Hangover of Delhi visit is still there. Its about a visit to the Press Club. I had forgotten my GMC card and without that it was "no entry".
Yashwant Singh of Bhadas who was with me had his sharp eye roving on the notice board of the Club while I searched for some friend to get us in. Ultimately, Ashok Bedi helped me get entry as his guest. We ordered two pegs. But, the waiter placed three on our table. The odd number three was a quiz for me. Yashwant drew my attention to the announcement of three pegs for two on the notice board. However, one peg free was a news for me and Yashwant suggested that I must have it in the Newsletter that there is incentive scheme in liquor also get three pegs for two.
While coming out , I saw Pradip Saurabh , a regular feature of the Club in his charateristic style. There was Amit Mukherjee with his friends on a table. Like many in Delhi, Amit was also curious to know the truth of the TOI issue. While parting , I could not resist myself and asked his Do kaa teen business.
He said that it happens whenever there is some scheme from the liquor company.This literally killed the news. But, in the interest of Delhi journalists who do not visit the Press Club and others elsewhere in the country , it must be a news. And so, friends I have the news that you can drink more paying less!!!!!
-Yogesh Sharma
http://www.gujaratglobal.com/
साभारः गुजरात ग्लोबल डाट काम
12.7.08
Three pegs for two
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यशवंत सिंह yashwant singh
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भड़ास4मीडिया पर पदमजी का संपूर्ण इस्तीफानामा जल्द
हिंदी मीडिया के मशहूर खेल पत्रकार पदम पति शर्मा उन दिनों दैनिक हिंदस्तान में बनारस में सहायक संपादक हुआ करते थे। उन्होंने 26 अप्रैल 2002 को अपने अखबार के प्रधान संपादक को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा। पत्र को मेल से भेजने के तुरंत बाद उन्होंने संस्थान को टाटा बाय बाय बोल दिया। पदम जी का वह इस्तीफानामा कई मायनों में ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है। तीन दशकों तक हिंदी प्रिंट मीडिया के लिए खेल पत्रकारिता के पर्याय रहे पदम जी ने इस्तीफे में अपने पूरे खेल जीवन के मर्म को निचोड़कर रख दिया है।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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11.7.08
मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)
मुझे आजकल लगता है कि मैं कोई जमाने से यहीं खड़ा, हवा चले न चले सिर पटकता पेड़ हूं।
या कोई धूल से अटी पिचके टायर वाली जीप हूं जिसके स्टीयरिंग का पाइप काटकर मेरे गांव छोकरे लोहार से कट्टा बनवाने की सोच रहे होंगे।
या कोई हिरन हूं जिसकी सींगों को तरास कर, भुस भर दिया गया है और जिसकी कांच की आंखों में उजबकपन के सिवा कोई और भाव नहीं है।
कभी लगता है कि बीमार, मोटे, थुलथुल, सनकी, भयभीत और ताकत के नशे मे चूर लोगों से भरे एक जिम में हूं।
पसीने और परफ्यूम की बासी गंध के बीच मुझे एक ऐसी मशीन पर खड़ा कर दिया गया है जिस पर समय लंबे पट्टे की तरह बिछा हुआ है।
मैं उस पर दौड़ रहा हूं, पसीने-पसीने हूं, हांफ रहा हूं लेकिन वहीं का वहीं हूं।
कहीं नहीं पहुंचा, एक जमाना हुआ।
समय का पट्टा मुझसे भी तेज भाग रहा है।
अगर मैं उसके साथ नहीं चला तो मशीन से छिटक कर गिर पड़ूंगा और कोई और मेरी जगह ले लेगा।
मैं थक रहा हूं यानि समय जरूर कहीं न कहीं पहुंच रहा है।
मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)
जमाना हुआ, मैं कहीं गया ही नहीं।
कई बार सपनों में बेहद तेज हूक उठी लेकिन वह नींद में ही मर गई।
आखिरी बार मैं शायद............Read More......
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यशवंत सिंह yashwant singh
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6.7.08
और यूं बदला हमारा संडे एडिशन


http://www.newspagedesigner.com/portfolios/portfolio1.php?UserID=14236
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यशवंत सिंह yashwant singh
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5.7.08
क्या हो गया मेरे इंदूर
धर्मेंद्र चौहान
क्या हो गया मेरे इंदूर (इंदौर) को। अक्टूबर २००६ में ही तो मेरा ट्रांसफर पंजाब हुआ है। शायद ही ऐसा कोई दिन गया हो जब मैंने इसकी (इंदूर की) खैर खबर न ली हो। रोज अखबारों के जरिए इसकी गतिविधियों को जानता हूं, पिछले साल ही तो जवाहर मार्ग में कर्फ्यू लगाया गया था। टीवी चैनल पर पथराव की लाइव कवरेज देखकर याद आ गया कि यही वो रंगरेज की दुकान है जहां से मैंने दोस्त की जींस का कलर बदलने के लिए रंग खरीदा था। लेकिन अब वो रंगरेज की दुकान जल चुकी है। लोग पथराव कर रहे थे। हमेशा लोगों और वाहनों की भीड़ से भरा जवाहर मार्ग खाली था। शांति के दुश्मन पथराव कर रहे थे। दूसरे तरह के लोग पुलिस वाले थे जो कभी आंसू गैस छोड रहे थे। तो कभी कर्फ्यू की बात सुन साइकिल से घर जा रहे अधेड पर लाठियां बरपा रहे थे।
पिछले साल १२ मार्च २००७ को सुबह दोस्त से बात हुई थी तब उसने बताया कि साउथतोड़ा में लडक़ी को छेडऩे को लेकर फिर पथराव हुआ था। अब अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीनी मामले को लेकर मेरा इंदूर सुलग रहा है, माफ करना सुलग नहीं रहा, जल रहा है। पहले पंढरीनाथ, छत्रीपुरा, खजराना और मल्हारगंज में कफ्र्यू लगा था। अब पूरा शहर उसकी चपेट में आ गया है। सच कहता हूं मेरे इंदूर तू वहां जल रहा है यहां पंजाब में मेरा दिल बैठ रहा है। पिछले साल भी ऐसा ही दिल तेजी से धडक़ रहा था इसलिए कि कफ्र्यू न लग जाए पिछले साल तो शहर के समझदारों ने संभाल लिया था कर्फ्यू नहीं लगा था। लेकिन इस साल दिल रो पड़ा है। पत्नी बार-बार टीवी चैनल बदलती है कहती है स्टार न्यूज लगाओ वह देखो खजराना का रिलायंस फ्रैश फोड़ दिया। ये आईबीएन ७ वालों को फोन लगाओ थानो का नाम बद्रीनाथ नहीं पंढरीनाथ है। ये चत्रीपुरा नहीं छत्रीपुरा है। मलहारगंज का ल आधा आएगा शुक्र है खजराना तो ठीक लिखा है। क्यों कभी लड़कियों की छेडख़ानी से पथराव की शुरुआत होती है तो कभी खुदा और ईश्वर के नाम से। अमन चैन के दुश्मनों ने पेट्रोल बम तैयार कर रखे हैं। बस उन्हें किसी बंद या झगड़े का इंतजार होता है। क्यों लोग उन मुठ्ठीभर अमानुष जिनका न कोई धर्म न है न ईमान उनकी जमात में शामिल हो जाते हैं। अपने प्यारे इंदूर से तेरह सौ किमी दूर रह कर बस मन करता है लौट आऊं, लेकिन एक बार सोचने पर मजबूर हो जाता हूं। मेरे इंदूर में तो सिर्फ व्यवस्था बनाने के लिए झांकी निकलने पर लोगों का रास्ता रोका जाता है, कर्फ्यू लगने पर नहीं।
मेरे इंदूर में नई फिल्म रिलीज होने पर सिनेमा हॉल की टिकट खिडक़ी पर पुलिस उन मनचलों पर लाठी बरसाती है जो बिना नंबर के लाइन में लग कर टिकट लेते हैं। वहां भागवत यात्रा निकलने या किसी संतजन के आने पर स्वागत स्वरूप शोभायात्रा में बम (रस्सी बम) फोड़े जाते हैं। लोगों के घर जलाने के लिए नहीं। वहां एक दिन पेट्रोल पंप हड़ताल होने पर शहर में कई गाडिय़ां सडक़ पर नहीं आतीं। इंदूर में लोगों के घर जलाने के लिए पेट्रोल (पेट्रोल बम) का इस्तेमाल नहीं होता। क्या मेरा इंदूर इतना बदल गया कि मुझे घर लौटने के लिए एक बार सोचना पड़ता है। इंदूर तुम्हारे पास अस्सी बरस की मेरी दादी, मम्मी-पापा और एक प्यारी बहन को छोडक़र इस भरोसे पंजाब आया था कि मेरा इंदूर सबसे सुरक्षित है। इंदूर शहर नहीं संयुक्त परिवार है। जहां एक सदस्य के बाहर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। शहर जहां कुछ दिन पहले शांति यात्रा निकली थी वहीं अब पत्थर बरस रहे हैं। मेरे अमन पसंद परिवार को क्या हो गया। कितना अच्छा लगा है जब सुना बिगबी आए हैं। खुद को इंदौर की मेजबानी का घायल बता गए हैं। जगजीत अपनी गजलों का जादू बरसा गए हैं। अब कफ्र्यू की खबर सुनकर अच्छा नहीं लगता। बार-बार दिल कहता है क्या हो गया मेरे इंदूर को।
धर्मेंद्र चौहान, इंदौर
(हाल मुकाम लुधियाना, पंजाब)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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17.4.08
पत्रकारिता से अच्छी अपनी चाय की दुकान
भड़ास पर पहली पोस्ट है। परिचय देने लायक बहुत कुछ नहीं है फिर भी नियमानुसार देने की कोशिश करता हूं। मैं साहित्य केचस्के से दिल्ली आया और पेट चलाने के लिए पत्रकार बन गया। नौकरी का संकट था इसलिए फ्रीलांसिंग करने लगा। बाद में कुछ चिरकुट टाइप अखबारों में काम किया। यहां काम तो ...... फाड़कर लिया जाता था पर पैसे देने में फटने लगती थी। हर जगह अलग-अलग गलीजखाने थे। लिखने बैठो तो पूरा रंडी रोना हो जाएगा। ऐसे में दो ही विकल्प थे कि काम करने के बाद भी उनका भारोत्तोलन करता या फिर नौकरी छोड़ देता। कई जगह ऐसा ही हुआ तो मालिक-संपादकों के पिछवाड़े पर लात मारकर पेशे से ही बाहर हो गया। आजकल दिल्ली यमुनापार के शकरपुर के एक मोहल्ले में चाय की दुकान चलाता हूं और जहां-तहां अपनी भड़ास निकालता रहता हूं। वहां कोई मुझे नहीं जानता। न झूठी विद्वता का रौब है और न ही अहंकार। गरीब लेकिन बड़े दिलवाले लोगों की नई दुनिया भी देख रहा हूं। इतनी कमाई हो जा रही है कि मजे से अपने दायित्व का निर्वाह हो रहा है। पत्रकारिता के नाम पर दोगले लोगों को तेल लगाने से अच्छा रि शेवालों का जूठा ग्लास धोना लग रहा है। अभी मोबाइल फोन चालू नहीं करवाया है पर पास के एक ग्राहक के साइबर कैफे में अपनी भड़ास निकालने का जुगाड़ फिलहाल कर लिया है। उम्मीद है कि मेरी भड़ास ज्यादा कड़वी भी हो भाई लोग झेल लेंगे।
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bambam bihari
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15.4.08
जो रहे काशी, उसको कहां उदासी, जय भोले!
दुबे जी को वही जाने, जिसने कभी उनका जीवट देखा हो। नौकरी और रोजगार के एक-से-एक दमदार नुस्खे, जोरदार आइडियाज। जो सुने, कायल हो जाए। वाह-वाह कर उठे। वाकई दुबे जी जो बताते हैं, आज के रोजगार उस पर अमल करने लगें तो किसी के आगे हाथ फैलाने, दांत चियारने की नौबत न आए। कुछ इसी तरह की तरकीबों और दांव-पेंच से सत्तू नरायन हो गए श्रीसत्यनारायाण दुबे जी!
