Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

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15.3.11

अंडमान में भी महिला सशक्तिकरण को लेकर गूंजी आवाज़

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (8 मार्च) पर पोर्टब्लेयर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारम्भ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाए एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने दीप जलाकर किया। श्री यादव ने अपने उदबोधन में कहा कि - ‘‘नारी ही सृजन का आधार है और इसके विभिन्न रूपों को पहचानने की जरूरत है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस इस तथ्य को उजागर करता है कि विश्व शान्ति और सामाजिक प्रगति को कायम रखने तथा मानवाधिकार और मूलभूत स्वतंत्रता को पूर्णरूप से हासिल करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, समानता और उनके विकास के साथ-साथ महिलाओं के योगदान को मान्यता प्रदान करना भी अपेक्षित है।‘‘ संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं युवा लेखिका सुश्री आकांक्षा यादव ने महिला सशक्तीकरण को सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार बताया। बदलते परिवेश में समाज में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं आज राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, मीडिया, कला, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, ब्लागिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं।
पोर्टब्लेयर प्रधान डाकघर की पोस्टमास्टर श्रीमती एम. मरियाकुट्टी ने कहा कि-'' संविधान में महिला सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान हैं पर दूरदराज और ग्रामीण स्तर तक भी लोगों को उनके बारे में जागरुक करने की जरूरत है। सुश्री सुप्रभा ने इस अवसर पर नारी की भूमिका के अवमूल्यन के लिए विज्ञापनों और चन्द फिल्मों को दोषी ठहराया जो नारी को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सुश्री शांता देब ने कहा कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ भगवान वास करते हैं, फिर भी नारी के प्रति समाज का रवैया दोयम है। सुश्री जयरानी ने उन महिलाओं पर प्रकाश डाला जो उपेक्षा के बावजूद समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुईं। इसके अलावा अन्य तमाम लोगों ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन जयरानी ने किया और आभार शांता देब ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में तमाम महिलाएं और प्रबुद्ध-जन उपस्थिति रहे।

24.6.09

सुनो तो मेरी भी......!

हे मर्द, तुमने क्या कहा?
ज़रा दुहराना तो
तुमने कहा- हम औरतें, कोमल हैं,
कमज़ोर हैं!
लाचार हैं साथ तुम्हारे चलने को,
हमारा कोई अस्तित्व नहीं है
बगैर तुम्हारे!

तुम्हारी इन बातों पर,
बचकानी सोच पर,
जी करता है खूब हँसू…….!

सोचती हूँ, कैसे बोलते हो तुम ये सब?
कहीं तुम्हे घमण्ड तो नही
अपनी इस लम्बी कद-काठी का,
चौड़ी छाती का जहाँ कुछ बाल उग आए हैं….!

सच में, अगर घमण्ड है तुम्हें
इन बातो का तो ज़रा सुनो मेरी भी-
तुम मर्दो का आज अस्तित्व है
क्योंकि
किसी औरत ने पाला है
तुम्हे नौ महीने अपने पेट मे !

लम्बी कद-काठी है
क्योंकि
तुम्हारी कुशलता के लिए
प्रयासरत रही है
कोई औरत हमेशा !

छाती चौडी है
क्योंकि
पिलाई है किसी औरत तुम्हे छाती अपनी !

अब सोचो,
फिर बोलो,
कौन लाचार है ?
किसका अस्तित्व नहीं, किसके बगैर?


-विकास कुमार

13.6.08

तुम्हारे शहर में कोई मइयत को कांधा नहीं देता, हमारे गांव में छप्पर भी मिलकर उठाते हैं।।

भाई यशवंत जी,

भड़ास में किन्हीं नीलोफर की पोस्ट को लेकर बड़ी चर्चाएं हैं। बड़ी अच्छी बहस करती हैं नीलोफर। मैने उनकी पोस्ट पढ़ी। नीलोफर की दिक्कत यह है कि वह जिस्म से बाहर खड़ी नहीं हो पाती। वह शुचिता की आग्रही हैं तमाम नकारों के साथ। यही है वह चीज जो उनकी परिधि तय करता है। इस परिधि से बाहर नीलोफर झांकना नहीं चाहती। इस मामले में उन्हें साहसी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि नीलोफर जिस परिवेश में पली बढ़ी हो वहां संबोधनों के कुछ अन्य मायने भी हों लेकिन हमारे गांव में तो कोई भी चलन संबंधहीन होता ही नहीं है। कह सकते हैं-

तुम्हारे शहर में कोई मइयत को कांधा नहीं देता
हमारे गांव में छप्पर भी मिलकर उठाते हैं।।


नीलोफर की दुनिया अपने इर्द-गिर्द ही नाचती है (कम से कम उनकी पोस्ट से यही लगता है)वह इस दुनिया में किसी के प्रवेश को लेकर दुराग्रही है। एक खिड़की है अधखुली, देखने की जुगुप्सा, हवा के झोंको से कांपती। अब खिड़की वह भी अधखुली आखिर कितना फलक दिखाई देगा और कितनी रोशनी सिमेटेगी यह खिड़की। शायद एक कमरा भी रोशन न हो सके। लेकिन शरीर, शरीर तो इतना नहीं। उसे नहाना है, हर पल हर क्षण नई रोशनी से। यह काम अधखुली खिड़की से कैसे होगा। यह खिड़की भी अधखुली क्यों। खिड़की है पूरा खुल सकती है, पूरा खुलने को ही होती है खिड़की। अल्प का भी अल्प क्या। जो अल्प है दरवाजे का उससे भी कम। फिर खिड़की को भी समझना चाहिए-

हवा के हाथ खाली हो चुके हैं
यहां हर पेड़ नंगा हो चुका है।।


तो फिर नंगों के शहर में नंगेपन को अशलील कैसे कहा जा सकता है। वह तो शलील ही कहलाएगा। नंगे रहकर शालीनता का ढोंग सब कर रहे हैं। नीलोफर भी शुचिता का पैमाना लेकर इस नंगपन को नापने की दौड़ में शामिल हैं। उनकी यह कोशिश उस परिंदे की याद दिलाती है जो पेड़ के गिरने पर भी उसकी शाख से लिपटा रहता है।
अच्छी लगे तो पोस्ट कर देना। धन्यवाद

--
jadon
(भड़ास को मिली एक मेल)

5.4.08

पत्रकार मनीषा पांडेय,मैं अर्धसत्य नामक ब्लाग की माडरेटर मनीषा नारायण हूं

"ब्लागर और पत्रकार मनीषा पांडेय ने वेबदुनिया डाट काम को टाटा बायबाय कह दिया है। उन्होंने दैनिक भास्कर से खुद को जोड़ लिया है। वे भोपाल में अपना नया काम एक अप्रैल को संभाल लेंगी। मनीषा चर्चित ब्लाग बेदखल की डायरी की माडरेटर हैं। उन्होंने वेब दुनिया में हिंदी ब्लागिंग को लेकर काफी कुछ काम किया है। मनीषा की नई नौकरी पर भड़ास की तरफ से ढेरों शुभकामनाएं।"

आज कई दिन बाद जबसे यशवंत दादा वापिस गये हैं तबसे अब तक मैं अपने भाई डा.रूपेश के घर आने का समय नहीं निकाल पायी थी। आज मीडिया रिलेटेड इन्फ़ार्मेशन वाली पट्टी पर इस खबर को देख कर एक बार फिर से मन में कुछ टीस सी उभर आयी। मुझे याद है कि मेरे और मनीषा पांडेय के नाम एक जैसे होने के कारण कितना विवाद हुआ था। यशवंत दादा ने बिना शर्त माफ़ी मांगी, मैंने भी भाई के कहने पर इससे माफ़ी मांगी कि आपको मेरा नाम मनीषा होने पर दुःख हुआ इसके लिये माफ़ करें, इस लड़की ने मेरे भाई को फोन करके कानूनी तिकड़मों की धमकी दी लेकिन भाई ने इसे अपने ही अंदाज़ में हंस कर सहन कर लिया। मैं भी उस घटना को भूलने की कोशिश कर ही रही थी कि एक बार फिर इसका नाम भड़ास पर दिखा तो लगा कि किसी ने ज़ख्म में उंगली डाल कर कुरेद दिया हो। हिन्दी के लिये बहुत कुछ किया होगा इस लड़की ने पर इसने एक बार भी यह नहीं माना आज तक कि जो कुछ भी इसने किया था वो एक गलतफहमी के चलते हुआ या इसने जो लोगों का दिल दुखाया उसके लिये इसे जरा भी शर्मिंदगी हुई है। मन में पीड़ा एक बार फिर से उभर आयी है कि इस लड़की को एकबार तो कम से कम कह दूं कि तुमने जो किया था वो गलत और पीड़ादायक था,तुम्हारे साथ लोगों की सहानुभूति इसलिये चिपक जाती है क्योंकि तुम एक स्त्री हो और मेरा तिरस्कार इस लिये कर दिया जाता रहा है क्योंकि मैं एक लैंगिक विकलांग हूं,हिजड़ा हूं। मुझे घिन आती है तुम्हारे जैसी सोच से चाहे तुम कितने भी बड़े सामाजिक कद के क्यों न हो तुम्हारी सोच का बौनापन हम सबने देखा है, अगर सचमुच पत्रकारिता करती हो या सुलझी सोच का एक अंश भी है आत्मा के किसी कोने में आज भी जीवित तो मुझसे आकर मिलो और एहसास करो अपनी गलती का।

जय भड़ास

6.3.08

मनुष्य मूलतः एक पशु है, स्त्री इनकार करने की स्थिति में नहीं होती??

((भड़ास की साथिन मुनव्वर सुल्ताना ने अपनी एक बेहद बोल्ड पोस्ट पेट और पेट से नीचे की ही... में महिला पुरुष की सेक्सुवल्टी पर कुछ अजीब पर तार्किक किस्म के सवाल उठाए हैं। और वे सवाल सामान्य या सतही नहीं बल्कि एक नई सोच, एक नई बहस, एक नई दृष्ठि को जन्म देने वाले हैं। पोस्ट तक तो ठीक, उस पर जो कमेंट आए हैं वो और भी ज्ञानवर्धक निकले। खासकर क्विन नामक किसी अनाम सज्जन या सज्जना की टिप्पणी। मुनव्वर जी की पोस्ट पर आईं टिप्पणियों को एक पोस्ट की शक्ल दे रहा हूं ताकि इस गंभीर लेकिन बेहद नाजुक विषय पर सारे भड़ासी ज्ञान प्राप्त कर सकें। हां, एक अनुरोध है कि अगर इस टापिक पर किसी को कुछ ज्ञान हो तभी वो इसमें नाक घुसेड़े, खामखा ज्ञान पेलने या बघारने न कूद पड़े और यूं ही राह चलते, कुछ कहने के लिए कहने को कुछ भी कमेंट न टिपिया दे। भई, मैं अपनी स्थिति का अभी से बयान कर सकता हूं कि इस नाजुक मसले पर मेरा अपना कोई सैद्धांतिक ज्ञान नहीं है, जो व्यावहारिक ज्ञान है उसका सार यही है कि शायद मैंने अपने स्वार्थ को ज्यादा वरीयता दी, दूसरे पक्ष की दिक्कतों को समझने की कोशिश कम की। कई बार इसके उलट रहा, दूसरे पक्ष की दिक्कतों को सिर माथे पर रखा और अपनी भावनाओं पर काबू करा। कैसे करा, ये भी बात देता हूं। ज्यादातर बार अपना हाथ जगन्नाथ के नारे पर अमल करते हुए, और कुछ बार ग़म भरे गाने सुनते हुए। वैसे मानवीय स्वभाव भी यही है, मजा भी यही है कि कभी अपने सुख के लिए दूसरे को दुख में होते हुए भी राजी कर लो और कभी खुद के दुख में होते हुए भी दूसरे के सुख की खातिर हंसते हंसते न्योछावर हो जाओ। वैसे, अपन का तो हिसाब रहा कि भइया, चलो मनाता हूं, अगर मान गए तो ठीक, न माने तो बिस्तरा अलग-अलग कमरे में लगा लेते हैं, न उठेगा धुआं, न लगेगी आग....वैसे, मैंने ज्यादा न बोलने की ठानी है क्योंकि मैं बोलूंगा तो ढेर सारे भाई लोग बोलेगा कि मैं बोलता हूं..:) वैसे, आप भी अपनी राय रखिएगा जरूर....जय भड़ास, यशवंत))

