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7.12.08

साहित्यिक छिछोरों डा .रूपेश श्रीवास्तव बन कर दिखाओ तो जरा

राजीव करुणानिधि,वरुण जायसवाल और वो लोग जिनके मां-बाप ने अब तक उनके नाम नहीं रखे अब तक बेनामी हैं, पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि वरुण जी ने न तो कभी डा.रूपेश श्रीवास्तव को पढ़ा है और न ही उनके व्यक्तित्त्व से जरा सा भी परिचित हैं। भाषा की श्लीलता और अश्लीलता के पैमानों से उन्हें मत नापिये उनके सामाजिक और साहित्यिक कद की पैमाइश के लिये आपको वातानुकूलित घर से निकल कर झोपड़ॊं मे श्रमिकों के साथ, सड़कों पर सोने वाले भिखारियों और बच्चों के साथ, जिस्मफ़रोशी करने वाली लाचार माताओं के साथ और हम जैसे लैंगिक विकलांगों के साथ चंद घंटे या दिन नहीं बल्कि अपनी M.D. Ph.D जैसी बड़ी डिग्रीज़ को किनारे रख कर,एक धनी परिवार की विरासत छोड़ कर,सन्यस्त रह कर जीवन जीने वाले इस परित्राता मसीहा को नापने के लिये नया पैमाना लाना होगा। दिवा से पनवेल और खोपोली तक होने वाले जहरीली शराब के व्यापार को अकेले अपने आत्मबल की ताकत से इस शख्स ने समाप्त करा दिया, मुझ जैसे अनेकों इंसानो को जिनके माता-पिता ने तक सड़कों पर धक्के खाने को छोड़ दिया था इस मसीहा ने सहारा दिया घर, हिंदी सिखाया, गालियां देकर कमर्शियल सेक्स वर्क करने वाले हिजड़े को बहन कह कर सम्मानित दर्जा दिलवाया, कम्प्यूटर सिखाया। जिस ब्लाग भड़ास पर आप उन्हें कलंक कह रहे हैं शायद आप जानते ही नहीं कि यशवंत दादा और डा.रूपेश श्रीवास्तव उस ब्लाग के माडरेटर हैं वे अगर चाहते तो आपका कमेंट हटा सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करा बल्कि आपसे बातचीत और विचारों के आदान-प्रदान का पुल बना लिया। आशा है कि आप मेरी बातों से व्यथित न होंगे। मै यह भाषा प्रयोग कर आपको ये सब लिख पा रही हूं उस बात का श्रेय आपके द्वारा कलंक ठहराये गए डा.रूपेश श्रीवास्तव को ही जाता है किसी बौद्धिक और साहित्यिक मुखौटाधारी ब्लागर को नहीं वरना यशवंत दादा जानते हैं कि भाई ने ही मुझे एक "भड़ासी डिक्शनरी" दी थी जो मुझे अब तक पूरी याद है। राजीव करुणानिधि नामक छिछोरा डा.साहब के ब्लाग आयुषवेद पर जाकर सुअरपन कर रहा है उसे चेतावनी है कि बेटा सुधारे नहीं तो ध्यान रखना हम भड़ासी वैसे भी घोषित तौर पर बुरे लोग हैं तुम्हारी तरह अच्छाई का मुखौटा नहीं लगाते,तुम्हारी औकात तुम्हें दिखाने में जरा भी देर न लगाएंगे।
जय जय भड़ास
मनीषा नारायण
माडरेटर "अर्धसत्य" ,सलाहकार "भड़ास"

5.4.08

पत्रकार मनीषा पांडेय,मैं अर्धसत्य नामक ब्लाग की माडरेटर मनीषा नारायण हूं

"ब्लागर और पत्रकार मनीषा पांडेय ने वेबदुनिया डाट काम को टाटा बायबाय कह दिया है। उन्होंने दैनिक भास्कर से खुद को जोड़ लिया है। वे भोपाल में अपना नया काम एक अप्रैल को संभाल लेंगी। मनीषा चर्चित ब्लाग बेदखल की डायरी की माडरेटर हैं। उन्होंने वेब दुनिया में हिंदी ब्लागिंग को लेकर काफी कुछ काम किया है। मनीषा की नई नौकरी पर भड़ास की तरफ से ढेरों शुभकामनाएं।"