दुबे जी कहते हैं, आज के जमाने में भी नौकरियां उन्हें नहीं मिल रही हैं, जो नौकरियां खोज रहे हैं। उल्टे हजार-हजार नौकरियां उन्हें खोज रही हैं, और वे हैं कि बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं। लाखो-करोड़ों रुपये हवा में उड़ रहे हैं। बस पकड़ने का हुनर चाहिए। जिनके पास अक्ल है, उन्हें नौकरियां खोज रही हैं, उनके ही हाथों में उड़ते नोट सट्ट-सट्ट आ रहे हैं। उनके लिए दुनिया स्वर्ग है, हरी-भरी है, खूब भरी-पूरी है। जो अक्ल के पैदल और आंख के अंधे हैं, उनके लिए दुनिया नर्क है, मुश्किलों का अखाड़ा है, न नोट उनकी पकड़ में आ पाता है, न नौकरी। बात 1980 की है।
दुबे जी बताते कि....हजारों युवा लखैरों की तरह घूम रहे हैं। उन्हें देखकर तरस आता है और गुस्सा भी। तुम भी तो बेरोजगार हो। तुम क्या, तुम्हारे साथ दस और बेरोजगारों को बैठे-ठाले काम मिल जाएगा। बस, मैं जैसा बताता हूं, वह कर डालो। बगल में बनारस है। गंगा मैया वहां से गुजरती हैं। अपने दस बेरोजगार साथियों में से पांच को दिन की ड्यूटी पर लगाओ, पांच को रात की ड्यूटी पर। करना ये है कि बनारस से मुगल सराय जाने वाले रोड के गंगा-पुल पर नदी-तल में एक बड़ा-सा जाल बिछा दो। जो भी वाहन-ट्रेनें आदि पुल से जब गुजरते हैं तो सवारियां गंगा मैया के नाम पर पुल के नीचे पैसा फेंकती हैं। रोजाना हजारों रुपये। सारा पैसा जाल में इकट्ठा होता जाएगा। सुबह-शाम जाल समटे कर पैसे बटोर लिया करो दोनों हाथों से। लगे हर्र-न-फिटकरी, कमाई लाखों की। जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले! दुबे जी की महिमा अपरंपार।
एक दिन बोले कि तुम्हे ऐसा काम बताता हूं, करोड़ों की कमाई हो जाएगा, लागत बस हजार-पांच सौ की। तुम्हारे कवि-गुरू श्याम नारायण पांडेय, अरे वही हल्दीघाटी वाले, यहीं बगल के गांव डुमरांव में रहते हैं। हल्दीघाटी महाकाव्य को कौन नहीं जानता। पांडेय जी के रोम-रोम में पैसा है। उनके रोम-रोम को बेंच डालो। कैसे कि......एक हजार पर्ची छपवाओ, उस पर स्लोगन होगा...हल्दीघाटी द्वार का निर्माण। कहां बनेगा हल्दी घाटी द्वार.... पंडित जी के गांव में। तुम बताओगे कि लागत आएगी पांच-दस करोड़। द्वार के लिए पंडित जी से एक पत्र लिखवा लो। उसकी एक हजार फोटो स्टेट करा लो। पर्ची और पत्रों का गट्ठर लेकर राजस्थान निकल जाओ। वहां के रजवाड़े-रईस महाराणा प्रताप के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं। उन्हें एक-एक पर्ची और पत्र की फोटो स्टेट थमाते जाओ, अपनी थैली भरते जाओ। एकाध महीने बाद इधर हल्दीघाटी द्वार के लिए डुमरांव रोड पर दो-चार हजार ईंटे गिरवा दो। फिर तो बेटा पर्ची काटते रहो, काटते रहो, थैली भरते रहो, भरते रहो। वैसे भी पंडित जी के पांव कब्र में लटके हैं, जाने कब टपक जाएं, फिर कौन पूछने वाला कि हल्दीघाटी द्वार के चंदे का क्या हुआ, अपना ठाट से गंगाघाट पर घर-मकान बनाकर काशी के हो जाओ। सात पुश्तें मजा करेंगी। जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!वाकई दुबे जी कमाल के। पांच साल में उन्होंने पांच कारखाने खोले। एक-एक कर पांचों का दीवाला। दस परसेंट अफसरों को थमा कर बाकी करोड़ों का लोन गया दुबे जी के बैंक खाते में।
एक दिन दुबे जी ने कहा। भाई लोग हट्टे-कट्टे हैं। नौकरी के लिए दांत चियारे दर-दर भटक रहे हैं। और नौकरी पांव में पड़ी है। एक काम और। हजारों को रोजगार मिल जाएगा घर बैठे। क्या कि..... ज्यादातर बेरोजगार किसानों के बेटे हैं। सबके यहां खूब गेंहूं होता है। सौ-पचास दुकानदारों से एडवांस में आर्डर लो। गेहूं का दलिया पिसवाओ, गांव की मजदूरिनों से पैकेटिंग करवाओ, दनादन सप्लाई करो। हर किसान सरसों उगाता है। इसी तरह सरसो के तेल की सप्लाई करो। हमारे इलाके में तो चावल भी खूब होता है, इसके भी तरह-तरह के आइटम तैयार करो, बेंचो। दस तरह के आइटम गुड़ से बनते हैं। भैंस पालो, दूध बेंचो। देखो न, दूध के लिए कितनी मारामारी मची है। अरे कुछ नहीं, तो पत्ते से कितने तरह के सामान बनते हैं। उनकी बगल के बनारस में ही खूब खपत है। पत्ते बीनो, बेंचो। मालदार बन जाओ। कौन रोकता है तुम्हें ऐं! जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!
((उपरोक्त लेख जेपी नारायण के ब्लाग बेहया से साभार लिया गया है))
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यशवंत सिंह yashwant singh
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30.3.08
दिल्ली-अहमदाबाद-मुंबईः पहली जहाज यात्रा, पहली मुलाकातें, उनकी बातें, वो ढेर सारी यादें......
तीन चार दिनों की यात्रा के बाद आज दोपहर दिल्ली पहुंचा तो भड़ास पर अंदर बाहर ढेर सारा पानी बह चुका था। अंदर माने इनबाक्स में मेल सैकड़ों की संख्या में पड़े थे और बाहर माने भड़ास पर ढेर सारी चीजें लिखी पढ़ी कही जा चुकी थीं। मनीष की संगीता पर पोस्ट और उस पर प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि भड़ास दरअसल अब वाकई एक वैकल्पिक मीडिया का रूप लेता जा रहा है। पारंपरिक मीडिया जिन मुद्दों और बातों को छू तक नहीं सकता, भड़ास जैसे कम्युनिटी ब्लाग पर वे बातें पूरी बेबाकी से आती हैं और लोगों को सोचने व करने पर मजबूर कर देती हैं। लगे रहिए दोस्तों, ऐसे ही छोटी चीजें कभी बड़ी बना करती हैं और ऐसे ही छोटी चीजें कभी बड़े आंदोलन का रूप ले लिया करती हैं। इस दौरान मुश्किलें भी हजार आती हैं लेकिन अगर माद्दा है तो फिर फौलादी सीने तूफानों से टकराया करते हैं। कीप इट अप। मनीष से प्रेरणा लेकर हिंदी के ढेर सारे पट्ठों, शेरों, शूरवीरों, बहादुरों को अपनी चुप्पी तोड़कर हिंदी के विजय के इस दौर में आनलाइन माध्यम में हिंदी में लिखना और अपनी न कही गई बातों को प्रकाशित करना शुरू कर देना चाहिए। भड़ास आपकी मदद के लिए तैयार है।
मैंने अपनी पहली हवाई यात्रा उसी रोमांच के साथ की जिस रोमांच के साथ मैंने जीवन में पहली बार साइकिल चलाना सीखा था। जहाज पर बैठने के बाद मेरी गुर्दन मुड़ी ही रही, नीचे धरती को एकटक देखता और निहारता रहा। किस तरह धरती की हर चीज धीरे धीरे छोटी होते होते एकदम से अदृश्य हो गईं और बादलों का संसार धरती पर कब्जा जमाए दिखा। बड़े बड़े शहर यूं नजर आए जैसे चींटी। नदियां, पहाड़, शहर, गांव सब एक ऊंचाई पर आने के बाद एकाकार हो गए और सब कुछ धुआं धुआं बादल बादल धूसर धूसर मिट्टी मिट्टी पानी पानी प्रकाश प्रकाश आसमान आसमान के रूप में दिखने लगा।
मुझे जो निजी तौर पर दिक्कतें आईं उसे जरूर बताना चाहूंगा। मैं सीट बेल्ट बांध नहीं पाया। जिधर से बांधने की कोशिश कर रहा था वो उल्टा वाला साइड था। आखिरकार पसीना पोंछते हुए मैंने अपने पड़ोसी से पूछा...भइया, इ बेल्टवा कइसे बांधा जाता है...। उस उन बंधु ने अपने चेहरे पर बिना यह शो कि लगता है तुम देहाती हो, पूरे सम्मान के साथ फटाक से मेरा बेल्ट बांध दिया और इस कदर फिर अपने काम में डूब गये जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मैं अपेक्षा यह कर रहा था कि वो थोड़ा मुस्करायेंगे, पूछेंगे, समझायेंगे....पर ऐसा कुछ न हुआ। शरीफ आदमी थे।
दूसरी दिक्कत ये रही कि सुबह पांच छह गिलास पानी पीने के आदत के चलते जब एयरपोर्ट पर पहुंचा तो सू सू करने की स्थिति बन गई थी लेकिन मैं इसलिए ज्यादा दाएं बाएं नहीं घूमा टहला कि कहीं कोई समझ न ले कि इ ससुरा पहली बार आया लगता है...बोले तो मन ही मन तय कर लिया था कि अबकी एक अच्छे देहाती की तरह चुपचाप सब भांपना देखना है और जहाज पर चढ़कर यात्रा कर के नीचे उतर लेना है। अगली बार दो कदम और आगे बढ़ेंगे और मूतेंगे भी। तो सू सू करने का जो प्रेशर बना था उसे हवाई जहाज में भी दबाए रहा। हालांकि मैं देख रहा था कि भाई लोग किस तरह उठ उठ कर टायलेट की तरफ जा रहे थे पर मैंने रिस्क नहीं लिया। दूसरे, उठने पर नीचे वाला सीन, धरती वाला दृश्य मिस करने का भी रिस्क था, सो अहमदाबाद में एरपोटर् के बाहर एक कोना पकड़कर हलका हुआ।
अहमदाबाद में आफिस का काम निपटाने के बाद वरिष्ठ ब्लागर संजय बेंगाणी से मिलने उनके अड्डे पहुंचा। संजय और पंकज जी ने बेहद प्रेम से अपनी टिफिन से खाना खिलाया और देर तक बतियाये। मैं बेहद सहज और अपनापा महसूस करता रहा। लगा, जैसे कि अभी दिल्ली में ही हूं, अपने घर के आसपास। संजय जी ने कुछ बातें इस मुलाकात के बारे में अपने ब्लाग पर कहीं हैं जिसे आप पढ़ व देख सकते हैं। उन्होंने विस्तार से लिखने के बारे में मुझे कहा है पर मैं क्या लिखूं, कुछ सूझ नहीं रहा, सिवाय इसके कि हिंदी ब्लागिंग ने हम अपरिचितों को इतना परिचित करा दिया है कि अब कोई शहर बेगाना, अनजाना नहीं लगता। हर शहर में अपने लोग मिल जाते हैं। और ये अपने लोग ही हैं जो पूरी दुनिया में फैले हैं, बस संजय पंकज की तरह हम सभी अपनी हिंदी और अपने हिंदी वालों पर गर्व करना शुरू कर दें, लिखना शुरू कर दें, देखिए...जमाना अपना है।
संजय जी से मिलने के बाद सुभाष भदौरिया जी का फोन नंबर पता कराया। और सफलता भी मिली। कानपुर आईनेक्स्ट के अपने दद्दा अनिल सिन्हा जी ने तुरंत मेरी मदद की और जाने कहां से डा. सुभाष भदौरिया का मोबाइल नंबर मुझे उपलब्ध कराया। डाक्टर साहब को फोन किया तो वे अहमदाबाद से बाहर एक कालेज में परीक्षा कराने में जुटे थे। उन्होंने वादा किया कि परीक्षा खत्म होते ही वे उस बस के पास पहुंच जाएंगे जिससे मुझे मुंबई जाना था। और डाक्टर साहब वादे के मुताबिक पहुंचे भी। डा. सुभाष भदौरिया, जिन्हें मुख्य धारा के ब्लागरों ने जाने क्या क्या कहा है और जाने किस किस तरीके से परेशान किया है, ये किस्सा पुराना है पर मैं तो हमेशा से डाक्टर साहब को एक बेहद सहज और सच्चा इंसान मानता रहा हूं। तभी तो डाक्टर साहब सच बोलकर जमाने भर के गम उठाते रहे हैं। डाक्टर साहब से पल भर की मुलाकात रही पर इस मुलाकात को जी लेने और कैद कर लेने की उनकी सहृदय बेचैनी ने मुझे भाव विभोर कर दिया। ये कैसे अनजाने रिश्ते होते हैं, जिनमें दो लोग अपने आप एक दूजे को चाहने लगते हैं। डाक्टर साहब ड्राइवर को पांच मिनट और रुकने की विनती करते रहे पर ड्राइवर किसी विलने की तरह ना में सिर हिलाकर गाड़ी बढ़ाने लगा, तब मुझे भी मजबूरन बाय बाय कहते हुए बस में घुसना पड़ा। डाक्टर साहब से पल भर की मुलाकात ढेर सारी यादें दे गईं। उनसे फिर मिलने का वादा है।
