Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label नया ब्लाग. Show all posts
Showing posts with label नया ब्लाग. Show all posts

14.4.09

हिजड़े चाँद से नहीं गिरते

(बरेली के पत्रकार साथी रहमान भी ब्लागिंग में कूद पड़े हैं। उनके ब्लाग 'आजाद आवाज' पर दो पोस्टें हैं जिनमें से एक यहां प्रकाशित कर रहा हूं। उनके ब्लाग का पता है- www.azadawaz.blogspot.com, रहमान की ब्लागिंग की पारी का हम स्वागत करते हैं- यशवंत)
------------------------------------------

बरेली में १२ अप्रैल को हिजड़ों पर एक नेशनल सेमिनार हुआ। यहां इसकी चर्चा कई वजहों से जरूरी है। एक तो ये कि ये सेमिनार कथित सभ्य समाज और हिजड़ों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए किया गया था। दूसरे इसे एक एजूकेशनल फाउंडेशन ने आयोजित किया था और संभवतः ये उत्तर प्रदेश का पहला अपनी तरह का आयोजन था। चर्चा इसलिए भी कि ये सेमिनार कुछ सवाल छोड़ गया, जिस पर बहस जरूरी है।सैयद शाह फरजंद अली एजूकेशनल एंड सोशल फाउंडेशन आफ इंडिया के इस आयोजन में जेएनयू के दर्शन शास्त्री प्रो. सत्यपाल गौतम, मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित डा. संदीप पांडेय, अमरीका से प्रकाशित उपन्यास नेवर ट्रस्ट अ गाड से चर्चा में रहे प्रो. एमआई सिद्दीकी, अंग्रेजी लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट शारदा दुबे, गोपाल कृष्ण जैसे लोग इसमें शामिल रहे। इसमें रुहेलखंड भर से तमाम हिजड़े भी जमा हुए थे, जिनका प्रतिनिधित्व उनकी गुरू मीनाक्षी ने किया। मीनाक्षी अंग्रेजी से एमए हैं और काफी संवेदनशील और जागरूक हैं।

कार्यक्रम के बीच में दर्शकों की तरफ से शुरू की गई बहस से मीनाक्षी उद्वलित हो उठीं और उन्होंने एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसके बारे में उस वक्त तो कोई चर्चा नहीं हुई, लेकिन कार्यक्रम के बाद वक्ताओं के बीच ये जेरेबहस रहा। मीनाक्षी के वक्तव्य के दौरान एक दर्शक ने सवाल किया कि आप लोग खुद ही समाज से दूर रहते हो और जबरन अपनी संख्या बढ़ाते हो। इस मीनाक्षी जज्बाती हो उठीं। उन्होंने जवाब में समाज को उसका ही चेहरा दिखा दिया। कहा कि हिजड़े चांद से नहीं टपकते, न ही वह जंगल से आते हैं। इसी के साथ उन्होंने हया नाम की अपनी बेटी को मंच पर बुला लिया। कुछ देर बाद ही दर्शकों के बीच से एक पांच-छह साल की एक सुंदर सी दुबली-पतली सी बच्ची गुलाबी फ्राक पहने नजरें झुकाए खड़ी थी। उसके मंच पर आते ही सन्नाटा छा गया। मीनाक्षी ने कहना शुरू कियाः ये बच्ची भी आप ही के सभ्य समाज से आई है। छह साल पहले इसके मां-बाप मेरे पास आए थे और कहा कि मीनाक्षी तुम इसे अपना लो, नहीं तो हमारे पास इसे जहर का इंजेक्शन लगवाने के अलावा कोई चारा नहीं है। मीनाक्षी ने ये कहकर हाल में सनसनी फैला दी कि ये बच्ची भी किन्नर है। उन्होंने बताया कि इसके मां-बाप पहले इसे अनाथालाय ले गए थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि ये किन्नर है तो उन्होंने इसे अपनाने से ही मना कर दिया।

