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29.12.08

साला चोर कहीं का...मारो इसको/इसकी..कमीना शब्दचोर

आदरणीय अशोक पाण्डेय जी से करबद्ध क्षमा चाहता हूं क्योंकि मैं ठहरा निपट चूतिया तो पाप और गुनाह को एक जैसी ही "चीज" समझ बैठा अब पता चला कि ये भाषाई अंतर है हिंदी और उर्दू का इसमें शब्दकोश नहीं देखना चाहिये/ग्यान तो नहीं पर एक शब्द है "ज्ञान" जिसे बांटने के लिये कुछ छात्र चाहिये २००९ में आफ़र है सस्ते में बांट रहा हूं अगर आपकी जानकारी में हों तो मेहरबानी करके मेरी दुकान चलवा दीजिये आजीवन दुकान पर "साभार" लिख कर टांगे रहूंगा। कानून की मां-बहन करने के लिये जस्टिस आनंद सिंह ही काफ़ी हैं लेकिन आप तो बस मेरी करिये क्योंकि आप उन्हें जानना नहीं चाहेंगे या फिर है सच जानने की ताकत(वैसे चुप ही रहेंगे ऐसी उम्मीद है) बुरा आदमी हूं, चोर हूं, गलीज़ हूं अंतरात्मा क्या बहिरात्मा क्या कुछ है ही नही... ईमान,दोस्ती,सच्चाई वगैरह जैसे गरिष्ठ आचरण से दूर रहता हूं इससे पेट खराब हो जाता है और जुलाब हो जाता है कोई आयुर्वेविक दवा असर नहीं करती इसलिये हलकट पन में ही स्वास्थ्य तलाश कर भला हूं। चोर हूं इसलिये भड़ास की आत्मा तक चुरा ली है। आदरणीय सुशील जी के लिये मेरा मोबाइल नं.
09224496555, मेरा ई-मेल rudrakshanathshrivastava7@gmail.com , मेरा ब्लाग - http://aayushved.blogspot.com/
जितनी गालियां चाहें दे/प्यार देना चाहें दे सकते है मुकुन्द ने जो करा उसके लिए उसको इतनी गालियां दीजिये कि आप द्वारा दी गयी गालियों को संग्रह कर एक नयी किताब प्रकाशित करा सके
आत्मन अंकित ने जो लिखा वह अंग्रेजी में है तो समझना कठिन है आशा है अगली बार वे हिंदी में लिखेंगे तो मुझ देसी पिल्ले की समझ में आ सकेगा और रही बात बेनामी, अनामी, गुमनामी की तो आपको बस इतना बताना था कि कम से कम जो खुल कर गालियां दे पाने का साहस था, लेकिन ध्यान रहे गालियां मौलिक हों मादर-फादर छाप परम्परागत गालियों को हमने कापीराइट करा लिया है अतः उन्हें प्रयोग नहीं करें:)
जय जय भड़ास

14.12.08

राजीव करूणानिधि! आओ मुझ हिजड़े से पंजा लड़ाओ

ये रही तुम्हारी टिप्पणी और साथ में है मेरा जवाब ताकि डा.साहब की पोस्ट की तरह कोई गलतफ़हमी पैदा न हो...
हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा, तू जिस तरह से भभक रही है इससे तो साफ़ जाहिर होता है कि तू जिस्म से नहीं दिमाग से भी हिजडा है. तेरी औकात क्या है मै जान चूका हूँ, मेरी औकात नापने का प्रयास मत करो, तेरे जैसी बेहूदी शख्स से मै मुह भी नहीं लगाना चाहता. मैंने डॉ रुपेश को कोई गाली नहीं दी थी, बस सलीके से एक जवाब लिखा था कि ''कृपया अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करे. अन्यथा ये समझा जायेगा कि आपकी मानसिक स्थिति अच्छी नहीं है.'' रही बात शराफत की चादर ओढ़ने की बात तो मै बता दू कि ये चादर नहीं मेरा व्यक्तित्व है. और तेरी जैसी नाली के कीडे के साथ मै कोई भी रहम नही रखता. आइन्दा सलीके से जवाब देना. तू भडासी है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. पर मै जो हु उससे तुझे जरूर फर्क पड़ेगा.. डॉ रुपेश इतने अच्छे इंसान है, इसके लिये उन्हें धन्यवाद, पर क्या अपनी बात कहने के लिये या उसका महत्व बढ़ाने के लिये गाली और अभद्र भाषा का प्रयोग करना उचित है. क्या रुपेश साहब अपने घर में अपने परिवार के सामने ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते है. अपनी बात या अपनी भडास निकलने के लिये सलीके दार शब्दों का भी इस्तेमाल हो सकता है. ये जरूरी नहीं कि गाली या बेहूदी भाषा बोलकर ही भडास निकली जा सकती है. और हा जो कुकृत्य बड़े समाज में क्लबों में होते है क्या वो गाँव की गलियों में नहीं होते. अच्छे और बुरे लोग हर जगह है, सिर्फ गाली बोलकर बात करने वाले ही साहसी, स्पस्टवादी, नेक विचार और साफ़ दिल नहीं होते.