मुंबई पहुंचा तो सीधे अपने अड्डे डाक्टर रूपेश के यहां पहुंचा। डाक्टर साहब ने अपनी फोटो तो कभी भड़ास या इधर उधर डाली नहीं सो उनकी शक्ल को लेकर मैंने ढेरों कल्पनाएं कर रखी थीं। पर वो तो निकले बेहद हैंडसम नौजवान। गठीला और योगीला शरीर। इलाके के यंग एंग्री मैन। कोई बार-वार नहीं चलना चाहिए। विकास की किसी योजना में कोई धांधली नहीं होनी चाहिए। ढेरों सच्चे पंगे ले रखे हैं डाक्टर साहब ने अपने इलाके में। पनवेल में उनके आवास पर रुका तो डाक्टर साहब के मुंबई भड़ासी ब्रांच के सारे कुनबे से मुलाकात हुई। बच्चों सी मुनव्वर आपा, कोमल हृदय और सुंदर व्यक्तित्व की स्वामिनी मनीषा दीदी, अनुभवों और सोच के धनी रूपेश जी के बड़े भाई भूपेश जी....।
डाक्टर रुपेश के साथ ही मुंबई को छान मारा। वो भी लोकल ट्रेन के भीड़ भरे डिब्बे में नहीं बल्कि लोकल ट्रेन को चलाने वाले ड्राइवरों की केबिन में ससम्मान बैठकर। इसे कहते हैं डाक्टर रुपेश का जलवा। ड्राइवरों से डाक्टर साहब यूं मराठी में बतियाते कि जैसे कभी प्रतापगढ़ में पैदा ही नहीं हुए हों बल्कि जन्मना मराठियन महाराष्ट्रियन हों।
डाक्टर रुपेश के साथ ही दो वरिष्ठ ब्लागरों लोकमंच वाले शशि सिंह और बतंगड़ वाले हर्षवर्धन से मुलाकात हुई। साथ में अपने आफिस के वरिष्ठ साथी रंजन श्रीवास्तव जी भी थे। लोवर परेल के कैफे काफी डे में हाट डाग रोल खाते और लेमन डेमन पीते हुए इहां से उहां तक खूब बतियाया गया।
शशि सिंह आजकल वोडाफोन में मैनजेर हैं। मैं इस बात का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि चिरकुट माइंडसेट वाले पत्रकार जान लें कि हिंदी पत्रकार अब नाकाबिल नहीं रहा बल्कि वो अपनी काबिलियत सिर्फ कलम की कथित मजबूरी के जरिए नहीं बल्कि बिजनेस और मार्केटिंग जैसे आधुनिक दुनिया के रहस्यों को सुलझाने के जरिए कर रहा है। शशि सिंह हमेशा से मेरे लिए एक समझने वाली चीज रहे हैं, उत्साह से लबालब व्यक्तित्व ऊर्जा से भरी सोच, इंटरप्रेन्योर माइंडसेट का मालिक, कुछ अलग करने रचने जीने सीखने को हमेशा तत्पर रहने वाला युवा......। शशि सिंह से ये मेरी दूसरी मुलाकात थी और हर्षवर्धन जी से पहली। हर्षवर्धन जी के बारे में मेरी सोच ये थी कि वो दिल्ली में ही किसी न्यूज चैनल में कार्यरत हैं पर वो निकले मुंबइया। इन दोनों पूरबिहों से मिलने बतियाने के बाद अगले दिन एक भयंकर वाली ब्लागर मीट हुई।
छात्र संगठन पीएसओ उर्फ आइसा के पुराने धुरंधरों दिग्गजों जिन्होंने अपने जमाने में संस्कृति से लेकर राजनीति तक को नए सिरे से समझने समझाने को क्रम को बखूबी अंजाम दिया था, अब मुंबई के भिन्न कोनों में रहते जीते लिखते सोचते हैं। इन सभी से एक साथ मुलाकात हो जाए, मैंने सोचा भी न था। इसके पीछे धारणा बस यही थी कि हम लंठ भड़ास वाले, कच्ची उम्र व सोच वाले, इन धुरंधरों के पासंग भी फिट नहीं बैठते तो ये लिफ्त क्यों मारेंगे। पर मेरी सोच मनगढ़ंत साबित हुई। वरिष्ट ब्लागर प्रमोद सिंह ने अभय तिवारी जी के घर मुलाकात तय कर दी तो मैंने लगे हाथ ढेर सारे परिचितों को वहां पहुंचने के लिए न्योत दिया। स्क्रिट राइटर सुमित अरोड़ा, डा. रुपेश और मैं तो उधर से अभय तिवारी जी, प्रमोद सिंह, अनिल रघुराज, बोधिसत्व, उदय यादव आदि थे। तीन बजे से बतकही शुरू हुई तो जाने कब पांच छह बज गया, पता ही नहीं चला। इतनी बड़ी मुंबई में एक जगह इतने सारे ब्लागरों और साथियों का इकट्ठा हो जाना मेरे लिए सपने सरीखा था। जीवन, दर्शन, हिंदी पट्टी, सोच, संवेदना, ब्लागिंग, एग्रीगेटर, निजी, सार्वजनिक, विवाद, मौलिकता, लेखन, व्यक्तित्तव, पहचान, हरामीपन...जैसे ढेरों विषयों से टकराते बूझते आखिर में भड़ास पर चर्चा ठहरी। साथी लोगों ने लतियाया, धोया, सिखाया, समझाया तो मैंने भी अपनी पेले रखी और उनकी सुनने समझने की मुद्रा बनाए रखी। इन लोगों की ढेर सारी बातों को मैं अमल करने लायक मानता हूं और इस पर कोशिश पहले ही शुरू कर दी गई है, आगे और भी कोशिशें होंगी।
और हां, ये बता दूं कि मुंबई के इन सभी लोगों से मेरी पहली मुलाकात थी, सिवाय सुमित अरोड़ा के जो मेरठ से मेरे साथी रहे हैं। प्रमोद सिंह की क्या पर्सनाल्टी है भाई, यूं बड़ी बड़ी मूंछें, गब्बर सिंह माफिक, भर पूरा चेहरा, ठाकुर माफिक, देह पर कुर्ता पाजामा क्रांतिकारियों की माफिक....जय हो....:)। जब आप प्रमोद सिंह के लिखे को पढ़ेंगे तो दूसरी ही तस्वीर उभरती है जिसे लेकर मैं मुंबई पहुंचा था। अभय तिवारी जी, सबसे दुबले पतले, पर सबसे गुस्सैल, क्या क्लास ली भाई ने मेरी, भड़ास और ब्लागवाणी विवाद पर:)। बोधिसत्व जी...अरे बाप रे...छह फुटा आदमी, बिलकुल हष्ट पुष्ट जैसे राष्ट्रपति के प्रधान अंगरक्षक, जैसे सीमा सुरक्षा बल के कमांडर, जैसे दुष्टों के दलन को आए महामानव....कहीं से कवि नहीं नजर आए:)। अनिल रघुराज जी, सकुचाए, चुप्पा, विनम्र, सहज.....बोलेंगे तो धारधार वरना चुप रहेंगे:)
और इन सभी की खबर ली डाक्टर रुपेश ने, नाड़ी नब्ज टटोलकर:) किसी की वात उठी हुई थी तो किसी की पित्त। अब ये भड़ासी डाक्टर और आयुर्वेद का मास्टर डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव इन मुंबइया ब्लागरों की नब्ज हमेशा देखता रहेगा ताकि कभी उंच नीच न हो जाए:)
उदय यादव जी के साथ मैं पार्टी के दिनों बनारस में काफी कुछ सीखा है, उनसे मिलना बारह पंद्रह साल बाद हो रहा था पर उदय भाई के व्यक्तित्व में कोई खास बदलाव नहीं। वही गठीला शरीर, वही मुस्कान, वही सहजता।
पहली रात डाक्टर रुपेश के पनवेल वाले घर में गुजारी तो दूसरी रात सुमित अरोड़ा के यहां, लोखंडवाला इलाके में। डाक्टर रुपेश के यहां मनीषा दीदी ने बड़े प्यार से मछली पकाई थी। चूंकि डाक्टर साहब खुद शुद्ध शाकाहारी और मांस मदिरा से दूर रहने वाले प्राणी हैं तो मछली पकाने का उपक्रम मनीषा दीदी ने मुनव्वर सुल्ताना आपा के घर पर किया।
दूसरी रात सुमित अरोड़ा के यहां पहूंचा तो भाई ने पृथ्वी थिएटर में लगातार बीमार नामक (अगर नाम न भूल रहा हूं तो) नाटक के शो के टिकट बुक करा लिए थे। इसी दौरान अजय ब्रह्मात्मज जी का फोन आ गया। यहां मैं बता दूं कि अभय तिवारी जी के यहां आने के लिए मैंने वमल वर्मा जी, आशीष महर्षि जी, अजय ब्रह्मात्मज जी को भी संदेश भेजा था पर ये तीनों अपनी व्यस्तताओं की वजह से समय नहीं निकाल पाए। तीनों ही लोगों के फोन या एसएमएस आए कि वे कोशिश करके भी उस टाइम पर उस जगह पहुंच नहीं पा रहे।
तो अजय जी के फोन आने पर बात हुई तो पता चला कि सुमित के घर के ठीक सामने पत्थर मारने भर की दूरी पर (शब्द साभार अजय ब्रह्मात्मज) ही अजय जी का भी घर है। और जब मैं बीयर गटकने के बाद सुमित के बाथरूम से नहाधोकर निकला तो सामने अजय जी को सुमित व उनके दोस्तों से बतियाता पाया। धन्य हो मुंबई वालों का प्रेम। अजय जी से जानकारी मिली की वही नाटक देखने विभा भाभी जी भी जा रही है। अगली सुबह नाश्ते पर अजय जी के घर आने का वादा कर मैं सुमित के साथ नाटक देखने निकल गया। इंटरवल में विभा जी ने खुद ही पकड़ लिया, आप यशवंत जी हैं ना....। मैंने मसाला मुंह में घुलासा हुआ था और एक अपिरिचित जगह पर एकदम से किसी महिला के इस तरह मुझे पहचान लेने से एकदम अकबकाया मैं वो पूरा मसाला गटक गया और फिर तुंरत बोल पड़ा...जी मैं ही हूं। तब भाभी जी ने बताया कि वो विभा हैं और अजय जी ने उन्हें मेरी हुलिया फोन पर बता दी थी। और साहब, मालूम है, कपड़ा कौन पहना था, हरे राम हरे कृष्णा वाला कुरता जो ऋषिकेश में घूमने के दौरान खरीदा था। सो, उस दर्शक वर्ग में एकमात्र मैं आदमी थी जो एकदम से हरा हरा नजर आ रहा था।
अगली सुबह देर से नींद खुली और देर से अजय जी के घर पहुंचे। तोसी कोसी का नाम ब्लागिंग के जरिए मेरी जुबान पर पहले से ही था। तोषी तो लाहौर में हैं, कोसी एकदिन पहले ही हाईस्कूल की परीक्षा देकर आजाद पंछी की माफिक मुस्करा रही थीं। विभा भाभी को प्रमोशन मिला था और उनका बर्थ डे भी था, अजय जी को पुरस्कार लेने का दिन भी वही थी, एक साथ एक ही दिन ढेर सारी खुशियां जश्न उत्सव मनाने का मौका....। ईश्वर ये खुशी बनाए रखे, सबको दे, इसी तरह। गरम गरम पूड़ियां और छोला और सब्जी और चटनी और पापड़ और .....। गले तक नाश्ता किया बोले तो पूरा भोजन ही कर लिया।
इस चार दिनी यात्रा का वृतांत कमोबेश यही है। आशीष महर्षि ने संदेश भेजा कि मिलने के लिए समय न निकाल पाने के लिए वे माफी चाहते हैं.......अरे भाया, इसमें क्षमा जैसी क्या बात आ गई यार, जिंदी रहे तो जरूर मिलेंगे भाया, दिल तो अपन लोग का मिला ही हुआ है, फिजिकल डिस्टेंस का आज के युग में कोई मतलब नहीं है।
तो डाक्टर रूपेश जी, मैंने यात्रा की समरी रख दी। कई चीजें छूट गई होंगी, कई नाम भूल गए होंगे, कई प्रसंग अनुल्लिखत होंगे.....प्लीज....उन कड़ियों को आप जोड़ दीजिएगा, एक नई पोस्ट डालकर।
अंत में, आप सभी हिंदी ब्लागर दोस्तों को, जो भारत से लेकर दुनिया भर के देशों में फैले हुए हैं, दिल से आभार के कहना चाहूंगा कि आप और हम अलग अलग होकर भी जब मिलते हैं तो यूं परिचित लगते हैं जैसे कभी अपिरचय था ही नहीं। मैं इस पूरे घटनाक्रम से अभिभूत हूं।
