11.3.09
होली क्यों नहीं मनाई जाती कभी कभी
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होली है तो पर यहां कहां
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कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज भी होली पारम्परिक तरीके से मनायी जा रही है। वहां की होली की खास बात है कि उसमें रंग भी है ता साफ सुथरे। वहां कोई हुडदंग जैसी चीजें नही हैं। औरतों की अपनी अलग होली होती है और आदमियों की अलग। होली वहां लगभग 15 दिनों तक चलती है। पहले दिन चीर बांधी जाती है। चीर बांधने का तरीका यह होता है कि एक डंडे में कपडों की पटिटयां घर घर जाकर बांधी जाती है। पहली पटटी कुलदेवता के मंदिर में बंधती है। यह चीर होली भर में होल्यारों के साथ साथ चलती है। होली में मौजूद सभी आदमियों या औरतों को होल्यार कहा जाता है। आदमियों की होली में बैठकी और खड़ी दोनों तरह की होलियों का चलन है। खड़ी होली में एक के बाद एक दूसरे घरों में जाकर सौंपसुपारी जिसमें चीनी मिली होती है खाने का मजा कुछ और ही है। वो भी दिन थे जब होल्यारों की इस मस्त भीड़ में हम भी शामिल हुआ करते थे। इसी बहाने सबके घर जाना होता थ। गांव जाना होता था। जब पापा अपने हिस्से की सौंप सुपारी हमें दे दिया करते थे हम कितने खुश हो जाते थे। जैसे सौंप सुपारी न हो कोई निधि हो जो हाथ लग गई हो। खैर जिस घर में बैठकी होली रमती है उसकी शान कुछ और ही होती है। तबला, हारमोनियम, सारंगी, ढ़ोल, दमुआ और उसके साथ एक लोटा जिसे सिक्के से बजाया जाता है, की धुनों पर ठेठ पहाड़ी अन्दाज में गाये जाने वाले खड़ीबोली के होली के गीत। साथ ही जिस घर में होली जम जाये वहां आलू के गुटकों और गुड़ के टपुके वाली चाय का मजा। और फिर रात की होली। रात को दो दो बजे तक होली गाने बजाने का रस। होली के अन्तिम दिन सारे घरों का एक चक्कर। छलड़ी के इस दिन रंग पोतने पुतवाने में एक अलग ही आनन्द है।
दूसरी ओ छुटपन में औरतों की होली में जाने और उसे देखने का भी मजा होता है। वहां सबसे अच्छी चीज होती है स्वांग। औरतें गांव भर की औरतों और पुरुषों का स्वांग करती हैं और लोट पोट होकर हंसती हैं। ये सबकुछ बड़ा मजेदार होता है।
लेकिन इस बार नहीं। आज मुझे अपने गांव चिटगल की याद आ रही है। यह स्वार्थ ही सही पर होली का असली मजा तो गांव में ही है। इस बार होली आ चुकी है और चली भी जायेगी। बिना किसी तरह का रंगीन अहसास कराये। और यहां इस माहौल में होली खेलने का मन भी नहीं है। ना पिचकारी का क्रेज है ना गुलाल का रंग। हाइडोफोबिया नही है फिर भी पानी से दूर दूर रहने का मन है। डर है कि कही कोई भिगा न दे और गांव की होली की याद दिमाग को तर बतर न कर दे। ऐसा हुआ तो मुश्किल हो जायेगी। यकीन मानिये।
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आप सभी को होली मुबारक
सभी सदस्यों और पाठकों को होली की ढेरों शुभकामनाऐं। आईये इस होली पर हम सब हिन्दुस्तानी मिलकर भाईचारे और सौहार्द का एक ऐसा रंग तैयार करें जो आतंकवाद रुपी दाग़ पर इस तरह से चढे कि वो दाग हमारे देश की सरज़मी से हमेशा के लिये मिट जाये। एक बार फिर कलम के सभी सिपाहियों को होली की मुबारकबाद...
आपका..
परेवज़ सागर
rangkarmi.blogspot.com
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Parvez Sagar
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Labels: होली
10.3.09
देखी हमरी काशी की होली !
आप सभी को होली की शुभकामनाएं। होली आते ही बरबस काशी के वो दिन याद आ जाते हैं जब भांग के नशे में धुत्त अस्सी पर हो रहे कवि सम्मेलन में झुंड बनाकर हर-हर महादेव का जयकारा लगाते हुए घूमते रहते थे। शाम को अस्सी के कवि सम्मेलन में वैसे तो सभी भद्र ही जुटते हैं मगर उस दिन किसी को मस्ती की तथाकथित अभद्रता से कोई भी परहेज नहीं होता। उस रोज के अभद्र शब्द अस्सी के कवि सम्मेलन के दिन शुभ माने जाते हैं। तभी तो भीड़ में कहीं दिखाई दे गए अपने परिचितों का सम्मान भी गाली से ही हम भी करते थे। मसलन अबे भोसड़ी के कहां घुस गया था जो अब दिखाई दे रहा है। उधर से जो जवाब आता था वह मैं .यहां मैं नहीं लिख रहा हूं मगर आप तो समझदार हैं, समझ ही गए होंगे। इस तरह के वाकए कवि सम्मेलन में होना आम बात थी। चलिए कुछ घटनाओं का जिक्र करते है जो आज भी जेहन में अपने अल्हणपन और काशी की होली की रंगीनियों को ताजा कर देते हैं। बुरा न मानो होली है की तर्ज पर सुनिए काशी की होली के मौके पर छात्रावास के दिन और अस्सी त्रिमुहानी पर हर साल होने वाले कवि सम्मेलन की आपबीती कथा। उस साल घरवालों से बीस बहाने बनाकर, पढ़ाई का वास्ता देकर काशी की होली और अस्सी का कवि सम्मेलन देखने छात्रावास में ही रूक गए। खाने का इंतजाम भी शहर में रह रहे एक मित्र के घर कर लिया था। अब तो बिंदास भी हो गए थे क्यों कि यहां घरवालों का खौफ भी नहीं रह गया था।

पहले अस्सी की एक घटना। मैं और मेरे कुछ दोस्त कवि सम्मेलन में हाजिर होने से पहले भांग जुटाने में इस कदर मसगूल हो गए कि समय का खयाल ही नहीं रहा। देर होते देख जो भंग मिली उसे चढ़ाई और कूच कर दिए अस्सी की ओर। पहुंचे तो मजमा जमा हुआ था। मंच पर उस वक्त के हीरो कवि चकाचक बनारसी रंग जमा रहे थे। उनकी कविताए मैं यहां पेश नहीं करूंगा क्यों कि वह सब अस्सी पर उनके मुखारविंद से भांग के नशे में ही सुनना श्रेयस्कर होगा। मेरी बातें सुनकर अगर आपकी तबियत फड़क रही है तो हुजूर आप खुद ही कभी होली पर अस्सी पहुंच जाइएगा। फिलहाल मेरी आपबीती सुनिए क्यों कि मैं भी सुनाने के लिए फड़फड़ा ही रहा हूं।
तो हुआ यह कि एक मेरे मित्र अस्सी पर ही रहते थे। उन्होंने हम लोगों को साक्षात देख लिया। गाली दी और पकड़ ले गए भंग पिलाने अपने घर। दूध में मिली भंग हम लोगों ने बेहिसाब चढ़ा ली। अब सबकुछ और रंगीन नजर आने लगा था। एक के दो दिखते और कोई कुछ बोलता तो समझ में आता नहीं, उल्टे मूर्खों की तरह बेहिसाब हंसते रहते थे। बहरहाल इसी दशा में अपने दोस्त को होली की शुभकामनाएं और धन्यवाद कहकर फिर आ गए कवि सम्मेलन के मजमे में।
यहीं वह घटना घटती है जो आज तक याद है। कुछ अश्लील है इसलिए बुरा न मानो होली है कि तर्ज पर सुनिए आगे की कथा।