उस वक्त को बात आई-गई हो गई, लेकिन इस सबके बीच एक बच्ची से उसकी सुकून और सम्मान भरी जिंदगी छीन ली गई। उसे सबके बीच में असमान्य होने का एहसास करा दिया गया था। रही-सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी। उसने बच्ची की फोटो सहित इस पूरे वाकिये को फ्लैश कर दिया। उसका चेहरा भी ब्लर करने की जहमत नहीं उठाई गई। अब ये बच्ची न तो कथित सभ्य समाज में सामान्य जीवन जी सकेगी और स्कूल में भी सभी बच्चे उसे अलग तरीके से ट्रीट करेंगे और चिढ़ाएंगे। जाहिर है कि अब उसके पढ़-लिखकर सामान्य जीवन जीने की संभावना शून्य कर दी गई।

हमारा आपसे सवाल है कि इस मामले में बुद्धिजीवियों का क्या रुख होना चाहिए था?
मीडिया का क्या सावधानी बरतनी चाहिए थी?
अब वह बच्ची सामान्य जीवन कैसे जी सकेगी?
और आखिर में, हिजड़ों पर ये आयोजन फिजियो डा. एसई हुदा की सोच का नतीजा था। मरीजों से निकल कर थर्ड जेंडर के लिए ऐसे आयोजन का जोखिम उठाना सराहनीय है।

9.4.09

अरे ब्लागरों, थोड़ा बच्चा बन जाओ, जरा बाल सजग पर घूम आओ

कविता- बंदर
कटी दल पर बैठा बन्दर
ले कर केला और चुकंदर
लम्बी चोटी उसके सर पर
लम्बी पूंछ है उसके ऊपर
कभी - कभी वह घर के अन्दर
लेकर सिर पर एक कलेंडर
लेके बंदरिया अपने संग
करने लगा रंग में भंग
-सोनू
कुमार
अपना घर

कक्षा 7
पेंटिंग:- आदित्य कुमार
अपना घर
कक्षा 6

--------------------------------------------------------------------
आजकल जब लोग मैं मैं मैं मैं करते हुए लिखते पढ़ते पढ़ाते बतियाते गरियाते चले जा रहे हैं, ऐसे में कोई शख्स बच्चों की बात करे, उनकी कविताओं और पेंटिंग को प्रकाशित करे, वो भी एक डेडिकेटेड ब्लाग बनाकर तो उसकी भूरि भूरि तारीफ की जानी चाहिए। लेकिन हम लोगों की आदत तो सनसनी पढ़ने पढ़ाने बतियाने और सुनाने की होती है। किसी ने किसी को गरिया दिया तो वो सब खूब पढ़ा जाएगा लेकिन कोई किसी दूसरे के हित में जी रहा है तो उस पर कोई ध्यान नहीं देगा। बाल सजग ब्लाग के महेश जी का मेल मिला कि उनके ब्लाग को भड़ास के कोने में दर्ज करें तो इस ब्लाग को खोला। मजा आ गया। क्या कविताएं हैं बच्चों की। कहानियां हैं। पेंटिंग हैं। प्लीज, आप लोग एक बार बाल सजग पर जाएं और महेश जी की हौसलाअफजाई जरूर करें, इतना शानदार ब्लाग बनाने और चलाने के लिए....।
उपरोक्त रचना बाल सजग से साभार ली गई है।
बाल सजग का पता है-
http://balsajag.blogspot.com
--------------------------------------------------------------------

आभार
यशवंत

27.7.08

तीन सूचनाएं...जोशी जी का ब्लाग, डांसिंग डिजिगनेशन और पितृ शोक

1-जोशी जी का ब्लाग
kishore kamal (kishorekamaldelhi@gmail.com)
to yashwantdelhi@gmail.com
date 25 Jul 2008 13:50
subject जोशी जी का ब्लॉग
mailed-by gmail.com