मुंबई जाने की सोचकर कभी फटा करती थी, वहां कौन है तेरा.....बर्तन माजना होगा, धक्के खाना होगा, कुचलकर मर जाएगा.....टाइप की बातें बताई जाती थीं। और जब पहली बार मुंबई गया तो लगा ही नहीं ये शहर दिल्ली से अलग है, परिचय के मामले में, जीने के मामले में, सहजता के मामले में, रिश्तों के मामले में...। और ये सब है हिंदी ब्लागिंग की बदौलत। मा बदौलत, यह दस्तूर कायम रहे.....।
जय भड़ास
यशवंत
15.3.08
सररर...र...र...र…
vedratna shukla
((ved_baba@yahoo.com))
अभी होली आने में करीब-करीब एक सप्ताह बाकी है लेकिन मन है कि सररर...र...र...र......र कर रहा है। देखिए न! मानता ही नहीं है, कह रहा है जोगीरा सररर...र...र...र......र…। कमबख्त रुकने को कतई तैयार नहीं, पेले हुए है सररर...र...र...र…। सरसों के फूल, फल में बदल गए हैं। अभी कल ही घर बात हुई थी तो पता चला कि कट गई सरसों। मैं वसंत का इंतजार करता रह गया और न जाने कब सरसों कट गई। ठीक से फूल भी नहीं देख पाया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी (‘भी’ के लिए आचार्य प्रवर माफ करियेगा) ऐसे ही इंतजार करते रहे। अपने साहित्याश्रम के तमाम पेड़ों में अगोरते रहे वसंत। आखिर एक पुष्प-बेल फूल कर कुप्पा हो गई और खड़-खड़ाकर आ गया वसंत। खैर, ऐन मौके पर मेरे पास भी आ गया है वसंत। आ ही नहीं गया है, धनुही से तीर भी चला रहा है। सदियों से उसकी आदत जो रही है। खेतों में हरियाली अपने चरम पर है। गेहूं जवान होकर अब अंगड़ाई ले रहा है। रोज धूप ज्यों-ज्यों जवान होती है त्यों-त्यों उसकी जवानी की गंध दिशाओं में फैल जाती है। यह सब कुछ अनुभव आधृत ही है, लेकिन है सौ फीसद सही। मैं तो यहां हूं भारत के दिल दिल्ली में। यहां वसंत का मतलब सड़क पर चमचमाती, शोर मचाती गाड़ियों से है। निवासस्थान पर भी सब कुछ अतिसामान्य है। कार्यस्थल पर भी कोई वसंत नहीं आया, सबकुछ यथावत है। इसी बीच आज ‘वो’ मिल गए। मैंने कहा तूने शर्ते-ए-वफा भुलाई है। वो कुछ बोले नहीं चुपचाप चल दिये। शोर-गुल के इस माहौल में ये पंक्तियां ऊपर वाले तीर-धनुष की वजह से उपजीं। अब तो होली तक मन सरसराता रहेगा। होली के दिन एकदम से
ठेठ हो जायेगा। होली है ही इसीलिए की मन ठेठ हो जाए, तन ठेठ हो जाए, सब कुछ ओरिजिनल अवस्था में पहुंच जाए। लेकिन रह-रहकर दिक्कत हो रही है कि ‘‘अबकी फिर नाहीं जा पाइब होली में घरे।’’
प्रकाशन हेतु निवेदन सहित---
वेदरत्न शुक्ल
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यशवंत सिंह yashwant singh
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6.3.08
वृंदावन का सबसे बड़ा संत... रुस्तम दादा
((दोस्तों, इसे पढ़ते हुए थोड़ा रो लेना अकेले में.....प्लीज पूरा पढ़ना...यशवंत))
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आजकल वृंदावन के बनारसीपने को जी रहा हूं। कल रात चार बजे होटल पहुंचा। बंदरों और कुत्तों से भागते, बचते, भटकते, होटल का रास्ता खोजते। कल शाम और रात के दौरान दो मीटिंग की, उसके बाद सिर्फ और सिर्फ वृंदावन के देसजपने को समझता बूझता रहा। सच कहूं, बिना शाम और रात को जिये किसी शहर को आप समझ ही नहीं सकते, समझेंगे भी तो वो आधा अधूरा और अधकचरा होगा जिसे आप अपनी संपूर्ण सत्य राय बताकर दूसरों के दिमाग पर थोप देंगे। कल की यादगार शाम और रात बिलकुल फक्कड़ी के नाम रही। हर दुकान पर मुंह मारते, पान घुलाते, अनजान और अजनबी लोगों से दोस्ती गांठते, उनसे बतियाते, खामखा दांत निपोरते हुए अपनी अति विनम्रता प्रस्तुत करने के साथ अगले आदमी को प्रभावित करते...... गपियाते ....गोलियाते....।
शहरों, लोगों, गलियों, माहौल, रातें, नदी, रिक्शा, पान.....सभी को आंखों में सजो लेने, जी लेने, महसूस कर लेने को हर पल बेचैन मैं कल रात को दिल से थैंक्यू कहा, उपरवाले को, भाई आज तो मजा बांध दिया। जीवन में हर चीज का दुहराव आज ब्रेक हुआ। ऐसा ही कुछ चाहता हूं रोज। देखो, ये नजारा देखकर पीना पिलाना भूल गया। डिप्रेसन गायब। दिल से पाप रार खत्म। लोग कितने अच्छे हैं। सब कुछ कितना सुंदर है। हर शख्स की जुबान पे है....राधे राधे। रिक्शा वाला आगे किसी को चेतावनी भी देता है तो कहना है राधे राधे। दुकान वाला अपने ग्राहक को देखते ही कहता है राधे राधे। मतलब हर बात में राधे राधे। जय हो राधे राधे।
तो वृंदावन की गलियों में रात के वक्त जो मिनी बनारस की झलक मिली, उसे खूब जिया। इस रिक्शे से उस रिक्शे। यहां से वहां। पैदल तो फिर पैदल ही पैदल। पान घुलाय घुलाय के। चुनरी बंधाय के। टिक्का लगाय के। चेहरा हंसाय के। कोई पाप वाप नहीं है। सब राधे राधे। जीवन कितना बढ़िया है। सब मस्त हैं। राधे राधे।
पर ससुरी निगाह ऐसी है अपनी न कि दुख को बुला ही लेती है। गम को देख ही लेती है। अवसाद को बूझ ही लेती है। भीगी पलकों से भीग ही जाती है। और इन दुखों, गमों, अवसादों, भीगी पलकों के साथ संबल बन खड़ा रहने को चल पड़ता हूं। भांड़ में जाये सुख, भांड़ में जाये राधे राधे। मुझे तो इन रुस्तम के साथ जीना है, दुखी होना है, उन्हें पल दो पल की खुशी देना है ताकि लगे कि वो उतने अभागे नहीं, जितना वो खुद अपने को मानते होंगे। वो बहादुर हैं, दुर्भाग्यशाली नहीं।
65 साल के रुस्तम के रिक्शे पर बैठने और फिर उतरने के बाद गौतम बुद्ध सी अवस्था में आ गया। दुख दुख दुख दुख...। रुस्तम की लंबी दाढ़ी से ही उनकी जात धर्म का पता चल जाता है पर इसका सिर्फ प्रतीकात्मक मतलब है, रुस्तम की ही तरह इसी शहर में या उस शहर में कोई कैलाश भी हो सकता है कोई दुखहरन भी हो सकते हैं कोई गुरमीत भी हो सकते हैं कोई जोजेफ भी हो सकते हैं.....। फिर भी, उनसे पूछ लिया, आपका नाम क्या है दादा?
बोले - रुस्तम।
फिर पूछा, तो फिर इतनी उम्र में रिक्शा काहें को खींच रहे हैं, इतने दुबले पतले हैं आप, क्या दिक्कत है आखिर?
रुस्तम दादा बोले...बेटवा, सब नसीब का खेल है।
थोड़ी चाय वाय साथ पी गई और बातें आगे बढ़ी तो रुस्तम की कहानी सुन आंखें भर आईं। किसी को ऐसी स्थिति में न लाये खुदा।
रुस्तम के चार बेटें और तीन बेटियां हैं। तीनों बेटियों को ब्याह कर उनके घर भेज दिया। चार बेटों में से एक के सात बच्चे हैं, दूसरे के पांच और तीसरे के तीन। चौथा कहीं बाहर रहता है अपना परिवार लेके। बाकी तीनों घर पे, रुस्तम के साथ ही। साथ कहें या सीने पे कहें। रुस्तम के बच्चे जो कमाते हैं उसे अपने बच्चों को खिलाने में गंवा देते हैं। तो रुस्तम क्या करें? अगर अकेले होते तो वो भी दाढ़ी वाढ़ी कटवा कर, पहचान छिपा कर, गेरवा वेरवा धारण कर राधे राधे कहते किसी आश्रम में प्रसाद पाते या फिर किसी मस्जिद पर ही चले जाते, दो चार पैसे जुटाकर खा पी जी लेते....मतलब जिंदगी किसी तरह बसर करने के जो हजार तरीके विकल्प स्थितियां हैं जो दुखदायी अदुखदायी दोनों ही हैं, को अपना लेते। पर 65 साले के अब गये तब गये वाली स्थिति में दिख रहे रुस्तम की मां भी अभी जिंदगा हैं। रुस्तम की बेगम साहिबा भी उन पर निर्भर हैं। तो रुस्तम को अपने अवाला दो और जानों की देखभाल, खिलाने पिलाने जिलाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही हैं और बेटें बेटियां इनमें उनकी एक कौड़ी की मदद नहीं करते या नहीं कर पाते, जो भी हो।
तो रुस्तम ने 65 की उमर में रिक्शा थाम लिया और राधे राधे वाले इस शहर में पूरी अंकड़ के साथ हांफते थूकते मुंह पोंछते सांसें संभालते भरे पेट निकली तोंद वाले स्वामियों, अनुयायियों, संप्रदायियों, यात्रियों....के बीच रिक्शे की घंटी मारते राधे राधे कहते अपने रिक्शे को वनखंडी से रमणरेती और परिक्रमा मार्ग से बस अड्डा ले जाते ले आते। कभी दस तो कभी पांच तो कभी बीस तो कभी कुछ नहीं पाते।
जोड़ गांठकर थक हारकर थूक हांफकर रुस्तम दादा रुपया लुंगी में गंठिया कर घर पहुंचते और अपने और दो स्त्रियों मां व बेगम को खिलाने जिलाने की कवायद में जुट जाते।
मैं सुनता रहा, भींगी आंखों को टपक पड़ने से रोकता रहा। इस पवित्र शहर की इस दुखी आत्मा के जीवन संघर्ष ने मुझे सबसे बड़ा संदेश दिया है। कोई भगवान वगवान नहीं, कोई खुदा वुदा नहीं। सब ढोंग पाखंड है। सब बातें है। सब झूठ है। सब बहकावा है।
रुस्तम की गलती क्या है? रुस्तम को सजा ये क्यों है? पिछला जनम, अगला जनम....सब बेकार की बातें। मन करता है कि गोली मार दूं सबको, एक एक को, सारा उत्सव खत्म हो जाए। सारी हलचल शांत हो जाए। सिर्फ और सिर्फ रुस्तम जिंदा रहे। और मैं देख सकूं उनकी खुशी.....उन्हें सताने, रुलाने, परेशान करने वाली दुनिया के खत्म हो जाने पर उनकी न रुकने वाली पागलों जैसी हंसी, उपर वाले का आभार प्रकट करत हुए कृतज्ञता भरी आंखों के साथ आसमान को निहारते।
पर ये ईंटों, सीमेंट, गाटरों की बड़ी खड़ी दुनिया में संवेदना तो कतई नहीं बसती, इनमें बसने वालों की आत्मा में चतुराई, चालाकी, धूर्तता, मक्कारी, चालबाजी, बनियागिरी, धंधेबाजी, काइयांपना, अवसरवाद.......बसता है। और राधे राधे के आध्यात्मिक इंट्रो के बाद अपने मूल रूप में पूरी विनम्रता के साथ सौदैबाजी धंधेबाजी अवसरवाद मक्कारी ....पर उतर आता है। सखी संप्रदाय के ये पुरुष जो स्त्रियों के वेष में साड़ी पहने मटकते लरजते शर्माते चले जा रहे हैं, उन्हें घंटी मारते हांफते रुस्तम राधे राधे कहकर हटाने की कोशिश करते हैं पर वो हैं कि वो खुद पर टिकी निगाहों को भरपूर समवेत जवाब देते हुए अपिने संप्रदाय के अनोखेपन का वर्णन प्रदर्शन करते चल रहे हैं। रुस्तम ने बड़ी देर की मेहनत के बाद कलेजे से सांस लेते हुए पैडल पर शरीर का पूरा जोर मार मार कर रिक्शे की जो स्पीड बनाई थी, इन सखियों के इसी मचकपने में उस पर ब्रेक लग जाता है। रिक्शा रुका तो रुस्तम की सांसते थामे नहीं थमी, धौंकनी की तरह उठते गिरते सीने से निकलती सांसें मुंह दाढ़ी समेत पूरे बदन को हिला रही थीं। ओफ्फ....क्या करें इस शांति, सुख, सौंदर्य, राधे राधे का......
