मुझे आजकल लगता है कि मैं कोई जमाने से यहीं खड़ा, हवा चले न चले सिर पटकता पेड़ हूं।
या कोई धूल से अटी पिचके टायर वाली जीप हूं जिसके स्टीयरिंग का पाइप काटकर मेरे गांव छोकरे लोहार से कट्टा बनवाने की सोच रहे होंगे।
या कोई हिरन हूं जिसकी सींगों को तरास कर, भुस भर दिया गया है और जिसकी कांच की आंखों में उजबकपन के सिवा कोई और भाव नहीं है।
कभी लगता है कि बीमार, मोटे, थुलथुल, सनकी, भयभीत और ताकत के नशे मे चूर लोगों से भरे एक जिम में हूं।
पसीने और परफ्यूम की बासी गंध के बीच मुझे एक ऐसी मशीन पर खड़ा कर दिया गया है जिस पर समय लंबे पट्टे की तरह बिछा हुआ है।
मैं उस पर दौड़ रहा हूं, पसीने-पसीने हूं, हांफ रहा हूं लेकिन वहीं का वहीं हूं।
कहीं नहीं पहुंचा, एक जमाना हुआ।
समय का पट्टा मुझसे भी तेज भाग रहा है।
अगर मैं उसके साथ नहीं चला तो मशीन से छिटक कर गिर पड़ूंगा और कोई और मेरी जगह ले लेगा।
मैं थक रहा हूं यानि समय जरूर कहीं न कहीं पहुंच रहा है।
मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)
जमाना हुआ, मैं कहीं गया ही नहीं।
कई बार सपनों में बेहद तेज हूक उठी लेकिन वह नींद में ही मर गई।
आखिरी बार मैं शायद............Read More......
11.7.08
मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: अनिल यादव, प्रमोशन, बिंदास बात, ब्लाग, भड़ास, संस्मरण, हारमोनियम
23.6.08
ब्लागर बालक के सवाल, गुरुवर अनिल यादव के जवाब
ब्लाग विवेचन कौमुदी
- अनिल यादव -
------------------
अयं कः?
-अयं ब्लागरः
ब्लागरं किं करोति?
-कटपट-पश्यति-खटपट- पश्यति, क्लिकति पुनपुनः मूषकम्।
ब्लागर कौन होता है?
-जिसके पास कम्प्यूटर होता है।
कंपूटर किसके पास होता है?
-जो साक्षर होता है।
क्या कंपूटर होने से कोई प्राणी ब्लागर होता है?
-नहीं, सिर्फ मनुष्य अब तक ब्लागर होता पाया गया है और इंटरनेट कनेख्शन भी अपरिहार्य है।
इंटरनेट किसके पास होता है?
-जो शुल्क देता है।
यह शुल्क लेता कौन है, क्या वणिक?
-चुप वे देवता हैं जो ज्ञान, सूचना और अभिव्यक्ति और मनोरंजन के समुद्र में तैरने के लिए कास्ट्यूम और उसके खारे जल की हानियों से जिज्ञासुओं की त्वचा को बचाने के लिए आसुत जल और तदुपरांत लोशन देते हैं। साधु, साधु।
किंतु कंपूटर किसके पास होता है?
-जिसके पास उसे रखने के लिए एक मेज हो।
मेज किसके पास होती है?
-जिसके पास उसके समक्ष रखने के लिए एक कुर्सी हो।
कुर्सी किसके पास होती है?
-हां यह भी एक तरह की खामोश, अनुल्लेखनीय सत्ता है, अधिक काल तक उस पर वही बैठ पाता है जो नितंब-दाह से बचने के लिए उस पर कुशन रखता है।
कुशन किसके पास होते हैं?
-जिसके पास अन्य कुशन होते हैं अर्थात वे समूह में रहते हैं।
अन्य उपादान?
-नेत्र हानि से बचने के लिए चश्मा, पानी के लिए जलछुक्कक, काफी का मग जिसमें काफी, चाय या बियरादि वैकल्पिक द्रव हों.
ये सब क्या अंतरिक्ष में अवस्थित होते हैं?
-मनुष्य जिस गुरूत्वाकर्षण का दास है उसी से आबद्ध होने के कारण कदापि नहीं, ये किसी नगर या उपनगर के किसी पुर के भवन में या भवन के एक कमरे में स्थित होते हैं।
भवन या कमरा किसका होता है?
जो उसका स्वामी होता है या किराया अदा करता है।
किराया का पण्य क्या होता है?
-मुद्रा- लीरा, डालर या रूबल देश, काल, परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनीय किंतु अपने मूल स्वरूप में अविचल एवं अपने समान पण्य की सभी वस्तुओं यथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि को क्रय कर सकने में सक्षम. साधु साधु।
ब्लागर का संपूर्ण अपरिहार्य एवं तात्कालिक परिवेश कितने मूल्य का होता है?