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डा०रूपेश श्रीवास्तव has left a new comment on your post "पेट और पेट से नीचे की ही ........":

मुनव्वर आपा,आपने तो खुदा को भी भड़ास के दायरे में ला दिया । भड़ास पर और पता नहीं क्या-क्या होना बचा है.....
जय जय भड़ास
Posted by डा०रूपेश श्रीवास्तव to भड़ास at 5/3/08 10:00 PM

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quin has left a new comment on your post "पेट और पेट से नीचे की ही ........":
और एक बात......... अगर जनता मैथुनोदरपरायण हैं तो उसे ऐसे ही रह्ने दो........ पुरुशों में पाये जाने वाले हारमोन खासकर टेस्टास्टोरोन ही उन्हे आक्रामक बनाता है...... इस हारमोन के प्रभावों को कम करने का सबसे सरल रास्ता मैथुन ही है....... अगर इनकी गर्मी मष्तिष्क में रह जाए तो आदमी औरों को मारता है, तरह तरह की खुफ़ारातें करता है......... अगर ज़रा तेज़ दिमाग हुआ तो विनाश के हथियार बनाता है या उन्हे इस्तेमाल करता है....... फ़ौजियों को दमित यूं ही नहिं रखा जाता..... यकीन ना आये तो किसी भी दिमाग के डॅक्टर या मनोवैग्यानिक से पूछ लें........ सड़ने दो लोगों को इस नर्क में अगर इससे हटा लिया तो अभी जितनी शान्ती धरती पर बची हुई है उसे भि ये लोग बचने नहिं देन्गे..... ये हारमोन काफ़ी खतरनाक है और सारे फ़साद की जड़ भी
Posted by quin to भड़ास at 6/3/08 12:14 AM

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quin has left a new comment on your post "पेट और पेट से नीचे की ही ........":
आयुर्वेद तो नहिं मालूम पर विग्यान तो यहि केह्ता है कि पेनेट्रेशन से गर्भ को हानि हो सकति है........ और यह भि सही है कि अधिकतर लोग ८-९ महीने तो क्या एक सप्ताह ब्रम्ह्च्र्य धारण नहिं कर सकते, उनका मस्तिष्क उसे नहिं करने देगा....... वैसे एन्डोक्राइन ज़्यादा सक्रीय होने की बात मेडीकल साइंस का स्थापित सत्य है......... मनोविग्यान की इस बात को हमें अब मान ही लेना चाहिये कि मनुश्य मूलतः एक पशु ही है। और स्त्री इन्कार करने की स्थिती में नहिं होती (अगर वो इन्कार करे तो मर्द का सिस्टम कहिं और सुख तलाशेगा)। यह स्थिती कमाऊ/ग्रहिणी दोनों तरह कि स्त्रीयों को असुरक्षा में डाल सकता है। पुरुष जो भी गलत करता है उसमें उसकी साज़िश कम और उसके endocrine system ;mainly testosterone and androgen का दोष ज़्यादा है। अगर कभी समय मिले तो अपने मनुष्य के श्रेश्ठ होने के सनस्कार को एक तरफ़ रख नीचे लिखी किताबें पढ़ें आप दुबारा पह्ले की तरह नहीं सोचेंगी
1. Men Are From Mars Women Are From Venus-------- John Gray
2. The naked ape------ Desmond Morris
3. Why men dont listen and women cant read maps------ Allen and Barbara pease
4. The human zoo-------- Desmond Morris
5. The naked woman------ Desmond morris

Note: Desmond Morris' books have been banned in some islamic/catholic nations for their provocative rationalism and strong feminist theme.
Posted by quin to भड़ास at 5/3/08 4:54 PM

आप उपरोक्त बातों से सहमत हैं?

2.3.08

दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं, दुश्मनों का भी मान रखते हैं...डा. सुभाष भदौरिया

[भड़ास] New comment on लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो....

डॉ.सुभाष भदौरिया. has left a new comment on your post "लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो...":

यशवंत सिंह जी
आपने आदरणीया मनीषाजी से माफी माँगकर बहुत ही नेक काम किया है.रंगेसियारों को वे पहिचानने की नज़र रखती हैं.उनके दोगलेपन को उन्होंने खुद उजागर किया है.
देर अबेर वे हम पापियों को भी पहिचानेंगी.
आमीन.
अन्य आदरणीय मनीषाजी से मैं माफी मांग रहा हूँ कि उनके दिल को ठेस लगी होगी. साथ में डॉ.रूपेशजी से जो एक गंभीर समस्या की ओर इंगित कर रहे हैं.पर उन पर शंका कर पूरे मामले को कहाँ से कहाँ ले जाया गया.
उनके पीछे आड़ लेकर वार करने वाले मठाधीशों कठमुल्लों के फ़तवों की हमें परवाह नहीं है.
आ गये कमज़र्फ कंधा ले के आँसू पोछने.
लाइन लग गई यार ढोंगियों की फाइर काल के नाम पर.
अपनी एक ग़ज़ल के कुछ अशआर अपने तमाम भड़ासी दोस्तों को नज़र कर रहा हूँ.


ग़ज़ल

जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आनबान रखते है.

शब्द भेदी हैं हम को पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.

दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.

जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.

वैसे तो हम जमी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखतें हैं.

ग़ालिबो मीर के हैं हम वारिस,
अपने शेरों में जान रखते है.

जय भड़ास.


Posted by डॉ.सुभाष भदौरिया. to भड़ास at 2/3/08 7:15 PM

लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरों, भड़ासियों, साथियों, मनीषा पांडेय जी के लिए संदेश

और ये रहा ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे का पहला पार्ट
ब्लागिंग के मठाधीश और उनके चिलांडुओं को लगा था कि वो एक साथ भौंकना शुरू करेंगे और भड़ासी डर कर उनके शरण में आ जाएंगे, त्राहिमाम करते हुए। पर हुआ उल्टा इन कुत्तों को न सिर्फ खदेड़ा गया बल्कि बताया भी गया कि दरअसल तुम लोग जिस हिप्पोक्रेसी के जरिए दुनिया को चूतिया बनाए हो और अपने को प्रगतिशीलता का पितामह साबित कर रहे हो, वो दरअसल विचार व व्यवहार का दोगलापन था, जिसे ढेर सारे दिन तुम ढंकने मे सफल रहे लेकिन भड़ास ने इसे उजागर कर दिया। इसी के चलते बजाय भड़ास का नुकसान होने के, ब्लागिंग के मठाधीश का मोहल्ला ही दरक गया। वहां भगदड़ मची हुई है। वो सदमें में है। हर बार का सफल दांव अब उसी को नष्ठ करने पर तुला हुआ है। उसे अब अपनी शक्ल भी छिपाने में मुश्किल हो रही है।

मठाधीश ने तो पहले तानाशाह की तरह फरमान जारी किया और चिलांडुओं से भी कहा कि वो भी फरमान का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटें...भड़ास बंद करो का। लेकिन जब उनके उखाड़े कुछ नहीं उखड़ा, बल्कि भड़ासियों ने उनकी झांटें नोचना शुरू कर दिया तो मठाधीश ने अपना पुराना कूटनीतिक दांव खेला, बिलो द बेल्ट प्रहार का खेल शुरू किया, जिसे वो हमेशा खेला करता है। पर हम इससे डरे नहीं, झुके नहीं, रोये नहीं, गिड़गिड़ाये नहीं.....इसके जवाब में भड़ास ने मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलने की शुरुवात की है। हमें मरना पसंद है, झुकना व रिरियाना नहीं। इसी क्रम में तमाम विरोधों के बावजूद आज दो मार्च से ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलना शुरू कर रहा हूं।

मैं जानता हूं कि तमाम वरिष्ठ ब्लागरों और भड़ासियों को मेरे द्वारा विवाद को खींचा जाना नागवार गुजरेगा लेकिन उनसे मैं करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूं कि वो बस इस पहले पार्ट को मुझे लिख लेने दें, जिसे अंतिम पार्ट मैं मान लूंगा और मैं अपनी तरफ से इस पूरे चैप्टर को क्लोज कर दूंगा, ये मेरा वादा है। भले ही इसके बाद मठाधीश और चिलांडु शाब्दिक लफ्फाजियों और हिप्पोक्रेसी के जरिए अपनी जीत की दुहाई देते हुए राग दरबारी गाएं और दुनियां को अपनी जीत का जश्न दिखाएं लेकिन वो अपनी आत्मा के आइने में झांकेंगे तो उन्हें सच दिखाई देगा।

सो ये जो पहला पार्ट लिख रहा हूं, उसे अंतिम पार्ट मानते हुए पढ़ें...
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ब्लागिंग का जो मठाधीश है, उसने अपने करियर के ग्रोथ के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा और प्रगतिशीलता का जिस तरह बेहतरीन इस्तेमाल किया है, उसका इस दौर का कोई दूसरा नमूना नहीं हो सकता है। इसके लिए रांची और पटना और दिल्ली के ढेर सारे पत्रकार साथियों, कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं और इसके मित्रों से बात की जा सकती है।

मेरे पास जो तथ्य मिले हैं, जो बातें बताईं गई हैं, जो मेल मिले हैं.....उसे मैं यहां जारी कर एक नई बहस को नहीं जन्म देना चाहूंगा लेकिन उसका लब्बोलुवाब यही है कि विचारधारा का अपनी तरक्की व उन्नति के लिए इस्तेमाल देखना हो तो मठाधीश का करयिर देखिए। जिस शख्स ने इसे कभी मदद की हो, इसने उसी की खाट खड़ी की। एक उदाहरण देना चाहूंगा। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी के संरक्षण में इस शख्स ने करियर की उंचाइयां पाईं लेकिन जब एक न्यूज चैनल को ज्वाइन कर लिया तो उसने एक मैग्जीन में लेख लिखकर हरिवंश जी को जाने क्या क्या नहीं कहा। अरे भाई, थोड़ी तो कृतज्ञता होनी चाहिए दिल मे या दिल्ली आकर ऐसे प्रोफेशनल हो गए हो कि सिवाय खुद को, कोई दिखता ही नहीं है। ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे।

इसी तरह प्रगतिशीलत व विचारधारा के नाम पर इसने ब्लागिंग में लोगों का इस्तेमाल किया, दुराव फैलाया और एक-एक कर सारे वरिष्ठ ब्लागरों से पहले दोस्ती की, सीखा और फिर जब काम निकल गया, उनका इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें किनारे लगाकर, ठिकाने लगाकर खुद को बढ़ाता चला गया।

आज मठाधीश को जानने वाले जितने भी ब्लागर हैं, उनमें से किसी एक से बात कीजिए, वो बतायेगा कि मठाधीश किस कदर तानाशाह और अलोकतांत्रिक शख्सीयत है जो विचारधारा को प्रोफेशनली इस्तेमाल कर ब्लागिंग में खुद की शख्सीयत बढ़ाता है। जो पसंद न आए, उसे नष्ट कर दो, उसे अलगाव में डाल दो, उसे अकेले में छोड़ दो, उसके करीब के लोगों को उससे काट दो, उसे कहीं तवज्जो न दो, उसके नामलेवा लोगों को धमका लो.......ये सारी बातें सभी को पता हैं। इन्हें एक-एक उदाहरण के जरिए भी समझाया जा सकता है लेकिन मैं इसे फिर कभी लिखूंगा, अगर जरूरत पड़ी तो।

ब्लागिंग के मठाधीश ने शायद इतिहास से सबक नहीं लिया कि जिसको भी यह गुमान हो गया कि वो ही सर्वोच्च और सबसे ज्यादा ताकतवर है, उसका यह घमंड उन सामान्य लोगों ने तोड़ दिया, जिसे वो अपने मुट्ठी में दबोचने लायक माना करते थे। तो इसी तरह से बिना समझे, बिना विचारे, बिना बहसियाये, बिना समझाए, बिना कहे, बिना विश्वास में लिए...एकाएक भड़ास को बंद करने का नेक विचार, नेक ऐलान ब्लागिंग के मठाधीश सर्वनाश ने चिलांडुओं के साथ किया, उससे उन्हें यह विश्वास था कि उनकी इतनी मजबूत सत्ता, गुट व ताकत के चलते भड़ास वाले भों भों करते हुए रोएंगे व उनके पैर पकड़कर माफी वाफी मांग लेंगे....