भीड़ के बीचोंबीच तन्मय होकर होली की चुटीली कविताएं सुन रहे थे तभी कुछ हुल्लड़बाजों का एक झुंड हमारे करीब से हर-हर महादेव करते हुए गुजरा। उनके हाथों में कुछ पुस्तिकाएं थीं। होली से ही संबंधित थीं। इच्छा हुई कि एक मैं भी ले लूं। अपने गांव जाकर दोस्तों को दिखाउंगा। बहरहाल एक पुस्तिका मांग बैठा। उसने पुस्तिका हाथ में थमाकर पैसे मांगे। सरसरी तौर पर उसपर लिखे दाम पांच रुपए मैंने उसे पकड़ा दिए। पैसे लेकर उसने कहा- आपने पूरा दाम नहीं दिया। मैंने कहा- दे तो दिया हूं। रहस्यमय मुस्कराहट के साथ वह बोला-- फिर से देखिए। इस बार दाम ठीक से पढ़ा। लिखा था-- पांच रुपए और पांच गांड़। वह खिलखिलाकर हंस पड़ा मगर मुझे कुछ समझ में नही आया कि क्या बोलूं। कुछ बोलता इसके पहले उसने कहा- अभी रहने दीजिए फिर कभी फुरसत में ले लूंगा। और वह फिर हर-हर महादेव बोलते हुए आगे बढ़ गया। बहरहाल वह फिर साक्षात तो क्या सपने में भी नहीं आया मगर होली का यह वाकया और वह हुल्लड़बाज आज भी मुझे याद है।

अब छात्रावासों की गाली की एक परंपरा की वह कथा सुनिए जिसमें विभिन्न छात्रावासों के छात्र रोज शाम को खाना खाने के बाद छत पर या उस बाल्कनी पर जुटते थे जहां से दूसरा छात्रावास दिखता था। इसके बाद शुरू होता था गालियों का दौर। मेडिकल के छात्र कला संकाय के छात्रों को ललकारते थे-- अबे चपरासियों कहां छुप गए ? तो इधर से कला संकाय का हुजूम चिल्लाता था-- अबे जमादारों-- हरामियों --- नींद नहीं आ रही है क्या ? अभी कोई जवाब उनका आता तबतक तीसरे छात्रावास से गाली गूंजती-- अरे मादर----- क्यों लड़ रहे हो ? अब तीन चार छात्रावासों से एक साथ गालियों का जो दौर चलता तो देर रात तक थमने का नाम नहीं लेता। अगर थोड़ा सुनसान हो भी जाता तो किसी छात्रावास से अकेले ही कोई दूसरे छात्रावास को ललकार देता। फिर क्या था, दुबारा शुरू हो जाता गालियों का दौर। इधर छात्रावासों के सामने की सड़क से गुजर रहे लोग भी होली की गालियों की बौछार से अछूते नही बचते थे। यह सब रोजाना नियमित कुछ देर चलता और फिर स्वतः थम जाता। होली आगमन का यह नियमित मनोरंजन और देर रात तक गूंजती गालियां होली आते ही फिर जेहन में गूंजने लगती हैं।
इन सब के बीच खासियत यह थी कहीं से कोई सद्भावना का माहौल गड़बड़ नहीं होने पाता था। सुबह सभी ऐसे मिलते थे जैसे रात का नजारा उनके लिए सपना था। मगर रात होते ही वह कार्यक्रम फिर चालू हो जाता था। जिन डाक्टर मित्रों को हम रात में गाली देते थे सुबह वही हमारे किसी बीमार साथी का अपना सगा समझकर इलाज करते थे। हम सिर्फ होली मनाते और आपस में ऐसा मनोरंजन करके अपना छात्रावासीय एकाकीपन दूर कर लेते थे। आज तो लोगों में वह सद्भाव ही नही रहा। कई लोगों को यह कहते सुना कि क्या होली मनाएं, लोग अब उतने अच्छे नहीं रहे। आखिर वह कौन सी कड़ी है जो लगातार टूटती ही जा रही है और होली जैसे भाईचारे के त्योहार को फीका करती जा रही है।
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Dr Mandhata Singh
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Labels: अस्सी, काशी की होली, होली
23.3.08
मेरठ में पत्रकार होली मिलन समारोह की एक तस्वीर

((ये तस्वीर राकेश जुयाल जी ने भेजी है. उन्होंने कुछ लिख कर भी भेजा है पर वो फांट करप्ट होने के कारण समझ में नहीं आ रहा है...यशवंत)) .
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यशवंत सिंह yashwant singh
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22.3.08
जिधर देखू तेरी तस्वीर नजर आती है !
विनीत खरे
http://paankidukaan.blogspot.com
यह बात तब की है जब मैंने अपना कदम जवानी देहलीज पर रखा ही था। उस समय मैं १२वी में पढता था, कुछ भी नहीं पता था कि क्या सही है, क्या ग़लत है, क्या करना है, बस एक सूत्री काम दोस्तो के साथ "मौजा ही मौजा"।
वैसे तो होली मेरे लिए हमेशा ही खास होती है लेकिन उस साल की होली तो मुझे आज तक याद है, हम पांच दोस्त होली की मस्ती मे थे एक दुसरे की टांग खीचते हुए सिविल लाइन्स से चौक की तरफ़ बढे चले। करीब आधे घंटे में चौक पहुचे। वहाँ चौराहे पे करीब २०० से ३०० लड़के अपनी मस्ती नाच गा रहे थे। हम भी उन्ही में शामिल हो गए।
तभी मेरी नजर एक मकान की खिड़की पर पड़ी, उस पर एक लड़की खड़ी थी, मैंने पहले तो टालने की कोशिश की लेकिन नजर थी की कुछ समय बाद वही चली ही जाती। उसकी आखों में अजीब से कशिश थी। मैंने अपने दोस्तो को भी दिखाया लेकिन वह तो होली की मस्ती में चूर थे। लेकिन मैं तो उसे देखता ही रहा। थोडी देर में हम लोग भी अपने अपने घरो के लिए चल दिए। लेकिन मैं घर कब, कैसे और कितनी देर में पंहुचा पता ही नहीं चला।
घर पहुँच के मैं नहा के सो गया लेकिन वह मेरे आखों के सामने घूम रही थी। मैंने सोचा एक दो दिन में यह खुमारी चली जायगी लेकिन मैं जिधर जाता सिर्फ़ वह ही वह नजर आती थी। न ही खेलने में मन लगता न ही किसी और काम में। इस बात को करीब 15 साल हो गए है। सिलसिला आज शायद कम हो गया है लेकिन आज भी वह मुझे नहीं भूलती।
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विनीत खरे
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Labels: Holi, Vineet Khare, विनीत खरे, होली
21.3.08
कुंठित संपादकों और इन्चार्जों को होली पर कई कुंतल गालियाँ
खेलें मसाने में होली दिगंबर, खेलें मसाने में होली....भड़ास के साथी लोगों, आज अपुन फिर दिल्ली वापस लौट आया. बच्चा लोग को हरिद्वार ऋषिकेश के पहाड़ पर घुमाने के बाद. लॉन्ग ड्राईव के बाद जो हालत होती है, वही मेरी भी है.
इधर भड़ास पर कई लोगों की पोस्टें देखने को मिली. सब पढ़ नहीं पाया क्योंकि इन दिनों टेम कम ही दे पाटा हूँ. बच्चा लोग हमेशा घेरे रहते हैं, सिर पर चढ़े रहते हैं.
कुछ बढ़िया सूचनाएं हैं.
एक तो ये की दो लोगों ने मुझे मेल करके ब्लॉग एग्रीगेटर बनाने का प्रस्ताव किया है. इन दोनों ही साथियों से होली बाद मुलाकात करूँगा और इक ऐसा ब्लॉग एग्रीगेटर बनाने की योजना बनाया जाएगा की हिन्दी ब्लोगिंग के मठाधीशों, चिलान्दुवों और रंगे सियारों की फट जाए और असलियत मालूम पड़ जाए.
दूसरी बात ये है कि इन दिनों ढेर सारे नए साथियों के अनुरोध आ रहे हैं कि उन्हें भड़ास ज्वाईन करना है. इन साथियों को जल्द ही निमंत्रण भेज दूंगा. उन लोगों को भड़ास ज्वाईन करने के लिए बस करना ये है कि जो निमंत्रण रूपी लिंक मेल के जरिये उन तक भेजा जाएगा, उसको क्लिक करके उसमे अपनी जीमेल कि आईडी और उसका अपना पासवर्ड दाल देन. बस हो गए भड़ास के मेंबर. अगर ज्यादे कुछ इस बारे में जानना हो तो हमारे भड़ास संचालक मंडल के साथियों से सम्पर्क कर सकते है, मेल के जरिये....
जल्द ही सभी संचालक मंडल के सदस्यों की मेल आईडी भी ऊपर दाल दी जायेगी ताकि लोग उनसे सम्पर्क कर सकें.