मेरठ के पत्रकार जगत में गुरुजी के नाम से मशहूर पंडित हरिशंकर जोशी ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भागदोड़ से कुछ समय निकालकर अपना ब्लॉग बनाया है, नाम है इर्दगिर्द http://www.irdgird.blogspot.com/ जोशी जी ने उस समय वीडियो कैमरा संभाला था जब इस देश में बमुश्किल एक दो वीडियो कैमरे थे। वो अपने मामाजी के साथ एबीसी के लिये काम करते थे। लेकिन बाद में वो अमर उजाला से जुड़ गये और स्टिल फोटोग्रॉफी करते रहे। उनके फोटो धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं में भी पहले पेज पर कई बार छपे हैं। कैमरे पर उनकी पकड़ सीएनबीसी आवाज़ में उनकी खबरों में साफ नज़र आती है।

2- Dancing designation of Mrinal Pande

Mrinal Pande all powerful lady of Hindustan group of Hindi publication had three designations in a fortnight. Her long time Editor-in-Chief label was found missing from the print line one day. She was just editor of Hindustan.This really put her in a fix. She had a tough time explaining about the missing in-chief of her designation. She was so infuriated that when Yashwant Singh broke this news on his media portal www.bhadas4media.com she had a bitter argument with him. In a week or so her designation grew in size with the addition of word principal to Editor. But no one knows what does the new designation means. (www.gujratglobal.com के न्यूजलेटर से साभार)


3- वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला को पितृ शोक

कानपुर निवासी और अमर उजाला, दिल्ली में एक्जीक्यूटिव एडीटर शंभूनाथ शुक्ला के पिता श्री राम किशोर शुक्ला का निधन कानपुर में हो गया। उनका देहांत 24 जुलाई को हुआ। तेरहवीं 6 अगस्त को है। शोक की इस घड़ी में हम शंभूनाथ जी के साथ हैं और स्वर्गवासी पिताश्री को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

जय भड़ास
यशवंत

19.6.08

ब्लागिंग में बृजेशः नेता जी की साली से विधायकजी ने दिल लगाया

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश सिंह भी हिंदी ब्लागिंग के मैदान में चुपके से कूद पड़े हैं। उन्होंने शुरुआत ही चौके छक्के से करी है। बृजेश जी ने अपने ब्लाग का प्यारा सा नाम रखा है- शहरनामा। दैनिक जागरण में शहरनामा नाम से कई संस्करणों में शहर की उन खबरों पर कालम छपता है जिन पर कोई खबर नहीं छापी जा सकती क्योंकि इन खबरों के सबूत नहीं होते लेकिन ये खबरें होती बिलकुल पुष्ट हैं। तो ऐसी सच्ची कनबतियां खबरों के लिए शहरनामा नामक ब्लाग बृजेश जी ने तैयार किया है। वे इस ब्लाग पर शहरयार नाम से लिख रहे हैं। चुटीले और कसे लेखन के मास्टर बृजेश जी इस वक्त दैनिक जागरण के दिल्ली प्रदेश के एक हिस्से के ब्यूरो इंचार्ज हैं।

आप भी शहरनामा की यात्रा कर आइए और कुछ मजेदार पोस्टों को पढ़ डालिए, साथ ही बृजेश जी का हौसला बढ़ाने के लिए उनकी पोस्टों पर कमेंट कर आइए। फिलहाल एक मजेदार पोस्ट को यहां डाल रहा हूं, शहरनामा से साभार....


नेता जी की साली से विधायकजी ने दिल लगाया

कांग्रेस में चमचागीरी की पुरानी परंपरा है.चमचागीरी के चक्कर में कांग्रेस के एक राष्ट्रीय महासचिव ने दिल्ली के एक विधायक को अपना मानस पुत्र बना लिया. कांग्रेस आलाकमान के दाहिने हाथ माने जाने वाले भारीभरक कद वाले इस नेता के घर विधायक बराबर का आना जाना था. बड़े नेता अक्सर व्यस्त रहते थे इसलिए घर की कुछ जिम्मेदारियां यह विधायक स्वेच्छा से उठाने लगे. इस बहाने नेताजी के घर में उनकी अच्छी पैठ बन गई.

