भड़ासी बाईयों और भाईयों, जब किसी साम्राज्य का विस्तार हो जाता है तो उसमें फटाव आने लगता है और अलग-अलग विचार धाराएं पैदा होने लगती हैं। ठीक वैसा ही भड़ास के साथ हो रहा है। पहले यहां सब भड़ासी मात्र हुआ करते थे अब इनमें भी श्रेणियां बनने लगी हैं। कुछ सक्रिय, कुछ निष्क्रिय, कुछ अक्रिय लेकिन भड़ासी तो सभी हैं क्योंकि जो कभी एकाध बार गलती से इधर मुंह मार लिये होंगे। अब भड़ास में फ़ैन क्लब बना है यानि कि जो फैन हैं वही भड़ासी हैं बाकी सब जो हैं नाम के भड़ासी हैं लेकिन उनकी सदस्यता अक्रियता या निष्क्रियता के आधार पर समाप्त करी तो गिनती के मुश्किल से पचास ही बचें शायद। मैं एक भविष्यवाणी कर रही हूं कि आने वाले समय में इस क्लब में कई विभाजन हो जाएंगे जैसे कि अभी कुछ लोग फैन हैं उनमें से जो ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "एग्जास्ट फैन" कहा जाएगा, जो इनकी अपेक्षा अधिक सक्रिय होंगे उन्हें "कूलर" और जो कूलरॊं से ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "ए.सी" की श्रेणी में रखा जाएगा।
25.10.08
भड़ास फ़ैन क्लब/एग्जास्ट फैन क्लब/कूलर क्लब/ए.सी. क्लब में मैं कहां रहूंगी?
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मुनव्वर सुल्ताना Munawwar Sultana منور سلطانہ
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28.6.08
यशवंत दादा,मौत का आतंक किसे दिखाया जा रहा है???????
आज बहुत दिनो बाद एक बार फ़िर से मेरे अंदर से मुख्यधारा से बाग़ी हुआ चिकित्सक निकल कर चिल्लाने को तैयार है इस लिये जोर जोर से चिल्ला कर कह देना चाहता हूं कि ये जो करुणाकर के बारे में मौत-मौत-मौत का भय है, पूरी तरह निर्मूल है। अरे यार लोगों ! इस दुनिया में जिस दिन प्रोग्राम बन कर आ गए थे उसी समय ईश्वर ने सबमें एक दिन डिलीट हो जाने का साफ़्टवेयर डाल दिया था कि जाओ आटोडिलीट हो जाना। मौत का आतंक किसे दिखाया जा रहा है कम से कम भड़ासी तो इस परिवर्तन से हरगिज नही डरते हैं। मैंने अभी करुणाकर से बात करी है और आप सबको कह देना चाहता हूं कि (यशवंत दादा आप भी शामिल हैं) बस करो ये डर-डर खेलना बहुत हो गया यार कब तक कांपोगे? एक बार हम सारे दोस्त जड़ी-बूटियों के लिये फ़्लोरा स्टडी के लिये फ़ील्ड में गये हुए थे तो सामान्य तौर पर आप माने या न माने ये छात्रों के लिये किसी पिकनिक से कम नहीं होता है ,लोग अपनी-अपनी गर्लफ़्रेंड्स को साथ ले जाना चाहते हैं, बीयर रखना नहीं भूलते हैं, ताश के पत्ते तो अनिवार्य होते हैं और अगर प्रोफ़ेसर साहब रंगीले हुए तो ढोलक,गिटार वगैरह भी संग रख लिया जाता है। इसमें जरूरी होता है कि साथ में एक अपडेटेड फ़र्स्ट एड किट भी ले ली जाए लेकिन उसे ढोना कौन चाहता है तो बिना मन के रख ही ली जाती है। स दोस्त अपनी-अपनी में मशगूल थे और हम थे कि एक पौधे को ताकत लगा कर उखाड़े पडे़ थे कि घर ले जाकर नमूने के तौर पर सहेजेंगे क्योंकि बह एक दुर्लभ पौधा था, उसकी जड़ से एक मस्त सांप चिढ़ कर निकला और हमें कस कर काट लिया। हमने शांति से प्रोफ़ेसर साहब को बताया कि एक जहरीले सांप ने काट लिया तो उनके तोते उड़ गये,चिल्लाने लगे कि अबे सालों दारू पीना बंद करो और फ़र्स्ट एड किट से एंटी स्नेक वेनम का इंजेक्शन निकाल कर डा.