अंत में कहना चाहूँगा की हिन्दी मीडिया के सभी कुंठित संपादकों और इन्चार्जों को होली पर कई कुंतल गालियाँ भड़ास की तरफ़ से स्वीकार हो, अगर वे नहीं सुधरे तो अगली होली तक इन कुंठित संपादकों और इन्चार्जों की लिस्ट तैयार कर उनकी करतूतों का भड़ास पर खुलासा किया जाएगा ताकि फिर कोई कुंठित एडिटर और इंचार्ज अपने जूनियर को परेशां और तबाह न कर सके.
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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20.3.08
होली के दिन दिल मिल जाते हैं........
अंकित माथुर
हिन्दी ब्लागिंग के छोटे से इतिहास में, भडास ने पता नही ऐसा क्या कर दिया की समूचे हिन्दी ब्लाग जगत में एक हलचल सी मची गई है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाये तो हिन्दी ब्लागिंग अभी भी शैशवावस्था में ही है, और इसे कोई भी (ब्लागर्स के अलावा या शायद वो भी नही)ज़्यादा गंभीरता से नही ले रहा है। ना जाने क्यों विभिन्न एग्रीगेटरों में इस ब्लाग की लोकप्रियता को लेकर घमासान सा मचा हुआ है। पहले कुछ व्यक्तिगत मतभेद उभर कर सामने आये, फ़िर एक सामूहिक आंदोलन सा चल गया भडास को बंद करने को लेकर।
कमर्शियल रूप से एक ब्लाग पर पडने वाले हिट्स उसी ब्लाग को प्रभावित करते हैं, और यदि कोई एग्रीगेटर किसी चर्चित ब्लाग को अपने साईट पर स्थान देता है तो निश्चित ही उसका भी कुछ तो भला होगा ही। अन्यथा उसे इस प्रकार की सर्विस प्रदान करने का क्या लाभ? यदि है, तो कृपया बतायें।
हिन्दी ब्लागिंग में अब भडास अपना एक मुकम्मल स्थान बना चुका है,वो स्थान चाहे हिन्दी ब्लागिंग के स्व्यंभू खुदाओं के द्वारा बहिष्कृत कर दिये जाने के कारण हो, वैचारिक मतभेदों के कारण हो या, इसे किनारे कर दिये जाने की मुहिम के कारण,अपने तीखे तेवर या फ़िर लेखन की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने की अपनी आधारभूत पृवृत्ति के कारण। हिंदी ब्लागिंग में भडास अपने आप में क्रमिक विकास की एक बडी परिघटना है। अनेक विवादों का जन्म हुआ, पटाक्षेप भी हुआ। नये लोग जुडे, पुराने हुए फ़िर यकायक किसी कारणवश ब्लाग से अलग हो गये, भडास को इस मुकाम पर पहुंचाने के पीछे यशवंत सिंह का शानदार योगदान रहा है। इस अवधि के दौरान भडास एक दिन यकायक गायब भी हुआ, लोग छटपटाये, लेकिन फ़िर एक सोये हुए शेर की मानिंद भडास जाग उठा और कईयों की नींदे उड़ गईं। बडे ही नाटकीय अंदाज़ में भडास अपने आप को एक प्रभावशाली मंच के रूप में स्थापित किया है।
अभी हाल ही में मैने देखा यशवंत सिंह ने भडास संचालक मंडल घोषित किया है, मेरे विचार से भडास के प्रत्येक सदस्य का भडास को संचालित करने के पीछे काफ़ी बडा हाथ है। लेकिन फ़िर भी यह एक स्वागत योग्य विचार है। इससे भडास को और पैनापन और दिशा मिलेगी। पहले भी कई मर्तबा इस
बात को लेकर चर्चा हो चुकी है कि भडास आखिर है क्या? भडास एक ऐसा मंच है जहां पर लोग अपने
कार्य क्षेत्र, अपनी व्यक्तिगत बातें, रोज़मर्रा से जुडी सरल या काम्प्लेक्स सभी तरह की बातें रखते हैं।
ये एक ऐसा मंच है जहां पर भिन्न भिन्न क्षेत्रों, अनुभवों, कार्यक्षेत्रों, बोलियों को बोलने वाले, अपनी अपनी भडास की अलग अलग परिभाषा रखने वाले लोग अपनी बातें लिखते पढते रहते हैं। जहां तक मेरा मानना है, उन्हे किसी को कुछ साबित नही कर के दिखाना है। जो जी में आता है लिख देते हैं।
अंत में मेरी ब्लाग एग्रीगेटरों से यही अपील है कि इस राई को पहाड ना बनाया जाये।
और किसी भी दुर्भावना से ग्रसित हो कर इसकी रेटिंग गलत सलत तरीके से ना की जाये।
धन्यवाद...
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Ankit Mathur
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होली है.....तुम्हारी भैन की...
आओ टेसू के फूलों के रंग में
थोड़ा सा कीचड़ मिला लो
ताकि दोस्त की पत्नी को रंग लगाते समय
तुम्हारे स्पर्श में दबी वासना का रंग
दब जाए इस कीचड़ के पीछे
गली मौहल्ले की सारी भाभियों से
होली खेलो लेकिन थोडी़ सी दारू और भांग
का सेवन करना मत भूल जाना
क्योंकि गली के सारे आवारा छोकरे भी हैं
इस इंतजार में कि इसी साल तो हुई है
तुम्हारी भी बहन सोलह साल की
अगर होश में रहे तो ग्लानि बोध होगा
ठीक से खेल नहीं पाओगे होली
और सारा ध्यान लगा रहेगा इसी बात पर
कि किस लौंडे ने बहन को गुलाल लगाया
किधर किधर छूने की कोशिश करी
और रात को नशे के बहाने हुड़दंग मचाने से
पीछे न हटना साल भर की सारी खुन्नस
निकाल लेना गालियां देकर उस पड़ोसी को
जो तुमसे डर कर बात तक नहीं करता है
और कहते जाना कि बुरा न मानो ,"होली है.....
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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19.3.08
करोड़ों -करोड़ शुभेच्छाएं होली , ईद-ए-मिलादुन्न्बी और गुड फ्राईडे एक साथ ....
मुझे हमेशा से इस बात पर गर्व रहा है कि मैं भारत जैसी इंद्रधनुषी वैचारिकता और संसकृतियों वाले देश में पैदा हुआ । बस हमारा ही देश है जहां अगर हम जाति धर्म भाषा और क्षेत्र के मुद्दों पर एक दूसरों से लड़ते हैं तो वहीं दूसरी ओर एक दूसरों के त्योहारों की खुशियों को बांटने से भी पीछे नहीं हटते हैं ,यही बात हमारे पड़ोसी मुल्कों और पूरे संसार को बताती हैं कि हम सब लड़ेंगे भी पर हैं तो हमवतन ही । एकता (कपूर नहीं) हमारी धड़कनों में बसती है । स्वीकारिये आप सब सबके लिये खुशियां लेकर आये त्योहारों की करोड़ों -करोड़ शुभेच्छाएं ,होली, ईद ए मिलादुन्नबी और गुड फ्राईडे एक साथ मनाया जाएगा बस ईश्वर अल्लाह या गौड जो भी तुम्हारा नाम हो(तुम्हे अच्छा लगता हो) से यही प्रार्थना है कि हमारी खुशियां दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती जाएं ,सब सामान्य जन खुशहाल रहें ।
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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16.3.08
कुछ तो बात है अपने पुराने शहरो में ...
विनीत खरे
(http://paankidukaan.blogspot.com/)
इस महानगर की भागदौड़ में मैं शायद खो गया हूँ। मैंने अपने को खोजने नाकाम कोशिश की कुछ याद आया लेकिन धुंधला सा।
मैं इलाहाबाद में रहता था , वहाँ के रास्ते गलियां सब अपने थे, जब भी मैं अपनी साईकिल से वहाँ से निकलता था, कोई न कोई चाचा ताऊ मिली ही जाता था। मैं भी उन लोगो को बहुत अदब से नमस्कार करता था। फिर वह अपने घर ले जाते, चाची प्यार से अपने हाथो से बने लड्डू खिलाती फिर हालचाल पूछती थी। ..... लेकिन महानगर में तो कोई एक दूसरे को पहचानते ही नही। लड्डू क्या वह तो नमस्ते तक नहीं करते।
कुछ तो बात है अपने पुराने शहरो में ...
