Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label यशवंत सिंह. Show all posts
Showing posts with label यशवंत सिंह. Show all posts

6.8.13

वीरेन डंगवाल के बहाने वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य

सोमवार 5 अगस्त 2013 को वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल जी के जन्मदिवस के बहाने 'हिंदी भवन' में हिंदी साहित्य पर आधारित कार्यक्रम का आयोजन हुआ। मेरे लिए यह कार्यक्रम अभूतपूर्व रहा। अबतक जिस हिंदी साहित्य में हमेशा जीने का सपना देखा, उसे बेहद करीब से जानने समझने का मौका मिला। इस कार्यक्रम के दौरान बहुत सारे वरिष्ठ कवियों और कवियों(पत्रकार-कवियों) के अनुभवों को जानने समझने के दौरान काफी हद तक उस अतीत को समझा, जिसके बारे में अबतक सिर्फ पढ़ा था।
खैर, इन सबके बीच मुझे 'विशेष' तौर पर प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य मिला। उन्हें उनके आवास से कार्यक्रम स्थल और फिर उन्हें आवास तक छोड़ने की बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मुझ जैसे युवा को मिली थी, जो मेरा सौभाग्य है। इस दौरान मैं 4-5 घंटे तक केदारनाथ जी के सानिध्य में रहा और उनके 'अतीत' में जीने के साथ इस समय के घटनाक्रम(राजनीतिक-साहित्यिक) पर लम्बी(थोड़ी-बहुत, जो मेरे लिए विशेष रही) चर्चा हुई। इस 4-5 घंटे के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण बात जो मैंने महसूस की, वह यह है कि इस उम्र में भी वह बेहद तरो-ताजा और जोश से भरे हुए थे। दरअसल, इस बात को पूरी तरह से मैं तभी समझ पाया, जब 'हिंदी भवन' की मंजिल पर हो रहे कार्यक्रम में जाने के दौरान 'सीढ़ियों' पर चढ़ते समय मैंने उन्हें सहारा देने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, 'अरे यार, मैं इतना भी बूढा नहीं हुआ हूं, कि सीढ़ियां भी न चढ़ सकूं'।
Shravan Shukla with Kedarnath Singh 
कुल मिलाकर कल का दिन मेरे मिले विशेष रहा। इस दौरान मैंने 'हिन्दयुग्म प्रकाशन' के संपादक शैलेश भारतवासी जी से निवेदन किया कि वो मेरी एक फ़ोटो केदारनाथ जी के साथ खींचे, ताकि मैं उसे अपने जीवन की अमूल्य निधि के तौर पर संजोह कर रख सकूं। शैलेश जी ने मेरे निवेदन को स्वीकार करते हुए श्री केदारनाथ सिंह जी के साथ मेरी दो फ़ोटो खींची, जिसे मैं यहां पर शेयर कर रहा हूं।
इस फ़ोटो में एक मैं हूं, जिसे आप सब पहचानते हैं। दूसरे श्री केदारनाथ सिंह जी हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की दुनिया में शायद ही कोई न पहचानता हो। केदारनाथ सिंह जी के बारे में आज की पीढ़ी को बताने के लिए इतना ही काफी है कि उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने पूरे जीवन हिंदी साहित्य की सेवा की। आपकी अनेक कृतियां हैं, जिनमें से कुछ एक का उल्लेख करना उनकी अन्य कृतियों का अपमान होगा, फिर भी उनकी कुछ बेहद चर्चित रचनाओं के रूप में अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल प्रमुख हैं। इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं।
इस कार्यक्रम को आयोजित कराने के लिए bhadas4media.com के संस्थापक-संचालक श्री यशवंत सिंह और वरिष्ठ पत्रकार श्री मुकेश कुमार जी को हार्दिक धन्यवाद। जिनकी वजह से हम जैसे युवाओं को श्री केदारनाथ सिंह, श्री वीरेन डंगवाल, श्री नीलाभ अश्क जैसे हिंदी की विभूतियों से मिलने और उन्हें बेहद करीब से जानने का सौभाग्य मिला।

इस मौके पर केदारनाथ जी की लिखी दो कविताएं विशेषरूप से शेयर करना चाहता हूं, जो मुझे बेहद पसंद हैं। तो पेश है उनकी लिखी 'नदी' कविता.. जो उन्होंने 82-83 के समय में में गंगा नदी को देखते हुए लिखी थी।

अगर धीरे चलो
वह तुम्हे छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में

सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई

कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!