रूपेश को लगाओ...... मर जाएगा वरना साले हम सब परेशानी में पड़ जाएंगे....... । एक भला सा सहपाठी दवा निकाल कर लाया और बोला कि सर ये तो एक्सपायर डेट का हो गया है(किसी ने भी फ़र्स्ट एड किट उठाते समय देखना जरूरी नहीं समझा कि देख लेते कि किस दवा की क्या डेट है)। पता है उस दिन क्या हुआ???? मैंने जिन्दगी का सबसे बड़ा चिकित्सा-मंत्र सीख लिया, प्रोफ़ेसर चिल्ला कर बोले अबे साले अब बता रहा है कि एक्सपायर डेट का हो गया है पहले नहीं देखा....... लगा इसी को ... ये तो वैसे भी मर जाएगा तो इसी एक्सपायर डेट के इंजेक्शन को लगा कर देख अगर बच गया तो ठीक है........ मुंह मत देख साले..... चमत्कार हो गया ......। मैं उस एक्सपायर डेट की दवा से बच गया जबकि मैं खुद उस सांप की प्रजाति को जानता हूं कि वो कितना जहरीला होता है; तो बच्चों इस कथा से मैंने क्या सीखा कि जो गतायु हो, मरणासन्न हो उस पर सारे जीवन रक्षक उपाय अपना लेने चाहिये न कि ये कह कर अलग खड़े हो जाना चाहिये कि ले जाओ ये तो मरने वाला है.... ये सुअर एम्स और टाटा के डाक्टर अपने आप को ब्रह्मा का बाप समझते हैं कि इन्होंने कह दिया और मरीज मर ही जाएगा..... कमीने कहीं के.। मेरी मां का उदाहरण तो यशवंत दादा भी जानते हैं जिन्हें ढाई साल पहले ब्रेस्ट कैंसर की अंतिम अवस्था बता कर ये कह दिया था इन चूतियेस्ट डाक्टरों ने कि बुढ़िया डेढ़-दो महीने में मर जाएगी जबकि मेरी माताराम पूरी तरह से अब स्वस्थ हैं और रिश्ते में लगने वाली सारी बहुओं को आशीर्वाद देती फ़िर रही हैं चाचा,मामा,फ़ूफ़ा सबकी बहुएं कहानी घर घर की देख रहीं हैं इनके संग.....। यार लोगों मैं करुणाकर के इलाज का जिम्मा ले रहा हूं बस आप लोग ऊपर वाले को बोल कर रखो कि इस बीच उसके स्वस्थ होने से पहले मुझे डिलीट न कर दे.....। अगर किसी का दिल बहुत बड़ा हो यानि उसे एन्लार्जमेंट आफ़ हार्ट नामक बीमारी हो और दवा के खर्च का जिम्मा उठाना चाहे तो भइये शौक से उठाए लेकिन मैं उसको कभी उसकी बीमारी यानि एन्लार्जमेंट आफ़ हार्ट का इलाज न बताउंगा,,,,,,, :)
जय जय भड़ास
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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16.4.08
यशवंत और डॉ.रूपेश ने मुहिम छेड़ दी है : गाधीगिरी बनाम गांडूगिरी