वहाँ के तयौहारों में तो पता चलता त्यौहार है। हफ्तो पहले से ही माँ तैयारी शुरू कर देती थी। वहाँ की होली की बात ही कुछ और। वह् माँ के साथ आलू के पापड़ बनवाते बनवाते चुपके से खाना, गुझिया के बनते समय गरम-गरम चखना, शाम को हास्य कवि सम्मेलन में वह हास्य की फुहार, होली जलने की रात दोस्तो के साथ शहर में घूमना, वह होली के दिन रंगो की बाल्टी, हर तरफ़ अबीर गुलाल .... लेकिन यहाँ तो भाई एक दूसरे को रंग क्या पानी की बूंद नहीं डालता।
यहाँ मरने पर चार कंधे नहीं नसीब होते है. यहाँ रहने वाले एक अजीब सी जी रहे है। जिसमे न प्यार, न रिश्ते , न जज्बात, बस जी रहे है। मेरा मानना है कि ९०% लोगो वही के है लेकिन वहाँ के लोग महानगर में आ के महानरकीय जिन्दगी जी रहे है। पता नहीं क्यों जी रहे है।
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विनीत खरे
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15.3.08
सररर...र...र...र…
vedratna shukla
((ved_baba@yahoo.com))
अभी होली आने में करीब-करीब एक सप्ताह बाकी है लेकिन मन है कि सररर...र...र...र......र कर रहा है। देखिए न! मानता ही नहीं है, कह रहा है जोगीरा सररर...र...र...र......र…। कमबख्त रुकने को कतई तैयार नहीं, पेले हुए है सररर...र...र...र…। सरसों के फूल, फल में बदल गए हैं। अभी कल ही घर बात हुई थी तो पता चला कि कट गई सरसों। मैं वसंत का इंतजार करता रह गया और न जाने कब सरसों कट गई। ठीक से फूल भी नहीं देख पाया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी (‘भी’ के लिए आचार्य प्रवर माफ करियेगा) ऐसे ही इंतजार करते रहे। अपने साहित्याश्रम के तमाम पेड़ों में अगोरते रहे वसंत। आखिर एक पुष्प-बेल फूल कर कुप्पा हो गई और खड़-खड़ाकर आ गया वसंत। खैर, ऐन मौके पर मेरे पास भी आ गया है वसंत। आ ही नहीं गया है, धनुही से तीर भी चला रहा है। सदियों से उसकी आदत जो रही है। खेतों में हरियाली अपने चरम पर है। गेहूं जवान होकर अब अंगड़ाई ले रहा है। रोज धूप ज्यों-ज्यों जवान होती है त्यों-त्यों उसकी जवानी की गंध दिशाओं में फैल जाती है। यह सब कुछ अनुभव आधृत ही है, लेकिन है सौ फीसद सही। मैं तो यहां हूं भारत के दिल दिल्ली में। यहां वसंत का मतलब सड़क पर चमचमाती, शोर मचाती गाड़ियों से है। निवासस्थान पर भी सब कुछ अतिसामान्य है। कार्यस्थल पर भी कोई वसंत नहीं आया, सबकुछ यथावत है। इसी बीच आज ‘वो’ मिल गए। मैंने कहा तूने शर्ते-ए-वफा भुलाई है। वो कुछ बोले नहीं चुपचाप चल दिये। शोर-गुल के इस माहौल में ये पंक्तियां ऊपर वाले तीर-धनुष की वजह से उपजीं। अब तो होली तक मन सरसराता रहेगा। होली के दिन एकदम से
ठेठ हो जायेगा। होली है ही इसीलिए की मन ठेठ हो जाए, तन ठेठ हो जाए, सब कुछ ओरिजिनल अवस्था में पहुंच जाए। लेकिन रह-रहकर दिक्कत हो रही है कि ‘‘अबकी फिर नाहीं जा पाइब होली में घरे।’’
प्रकाशन हेतु निवेदन सहित---
वेदरत्न शुक्ल
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यशवंत सिंह yashwant singh
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14.3.08
खुशखबरी है भड़ासियों.....
अरे खुशखबरी है सारे भड़ासियों के लिये । जिन्दगी भी कैसे-कैसे शेड्स दिखाती है हर पल कभी हम उनके प्रभाव में आकर रोते हैं दुखी होते हैं परेशान रहते हैं और वहीं अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाता है कि बस बेज़ार बदरंग सी हुई जिन्दगी में इन्द्रधनुष उतर आता है । अरे साले सब सोच रहे होंगे कि क्या खुशखबरी है ये नालायक बताता भी नहीं ,अपने भयंकर भड़ासी भाई मनीषराज की मेहनत रंग लाई अभी उनसे बात हुई तो बताया कि १:४५ दोपहर में बिटिया हुई है । सारे भड़ास परिवार की ओर से बिट्टी रानी के आगमन की हार्दिक शुभकामनाएं । बिटिया और बहूरानी दोनो स्वस्थ हैं ,प्रसव सामान्य था ,गुड़िया का वजन पूछा कितना है तो मनीष भाई बोले कि अभी डाक्टर अंदर हैं पता नहीं तो मैंने कहा कि अरे अंदर घुस जाओ और उठा कर देख लो और डाक्टरों को बोलो कि सालों बीबी मेरी बच्ची मेरी तुम्हारा रोल पूरा हो गया अब भाग जाओ ,तब तक बहन ने बताया कि बिट्टो तीन किलो की है । अरे नाचने का मन कर रहा है मेरा नयी बिटिया की अगवानी में । हम सब उनके उत्तम स्वास्थ्य और भविष्य की प्रार्थना करते हैं ।. मैंने उसका नाम फाल्गुन माह में आने के कारण फाल्गुनी बताया है बाकी दकियानूसी अंदाज में पोथी खोल कर बैठता हूं तो समझ में आयेगा । जै हो जै हो जै हो....... होली के गुलाबी रंग की एक मुट्ठी तो परमात्मा ने हम सब पर उछाल दी है........होली है.....
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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8.3.08
भाषा में गंदगी देखने वाले परम (चूतिया) लोगों के लिए पेश है... काशी का अस्सी
((होली आते देख भड़ास पर साथियों ने होलियाना माहौल बनाया तो मेरा भी मन अइंठ रहा है, मुझे लखेद रहा है, बोल रहा है....अबे, तू भी कुछ लिक्ख, साला केवल पढ़ पढ़ कर मने मन मुनक्का, मने मन छुहारा होता रहेगा। सो, मन की पेलाई के बाद मेरी आत्मा जगी तो खुद लिखने के बजाय टीपने की सोचना लगा। यही तो दिक्कत है हम जैसों में। भोषणी के, जब हमारे टाइप लोग लेखक-कथाकार-कवि-साहित्यकार टाइप बन नहीं पाए, तो टिपियाने में क्या जाता है, तुम लोग लिखो, मैं उसे उठाकर चेप दूंगा अपने यहां। मेरे जैसा आदमी इसी तरह सोचते हुए होली पर कुछ टिपियाने के अभियान में गूगल बाबा के सहयोग से खोजते-खाजते पहुंच गया एक साइट पर जिसमें काशी के अस्सी के कुछ अंश दिए हुए थे। सो, मैंने बिना देर किए, उस साइट को दिल ही दिल थैंक्यू थैंक्यू बोलते, लप्प से वो मैटर टीप लिया और अपन भड़ास पर चेंप दिया, इस उम्मीद में कि जो मजा पढ़ के हम लोग लिये थे, वो इस झलकी को पढ़कर आप भी ले सकेंगे और अगर मन न भरे तो एगो काशी का अस्सी खरीद लीजिएगा। तो भई, उस साइट का नाम लेकर आभार प्रकट कर देते हैं। साइट का नाम है, भारतीय साहित्य संग्रह,....मुझे उम्मीद है कि इससे प्रेरणा लेकर वो साथी जो इस वक्त कनाट प्लेस के आसपास की किसी खूबसूरत बिल्डिंग में मौज कूट रहे हैं, वो जरूर अपनी गालियों, कविताओं और मुक्तक के प्रयोग को और आगे बढ़ाएंगे। मेरे खयाल से समझदारों के लिए इशारा काफी होता है, क्यों हरे भाई, पंकज भाई, नीरव जी....:)जय भड़ास, यशवंत)
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देख तमाशा लकड़ी का
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मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है ! जो भाषा में गन्दगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद् ‘परम’ (चूतिया का पर्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएँ-
तो सबसे पहले इस मुहल्ले का मुख्तसर-सा बायोडॉटा—कमर में गमछा, कन्धे पर लँगोट और बदन पर जनेऊ—यह ‘यूनिफॉर्म’ है अस्सी का !