राजीव करूणानिधि! तुमने डा.रूपेश के ब्लाग आयुषवेद पर जाकर क्या टिप्पणी करी थी वो तो तुम भी जानते हो और डा.साहब भी वरना इस तरह से तुम्हें हगने के बाद लीपा पोती करने की जरूरत न पड़ती। तुमने डा.साहब को उनके ब्लाग पर जाकर जो टिप्पणी करी थी उसके बाद मैंने पोस्ट लिखी थी क्योंकि मुझे भी तुम जैसे फटीचर एक चाय पर खबर लिखने वाले चिरकुट पत्रकार के मुंह लगने में दिलचस्पी नहीं है पता नहीं एड्स वगैरह हो गया तो मैं तो परेशान हो जाउंगी तुममें तो इतना स्वीकारने का साहस नहीं है कि दम से कह सको कि हां डा.रूपेश को गाली दी क्या उखाड़ लेगा वो मेरा....। लेकिन इतना स्वीकारने के लिये आत्मबल चाहिये तुम्हारे जैसा कीड़ा सत्य को गलती करने के बाद न मानने के झूठे दम्भ का पोषण करने में ही पूरी जिंदगी गुजार देता है। डा.साहब को उनकी अच्छाई का प्रमाणपत्र तुम जैसे मुखौटाधारियों से नहीं चाहिये पहले तुम अपने गलीजपन को दूर कर लो फिर उनके ऊपर कोई टीका-टिप्पणी करने की औकात होगी तुम्हारी। अगर साहस है तो जो लिखा था उसे उन्ही शब्दों में फिर से लिखो फिर देखो कि भड़ासी होने से क्या-क्या फर्क पड़ता है अविनाश दास जैसे मठाधीश को भी ऐसी ही गलतफहमी थी। मैं ही क्या, सारे भड़ासी इस बत को स्वीकारने में घबराते नहीं कि उनके भीतर भी बुराइयां है। अब जरा तुम अपनी औकात का ढोल पीटो कि मेरा क्या उखाड़ लोगे बेटा इधर तो कुछ है ही नहीं लेकिन अगर हम चाहें तो तुम्हारा जरूर उखाड़ देंगे। भाषा की पिपिहरी बजाने से तुम अच्छे हो गये तो बने रहो रजनीश झा,यशवंत सिंह, डा.रूपेश श्रीवास्तव को तो तुम अभी जानते हो क्योंकि तुमने अभी पत्रकारिता करते हुए ब्लागिंग का "सफर" शुरू करा है वरना भड़ास का यू.आर.एल. भी टाइप करने से पहले हजार बार सोचते लेकिन फिर भी तुम्हारी हिम्मत न होती।

हम सब बेहूदे, कुंठित, गन्दे, बुरे, गलीज़, गालीबाज, दारूबाज, अभद्र, नीच और हर तरह से बुरे हैं हमसे मत उलझो। तुम्हारी औकात का मापन करके तुम्हें बताएंगे कि तुम कितने बड़े पत्रकार और ब्लागर हो। आओ दिखाओ अपना "अच्छा" व्यक्तित्व......। एक बात याद रखना बेटा कि गाली मत देना क्योंकि तुम जैसे लोग गाली नहीं देते और देते हैं तो स्वीकारने की दम नहीं रखते। तुम कितने सलीकेदार हो और तुम्हारे क्या संस्कार हैं वो तो तुमने डा.साहब के ब्लाग पर जाकर अपनी टिप्पणी से बताया है अब जरा मेरे जैसे नाली के कीड़े की औकात मैं तुम्हें बताती रहूंगी जब तक तुम्हें सही करके तुम्हारा मुखौटा उतार कर तुम्हारा असली चेहरा सामने नहीं ले आती। तुम अब अपनी शराफत की वैचारिकता का गोबर हगो ताकि पता चले कि तुम खसिया बैल हो या सांड........आओ.....आओ .....सींग मारो हमें हम तुम्हारी पिछाड़ी में डंडा ठोंक रहे हैं।

नाम के आगे करुणानिधि लगाने का नाटक करते हो लेकिन एक बात साफगोई से मानते हो कि हमारे जैसे नाली के कीड़ॊ पर तुम्हे रहम नहीं आता क्योंकि तुम्हारी करुणा का भी नाटक अब समाप्त होने वाला है......शटर डाउन होने वाला है बेटा।