लेकिन मैं यह बताना चाहता हूं कि भड़ास ने न तुम सबको नंगा कर दिया है, बल्कि ब्लागिंग व पत्रकारिता जगत में घृणा के लायक बना दिया है, जिसके तुम लोग काबिल हो। और रही बात हम भड़ासियों को तो ये जान लो....

हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम बुरे लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम अच्छे हैं

हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम चूतिये हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम विद्वान हैं

हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम कुंठित लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम मोक्ष पाए हैं

हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम अपूर्ण लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम्हीं अंतिम सत्य हैं

हम भदेस, फ्रस्टेट, देसज, असफल लोगों के कंधे
कमजोर भले हों, पर इतने नहीं कि झुक जाएं
उनके सामने जो हर चीज को सही गलत होने के लिए
सार्टिफिकेट देते घूमते फिरते हैं, आईएसआई मार्का

तुम लोग तो सफल होने के लिए ही पैदा हुए थे,
छा जाने के लिए ही इस धरती पर जन्मे थे,
विजय करने के लिए ही राजधानी पहुंचे थे,
इतिहास बनाने के लिए जी रहे हो, कर रहे हो

पर हमने तो हमेशा इतनी बड़ी बड़ी बातों के आगे
खुद को तुच्छ, नीच, मलिन माना और
चुपचाप जीते रहे, नून तेल के लिए मरते रहे
हर शाम पीकर बकते रहे, बड़ बड़ बकते रहे
गाली वाली देकर, कुछ लिखकर, कुछ बोलकर
बताते रहे कि हम लोग, आप एलीट व सभ्य
लोगों के आगे बड़े बुरबक हैं, और प्लीज जीने दें हमें
अपने तरीके से, अपनी गंदगी में लोटते हुए, हंसते हुए, रोते हुए

पर आपको नहीं था यह मंजूर कि आपकी प्रसिद्धि की हवेलियों के आसपास
बसी रहे, बढ़ती रहे कोई मलिन बस्ती जहां असभ्य लोग
खाते हगते मूतते हंसते रोते जीते सोते एक ही कमरे में गुजार लेते हों जिंदगी

आपको तो चाहिए हर रोज उनसे जीने का करारनामा
जिसमें लिखा हो कि हम नीच लोग, सताए लोग
आप महान वैचारिक सभ्य लोगों को वचन देते हैं कि
हम हर रोज उठते हुए आपको नमन करेंगे, यहां जीने देने के लिए
और जब भी दिखेंगे आप, या आपकी तरफ से आएगी कोई हवा
हम सम्मान में उठ खड़े होंगे और सिर झुकाकर कहेंगे हुजूर हुजूर हुजूर

पर माफ करना मठाधीश, तु्म्हारे चिलांडुओं....
तुम ये भूल गए कि कई लोग डर डर के जीने से बेहतर
एक रोज मरना समझते हैं
और जो मर मर के जीने से इनकार कर दे तो वो
तुम्हारी अट्टालिकाओं में घुसकर अपने सिर से दीवारों को फोड़ सकता है
और तुम्हारे फौज फाटे बस यूं ही हल्ला करते हुए
दाएं बाएं कुछ सक्रिय दिखने की कोशिश भर करते रहेंगे

प्लीज, आगे से ध्यान रखना, गंदे लोगों को भी जीने का हक है माई लार्ड



(यह पहला और अंतिम पार्ट उन अनाम कमेंटों के जवाब में है, जो मठाधीश ने मेरे खिलाफ अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर रखे हैं, अगर उसी जैसे फिर अनाम कमेंट आए तो पहले पार्ट के आगे दूसरा पार्ट भी शुरू होगा, फिलहाल हिसाब बराबर कर लेने के कारण इस पहले पार्ट को ही अंतिम पार्ट घोषित करता हूं, हालांकि मठाधीश अभी हरकत से बाज नहीं आएगा और अपने पुराने पिट चुके दांव आजमाता रहेगा, रुक रुक कर चिंतनशील मुद्रा में जाने किस किस एंगिल से बौद्धिक बाजीगरी की पिपहिरी बजाता रहेगा, पर हम लोगों के पास और भी काम हैं भाया, सो इस मुद्दे को सलाम..........यशवंत)
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प्रकरण खत्म, साथ देने के लिए आप सभी साथियों का आभार
मैं इन्हीं गद्द और पद्द भरी बातों के साथ इस प्रकरण को समाप्त घोषित करता हूं। अपने भाई और कवि हरेप्रकाश उपाध्यय, डा. रूपेश श्रीवास्तव, मनीष राज, अंकित माथुर.....समेत सभी लोगों से इसलिए माफी चाहता हूं कि मैंने इस प्रकरण को लंबा खींचा, पर दोस्तों ये जरूरी था वरना हम लोग अब तक निगले जा चुके होते और बिना हमारा पक्ष सुने ही हमारे चरित्र पर अदालत से फैसला दिलाकर हमें फांसी पर लटकाया जा चुका होता। मैं निजी तौर पर वादा करता हूं कि मैं भड़ास पर खुद किसी पोस्ट में किसी महान ब्लागर का उल्लेख अब नहीं करूंगा और न ही किसी को अपना गुरु वुरु मानूंगा। हम लोग अपने दम पर लड़े भिड़े और आगे बढ़े लोग हैं जो अपनी मस्ती की धुन में पूरी टीम भावना के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं ताकि देसजपने की खुशबू या बदबू उन राजमहलों तक भी पहुंचे जहां हमारा जाना वर्जित है।
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भड़ासी अपने पोस्टों में दूसरे ब्लागरों का नाम न लें, किसी पर टिप्पणी न करें
मैं आप लोगों से भी अनुरोध करूंगा कि अब किसी पोस्ट में किसी ब्लाग का नाम, किसी ब्लागर का नाम जो भड़ास का मेंबर न हो, न लिया जाए। हम लोगों के लिए भड़ास निकालने के ढेर सारे बिंदु अभी बाकी है, क्यों खामखा किसी के मुंह लगा जाए। हर हम लोग अपनी रक्षा हर हालत में करेंगे, एकजुटता के साथ, यह वादा है। भड़ास को हम कई हिस्सों में बांट सकते हैं जैसा आर्थिक भड़ास, राजनीतिक भड़ास, सांस्कृतिक भड़ास, देसज भड़ास, शहरी भड़ास, व्यंग्य भड़ास, गुस्सा भड़ास....और आप पाएंगे कि हमने अभी कई सेक्शन पर कुछ लिखा ही नहीं।
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सीनियर ब्लागरों को विशेष आभार....
मैं अंत में उन ढेर सारे वरिष्ठ ब्लागरों को दिल से शुक्रिया कहता हूं जिन्होंने मुश्किल घड़ी में हम भड़ासियों का साथ दिया और हौसला बंधाया। मैं उन लोगों की सलाह पर ही इस विवाद को यहीं विराम देता हूं। साथी बोधिसत्व, अभय तिवारी, दिलीप मंडल, संजय तिवारी, मसिजीवी, अशोक पांडे, अरुण अरोरा, प्रमेंद्र प्रताप सिंह.....समेत ढेरों ऐसा ब्लागर साथी हैं जिनके लिखे, कहे से मैं प्रेरणा पाकर यह सारा झगड़ा खुद अपनी तरफ से खत्म कर रहा हूं।
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मनीषा पांडेय जी, हम भड़ासी बिना शर्त माफी मांगते हैं
मैं बेदखल की डायरी वाली मनीषा पांडेय से कहना चाहूंगा कि अगर हमारे बार-बार सफाई देने के बावजूद उन्हें यह लगा कि भड़ास ने उनकी भावनाओं को दुख पहुंचाया है, खिल्ली उड़ाई है, टारगेट कर लिखा है, बदनाम करने की साजिश की है....तो मैं बिना शर्त माफी मांगता हूं। हम लोगों की कभी ऐसी मंशा नहीं रही। हम स्त्रियों का सम्मान करते हैं और उनकी लड़ाई के साथ खुद को जोड़कर देखते हैं। ऐसे में हम किसी भी आम खास महिला साथी को टारगेट बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो कुछ सब हुआ वो गलफहमी व संवादहीनता के चलते हुआ। मैं इसी के साथ विश्वास दिलाता हूं कि भड़ास में जो कुछ छपा है, कहा गया है, उसके पीछे कतई आप नहीं थीं। आपके लिखे पर मुझे जो कुछ कहना था मैं उन्हीं दिनों एक पोस्ट के जरिए आपको संबोधित करते हुए आपके आरोपों के जवाब में कह दिया था। उसके बाद आपको टारगेट नहीं किया गया। यह दुर्योग था कि उन्हीं दिनों मुंबई के एक लैंगिक विकलांग साथी ने अपना ब्लाग शुरू किया और कुछ पोस्टें भड़ास पर भी डालनी शुरू कीं, और वो साथी ये काम डा. रूपेश के सहयोग से कर रहीं थीं। आपसे विवाद के बहुत पहले से मुंबई की उस लैंगिक विकलांग साथी के नाम का जिक्र डा. रूपेश अपनी पोस्टों में करते रहे हैं, ये बात हम लोगों ने कई बार कही है।

खैर, अब सफाई देने का वक्त नहीं है, और माफी मांगते समय सफाई देनी भी नहीं चाहिए। माफी के साथ कोई शर्त नहीं होती सो हम बिना शर्त माफी मांगते हैं और आपकी गरिमा का सम्मान करते हुए आपकी मेधा की भूरि भूरि तारीफ करते हैं। अब तो ये कहने का वक्त है कि अगर दिल में कोई मलाल हो तो, प्लीज... उसे निकाल दीजिए। आपके लिखे का मैं हमेशा कायल रहा हूं, और रहूंगा, वैचारिक मतभेद तो होते रहते हैं लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। उम्मीद है, भूल चूक लेनी देनी को माफ करते हुए आप मुझ अज्ञानी मूरख समेत सारे नासमझ भड़ासियों को भी क्षमा कर देंगी, जिनके मन में किसी के लिए कोई पाप नहीं होता है और जो होता है वो सबके सामने होता है। आपकी माफी के इंतजार में....यशवंत

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अंत में भड़ासियों के लिए संदेश
हे प्यारे भड़ासियों, अब मस्त रहिए, डटे रहिए, किसी दूसरे के ब्लाग को न देखिए। भड़ास पर आप लिखते रहिए, आपस में लड़ते रहिए, आपस में सुलह करते रहिए, हम खुद ही इतनी संख्या में हैं कि हमें लड़ने के लिए भड़ास के बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है लेकिन अगर बाहर से भड़ास को चुनौती मिलती है तो हम सब मिलकर नाक तोड़ देंगे, इसकी गारंटी करिए। ये जंग थी, जिसमें न कोई हारा है न कोई जीता है। जैसे को तैसा वाले अंदाज में बातें की गईं हैं। लेकिन अब इसे खत्म करना चाहिए। बहुत हुआ।

और मैं ये चैप्टर अब बंद करता हूं। आपसे भी अनुरोध करता हूं कि कोई भी साथी अब अपनी पोस्ट में पीछे हुए किसी विवाद का कोई जिक्र नहीं करे। और हो सके तो हमें अपने विरोधियों, दुश्मनों से भी माफी मांग लेनी चाहिए तो वो अपनी महानता कायम रख सकें और हम हारे हुए लोग फिर हारकर जीने का सुख ले सकें। जीने का मजा इसी में है प्यारे.....

