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30.8.10

हिंदू पुलिसवाले नहीं रख सकेंगे दाढ़ी
अहमदाबाद, जागरण संवाददाता : भले ही गुजरात में हिंदू हितों की दुहाई देने वाली भाजपा की सरकार है, बावजूद इसके आजकल राज्य के पुलिस विभाग में आस्था और कानून की जंग छिड़ी हुई है। दरअसल राज्य के कई पुलिसकर्मी गुजराती श्रावण मास का उपवास रख रहे हैं, जिसके चलते उनकी दाढ़ी बढ़ गई है। पुलिस आयुक्त के निर्देश पर उपवासी पुलिसकर्मियों को दाढ़ी कटवाने का फरमान सुनाया गया है। संयुक्त पुलिस आयुक्त अतुल करवल ने अहमदाबाद के सभी पुलिस थानों, चौकी, पीसीआर वैन, मोबाइल वैन को आदेश जारी किया है, जिसके अनुसार राज्य के किसी भी पुलिसकर्मी को श्रावण मास में दाढ़ी रखने की छूट नहीं है। उपवास कर रहे जिन पुलिसकर्मियों की दाढ़ी बढ़ गई है उसे तुरंत कटवा लेने के निर्देश दिए गए हैं। करवल ने बताया कि समुदाय विशेष को छोड़कर दाढ़ी रखने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जाएगी। उपवास रखने वाले पुलिसकर्मियों ने दाढ़ी रखने की छूट मांगी थी जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उपवास शुरू कर दिया और दाढ़ी नहीं कटवाई। इससे चिंतित आला अधिकारी अब दाढ़ी कटवाने का दबाव डाल रहे हैं।

Courtesy: Dainik Jagran 30.08.2010

23.10.08

डा.रूपेश श्रीवास्तव की मौत ..... हत्या या आत्महत्या?

जो जन्मा है वो मरेगा ही लेकिन कैसे मरेगा और कब मरेगा ये भला कौन जानता है,हां पैदा कैसे होगा ये तमाम लोग जानते हैं। एक थे डा.रूपेश श्रीवास्तव,अक्सर कहानियां सुनाते थे। जिनमें से कुछ कहानियां आपकी नजर हैं....
पहली कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत विद्वान था। एक दिन वह मर गया।
दूसरी कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत बलवान था। एक दिन वह मर गया।
तीसरी कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत धनवान था। एक दिन वह मर गया।
इन कहानियों से हट कर एक और कहानी थी जो खुद उनकी आत्मकथा वो सुनाते थे कि एक आदमी था, एक दिन वह मर गया। पिछले कुछ समय से डा.रूपेश श्रीवास्तव इस पन्ने से गायब थे जबकि कुछ लोगों ने उन्हें याद भी करा (कु.मंजुराज ठाकुर और रजनीश के.झा) लेकिन एक न एक दिन सब भुला दिये जाते हैं तो लोग उन्हें भी बस भूलने की प्रक्रिया में हैं जल्द ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। डा.रूपेश श्रीवास्तव भी मर गये और वो अपनी आत्मकथा हमारे लिये छोड़ गये शायद खुद को संत कबीर समझने के मुग़ालते में जिये इसीलिये ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया.....। चलिये मर तो गये लेकिन अब तक ये नहीं पता चल पाया कि उनकी मौत हुई कैसे? ये हत्या है या आत्महत्या? इतनी जल्दी तो मरने वालों में से लगते नहीं थे। आपको शायद पता न हो उन्होंने भड़ास से खूब प्रसिद्धि और पैसा कमा लिया था तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी भयंकर उपलब्धि के चलते उन्हें सफलता की खुशी सहन न हुई हो और हास्य अटैक आकर मर गये हों? ऐसा भी संभव है कि जैसे कुत्ते को घी हज़म नही होता वैसे ही डा.रूपेश श्रीवास्तव को शोहरत न पची हो और पगला गये हों और इसी पागलपन में किसी गाड़ी-साड़ी के नीचे आकर मर गये हों? उनके बारे में मुझे एक रहस्य जो आज उनकी मौत के बाद खोल रहा हूं वह ये है कि वे आखिरी सांस तक हिंदू बने रहे इसलिये नहीं कि मुसलमान या क्रिस्तान बनने में कोई दिक्कत रही हो पर उनके अनुसार ये सम्प्रदाय पुनर्जन्म की सोच नहीं मानते इसलिये डा.रूपेश श्रीवास्तव जीवन भर दुविधा में रहे कि अगर पुनर्जन्म की व्यवस्था न हुई तो प्रेतयोनि तो होती होगी। बेचारे इसी धर्मसंकट में झूलते मर गये। कुछ लोग बताते हैं कि उन्हें न समझ पाने वालों ने उन्हें प्रसिद्धि और पैसे का ज़हर दे दिया जिससे कि उनकी मौत हो गयी। बस ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि उन्हें कभी शान्ति न मिले।

10.10.08

हम

दो अक्षर के बिना हम पुरे नही हो सकते, मैं (I) और (U)। और ये दो ही हमारे में भारतीयता का एहसास करते हैं।
जय हिंद
जय भारत।