आज कई दिन बाद जबसे यशवंत दादा वापिस गये हैं तबसे अब तक मैं अपने भाई डा.रूपेश के घर आने का समय नहीं निकाल पायी थी। आज मीडिया रिलेटेड इन्फ़ार्मेशन वाली पट्टी पर इस खबर को देख कर एक बार फिर से मन में कुछ टीस सी उभर आयी। मुझे याद है कि मेरे और मनीषा पांडेय के नाम एक जैसे होने के कारण कितना विवाद हुआ था। यशवंत दादा ने बिना शर्त माफ़ी मांगी, मैंने भी भाई के कहने पर इससे माफ़ी मांगी कि आपको मेरा नाम मनीषा होने पर दुःख हुआ इसके लिये माफ़ करें, इस लड़की ने मेरे भाई को फोन करके कानूनी तिकड़मों की धमकी दी लेकिन भाई ने इसे अपने ही अंदाज़ में हंस कर सहन कर लिया। मैं भी उस घटना को भूलने की कोशिश कर ही रही थी कि एक बार फिर इसका नाम भड़ास पर दिखा तो लगा कि किसी ने ज़ख्म में उंगली डाल कर कुरेद दिया हो। हिन्दी के लिये बहुत कुछ किया होगा इस लड़की ने पर इसने एक बार भी यह नहीं माना आज तक कि जो कुछ भी इसने किया था वो एक गलतफहमी के चलते हुआ या इसने जो लोगों का दिल दुखाया उसके लिये इसे जरा भी शर्मिंदगी हुई है। मन में पीड़ा एक बार फिर से उभर आयी है कि इस लड़की को एकबार तो कम से कम कह दूं कि तुमने जो किया था वो गलत और पीड़ादायक था,तुम्हारे साथ लोगों की सहानुभूति इसलिये चिपक जाती है क्योंकि तुम एक स्त्री हो और मेरा तिरस्कार इस लिये कर दिया जाता रहा है क्योंकि मैं एक लैंगिक विकलांग हूं,हिजड़ा हूं। मुझे घिन आती है तुम्हारे जैसी सोच से चाहे तुम कितने भी बड़े सामाजिक कद के क्यों न हो तुम्हारी सोच का बौनापन हम सबने देखा है, अगर सचमुच पत्रकारिता करती हो या सुलझी सोच का एक अंश भी है आत्मा के किसी कोने में आज भी जीवित तो मुझसे आकर मिलो और एहसास करो अपनी गलती का।

जय भड़ास

21.3.08

ध्रतराष्ट्र बने संपादक , दुःशासन हुई पत्रकारिता और सभा में नंगी करी गयी तुम सबकी लैंगिक विकलांग बहनें