7.12.08

साहित्यिक छिछोरों डा .रूपेश श्रीवास्तव बन कर दिखाओ तो जरा

राजीव करुणानिधि,वरुण जायसवाल और वो लोग जिनके मां-बाप ने अब तक उनके नाम नहीं रखे अब तक बेनामी हैं, पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि वरुण जी ने न तो कभी डा.रूपेश श्रीवास्तव को पढ़ा है और न ही उनके व्यक्तित्त्व से जरा सा भी परिचित हैं। भाषा की श्लीलता और अश्लीलता के पैमानों से उन्हें मत नापिये उनके सामाजिक और साहित्यिक कद की पैमाइश के लिये आपको वातानुकूलित घर से निकल कर झोपड़ॊं मे श्रमिकों के साथ, सड़कों पर सोने वाले भिखारियों और बच्चों के साथ, जिस्मफ़रोशी करने वाली लाचार माताओं के साथ और हम जैसे लैंगिक विकलांगों के साथ चंद घंटे या दिन नहीं बल्कि अपनी M.D. Ph.D जैसी बड़ी डिग्रीज़ को किनारे रख कर,एक धनी परिवार की विरासत छोड़ कर,सन्यस्त रह कर जीवन जीने वाले इस परित्राता मसीहा को नापने के लिये नया पैमाना लाना होगा। दिवा से पनवेल और खोपोली तक होने वाले जहरीली शराब के व्यापार को अकेले अपने आत्मबल की ताकत से इस शख्स ने समाप्त करा दिया, मुझ जैसे अनेकों इंसानो को जिनके माता-पिता ने तक सड़कों पर धक्के खाने को छोड़ दिया था इस मसीहा ने सहारा दिया घर, हिंदी सिखाया, गालियां देकर कमर्शियल सेक्स वर्क करने वाले हिजड़े को बहन कह कर सम्मानित दर्जा दिलवाया, कम्प्यूटर सिखाया। जिस ब्लाग भड़ास पर आप उन्हें कलंक कह रहे हैं शायद आप जानते ही नहीं कि यशवंत दादा और डा.रूपेश श्रीवास्तव उस ब्लाग के माडरेटर हैं वे अगर चाहते तो आपका कमेंट हटा सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करा बल्कि आपसे बातचीत और विचारों के आदान-प्रदान का पुल बना लिया। आशा है कि आप मेरी बातों से व्यथित न होंगे। मै यह भाषा प्रयोग कर आपको ये सब लिख पा रही हूं उस बात का श्रेय आपके द्वारा कलंक ठहराये गए डा.रूपेश श्रीवास्तव को ही जाता है किसी बौद्धिक और साहित्यिक मुखौटाधारी ब्लागर को नहीं वरना यशवंत दादा जानते हैं कि भाई ने ही मुझे एक "भड़ासी डिक्शनरी" दी थी जो मुझे अब तक पूरी याद है। राजीव करुणानिधि नामक छिछोरा डा.साहब के ब्लाग आयुषवेद पर जाकर सुअरपन कर रहा है उसे चेतावनी है कि बेटा सुधारे नहीं तो ध्यान रखना हम भड़ासी वैसे भी घोषित तौर पर बुरे लोग हैं तुम्हारी तरह अच्छाई का मुखौटा नहीं लगाते,तुम्हारी औकात तुम्हें दिखाने में जरा भी देर न लगाएंगे।
जय जय भड़ास
मनीषा नारायण
माडरेटर "अर्धसत्य" ,सलाहकार "भड़ास"

4.11.08

भूतों को उल्टी-टट्टी नहीं होती है?