अंत में मेरी प्रिय लाइन...

तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर
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जय भड़ास
यशवंत

28.2.08

लड़की का नाम रुचिका, लड़के का नाम नासिर....संदर्भ वो पतिता फिर भाग गई ...पार्ट टू

पिछले दिनों पतिता सीरिज में दो पार्ट में मैंने दो स्त्रियों की सच्ची कहानी लिखी, दूसरी कहानी मेरठ के जिस लड़की की थी, जिसने एक मुस्लिम लड़के से प्रेम विवाह किया था और घर से भाग गई थी.......लंबी कहानी, उसका इंटरव्यू दैनिक जागरण मेरठ संस्करण में प्रकाशित किया था उस वक्त। उस बारे में मेरे अनन्य मित्र और दैनिक जागरण मेरठ की शोध व लाइब्रेरी टीम के इंचार्ज राकेश जुयाल ने मुझे मेल से जानकारी दी कि उस लड़की का नाम रुचिका था, और वो लड़का नासिर नाम का था। बाद में हाईकोर्ट ने उन दोनों को एक साथ रहने व समाज के ठेकेदारों को उनकी जिंदगी से दूर रहने का निर्णय सुनाया था।

साथी राकेश जुयाल का दिल से आभार जो उन्होंने यह महत्वपूर्ण तथ्य मेल के जरिए मुझे भेजा। मैं उनके पत्र को यहां हू ब हू प्रकाशित कर रहा हूं ताकि जिन लोगों ने उस स्टोरी को पढ़ी होगी, वे ये तथ्य भी जान लें। जिन लोगों ने वो स्टोरी नहीं पढ़ी होगी वो.....वो पतिता फिर भाग गई...पार्ट टू....शीर्षक से पिछले दिनों भड़ास में प्रकाशित पोस्ट जरूर पढ़ें।
जय भड़ास
यशवंत
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RJuyal to me
show details 23 Feb (5 days ago)

यशवंत जी वो लड़की रुचिका जिसे आपने क्फ्.फ्.भ् को पहले पेज पर बाई लाइन अपने नाम से छापा था ,दुविधा के दोराहे पर खड़ी हुई जिंदगानी , शीर्षक से प्रकाशित किया था । ख्फ् मई को रुचिका फिर नासिर के साथ भाग गई
ख्� मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की हां के बाद चले महानगर के प्रेम दीवाने
जाति-धर्म से ऊपर प्रेम की जीत हुई जिसे कोर्ट ने भी स्वीकार किया ।

राकेश जुयाल


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25.2.08

मसिजीवी जी माफ करें !!!

मसिजीवी जी ने जो आरोप लगाया था, उसमें एक सीधा सरल सवाल था कि क्या मनीषा हिजड़ा व मनीषा पांडेय दो अलग अलग शख्सीयतें हैं या मनीषा पांडेय को बदनाम करने के लिए मनीषा हिजड़ा नामक कोई काल्पनिक चरित्र भड़ासियों ने यशवंत सिंह के नेतृत्व में गढ़ लिया?

और, अगर किसी को भी इस दुर्योग के कारण शक होता है तो उसे सवाल पूछना ही चाहिए। मसिजीवी जी ने वही किया। मैं उनकी तारीफ करता हूं जो उन्होंने अपने मन में पैदा हुए भ्रम को भड़ास पर आकर खुद अपने नाम से एक टिप्पणी करके पूछ लिया। मैंने उसी क्रम में ये अनुरोध किया कि भई, मसिजीवी जी को अपनी भड़ासी साथी मनीषा हिजड़ा की वास्तविकता सत्यापित करा दीजिये।

साथी मनीषा हिजड़ा ने अपनी पोस्ट लिखकर जो बात कही है उससे उनकी सत्यता स्थापित होती है या नहीं, ये तो मसिजीवी जी बतायेंगे। जहां तक मुझे पता है, आदरणीय डा. रूपेश जी का जो बहुआयामी कार्यक्षेत्र व सामाजिक सरोकार हैं, उसमें कई ऐसे हिजड़े साथी भी उनके दोस्त हैं, शिष्य हैं जिनकी दिक्कतों के लिए डा. रूपेश लड़ते रहते हैं। इन साथियों की दिक्कतों को समझ सकने वाले डा. रूपेश ने मनीषा हिजड़ा को सजेस्ट किया कि वो ब्लाग के जरिए अपने समुदाय की दिक्कतों, दुविधाओं, सुख-दुख को बाकी दुनिया तक पहुंचाये। इसके लिए मनीषा राजी हुईं तो डाक्टर साहब ने ब्लाग बनवाने में उनकी बखूबी मदद की और मुझे सूचित भी किया। उनकी शुरुवाती पोस्टें इस बात का प्रमाण हैं कि मनीषा का जिक्र वे उस समय से भड़ास पर करते रहे हैं जब मनीषा पांडेय विवाद शुरू भी नहीं हुआ था। मसिजीवी जी को थोड़ी गलफहमी हुई थी, पर उन्होंने साफ दिल से पूछ लिया, इसके लिए मैं उन्हें वाकई बहादुर और नेक दिल इंसान मानूंगा।

सोचिए, मसिजीवी जी अपना सवाल अनाम बनकर भी कर सकते थे, जैसा कि ढेर सारे कायर लोग ब्लागिंग में करते हैं। वे किसी और अनाम आईडी से अपना सवाल उठा सकते थे। वे अपने ब्लाग पर ही भड़ास व मुझे गरियाते हुए इस मनीषा नाम से हुई दुविधा को सच मानते हुए लिख सकते थे। पर उन्होंने शराफत का परचिय दिया। भड़ास पर आकर अपने नाम से ही उन्होंने अपनी शंका का इजहार कर दिया।

पर उन्हें भड़ासी साथियों ने जिस तरह उत्तर दिया है, उससे मुझे दुख पहुंचा है। भई, हम भड़ासी वाकई लंठ लोग हैं जो किसी को भी किसी बात पर गरिया देते हैं, उसकी ऐसी तैसी कर देते हैं? कहीं हम लोगों की छवि ब्लागिंग के बाहुबल वाले लोगों की जो बन रही है, उसके पीछे यही वजह तो नहीं है? क्या हम सवाल करने वाले को दुश्मन मानने लगते हैं? क्या हम लोकतांत्रिक देश में रहते हुए अपने सामंती व्यक्तित्व को नहीं बदल पाये हैं (जो कि मेरे अंदर भी है) और किसी के सवाल करने को अपना अपमान मान लेते हैं (ऐसा मेरे अंदर भी है)? हम अपने दिमाग का डेमोक्रेटाइजेशन करने में अक्षम रहे हैं लेकिन क्या हम हिंदी वाले इसके लिए कोशिश नहीं कर सकते? अगर कोई आलोचना करता है या उंगली उठाता है तो उसे पराया या दुश्मन मानने के बजाय निंदक नियरे राखिए वाली लाइन को याद करते हुए सम्मान नहीं दे सकते हैं?

इन सवालों का जवाब मैं खुद से तलाश रहा हूं। इसके पीछे वजह सिर्फ इतना भर है कि मसिजीवी जी के बारे में मैं जितना जानता हूं उतना उन्हें एक अच्छा व नेक इंसान कहने के लिए पर्याप्त है। वे अपनी सोच, अपने व्यक्तित्व व अपने रहन सहन में वाकई एक सहज सरल व लोकतांत्रिक शख्सीयत हैं। उन्होंने हमेशा गलत चीजों का खुलकर विरोध किया है, और इसी तेवर के चलते उन्होंने जो भी चीज महसूस किया, उसे आकर भड़ास पर कहा। यह बहस अलग है कि उन्होंने जो समझा वह उचित था या अनुचित।

मैं अपने भड़ासी साथियों के तरफ से मसिजीवी जी से इस बात के लिए माफी मांगता हूं कि अगर उन्हें मनीषा हिजड़ा व मनीषा पांडेय नाम के साम्य के कारण उठाए गए उनके सवाल के बाद भड़ास पर अगर साथियों के लेखों-टिप्पणियों से किसी प्रकार का दुख पहुंचा हो तो वे हमें नासमझ मानकर माफ कर दें।

दरअसल भड़ासी साथी दिल के सच्चे हैं इसलिए वे अक्सर भावुक हो जाया करते हैं। यह भावुकता ही है जो हमें जिलाए और बचाए हुए है वरना बौद्धिकता का रास्ता कहां लेकर इस देश व समाज को गया है, यह हम सब देख रहे हैं। हम बौद्धिकता के विरोधी नहीं हैं पर हम सहज बौद्धिकता चाहते हैं, हम व्यावहारिक बौद्धिकता चाहते हैं, हम वैज्ञानिक बौद्धिकता चाहते हैं। हम कतई हिप्पोक्रेसी नहीं चाहते। हम ट्रांसपैरेंसी चाहते हैं और ट्रांसपैरेंसी जीते भी हैं।

उम्मीद है, इस पोस्ट के बाद सभी भड़ासी मसिजीवी जी को सवाल उठाने के लिए थैंक्यू कहते हुए उनसे भड़ास के प्रति अपने स्नेह के यथावत कायम रखने का अनुरोध करेंगे।

डा. रुपेश जी से अनुरोध करूंगा कि डाक्टर साहब अपने जो कुछ लिखा है, कहा है, मैं उसके पीछे के दर्द व भावना को समझ सकता हूं। आप भड़ास के माडरेटर हैं, इसलिए आप जो भी कहेंगे, लिखेंगे, उस हम भड़ासी सिर माथे रखेंगे पर हम लोग भी अपनी राय इसी मंच पर रखते रहेंगे। जाहिर सी बात है, हमारे आप में लोगों को असहमतियां दिखेंगी पर रास्ते अलग अलग होने के बावजूद हम नदियों की मंजिल तो वही सागर ही है ना, जहां वो पहुंचती हैं और जहां हमें भी पहुंचना है।

और आखिर में साथी मनीषा हिजड़ा से, आप बिलकुल हतोत्साहित न हों। ये जो शुरुवाती मुश्किलें होती हैं, वो हमें अंदर से मजबूत करती हैं और लंबे सफर के लायक बनाती हैं सो आप अपना काम जारी रखें। मसिजीवी जी सदा आपके साथ हैं, भड़ास सदा आपके साथ है। प्लीज, आप लिखना जारी रखें।

जय भड़ास
यशवंत

23.2.08

वो पतिता फिर भाग गई.....!!! पार्ट-2

मेरठ की वो लड़की। बेहद सुंदर। जीभर के जिसे देख ले, उसे प्यार हो जाये। परिवार की सबसे बड़ी लड़की। हायर मिडिल क्लास की लड़की। शहरी परिवेश के परिवार की लड़की। स्मार्ट और अक्लमंद लड़की।

स्कूल आते जाते एक नौजवान से उसे प्यार हो गया। नौजवान भी कोई खास नहीं। टपोरी टाइप। वो भी यंग स्मार्ट और फौलादी बदन वाला। दिन के वक्त का ज्यादातर हिस्सा सड़क पर बाल संवारते, बाइक भगाते बिताता था। वह अपने कौशल और स्किल से उस लड़की पर डोले डालने लगा। लड़की को अच्छा लगता था। कभी गुस्साने का दिखावा करती तो कभी मुस्करा कर आगे बढ़ जाती। बकौल कवि हरिप्रकाश उपाध्याय की कविता के शब्दों में कहें तो सबसे सतही मुंबइया फिल्मों ने प्रेम करने के जो तरीके सिखाये, इन दोनों नौजवान दिलों ने उनसे सबक लेकर प्रेम करना सीख लिया।

और एक दिन.............!!!!