हालाँकि बम्बई-दिल्ली के चलते कपड़े-लत्ते की दुनिया में काफी प्रदूषण आ गया है। पैंट-शर्ट, जीन्स, सफारी और भी जाने कैसी-कैसी हाई-फाई पोशाकें पहनने लगे हैं लोग ! लेकिन तब, जब कहीं नौकरी या जजमानी पर मुहल्ले के बाहर जाना हो ! वरना प्रदूषण ने जनेऊ या लँगोट का चाहे जो बिगाड़ा हो, गमछा अपनी जगह अडिग है !
‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है ! चाहे होली का कवि-सम्मेलन हो, चाहे कर्फ्यू खुलने के बाद पी.ए.सी और एस.एस.पी. की गाड़ी, चाहे कोई मन्त्री हो, चाहे गधे को दौड़ाता नंग-धड़ंग बच्चा—यहाँ तक कि जार्ज बुश या मार्गरेट थैचर या गोर्बाचोव चाहे जो आ जाए (काशी नरेश को छोड़कर)—सबके लिए ‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ का जय-जयकार !
फर्क इतना ही है कि पहला बन्द बोलना पड़ता है—जरा जोर लगाकर; और दूसरा बिना बोले अपने आप कंठ से फूट पड़ता है।
जमाने के लौड़े पर रखकर मस्ती से घूमने की मुद्रा ‘आइडेंटिटी कार्ड’ है इसका !
नमूना पेश है—
खड़ाऊँ पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला—‘किस दुनिया में हो गुरू ! अमरीका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घण्टे-भर से पान घुला रहे हो ?’’
मोरी में ‘पंचू’ से पान की पीक थूककर बोले—‘देखौ ! एक बात नोट कर लो ! चन्द्रमा हो या सूरज—भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। तन्नी गुरू टस-से-मस नहीं होंगे हियाँ से ! समझे कुछ ?’
‘जो मजा बनारस में; न पेरिस में, न फारस में’—इश्तहार है इसका।
यह इश्तहार दीवारों पर नहीं, लोगों की आँखों में और ललाटों पर लिखा रहता है !
‘गुरू’ यहाँ की नागरिकता का ‘सरनेम’ है।
न कोई सिंह, न पांड़े, न जादो, न राम ! सब गुरू ! जो पैदा भया, वह भी गुरू, जो मरा, वह भी गुरू !
वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतन्त्र है यह :
गिरिजेश राय (भाकपा), नारायण मिश्र (भाजपा), अम्बिका सिंह (कभी कांग्रेस, अभी जद) तीनों की दोस्ती पिछले तीस सालों से कायम है और न आने वाली कई पीढ़ियों तक इसके बने रहने के आसार हैं ! किसी मकान पर कब्जा दिलाना हो, कब्जा छुड़ाना हो, किसी को फँसाना हो या जमानत करानी हो—तीनों में कभी मतभेद नहीं होता ! वे उसे मंच के लिए छोड़ रखते हैं...अस्सी के मुहावरे में अगर तीनों नहीं, तो कम-से-कम दो—एक ही गाँड़ हगते हैं।
अन्त में, एक बात और। भारतीय भूगोल की एक भयानक भूल ठीक कर लें। अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं। अस्सी ‘अष्टाध्यायी’ है और बनारस उसका ‘भाष्य’ ! पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से ‘पूँजीवाद’ के पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी ‘टीका’ हो जाए...मगर चाहने से क्या होता है ?
अगर चाहने से होता तो पिछले खाड़ी युद्ध के दिनों में अस्सी चाहता था कि अमरीका का ‘व्हाइट हाउस’ इस मुहल्ले का ‘शुलभ शौचालय’ हो जाए ताकि उसे ‘दिव्य निपटान’ के लिए ‘बहरी अलंग’ अर्थात् गंगा पार न जाना पड़े...मगर चाहने से क्या होता है ?
इति प्रस्तावना।
तो मित्रो, यही अस्सी मेरा बोधगया है और अस्सीघाट पर गंगा के किनारे खड़ा वह पीपल का दरख्त बोधिवृक्ष, जिसके नीचे मुझे निर्वाण प्राप्त हुआ था !
अन्तर्कथा यह है कि सन् ’53 में मैं गाँव से बनारस आया था। मँझले भैया रामजी सिंह के साथ। आगे की पढ़ाई के लिए। उन्हें बी.ए. प्राइवेट पढ़ना था घर की खेती-बारी सँभालते हुए। और मुझे इंटर में। वे बेहद सख्त गार्जियन थे—कुछ-कुछ प्रेमचन्द के ‘बड़े भाई साहब’ की तरह ! इस बात का भी मुझे आश्चर्य होता था और उन्हें भी कि अपने अध्यापकों से अधिक ज्ञान के बावजूद, अपने ही मित्रों को पढ़ा-पढ़ाकर पास कराने के बावजूद वे खुद फेल कैसे हो जाते हैं ?
उन्होंने एक बार अपने पास चेले को पकड़ा। रिजल्ट आया ही आया था। उन्होंने पूछा, ‘‘बे लालजी ! हम तुझे पढ़ाए, जो-जो नहीं आता था तुझे सब बताए, लिखाए, रटाए; तू पास हो गया, हम कइसे फैल हो गए ?’ लालजी बोले—‘गुरू, ऐसा है कि आप जो पढ़ाए, वह तो हम पढ़े ही। बाकी आपकी चोरी-चोरी भी कुछ पढ़े थे।’
उन्हें उसके उत्तर से संतोष नहीं हुआ। मुझसे पूछा—‘अन्दाजा लगाओ तो जरा ! क्या बात हो सकती है ? इसमें अन्दाजा लगाने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन मैं अन्दाजा लगाने लगा और नहीं लगा पाया। कारण, कि भैया के शब्दकोश में व्याकरण के लिए कोई जगह नहीं थी ! ‘ने’, ‘में’, ‘का’, ‘पर’, ‘से’ आदि को वे फालतू और बेमतलब समझते थे ! सीधे-सादे वाक्य में अड़ंगेबाजी के सिवा और कोई काम नहीं नजर आता था इनको ।...लेकिन यह बताता तो लात खाता !
बहरहाल, बात ‘निर्वाण’ की।
एक दिन भैया ने कहा—‘तुम्हारी अंग्रेजी कमजोर है। वह बातचीत होने लायक होनी चाहिए। कोई तुमसे अंग्रेजी में कुछ पूछे और तुम उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने लगो, यह अच्छा नहीं। तुम अस्सी के चुडुक्कों के साथ खेलना छोड़ो और चलो, अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करो।’
भैया मुझे इसी पीपल के पास ले आए। शाम के समय। घाट पर भीड़-भाड़ कम थी। उन्होंने मुझे एक सीढ़ी के पास बिठा दिया और कहा—‘डेली शाम को यहाँ आकर अभ्यास करो !—ऐसे !’
वे पन्द्रह गज दूर खड़े हो गए—अटेंशन की मुद्रा में और पेड़ से बोले—‘व्हाट इज योर नेम ?’ फिर पेड़ के पास ले गए और सामने देखते हुए उसी मुद्रा में बोले, ‘सर, माई नेम इज रामजी सिंह !’ फिर वहाँ से पन्द्रह गज दूर—व्हाट इज योर फादर्स नेम ?’ फिर पेड़ के पास से—‘सर, माई फादर्स नेम इज श्री नागर सिंह !’ इस तरह वे तब तक पीपल के पास आते-जाते रहे, जब तक पसीने-पसीने नहीं हो गए !
‘हाँ, चलो अब तुम ?’ वे सीढ़ी पर मेरी जगह बैठकर सुस्ताने लगे।
मित्रो ! भगवान झूठ न बुलवाएँ तो कहूँ कि अंग्रेजी बोलना तो मुझे नहीं आया, हाँ, इतना जरूर समझा कि पसीने से ज्ञान का बड़ा गहरा सम्बन्ध है !
इसीलिए जब लोग पूछते हैं कि तुम्हें इतना अधिक पसीना क्यों होता है या बूढ़े बकरे की तरह गन्धाते हो तो मैं उनकी मूर्खता पर हँसकर रह जाता हूँ। अरे भले आदमी, ज्ञानी को ज्ञानोद्रेक से पसीना नहीं आएगा तो क्या कँपकँपी छूटेगी ?
लेकिन साहब, मेरे ज्ञान की बधिया बैठा दी मुहल्ले के ‘आदिवासियों’ ने।
इधर ‘प्रामाणिक अनुभूती’ और उधर ‘भोगा हुआ यथार्थ’ और यथार्थ को पसीने से परहेज !