केदार नाथ जी की दूसरी कविता देश के विभाजन बाद की त्रासदी के बाद 'सन् ४७ को याद करते हुए' है, जिसे मैं बेहद पसंद करता हूं। केदारनाथ जी ने यह कविता 1982 में लिखी थी।

तुम्हें नूर मियां की याद है केदारनाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियां
ठिगने नूर मियां
रामगढ़ बाजार से सुरमा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियां
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियां?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहां हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

15.9.10

ई-मेल सेंड करें, ब्लाग पर वही छपा मिलेगा

हालांकि ये सुविधा काफी दिनों से है, पर इसको आज ट्राई किया और जबर्दस्त रूप से प्रभावित हुआ. आप अपने ब्लाग की सेटिंग में जाकर ईमेल व मोबाइल वाले आप्शन में मेल से ब्लाग पोस्ट प्रकाशित करने के आप्शन में कोई सिक्रेट वर्ड या डिजिट भरें. उदाहरण के तौर पर वहां दिया गया होगा...
yashwantdelhi.Secretword@blogger.com
अब जो Secret word वाला स्थान है, वहां कोई गुप्त शब्द या अंक भरें व उसे याद रखें. मान लीजिए आपने वहां ram डाल दिया. फिर सेटिंग को सेव कर दिया. तो आपका मेल से पोस्ट प्रकाशित करने का पता हुआ.
yashwantdelhi.ram@blogger.com

उपरोक्त मेल आईडी पर मेल में जो कुछ लिखकर भेजेंग, वह आपके ब्लाग पर छपा मिलेगा. मेल के सब्जेक्ट में जो कुछ लिखेंगे, वह ब्लाग पोस्ट के शीर्षक के रूप में दिखेगा.

अगर आप यह सब जानते हों तो अच्छी बात. न जानते हों तो ट्राई करिए.
ज्ञान बांटने से बढ़ता है, छुपाने से घटता है, यह कहावत तो सुनी ही होगी आपने.
तो आप भी कोई नई चीज हम सभी को बताइए. आपकी पोस्ट का इंतजार रहेगा.
यशवंत

14.12.08

राजीव करूणानिधि! आओ मुझ हिजड़े से पंजा लड़ाओ

ये रही तुम्हारी टिप्पणी और साथ में है मेरा जवाब ताकि डा.साहब की पोस्ट की तरह कोई गलतफ़हमी पैदा न हो...
हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा, तू जिस तरह से भभक रही है इससे तो साफ़ जाहिर होता है कि तू जिस्म से नहीं दिमाग से भी हिजडा है. तेरी औकात क्या है मै जान चूका हूँ, मेरी औकात नापने का प्रयास मत करो, तेरे जैसी बेहूदी शख्स से मै मुह भी नहीं लगाना चाहता. मैंने डॉ रुपेश को कोई गाली नहीं दी थी, बस सलीके से एक जवाब लिखा था कि ''कृपया अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करे. अन्यथा ये समझा जायेगा कि आपकी मानसिक स्थिति अच्छी नहीं है.'' रही बात शराफत की चादर ओढ़ने की बात तो मै बता दू कि ये चादर नहीं मेरा व्यक्तित्व है. और तेरी जैसी नाली के कीडे के साथ मै कोई भी रहम नही रखता. आइन्दा सलीके से जवाब देना. तू भडासी है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. पर मै जो हु उससे तुझे जरूर फर्क पड़ेगा.. डॉ रुपेश इतने अच्छे इंसान है, इसके लिये उन्हें धन्यवाद, पर क्या अपनी बात कहने के लिये या उसका महत्व बढ़ाने के लिये गाली और अभद्र भाषा का प्रयोग करना उचित है. क्या रुपेश साहब अपने घर में अपने परिवार के सामने ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते है. अपनी बात या अपनी भडास निकलने के लिये सलीके दार शब्दों का भी इस्तेमाल हो सकता है. ये जरूरी नहीं कि गाली या बेहूदी भाषा बोलकर ही भडास निकली जा सकती है. और हा जो कुकृत्य बड़े समाज में क्लबों में होते है क्या वो गाँव की गलियों में नहीं होते. अच्छे और बुरे लोग हर जगह है, सिर्फ गाली बोलकर बात करने वाले ही साहसी, स्पस्टवादी, नेक विचार और साफ़ दिल नहीं होते.


