हैं, इसलिए आप जो भी कहेंगे, लिखेंगे, उस हम भड़ासी सिर माथे रखेंगे पर हम लोग भी अपनी राय इसी मंच पर रखते रहेंगे। जाहिर सी बात है, हमारे आप में लोगों को असहमतियां दिखेंगी पर रास्ते अलग अलग होने के बावजूद हम नदियों की मंजिल तो वही सागर ही है ना, जहां वो पहुंचती हैं और जहां हमें भी पहुंचना है।
और आखिर में साथी मनीषा हिजड़ा से, आप बिलकुल हतोत्साहित न हों। ये जो शुरुवाती मुश्किलें होती हैं, वो हमें अंदर से मजबूत करती हैं और लंबे सफर के लायक बनाती हैं सो आप अपना काम जारी रखें। मसिजीवी जी सदा आपके साथ हैं, भड़ास सदा आपके साथ है। प्लीज, आप लिखना जारी रखें।
जय भड़ास
यशवंत