लड़की उस लड़के संग भाग गई।

मचा हल्ला। कोहराम। जितने मुंह उतनी बातें। प्रेम में दुनियादारी घुस गई। पकड़ो, मारो, हिंदु, मुस्लिम, आईएसआई, धर्म परिवर्तन, शादीशुदा....। मतलब आप लोग समझ गए होंगे। लड़का मुसलमान था। शादीशुदा था। आईएसआई का एजेंट था। ये मैं नहीं कह रहा हूं, लड़की के परिजनों ने जिन हिंदुवादी नेताओं को पकड़ा उन लोगों ने सड़क पर उतरकर ये सारी बातें माइक से कहीं।

और एक दिन लड़की पकड़ ली गई।

ज्यादा दूर नहीं भागे थे वो। यहीं गाजियाबाद में एक फ्लैट लेकर रह रहे थे। लड़की को मां की याद आई, फोन किया। परिजनों ने उसे पुचकारा। सब कुछ स्वीकारने और बढ़िया से शादी करने का लालच दिया। लड़के फंस गई, उसने अपना एड्रेस बता दिया। घर वाले हिंदुवादी नेताओं और पुलिस के साथ आए और लड़की को उठा ले गए। लड़के को खूब मारा पीटा और उसे छोड़ दिया।

मेरठ में यह मुद्दा सिर्फ प्रेम विवाह और भागने के कारण नहीं बल्कि हिंदू बनाम मुस्लिम के मुद्दे के कारण खूब चर्चित हुआ। हिंदू व मुस्लिम नेताओं के मैदान में आ जाने से मामला ला एंड आर्डर तक जाता दिखा।

दैनिक जागरण के सिटी चीफ के बतौर मैंने खुद उस लड़की से बात करने की ठानी और उसके दिल की राय प्रकाशित करने का निर्णय लिया। एक संपर्क द्वारा उस लड़की के घर पहुंचे जहां वह लगभग कैद में रखी गई थी। मैंने सबसे विनती की कि मुझे अकेले में बात करने दिया जाए। और उस लड़की से बातें करने के बाद मेरा माथा भन्ना गया। सिर्फ वह बेहद खूबसूरत ही नहीं थी बल्कि बेहद बौद्धिक और समझदार भी थी। उसने जो बातें कहीं उसे मैंने एज इट इज छाप दिया।

उसके जो कहा, उसका लब्बोलुवाब ये था...

मुझे पहले से पता था कि वो शादीशुदा है लेकिन अब वो तलाक दे चुका है। जो आदमी तलाकनामा मुझे दिखा चुका है और उसे मेरे ही साथ रहना है तो फिर क्या दिक्कत है।

वो बेहद शरीफ लड़का है। उसे लोग फर्जी तौर पर आईएसआई का एजेंट बता रहे हैं। मैं उसके साथ रहना चाहती हूं क्योंकि वो मुझे अच्छा लगता है। मुझे नहीं चाहिए ये सुख। मैं उसके साथ गरीबी में जी लूंगी।

ये देखिए तस्वीरें, जो छिपाकर ले आई हूं। हम लोगों ने बाकायदा निकाह किया है और निकाह मैंने अपनी मर्जी से किया है।

ये देखिए तस्वीरें जिसमें उनके घर के सारे लोग हैं और कितने प्यार से मुझे घर में ले जाया गया। रखा गया। पार्टी हुई। वहां के जो छोटे बच्चे हैं वो मुझे इतने प्यारे लगते हैं, कि मैं उन्हें याद करके रोती हूं। हम लोगों को उनका घर छोड़कर इसलिए गाजियाबाद जाना पड़ा क्योंकि पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार कर लेती।

मैं तो मां की ममता में पकड़ ली गई। इन्होंने (मां ने) मेरे साथ धोखा किया है। ये समझा रही हैं कि मुस्लिम से शादी करने से नाक कट गई। मैं कहती हूं कि क्या सुनील दत्त ने नरगिस से शादी करके अपने खानदान की नाक कटा ली। मुझे समझ में नहीं आता, इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद लोग इतनी घटिया बातों को क्यों जीते रहते हैं।


-----उस कम उम्र की लड़की (मेरे खयाल से ग्रेजुएशन सेकेंड इयर में थी वो) के इतने मेच्योर व शानदार विजन को देखकर मैं दंग रह गया। उसने मेरी राय इस बारे में जानने की कोशिश की तो मैंने कहा कि तुमने सौ फीसदी ठीक किया है। अगर तुम उसके साथ खुश हो और तुम्हें उस पर भरोसा है तो बाकी किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।

मैंने उसकी कही हुई सारी बातें उसकी तीन तस्वीरों के साथ दैनिक जागरण पहले पन्ने पर बाटम में प्रकाशित किया। और मामला फिर गरम हो गया।

पूरे मेरठ में एक बात का जमकर प्रचार किया जाता है कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को सायास तरीके से फंसाते हैं और शादी कर लेते हैं। ऐसे वो अपने मजहब के विस्तार व हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मकसद से करते हैं। पर मैं ये बात नहीं मानता। पहली बात तो हम ये क्यों मान लेते हैं कि हिंदू लड़कियां गाय बकरी हैं जिनके पास कोई दिमाग नहीं है और वो जो फैसला ले रही हैं उसमें उनका दिमाग नहीं बल्कि मुस्लिम लड़कों का हिप्पोनेटिज्म काम आता है। अरे भाई, लड़कियां दिमाग रखती हैं। उन्हें अपने फैसले लेने दो। ये तो तुम्हारे अपने धर्म और संस्कार की दिक्कत है ना कि वो लड़कियां तुम्हारे वर्षों के रटाये जिलाये संस्कारों को प्रेम के धागे के चलते झटके में तोड़ डालती हैं। इसका मतलब तु्म्हारे संस्कारों व सिखाये विचारों में दम नहीं है, तुम्हारी ट्रेनिंग में कमजोरी है।

खैर, बहस भटक रही है। वापस लौटता हूं मुद्दे पर।

इंटरव्यू छपने के बाद उस लड़की पर पहरा और बढ़ा दिया गया और किसी भी मीडिया से मिलने पर एकदम से पाबंदी लगा दी गई क्योंकि उसके खुले विचारों को मैंने हू ब हू जागरण में प्रकाशित कर दिया था। कहां उसकी मां ये मानकर चल रही थीं कि उनके पक्ष में सब छपेगा, और कहां इंटरव्यू ने लड़की के पक्ष को मजबूत कर दिया।

वो लड़की हिंदूवादियो और परिजनों के लिए विलेन बन चुकी थी। उधर लड़के ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि मेरी पत्नी को जबरन ले गये हैं वो लोग। खैर, लड़की को रोज दर्जन भर लोग समझाने पहुंचने लगे उसके घर। शुरू में तो वो चीखती चिल्लाती उनसे बहस करती रही, जबान लड़ाती रही। लेकिन समझानों वालों की बेहिसाब संख्या देखकर वो मौन हो गई। वो केवल सामने बोलते लोगों को निहारती और शांत रहती।

धीरे धीरे ये मामला शांत हो रहा था। लोग लगभग इस प्रकरण को भूलने लगे थे। वो लड़की गंदी लड़की, खराब लड़की, पतित लड़की घोषित की जा चुकी थी। न सिर्फ परिवार द्वारा समाज द्वारा बल्कि पूरे शहर के हिंदुओं द्वारा।

उस लड़की के चेहरे की रौनक गायब हो चुकी थी। हां, मुझे याद आया। उसकी मां अध्यापिका थीं। उन्होंने बेटी को खुले माहौल में पाला था और कभी किसी चीज के लिए बंदिश नहीं लगाई। अब उन्हें अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो ये नहीं सोच पा रही थी कि चलो बेटी ने गलत ही सही, फैसला ले लिया है तो उसका साथ दें। समझाया बुझाया फिर भी नहीं मान रही है तो उसे उसकी मन की करने दो। बहुत बिगड़ेगा तो क्या बिगड़ेगा। वो मुस्लिम युवक उसे छोड़ देगा, जैसी की आशंका परिजनों द्वारा जताई जा रही थी। तो इससे क्या होगा? क्या किसी के छोड़ने से किसी की ज़िंदगी खत्म हो जाती है। मैं तो मानता हूं कि मुश्किलें और चुनौतियां हमेशा आदमी की भलाई के लिए ही आती हैं। ज्यादातर महान लोगों ने जीवन के हर मोड़ पर मुश्किलों का सामना किया और उससे जीतकर या हारकर, उससे सबक लेकर और आगे बढ़ गए। हो सकता है, वो लड़की खुद अपने जीवन के अऩुभवों से जो सबक लेती उससे वो समझ पाती कि उसने जो निर्णय लिया है वो सही या गलत है।

बात फिर भटक रही है। मैं कह रहा था कि समय बीतने के साथ माहौल लगभग शांत हो चुका था।

और एक दिन फिर खबर आई। वो लड़की उस लड़के के साथ फिर भाग गई।

हुआ यूं कि समय बीतने के साथ लड़की ने थोड़ा नाटक किया। उसने मां के सामने झुकने का नाटक किया। बाहर निकलने की थोड़ी थोड़ी आजादी उसे मिलने लगी। उसे भागते न देखकर उसे थोड़ी और आजादी दे दी गई। नौंचदी मेले में घूमने के लिए भी कह दिया गया। उसके साथ कोई घर का हमेशा होता था। मेले में वो भाई के साथ गई और जाने कब भाई को महसूस हुआ कि उसकी बहन उसके साथ नहीं है। खूब ढूंढा तलाशा गया पर वो नहीं मिली। बाद में मालूम चला, दोनों फिर भाग गये। इस बार बेहद दूर चले गए।

उसके बाद क्या हुआ, मुझे कोई खबर नहीं मिली। पर मैं उस लड़की के चेहरे को आज भी नहीं भूल पाता हूं।

सच्ची कहूं तो मैं उसे अंदर ही अंदर प्यार करने लगा था। वो लड़की पतित घोषित कर दी गई थी, समाज के द्वारा, शहर के द्वारा, परिवार के द्वारा। उस लड़की का नाम दूसरे घरों की लड़कियों के सामने इसलिए लिया जाता था ताकि बताया जा सके कि पतित, गंदी, बुरी लड़कियां होती कैसी हैं और वो कितना नुकसान कर देती हैं, अपना, खानदान का और समाज का। उन दिनों मेरठ के बाकी घरों की लड़कियों को उनकी माएं उस जैसी कभी न बनने की नसीहत देती थीं। मुझे खुद याद है कि मेरे मोहल्ले पांडवनगर में कई घरों की माएं अपनी बच्चियों से हंसते हुए बतियाती थीं और उस बेशरम लड़की के किस्से पढ़कर, सुनाकर ईश्वर से अनुरोध करती थीं कि हे ईश्वर ऐसी पतित लड़कियां किसी मां-पिता को न देना।