गुस्सा और दुःख इतना ज्यादा है कि लग रहा है खूब जोर से चिल्लाऊं । जब तक भड़ास से नहीं जुड़ी थी यकीन मानिए कि शर्म क्या होती है पता ही नहीं था लेकिन डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे अपनी बहन बना कर मेरी जिन्दगी में इतना ज्यादा बदलाव ला दिया है कि जब मेरे और मेरी ही जैसी दूसरी लैंगिक विकलांग बहनों के सारे कपड़े उतरवा कर परेड करवाई गई तो एक पल को लगा कि लोकल ट्रेन से कट कर जान दे दूं लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने मेरे डा.भाई का चेहरा आ गया जो हमेशा मुझे हिम्मत दिलाते रहते हैं कि दीदी एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि ये लोग जो आपको इंसान नही समझते अपने करे पर शर्मिंदा होंगे ; फिर एक-एक करके मेरे सामने मेरे भाई पंडित हरे प्रकाश,यशवंत दादा,मनीष भाई,चंद्रभूषण भाई सामने आने लगे और मैं फिर पूरी ताकत से अन्याय का सामना करने के लिये खड़ी हो गयी हूं । मुंबई से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक वार्ताहर और उर्दू दैनिक इन्कलाब ने एक खबर छापी जिसकी हैडिंग उन्होंने महज सनसनी फैलाने के लिये ऐसी रखी कि लोग उस खबर को चटखारे लेकर पढ़ें ,जरा आप सब खबर के हैडिंग पर ध्यान दीजिये "हिजड़े द्वारा लोकल ट्रेन के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में महिला से बलात्कार की कोशिश" । बस फिर क्या था बड़ी-बड़ी वारदातें हो जाने के बाद भी कुम्भकर्ण की तरह से सोने वाली मुंबई पुलिस का लैंगिक विकलांग लोगों पर कहर टूट पड़ा । हम सफर करें तो ट्रेन के किस डिब्बे में अगर पुरुषों के साथ जाएं तो सुअर किस्म के लोग जिस्म रगड़ने का बहाना देखते हैं ,कुत्सित यौन मानसिकता के नीच पुरुष भीड़ का बहाना कर के सीने और नितंबों पर हाथ लगाते हैं ,हमारे हाथॊं को पकड़्ते हैं पर हमें तो शर्म नहीं आनी चाहिए और न ही हमें गुस्सा आना चाहिये इन कमीनों की हरकत पर क्योंकि शर्म तो नारी का गहना होती है और हम तो न नारी हैं न नर । महिलाओं के डिब्बे में जाओ तो कुछ सुरक्षित महसूस होता था लेकिन इस सभ्य समाज के मुख्यधारा की पत्रकारिता के इस हथियार ने हमें यहां से उखाड़ कर बेदखल कर दिया है । ध्यान दीजिये कि अगर कोई अपराधी किस्म का इंसान बुर्का पहन कर ऐसी नीच हरकत करता तो क्या ये पत्रकार और संपादक महोदय ये हैडिंग बनाते कि एक मुसलमान महिला ने दूसरी महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश करी ,नहीं ,ऐसा तो वे हरगिज़ नही करते क्योंकि इस बात से सनसनी नहीं फैल पाती लेकिन एक हिजड़े के बारे में ऐसा लिखा तो सबका ध्यान जाएगा । अरे कोई तो इन गधे की औलादों को समझाए कि अगर हिजड़ा है तो बलात्कार क्या पैर के अंगूठे से करेगा ,वो तो महज एक अपराधी था जो हिजड़े का वेश बना कर आया था । संपादक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो ये देखे कि ऐसी खबर का क्या परिणाम होगा । अब मुझे समझ में आ रहा है कि देश में जातीय दंगों को फैलाने में मीडिया का क्या रोल रहता है ,अगर किसी ने मौलाना का वेश बना कर किसी को गोली मार दी तो ये पहले मरने वाले को देखेंगे कि क्या वो हिंदू था और फिर खबर बनाएंगे कि मुसलमान ने हिंदू की हत्या कर दी फिर भले पूरे देश में जातीय दंगों की आग भड़क कर सब स्वाहा हो जाए । हिजड़े को निशाना बना कर खबर छाप दी और चालू हो गया पुलिस का धंधा ,सब को नंगा करके परेड कराई गई ताकि देखा जा सके किसके जननांग कितने विकसित हैं या क्या है हिजड़े की कमर के नीचे और टांगो के बीच में ? इन कमीने पत्रकारों को अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं अपनी ताकत इस्तेमाल करके जेंडर आईडेंटीफ़िकेशन का कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाते ? कम से कम हमें भी तो ये पता चल जाएगा कि हम किस डिब्बे में यात्रा करें । किसी पत्रकार ने रेलवे पुलिस से यह नहीं पूछा कि जब हर महिला डिब्बे में एक रेलवे पुलिस का सुरक्षाकर्मी तैनात रहता है तो जब वो अपराधी बलात्कार की कोशिश कर रहा था तो क्या वो पुलिस वाला तमाशा देख रहा था या अपनी अम्मा के साथ सोने गया था , क्या यात्रियों की सुरक्षा की रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? मैने नीच पुलिस वालों के हाथॊं को अपने जिस्म पर रेंगते हुए महसूस किया ,ये सुअर किसी गंदी दिमागी बीमारी के मरीज जान पड़े मुझे सारे के सारे । क्या मेरी इस अस्तित्व की लड़ाई में मेरे भड़ासी भाई-बहनें साथ हैं ये सवाल आप सब से है ,नाराज मत होइएगा कि ये क्या होली के रंग में तेज़ाब मिला रही है लेकिन बात ही ऐसी है । मेरे भाई डा.रूपेश अभी आधी रात को भी मेरे साथ हैं कि कहीं शर्मिन्दगी से मैं कुछ गलत निर्णय न ले लूं इस लिये जबरदस्ती मुझे पकड़ कर अपने घर ले आए हैं । होली मनाइए लेकिन अपनी इस बदकिस्मत बहन के बारे में भी सोचियेगा ।