भाई भड़ासियों कौन कहता है कि भूतों को उल्टी-टट्टी नहीं होती है? अब मुझे ही देख लो मुझे मरे अरसा हो चुका है पर आज उल्टी हुई तो उसे भड़ास पर उगल रहा हूं। नीचे एक पोस्ट है कि साम्राज्यवाद के प्रतीक इंडिया गेट पर सलामी देना उचित है या नहीं.......आप इस पर कोई भी टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि भड़ासियों का क्या भरोसा साले अगर कुछ उल्टा-सुल्टा बोल गये और किन्ही लोगों को जम गयी तो झंडे के नीचे आने से पहले ही बिदक कर भाग जाएगा। जो कुछ तर्क-कुतर्क पेलने हों तो कल जिधर बताया गया है उधर जाना लेकिन वहां भी कुछ बोलना मत क्योंकि सारे एक ही सुर में बोलेंगे। अरे मुझ सुपर चूतियेस्ट से पूछो तो बिना दिमाग लगाए बेवकूफ़ की तरह कह दूंगा कि अरे यार जिस तरह तमाम शहरों, रेलवे स्टेशनों के नाम बदले हैं वैसे ही बस उस समय की सरकार के कर्मचारियों से अगर अब आपको खुन्नस है और वे आपको गद्दार, साम्राज्यवाद के रक्षक आदि-आदि-इत्यादि महसूस होने लगे हैं तो उनके नाम हटा कर अपने पसंदीदा शहीदों के नाम लिखवा लो और सलामी जारी रहने दो, मचमच किस बात की है पन भिड़ू लोग! तुम सब ढक्कन हो, अरे जब तक राष्ट्र के हित में रोटी-कपड़ा-मकान जैसी टुच्ची-मुच्ची समस्याओं को नजरअंदाज करके करे जा रहे इस आंदोलन में लाठियां गोलियां चल कर कुछ लोग टपक न जाएं तब तक नाम नहीं बदले जाएंगे। इसलिये अपुन तो मर चुका है वरना जरूरच जाता पन भिड़ू लोग तुम लोग जाओ न इत्ते जरूरी मुद्दे के वास्ते जान देने कूं, देश साला सिविल वार जैसी सिचुएशन में आ गया है तो जरा मरना तो बीमा पालिसी निकाल लेना ताकि घर वाले सुख से रह सकें क्योंकि साम्राज्यवाद की रक्षा करते मरने वालों के पास तो ये आप्शन इच नईं था।
जय जय भड़ास

27.10.08

डा.रूपेश श्रीवास्तव के शिष्य का चड्ढी संकट

जब भी चड्ढी में कुछ होता था तो वह अन्य कारण से होता था लेकिन आजकल जब से यशवंत दादा ने बताया है कि डा रूपेश श्रीवास्तव का भूत न जाने किस-किसकी चड्ढी खोलेगा और इसी लिये उन्होंने तो अभी से कस कर चड्ढी पकड़ रखा है तो मुझे भी यही खतरा सता रहा है। डा रूपेश श्रीवास्तव की मौत की सूचना पर यशवंत दादा ने जो टिप्पणी करी वह डरावनी है क्योंकि इससे बहुत पहले भी यशवंत दादा लिख चुके हैं कि डा रूपेश श्रीवास्तव उनके सपने में आ कर सिर पर डंडा लेकर खड़े रहते हैं और कहते हैं कि क्रांति करो और अब हैं कि चड्ढी संकट जैसा राष्ट्रीय खतरा पैदा कर दिया है। ये डा रूपेश श्रीवास्तव भी मर कर न जाने क्या चाहते हैं अब तो लगता है कि अगर मेरे सपने में डंडा लेकर आए तो पता नहीं क्या-क्या कहेंगे इस कारण नींद ही गायब है उनके मरने के बाद से।
ये चड्ढी का खतरा ऐसा बढ़ा है की सोचा की लोहे की बनवा लूँ, पक्का और परमानेंट मगर फ़िर याद आया की जब रुपेश चड्ढी उतरने में माहिर है तो उसका भूत दो देखते देखते लोहे वाला भी गायब ही कर देगा, अब तो यशवंत दादा के साथ मैं भी चड्ढी संकटग्रस्त हो गया हूँ, बचाओ यारों इस चड्ढी उतारू भूत से......

23.10.08

डा.रूपेश श्रीवास्तव की मौत ..... हत्या या आत्महत्या?