गांडीवर लात मारुन बाहेर काढ़ुन टाक या दोघा आई झवाड़्याना आले मोठे पत्रकार... (गांड पर लात मारकर बाहर निकाल दो इन दोनो मादरचो॑** को बड़े आए पत्रकार....)........। क्या आप यकीन करेंगे कि ये किसी गुंडे या मवाली के शब्द नहीं बल्कि एक ऊंचे सरकारी ओहदे पर बैठे अधिकारी के हैं। जरा ये भी जान लीजिये कि ऐसी ही दसियों गन्दी-गन्दी बातें कही किसके लिये गयी हैं। भड़ास परिवार के लिये आदरणीय माने जाने वाले तीखे तेवरों के लिये पहचाने जाने वाले आपके भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के लिये और उनके साथ में था मैं नाचीज़(आप लोगों की मुनव्वर आपा का बाप हूं मैं) जो अपने जमाने का बड़ा रंगबाज हुआ करता था लेकिन अब सचमुच बूढ़ा हो गया हूं। बात भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के द्वारा चलाए जा रहे सरकारी कामों में अनियमितता के खिलाफ़ R.T.I.(सूचना प्राप्ति के अधिकार) की है। उन्होंने तमाम सरकारी घपलों की पोल खोल कर रख दी है लेकिन धन्य हैं मुंबई और नई मुंबई के पत्रकार जो सिर्फ भड़वागिरी के अलावा कुछ नहीं करते हैं,पत्रकारिता के तमाम उसूल उन्होंने बेंच कर खा लिये हैं। सूचना प्राप्ति के अधिकार के अंतर्गत जो दस्तावेज कार्यालयों ने रो-रोकर दिये उन्हें हाथ में लेकर जब भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव हमारे क्षेत्र की नगर परिषद के चीफ़ आफ़िसर के पास लेकर गये तो उसने जो न सिर्फ़ गाली-गलौच करी बल्कि धक्का-मुक्की करते हुए कहा कि जो उखाड़ सकता है उखाड़ ले तुम पत्रकारों में इतनी भी ताकत भी नहीं है कि मेरी झांट का एक बाल भी टेढ़ा कर सको। इस अधिकारी ने कहा कि तुझे क्यों चाहिये ये सब जानकारी ? लोगों को ब्लैकमेल करता है साले....... पता नही कहां-कहां से मादरचो** हिन्दी बोलने वाले आकर हमें चो * ना सिखा रहे हैं..... । भड़ास के मॉडरेटर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव ने इतना अपमान सहकर भी अपना आपा नहीं खोया बिना किसी नाराजगी के उन्होंने उस नीच अधिकारी से माफ़ी मांगी कि मेरी वजह से आपको तकलीफ़ हुई इसके लिये माफ़ करें। मेरे सामने उन्होंने तुरंत ही बाहर आकर भड़ास के दूसरे मॉडरेटर श्री यशवंत सिंह को फोन करके घटना की जानकारी दी और मशविरा किया कि ये लड़ाई कैसे लड़ेंगे हम सारे भड़ासी। उन्होंने मुझे अभी बताया कि भड़ास के दिग्गजों ने निर्धारित किया है कि इस लड़ाई को गांधीगिरी से लड़ना है। मुझे निजी तौर पर नहीं मालुम कि लड़ाई का ये कौन सा तरीका है? मेरे लिये तो ये एक बिलकुल नया अनुभव होने वाला है क्योंकि मैंने तो मामले पिस्टल से सुलझाए हैं अबतक। डॉ.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे बताया कि भड़ास के दूसरे मॉडरेटर श्री यशवंत सिंह ने तो ये मुहिम छेड़ भी दी है और उस अधिकारी से सीधे बात भी करी है कि आपने जो भी किया वो बड़ा अच्छा किया हम लोगों के साथ ऐसा ही किया जाना चाहिये क्योंकि हम हैं धरती ग्रह के हिन्दी के सबसे बड़े हिन्दी कम्युनिटी ब्लाग से जुड़े लोग, जिसमें हिन्दी मीडिया से जुड़े कथित महान-महान लोग जुड़े हैं। अब मैं देखना चाहता हूं कि बाकी भड़ासी क्या करते हैं मैं इस पोस्ट को लिख कर मूक दर्शक रहूंगा देखने के लिये कि भड़ास की ताकत क्या है और कितनी है?