एक थे हमारे बापजान जो पैना उठाए हमें किताबें-कापियों में जोते रखते थे—‘सालो, खेती तो गई सरकार के ‘उसमें’। अगर यह भी नहीं करोगे तो भीख माँगोगे !’ दूसरी ओर मुहल्ले के बाप थे जो अपने बच्चों का स्कूल में नाम लिखाते थे—पढ़ने के लिए नहीं, सरकार की ओर से मुफ्त बँटने वाली ‘दलिया’ के लिए ! वे केवल ‘रेसस पीरियड’ में ही स्कूल में नजर आते।
उनका एक जीवन-दर्शन था—‘जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?’
पूरा मुहल्ला पीढ़ियों से उसी शैली से जीता चला आ रहा था—गाता-बजाता, झूमता, मदमाता ! किसी के पास कोई डिग्री नहीं, रोजगार नहीं, व्यवसाय नहीं, काम नहीं; परलोक सिधारते समय पंडित महाराज ने पत्रा-पोथी लपेटे हुए एक लाल बेठन खोंस दिया बेटे की काँख में—बस ! वे तख्त पर बेठन रखे हुए जनेऊ से पीठ खुजा रहे हैं और जजमान का इन्तजार कर रहे हैं !
जजमान रोज-रोज नहीं आते, ग्रह-नक्षत्र भी रोज-रोज खराब नहीं होते, मुंडन, शादी-ब्याह, जनेऊ जैसे संस्कार भी रोज-रोज नहीं होते और न रोज-रोज फत्ते गुरु की कन्धे पर कुम्हड़ा होता है। फत्ते गुरू कुम्हड़े का पूरा वजन उठाए हुए मुहल्ले-भर को सुनानेवाली आवाज में आत्मलाप करते आ रहे हैं—‘पालागी फत्ते गुरू !’ जय हो जजमान !’’ सट्टी गए थे का गुरू ?’ कवन भँड़ुआ सट्टी जाता है जजमान ?’ अरे तो इतना बड़ा कोंहड़ा ? हफ्ते-भर तो चलेगा ही गुरू !’ हफ्ते-भर तुम्हारे यहाँ चलता होगा। यहाँ तो दो जून के लिए भी कम है !’
मुहल्ला अपने दरवाजों, खिड़कियों, छतों से आँखें फाड़ फत्ते गुरू का कोंहड़ा देख रहा और उनके भाग्य से जल-भुन रहा है। सन्तोष है तो यह कि आज का दिन फत्ते गुरू का, कल का दिन किसी और गुरू का ! कौन जाने हमारा ही हो ?
कहते हैं, बुढ़ापे में तुलसी बाबा कुछ-कुछ ‘पिड़काह’ और चिड़-चिड़े हो चले थे। मुहल्ले वालों ने उनसे जरा भी छेड़छाड़ की, पिनक गए और शाप दे डाला—‘जाओ, तुम लोग मूर्ख दरिद्र रह जाओगे !’
मित्रो, मेरा मतभेद है इससे। शान्तिप्रिय द्वेवेदी को जितना तंग किया मुहल्ले ने, उससे अधिक तंग तो नहीं ही किया होगा बाबा को और अगर उन्हें शाप ही देना था तो जाते-जवाते इनके हाथ ‘मानस’ पोथी क्यों पकड़ा जाते ? फिर भी ये कहते हैं, तो हम मान लेते हैं; लेकिन सरापकर भी क्या कर लिया बाबा ने ? माथे पर चंदन की बेंदी, मुँह में पान और तोंद सहलाता हाथ ! न किसी के आगे गिड़गिड़ाना, न हाथ फैलाना। दे तो भला, न दे तो भला ! उधर मंदिर, इधर गंगा; और घर में सिलबट्टा ! देनेवाला ‘वह’; जजमान भोंसड़ी के क्या देगा ? भाँग छानी, निपटे और देवी के दर्शन के लिए चल पड़े।
चौके में कुछ नहीं, मगर जिए जा रहे हैं—ताव के साथ ! चेहरे पर कोई तनाव नहीं, कहीं कोई फिक्र नहीं और उधर से लौटे तो साथ में कभी-काल, एक जजमान—‘सुन बे रजुआ, खोल केवाड़ी, आयल हौ जजमान चकाचक !’’
तो साहब ! कच्ची उमर और बाला जोबन ! अपन को भा गया यह दर्शन !
काहे की है-है और काहे की खट्-खट् ! साथ तो जाना नहीं कुछ ! फिर क्यों मरे जा रहे हो चौबीसों घंटे ? सारा कुछ जुटाए जा रहे हो, फिर भी किसी के चेहरे पर खुशी नहीं ! यह नहीं है, तो वह नहीं है ! इसे साड़ी, तो उसे फ्रॉक, तो इसे फीस, तो उसे टिफिन, तो इसे दवा, तो उसे टॉनिक, तो इसे...कुछ करो तब भी और न करो तब भी यह दुनिया चल रही है और चलती रहेगी...
प्यारेलाल ! अपनी भी जिन्दगी जियो, दूसरों की ही नहीं !
ऐसे में ही गया था सब्जी लेने अस्सी पर ! लुंगी और जाकिट पहने हुए !
लगभग दो बजे दोपहर।
सन् ’70 के जाड़ों के दिन।
सलीम की दुकान पर खड़ा हुआ ही था कि सड़क से आवाज आई—डॉक्टर !
मैंने मुड़कर देखा तो एक परिचित मित्र ! रिक्शे पर ! इससे पहले एक-दो बार की ही भेंट थी उससे।
मैं पास पहुँचा तो उसने पूछा, ‘आवारगी करने का मन है डॉक्टर ?’
‘क्या मतलब ?’
‘कहीं चलना चाहते हो ? कलकत्ता, बम्बई, दार्जलिंग, कालिंगपाँग, नेपाल कहीं भी !’
मैं चकित ! बोला—‘रुको ! सब्जी देकर आते हैं तो बात करते हैं।’
उसने रिक्शे पर बैठे-बैठे मेरा हाथ पकड़ा—‘एक बात का उत्तर दो। महीने में कितने दिन होते हैं ? तीस दिन। इनमें से कितने दिन तुम्हारे अपने दिन हैं ? ‘अपने’ का मतलब जिसमें माँ-बाप, भाई-बहन, बीवी, बेटा-बेटी किसी का दखल न हो। जैसे चाहो, वैसे रहो, जैसा चाहो, वैसा जियो।’
मैं सोच में पड़ गया।
‘एक दिन, दो दिन, तीन दिन ?’ वह उसी गम्भीरता से बोलता रहा।
मैं चुप।
‘सुनो ! महीने के सत्ताइस दिन दे दो बीवी को बाल-बच्चों को, पूरे खानदान को ! उनसे कहो कि भैया, ये रहे तुम्हारे दिन ! लेकिन ये तीन दिन मुझे दे दो। मेरी भी अपनी जिन्दगी है, उसके साथ जुल्म न करो, समझा ?’
‘और सुनो ! कार्यक्रम बनाकर जीने में तो सारी जिन्दगी गँवा रहे हैं हम ! हम घर से निकलते ही कहते हैं कि सुनो, अमुक जगह जा रहे हैं और इतने बजे आएँगे। और कहीं बाहर जाना हुआ तो हफ्ते-भर के राशन-पानी, साग-सब्जी का बन्दोबस्त करके जाते हैं !...इन सबका कोई मतलब है क्या ? आवारगी करने का भी कार्यक्रम बनाया जाता है क्या ?’
‘ठीक है यार ! मैं सलीम को बता तो दूँ कि सब्जी पहुँचा के घर पर बोल देगा !’
‘लो, फिर वही बात ! अरे, जिन्हें खाना है, वे ले जाएँगे; चलो तुम !’
‘अच्छा चलो !’ मैं भी बगल के रिक्शे पर बैठ गया—‘तुम भी क्या कहोगे ?’
और साहब ! मैंने सोचा था कि शहर से ही कहीं सिनेमा वगैरह देख-दाखकर शाम नहीं तो रात तक लौट आएँगे, लेकिन पहुँच गए पंजाब मेल से सचमुच कलकत्ता, वहाँ के डायमंड हार्बर, फिर वहाँ से काकद्वीप। छककर रास्ते-भर खाया-पिया—मौज मनाई ! पसीने के बगैर जिन्दगी का मजा लिया।...वही लुंगी और जाकिट, हवाई चप्पल, जेब में दस नए पैसे। आन का आँटा, आन का घी। भोग लगावैं बाबाजी !
पाँच दिन बाद लौटे थे घर !