जो जन्मा है वो मरेगा ही लेकिन कैसे मरेगा और कब मरेगा ये भला कौन जानता है,हां पैदा कैसे होगा ये तमाम लोग जानते हैं। एक थे डा.रूपेश श्रीवास्तव,अक्सर कहानियां सुनाते थे। जिनमें से कुछ कहानियां आपकी नजर हैं....
पहली कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत विद्वान था। एक दिन वह मर गया।
दूसरी कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत बलवान था। एक दिन वह मर गया।
तीसरी कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत धनवान था। एक दिन वह मर गया।
इन कहानियों से हट कर एक और कहानी थी जो खुद उनकी आत्मकथा वो सुनाते थे कि एक आदमी था, एक दिन वह मर गया। पिछले कुछ समय से डा.रूपेश श्रीवास्तव इस पन्ने से गायब थे जबकि कुछ लोगों ने उन्हें याद भी करा (कु.मंजुराज ठाकुर और रजनीश के.झा) लेकिन एक न एक दिन सब भुला दिये जाते हैं तो लोग उन्हें भी बस भूलने की प्रक्रिया में हैं जल्द ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। डा.रूपेश श्रीवास्तव भी मर गये और वो अपनी आत्मकथा हमारे लिये छोड़ गये शायद खुद को संत कबीर समझने के मुग़ालते में जिये इसीलिये ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया.....। चलिये मर तो गये लेकिन अब तक ये नहीं पता चल पाया कि उनकी मौत हुई कैसे? ये हत्या है या आत्महत्या? इतनी जल्दी तो मरने वालों में से लगते नहीं थे। आपको शायद पता न हो उन्होंने भड़ास से खूब प्रसिद्धि और पैसा कमा लिया था तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी भयंकर उपलब्धि के चलते उन्हें सफलता की खुशी सहन न हुई हो और हास्य अटैक आकर मर गये हों? ऐसा भी संभव है कि जैसे कुत्ते को घी हज़म नही होता वैसे ही डा.रूपेश श्रीवास्तव को शोहरत न पची हो और पगला गये हों और इसी पागलपन में किसी गाड़ी-साड़ी के नीचे आकर मर गये हों? उनके बारे में मुझे एक रहस्य जो आज उनकी मौत के बाद खोल रहा हूं वह ये है कि वे आखिरी सांस तक हिंदू बने रहे इसलिये नहीं कि मुसलमान या क्रिस्तान बनने में कोई दिक्कत रही हो पर उनके अनुसार ये सम्प्रदाय पुनर्जन्म की सोच नहीं मानते इसलिये डा.रूपेश श्रीवास्तव जीवन भर दुविधा में रहे कि अगर पुनर्जन्म की व्यवस्था न हुई तो प्रेतयोनि तो होती होगी। बेचारे इसी धर्मसंकट में झूलते मर गये। कुछ लोग बताते हैं कि उन्हें न समझ पाने वालों ने उन्हें प्रसिद्धि और पैसे का ज़हर दे दिया जिससे कि उनकी मौत हो गयी। बस ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि उन्हें कभी शान्ति न मिले।

2.8.08

लोकतंत्र गया तेल लेने........

कल दोपहर को जब मुंबई के सबसे ज्यादा जगमगाते क्षेत्र जुनैद नगर, अंधेरी(पश्चिम) में अपने किसी काम से गया तो नजारा देखा कि युवकों की एक टोली दुकानो में जा-जाकर कुछ पर्चे दे रहे हैं और कुछ ऊंची से आवाज में दुकानदारों को हिदायत(धमकीनुमा) दे रहे हैं। इतना देख कर तो मेरे जैसे प्राणी को कौतूहल स्वाभाविक है कि जान तो लें कि भइए चल क्या रहा है......? दुकानदारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये पर्चे हुक्म हैं इस बात का कि यदि मुंबई महानगरपालिका के आदेशानुसार दुकानों के नामों मे बोर्ड एक माह के अंदर मराठी में नहीं करे तो अवधि समाप्त होने के बाद दुकानो को तोड़ दिया जाएगा, आग लगा दी जाएगी; ये "राजा साहब" का आदेश है......। अरे स्स्साला... हमारे तो दिमाग में भोलेनाथ तांडव करने लगे कि जल्दी से पता करो कि देश आजाद हुए इतने साल बाद कहीं फिर से लोकतंत्र समाप्त तो नहींथो गया रातोंरात और राजा-महाराजा अस्तित्त्व में आ गए हों। जब मैंने लपक कर उन युवकों को जादू की झप्पी दी और पूछा कि भाई लोग आप क्या मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारी हो या राजा साहब के सिपाही तो उन्होंने हिकारत भरी नजरों से मेरी तरफ़ देख कर बताया कि हम लोग राजा साहब के सैनिक हैं इसपर हमने जान की खैर मांगते अगला सवाल पूंछ लिया कि सेनापति जी ये तो बता दीजिये कि अब हम किस राजा साहब की प्रजा हैं। पता चला कि जब बाळ ठाकरे बालासाहब ठाकरे हो सकता है तो राज ठाकरे राजा साहब ठाकरे क्यों नहीं......? मुंबईवासियों को ये भी नहीं पता कि मुंबई में लोकतंत्र तेल लेने जा चुका है अब वहां राजा-महाराजा राज्य करते हैं। अगर आजादी के बाद हमारे वीरों ने शहादतें देकर कुछ सर्वाधिक मूल्यवान कुछ पाया था तो वह था इस देश में अपना कानून,एक लिखित संविधान जिसे बनाने वाले हर धर्म, जाति,रवायतों और भाषा के साथ-साथ क्षेत्र की भी विशेषताओं को समझते हुए उनका सम्मान करते थे लेकिन ऐसे राजाओं ने अपने स्वार्थ के लिये उस संविधान को ऐसा बना दिया है जो कि सिर्फ़ इनके इशारों पर नाचने वाली रंडी है(विद्वानजन इन कठोर शब्दों के लिये क्षमा करें किन्तु मैं आहत हूं)।