उस सुअर अधिकारी का नाम, पता और टेलीफोन नं. लिखने को कहा है कि अगर हो सके तो उसे गांधीगिरी करते हुए फूल और गिफ़्ट भेजिये उसके कमीनेपन के व्यवहार के लिये धन्यवाद करिये-------
नाम : ए.के.देसाई
पद : चीफ़ आफ़िसर(मुख्याधिकारी),
पता: पनवेल नगर परिषद,जिला रायगढ़(नई मुंबई)-४१०२०६
फोन: ०२२-२७४५५७५१(आफ़िस)
०२२-२७४५२२०६(निवास)
०९३२४९८३३४४(मोबाईल)
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मोहम्मद उमर रफ़ाई
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Labels: R.T.I., गांधीगिरी, डॉ.रूपेश श्रीवास्तव, पत्रकार, भड़ासी, यशवंत सिंह, हिन्दी मीडिया
9.4.08
RTI-RTI खेलना और टाईम मशीन की ईजाद........
मेरा पसंदीदा काम है मात्र दस रुपए और थोड़ा सा वक्त खर्च करके ब्यूरोक्रेट्स के साथ RTI-RTI खेलना यानि कि जब मन किया पूछ लिया सरकारी अधिकारियों से कि सालों बताओ सड़क की चौड़ाई कागजों पर कितनी है और सचमुच में कितनी है या कागजों में झोपड़पट्टी के लिये कितनी सीट्स का टायलेट पास हुआ और सच में बनाए कितने हैं वगैरह-वगैरह। आप लोगों को पता होगा कि मैने पहले एक पोस्ट में लिखा था कि मुझे नगर परिषद के अधिकारियों ने अपना मुंहलगा साला समझ कर मजाक किया और RTI के अंतर्गत सादा कागज मुहर लगा कर उपलब्ध करा दिया। बस फिर क्या था हम इस रिश्ते से नाराज हो गये कि साले तुम बनो हम तो जीजा बनेंगे और प्रथम अपीलीय अधिकारी को अपील कर दी जो कि खुद को बड़े जीजा से कम नहीं मानते हैं और काफ़ी मजाकिया किस्म के हैं वो भी ऐसे ही मजाक करते हैं और पद सम्हाले हैं सहा.आयुक्त का। इसी मजाक की परंपरा के चलते मेरे पास दिनांक ८/४/२००८ को शाम के ०४:४५ पर एक भला सा मानव प्रतीत होने वाला प्राणी हाथोंहाथ एक पत्रनुमा वस्तु लाया कि साहब इसे ले लीजिये । मैंने उसे पानी पीने को दिया और पूछा कि चाचा ये क्या है तो उसने बताया कि हे नादान बालक,कुटिल कालवश निज कुल घालक ये तेरा बुलावा है, पल भर को लगा कि कहीं यमदूत वेष बदल कर तो नहीं आ गया । डरते डरते पत्र खोल कर पढ़ा तो प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास से बुलावा आया था कि आओ साले सुनवाई नामक नाटक है उसका ये मुफ़्त पास है। पत्र मोड़ कर रखने ही जा रहा था तो इतने में मुनव्वर आपा के अब्बा हुज़ूर जनाब मोहम्मद उमर रफ़ाई दरवाजे पर प्रकट हो गये और बोले क्या है ये हाथ में जिसे इतने जतन से थामे हो तो मैने बता दिया,उन्होंने देखने की इच्छा जाहिर करी तो मैंने पत्र उनके हाथ पर रख दिया तो कुछ देर तक तो पता नहीं क्या देखते रहे फिर बोले कि डाक्टर साहब क्या आपने टाईम मशीन की भी ईजाद कर ली है।.