राजीव करूणानिधि! तुमने डा.रूपेश के ब्लाग आयुषवेद पर जाकर क्या टिप्पणी करी थी वो तो तुम भी जानते हो और डा.साहब भी वरना इस तरह से तुम्हें हगने के बाद लीपा पोती करने की जरूरत न पड़ती। तुमने डा.साहब को उनके ब्लाग पर जाकर जो टिप्पणी करी थी उसके बाद मैंने पोस्ट लिखी थी क्योंकि मुझे भी तुम जैसे फटीचर एक चाय पर खबर लिखने वाले चिरकुट पत्रकार के मुंह लगने में दिलचस्पी नहीं है पता नहीं एड्स वगैरह हो गया तो मैं तो परेशान हो जाउंगी तुममें तो इतना स्वीकारने का साहस नहीं है कि दम से कह सको कि हां डा.रूपेश को गाली दी क्या उखाड़ लेगा वो मेरा....। लेकिन इतना स्वीकारने के लिये आत्मबल चाहिये तुम्हारे जैसा कीड़ा सत्य को गलती करने के बाद न मानने के झूठे दम्भ का पोषण करने में ही पूरी जिंदगी गुजार देता है। डा.साहब को उनकी अच्छाई का प्रमाणपत्र तुम जैसे मुखौटाधारियों से नहीं चाहिये पहले तुम अपने गलीजपन को दूर कर लो फिर उनके ऊपर कोई टीका-टिप्पणी करने की औकात होगी तुम्हारी। अगर साहस है तो जो लिखा था उसे उन्ही शब्दों में फिर से लिखो फिर देखो कि भड़ासी होने से क्या-क्या फर्क पड़ता है अविनाश दास जैसे मठाधीश को भी ऐसी ही गलतफहमी थी। मैं ही क्या, सारे भड़ासी इस बत को स्वीकारने में घबराते नहीं कि उनके भीतर भी बुराइयां है। अब जरा तुम अपनी औकात का ढोल पीटो कि मेरा क्या उखाड़ लोगे बेटा इधर तो कुछ है ही नहीं लेकिन अगर हम चाहें तो तुम्हारा जरूर उखाड़ देंगे। भाषा की पिपिहरी बजाने से तुम अच्छे हो गये तो बने रहो रजनीश झा,यशवंत सिंह, डा.रूपेश श्रीवास्तव को तो तुम अभी जानते हो क्योंकि तुमने अभी पत्रकारिता करते हुए ब्लागिंग का "सफर" शुरू करा है वरना भड़ास का यू.आर.एल. भी टाइप करने से पहले हजार बार सोचते लेकिन फिर भी तुम्हारी हिम्मत न होती।

हम सब बेहूदे, कुंठित, गन्दे, बुरे, गलीज़, गालीबाज, दारूबाज, अभद्र, नीच और हर तरह से बुरे हैं हमसे मत उलझो। तुम्हारी औकात का मापन करके तुम्हें बताएंगे कि तुम कितने बड़े पत्रकार और ब्लागर हो। आओ दिखाओ अपना "अच्छा" व्यक्तित्व......। एक बात याद रखना बेटा कि गाली मत देना क्योंकि तुम जैसे लोग गाली नहीं देते और देते हैं तो स्वीकारने की दम नहीं रखते। तुम कितने सलीकेदार हो और तुम्हारे क्या संस्कार हैं वो तो तुमने डा.साहब के ब्लाग पर जाकर अपनी टिप्पणी से बताया है अब जरा मेरे जैसे नाली के कीड़े की औकात मैं तुम्हें बताती रहूंगी जब तक तुम्हें सही करके तुम्हारा मुखौटा उतार कर तुम्हारा असली चेहरा सामने नहीं ले आती। तुम अब अपनी शराफत की वैचारिकता का गोबर हगो ताकि पता चले कि तुम खसिया बैल हो या सांड........आओ.....आओ .....सींग मारो हमें हम तुम्हारी पिछाड़ी में डंडा ठोंक रहे हैं।

नाम के आगे करुणानिधि लगाने का नाटक करते हो लेकिन एक बात साफगोई से मानते हो कि हमारे जैसे नाली के कीड़ॊ पर तुम्हे रहम नहीं आता क्योंकि तुम्हारी करुणा का भी नाटक अब समाप्त होने वाला है......शटर डाउन होने वाला है बेटा।

13.11.08

मेरी ब्लॉग यात्रा!