रुस्तम रुके, थमे, फिर हांफते हुए पैदल ही रिक्शा खींचने लगे। हम उतर गए। रुस्तम से बतियाते, बातें करते सड़क की चढ़ाई पार करने।
रूस्तम ने बीस रुपये मांगे, बीस दिए। बातें शुरू हुईं। चाय पी गई। और उनके दुख से दुखी मैं भीगी आंखें लिए जब यह कहते हुए उनसे अलग हुआ कि रुस्तम दादा, आप बहुत बहादुर हैं। आप इस शहर के असली संत हैं, असली तपस्वी हैं, मुझे गर्व है कि मैंने आपका दर्शन किया। और....मैं आगे बढ़ गया। साथ वाले साथी ने बाद में बताया.....यशवंत, तुमने रुस्तम को रुला दिया।
सोचता हूं, रोने हंसने में कोई खास फर्क नहीं है। अच्छे बुरे में कोई खास फर्क नहीं है। संत राक्षस में कोई खास फर्क नहीं है। जीवन मरण में कोई खास फर्क नहीं है। अवसाद प्रसन्नता में कोई खास फर्क नहीं है। दुख सुख में कोई खास फर्क नहीं है। मेरे होने न होने में कोई खास फर्क नहीं है। आपके कहने न कहने में कोई खास फर्क नहीं है........
और शायद यही शिवत्व है, यही मुक्ति है, यही आनंद है, यही अमरता है.....जिसे पा लेना चाहिए, हम सभी को। हम भड़ासियों को। हम मनुष्यों को......ताकि
हाय हाय मार मार भाग भाग चल चल चढ़ चढ़ काट काट दौड़ा दौड़ा गिरा गिरा सफल सफल हार हार जीत जीत .....के चूतियापे से उबर कर केवल संवेदना बड़प्पन को जिया जा सके......
क्यों भाई लोग, आप लोग क्या सोचते हैं महाराज....कहिए राधे राधे.....
वंदावन के सबसे बड़े संत रुस्तम दादा को सलाम करता हूं क्योंकि ...
1- जाति धर्म मजहब अलग होने के बावजूद वे असल भारतीय हैं। राधे राधे उनकी जुबान से इसलिए नहीं फूटता कि वे बहुसंख्यक हिंदू बहुस शहर में रहते हैं, इसलिए फूटता है कि वृंदावन की ये जुबान है, मैं खुद यहां फोन आने पर राधे राधे करने लगा हूं.....वो फोन चाहे मेरे गांव गाजीपुर से क्यों न आया हो। ये वृंदावन का असर है। यह साझी संस्कृति है। यह मिट्टी की खुशबू है।
2- बुजुर्ग होने के बावजूद, बेटों के मुंह फेर लेने के बावजूद जिंदगी से हार न मानी, रार न ठानी। जिंदगी को जीने की ही राह पर चलते रहे। भले उतना ही पसीना बहाना पड़ रहे हो जितना जवानी में बहाते थे तो कोई फरक नहीं पड़ता था और अब बहा रहे हैं तो पूरा शरीर हिलने लग रहा है।
3- बेटियों बेटों पर उम्मीद करने, उनसे मांगने, उन पर निर्भर होने की बजाय....मुश्किल आने पर खुद दौड़ पड़े अपनी शहर की सड़कों पर, रिक्शा खींचते। किसी से क्यों हाथ पसारे, जब तक है दम में दम, जी लेंगे हम।
4- धर्म, नोटों, मंदिरों, रास, मस्ती, आनंद, मस्ती, ईश्वर....वाले शहर की खुशी से थोड़ा भी दुखी ना होते हुए उनके साथ दिखने रहने की कोशिश करते हुए भी अपने दुख को न बताना, न प्रकट करना, न खोलना। बस अपने काम से काम रखना। यही तो लय है।
5- एक बहादुर इंसान, जिसे किसी पल आई किसी मुश्किल से कोई घबराहट नहीं, कोई ढोंग नहीं, कोई पाखंड नहीं। बिलकुल साफ पारदर्शी जीवन। मुश्किल है तो है, हल कर। आगे बढ़। जिंदगी जी। दुखों से लड़। आगे बढ़े।
जय हो रुस्तम की
जय भड़ास
यशवंत
4.3.08
लंगड़ा पत्रकार
बच्चे बड़े हो रहे हैं। उनकी वो बातें जो दिल छू जाती हैं, सारे दिन के गम भुला देती हैं, जीने की प्रेरणा देती हैं, बच्चों जैसा बनने को कहती हैं.....धीरे धीरे भूलती जा रही हैं। सोच रहा हूं, जब सारी भूल जाएंगी तो फिर तो माथा ही पीटना है, जो याद है आप लोगों से शेयर कर लेता हूं..
-सुपुत्र आयुष दादा ने जिद की कि उन्हें जिमेट्री बाक्स चाहिए। हालांकि उनके क्लास में इस बाक्स की जरूरत कतई नहीं पड़ती पर उन्हें जाने कहां से रट चढ़ गई कि मुझे जेमेट्री बाक्स चाहिए सो ले आया। जब घर आए तो खोला और आयुष दादा बोल पड़े....पापा, ये देखो, ये लंगड़ा पत्रकार है.....।
आयुष के हाथ में लंगड़ा प्रकार था, जिसे मैं आज भी लंगड़ा प्रकार बोलता हूं क्योंकि बचपन से यही बोलता, पढ़ता,सुनता आया हूं...और शायद ये मेरे देहातीपन का ही असर होगा कि लंगड़ा प्रकार को आयुष दादा लंगड़ा प्रकार की जगह बोलने में अपनी तोतले जुबान में लंगड़ा पत्रकार बोल गए। पर कितना सही बोला....हम सब तो लंगड़ा पत्रकार ही हैं ना, उस फिल्म के लंगड़ा त्यागी की तरह....।।।
-सिम्मी दीदी जब कुछ बरस पहले मेरठ में थीं तो एक दिन रानी मुखर्जी की फिल्म आ रही थी, एकदम से बोल पड़ी, पापा देखो...मुखा रानी जी की फिल्म आ रही है....। और हम सब लोग हंस पड़े। वो रानी मुखर्जी तो सुनती थी पर उसे जाने क्या कनसीव किया कि बोलने के वक्त बजाय रानी मुखर्जी बोलने के वो मुखा रानी जी बोल पड़ीं। यकीन मानिए, मैं आज भी रानी मुखर्जी को खुद मुखा रानी जी कह कर बुलाता हूं। बड़ा मजा आता है बच्चों जैसा बनकर जीने, बोलने और करने में...:)
-बच्चों का आजकल एक्जाम चल रहा है। कल आयुष दादा अपनी मम्मी के पास गए किचन में और बोल पड़े...मम्मी, मम्मी....मैंने नल कर लिया है....। बेटा पहली बार लर्न को हूबहू बोलना चाह रहा था क्योंकि सिम्मी दीदी यही बोलती थीं, जो उनकी टीचर सिखाती थीं, कि बेटा जाओ लर्न करो और सिम्मी दीदी घर पर कहती थीं कि पापा ये मैम ने लर्न करने को दिया था और देखो मैंने लर्न कर लिया। तो उनका सुन सुन के आयुष दादा का कपार कुफुता गया था और एकाएक बोल पड़े...मम्मी मम्मी देखो, मैंने नल कर लिया है। और मम्मी हैं कि बजाय तारीफ करने के पूरा जबड़ा खोल के हा हा हा हा करने लगीं और बाद में बोलीं ..बेटा नल नहीं लर्न....।
-इसी तरह आयुष गमला को गलमा, खिड़की को खिकड़ी बहुत दिनों तक बोला करते थे और वो जब तक बोलते रहे, हम लोग बच्चों को देखकर मुग्ध होते रहे। आज भी मुग्ध होते हैं, काश हम इन जैसे हो पाते।
जय भड़ास
यशवंत
सुनले हुअ कि नाही-होली में चोली सिलबावे ला बुढ़बा
पंकज पराशर
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लोग कहते हैं होली का असली मजा ब्रज में आता है, मगर दो-तीन-सालों तक जब मैंने बनारस की होली देखी तो भैया होली में हर बार मन बनारस ही भागता है। तमाम गंभीरता और सोफिस्टीकेशन का लबादा उतरकर अस्सी घाट पर गिर जाता है जब अस्थि-पंजर वृद्ध भी होलियाते हैं- जा रजा पिछबाड़ा संभाल के...सुनले हुअ कि नाही-होली में चोली सिलबावे ला बुढ़बा...और गालियों का आलम यह है कि बहुत मासूमितय से गुरु लोग स्वीकारते हैं, अरे नाहीं बुजरौ वाले के हम कब ले गाली देली मरदे? तो जनाब सोफिस्टीकेटेड मरदे जो हैं न, वह औरत की तरह नजरें नीची करके हँसते रह जाते हैं। ऐसे में होली से पहले जो गलती-कुगलती से दुश्मन नामक विशेषण के दायरे में चले जाते हैं वो भी होली में चोली सिलवाकार साथ पहनाने के लिए निकल पड़ते हैं। होली बीतने के सप्ताह भर बाद तक दर्जियों के यहां गुरु लोग पेल्हड़ (नैतिकतावादी साहब लोग माफ कीजिये, वहां यही शब्द फगुआ में हर खास-ओ-आम प्रयोग में लाते हैं) और चोली के बीच रिश्ते के लिए बरइछा कराने की तैयारी में मुब्तिला हो जाते हैं।
एक अंग्रेज सज्जन अस्सी के पास के एक मोहल्ले भदैनी में एक भदेस पंडितजी से काशी की प्राचीनता के बारे में पूछ रहे थे। पंडित जी ने इत्मीनान से कहा कि अगर आपकी रूचि यहां के इतिहास में है तो आप जाकर बी.एच.यू. के डाक्टरों-प्रोफेसरों से मिलिये...और फिर साहब काशी के इतिहास को उन्होंने शरीर के उन-उन महिला और पुरुष अंगों के साथ जोड़कर बताना शुरु किया जिसके बारे में यहां बताने पर नैतिकतावादी लोग भड़ास को और ज्यादा बदनाम करेंगे। हम वहां जा रहे हैं। लौटकर तो लिखेंगे ही, संभव हुआ तो पल-पल की खबर उसी दिन वहीं से भड़ास पर लिखेंगे।
--पंकज पराशर
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यशवंत सिंह yashwant singh
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गीतकार रमेश रमनः गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला.....
((पिछले दिनों हरिद्वार यात्रा पर था तो कई पोस्टों के जरिए कई कई अनुभवों, मिलाकातों, भ्रमण आदि के बारे में बताया था। पर एक चीज छूट गई थी जो शायद सबसे कोमल चीज है। हरिद्वार के बसे और देश भर में मशहूर गीतकार रमेश रमन से मुलाकात। डा. अजीत तोमर के सौजन्य से जब रमेश रमन जी से मिलने उनके आफिस पहुंचे तो उस वक्त आफिस बंद होने का समय हो चला था। ढलती हुई शाम के वक्त रमन जी के आफिस में हो शुरुवाती परिचय होने के बाद जो स्वर लहरियां फूटीं तो रुकने थमने का नाम ही नहीं लेतीं। मुझसे रहा नहीं गया, कागज कलम उठाकर तुरंत नोट करने लगा। शब्द जितने अच्छे, स्वर उतना ही उत्तम। ये संयोग, ये मेल बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। अगर संक्षेप में कहूं कि मेरी हरिद्वार यात्रा का सबसे कोमल पक्ष व सबसे संवेदनशील पक्ष कोई रहा है तो वो रमेश रमन जी से मुलाकात ही है। देर से ही सही, मैं रमन जी द्वारा लिखित कई गीतों, कविताओं को यहां नीचे भड़ासियों के लिए डाल रहा हूं। मैं तो इन सभी को उनके कोमल कंठ से मय राग के सुन आया हूं इसलिए मैं तो इन लाइनों के पिछे छिपे धुन व संगीत को भी महसूस कर पा रहा हूं व बैठे बैठे गुनगुना भी रहा हूं। आप लोग फिलहाल पढ़िए, कभी मौका मिला तो भड़ास सम्मेलन के दौरान रमन जी को बुलाया जाएगा...जय भड़ास, यशवंत))
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1.
तू अगर पुरवाई है तो
तू अगर पुरवाई है तो बादलों के साथ आ
प्यास धरती की बुझा, ये पेड़ पौधे मत हिला
खेत की क्यारी है सूखी, आ जरा यहां घूम जा
भीगे भीगे होठों से तू, क्यारी क्यारी चूम जा
झरनों को दो जिंदगी, कुछ नदी का कर भला
तू अगर पुरवाई है तो...............