मेरी कुछ समझ में ही नहीं आया कि अब्बा दि ग्रेट क्या फ़रमा रहे हैं ,उन्होंने मुझे दिखाया कि उस पत्र पर जिस तारीख का बुलावा था वो तो ९/४/२००७ है यानि कि एक साल पहले की तारीख और वो भी एक जगह नहीं तीन चार जगह यही गलती थी। आज जब मैंने अपीलीय अधिकारी महोदय को बताया तो उन्होंने कहा कि आपको तो मीनमेख निकालने की आदत हो गयी है ये तो नहीं बनता कि चुपचाप बाकी लोगों की तरह शान्ति से रहें और हमें भी रहने दें, लगे रहते हो फ़ालतू में सबको सताने में। ऐसी बाते सुन कर हमारा तो पिछवाड़ा सुलग कर कोयला हो गया मन किया कि उसे खूब गरिया दूं और दुकान पर चार छह लातें कस-कस कर जमा दूं लेकिन ये सोच कर चुप रहा कि अगर इस सुअर को गालियां दे ली तो मन हलका हो जाएगा फिर पता नहीं भड़ास पर पोस्ट डालने का मन ही न करे इसलिये सिर्फ घूर-घूर कर ही काम चला लिया। अब उसे जितना गाली देना है संध्या पूजा के बाद आराम से लेट कर इस पोस्ट को डालने के बाद दूंगा और हां दूसरी बात कि जिस संदर्भ में यह अपील थी उसके लिये शनिवार को फिर से पनवेल नरकपालिका के चीफ़ आफ़िसर का सर खाने और बैंड बजाने जाना है और साथ में होंगी हमारी महाभयंकर भड़ासी बहन मनीषा दीदी और ग्यारह और दीदियां। मर गया साला समझिये............
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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Labels: RTI, ब्यूरोक्रेट्स, भड़ासी, मनीषा दीदी, मुनव्वर आपा
7.4.08
हैप्पी "विक्रम संवत २०६५" यानि न्यू ईयर
आज सुबह सुबह जब आंख खुलने ही वाली थी कि एक राजाओं जैसे हुलिये वाला शख्स सामने से आता दिखा तो मुझे लगा कि ये सपना शायद किसी माइथोलाजिकल बैकग्राउंड से संबंधित है। लेकिन उस शख्स ने बताया कि वो तो महाराज विक्रमादित्य हैं। दिमाग पर काफ़ी जोर देने पर याद आया कि अरे बाप रे ये तो बड़े प्रतापी महाराज हैं। उन्होंने मुझसे बड़ी रिक्वेस्ट-सिक्वेस्ट करी कि अरे तुम भड़ासी तो हिंदी वाले हो और न जाने क्या बात थी पौष माह की एकादशी को "हैप्पी न्यू ईयर" चिल्ला चिल्ला कर एक दूसरे को बधाई दे रहे थे, मदिरा आदि का सेवन करके पगलाए जा रहे थे। मैंने स्वर्ग में सबसे पूछा तो मुझे बताया गया कि आज मानव जाति ईसा मसीह के नाम से वर्ष की शुरूआत मानती है इसलिये यह उन्माद है। इसलिये हे भड़ासी प्राणी,आज अगर तुम हिंदी का दंभ भरते हो तो मेरे नाम से चल रहे विक्रम संवत के शुरुआत की भी जनसामान्य को शुभेच्छा दे दो कि आज से विक्रम संवत २०६५ प्रारंभ हो गया है। यदि तुम मुझे भूल गये तो दोष तुम्हारा नहीं है यह तो समय का प्रभाव है लेकिन तुम सब तो धारा के विपरीत चलने का साहस करते हो। अचानक आंख खुल गयी और उठते ही महाराज विक्रमादित्य आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठा कर अद्रश्य हो गये। मैं उनके निवेदन पर यह पोस्ट डाल रहा हूं अगर मन करे तो एक दूसरे को शुभेच्छा दे दो वरना अगले साल फिर महाराज याद दिलाने आयेंगे।
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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Labels: न्यू ईयर, भड़ासी, विक्रम संवत, हिंदी
1.3.08
कीचड़ की होली बस करिए.........