-अगर वह अविवाहित, समूह में रहते हुए लैमारी का अभ्यासी या कार्यालय के संसाधनों का प्रयोग करने में निपुण नहीं है तो भारतीय मुद्रा में न्यूनतम बीस हजार रूपए।
इतनी भारतीय मुद्रा कहां से आती है?
-चाकरी, व्यापार किवां उत्कोच या चोरी करने से अन्य स्रोत भी हैं जिनका तुम्हारी हरी धनिया सी ताजी और खुशबूदार चेतना पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। साधु-साधु।
उत्पादन की प्रक्रिया का चिंतन से गूढ़ संबंध है अस्तु बीस हजार या अधिक भारतीय मुद्रा अर्जित करने की प्रक्रिया ब्लागर रूपी जातक की चेतना पर प्रभाव डालती है और उसके विचारों को कैसे रूपांतरित करती है?
-उसके मष्तिष्क का प्रतिबद्धता भाग लुप्त हो जाता है, विवेक भाग उत्तरोत्तर क्षीण होता है, अपने वर्तमान स्तर की सुरक्षा व प्रगति हेतु चेष्टा करने वाला भाग ग्रीष्म के वायु की भांति प्रलयंकर हो जाता है। तो क्या निर्धन, विकलांग, स्त्रियां, बालक या पण्यविहीन वनों में रहने वाले संन्यासी ब्लागिंग नहीं कर सकते यदि करें तो उनके विचार कैसे होंगे? किसी प्रकार की विकलांगता, लिंग या वय से इसका संबंध नहीं है इसका संबंध संसाधन एवं तकनीक के ज्ञान से है जिसके संसाधन गुड़ है जिसके पीछे ज्ञान कुत्ते की तरह विचरण करता है। साधु साधु।
ब्लागिंग का उपयुक्त काल क्या है और इसे कैसे करना चाहिए?
-प्रातः प्रातराश से पूर्व या रात्रि को कोलाहल प्रिय परिजनों के शयन के पश्चात, यदि सिद्ध हो जाए तो कभी भी किया जा सकता है।
इसका हेतु क्या है और यह क्यों आवश्यक है?
-इसका अविष्कार ग्राम सभ्यता, संयुक्त परिवारों एवं कृषि आधारित व्यवस्था के उच्छेद काल के परवर्ती भ्रष्टाचार के कच्चे माल से चलने वाले उद्योगों से प्रकीर्ण महानगरों में मनुष्य के अकेले पड़ जाने के पश्चात असुरक्षा की भावना के शमन के लिए हुआ। भली प्रकार से सुसज्जित एवं अन्य सुखकर उपादानों से आच्छादित किंतु बंद प्रकोष्ठों में बैठे मनुष्य समूह से पृथक श्रृंगालों की भांति हुंआ-हुंआ करते हैं अन्य उनकी ही ध्वनि को प्रतिध्वनित करते हैं तब उन्हें एक बार फिर समूह में होने का आभास होता है। इसी प्रक्रिया में एक अन्य रसायन का भी स्राव होता है जिससे लगता है कि श्वान काष्ट की विशाल गाड़ी की छाया में सुखपूर्वक चलने की बजाय उसे संपूर्ण बल से खींच रहा है। तदनंतर इस कल्पित पुरूषार्थ से श्वास फूलने लगता है और वत्स तुमसे यह गुप्त भेद कहता हूं कि उसकी अनुभूति संतति प्राप्ति हेतु किए गए मैथुन से श्लथ आत्मा को मिलने वाले उल्लास मिश्रित आनंद से भिन्न नहीं होती।
इन श्रृंगालों का स्वामी कौन है?
-वे आभासी विश्व में रहने के अभ्यस्त हो चले हैं अतः उनमें से अधिकांश स्वयं को स्वामी कहते है, कुछ के स्वामी आभासी विष्णु हैं जो क्षीरसागर में बीस हजार किमी से अधिक लंबे इंटरनेट केबिल रूपी शेषनाग पर लेटे लक्ष्मी से पैर दबवाते रहते हैं।
क्या विष्णु ब्लागिंग करते हैं?