2.3.08

मनीषा बहन से माफ़ी

न जाने कितनी बार लिखा और मिटाया ,समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे बात शुरू करें । लेकिन जो मन में है वो तो कहना ही है क्योंकि भाई बोलते है कि अगर मन में बात रखा तो बीमार हो जाते हैं । अभी मेरे नाम वाली मनीषा बहन से एकदम सीधी बात कि आपको मेरे कारण परेशानी और दुख हुआ तो माफ़ करिये मुझे और मेरे भाई को । भाई तो इमोशनल हैं तो उन्होंने मेरे को लेकर एकदम डिफ़ेंसिव तरीका अपना लिया वो भी गलत नही हैं । आप लोगों के सामने मैं भाई की लिखी एक कविता रख रही हूं जिससे आप सबको भाई की सोच की गहराई और प्रेम व करुणा का अंदाज हो जायेगा ।

ए अम्मा,ओ बापू,दीदी और भैया
आपका ही मुन्ना या बबली था
पशु नहीं जन्मा था परिवार में
आपके ही दिल का चुभता सा टुकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
कोख की धरती पर आपने ही रोपा था
शुक्र और रज से उपजे इस बिरवे को
नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे माई
फलता भी पर कटी गर्भनाल,जड़ से उखड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?
अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं
सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज
मैं ही बस ममतामय गोद से बिछुड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सबके लिए मानव अधिकार हैं दुनिया में
जाति,धर्म,भाषा,क्षेत्र के पंख लिए आप
उड़ते हैं सब कानून के आसमान पर
फिर मैं ही क्यों पंखहीन बेड़ी में जकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
प्यार है दुलार है सुखी सब संसार है
चाचा,मामा,मौसा जैसे ढेरों रिश्ते हैं
ममता,स्नेह,अनुराग और आसक्ति पर
मैं जैसे एक थोपा हुआ झगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
दूध से नहाए सब उजले चरित्रवान
साफ स्वच्छ ,निर्लिप्त हर कलंक से
हर सांस पाप कर कर भी सुधरे हैं
ठुकराया दुरदुराया बस मैं ही बिगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
स्टीफ़न हाकिंग पर गर्व है सबको
चल बोल नहीं सकता,साइंटिस्ट है और मैं?
सभ्य समाज के राजसी वस्त्रों पर
इन्साननुमा दिखने वाला एक चिथड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लोग मिले समाज बना पीढियां बढ़ चलीं
मैं घाट का पत्थर ठहरा प्रवाहहीन पददलित
बस्तियां बस गईं जनसंख्या विस्फोट हुआ
आप सब आबाद हैं बस मैं ही एक उजड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
अर्धनारीश्वर भी भगवान का रूप मान्य है
हाथी बंदर बैल सब देवतुल्य पूज्य हैं
पेड़ पौधे पत्थर नदी नाले कीड़े तक भी ;
मैं तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सोचिये हमारे बारे में भी ,मनीषा बहन से एक बार फिर माफ़ी मांगती हूं । अब आप सब लोग होली की तैयारियां करिये ।
नमस्ते
नमस्ते