21.3.08

ध्रतराष्ट्र बने संपादक , दुःशासन हुई पत्रकारिता और सभा में नंगी करी गयी तुम सबकी लैंगिक विकलांग बहनें



गुस्सा और दुःख इतना ज्यादा है कि लग रहा है खूब जोर से चिल्लाऊं । जब तक भड़ास से नहीं जुड़ी थी यकीन मानिए कि शर्म क्या होती है पता ही नहीं था लेकिन डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे अपनी बहन बना कर मेरी जिन्दगी में इतना ज्यादा बदलाव ला दिया है कि जब मेरे और मेरी ही जैसी दूसरी लैंगिक विकलांग बहनों के सारे कपड़े उतरवा कर परेड करवाई गई तो एक पल को लगा कि लोकल ट्रेन से कट कर जान दे दूं लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने मेरे डा.भाई का चेहरा आ गया जो हमेशा मुझे हिम्मत दिलाते रहते हैं कि दीदी एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि ये लोग जो आपको इंसान नही समझते अपने करे पर शर्मिंदा होंगे ; फिर एक-एक करके मेरे सामने मेरे भाई पंडित हरे प्रकाश,यशवंत दादा,मनीष भाई,चंद्रभूषण भाई सामने आने लगे और मैं फिर पूरी ताकत से अन्याय का सामना करने के लिये खड़ी हो गयी हूं । मुंबई से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक वार्ताहर और उर्दू दैनिक इन्कलाब ने एक खबर छापी जिसकी हैडिंग उन्होंने महज सनसनी फैलाने के लिये ऐसी रखी कि लोग उस खबर को चटखारे लेकर पढ़ें ,जरा आप सब खबर के हैडिंग पर ध्यान दीजिये "हिजड़े द्वारा लोकल ट्रेन के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में महिला से बलात्कार की कोशिश" । बस फिर क्या था बड़ी-बड़ी वारदातें हो जाने के बाद भी कुम्भकर्ण की तरह से सोने वाली मुंबई पुलिस का लैंगिक विकलांग लोगों पर कहर टूट पड़ा । हम सफर करें तो ट्रेन के किस डिब्बे में अगर पुरुषों के साथ जाएं तो सुअर किस्म के लोग जिस्म रगड़ने का बहाना देखते हैं ,कुत्सित यौन मानसिकता के नीच पुरुष भीड़ का बहाना कर के सीने और नितंबों पर हाथ लगाते हैं ,हमारे हाथॊं को पकड़्ते हैं पर हमें तो शर्म नहीं आनी चाहिए और न ही हमें गुस्सा आना चाहिये इन कमीनों की हरकत पर क्योंकि शर्म तो नारी का गहना होती है और हम तो न नारी हैं न नर । महिलाओं के डिब्बे में जाओ तो कुछ सुरक्षित महसूस होता था लेकिन इस सभ्य समाज के मुख्यधारा की पत्रकारिता के इस हथियार ने हमें यहां से उखाड़ कर बेदखल कर दिया है । ध्यान दीजिये कि अगर कोई अपराधी किस्म का इंसान बुर्का पहन कर ऐसी नीच हरकत करता तो क्या ये पत्रकार और संपादक महोदय ये हैडिंग बनाते कि एक मुसलमान महिला ने दूसरी महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश करी ,नहीं ,ऐसा तो वे हरगिज़ नही करते क्योंकि इस बात से सनसनी नहीं फैल पाती लेकिन एक हिजड़े के बारे में ऐसा लिखा तो सबका ध्यान जाएगा । अरे कोई तो इन गधे की औलादों को समझाए कि अगर हिजड़ा है तो बलात्कार क्या पैर के अंगूठे से करेगा ,वो तो महज एक अपराधी था जो हिजड़े का वेश बना कर आया था । संपादक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो ये देखे कि ऐसी खबर का क्या परिणाम होगा । अब मुझे समझ में आ रहा है कि देश में जातीय दंगों को फैलाने में मीडिया का क्या रोल रहता है ,अगर किसी ने मौलाना का वेश बना कर किसी को गोली मार दी तो ये पहले मरने वाले को देखेंगे कि क्या वो हिंदू था और फिर खबर बनाएंगे कि मुसलमान ने हिंदू की हत्या कर दी फिर भले पूरे देश में जातीय दंगों की आग भड़क कर सब स्वाहा हो जाए । हिजड़े को निशाना बना कर खबर छाप दी और चालू हो गया पुलिस का धंधा ,सब को नंगा करके परेड कराई गई ताकि देखा जा सके किसके जननांग कितने विकसित हैं या क्या है हिजड़े की कमर के नीचे और टांगो के बीच में ? इन कमीने पत्रकारों को अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं अपनी ताकत इस्तेमाल करके जेंडर आईडेंटीफ़िकेशन का कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाते ? कम से कम हमें भी तो ये पता चल जाएगा कि हम किस डिब्बे में यात्रा करें । किसी पत्रकार ने रेलवे पुलिस से यह नहीं पूछा कि जब हर महिला डिब्बे में एक रेलवे पुलिस का सुरक्षाकर्मी तैनात रहता है तो जब वो अपराधी बलात्कार की कोशिश कर रहा था तो क्या वो पुलिस वाला तमाशा देख रहा था या अपनी अम्मा के साथ सोने गया था , क्या यात्रियों की सुरक्षा की रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? मैने नीच पुलिस वालों के हाथॊं को अपने जिस्म पर रेंगते हुए महसूस किया ,ये सुअर किसी गंदी दिमागी बीमारी के मरीज जान पड़े मुझे सारे के सारे । क्या मेरी इस अस्तित्व की लड़ाई में मेरे भड़ासी भाई-बहनें साथ हैं ये सवाल आप सब से है ,नाराज मत होइएगा कि ये क्या होली के रंग में तेज़ाब मिला रही है लेकिन बात ही ऐसी है । मेरे भाई डा.रूपेश अभी आधी रात को भी मेरे साथ हैं कि कहीं शर्मिन्दगी से मैं कुछ गलत निर्णय न ले लूं इस लिये जबरदस्ती मुझे पकड़ कर अपने घर ले आए हैं । होली मनाइए लेकिन अपनी इस बदकिस्मत बहन के बारे में भी सोचियेगा ।