एक और सरदी का आगमन हो गया, ज्यादा पुरानी बात नही है जब पिछले सर्दियों में मैं आगरा में था। बेतरतीब सरदी और दिन से लेकर अहले रात तक कंपकपाते ठण्ड में काम के साथ गप्पें और ठण्ड सभी का आनंद। मगर इसी ठण्ड में बहुत कुछ हुआ, जिन्दगी के कुछ बहुत ही तकलीफदेह पल आए, समवेदना के ज्वार भाटा में उलझा रहा क्यूंकि जो बहुत करीब था वो अचानक से बहुत दूर हो गया। गुमसुम सा सन्नाटे की तरह पसरा बीतती रात की तरह काम से लिपट कर उस एकाकी पल को दूर करने का हरसंभव प्रयास विफल हो रहा था, मुहब्बत का जन्नत ताज का शहर आगरा मेरे उस एक एक पल को भारी कर रहा था।
आगरा से प्रकाशित होने वाला समाचारपत्र अकिंचन भारत उस समय मेरा ठिकाना हुआ करता था। जहाँ सुबह से लेकर रात के दो से तीन बजे तक में अखबारनवीसों के बीच हुआ करता था, एक नए बच्चा अखबार में कुछ बेहतरीन लोगों का साथ मानों एक परिवार का साथ हो। वरिष्ट पत्रकार गजेन्द्र यादव जी का बड़े भाई का प्यार और स्नेह तो वैभव पाण्डेय का छोटे भाई का प्यार मगर यहाँ चर्चा मैं इस बात का कर रहा हूँ की ये ही वो दिन थे जब ब्लॉग का खुमार मुझ पर भी चढा और ब्लॉग की दुनिया में मैंने भी पदार्पण किया।
यहीं पर सेन्ट्रल डेस्क पर विनीत उत्पल हुआ करते थे, समभाषी होने के कारण, अन्य कारण भी कि हमारी मित्रता भी हुई, पत्रकारों का तकनिकी में रुझान हमेशा मुझे आकर्षित करता रहा है और ये भी एक वजह थी कि विनीत के साथ हमारी गाहे बगाहे बात चीत होती रही। जहाँ मैंने विनीत को ब्लॉग पर लिखते पढ़ते पाया, एक हिन्दी भाषी और हिन्दी प्रेमी का आकर्षित होना निश्चित था सो हुआ भी, और कम्पूटर से तकनिकृत होने के बावजूद ब्लॉग की दुनिया से अनजान मैं ने ब्लॉग में कदम रखा, धन्यवाद विनीत । मुझे कोई हिचक नही शर्म नही की विनीत उत्पल मेरे ब्लॉग गुरु हैं। ब्लॉग बनाने से लेकर ब्लॉग का संचालन (अग्रगेटर) करने वालों पर पंजीकरण तक, या फ़िर विभिन्न ब्लोगों पर भ्रमण तक सब विनीत की ही देन है।
विनीत के बारे में बतात चलूँ कि जब मैं रायपुर के भाष्कर में था तो वहां के वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत शर्मा ने एक बार एक झा जी पत्रकार से मेरी बात करायी जो दिल्ली में थे और प्रशांत जी के साथ काम कर चुके थे, और अकिंचन भारत में आके पता चला कि वो दूर का भाष होने वाला और कोई नही विनीत ही हैं, तभी कहते हैं कि दुनिया गोल है, कोई भी कहीं भी मिल सकता है।
भड़ास का रास्ता भी विनीत का ही दिखाया हुआ है। न्योता पाओ भडासी बनो अद्भुत था वो यशवंत जी का स्लोगन, बिना आकर्षित हुए आप रह ही नही सकते थे सो मैं भी हुआ और बन बैठा भडासी।
आरंभिक दिनों में मैं बस चिट्ठाजगत या ब्लोग्वानी, और नारद सरीखे अग्रगेटर पर ही घुमा करता था, लिखने का वक्त नही सो गाहे बगाहे बस नजर मार लिया करता था, भडास पर आने के बाद भी मजे से पढ़ना और बस पढ़ना इससे ज्यादा नही कर पा रहा था। आगरा से वापिस भी आ चुका था और लिखने की तीव्र इच्छा हिलोरें भी मार थी सो बस कैसे-कैसे के उहा पोह में पड़ा हुआ था की यशवंत सिंह भड़ास वाले मेरे दुसरे गुरु बने जब उन्होंने बताया की कैसे मैं पोस्ट लिख सकता हूँ, (मेरा मतलब भड़ास पर से है), गुरुदेव प्रणाम प्रणाम।
ब्लॉग पर पोस्ट करना तो सीख गया था मगर समयाभाव की बस सिर्फ़ टिपिया कर निकल लेता था, और महीनों सिर्फ़ पढने और टिपियाने का सिलसिला चला, इस बीच मैं रायपुर, नागपुर, दिल्ली होते हुए मायानगरी मुंबई पहुँच गया था। टीका टिपण्णी से लगता था की डॉक्टर रुपेश आजिज आ गए हैं जब मेरे पीछे ही पड़ गए की बहुत हो गया टिपियाना अब जल्दी से पोस्ट डाल दो, और सच्चे अर्थों में कहूं तो पोस्ट लिखने और निरंतर लिखने की प्रेरणा बस डॉक्टर रुपेश का किया धारा है, डॉक्टर साहब को प्रणाम और प्रणाम अपने तीनो गुरुओं को जिनके कारण थोड़ा बहुत लिख कर अपने भाव व्यक्त कर पाता हूँ।
यात्रा जारी है और संग ही जारी है मेरे गुरुओं के आशीष जिस से मैं अपने पथ पर अग्रसर हूँ। विचारों का कारवां शायद इसे ही तो कहते हैं।
साल के बदलाव ने बदलते पथ पर बहुत कुछ बदला है और आगे भी बदलेगा।