29.2.08

मनीषा दीदी का अस्तित्त्व का खौफ़ सता रहा है शीर्षस्थ ब्लागरों को

एक पल के लिए तो अंदर काफ़ी कुछ कौंध गया लेकिन जो हो रहा है वह तो मानव अस्तित्त्व में सभ्यता की शुरूआत के साथ ही शुरू हो गया था तो जब जब कोई सहज सरल सा आदमी सत्य को अपनी अनगढ़ सधुक्कड़ी भाषा में अभिव्यक्त करेगा तो स्वयंभू सभ्यजन उस पर पत्थर फेंकेंगे ही और अब तो ये लोग गनीमत है कि सूली पर नहीं चढ़ा देते । रही बात गालियों कि तो क्या गालियां इनकी विकसित होती सभ्यता के साथ ही नहीं चल रही हैं ? यकीन है कि भाषा का विकास जिस दिन हुआ होगा उस दिन ही सबसे पहली गाली दी गयी होगी । मैंने सोचा था कि यदि कभी ब्लागर मीट हुआ तो मनीषा दीदी को साथ लेकर आउंगा और आप सबसे प्रत्यक्ष ही परिचय करवाउंगा पर अब मैं सोच रहा हूं कि ऐसा सोच कर मैंने कदाचित गलती करी क्योंकि लोग अभी इतने सरल सहज नहीं हुए कि मनीषा दीदी जो कि इनके ही मानसिक षंढत्व को आइना दिखाने जा रही थीं ये लोग उन्हें ब्लागर मीट में ही पेटीकोट उठा कर चढ्ढी उतारने को कहते कि हम लोग तभी मानेंगे जब खुद हाथों से गुप्तांग छूकर देखेंगे या आखों से देखेंगे । लेकिन सच तो ये है कि इन सबको अपने अपने भीतर में एक मनीषा दीदी दिखने लगीं हैं तो ये हरकत इनकी हड़बड़ाहट का परिणाम है । मनीषराज तो औघड़ साधुओं वाली भाषा प्रयोग करते हैं उसमें कुछ बुरा नहीं है बल्कि कथित शीर्षस्थ ब्लागरो का सिंहासन हिलने लगा तो उन्हें इस पर आपत्ति होने लगी । जिसए जितने पत्थर मारने हैं मार ले हम विचार हैं मरते नहीं वरना इन लोगों ने तो कब का हमें समाप्त कर दिया होता लेकिन ये नहीं जानते कि जब तक हम कथित बुरे लोग हैं तभी तक इनके पास खुद को अच्छा कहने का पैमाना है वरना इन्हें कौन अच्छा कहेगा ? एक दूसरे की प्रशंसा ही करते जिंदगी बीतेगी । मनीषा दीदी का अस्तित्त्व अब ब्लाग से निकल कर इन सब में समा गया है अब उन्हें किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है । और एक खुला चैलेंज कि अगर जिसे मनीषा दीदी के अस्तित्त्व पर संदेह है वह मुझसे मिले लेकिन एक शर्त है कि उसे या तो मनीषा दीदी को पत्नी का दर्जा कानूनी तौर पर देना होगा या आजीवन २०,००० हजार रुपए प्रतिमाह देने होंगे या अगर ये मंजूर न हो तो स्वयं को सर्जरी करवा कर उनके जैसा बनवाना होगा इसमें उन्हें कोई कानूनी दिक्कत नहीं आएगी इसकी जिम्मेदारी मेरी है यह आपरेशन मैं वेल्लूर मेडिकल हास्पीटल ,तमिलनाडु से कानूनी तौर पर करवा दूंगा अगर कानूनी दिक्कत आयी तो मैं आजीवन उस व्यक्ति का दास बन कर रहूंगा । इन बातों से कोई ये न सोचे कि मैं यह सब खीझ कर कह रहा हूं बल्कि ये तो मेरा विश्वास है और मेरे कर्म हैं जिन्हें मैंने अपनी गुरूशक्तियों की ताकत व आशीर्वाद से सामाजिक जीवन में जिया है । जिस भी सभ्य व्यक्ति को मनीषा दीदी से मिलना हो वो मुझसे तत्काल सम्पर्क करे लेकिन ध्यान रखिए कि हर बात की कीमत होती है तो आप भी अपने संदेह के निवारण के लिए कीमत चुकाइए मैं तो ताल ठोंक कर खड़ा हूं ;सांच को आंच नहीं दो और दो पांच नहीं । जिसमें साहस हो वो आगे आए दूर खड़ा रह कर आरोप न लगाएं । अश्लीलता या श्लीलता के बीच की सीमारेखा का निर्धारण का ठेका प्रगतिशील लोगों ने ही ले रखा है क्या कि जिसे चाहा सराहा जिसे चाहा तिरस्कार कर दिया ,बस इन सभी आरोप लगाने वालों से एक बार हिम्मत जुटा कर खुद के भीतर झांकने की अपील है..............
जय जय भड़ास

26.2.08

भड़ासी डिक्शनरी

अभी बहोत देर तक बैठ कर पोस्ट लिखा और कम्प्यूटर हैंग हो गया तो मैंने रिस्टार्ट कर दिया और सारा टाइप किया गायब हो गया ।
एकदम थक गयी हूं पर आप लोग का प्यार देख कर फिर हिम्मत कर रही हूं । मैं आप लोग को बताना चाहती हूं कि मुझे डा.भाई ने एक दस लाइन का डिक्शनरी दिया था ताकि मैं गंदा गंदा न लिख दूं गलती से । हम लोग तो बात करने में जो भाषा वापरते हैं अब पता चला कि वो अच्छे लोग नहीं वापरते । जब मेरे बारे में बह्स हो गयी तो मन किया कि जम कर गाली दूं पर भाई ने रोक दिया कि दो दिन बाद लिखना पहले बाकी लोग का भी बात देखो ,अब सब ठीक है । अभी डा.भाई ने मुझे इजाजत दे दिया है कि मैं जैसा मन में आये वो लिखूं। अगर लिखना जरूरी हो तो क्या लिखना होगा ताकि गंदा न लगे । सच में तो आज तक किसी ने बताया ही नहीं कि क्या अच्छा क्या गंदा है
अब मैं जान गयी हूं कि भाई ने मुझे क्यों यह कहा था कि मैं कुछ पुरानी पोस्ट्स पढ़ूं लेकिन आप लोग भी गाली लिखते हैं जब मैंने भाई से पूंछा कि मैं गाली क्यों न दूं तो उन्होंने ताकीद किया कि जिसे जो लिखना है लिखने दो ,आप वही भाषा लिखना जो मैंने कहा है । लेकिन अब भाई ने मुझे फ़्री कर दिया है कि मैं जो चाहूं लिख सकती हूं ।
अभी आप लोग से एक सवाल कि क्या आप एक लैंगिक विकलांग को बेबीसिटर ,ट्यूटर,वाचमैन,घरेलू नौकर या अपने आफ़िस में कलीग के तौर पर आसानी से सहन कर सकते हैं ? जबाब जरूर दीजिए