मौज तो बहुत आई, लेकिन लौटानी ट्रेन में ही एक दूसरा ज्ञानोदय हुआ।
जो भी तुम पर पैसा खर्च करता है, वह तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए। प्यारेलाला ! ट्रेन छूटनेवाली है, लपक के जरा दो टिकट तो ले आओ !...जरा उस तरफ बैठ जाओ तो थोड़ा बदन सीधा कर लें...यार, कैसे दोस्त हो, कहीं से एक गिलास पानी नहीं पिला सकते ?...जरा वो तौलिया तो पकड़ाना, ‘फ्रेश’ हो लिया जाए ?...गुरू, सिगरेट तो है मगर माचिस छूट गई, डिब्बे में नजर दौड़ाओ ! कोई-न-कोई जरूर बीड़ी सिगरेट पी रहा होगा !...अगर आप दोस्त के लिए इतना भी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ?
घर में ऐसा कुहराम मचा था कि न पूछिए ! कई दिनों से चूल्हा नहीं जला था और बीवी ने बेवा होने की पूरी तैयारी कर ली थी !
मुझे जल्दी ही अहसास हो गया कि माया-मोह के जंजाल में फँसा मैं—अस्सी का प्रवासी—इस दर्शन के काबिल नहीं !
अस्सी पर प्रवासियों की एक ही नस्ल थी शुरू में—लेखकों-कवियों की !
आजादी के बाद देश में जगह-जगह ‘केन्द्र’ खुलने शुरू हो गए थे—‘मुर्गी-पालन केन्द्र’, ‘मत्स्य पालन केन्द्र’, ‘सुअर-पालन केन्द्र’, ‘मगर-घड़ियाल-पालन केन्द्र’। इन कवियों-लेखकों ने भी अपना एक केन्द्र खोल लिया—केदार चायवाले की दुकान में। ‘कवि-पालन केन्द्र’। कोई साइनबोर्ड नहीं था, लेकिन जनता इसे इसी रूप में जानती थी। सुबह हो या दोपहर या शाम—केदार, विजयमोहन, अक्ष्योभ्येश्वरी प्रताप, शालिग्राम, अधीर, आनन्द भैरवशाही, विद्यासागर नौटियाल, विश्वनाथ त्रिपाठी (देहलवी), श्याम तिवारी, विष्णुचन्द्र शर्मा, बाबा कारन्त—इनमें से किसी को भी समूह में या अलग-अलग यहीं पाया जाता था !
इसके मानद इंचार्ज थे समीक्षक नामवार सिंह और पर्यवेक्षक थे त्रिलोचन। ये कवि प्रायः यहीं से ‘काव्य-भोज’ के लिए ‘तुलसी पुस्तकालय’ या ‘साधु वेला आश्रम’ की ओर रवाना होते।
मगर हास्य ! ’60 के शुरू होते-होते भी ‘फुर्र’ हो गए और केन्द्र भी टूट गया !
सन् ’65 के आस-पास जब धूमिल का आविर्भाव हुआ तो उसने गुरु के चरण-चिह्नों पर चलते हुए केदार चायवाले के सामने हजारी की दुकान को ‘केन्द्र’ बनाने की कोशिश की। हजारी के बगल में कन्हैया हलवाई की दुकान। वह कन्हैया के यहाँ से चार आने की जलेबी लेता और चार आने का सेव-दालमोठ और हजारी की दुकान में आ बैठता। इधर-उधर से कवियाये दूसरे लोग भी आते और नागानन्द भी। कवियों की नज़र अखबार या बहस पर होती, नागानन्द की जलेबी-नमकीन के दोनों पर !
ऐसे में केन्द्र क्या चलता !
मगर बाद के कई वर्षों तक—जिस प्रकार गोला दीनानाथ के इलाके में घुसते ही मसालों की गन्ध से नाक परपराने लगती है, उसी प्रकार अस्सी पर खड़े होने वाले किसी भी आदमी के कान के पर्दे काव्य-चर्चा से फटने लगते थे। धूमिल काव्य द्रोहियों के लिए परशुराम था और उसकी जीभ फरसा !
अस्सी से धूमिल क्या गया, जैसे आँगन से बेटी विदा हो गई। घर सूना और उदास।
इधर सुनते हैं कि कोई बुढ़ऊ-बुढ़ऊ से हैं कासीनाथ-इनभर्सीटी के मास्टर जो कहानियाँ-फहानियाँ लिखते हैं और अपने दो-चार बकलोल दोस्तों के साथ ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर ‘राजेश ब्रदर्स’ में बैठे रहते हैं ! अकसर शाम को ! ‘ए भाई ! ऊ तुमको किधर से लेखक-कवि बुझाता है जी ? बकरा जइसा दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाने से कोई लेखक कवि न थोड़े नु बनता है ? देखा नहीं था दिनकरवा को ? अरे, उहै रामधारी सिंघवा ? जब चदरा-ओदरा कन्हियाँ पर तान के खड़ा हो जाता था—छह फुट ज्वान; तब भह्-भह् बरता रहता था। आउर ई भोंसड़ी के अखबार पर लाई-दाना फइलाय के, एक पुड़िया नून और एक पाव मिरचा बटोर के भकोसता रहता है ! कवि-लेखक अइसै होता है का ?
सच्चा कहें तो नमवर-धूमिल के बाद अस्सी का साहित्य-फाहित्य गया एल.के.डी. (लौंडा के दक्खिन) !’’
मित्रो, इमर्जेंसी के बाद और ’80 के आस-पास से गजब हो गया !
भारत पर तो बेशक हमले हुए—यवनों के, हूणों के, कुषाणों के, लेकिन अलग-अलग और बारी-बारी, मगर अस्सी पर एक ही साथ कई राज्यों और जिलों से हमले हुए—आरा, सासाराम, भोजपुर, छपरा, बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया जाने कहाँ-कहाँ से ‘जुवा’ लड़के युनिवर्सिटी में पढ़ने आए और चौराहे पर डेरा-डंडा गाड़ चले !
इनमें नई नस्लें थीं !
एक नस्ल पैदा हुई ‘फाइन आर्ट्स’ के शौक से ! ये लड़के ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर पेंसिल और स्केचबुक लिये बैठे रहते हैं और ‘संघ की ओर से बँटनेवाली खिचड़ी या रोटियों के इन्तजार में बैठी या लेटी गायों, कुत्तों और भिखमंगों कि चित्र बनाया करते हैं !
दूसरी नस्ल ‘तुलसीघाट’ पर आयोजित होने वाले ‘ध्रुपद मेला’ से निकली ! यह गायकों-वादकों और उनकी कला पर फिदा होकर सिर हिलानेवालों की नस्ले हैं ! ये कढ़ाई किए हुए रंग-बिरंगे कुर्ते और चूड़ीदार पाजामा पहने, कन्धे पर झूलते लम्बे बाल बढ़ाए किसी गुरू या चेली के साथ बगल में तानपूरा दबाए इधर-उधर आते-जाते नजर आते हैं।
तीसरी नस्ल और भी जालिम है—पत्रकारों की ! तलवार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’ वालो की। ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है ! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं ! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है !
एक चौथी नस्ल भी है गोवर्धनधारियों की जो कानी उँगली पर ‘राष्ट्र’ उठाए किसी चेले के ‘हीरो-हाण्डा’ पर दस बारह साल से मुस्की मार रहे हैं। लेकिन इनके बारे में बाद में !
(भारतीय साहित्य संग्रह से साभार)
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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4.3.08
महाशिवरात्रि से होली तक
पूरी उम्मीद है कि आप में से अधिकतर लोगों को भांग का मजा पता होगा । भूल मत जाइये कि 6 मार्च को महाशिवरात्रि है और मुझे लगता है कि यह त्योहार शाय्द होली से पहले मूड सैट करने के लिये आता है कि आप तरंगित होने का मन अभी से बना लें । भाई लोग भांग का सेवन करिये और एवन रहिए । ध्यान रखिए कि अगर खुद को भगवान शिव समझ कर ओवरडोज़ ले लिया तो भारी पड़ेगा । इसलिये भांग का सेवन या कोई भी नशा तब तक ही करें जब तक होश कायम है उसके बाद बंद करदें ताकि बचा हुआ काम करके कोई गरीब डाक्टर अपनी होली का इंतजाम कर सके । तो भिड़ू लोग देर किस बात का है शुरू हो जाने का महाशिवरात्रि से होली तक टुनकी का प्रोग्राम.......