मैं उस लड़की का नाम भूल चुका हूं। मेरे मेरठ के साथी अगर इसे पढ़ रहे हों तो जरूर बतायें उसका नाम, कमेंट के रूप में लिखकर। पर उस पतिता प्यारी गुड़िया को मैं आज भी दिल से प्यार करता हूं। उसके लिए दुवा करता हूं कि वो जहां रहे, सुखी रहे।

जय भड़ास
यशवंत

22.2.08

इस पतित औरत को सलाम....पार्ट वन

आगरा में बस से ज्यों उतरा, आटो पकड़ने कि लए आगे बढ़ा। चौराहे पर आटो स्टैंड। दूसरी ओर पुलिस चौकी। आटो में बैठा ही था कि एकदम से शोर मचा। पीछे मुड़ा तो एक 35-40 की उम्र की गरीब सी, साड़ी पहने महिला अपने चप्पलों से एक 30 वर्ष के युवक की पिटाई कर रही थी। एकदम से हल्ला हुआ कि फलाना पिट रहा है। सभी आटो ड्राइवर दौड़े, उसे बचाने को। उधर से पुलिस वाले भी चल पड़े। देखते ही मजमा इकट्ठा हो गया। मालूम हुआ मामला छेड़खानी का है। महिला गरियाये जा रही थी। वो युवक बचाव में पीछे खिसक रहा था। उसके मुंह पर चप्पलें गिरती जा रहीं थीं। आटो वाले महिला को मिलकर गरियाने लगे और उसके चप्पलों की चंगुल से अपने साथी को बचाने लगे। पुलिस वाले खरामा खरामा आ रहे थो सो तब तक ढेर सारी चप्पलें उस युवक रूपी आटो ड्राइवर पर गिर चुकी थीं। पुलिस ने उसे पकड़ कर अपने कब्जे में लिया। महिला बोले जा रही थी। छेड़ रहा था। पीछे से उंगली की। एक बार तो चुप रही। फिर ये दूसरी बार आकर उंगली कर रहा था। समझता है कि वेश्या हूं। अकेले हूं तो इसका मतलब हुआ वेश्या हूं। अपने मां को जाकर उंगली कर। हरामजाते, कुत्ते, कमीने, सुअर की औलाद....।

आटो वालों में रोष व्याप्त था। मैंने अपने ड्राइवर को घुड़की लगाई....अबे चल, यहीं झगड़ा सुलझाता रहेगा। अपना ड्राइवर आया और गाड़ी स्टार्ट कर दी। गाड़ी के साथ आटो वाले का भी मुंह चल रहा था.....साली, धंधा करती है। कई दिनों से इसी चौराहे पे दिखती है। देखने पे मुस्करा भी देती है। इसने आज भाई को फंसा दिया।

मैं चुपचाप उसकी बात सुनता रहा। वह आगे बोला, एक झटके में मेरी शक्ल देखने के बाद सामने सड़क पर निगाह केंद्रित करते हुए....बताओ भाई साहब आप, शरीफ घर की औरत किसी को मारने की हिम्मत कर सकती है। ये साली खुद ही बेइज्जत औरत है। शरीफ महिला तो यह कहने में संकोच करेगी कि उसके साथ क्या हुआ। वह तो चुपचाप चली जायेगी। लेकिन ये जो धंधे वाली होती हैं ना, ये किसी को भी फंसा देती हैं।

बिना चेहरे पर कोई भाव लाये उसकी बात सुनता रहा, सोचता रहा। मेरे बगल में बैठे पुरुष सहयात्री आटो चालक की हां में हां मिलाते हुए बोले...बेचारा अच्छा खासा पिट गया। देखो, वो पीट रही थी तो वो चुपचाप पिट रहा था, कुछ नहीं बोला।

मैंने भी वाणी को शब्द दिया....असल में उस साले को यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि छेड़ने के बाद इस तरह उसे चप्पल खाने पड़ेंगे। और जब चप्पल गिरने लगे तो एकदम से उसे अवाक होना पड़ा, अपनी इज्जत जाती दिखी तो उसे चुपचाप रहने में ही भलाई समझ में आई होगी।

आटो ड्राइवर फिर बोल उठा....भाई साहब, आप जानते नहीं हैं। यहां धंधेवालियों की पूरी बस्ती है। वे सब ऐसे ही घूमती रहती हैं। आप बताओ, उसकी शक्ल और उसकी आवाज से आप उसे शरीफ घर की मान रहे थे।

मैंने जवाब दिया...भाई, वो जो तुम्हारा दोस्त था, वो भी शरीफ नहीं दिख रहा था। क्या तुम लोगों की यूनियन का अध्यक्ष था क्या?

उसने कहा...नहीं अध्यक्ष तो नहीं, लेकिन दबंग लड़का है। ड्राइवरों की हर दिक्कत में साथ रहता है।

आटो ड्राइवर की बात से समझ में आ गया कि वो आटो ड्राइवर जो पिट रहा था, चौराहे के आटो ड्राइवरों का रहनुमा टाइप का था, इसलिए वो बिना आटो चलाए, सिर्फ आटो स्टैंड की उगाही से अच्छा खासा पैसा बना लेता था और जिस फिल्मी स्टाइल में गोविंदा मार्का कपड़े व चेहरे की स्टाइल बना रखी थी, उसमें उसके अंदर एक ठीकठाक डान दिख रहा था। पुलिस वाले भी उसे जिस कूल तरीके से ले गये, उससे लगा कि उनका भी चहेता होगा क्योंकि चौराहे कि पुलिस चौकी है, सो ट्रकों से वसूली में और दारू मुर्गा की व्यवस्था में ये साथ देता होगा।

मैंने ये सच्ची घटना आगरा के कई पत्रकार मित्रों के साथ शेयर की और उस औरत के हिम्मत की दाद दी, जिस वहां चौराहे पर खड़े बहुतायत ड्राइवरों व यात्रियों ने बुरी औरत, पतित औरत घोषित कर दिया था। मैं और मेरी सोच अल्पमत में लेकिन इस पतित औरत ने जो साहस का काम किया, उससे ढेर सारी शरीफ औरतों को सबक मिलेगा। जैसा कि मेरे आटो का ड्राइवर कह रहा था, शरीफ औरतें छेड़खानी होने के बाद भी नहीं बोलतीं, ये साली तो बिना कुछ हुए चिल्ला रही थी।

मायने ये है...पहली बात तो वो औरत धंधेवाली होगी, ये मैं नहीं मानता क्योंकि हर सक्रिय लड़की के साथ मर्द कई आरोप व रहस्य मढ़ देते हैं, दूसरी बात अगर वो धंधे वाली होगी भी तो उसने जो साहस किया, सिर्फ यही साहस उन तमाम शरीफजादियों के चेहरे पर तमाचा हैं जो सिर्फ कला कला के लिए में विश्वास करती हैं और बातें बघारती हैं। मैं इस पतित औरत को इन शरीफ औरतों से महान का दर्जा देता हूं जो छिड़ने के बाद भी चुपचाप शर्म से गाल लाल किये चली जाती हैं। तीसरी बात अगर ये औरतें, जो धंधा करती हैं या नहीं करती हैं, खुलकर अपने साहस के साथ आगे आती हैं और मर्दों से भरे चौराहे पर खड़े एक लफंगे को जूतियाती है तो उसने संदेश दे दिया है, हे प्रगतिशीलों, हे वाचालों, हे गाल बजाने वालों, देखो....हम जो करते हैं ना, अपनी मर्जी से करते हैं। धंधा करते भी हैं तो अपनी मर्जी से, चप्पल मारते भी हैं तो अपनी मर्जी से.....। तुम साले, अपनी दुनिया में नियम कानून व मुक्ति के मैराथन की दौड़ की तैयारियों में लगे रहो.....।

इस महिला को मैंने उस समय भी मन ही मन सलाम किया था। सोचा था, लिखूंगा पर लिख नहीं पाया। लेकिन अब जब कुछ लोग झंडाबरदार होकर महिलाओं को कथित मसीहा बनकर उभरी हैं और बहस को अपने हिसाब से चलाने पर आमादा हैं, उन्हें मैं उदाहरणों के जरिए समझाने की कोशिश करूंगा कि जिस पतनशीलता की बात कर रहा हूं वो क्या है भड़ासी भोंपू का राग क्या है।

जय चोखेरबालियां, जय भड़ास
यशवंत सिंह

21.2.08

मनीषा जी, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...उर्फ रसमलाई बनाम दिवालियापन

मनीषा पांडेय ने अपनी पोस्ट में मेरी बातों, विचारों, इरादों को जिस तरह कनसीव किया है, और जो कलम तोड़ कर लिखा है, उसका एक एक कर जवाब देना चाहूंगा....यशवंत
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आपने कहा---
हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा।

मेरा कहना है...
दरअसल मठाधीशों का हमेशा इरादा रहता है कि बहसें उनके मुताबिक, हिसाब से चलें और उनके तरीके को ही लोग स्वीकार कर वाह वाह, शानदार, वेरी गुड कहें...जैसा कि हो रहा है....। बात निकली है तो दूर तलक जायेगी.....। अगर बात निकली है तो उसके हर लेयर, पर पेंच, हर एंगिल को समझा बूझा जाएगा और लोग उसे अपने अपने तरीके से बूझेंगे। इसे रोकने की मंशा रखना, नियंत्रित करने के बारे में सोचना, इससे खफा होने एक व्यक्तिवादी और आत्मकेंद्रित सोच का परिचायक है।


आपने कहा---
पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ

मेरा कहना है...
सच्ची बात तो यही है जो मैंने कहा था, आप भड़ास निकाल रही हैं। इस भड़ास के मायने कतई भड़ास ब्लाग या भड़ास बैंड नहीं बल्कि दिल की बात कह देना है, जो आप शिद्दत से महसूस करती हैं। इस देश में जिस तरह से 99 फीसदी लोग बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बातें बघार कर फिर अपने रोजी रोटी और कमाने खाने में जुट जाते हैं, अपने धंधे को बेहतर करने में लग जाते हैं और समाज को व अवाम को अपने हाल पर छोड़ देती हैं, अगर वही करने का इरादा है तो कोई बात नहीं। ब्लागिंग में ऐसे ढेर सारे लोग हैं जो अपने ब्लाग पर क्रांति की अलख जगाए हुए हैं और उसके बाद बेहद निजी किस्म के शीशे के घरों में बेटा बिटिया माई बाप बियाह खाना पैसा धंधा सुख दुख....आदि किस्म की निजी चीजों को प्राथमिकता में रखे हुए हैं। वहां से बाहर निकलते ही फिर सिद्धांत बघारने लगते हैं। आप वैसा हैं या नहीं, आप जानें लेकिन यह जरूर है आप अच्छा खासा भोंपू बजा लेती हैं, रीमिक्स वाला।


आपने कहा---
यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं।
मेरा कहना है...
इसका जवाब उपर दे दिया है। लड़कियां भड़ास नहीं निकालेंगी तो देवी व दुर्गा बनी रहेंगी। आप भी बनी रहिए। आपको अच्छा अच्छा गुडी गुडी कहने वाले ढेर सारे लोग हैं। भगवान ने बुद्धि और कलम दे दी है, चाहे जिसकी बखिया उघेड़िये। आप लिखते रहिए अंतरराष्ट्रीय महिला विशेषज्ञों के नाम लेकर उद्धरण देते हुए महान नारीवादी आंदोलनों के दर्शन और आंसू बहाते रहिए महिलाओं की दशा-दिशा पर। लेकिन जो कुछ झेला है, बूझा है, महसूसा है...उसे कहने का साहस नहीं होगा, भड़ास निकालने की ताकत नहीं होगी तो ढेर सारे आडंबरियों से बाहर आप भी नहीं होंगी।