धूल धरती की उड़ा मत, देख फूलों को सता मत
दर्द सोये तू जगा मत, प्यास को पागल बना मत
गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला
तू अगर पुरवाई है तो...............
प्यास की तू अंजुली भर, कुछ दान कर कुछ पुण्य कर
आके पेड़ों को नहला जा, कर कृपा इन फूलों पर
परियों की तरह उतरकर, परिंदों को झुला झूला
दू अगर पुरवाई है तो................
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2.
बिन आहट के आ जाते हो
बिन आहट के आ जाते हो
आंखों को नहला जाते हो
बहुत सताते हो पलकों को
सांसों को उलझा जाते हो
बिन आहट के......
सागर के पानी से खारे
कैसे कह दें तुम हो हमारे
कितने राज छुपा जाते हो
अंदर कुछ पिघला जाते हो
बिन आहट के .....
तुम ममता की गोद पले हो
तुम यादों के बहुत सगे हो
कितने दर्द जगा जाते हो
दिल को बहुत दुखा जाते हो
बिन आहट के ......
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3.
आम कट गया
आम कट गया
शीशम ने तो देखकर
आंखें फेर लीं
पीपल ने पूजा का
बहाना बनाकर
मौन धारण किया
बरगद को अपने बुढ़ापे
का खयाल आया
कुछ नहीं बोला
और......
आम कट गया
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4.
अस्तित्व की कविता सुनें
आओ कभी किसी वृक्ष से अस्तित्व की कविता सुनें
या फिर कभी किसी फूल से व्यक्तित्व की कविता सुनें
जीना का दर्शन सरल मिल जायेगा निश्चित है ये
आओ कभी किसी दीप से अपनत्व की कविता सुनें
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5.
तुम्हारा मेरा साथ
तुम्हारे पास अर्थ बहुत है
मेरे पास शब्द बहुत हैं
आओ, थोड़ी दूर तक चलें
शब्दार्थ बनकर
जीवन के भावार्थ से मिलने
विश्वास रखना
तु्म्हारे अर्थ का अनर्थ नहीं होने दूंगा
तुम्हें भी ध्यान रखना होगा
कि मेरा कोई भी शब्द
अपशब्द की संज्ञा न पा जाए
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उपरोक्त सभी गीत व कविताएं गीतकार रमेश रमन द्वारा रचित हैं। आप रमन जी से उनके निवास के फोन 01334-220749 और कार्यालय के फोन 01334-227904 पर फोन कर संपर्क कर सकते हैं।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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28.2.08
लड़की का नाम रुचिका, लड़के का नाम नासिर....संदर्भ वो पतिता फिर भाग गई ...पार्ट टू
पिछले दिनों पतिता सीरिज में दो पार्ट में मैंने दो स्त्रियों की सच्ची कहानी लिखी, दूसरी कहानी मेरठ के जिस लड़की की थी, जिसने एक मुस्लिम लड़के से प्रेम विवाह किया था और घर से भाग गई थी.......लंबी कहानी, उसका इंटरव्यू दैनिक जागरण मेरठ संस्करण में प्रकाशित किया था उस वक्त। उस बारे में मेरे अनन्य मित्र और दैनिक जागरण मेरठ की शोध व लाइब्रेरी टीम के इंचार्ज राकेश जुयाल ने मुझे मेल से जानकारी दी कि उस लड़की का नाम रुचिका था, और वो लड़का नासिर नाम का था। बाद में हाईकोर्ट ने उन दोनों को एक साथ रहने व समाज के ठेकेदारों को उनकी जिंदगी से दूर रहने का निर्णय सुनाया था।
साथी राकेश जुयाल का दिल से आभार जो उन्होंने यह महत्वपूर्ण तथ्य मेल के जरिए मुझे भेजा। मैं उनके पत्र को यहां हू ब हू प्रकाशित कर रहा हूं ताकि जिन लोगों ने उस स्टोरी को पढ़ी होगी, वे ये तथ्य भी जान लें। जिन लोगों ने वो स्टोरी नहीं पढ़ी होगी वो.....वो पतिता फिर भाग गई...पार्ट टू....शीर्षक से पिछले दिनों भड़ास में प्रकाशित पोस्ट जरूर पढ़ें।
जय भड़ास
यशवंत
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RJuyal to me
show details 23 Feb (5 days ago)
यशवंत जी वो लड़की रुचिका जिसे आपने क्फ्.फ्.भ् को पहले पेज पर बाई लाइन अपने नाम से छापा था ,दुविधा के दोराहे पर खड़ी हुई जिंदगानी , शीर्षक से प्रकाशित किया था । ख्फ् मई को रुचिका फिर नासिर के साथ भाग गई
ख्� मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की हां के बाद चले महानगर के प्रेम दीवाने
जाति-धर्म से ऊपर प्रेम की जीत हुई जिसे कोर्ट ने भी स्वीकार किया ।
राकेश जुयाल
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हिजड़े प्रेस में हैं या प्रेस वाले हिजड़े हैं ???
इस बार मथुरा वृंदावन की यात्रा अपनी कार से की। एक मित्र के साथ। सूंय सूंय करते हुए 120 की स्पीड में। रास्ते में रुकते, खाते, चबाते, गाल बजाते....पता ही नहीं चला कब पहुंच गए। दो दिन बाद वहां से आज दिल्ली पहुंचा तो नोएडा, सेक्टर 12-22 के पास रूका। यहां मेट्रो हर्ट हास्पिटल है, बगल में दारू शाप है, थोड़ी दूर पर आंटी की मशहूर नानवेज शाप है, बड़ा सा पार्क है, पराठे वाली की लजीज दुकान है....माने यह जगह मेरी प्रिय जगहों में से एक है। मयूर विहार फेज थ्री वाले अपने घर से निकलने के बाद दाएं बाएं कहीं निकलने का मन होता है तो इसी अड्डे पर पहले पहुंचता हूं। सुबह के वक्त पहुंचने पर लजीज पराठे खाने के बाद पार्क में देह सीधा कर लेटने में बड़ा आनंद आता है। यहां ढेर सारे लोग सोते व गपियाते मिल जाएंगे।
आज जब दिल्ली पहुंचे तो घऱ पहुंचने से पहले इसी अड्डे पर रुका। पराठे खाया। पान खाया। पार्क में थोड़ी देर के लिए बैठ लिया। गपियाने बतियाने के बाद जब चलने को हुए तो फिर पान खाने के लिए दुकान पर रुके। बगल में हिजड़े साथियों की हलचल दिखाई दी। कोई आ रहा है तो कोई जा रहा है। मेरी उत्सुकता बढ़ी। दाएं बाएं नजर दौड़ाने पर पता चला कि दो गाड़ियां फुल हैं इन साथियों से। दोनों गाड़ियों में एक एक ढोलक। साड़ी और सलवार सूट पहने इन हिजड़ा साथियों को देखते हुए पहले तो डा. रूपेश श्रीवास्तव की शिष्या मनीषा याद आईं जिन्हें आजकल डाक्टर साहब ब्लागिंग सिखा रहे हैं। फिर मुझे वो शब्द याद आया जिसे डा. रूपेश इन लोगों के लिए यूज करते हैं, लैंगिक विकलांग। यह शब्द वाकई सही शब्द है जो इनकी स्थिति को हू ब हू अभिव्यक्त करता है।
पर यह क्या? इन दोनों गाड़ियों पर तो प्रेस लिखा है !! कहीं ये हिजड़े प्रेस वाले तो नहीं....?? या कहीं प्रेस वाले हिजड़े तो नहीं हो गए ?? माजरा क्या है ?? मैंने अपनी उत्सुकता अपने साथी को बताई तो उन्होंने मेरी बात पर हंस दिया। बोले, बड़ा जोरदार है यह वाक्य....कहीं प्रेस वाले हिजड़े तो नहीं, कहीं हिजड़े प्रेस वाले तो नहीं ??
कुछ यूं भी कहा जा सकता है....प्रेस की जो हालत है भइया, उसमें तो अब हिजड़े भी प्रेस वाले बन गए हैं...या प्रेस की हालत ये है कि प्रेस के काम के लिए हिजड़े भर्ती किए जा रहे हैं....या प्रेस इतना आसान है कि अब हिजड़े भी प्रेस में घुस जा रहे हैं....
ढेर सारे कुतर्क गढ़े जा सकते हैं लेकिन एक बात तो सच है कि प्रेस शब्द का गाड़ियों पर जिस कदर गैर प्रेस वाले लोग इस्तेमाल करते हैं, वो सरासर गलत है। सिर्फ इसलिए कि पुलिस वाले रोकेंगे नहीं, ट्रैफिक वाले टोकेंगे नहीं, चोर-उचक्के झांकेंगे नहीं, इस कारण हर कोई प्रेस लिखा लेता है गाड़ी पर।
मेरे साथ थोड़ा उलटा रहा है। 12 वर्ष के पत्रकारीय जीवन में कभी अपनी गाड़ी पर प्रेस नहीं लिखवाया। कभी एकाध बार स्टीकर चिपकवा लिया हो, चुनाव या दंगे के समय तो अलग बात है वरना पता नहीं क्यों प्रेस लिखवाना कभी पसंद नहीं आया। इसके पीछे एकमात्र वजह शायद यही है कि असली प्रेस कर्मी को कभी अपनी पहचान बताने के लिए प्रेस कार्ड नहीं दिखाना पड़ता और प्रेस शब्द नहीं लिखाना पड़ता। पत्रकारिता अगर आपकी आत्मा और देह में हैं तो वो आपके चेहरे व शब्दों व बोली से भी टपकती है, दिखती है।
खैर, माफ करना, अगर किसी को हिजड़े व प्रेस में तुलना करने पर बुरा लगा हो क्योंकि ये तुलना करने का मामला नहीं बल्कि प्रेस शब्द के दुरुपयोग का मामला है।
वैसे मेरे दिल से पूछेगे तो यही कहूंगा कि हिजड़े जितने इमानदार व साहसी होते हैं, प्रेस में 90 फीसदी से ज्यादा लोग उस लेवल के नहीं होंगे। बोले तो अगर प्रेस वाले हिजड़ों जितना मिशनरी, साहसी व इमानदार व दमदार हो जाएं तो प्रेस का कल्याण हो जाए। पर यहां तो तेलुओं, चमचों, क्लर्कों, चारणों, भाटों, बलात्कारियों, व्यभिचारियों, बौद्धिक दिवालियों, दलालों, अशिक्षितों, छिछोरों, बेवकूफों... का ही जमावड़ा है जो प्रेस के नाम पर हर वो गलत काम कर रहे हैं जो प्रेस वाले को न करने के लिए कहा गया है, बताया गया है, समझाया गया है।
लगे रहो .....
