Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

29.12.08

साला चोर कहीं का...मारो इसको/इसकी..कमीना शब्दचोर

आदरणीय अशोक पाण्डेय जी से करबद्ध क्षमा चाहता हूं क्योंकि मैं ठहरा निपट चूतिया तो पाप और गुनाह को एक जैसी ही "चीज" समझ बैठा अब पता चला कि ये भाषाई अंतर है हिंदी और उर्दू का इसमें शब्दकोश नहीं देखना चाहिये/ग्यान तो नहीं पर एक शब्द है "ज्ञान" जिसे बांटने के लिये कुछ छात्र चाहिये २००९ में आफ़र है सस्ते में बांट रहा हूं अगर आपकी जानकारी में हों तो मेहरबानी करके मेरी दुकान चलवा दीजिये आजीवन दुकान पर "साभार" लिख कर टांगे रहूंगा। कानून की मां-बहन करने के लिये जस्टिस आनंद सिंह ही काफ़ी हैं लेकिन आप तो बस मेरी करिये क्योंकि आप उन्हें जानना नहीं चाहेंगे या फिर है सच जानने की ताकत(वैसे चुप ही रहेंगे ऐसी उम्मीद है) बुरा आदमी हूं, चोर हूं, गलीज़ हूं अंतरात्मा क्या बहिरात्मा क्या कुछ है ही नही... ईमान,दोस्ती,सच्चाई वगैरह जैसे गरिष्ठ आचरण से दूर रहता हूं इससे पेट खराब हो जाता है और जुलाब हो जाता है कोई आयुर्वेविक दवा असर नहीं करती इसलिये हलकट पन में ही स्वास्थ्य तलाश कर भला हूं। चोर हूं इसलिये भड़ास की आत्मा तक चुरा ली है। आदरणीय सुशील जी के लिये मेरा मोबाइल नं.
09224496555, मेरा ई-मेल rudrakshanathshrivastava7@gmail.com , मेरा ब्लाग - http://aayushved.blogspot.com/
जितनी गालियां चाहें दे/प्यार देना चाहें दे सकते है मुकुन्द ने जो करा उसके लिए उसको इतनी गालियां दीजिये कि आप द्वारा दी गयी गालियों को संग्रह कर एक नयी किताब प्रकाशित करा सके
आत्मन अंकित ने जो लिखा वह अंग्रेजी में है तो समझना कठिन है आशा है अगली बार वे हिंदी में लिखेंगे तो मुझ देसी पिल्ले की समझ में आ सकेगा और रही बात बेनामी, अनामी, गुमनामी की तो आपको बस इतना बताना था कि कम से कम जो खुल कर गालियां दे पाने का साहस था, लेकिन ध्यान रहे गालियां मौलिक हों मादर-फादर छाप परम्परागत गालियों को हमने कापीराइट करा लिया है अतः उन्हें प्रयोग नहीं करें:)
जय जय भड़ास

5 comments:

News4Nation said...

कसम से ,,हा हा अब क्या कहू
रुपेश जी क्या लिखते हो ,gajab का लिखा है सच मजा आ गया
!

यशवंत सिंह yashwant singh said...

:)

Unknown said...

जय हो गुरुदेव की,
जय जय भड़ास,
मजा आ गया,
सिद्दतो बात भड़ासपन दिखा,
जय जय भड़ास

प्रकाश गोविंद said...

घटना ५-६ साल पुरानी है !

जनविजय पत्रिका का सम्पादन देखते हुए मैं सदैव नवलेखन को प्रोत्साहित करता रहता था !
एक लड़का अपनी रचना प्रकाशन हेतु दे गया था ! मेरे आश्वासन देने के कारण उसने कई चक्कर लगाए तो मैंने छाप दी ! लड़का बेहद खुश !
बात आई गई हो गई !

करीब डेढ़ - दो महीने बाद एक अधेड़ से सज्जन तमतमाते हुए ऑफिस में घुसे और कहने लगे वो जो फलाना रचना आपने छापी है , मेरी लिखी हुयी है ! जिसे मैंने कई माह पूर्व लिखकर फीचर एजेन्सी में भेजा भी है ! उसके बाद अपना भारीभरकम परिचय भारीभरकम आवाज में चरणबद्ध तरीके से दिया और कोर्ट कचहरी .... कंज्यूमर फोरम इत्यादि का हवाला देते हुए किसी तरह विदा हुए ! स्टाफ का अच्छा खासा मनोरंजन हो गया !

दूसरे दिन पारिश्रमिक देने की बात करके उसी लड़के को बुलवाया ! मैंने बहुत ही स्नेह से उसे समझाया कि "तुम अगर चाहो तो इससे कहीं बेहतर रचना लिख सकते हो .....तुमने नाहक किसी और की रचना का इस्तेमाल किया..... खैर सभी महान लोगों से ऐसी भूलें हो जाती हैं ! आईंदा ऐसा नही करना.... तुम्हे यह रचना मिली कहाँ से थी ? लड़के ने बताया कि एक पत्रिका से !
मैंने उसे लाने के लिए कहा ! दूसरे दिन जब वो पत्रिका लाया तो मैंने देखा कि वो पत्रिका १९८५ की कादम्बिनी थी और उसमें प्रकाशित उसी रचना के रचयिता का नाम गया प्रसाद चतुर्वेदी (भोपाल) लिखा था !
हम सब लोग खूब हँसे !

आजकल भइया सबकुछ चुराया ही तो जा रहा है ! अस्पताल से बच्चे तक चुराए जा रहे हैं ! गीत संगीत चुराया जा रहा है ! हालीवुड की फिल्मों से पूरा -पूरा सीन चुरा लिया जाता है ! पत्रकार बंधू इंटरनेट से मसाला एकत्र कर अपना नाम दे रहे हैं ! यूनिवर्सिटी से थीसिस चोरी हो रही हैं !

कल एक चुटकुला पढ़ा था :
प्रश्न : असली घी और नकली घी में फर्क क्या है ?
उत्तर : जो बाजार में मिलता है वो नकली घी है और जो नहीं मिलता वो असली घी है !

अंत में :
वाकई में हम जहनी तौर पर इतने ज्यादा बेकार हो चुके है कि एक भी मौलिक गाली तक नहीं सोच सकते !

Ashok Kumar pandey said...

माफ़ कीजिये मै यहाँ गाली प्रतियोगिता मे भाग लेने नही आया। ग्यान इसलिये लिखा कि यूनिकोड पर यही लिख पाया। रहा सवाल गुनाह ऑर पाप का तो हिन्दी ऑर ऊर्दू मे ये समानार्थी नही है।
खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे वैसे इसी को कहते है।
चोरी ज़िन्दाबाद रखिये।