आपने कहा---
यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत।

मेरा कहना है...
चलिए माना न आपने कि आप के चलते लड़कियां जो आज बेहतर हालत में हैं, नहीं हैं बल्कि इसके पीछे बाजार है। और यही बाजार लड़कियों को और पतित करेगा, और अच्छी हालत में ले जायेगा। और तरक्की करने देगा। आप लोग खामखा गाल बजाती रहेंगी, शरीफ, नेक और ईमानदार बनने के लिए।


आपने कहा---
कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मेरा कहना है...
जी, हम जानते हैं भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम। आज हम हिंदीवाले जो अंग्रेजी के दबाव में, हिंदी मीडिया की सामंती गठन, ऐंठन के दबाव में जिस विकृति को जी रहे थे, उसे निकाल कर, उसे उगल कर सहज महसूस करते हैं। भड़ास कोई बैंय या भोंपू नहीं मेडिकल साइंस की एक विधा है जिसे डा. रूपेश और मुनव्वर सुल्ताना बेहतर जानते हैं। कभी अपनी नौकरी, अपने ब्लाग और अपनी दुनिया से बाहर वक्त मिले तो भड़ास को कायदे से पढ़िए और समझिए। लेकिन जो लोग अपने को काबिल और झंडाबरदार मान चुके हैं दरअसल उन लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आता। और आपने जो बात कही है कि पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई ....तो मैं ये कह सकता हूं कि आपके इस बौद्धिक दिवालियेपन के लिए भगवान आपको माफ करे। आप को खुद नहीं पता आप क्या लिख रही हैं, क्या कह रही हैं।

आपने कहा---
मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं।
मेरा कहना है...
केवल कहते रहिए। सिद्धांत दर्शन गढ़ते रहिए। अगर इसी सबसे क्रांति या उत्थान या तरक्की संभव थी तो अब तक रोज तरक्की व क्रांति होती।

आपने कहा---
सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती।

मेरा कहना है...
ऐसी ही लड़कियां गढेंगी लड़कियों के लिए एक अलग सा भड़ासी बैंड। आप देखते रहिएगा। भड़ासी बैंड गढ़ने के लिए साहस चाहिए, समाज के खिलाफ जाने कि हिम्मत चाहिए, आलोचनाओं को झेलने का बूता चाहिए। मास्टर की तरह गूढ़ बातें करने कहने से वो रामरतन की बिटिया कुछ नहीं समझेगी, शून्य में टुकुर टुकुर ताकती रहेगी। उसे साफ साफ समझाने वाली जरूर आएगी। लेकिन ये आप जैसियों से संभव नहीं है।

आपने कहा---
यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

मेरा कहना है...
भइया हम बुरे लोग हैं, मैंने पहले ही कहा था, फिर कह रहा हूं। और आप जैसों को ये लगता है कि हमारे सुझवा रसातल में ले जाएंगे तो ये शायद आपकी समझदारी की कमी है या फिर भड़ासियों की कमजोरी है जो आपको समझा न पाए। थोड़ा वक्त निकालिए और फिर पढ़िए गुनिए भड़ास को व भड़ासी दर्शन को।
ये तो होना ही था, आपकी पतनशील स्वीकारोक्तियां कहीं आपके खिलाफ न चली जाएं सो आपके फेस सेविंग करनी ही थी। आखिर आप भी लड़की हो और इसी समाज में आपको रहना है। बहस को गोलमोल और बौद्धिक बना देने की यह रणनीति कोई नई नहीं है। हमेशा ऐसा होता है कि जब कम पढ़े लिखे लोग फील्ड में जाकर चीजों को एक ठीक ठीक दिशा में ले जाने की कोशिश करते हैं तो कुछ बौद्धिक आकर उन्हें उसके हजार पेंच समझातें हैं और सारे आंदोलन को कनफ्यूज कर देते हैं। आपका कनफ्यूजन भले ही शाब्दिक आवरण में धारधार और साफ साफ लग रहा हो लेकिन आपसे कह दिया जाए कि आप स्त्री मुक्ति के लिए चार चरणों की वास्तविक स्ट्रेटजी डिफाइन करिये तो आपके पास या तो वक्त नहीं होगा या फिर आप फिर बौद्धिक प्रलाप करने लगेंगी। आपने जो सुविधायें हासिल कर ली हैं, उसे मेंटेन रखते हुए नारी मुक्ति की कल्पनाएं और कथाएं कहते रहिए, देखते हैं, उससे कितना भला होता है स्त्रियों का।
जिस दिन लड़कियों तक, स्त्रियों तक अपने लिए स्पेस पाने का संदेश पहुंच गया न तो उस दिन से आपके रोके नहीं रुकेगा उनका पतन। अभी जो पतन है सीमित मात्रा में। संदेस पहुंचने के बाद कुछ उसी तरह लड़कियां बुरी बनेंगी, पतित होंगी जिस तरह गांधी जी का संदेश पहुंचने के बाद भारत के जन जन में हुआ था। लोग अंग्रेजों के फौज पाटे से डरना भूल गए और खुलकर सामने आ गए....हां, हमें आजादी चाहिए।

आपने कहा---
आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है।

मेरा कहना है...
टापू तो आप बनाए हुए हैं, अपने तक सीमित। खुद के इर्द गिर्द बहस चलाने की रणनीति बनाकर। हम तो विस्तार अपार वाले लोग हैं। मान लो, अगर आप और हम टापू भी हैं तो इन टापूओं को क्रांति के प्रतीक टापू बनाने होंगे, इनके फैलाव बढ़ाने होंगे। इन्हें बाकी जगहों पर संदेस भेजने होंगे कि आओ, तुम भी इस जैसे टापूओं के निर्माण में जुट जाओ।
बिलकुल मुंह बिराना चाहिये इन टापूओं पर खड़े होकर। बिलकुल दिखाना चाहिए मुक्ति के पेड़ को। ताकि संदेश आम अवाम तक पहुंचे। वो इस मुक्ति को, इस सुख को, इस आजादी को जी सकने की कम से कम लालसा तो पैदा हो।
रही बात मेरी अकल पर तरस करने को तो फिर वही कहूंगा, आपका बौद्धिक दिवालियापन दरअसल आपकी आंख पर पट्टी बांधे हुए है जो आपक आपकी सोच से बाहर आने से रोके हुए है। आपके अंदर भी एक क्रांति की जरूरत है तभी यह अहन्मयता जाएगी और आप सहज व सरल हो पाएंगी। ऐसे दंभी व्यक्तित्व को अपने सिवाय सारी दुनिया मूरख और खराब दिखती है। हां में हां मिलाओ तो खुश, कुछ अलग से सोच कर कह दो तो आग लग गई। दरअसल ये दिक्कत आपकी नहीं, आप जिस ढांचे की हिंदी मीडिया व समाज से निकल कर आगे बढ़ी हैं, उसकी दी हुई ट्रेनिंग है। इससे मुक्त होना ही शिवत्व है, समझदारी हैं। तभी आप अपने समुदाय, लिंग की अगुवा और नेता बन पाएंगी। मैं ये दावे से कह सकता हूं कि दूसरों की अकल पर तरस खाने वाली मनीषा की किसी से नहीं पट सकती क्योंकि ये जो भयंकर वाला इगो है वो जानलेवा है। प्लीज, भड़ास के डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव से संपर्क कीजिए आप जिन्होंने ऐसे ढेरों मरीजों को सहज व सरल बनाया है।


आपने कहा---
लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

मेरा कहना है...
हमने कभी नहीं कहा कि भइया मनीषा आओ, भड़ासी बन जाओ। हमने हमेशा भड़ास से लड़कियों और महिलाओं की ज्यादा उपस्थिति पर ऐतराज जताया है। यकीन न हो तो भड़ास को पढ़ लेना। दरअसल स्त्री को देखकर पुरुष में लार टपकाने की जो आदत है ना, भड़ासी उससे मुक्त हैं। ये ग्रंथि उनमें जरूर हो सकती है जो आपकी हर अदा पर वाह वाह करते होंगे। हम तो जो सोचते समझते हैं, सच्चा, खरा, सोने की तरह उसे उगल देते हैं। ये आप पर है कि आप इस उगलन को कितना स्वीकार्य कर पाती हैं। भड़ास आपके बगैर मजे में हैं और हमारा कोरस बहुत बढ़िया अंदाज में जन जन तक पहुंच रहा है।

उम्मीद है, आपको सारे सवालों के जवाब मिल गए होंगे। कुछ बाकी हों तो बताइएगा।

जय भड़ास, जय चोखेरबालियां
यशवंत सिंह

चोखेरबाली में भड़ासी आ गए तो मुझे अब सोचना होगा...!!!

((स्त्रियों के चर्चित ब्लाग चोखेरबाली का सदस्य बनने का न्योता मिला तो तुरंत जाकर ज्वाइन कर लिया। बुरे लोगों पर कौन भरोसा करता है, लेकिन चोखेरबाली ने किया तो लगा, चलो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बुरे लोगों को इस लायक मानते हैं कि वे कथित अच्छे लोगों से ज्यादा बेहतर हैं। खैर, चोखेरबाली पहुंचा तो वहां अपने स्वभाव अनुरूप एक पोस्ट भी दे मारा। और जहां जायें डाढ़ो रानी वहां लाये ओला पानी के अंदाज में मेरे लिखे पर कुछ लोगों को एतराज हो गया। ये कहां से चले आये म्लेच्छ कहीं के, भड़ासी कहीं के। भगाओ इन्हें। अगर ये रहेंगे तो हम न रहेंगे.....आदि आदि। तो भइया, अब हम का कहें, आज के जुग में सच सच बोल दो तो चुभ जाती है। एक ने हुवां किया तो नीचे कई लोग हुवां हुवां करने लगे, कुछ लोग आंचल में मुंह छुपाए कहने लगे कि जिधर उड़ेगा ये आंचल, उधर की राह हम भी चल पड़ेंगे .....खैर, यहां मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि भड़ासियों को पता चल सके कि भड़ासानंद आजकल कहां कहां मुंह मार रहे हैं। तो लीजिए चोखेरबाली पर जो लिखा है, उसे पढ़िए और उसमें आए कमेंट को बूझिए....जय भड़ास, यशवंत))


Wednesday, February 20, 2008
सिर्फ और सिर्फ पतन, कोई मूल्य वूल्य की शर्त न थोपो
यशवंत सिंह
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मनीषा ने जो लिखा, मैं पतित होना चाहती हूं, दरअसल ये एक जोरदार शुरुआत भर है। उन्होंने साहस बंधाया है। खुल जाओ। डरो नहीं। सहमो नहीं। जिन सुखों के साथ जी रही हो और जिनके खोने का ग़म है दरअसल वो कोई सुख नहीं और ये कोई गम नहीं। आप मुश्किलें झेलो पर मस्ती के साथ, मनमर्जी के साथ। इसके बाद वाली पोस्ट में पतनशीलता को एक मूल्य बनाकर और इसे प्रगतिशीलता के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। यह गलत है।

दरअसल, ऐसी ऐतिहासिक गल्तियां करने वाले लोग बाद में हाशिए पर पाए जाते हैं। कैसी प्रगतिशीलता, क्यों प्रगतिशीलता? क्या महिलाओं ने ठेका ले रखा है कि वो एक बड़े मूल्य, उदात्त मूल्य, गंभीर बदलाव को लाने का। इनके लिए पतित होने का क्या मतलब? ये जो शर्तें लगा दी हैं, इससे तो डर जाएगी लड़की। कहा गया है ना...जीना हो गर शर्तों पे तो जीना हमसे ना होगा.....। तो पतित होना दरअसल अपने आप में एक क्रांति है। अपने आप में एक प्रगतिशीलता है। अब प्रगतिशीलता के नाम पर इसमें मूल्य न घुसेड़ो। कि लड़ाई निजी स्पेस की न रह जाए, रिएक्शन भर न रह जाए, चीप किस्म की चीजें हासिल करने तक न रह जाए, रात में घूमने तक न रह जाए, बेडरूम को कंट्रोल करने तक न रह जाए....वगैरह वगैरह....। मेरे खयाल से, जैसा कि मैंने मनीषा के ब्लाग पर लिखे अपने लंबे कमेंट में कहा भी है कि इन स्त्रियों को अभी खुलने दो, इन्हें चीप होने दो, इन्हें रिएक्ट करने दो, इन्हें साहस बटोरने दो.....। अगर अभी से इफ बट किंतु परंतु होने लगा तो गये काम से।

मेरे कुछ सुझाव हैं, जिस पर अगर आप अमल कर सकती हैं तो ये महान काम होगा.......