होली का मौसम गया है भड़ास पर ऐसा जिक्र चल ही रहा था कि कुछ फागुन गाया जाए ,गीत गुनगुनाए जाएं कि लोगों को लगने लगा कुछ बवाल हो गया है । भाई लोग इतने समय से जो भी हुआ उसमें नया क्या था ? हम सब भड़ासी नीच, गन्दे, ढीठ, घिनौने, बदबूदार, कमीने, असभ्य, गलीज़ ,छिछोरे वगैरह-वगैरह न जाने क्या-क्या ऐसे हैं जो कि बौद्धिकता के नुमाइंदे नहीं हो सकते । अरे भाई लोग ,ये तो हम सरल सहज भावुक भड़ासियों का सम्मान है ,यही तमगे हैं जो हमारे सीने पर जगमगा कर हमें उस वर्ग से अलग रखते हैं । अब मैं दिल ,फेफड़ों ,गुर्दों ,तिल्ली ,आमाशय आदि(इनमें दिमाग़ शामिल नहीं है) तमाम अंग-उपांगों से यही कहना चाहता हूं कि यशवंत दादा और अविनाश भाई ने जो होली की शुरुआत कीचड़ से करी है अब वह रुके ; अरे भाई कितने सारे रंग हैं क्या साला पूरा मौसम कीचड़ की ही होली खेल कर बिता देना चाहते हैं आप लोग ? बस करो एक दूसरे पर कीचड़ उछालना । भड़ासी तो औघड़ हैं ही तो जिसने एक अंजुरी कीचड़ उछाला तो साले सब चल पड़े उसके ऊपर गटर का ढक्कन खोल कर मलीदा निकाल कर उछालने और छोटे बच्चों की तरह उसी में लोट-पोट होकर खुश होने लगे । अविनाश ,मसिजीवी और मनीषा पांडेय बहन ने बस कीचड़ की अंजुलि भर कर उछाला ही था कि यशवंत दादा ,मुनव्वर आपा ,मनीष (महा)राज , अपने पंडित जी ग्रीन लाइट (हरे प्रकाश) उपाध्याय और मैं खुद दौड़ पड़े ,होली है-होली है का नारा बुलंद करके कीचड़ की टोकरियां लेकर इन सब पर । आज मनीषा दीदी ने मुझे टोका तब होश आया कि यार वाकई और भी रंग हैं भड़ास में जो हम उड़ाकर समां रंगीन कर सकते हैं । आज उनसे मिला तो वे अपने ही अंदाज में एक उंगली से कुछ छिपा कर टाइप कर रहीं थीं मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि मै यह अपने नाम वाली मनीषा के लिए लिख रही हूं ,जब पूरा हो जाएगा तो खुद ही भड़ास पर भेज दूंगी और मैंने देखा मेरी बहन मनीषा की आंखो में कि वो इन्दौर वाली मनीषा बहन से शायद कुछ प्यार की बात कहना चाह रही हैं तो अब इंतजार है उनकी पोस्ट का कि कब पूरा कर पाती हैं वो अपनी बात.......
अरे मेरे प्यारों तो देर किस बात की है जरा हो जाए क्रांति-भ्रांति-शान्ति की सारी खुशबुओं को होली के रंगों में मिला कर भरपूर-भरपेट मस्ती करने का । अब मैं जरा गब्बर सिंह के अंदाज़ में यशवंत दादा से पूंछता हूं कि कब है होली ? होली कब है ?