27.10.08

डा.रूपेश श्रीवास्तव के शिष्य का चड्ढी संकट

जब भी चड्ढी में कुछ होता था तो वह अन्य कारण से होता था लेकिन आजकल जब से यशवंत दादा ने बताया है कि डा रूपेश श्रीवास्तव का भूत न जाने किस-किसकी चड्ढी खोलेगा और इसी लिये उन्होंने तो अभी से कस कर चड्ढी पकड़ रखा है तो मुझे भी यही खतरा सता रहा है। डा रूपेश श्रीवास्तव की मौत की सूचना पर यशवंत दादा ने जो टिप्पणी करी वह डरावनी है क्योंकि इससे बहुत पहले भी यशवंत दादा लिख चुके हैं कि डा रूपेश श्रीवास्तव उनके सपने में आ कर सिर पर डंडा लेकर खड़े रहते हैं और कहते हैं कि क्रांति करो और अब हैं कि चड्ढी संकट जैसा राष्ट्रीय खतरा पैदा कर दिया है। ये डा रूपेश श्रीवास्तव भी मर कर न जाने क्या चाहते हैं अब तो लगता है कि अगर मेरे सपने में डंडा लेकर आए तो पता नहीं क्या-क्या कहेंगे इस कारण नींद ही गायब है उनके मरने के बाद से।
ये चड्ढी का खतरा ऐसा बढ़ा है की सोचा की लोहे की बनवा लूँ, पक्का और परमानेंट मगर फ़िर याद आया की जब रुपेश चड्ढी उतरने में माहिर है तो उसका भूत दो देखते देखते लोहे वाला भी गायब ही कर देगा, अब तो यशवंत दादा के साथ मैं भी चड्ढी संकटग्रस्त हो गया हूँ, बचाओ यारों इस चड्ढी उतारू भूत से......