25.2.08

मैं शरीर से हिजड़ा और आप आत्मा से हिजड़े हैं

आज दो दिन पहले आप लोग के ब्लोग पर मैंने अपने भाई डा.रूपेश के कहने पर मेम्बर बन कर एक पोस्ट लिखा था । इस पोस्ट को लेकर कुछ लोग को प्राब्लम होने लगा कि ये मनीषा कौन है ? मेरी हिन्दी तो ऐसी है कि जितना भीख मांगते समय आशीर्वाद देने या फिर गालियां देने को काम आती है पर डा.भाई ने बताया कि अपना ब्लोग बनाना और उस पर लिखने के लिये अच्छा भाषा जानना चाहिए । मेरी भाषा मलयालम है और मैं मराठी ,इंग्लिश,तेलुगु,तमिळ बोल लेती हुं । आप लोग का लिखा हुआ मेरे को ज्यादा समझ में नहीं आता आर्थिक ,अस्तित्व,मसिजीवी या शुचितावादी का क्या अर्थ होता है ? हमारी प्राब्लम तो जिंदगी को आसान तरीके से जीना है जैसे राशन कार्ड,ड्राइविंग लाइसेंस,मोबाइल के लिए सिम कार्ड के वास्ते फोटो लगा हुआ आइडेंटिटी प्रूफ़ जैसे कि पैन कार्ड वगैरह अभी आप लोग बताओ किधर से लाएं ये सब ? उंगलियां दरद करने लगती हैं टाइप करने में लेकिन ऐसा लगता था कि इंटरनेट पर ब्लोग पर लिखने से प्राब्लम साल्व होगा पर इस खुशी में हम सब लोग ये भूल गए कि इधर भी तो वो ही लोग हैं जो ट्रेन में,सरकारी आफिसों में मिलते हैं । अभी हिन्दी टाइप करना आता है तो इन्हीं उंगलियों से इतना गंदा गंदा गाली भी टाइप कर सकती हूं कि मेरे और मेरे भाई के बारे में बकवास करने वाले लोग को वापिस मां के पेट में घुस कर मुंह छुपाना पड़ जायेगा लेकिन मुझे इतना तो अकल मेरे भाई ने दिया कि ऐसा लोग के मुंह नहीं लगना चाहिये ,हम लोग तो शरीर से हिजड़े हैं पर ये तो आत्मा से हिजड़े हैं इस वास्ते मैं इन आत्मा से हिजड़े लोग को गाली भी देकर इनका भाव नहीं बढ़ाना चाहती हूं अगर भड़ास पर मेरे होने से आप लोग को दिक्कत है तो भड़ास पर मैं पोस्ट भेजना बंद कर देती हुं ताकि लोगों को मेरे होने से अड़चन न हो क्योंकि हमे तो मुंबई में सार्वजनिक टायलेट तक में इसी प्राब्लम का सामना करना पड़ता है कि जेन्ट्स टायलेट में जाओ तो आदमी लोग झांक कर देखना चाहते कि हमारे नीचे के अंग कैसे हैं और लेडीज टायलेट में जाओ तो औरतें झगड़ा करती हैं । बस यही हमारी दिक्कते हैं जो हमें जिंदगी ठीक से नहीं जीने देतीं और हम अलग से हैं । अभी उंगलियां अकड़्ने लगी हैं मैं इतना लिख भी नहीं पाती पर आप लोग के दुख ने ताकत दिया लिखने का । अभी जब तक आप लोग नहीं बोलेंगे मैं भड़ास पर नहीं लिखूंगी ।
नमस्ते