जय भड़ास
यशवंत
8.2.08
दारूबाजी के फंडे
दारूबाजों के बारे में एक से एक किस्से हैं। मेरे एक मित्र ने बताया कि उनके गांव में एक दारूबाज है जो महीने भर लगातार दिन रात पीता रहता है, माने की टुन्न रहता है। महीने भर ज्यों बीतता है, वह छोड़ देता है, पूरे एक महीने के लिए। फिर वह बिलकुल नहीं पीता महीने भर। उसके बाद जो महीना आता है उसमें फिर वह दिन रात टल्ली रहता है। जब उसका पीने वाला महीना आता है तो उसके पड़ोस वाले बोल पड़ते हैं--लो, पग्गल तो गया। इसके पीने के दिन शुरू हो गए।
और इन पीने वाले दिनों में पग्गल किसी से कुछ नहीं बोलता। बस, वह नशे में रहता है, चिंतन करता रहता है। खाता है और पीता है और सोता है और चिंतन करता है। बस, और कुछ नहीं करता। इन दिनों में वह न घर का न खेत का न मवेशियों का, कोई काम नहीं करता। घर उसके बाकी परिजन चलाते हैं। वह तो सिर्फ नशे में तपस्या करता रहता है।
भई, इन सज्जन के बारे में जानकर मुझे उत्सुकता हो पड़ी है इनसे मिलने के लिए। हां, ये बुलंदशहर जिले के एक गांव के रहने वाले हैं। अगर किसी टीवी वाले भइया को ठीकठाक ब्रेकिंग न्यूज चाहिए तो वहां चला जाए, उनके पीने वाले दिनों की रिकार्डिंग कर ले फिर बिना पीने वाले महीने की उनकी जिम्मेदार व सक्रिय ज़िंदगी की तस्वीर उतार ले, बस हो गया अजब-गजब और परोस दे ब्रेकिन न्यूज बनाके।
एक अपना मित्र था, कानपुर में। उसका भी एक तगड़ा नियम था। वह पीता तो था लेकिन केवल पहला पैग। आप उसके पहले पैग में या एक बूंद दारू दो और बाकी पानी भर दो या पहले पैग में गिलास में केवल निट दारू भर दो, वो मना नहीं करेगा, पी जायेगा। लेकिन उसके बाद दूसरा पैग किसी हालत में नहीं ले सकता। धरती डोल जायें, चांद-सूरज खिसक जायें, पर भाई दूसरा पैग नहीं लेता तो नहीं लेता। उसका यह फंडा हमने हमेशा देखा, बहुत जिद की दूसरा पैग पिलाने को पर भाई ने नहीं पिया तो नहीं पिया। बाद में हम लोगों ने उसके इस नियम को सराहा और सभी दारूबाजों को इसी नियम पर चलने की सलाह दी। सलाह देने में क्या जाता है। भले सलाह खुद फालो करो न करो। यही तो अपने डेमोक्रेसी में मजा है।
एक मेरे और मित्र हैं। वो या तो नहीं पीते हैं। जब पीते हैं तो एक दो पैग पर नहीं रखते। उनका मानना है कि इतना पी लो कि होश ही न रहे। मतलब, वो कम से कम अद्धा तो खत्म ही कर देते हैं। अगर बेहोशी युक्त नशा न हुआ तो फिर एक क्वाटर मंगा लेते हैं। और, आखिर में वो खाली बोतलों को सिर पर रखकर, अदभुत संतुलन साधते हुए नाचने लगते हैं। एकदम मुक्त और मोक्ष की अवस्था में आ जाते हैं। फिर वो अपने लोकधुनों को गा-गाकर रोते हैं, अपने अतीत के सुंदर जीवन को याद करते हैं और वर्तमान के चूतियापे को गरियाते हैं।
एक अन्य साथी हैं। उनका फंडा ये है कि वो अपने पैसे से न पीने की बात करते हैं। पर उन्हें दो पैग कोई पिला दे तो वो एटीएम कार्ड व नगद सामने रख देते हैं। उसके बाद उनके पैसे से चाहें जितना पियो, वो कतई बुरा नहीं मानेंगे, लेकिन अगर शुरू में ही आपने उनसे कह दिया कि आज जरा पिलाइए, तो भाई ऐसा करारा बहाना बनाकर निकल लेगा कि पूछो मत। लेकिन उन्हें आप खुद ही आफर कर दें और एक क्वाटर के दो पैग पिला दें तो फिर वो अपने पैसे से बोतल मंगा लेंगे।
तो ये दारूबाजों के दारूबाजी संबंधी चार फंडे व चार व्यक्तित्व हैं। अब ये न पूछिये, मेरा वाला फंडा क्या है। वो बाद में बताऊंगा। हां, इतना जरूर बता दूं कि मैं एक तो अच्छा खासा गैप देता हूं, नये साल के पहले दिन से ही। वीकेंड पर मटन-चिकन बनाता हूं तो साथ में एक क्वाटर भी ले आता हूं। बस, एक एक घूंट सिप करते हुए प्याज लहसुन काटते, मांस धोते और पकाते निपटा देता हूं। उसके बाद छककर खाता हूं। सुबह उठकर इतना भयंकर एक्सरसाइज करता हूं कि रात का पिया हुआ गायब हो जाता है। मतलब, ड्रिकिंग विथ नानवेज। और सुबह उठकर साइड इफेक्ट दूर करने के लिए प्राणायाम।
तो ये मेरा वाला मिलाकर पांच फंडे हो गए। अगर आपको भी कोई ऐसा दारूबाज मिला हो जिसका दारूबाजी को लेकर कोई फंडा हो तो जरूर भड़ासियों को बताएं। कम से कम मैं तो चाव से पढूंगा इसे।
डाग्डर साहब को यह पोस्ट बकवास लगे या बिंदास, पर मुझे तो ऐसी गपोड़ी चर्चाएं व बतकही करने में बड़ा मजा आता है। मैं जब भड़ास पर लिखता हूं तो देस, समाज, जिम्मेदारी व नैतिकता को भेज देता हूं तेल लेने के लिए। आनलाइन कोई तो स्पेस ऐसा हो जहां दिल की बात लिखी जा सकती हो, और वो स्पेस भड़ास देता है, मेरा अपना स्पेस.....।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: अनुभव, दारूबाजी, पीना-पिलाना, भड़ास, संस्मरण
3.2.08
उनकी आस्था का फूल कबकी झर गया होगा...अवनींद्र कमल-अंतिम भाग
शहर की तंग बस्ती से काफिला गर गया होगा
किसी मुफलिस का बच्चा फिर कुचल कर मर गया होगा
किसे फुरसत है, उसके हाल पर अफसोस करने की
जो मजदूरी के बदले मार खाकर घर गया होगा
हुई है मौत उसकी छटपटाकर भूख से लेकिन
तुम्हें लगता है कोई कत्ल आकर कर गया होगा
गंगा में नहाकर कार से वो लौट आया है
कभी ये सोच मत लेना कि सचमुच तर गया होगा
जो करजे में ही डूबे हैं, वो क्या डुबकी लगायेंगे
उनकी आस्था का फूल कबका झर गया होगा
वसूली के लिए जब रात में छापा पड़ा होगा
पुलिस को देखकर के गांव सारा डर गया होगा
-अवनींद्र कमल
और अंत में...
शहर की सनसनी में खो गई है याद गांव की
नन्हों को सुनाये लोरियां अब कौन माओं की
मुझे लगता है गंगा शर्म से खुद डूब जाएगी...अवनींद्र कमल-पार्ट वन
बनारस उन दिनों धर्म की वजह से कम, सांप्रदायिक तनाव और मारामारी के लिए ज्यादा जाना जाता था जब अवनींद्र कमल बनारस में अध्ययन के लिए गए हुए थे। एक बेहद सामान्य परिवार का नौजवान हिंदी साहित्य के लिए कुछ करने की मंशा लेकर पढ़ाई-लिखाई करता रहा, साथ ही बनारस की संवेदना को भी पकड़ने की कोशिश में लगा रहा। उसे जो समझ में आया, उसे लिपिबद्ध किया। तब दुबला-पतला अवनींद्र कमल मंचीय कविताई में उभरता हुआ सितारा था और उसने इसी कर्म में अपना जीवन लगाने की ठानी थी। पर होता वो कब है जो सोचा होता है, होता वो है जो कभी न सोचा।
मंचीय कविता में कुछ ही दिनों की मेहनत के बाद नाम कमाने से चमका यह सितारा रोजी-रोटी और घर-गृहस्थी चलाने के लिए इस कदर गंभीर संकट में पड़ा कि उसे दो हजार रुपये की नौकरी पर पत्रकारिता में ट्रेनी का करियर शुरू किया। अमर उजाला के बाद अब दैनिक जागरण में उप संपादक हैं, पश्चिमी यूपी के एक जिले बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ हैं। जब उन्हें अपने गांव, माटी, मंचीय कविताई आदि की याद आती है तो रुवांसा होकर कमल बोलते हैं--ज़िंदगी साली लौंड़े लग गई, घर-गृहस्थी चलाने में।
अपने पुराने दिनों की सीडी देखकर कमल खुद को तसल्ली देते हैं, एक दुबला पतला नौजवान बड़े बड़े दिग्गज मंचीय कवियों के बीच माइक संभाल कर लगातार गाये-बोले जा रहा है और पब्लिक ताली पीट रही है। उन दिनों का दुबला-पतला नौजवान अब भरे गाल और शरीर वाला हो चुका है, कुछ ठीकठाक घर-गृहस्थी और नौकरी चलने की वजह से और कुछ दारूबाजी के कारण।
यहां अवनींद्र द्वारा लिखित कुछ कविताएं डालना चाहूंगा जिन्हें मैं शुरू से बेहद पसंद करता रहा हूं। फोन पर अवनींद्र ने ये लाइनें नोट कराईं, हालांकि सच ये भी है कि इधर पिछले पांच छह सालों में अवनींद्र ने कुछ नहीं लिखा है। आप कह सकते हैं कि एक प्रतिभा ने दुनियादारी के चक्करर में असमय दम तोड़ दिया। हममें से ज्यादातर का यही हाल है, करना कुछ चाहते थे, कर कुछ रहे हैं....चलिए, कमल बाबू को पढ़ते हैं...
जय भड़ास, यशवंत
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उन दिनों का बनारस
अजी देखो बनारस शहर की ये तंग गलियां हैं
यहां गंगा के पानी में कई प्यासी मछलियां हैं
न अब सुबहे बनारस है, न अब वह मौज मस्ती है
जहां पर देखिये अब देखिये फिरकापरस्ती है
कि हत्या और बलवा इस नगर की शान है भाई
यहां पूजा गृहों में बिक रहा इमान है भाई
यहां पंडों की किलकारी से मंदिर गूंज जाते हैं
सुना है इस शहर में देवता भी घूस खाते हैं
दबी इतिहास के खंडहर में कबिरा की कहानी है
वो खाली पेट जो सोई हुई है नौकरानी है
यहां तुलसी की चौपाई की हत्या रोज होती है
स्वयं सीताओं को ही रावणों की ही खोज होती है
गूंगे पेट की शहनाई चारों ओर बजती है
पुजारी की तपस्या से अब लैला उपजती है
खड़ी इतरा रही जो ये गगनचुंबी हवेली है
इसी के सामने फैली कई खाली हथेली है
कि तन की नग्नता से सभ्यता भी उब जाएगी
मुझे लगता है गंगा शर्म से खुद डूब जाएगी
31.1.08
हरिद्वार की ठंडी, धर्म की सरगर्मी, डा. बुधकर और तोमर संग चाय की चुस्की
हरिद्वार की भयंकर ठंडी ने तो दिल्ली की सर्दी को पछाड़ दिया। उंगलियां कड़कडा के यूं ऐंठी हैं कि हिलने डुलने से मना कर रही हैं। इस शहर में आज दूसरा दिन है और दो दिनों में इतनी सारी बातें हुईं कि अगर सभी को बताने बैठूंगा तो जाने कितनी पोस्टें किलो किलो भर की लिखनी पड़ेंगी। संक्षेप में, कुछ बातें...
-इंटरनेट की आभाषी दुनिया के जरिये बने मित्रों से वास्तविक दुनिया में मिलन हुआ। डा. कमलकांत बुधकर और डा. अजीत तोमर, दोनों ही ब्लागर, से मिलना न सिर्फ यह भरोसा दिलाने वाला था कि कमीनों की इस दुनिया में अच्छे अभी बड़ी संख्या में हैं, और ये संख्या, इंशाअल्लाह, ब्लागिंग व ब्लागरों के चलते और ज्यादा बढ़ने वाली है।
-हरिद्वार में उतरने से पहले ही डा. अजीत तोमर का स्नेहिल आमंत्रण आ चुका था कि आप पहले मेरे यहां आएंगे, चाय पियेंगे, फिर जाना हो जाएंगे। मैं हरिद्वार में सिंहद्वार पर उतरा और थोड़ी ही देर में डा. अजीत हाजिर। उनकी बाइक पर उनके कमरे पहुंचा। दो दो पैग चाय के बाद बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं और देखते देखते उनकी जि़द आ गई कि आज रात यहीं गुजारें। उनके साधिकार अनुरोध को टाल न पाया। बतियाते बतियाते कब नींद आ गई, पता न चला।
-सुबह सवेरे उठने की मेरी कोशिशें हमेशा बेकार होती हैं सो देर से उठा और फिर डा. कमलकांत बुधकर जी का आदेश पहुंचा कि यशवंत जी को लेकर मेरे घर आओ। हम दोनों डा. बुधकर जी के यहां पहुंचे। विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के रीडर डा. बुधकर न सिर्फ बेहद अच्छे इंसान बल्कि एक सच्चे दोस्त बन गए, थोड़ी ही देर की बातचीत के बाद। लगे हाथ उन्होंने भड़ास की मेंबरशिप ले ली और इंट्रोडक्टरी पोस्ट भी प्रेषित कर दी।
-धूप में चाय पीते हुए बुधकर जी को सुनना मजेदार अनुभव रहा। महाराष्ट्र के सतारा के बुध गांव के होने के नाते बुधकर पर जब बुध गांव पहुंचे तो वहां कोई अपने नाम में बुधकर नहीं लगाता, पता चला कि जो लोग अपने गांव से बाहर निकले उन्होंने ही अपने नाम में गांव के नाम के साथ कर जोड़ लिया....गावस्कर, बुधकर, मंजरेकर.....आदि आदि। डा. बुधकर जी ने ब्लागर मीटिंग का प्रस्ताव भी रखा, जिसे उन्होंने अपनी पोस्ट में भी लिखा है।
-डा. बुधकर से मिलना, उनको सुनना, उनके लिखे को पढ़ना....बेहद सुखद अनुभव है। अनुभवों की जो थाती, शब्दों का जो शिल्प, बयान करने का अंदाज़, व्यक्तित्व की सहजता...ये सब चीजें उन्हें कुल मिलाकर ऐसा बना देती हैं कि उनसे बार बार बतियाने गपियाने सुनने और जीने का मन करता है।
-डा. अजीत मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं और गुरुकुल कांगड़ी विवि में ही शोध किया और अब यहीं अध्यापन करने लगे हैं। उम्र तो ज्यादा नहीं है लेकिन संवेदना इतनी गहन की जैसे छोटी सी छोटी चीज उनकी निगाह से छूट नहीं पाती। इन चीजों को वे कविता के रूप में आकार देने की कोशिश करते हैं। उनके ब्लाग पर आप कविताएं ही पायेंगे। उनकी मेहमाननवाजी देखकर मैं सोचने लगा कि इस शख्स से पहले कभी मिला नहीं और पहली ही मुलाकात में इतना अपनापा। शायद एक समान सोच व संवेदना के लोग जब मिलते हैं तो लगता है कि जमाने से मिले हुए हैं, बिछ़ड़े ही कब थे।
-डा. अजीत के साथ हरिद्वार घूमने के बाद आज मैंने उन्हें विदा किया और फिर खुद घूमने निकला। हर की पैड़ी के साथ साथ आसपास के पूरे इलाके को घूमा। कुछ यूं दिखा सारा मंज़र...