16.4.08

यशवंत और डॉ.रूपेश ने मुहिम छेड़ दी है : गाधीगिरी बनाम गांडूगिरी

गांडीवर लात मारुन बाहेर काढ़ुन टाक या दोघा आई झवाड़्याना आले मोठे पत्रकार... (गांड पर लात मारकर बाहर निकाल दो इन दोनो मादरचो॑** को बड़े आए पत्रकार....)........। क्या आप यकीन करेंगे कि ये किसी गुंडे या मवाली के शब्द नहीं बल्कि एक ऊंचे सरकारी ओहदे पर बैठे अधिकारी के हैं। जरा ये भी जान लीजिये कि ऐसी ही दसियों गन्दी-गन्दी बातें कही किसके लिये गयी हैं। भड़ास परिवार के लिये आदरणीय माने जाने वाले तीखे तेवरों के लिये पहचाने जाने वाले आपके भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के लिये और उनके साथ में था मैं नाचीज़(आप लोगों की मुनव्वर आपा का बाप हूं मैं) जो अपने जमाने का बड़ा रंगबाज हुआ करता था लेकिन अब सचमुच बूढ़ा हो गया हूं। बात भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के द्वारा चलाए जा रहे सरकारी कामों में अनियमितता के खिलाफ़ R.T.I.(सूचना प्राप्ति के अधिकार) की है। उन्होंने तमाम सरकारी घपलों की पोल खोल कर रख दी है लेकिन धन्य हैं मुंबई और नई मुंबई के पत्रकार जो सिर्फ भड़वागिरी के अलावा कुछ नहीं करते हैं,पत्रकारिता के तमाम उसूल उन्होंने बेंच कर खा लिये हैं। सूचना प्राप्ति के अधिकार के अंतर्गत जो दस्तावेज कार्यालयों ने रो-रोकर दिये उन्हें हाथ में लेकर जब भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव हमारे क्षेत्र की नगर परिषद के चीफ़ आफ़िसर के पास लेकर गये तो उसने जो न सिर्फ़ गाली-गलौच करी बल्कि धक्का-मुक्की करते हुए कहा कि जो उखाड़ सकता है उखाड़ ले तुम पत्रकारों में इतनी भी ताकत भी नहीं है कि मेरी झांट का एक बाल भी टेढ़ा कर सको। इस अधिकारी ने कहा कि तुझे क्यों चाहिये ये सब जानकारी ? लोगों को ब्लैकमेल करता है साले....... पता नही कहां-कहां से मादरचो** हिन्दी बोलने वाले आकर हमें चो * ना सिखा रहे हैं..... । भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव ने इतना अपमान सहकर भी अपना आपा नहीं खोया बिना किसी नाराजगी के उन्होंने उस नीच अधिकारी से माफ़ी मांगी कि मेरी वजह से आपको तकलीफ़ हुई इसके लिये माफ़ करें। मेरे सामने उन्होंने तुरंत ही बाहर आकर भड़ास के दूसरे मॉडरेटर श्री यशवंत सिंह को फोन करके घटना की जानकारी दी और मशविरा किया कि ये लड़ाई कैसे लड़ेंगे हम सारे भड़ासी। उन्होंने मुझे अभी बताया कि भड़ास के दिग्गजों ने निर्धारित किया है कि इस लड़ाई को गांधीगिरी से लड़ना है। मुझे निजी तौर पर नहीं मालुम कि लड़ाई का ये कौन सा तरीका है? मेरे लिये तो ये एक बिलकुल नया अनुभव होने वाला है क्योंकि मैंने तो मामले पिस्टल से सुलझाए हैं अबतक। डॉ.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे बताया कि भड़ास के दूसरे मॉडरेटर श्री यशवंत सिंह ने तो ये मुहिम छेड़ भी दी है और उस अधिकारी से सीधे बात भी करी है कि आपने जो भी किया वो बड़ा अच्छा किया हम लोगों के साथ ऐसा ही किया जाना चाहिये क्योंकि हम हैं धरती ग्रह के हिन्दी के सबसे बड़े हिन्दी कम्युनिटी ब्लाग से जुड़े लोग, जिसमें हिन्दी मीडिया से जुड़े कथित महान-महान लोग जुड़े हैं। अब मैं देखना चाहता हूं कि बाकी भड़ासी क्या करते हैं मैं इस पोस्ट को लिख कर मूक दर्शक रहूंगा देखने के लिये कि भड़ास की ताकत क्या है और कितनी है?
उस सुअर अधिकारी का नाम, पता और टेलीफोन नं. लिखने को कहा है कि अगर हो सके तो उसे गांधीगिरी करते हुए फूल और गिफ़्ट भेजिये उसके कमीनेपन के व्यवहार के लिये धन्यवाद करिये-------
नाम : ए.के.देसाई
पद : चीफ़ आफ़िसर(मुख्याधिकारी),
पता: पनवेल नगर परिषद,जिला रायगढ़(नई मुंबई)-४१०२०६
फोन: ०२२-२७४५५७५१(आफ़िस)
०२२-२७४५२२०६(निवास)
०९३२४९८३३४४(मोबाईल)