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21.11.08

यशवंत दादा! सच बताना........

अमीबा एक ऐसा प्राणी है जो पूरा का पूरा मात्र एक ही कोशिका से बना होता है यानि कि दिल-दिमाग-मन-आत्मा सभी उसी कोशिका में ठुंसे रहते हैं। उसमें लैंगिक प्रजनन नहीं होता इसलिये इन्हें कभी ही कोई सेक्सुअल प्राब्लम होती ही नहीं, इनमें न नर हैं न मादा और न ही हिजड़े। एक विशेष बात इस प्राणी के बारे में के इसका कभी एक आकृति नहीं रहती है यानि हमेशा शक्ल-सूरत बदलती रहती है यानि कि आप जिस "रामू अमीबा" से कल मिले थे उसे आज आप "श्यामू अमीबा" समझ बैठें। ’एकोहं बहुस्यामि’ की सोच में ये भी विश्वास रखते हैं। ये अपनी प्रकृति कभी नहीं बदलते यानि अमीबा ही रहते हैं ये नहीं कि पैरामीशियम(एक और दूसरा एक-कोशिकीय प्राणी) बन गये। इसलिये अमीबा के बारे में कोई राय कायम करना क्या मानवीय बुद्धिमानी की कसौटी पर सही रहेगी? ये कब पैदा हुए और मर गए पता ही नहीं चलता शायद इसलिये कि इन्हें न तो कब्रिस्तान में दफ़नाते हैं न ही श्मशान में जलाते हैं और तो और शवयात्रा तक नहीं निकालते। "अंगुलिमाल अमीबा" के गले में उंगलियों की माला है वो हर बात में एक उंगली निकाल कर मुद्दे की पिछाड़ी में डाल देता है ऐसा आपने सोचा लेकिन जब अमीबा ने अपनी प्रकृति इतने दिन तक आपको बतायी तो सच बताना कैसा लगा। न पैसा-न प्रसिद्धि-न शान्ति....... यही तो जीवन है; हम सबका अधूरापन ही तो हमें पूर्णता की ओर धकेलता है लेकिन हम किस बात को पूर्णता मानें ये हमारी मर्जी है। बस यावज्जीवेत सुखम जीवेत ही सत्य है, सत्य वही है जिसे हम मानते हैं जिसे नहीं मानते वो सत्य कहां है हमारे लिये? मेरे जीवन में संबंधों की उपलब्धियों में आप श्रेष्ठतम हैं ये मैं बता चुका हूं आज लिख कर दे रहा हूं। शरारतें,गम्भीरताएं,मनोरंजन,महत्त्वाकांक्षाएं,उठापटक,क्षोभ और गुदगुदी के बीच लोटने में बड़ा आनंद है,मुझ सुअर का यही कीचड़ है। मैं ने आपको कितना सताया है और क्यों सताया है ये आप जान पाये या नहीं? मैं नहीं बताउंगा, इस बात में बहुत सारे प्रश्नवाचक चिह्न लगा सकता था पर एक ही लगा कर काम चला लिया।
जय जय भड़ास

1.3.08

कीचड़ की होली बस करिए.........

होली का मौसम गया है भड़ास पर ऐसा जिक्र चल ही रहा था कि कुछ फागुन गाया जाए ,गीत गुनगुनाए जाएं कि लोगों को लगने लगा कुछ बवाल हो गया है । भाई लोग इतने समय से जो भी हुआ उसमें नया क्या था ? हम सब भड़ासी नीच, गन्दे, ढीठ, घिनौने, बदबूदार, कमीने, असभ्य, गलीज़ ,छिछोरे वगैरह-वगैरह न जाने क्या-क्या ऐसे हैं जो कि बौद्धिकता के नुमाइंदे नहीं हो सकते । अरे भाई लोग ,ये तो हम सरल सहज भावुक भड़ासियों का सम्मान है ,यही तमगे हैं जो हमारे सीने पर जगमगा कर हमें उस वर्ग से अलग रखते हैं । अब मैं दिल ,फेफड़ों ,गुर्दों ,तिल्ली ,आमाशय आदि(इनमें दिमाग़ शामिल नहीं है) तमाम अंग-उपांगों से यही कहना चाहता हूं कि यशवंत दादा और अविनाश भाई ने जो होली की शुरुआत कीचड़ से करी है अब वह रुके ; अरे भाई कितने सारे रंग हैं क्या साला पूरा मौसम कीचड़ की ही होली खेल कर बिता देना चाहते हैं आप लोग ? बस करो एक दूसरे पर कीचड़ उछालना । भड़ासी तो औघड़ हैं ही तो जिसने एक अंजुरी कीचड़ उछाला तो साले सब चल पड़े उसके ऊपर गटर का ढक्कन खोल कर मलीदा निकाल कर उछालने और छोटे बच्चों की तरह उसी में लोट-पोट होकर खुश होने लगे । अविनाश ,मसिजीवी और मनीषा पांडेय बहन ने बस कीचड़ की अंजुलि भर कर उछाला ही था कि यशवंत दादा ,मुनव्वर आपा ,मनीष (महा)राज , अपने पंडित जी ग्रीन लाइट (हरे प्रकाश) उपाध्याय और मैं खुद दौड़ पड़े ,होली है-होली है का नारा बुलंद करके कीचड़ की टोकरियां लेकर इन सब पर । आज मनीषा दीदी ने मुझे टोका तब होश आया कि यार वाकई और भी रंग हैं भड़ास में जो हम उड़ाकर समां रंगीन कर सकते हैं । आज उनसे मिला तो वे अपने ही अंदाज में एक उंगली से कुछ छिपा कर टाइप कर रहीं थीं मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि मै यह अपने नाम वाली मनीषा के लिए लिख रही हूं ,जब पूरा हो जाएगा तो खुद ही भड़ास पर भेज दूंगी और मैंने देखा मेरी बहन मनीषा की आंखो में कि वो इन्दौर वाली मनीषा बहन से शायद कुछ प्यार की बात कहना चाह रही हैं तो अब इंतजार है उनकी पोस्ट का कि कब पूरा कर पाती हैं वो अपनी बात.......
अरे मेरे प्यारों तो देर किस बात की है जरा हो जाए क्रांति-भ्रांति-शान्ति की सारी खुशबुओं को होली के रंगों में मिला कर भरपूर-भरपेट मस्ती करने का । अब मैं जरा गब्बर सिंह के अंदाज़ में यशवंत दादा से पूंछता हूं कि कब है होली ? होली कब है ?