1- हर महिला ब्लागर अपने पतन का एलान करे और पतन के लक्षणों की शिनाख्त कराए, जैसा मनीषा ने साहस के साथ लिखा। अरे भइया, लड़कियों को क्यों नहीं टांग फैला के बैठना चाहिए। लड़कियों को क्यों नहीं पुरुषों की तरह ब्लंट, लंठ होना चाहिए....। ये जो सो काल्ड साफ्टनेस, कमनीयता, हूर परी वाली कामनाएं हैं ये सब स्त्री को देवी बनाकर रखने के लिए हैं ताकि उसे एक आम मानव माना ही न जाए। तो आम अपने को एक आम सामान्य बनाओ, खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं।

2- सबने अपने जीवन में प्रेम करते हैं, कई बार प्रेम का इजाहर नहीं हो पाता। कई बार इजहार तो हो जाता है पर साथ नहीं जी पाते....ढेरों शेड्स हैं। लेकिन कोई लड़की अपनी प्रेम कहानी बताने से डरती है क्योंकि उसे अपने पति, प्रेमी के नाराज हो जाने का डर रहता है। अमां यार, नाराज होने दो इन्हें.....। ये जायेंगे साले तो कई और आयेंगे। साथ वो रहेगा जो सब जानने के बाद भी सहज रहेगा। तो जीते जी अपनी प्रेमकहानियों को शब्द दो। भले नाम वाम बदल दो।

3- कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो।

4- महिलाओं लड़कियों का एक ई मेल डाटाबेस बनाइए और उन्हें रोजाना इस बात के लिए प्रमोट करिए कि वो खुलें। चोखेरबाली पर जो चल रहा है, उसे मेल के रूप में उन्हें भेजा जाए।

5- छात्राओं को विशेष तौर पर इस ब्लाग से जोड़ा जाए क्योंकि नई पीढ़ी हमेशा क्रांतिकारी होती है और उसे अपने अनुरूप ढालने में ज्यादा मुश्किल नहीं होतीं। उन्हें चोखेरबाली में लिखने का पूरा मौका दिया जाए।

6- एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह, ताकि आप लोग गंभीरता व मूल्यों के आवरण में जिन चीजों को कहने में हिचक रही हैं, जिस युद्ध को टाल रही हैं, इस समाज के खिलाफ जिस एक अंतिम धक्के को लगाने से डर रही हैं, वो सब शुरू हो जाए।

जय चोखेरबालियां
यशवंत
Posted by यशवंत सिंह yashwant singh at 6:40 PM
Labels: पतनशील लड्कियाँ


6 comments
Mired Mirage said...
बढ़िया सुझाव हैं । मैं तो आपका सुझाव पढ़ने से पहले ही कंचन सिंह चौहान जी के स्त्री बनाम पुरुष पर अपनी भड़ास टिप्पणी के रूप में लिख आई हूँ ।
घुघूती बासूती
February 20, 2008 7:17 PM

रचना said...
"खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं। "
क्यो हम वैसा लिखे जैसा भड़ासी लिखते ?? कोई खास वजह भी बताये की ऐसा भड़ास पर क्या हुआ हैं जो किसी के लिये भी प्रेरणा का सूत्र हैं ? क्या उपलब्धि हैं भड़ास की , क्या किया हैं भड़ास ने ? एक सामुहिक ब्लॉग हैं भड़ास जहाँ आप जो चाहे लिख सकते हैं , भड़ास के पुनर्जनम से पहले जो पोस्ट आया करती उसमे गाली , नारी शरीर संरचना और बहुत कुछ होता था जिसका कोई महत्व ही नहीं हैं
नहीं मुझे तो नहीं चाहीये ऐसी पतन शीलता ।
" कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो। "
क्यो क्या ऐसा करने से कोई क्रांती आ जायेगी ?? क्या इससे समाज मे फैली रुदीवादी परम्पराये खत्म हो जाएगी ?
"एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह "
कब तक स्त्री को ये सुनना है , ऐसा करो इसकी तरह रहो , हमारी तरह बनके देखो !!!! चोखेर बाली का मतलब और मकसद क्या अब हमे किसी और से समझना होगा ?? क्या हम इतने भी परिपक्व नहीं है की सोच सके हमे क्या करना हैं ?? कमाल हैं एक और सीख !!
मेरे पास तो कोई ऐसा वाकया या संस्मरण नहीं हैं जिनका जिक्र कर के मै अपनी पतन शीलता का झंडा फेहरा सकूं पर ऐसे बहुत से संस्मरण हैं जहाँ मैने समाज से हर वह अधिकार लिया जो किसी पुरूष को मिलता , अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी जीने का । मुझे अगर शराब और सिगरेट की जरुरत महसूस होगी तो मै इसलिये लूगी की मुझे उसकी जरुरत हैं इसलिये नहीं की यशवंत लेते हैं । मुझे बराबरी पुरूष से नहीं करनी है क्योंकी मै तो जनम से पुरूष के बराबर ही हूँ । और मुझे ये सिद्ध भी नहीं करना है , मुझे केवल उज्र हैं की समाज स्थापित उस रुढ़ीवादी सोच से जहाँ स्त्री को उसकी शरीर की संरचना की वजह से बार बार अपमानित होना पड़ता है और मै अपनी हर सम्भव कोशिश करती हूँ कि इस के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखूं । मानसिक परतंत्रता से ग्रसित है स्त्री वर्ग और बदलना जरुरी है उस सोच का
February 20, 2008 9:33 PM

swapandarshi said...
अगर भडासी, इस म्लोग मे लिखने लगे, और तय करने लगे कि क्या लिखना होगा. टो मुझे इस ब्लोग की सदस्य्ता को लेकर सोचना होगा
February 20, 2008 10:08 PM

Pramod Singh said...
भइया, इस टिल्‍ली-बिल्‍ली उद्यीपन में मैं, बतौर एक ब्‍लॉगर और इस सामाजिक स्‍पेस को शेयर करते हुए- रचना व स्‍वप्‍नदर्शी की प्रतिक्रियाओं के साथ हूं. यही अच्‍छा है कि सब अपना सबक स्‍वयं लें.. बस इस बात से ज़रा ताज्‍जुब होता है कि नतीजों तक पहुंचने की ऐसी हड़बड़ क्‍यों मची हुई है? मानो किसी सलाने जलसे में ईनाम बंटनेवाला है कि यह सही और यह गलत!.. बिना नाटकीयता के अलग-अलग पर्सपेक्टिव नहीं बनाते रखे जा सकते?
February 20, 2008 11:34 PM

ओमप्रकाश तिवारी said...
रचना व स्‍वप्‍नदर्शी ne sahi kaha
February 21, 2008 12:49 AM

(चोखेरबाली से साभार)

इसलिए पतित होने दो ताकि वह अपने लिए स्पेस गढ़ सके

((आजकल भड़ास के अलावा मैं कुछ दूसरों ब्लागों पर टिप्पणियां कर रहा हूं और पोस्ट लिख रहा हूं। मनीषा पांडेय का ब्लाग है बेदखल की डायरी। इस ब्लाग पर मनीषा जो लिखती हैं, उसे मैं बड़े चाव के पढ़ता हूं। उनके लिखने का अंदाज बिलकुल भड़ासियों जैसा होता है। बिलकुल साफ साफ मन की बात, सोच, इरादे लिख देती हैं। तो मनीषा ने अपने इसी अंदाज, साहस या दुस्साहस के क्रम में एक पोस्ट चोखेरबाली पर लिख मारी...हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं। इस पोस्ट को काफी पढ़ा गया। उसके बाद उन्होंने लिखा..क्या पतनशीलता कोई मूल्य है? मैंने इसी पर टिप्पणी की है, जो इस तरह है....यशवंत))

यशवंत सिंह yashwant singh said...
सारी भाई मनीषा, गलत नाम लिखने के लिए। देखो, नाम तक याद नहीं है, बस लिखने की तुम्हारी स्टाइल व कंटेंट व याद है।

आपकी तारीफ करने के क्रम में मैं अपनी एक असहमति का जिक्र नहीं कर पाया था, वो अब कर रहा हूं।

आपका उपसंहार सैद्धांतिक तौर पर अच्छा है, लिखा अच्छे से है, पर व्यावहारिक नहीं है। पतित होने के लिए जिस बड़े विजन, बड़े फलक, बड़े संदर्भों की शर्त लगा दी है वो उचित नहीं है।

भइया, लड़की को मुक्त होने दो। उस ढेर सारी चीजें न समझाओ, न बुझाओ और न रटाओ। उसे बस क से कबूतर पढाओ। माने अपनी मर्जी से जीने की बात सिखाओ। आत्मनिर्भर होने को कहो। दिल की बात को सरेआम, खुलेआम रखने का साहस दो।

मनमर्जी करेगी तो जाहिर सी बात है कि गलत भी करेगी, सही भी करेगी। दिल की बात कहेगी तो अच्छी बात भी कहेगी, बुरी बात कहेगी। पर ये क्या कि स्त्री पतित हो लेकिन विचारधारा का चश्मा लेकर, नैतिकता का आवरण ओढ़कर, महिलावादी विजन लपेटकर.....।

इस लड़की को अभी सिर्फ इसलिए पतित होने दो कि वह इससे अपने लिए स्‍पेस पा सकती है, वह इससे चीप किस्‍म की ही सही, निजी आजादी पा सकती है।

समूची मानवता, उदात्तता, रचनात्मकता...ये सब तब होंगी जब वह अपने निजी स्पेस की जंग को जीत ले। रिएक्ट करने में सफल हो जाए। इतने महान लक्ष्य अभी से देंगी तो वैसे ही महानता के बोझ से दबी स्त्री फिर और महान हो जाएगी और पतित होने से रह जाएगी।

मैं तो कहूंगा इस पतनशीलता को किसी मूल्य से न जोड़ो। इसे मूल्यहीन पतनशीलता कहना पड़े तो खुल के कहो। चीजें क्रमिक तरीके से विकसित होती हैं। अभी रिएक्ट कर लेने दों, स्पेस ले लेने दो, चीप किस्म के सुख जी लेने दो....अपने आप इससे मन उबेगा और फिर अंदरखाने बड़े सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। लेकिन अगर पतन होने के लिए पहले ही ढेर सारे मूल्य वगैरह बना दिए तो फिर सब टांय टांय फिस्स.....

एक बढ़ियावाली बहस शुरू करने के लिए आपको बधाई।
जय भड़ास
यशवंत
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