हर जगह धर्म से जुड़ी दुकानें
कंठी, माला, कपड़े, शंख,
किताबें, प्रसाद, कैसेट,
पूजा का सामान, तस्वीरें
पंडे, लाइन से बैठे भिखारी,
गंगा में डुबकी लगाते श्रद्धालु,
पैसे लेकर ग्रुप फोटो खींचते फोटोग्राफर,
गंगा में डुबकी लगाकर पैसे बीनते लड़के,
रसीद काटकर पैसे मांगती महिलाएं,
गरीबों को भोजन खिलाने का
आह्वान करते ठेले वाले दुकानदार,
धार्मिक गीतों का शोर मचाकर सीडी
व कैसेट बेचते लौंडे,
पतली-पतली गलियां,
ताजी ताजी छनतीं पूड़ियां,
बड़े बड़े धर्मशाले, गेरुआ धारी साधु संत
और इन सबको अगल बगल बसाये
कल कल करतीं बहतीं पावन गंगा,
गंगा को चुनरी ओढ़ाये खड़े बड़े पहाड़
चुपचाप देखते निहारते सदियों से.....
सब कुछ धर्ममय और सबके पीछे पैसे का खेल
बस निष्पाप और निष्कलुष गंगा दिखीं
और पहाड़ दिखे, बाकी सब के मन में
थोड़ा थोड़ा खोट,
जैसे पैसे की जगह
मांग रहे हों रुपये रूपी वोट...
हरिद्वार की ठंडी को मात करती है
सिर्फ धर्म के धंधे की जोरदार गर्मी
लगता है जैसे मौसम सिर्फ धर्म
और भक्ति को बेचकर पैसे बनाने का है।
बातचीत करने पर पता चला कि स्थानीय लोग तो सिर्फ धर्म के नाम पर पैसे बनाकर जीवन चलाने में जुटे रहते हैं और बाहर के लोग सिर्फ धर्म को जीने और बूझने आते हैं।
मुझे जो दो चीजें अच्छी लगीं उनमें से एक था टेलीस्कोप जिससे दूर पहाड़ पर स्थित मंदिरों को साफ देखा जा सकता था, गंगा के बीच में बनी गंगा की प्रतिमा को साफ देखा जा सकता था और टी सीरिज वालों की तरफ से बनाई गई शंकर की विशालकाय मूर्ति की जटा में गंगा की शक्ल को देखा जा सकता था। पांच रुपये लिए सिर्फ ये चीजें दिखाने के लिए।
फिलहाल इतना ही
फिर मिलेंगे
जय भड़ास
यशवंत सिंह
23.1.08
...तो मेरे दिल में आ जाना...उर्फ खटिया पर पेटकुनियां लेटकर रेडियो सीलोन सुनना
कभी शाम ढले तो मेरे दिल में आ जाना, कभी चांद खिले तो मेरे दिल में आ जाना... सुर फिल्म का यह गीत जिसे संभवतः महालक्ष्मी नामक गायिका ने गाया है, जब पहली बार सुना था तो पागल हो गया था। और सुना भी कहां, एक मित्र को फोन किया तो उनके डायल टोन के रूप में यह था। उन्होंने फौरन उठा लिया था, इसलिए उनसे रिक्वेस्ट करना पड़ा कि दुबारा डायल कर रहा हूं, फोन न उठाइयेगा, गाना बहुत बढ़िया है। और मैं कई बार फोन करके सुनता रहा।
बाद में इस गाने से इतना प्रभावित हुआ कि इसे खुद के मोबाइल का डायल टोन बनाना चाहा पर कई कोशिशों के बाद भी सफल नहीं हो पाया। आखिरकार इसे एक मेरे मित्र ने आनलाइन म्यूजिक साइट smashits.com पर सुनवाया। तभी जान पाया कि यह सुर फिल्म का गाना है, 2002 में बनी फिल्म है यह, महालक्ष्मी ने गाया है, डायरेक्टर तनूजा चंद्रा हैं और म्यूजिक डायरेक्टर एमएम करीम। आज ये गाना सुनते हुए मुझे अपनी कई कमियों पर तरस आई....जैसे..
1- ब्लागिंग में अगिया बेताल की तरह भड़ास लेकर चला आया पर ब्लागिंग की तकनीक जानने के मामले में गदहा ही रह गया। कई गानें चाहता हूं भड़ास पर डालूं, पर इसलिए डाल नहीं पाता क्योकि मैं पाद-वाद आदि कास्टिंग करना नहीं जानता। काश, ये आता तो इस गाने को आप सभी को सुनाता। अगर कोई साथी मेरी मूढ़ता पर तरस खाकर इस गाने को भड़ास पर डाल दे तो मजा आ जाय। उसकी जय जय होगी।
2- आईटीओ और कनाट प्लास तो मशहूर जगहें हैं, दिल्ली या नोएडा या गुड़गांव या गाजिबायाबद या किसी शहर में देख लो, लड़के लड़कियां कान में खोंसे रहते हैं, जरूर गाना ही सुनते होंगे। स्साला, मैं सोचता हूं कि ये मैं क्यों नहीं कर सकता। पता है, बहुत महंगा या मुश्किल नहीं है, पर कर नहीं पाता। ये जो काम चलने वाली मानसिकता है, अनाप-शनाप के काम में उलझ रहने की आदत है, उससे निजात मिलने तो कुछ नया करूं। हालांकि सच कहूं, ये जो कान में खोंसे रहते हैं, इन्हें देखकर जाने क्यों दया भी आती है। कई तो जिनुइन तौर पर संगीत सुनने वाले लगते हैं, लेकिन कई तो लगता है सिर्फ मुझे चिढ़ाने के लिए बजा रहे हों...
किशोर उम्र के रूमानी दिनों में जब अभाव जिंदगी को खुशगवार बनाये हुए थी और गांव का जीवन व्यक्तित्तव में नाजुकता व संवेदना भरे था, रेडियो खटिया के कोने में धीमी आवाज में बजाते हुए, पेटकुनिया सोते हुए गानों के शब्दों के अर्थों को बंद आखों में विजुवलाइज किया करते थे, लगता था, किसी कोने से आसमान से उतरकर वो परी बस मेरे लिए ही आने ही वाली है, यही गाते हुए, जो सुन रहा हूं....। खैर, वो परी नहीं आई, खयालों में हमेशा बसी रही, और जो परियां दिखीं वो सिर्फ नाम की थीं, दिल-दिमाग में हमारे आप जैसे दुखों-सुखों स्वार्थों-दुविधाओं को जीती हुईं लड़कियां थीं। तो उन दिनों जो गाने मुझे बेहद पसंद थे, जिन्हें आज भी शाम को घर जाते वक्त गाड़ी में गाता रहता हूं. वो इस प्रकार हैं--
तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी मे शामिल है,
जहां भी जाऊं ये लगता है मेरी महफिल है
ये आसमान, ये बादल, ये रास्ते, ये घटाएं
हर एक चीज है अपनी जगह ठिकाने पे
कई दिनों से शिकायत नहीं जमाने से...
समझे आप, रुमानी दिनों मे किसी को किसी से भला क्या शिकायत हो सकती है। फंतासी, कल्पना, सपने, गाने, संगीत, खोया खोया सा रहना, आसमान निहारना, अकेले सूनसान नदी किनारे या बगीचे में बैठकर सोचना.....और दूर से सीलोन, या विविध भारती, या आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस से आ रहे गानों को सुनना, गुनना, बूझना, शरमाना, समझाना, हंसना......
पता नहीं क्या लेकर बैठ गया, लेकिन संगीत भड़ास का अनिवार्य पार्ट होना चाहिए और इस दायित्व को अगर कोई भड़ासी निभाएं तो बड़ी खुशी होगी, उनसे मैं चाहूंगा कि उपरोक्त तीनों गाने, ओह....तीसरा तो लिखना भूल ही गया...वो इस तरह है....
तुमसे मिलकर
ना जाने क्यूं
और भी कुछ याद आता है
ये प्यार के दुश्मन, प्यार के कातिल
लाख बने ये दुनिया....
पर हमने वफा की राहन न छोड़ी
हमने तो अपनी.....
उस राह से भी हम गुजरे हैं,
जिस राह पे सब लुट जाता है...
लुट जाता है...
भई, एक और ....प्लीज, मेरा बड़ा फेवरिट है, लव सांग में....
मेरे प्यार की उमर हो इतनी समन
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम
बिन तेरे एक पल भी मुझे रहा नहीं जाये
ये दूर दूर रहना अब सहा नहीं जाये
टूट जाये न कहीं मेरे प्यार का भरम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से...
मेरे सपने गुलाबी नीले हो गये जवां
लो आके तेरी बाहों में मैं खो गई कहां
हाजिर है जान जानेमन जान की कसम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से कसम
देखा...इतनी लाइनों को लिखने का मतलब है कि मैं इन्हें वाकई गाता हैं, खामखा पेल नहीं रहा हूं कि देखो, बहुत बड़ा गवइया भी हूं। भगवान ने गला तो सबको दिया है, सो मेरे पास भी है और महेंद्र कपूर मार्का भरे गले वालों का गाना गवाना हो तो कभी भी आदेश करियेगा, मैं तो लोगों को खोज खोज के सुनाता हूं...सुन लो यार, एक और.....। और अगला कहता है, पक गया, अब अगली मीटिंग में सुनाना.....हा हा हा हा।
तो भई, इन दिनों के अपने फेवरिट गाने ....आना तो फिर ना जाना, कभी शाम ढले तो मेरे दिल में आ जाना ...को सुनते हुए ये पोस्ट लिख रहा हूं और इस गाने को बार बार सुन रहा हूं।
कुछ दिन पहले तक भिखारी ठाकुर के गाने डगरिया जोहत ना, जिसे देवी ने गाया है और जिसे मेल के जरिये अविनाश भाई मोहल्लेवाले ने भेजा था, लगातार सुनता था, पर उसे इतना सुना कि घर पर बच्चा लोग लैपटाप खोलते ही चिढ़ाने लगते हैं...डगरिया..बबरिया, डहरिया.....पता नहीं क्या क्या सुनेंगे पापा। तो, मैंने धीमी आवाज में सुनना शुरू कर दिया है।
अंत में, आप सबसे भी, खूब सुनें संगीत, खूब जियें संगीत, जीवन के जितने पल इनके पास रहकर गुजारेंगे, उतने ज्यादा पल जीवन में जोड़ेंगे वरना जीवन खत्म करने वाले पल से तो हम लोग हमेशा दो चार हो रहे हैं।
और अगर विमल वर्मा का नाम न लूं तो शायद मेरी समकालीन संगीत सोच पर यह पोस्ट अधूरी रह जायेगी। विमल वर्मा जी के ब्लाग ठुमरी (http://thumri.blogspot.com) पर जाकर मैंने वो गाने सुनें, जिन्हें हम लोगों ने जिया है। इलाहाबाद और बीएचयू में अपनी पार्टटाइमरी होलटाइमरी क्रांतिकारिता के दौरान दस्ता ग्रुप से जुड़कर जो कुछ सुना, सीखा, गाया उनें से कई कुछ लिखित व कुछ संगीत रूप में विमल जी के ब्लाग पर मिला। वैसे, विमल जी का नाम तो इलाहाबाद से ही सुन रखा था लेकिन जब उनसे उनके ब्लाग के जरिये संपर्क कायम हुआ तो वो संगीत की तरह सरल व सहज दिखे। प्रमोद सिंह जैसे भाव मारने वाले नहीं, जिनसे कई बार रिक्वेस्ट किया कि भइया, हमहूं से बतिया लो, लेकिन बंदा है कि लिफ्टे नहीं मारता, पता नहीं क्या क्या अपने ब्लाग पर पेले रहता है। हालांकि लिखता अच्छा है भाई, कुंभ के मेले में बिछड़ा हुआ भाई लगता है।
चलो, अब फिर कह दें.....
संगीत ज़िंदाबाद,
गद्यकार मुर्दाबाद
भड़ास की जय जय
सकल भड़ासियों की जय जय
यशवंत सिंह