6.3.08

कोई कहता है कि सेक्स एक विज्ञान है कोई कहता है कि कला है



मैने अपनी पिछली पोस्ट में जो भी लिखा था वह कोई भारी वैज्ञानिकता की बात नहीं थी बल्कि मैंने अपने और एक सामान्य(सिर्फ़ और सिर्फ़ सामान्य) औरत की बात कही थी । इस पर जिन महानुभाव ने उस पोस्ट पर टिप्पणी की पूंछ लगा दी है उनसे चंद बातें बांटना चाहूंगी बाकी भड़ासी भाई-बहन अगर चाहें तो इस बात में मुंह मार लें मैं सबको निमंत्रित कर रहीं हूं वैसे तो न्योता देने की जरूरत नहीं है बिना कहे ही मेरे भाई-बहन कूद पड़ते हैं । जो भी बातें लिखी गयी हैं उसके बारे में बस इतना ही कहना है कि अगर किसी पेड़ से कहा जाए और अगर वो मासूम जवाब दे सके तो कहें कि भइया क्या तुम जिस पानी को जमीन से चूँस-चूँस कर बड़े हुए हो और अब फल फूल रहे हो क्या उस पानी का जरा सा भी ज्ञान रखते हो कि उसमें कितना हाईड्रोजन और कितना भाग ऑक्सीजन होता है ,आपको क्या लगता है कि वो क्या जवाब देगा ? वो पेड़ कहेगा कि प्रभु,कैसी पगलाई सी बातें कर रहे हो हमने तो कभी इस बारे में सोचा ही नहीं और तुम हो कि ये सब सोच रहे हो । जीवन को विज्ञान के नजरिये से देखने पर मैं और तुम बस रसायनों के चलते-फिरते से ढेर ही नजर आते हैं और जीवन महज एक रसायनिक प्रतिक्रिया के अलावा कुछ नहीं है । जीवन की शुरूआत भी कुछ ऐसी ही है जो कि सेक्स से शुरू होता है और यह भी ऐसा ही होता है । कोई कहता है कि सेक्स दो टांगो के बीच का नहीं बल्कि दो कानो के बीच का विषय होता है ,कोई कहता है कि सेक्स एक विज्ञान है कोई कहता है कि कला है । अब कोई किसी कनखजूरे से कहे कि राजा तुम्हारे तो हजार पैर हैं तो तुम ये कैसे निर्णय लेते हो कि पहले कौन से पैर को उठाना है तो यकीन मानिये कि वो कनखजूरा अगर इस बात को सोचने लगे तो जिन्दगी भर नहीं चल पायेगा । ब्रह्मचर्य क्या होता है ये वो लोग कभी नहीं समझ सकते जो सेक्स को एनालाइज करके समझना चाहते हैं उन्हें किताबों को पढ़ कर भला क्या समझ में आयेगा इसलिये उनकी हालत बस पूरा जीवन कनखजूरे जैसी ही बनी रहती है । इन लोगों को सलाह है कि जिन किताबों को पढने की सलाह दी जा रही है उनके साथ जरा हमारे डा.रूपेश श्रीवास्तव का लिखा साहित्य भी पढ लें क्योंकि मेरी तो सोच अब बदलने से रही हो सकता है शायद आपकी सोच पर प्रभाव पड़े ।
भड़ास ज़िन्दाबाद