-नहीं करते तो अब करेंगे लेकिन अब तुम जाओ सुत रहो। अगले सत्र में अपने मातृकुल से अनुमति से लेकर आना।
-anil yadav मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
(अनिल यादव के ब्लाग हारमोनियम से साभार)
14.6.08
अनिल यादव का ब्लाग हारमोनियम, उनकी पहली पोस्ट ललमुंही विदेशिन व बुढ़िया के गुत्थमगुत्था होने पर
हारमोनियम मेरे लिए खास ब्लाग है। हालांकि यह ब्लाग अभी बना ही बना है। इसमें सिर्फ बोहनी वाली एकमात्र पोस्ट पड़ी है। और उस इकलौती पोस्ट को चुराकर भड़ास पर डाल रहा हूं। खास ब्लाग इसलिए कि इस ब्लाग को जिसने शुरू किया है, वो मेरे रोल माडल की तरह हैं। नाम है अनिल यादव। इन दिनों लखनऊ में द पायनियर अखबार में हैं।
इससे पहले वे दैनिक हिंदुस्तान वाराणसी, अमर उजाला लखनऊ, दैनिक जागरण लखनऊ, अमर उजाला मेरठ, अमर उजाला नोएडा आदि जगहों पर कार्य कर चुके हैं। मैं जब बीएचयू से पत्रकारिता का कोर्स कंप्लीट कर और छात्र राजनीति से भागकर लखनऊ पहुंचा तो राज्य की राजधानी लखनऊ में मेरा कोई ऐसा परिचित नहीं था जिसके यहां रुक सकूं और नौकरी खोजने के लिए संघर्ष कर सकूं। अनिल यादव से हलकी सी मुलाकात और छोटा सा परिचय था। वे अपने छोटे भाई कामरेड सुनील यादव के बीएचयू में छात्रसंघ के अध्यक्षी चुनाव में प्रचार के लिए कुछ दिनों के लिए आए थे। उस दौरान मैं उनके संपर्क में आया। उनसे काफी प्रभावित हुआ।
आइसा से भागकर जब लखनऊ पहुंचा तो सीधे अनिल के यहां पहुंचा। उसके बाद अगले साल भर तक निश्चिंत भाव से बेरोजगार और कभी कभार मौसमी रोजगारशुदा होने के बावजूद अनिल के घर पर रहकर और उनके पैसे पर हर रोज होली-दीवाली मनाता रहा। ढेर सारे खट्टे-मीठे पल गुजरे और मैं हर पल को संपूर्णता में जीने/सहेजने/सीखने की कोशिश करता रहा।
अगर मुझसे पूछा जाय कि किसी एक व्यकित का नाम बताओ जिसके प्रति तुम ताज़िंदगी कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहते हो तो मैं अनिल यादव का नाम लूंगा। हालांकि मुझे पता है कि अनिल भाया और शिल्पी माते पिछले कई महीनों, नहीं, बल्कि वर्षों से मुझसे नाराज चल रहे हैं लेकिन उनकी नाराजगी अपनी जगह और मेरा प्यार अपनी जगह।
पत्रकारिता से लेकर जीवन के हर पल में अति ईमानदारी और पूर्ण सचेत संवेदना के साथ जीने की कोशिश करने वाले अनिल के लिखे को हमेशा सराहना मिली क्योंकि वे जो लिखते हैं उसमें कोई बनावटीपन नहीं बल्कि सब कुछ संपूर्ण लाइव और बेहद ओरीजनल-रीयलिस्टिक होता है और इस रीयलिज्म में भी एक विजन व एक सचेत समझ दिखती रहती है।
यकीं न हो तो उनका लिखा नीचे वाला पढ़ लीजिए।
ब्लागिंग में अनिल के आने पर हम सब बेहद उत्साहित हैं और भड़ास उनका तहेदिल से स्वागत करता है।
ब्लाग बनाने के बाद अनिल ने एक छोटी सी मेल वाली चिट्ठी भी भेजी है, जो इस प्रकार है....
introduction ceremony
anil yadav (oopsanil@gmail.com)
like other blogs there is a new one named URL-http://iharmonium.blogspot.com-
please attach it and introduce to rest of thedunia and enjoy hearing a new tune on harmunia.anilyadav
lucknow
अपने ब्लाग पर उन्होंने जो खुद की प्रोफाइल बनाई है, उसमें उनके बारे में जो तीन चार जानकारियां हैं, उनमें से दो इस प्रकार हैं....
Interests- Absorbing what ever is all around.
Favorite Music- traffic tunes (unedited)
अनिल के ब्लाग को पहली नजर में देखने पर अभी कई तकनीकी कमियां दिख रहीं हैं। जैसे वहां अभी कमेंट करने वाला आप्शन दिया ही नहीं गया है। मतलब, अनिल के ब्लागिंग में आने का कोई स्वागत करे तो किस तरह करे, कोई उनके लिखे पर उन्हें गरियाना या सराहना चाहे तो किस तरह करे।
उम्मीद है, वे ये तकनीकी चीजें आज नहीं तो कल सीख लेंगे, पर हम लोगों के लिए सबसे जरूरी है उनका ब्लागिंग में लगातार सक्रिय रहना और कुछ न कुछ लिखते रहना। उम्मीद है हमेशा की तरह उनके लिखे का फैन क्लब हिंदी ब्लागिंग में भी बनेगा।
तो चलिए, पेश है उनके ब्लाग हारमोनियम से साभार,
उनकी पहली ब्लाग पोस्ट.....