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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सुनले हुअ कि नाही-होली में चोली सिलबावे ला बुढ़बा
पंकज पराशर
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लोग कहते हैं होली का असली मजा ब्रज में आता है, मगर दो-तीन-सालों तक जब मैंने बनारस की होली देखी तो भैया होली में हर बार मन बनारस ही भागता है। तमाम गंभीरता और सोफिस्टीकेशन का लबादा उतरकर अस्सी घाट पर गिर जाता है जब अस्थि-पंजर वृद्ध भी होलियाते हैं- जा रजा पिछबाड़ा संभाल के...सुनले हुअ कि नाही-होली में चोली सिलबावे ला बुढ़बा...और गालियों का आलम यह है कि बहुत मासूमितय से गुरु लोग स्वीकारते हैं, अरे नाहीं बुजरौ वाले के हम कब ले गाली देली मरदे? तो जनाब सोफिस्टीकेटेड मरदे जो हैं न, वह औरत की तरह नजरें नीची करके हँसते रह जाते हैं। ऐसे में होली से पहले जो गलती-कुगलती से दुश्मन नामक विशेषण के दायरे में चले जाते हैं वो भी होली में चोली सिलवाकार साथ पहनाने के लिए निकल पड़ते हैं। होली बीतने के सप्ताह भर बाद तक दर्जियों के यहां गुरु लोग पेल्हड़ (नैतिकतावादी साहब लोग माफ कीजिये, वहां यही शब्द फगुआ में हर खास-ओ-आम प्रयोग में लाते हैं) और चोली के बीच रिश्ते के लिए बरइछा कराने की तैयारी में मुब्तिला हो जाते हैं।
एक अंग्रेज सज्जन अस्सी के पास के एक मोहल्ले भदैनी में एक भदेस पंडितजी से काशी की प्राचीनता के बारे में पूछ रहे थे। पंडित जी ने इत्मीनान से कहा कि अगर आपकी रूचि यहां के इतिहास में है तो आप जाकर बी.एच.यू. के डाक्टरों-प्रोफेसरों से मिलिये...और फिर साहब काशी के इतिहास को उन्होंने शरीर के उन-उन महिला और पुरुष अंगों के साथ जोड़कर बताना शुरु किया जिसके बारे में यहां बताने पर नैतिकतावादी लोग भड़ास को और ज्यादा बदनाम करेंगे। हम वहां जा रहे हैं। लौटकर तो लिखेंगे ही, संभव हुआ तो पल-पल की खबर उसी दिन वहीं से भड़ास पर लिखेंगे।
--पंकज पराशर
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: पंकज पराशर, फगुवा, भड़ास, संस्मरण, होली
1.3.08
कीचड़ की होली बस करिए.........
होली का मौसम गया है भड़ास पर ऐसा जिक्र चल ही रहा था कि कुछ फागुन गाया जाए ,गीत गुनगुनाए जाएं कि लोगों को लगने लगा कुछ बवाल हो गया है । भाई लोग इतने समय से जो भी हुआ उसमें नया क्या था ? हम सब भड़ासी नीच, गन्दे, ढीठ, घिनौने, बदबूदार, कमीने, असभ्य, गलीज़ ,छिछोरे वगैरह-वगैरह न जाने क्या-क्या ऐसे हैं जो कि बौद्धिकता के नुमाइंदे नहीं हो सकते । अरे भाई लोग ,ये तो हम सरल सहज भावुक भड़ासियों का सम्मान है ,यही तमगे हैं जो हमारे सीने पर जगमगा कर हमें उस वर्ग से अलग रखते हैं । अब मैं दिल ,फेफड़ों ,गुर्दों ,तिल्ली ,आमाशय आदि(इनमें दिमाग़ शामिल नहीं है) तमाम अंग-उपांगों से यही कहना चाहता हूं कि यशवंत दादा और अविनाश भाई ने जो होली की शुरुआत कीचड़ से करी है अब वह रुके ; अरे भाई कितने सारे रंग हैं क्या साला पूरा मौसम कीचड़ की ही होली खेल कर बिता देना चाहते हैं आप लोग ? बस करो एक दूसरे पर कीचड़ उछालना । भड़ासी तो औघड़ हैं ही तो जिसने एक अंजुरी कीचड़ उछाला तो साले सब चल पड़े उसके ऊपर गटर का ढक्कन खोल कर मलीदा निकाल कर उछालने और छोटे बच्चों की तरह उसी में लोट-पोट होकर खुश होने लगे । अविनाश ,मसिजीवी और मनीषा पांडेय बहन ने बस कीचड़ की अंजुलि भर कर उछाला ही था कि यशवंत दादा ,मुनव्वर आपा ,मनीष (महा)राज , अपने पंडित जी ग्रीन लाइट (हरे प्रकाश) उपाध्याय और मैं खुद दौड़ पड़े ,होली है-होली है का नारा बुलंद करके कीचड़ की टोकरियां लेकर इन सब पर । आज मनीषा दीदी ने मुझे टोका तब होश आया कि यार वाकई और भी रंग हैं भड़ास में जो हम उड़ाकर समां रंगीन कर सकते हैं । आज उनसे मिला तो वे अपने ही अंदाज में एक उंगली से कुछ छिपा कर टाइप कर रहीं थीं मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि मै यह अपने नाम वाली मनीषा के लिए लिख रही हूं ,जब पूरा हो जाएगा तो खुद ही भड़ास पर भेज दूंगी और मैंने देखा मेरी बहन मनीषा की आंखो में कि वो इन्दौर वाली मनीषा बहन से शायद कुछ प्यार की बात कहना चाह रही हैं तो अब इंतजार है उनकी पोस्ट का कि कब पूरा कर पाती हैं वो अपनी बात.......
अरे मेरे प्यारों तो देर किस बात की है जरा हो जाए क्रांति-भ्रांति-शान्ति की सारी खुशबुओं को होली के रंगों में मिला कर भरपूर-भरपेट मस्ती करने का । अब मैं जरा गब्बर सिंह के अंदाज़ में यशवंत दादा से पूंछता हूं कि कब है होली ? होली कब है ?
हास्य कविता :प्रतियोगिता
हास्य कविता :प्रतियोगिता
मित्रो,होली के अवसर पर आप सभी कलम उठाइए , लिखा भेजिए एक छोटी सी हास्य रचनामध्य-प्रदेश लेखक संघ, जबलपुर की और सेप्रथम तीन विजेता प्रतिभागीयों को क्रमश: 300/- , 200/- तथा 100/- की पुरूस्कार राशी एक एक प्रशस्ति पत्र भेजा जावेगा। 10 प्रतिभागी भी सम्मानित होंगे,नियम:
रचना की मौलिकता ज़रूरी होगी,
स्पष्ट पता -मेल आई डी , तथा मौलिकता की घोषणा पत्र , रचना के साथ संलग्न हों।
कविता ए-फॉर आकार के पेज से अधिक लम्बी होने पर प्रतियोगिता से हटाने का अधिकार निर्णायक मंडल का होगा
व्यक्तिगत आक्षेप न हों
एक रचना कार एक रचना ही भेज सकते हैं,
यूनीकोड पर टंकित कर ने इस लिंक का सहारा लीजिये => http://www.google.com/transliterate/indic
तथा रचना/प्रविष्ठी girishbillore@gmail.com पर मेल करिए
अन्तिम तिथि:- १०/०३/२००८
गिरीश बिल्लोरे "मुकुल "
Posted by
Girish Billore Mukul
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Labels: कविता, जबलपुर, प्रतियोगिता, म०प्र०, लेखक, संघ, हास्य, होली
20.2.08
ई क्या हो रिया है ?
अरे होली का टेम है । रंग-गुलाल उड़ना चाहिए । मस्ती-वस्ती होनी चाहिए । हंसी-मजाक होना चाहिए । छेड़-छाड़ होने चाहिए । ई बहस चल रिया है । सब बकवास है रे । कोई होली सुनाओ रे । बहस-तहस बहुत हो गिया रे । होली तुम सब का मन कैसे लग रिया रे ई बहस -फहस मे। पिचकारी लाओ रे । रंग डाल दो । रंग न हो पानी डाल दो । पानी न हो कीचड़ डाल दो । तेजाब काहे डाल रिया रे । होली मे भंग नही खाया क्या रे ? होली मे भौजी से लड़ लिया क्या रे ? तो साली से खेल लो रे । साली नही तो घरवाली से खेल लो रे । वो भी नही तो बगलवाली से देख लो रे । उससे डर लगता तो अपन भड़सी से ही खेल लो रे । होली के टोली ले के निकलो रे । डोरे डालो रे । कुछ करो रे । बहुत हो गया रे । भांग पीके आता हूँ तो और बताता हूँ रे ।
Posted by
हरे प्रकाश उपाध्याय
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