25.2.08

डा.रूपेश श्रीवास्तव और मुनव्वर सुल्ताना भी काल्पनिक है

आज मुझे मसिजीवी जी की बात पर कोई दुःख नहीं हुआ क्योंकि बुद्धिजीवी तो ऐसा सोचने के लिए स्वतंत्र हैं शायद उन्हें यह भ्रम हो गया है कि शायद भड़ास में चोखेरबाली वाली मनीषा जी से यशवंत जी की जो बौद्धिक चर्चा स्त्रियों को लेकर हो रहा है उसके ही क्रम में ही चोखेरबाली वाली मनीषा जी को अपमानित करने के लिये किसी भड़ासी (कदाचित यशवंत जी या मैंने) ने यह नया ई-मेल आईडी बनाया है । प्रतीत होता है कि मसिजीवी के आगे मेरी मैत्रिण मनीषा को अपनी लैंगिकता प्रमाणित करने के लिये बाकायदा अपना पेटीकोट उठाकर चड्ढी उतार कर फोटो खिंचवाना पड़ेगा वरना हो सकता है स्याही पर जीवित रहने वाले भाईसाहब को संतुष्टि न होगी और उन्हें विद्रूपता ,कुद्रूपता और पता नहीं कौन-कौन सी रूपता सपनों में आती रहेगी । चूंकि मेरी मैत्रिण मनीषा के बारे में इस लिए नहीं जानते क्योंकि स्याही पर जीवित रहने वाले भाईसाहब भड़ास पर टिप्पणी करने से बचते हैं ऐसा उन्होंने लिखा लेकिन मुझे पता है कि उनके पास दूसरों की पोस्ट्स पढ़ने के लिए समय नहीं रहता है । जब से भड़ास में चोखेरबाली वाली मनीषा जी से यशवंत जी की जो बौद्धिक चर्चा स्त्रियों को लेकर शुरू हुई है उससे कहीं बहुत पहले से मेरी लिखी पोस्ट्स में मेरी मैत्रिण मनीषा का जिक्र करता आ रहा हूं ।
स्याही पर जीवित रहने वाले भाईसाहब अंत में लिखते हैं:-
"एक सवाल यशवंत से भी, मित्र इस तरह एक नए भड़ासी आईडी को और जोड़ दिया गया..आप दो सौ पचास से इक्‍यावन गिने जाएंगे :)) क्‍या सच की संख्‍या कैसे पता चले ? :)) "स्याही पर जीवित रहने वाले भाईसाहब सामान्य ज्ञान कैसा है मुझे नहीं पता पर इतना जरूर मालुम पड़ गया है कि उन्हें भड़ास के बारे में तनिक भी जानकारी नहीं है वरना उन्होंने इस सवाल को मुझसे भी किया होता क्योंकि स्याही पर जीवित रहने वाले भाईसाहब को इतना भी नहीं पता कि भड़ास का एक मोडरेटर मैं भी हूं । चूंकि मेरी मैत्रिण मनीषा को आप एक नहीं मान सकते इसलिए अब बताता हूं कि भड़ासी उनके जुड़ने से दो सौ पचास नहीं बल्कि उन जैसे बुद्धिजीवी लोगों की गिनती मे दो सौ साढ़े पचास होने चाहिए । मैं मानता हूं कि ऐसे ही स्वयंभू बुद्धिजीवी लोगों ने मेरी मैत्रिण मनीषा जैसे विकलांग लोगों को हाशिए पर धकेला हुआ है और सीधे ही उनके दोषी हैं । मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि उनके परिवार में कोई ऐसा बच्चा पैदा न हो लेकिन अब छटपटा कर ये न कहने लगिएगा कि अरे अब तो डा.रूपेश श्रीवास्तव भी हिजड़ों की तरह कोसने लगे ।
http://bhadas.blogspot.com/2008/01/blog-post_30.html
उनकी जानकारी के लिए इस पोस्ट की जानकारी दे रहा हूं जब मैंने मेरी मैत्रिण मनीषा का जिक्र करा था ,अगर कल को इन्हें यह संदेह होने लगे कि डा.रूपेश श्रीवास्तव और मुनव्वर सुल्ताना भी काल्पनिक है तो क्या किया जाएगा ? वैसे मैंने ऐसे लोगों की अगर परवाह करी होती या इनकी सोच से दुनिया देख रहा होता तो आज मैं भी बौद्धिक षंढत्व का चलता फिरता आइना होता । लगता है कि मैंने इस बात को यशवंत दादा की वजह से ज्यादा ही भाव दे दिया वरना तो इस बात के लिये खामोशी ही मेरा उत्तर है ।
जय जय भड़ास