यशवंत
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क्या ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है?
- अनिल यादव-
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दिन, उस छोटी सी खबर और उससे भी ज्यादा साथ छपी फोटू ने गुदगुदाया। सारनाथ गई एक घुमक्क़ड़ विदेशी युवती ने सड़क की पटरी पर बैठी बुढ़िया से दो रूपए का गाजर खरीदा और स्कूली लड़कों जैसे खिलवाड़ भाव से बिना पैसा दिए जाने लगी। हो सकता है कि युवती को उसमें अपने बचपन की कोई रिगौनी आंटी नजर आ गई हो। लेकिन उस देहातिन को जैसे आग लग गई और वह दौड़कर उस युवती से जूझ गई। युवती को वाकई मजा आ गया, शायद एक गंवई हिन्दुस्तानिन से पहली बार अनायास वास्तविक संवाद स्थापित हो गया था। पुलिस के सिपाहियों और देसी लहकटों को वह रोज झेलती होगी लेकिन उसे बर्दाश्त नहीं था कि कोई ललमुंही विदेशिन उसे उल्लू बनाकर दांताखिलखिल करती हुई चली जाए।
इसी बीच गाजर भारत-यूरोप के बीच पुल बन चुका था। फोटू में खड़े युवती के साथी का चेहरा कुछ ऐसा प्रफुल्ल था, जैसे सारनाथ के परदे पर कोई ओरियंटल फिल्म देख रहा हो। उसके आराम से खड़े होने के पीछे का आत्मविश्वास रहा होगा कि वह बुढिया, बैलेंस डाइट पर पली, दिन भर उसके साथ पैदल भारत नापने वाली उसकी छरहरी साथिन का क्या बिगाड़ पाएगी? बाई द वे यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस युगल को यह घटना जिंदगी भर याद रहेगी। इसमें हाऊ डू यू फील अबाउट बेनारस जैसी रस्मी बोरियत नहीं थी। तंत्र, मंत्र, योगा और होली गंगा का फंदा नहीं था। इसमें खांटी भारतपन था जिसे वे अपने देश जाकर लोगों को बताएंगे।
तो अखबार में छपी फोटू में परमआधुनिक यूरोप के साथ एक भारतीय देहातिन भिड़ी हुई थी। कल्पना में न समाने वाला यह पैराडाक्स लोगों को गुदगुदा रहा था। लेकिन गाजर वाली के लिए यह झूमाझटकी कोई खिलवाड़ नहीं थी। ललमुंही विदेशिन के लिए दो रूपए का मतलब कुछ सेंट या पेंस होगा लेकिन गाजरवाली के लिए इसका मतलब है। कुप्पी में डाले गए दो रूपए के तेल से कई रात घर में रोशनी रहती है।
चूरन, चनामुरमुरा, गुब्बारे, फिरकी और प्लास्टिक के फूल बेचने वाले दस बीस रूपए की आमदनी के लिए सारा दिन गलियों में पैदल चलते रहते हैं। बनारस में अब भी पियरवा मिट्टी के ढेले बिकते हैं, जिन्हें शहनाज हुसैन सबसे बेहतरीन हेयर कंडीशनर बताती हैं। इन्हें बेचने-खरीदने वाले दोनों के लिए दो रूपया रकम है।
अभी मार्च के आखिरी हफ्ते में आयकर-रिटर्न भरने में सारा देश पसीना-पसीना हो रहा था। तरह-तरह के खानों वाले ठस सरकारी कागजों का अंबार था और कर विशेषग्यों की चौर्य-कला से विकसित देसी तिकड़में थी। जो चख-चख थी उसका सार यह था कि सरकार बड़ा अत्याचार कर रही है, यदि कोई ईमानदारी से इनकम-टैक्स भर तो भूखों मरेगा और उसके बच्चे भीख मांगेगे। लिहाजा बीमा के प्रीमियम, धर्माथ चंदे और मकान किराए की फर्जी रसीदों, एनएससी वगैरा के जुगाड़ं फिट किए गए ताकि अपना पैसा अपने पास रहे। .यहां कुछ हजार का सवाल था और सारनाथ की गाजरवाली के सामने अदद दो रुपयों का। क्या ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है। अगर आयकर विभाग को झांसा देकर कुछ हजार बचा लेने वाले बाबुओं और सड़क किनारे बैठी बुढ़िया के बीच खरीद-बेच के अलावा कोई और रिश्ता बचा हुआ है तो नहीं हंसा जाएगा।