यहां तक तो ठीक था किंतु आका की सेवा करते-करते विधायक जी का दिल घर की एक सुंदरी पर आ गया.यह सुंदरी कोई और नहीं बड़े नेता जी की साली साहिबा हैं.इन्हें विधायक जी कई बार मानस पुत्र के नाते यहां वहां ले आते जाते रहे हैं. जब तक इश्क चलता रहा लोगों ने ज्यादा कान नहीं दिया किंतु पहले से शादीशुदा विधायक जी को महासचिव की साली इतनी पसंद आई कि वह उससे शादी करने का ख्वाब पालने लगे.विधायक जी जो कभी कांग्रेसी दिग्गज नेता को पिता तुल्य तथा उनकी पत्नी को मातृवत मानते थे वे अब मौसी तुल्य उन्ही नेता की साली को पत्नी बनाना चाहते थे.

एक तो विधायक व युवती का अलग-अलग धरम ऊपर से बेटा बन घर में सेंध लगाने का यह रवैया नेताजी को पसंद नहीं आया, लिहाजा कभी इन्हीं नेता के नाम का रुआब गांठने वाले विधायक को घर में इंट्री बंद हो गई है. अब आगामी चुनाव के मद्देनजर विधायक के टिकट पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं. इन दिनों कांग्रेसियों में बेटा बन नेता की साली पर लाइन मारने वाले इन विधायक महोदय की चरचा आम है.

प्रस्तुतकर्ता- shaharyar


साभारः शहरनामा

14.6.08

अनिल यादव का ब्लाग हारमोनियम, उनकी पहली पोस्ट ललमुंही विदेशिन व बुढ़िया के गुत्थमगुत्था होने पर

हारमोनियम मेरे लिए खास ब्लाग है। हालांकि यह ब्लाग अभी बना ही बना है। इसमें सिर्फ बोहनी वाली एकमात्र पोस्ट पड़ी है। और उस इकलौती पोस्ट को चुराकर भड़ास पर डाल रहा हूं। खास ब्लाग इसलिए कि इस ब्लाग को जिसने शुरू किया है, वो मेरे रोल माडल की तरह हैं। नाम है अनिल यादव। इन दिनों लखनऊ में द पायनियर अखबार में हैं।

इससे पहले वे दैनिक हिंदुस्तान वाराणसी, अमर उजाला लखनऊ, दैनिक जागरण लखनऊ, अमर उजाला मेरठ, अमर उजाला नोएडा आदि जगहों पर कार्य कर चुके हैं। मैं जब बीएचयू से पत्रकारिता का कोर्स कंप्लीट कर और छात्र राजनीति से भागकर लखनऊ पहुंचा तो राज्य की राजधानी लखनऊ में मेरा कोई ऐसा परिचित नहीं था जिसके यहां रुक सकूं और नौकरी खोजने के लिए संघर्ष कर सकूं। अनिल यादव से हलकी सी मुलाकात और छोटा सा परिचय था। वे अपने छोटे भाई कामरेड सुनील यादव के बीएचयू में छात्रसंघ के अध्यक्षी चुनाव में प्रचार के लिए कुछ दिनों के लिए आए थे। उस दौरान मैं उनके संपर्क में आया। उनसे काफी प्रभावित हुआ।

आइसा से भागकर जब लखनऊ पहुंचा तो सीधे अनिल के यहां पहुंचा। उसके बाद अगले साल भर तक निश्चिंत भाव से बेरोजगार और कभी कभार मौसमी रोजगारशुदा होने के बावजूद अनिल के घर पर रहकर और उनके पैसे पर हर रोज होली-दीवाली मनाता रहा। ढेर सारे खट्टे-मीठे पल गुजरे और मैं हर पल को संपूर्णता में जीने/सहेजने/सीखने की कोशिश करता रहा।

अगर मुझसे पूछा जाय कि किसी एक व्यकित का नाम बताओ जिसके प्रति तुम ताज़िंदगी कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहते हो तो मैं अनिल यादव का नाम लूंगा। हालांकि मुझे पता है कि अनिल भाया और शिल्पी माते पिछले कई महीनों, नहीं, बल्कि वर्षों से मुझसे नाराज चल रहे हैं लेकिन उनकी नाराजगी अपनी जगह और मेरा प्यार अपनी जगह।

पत्रकारिता से लेकर जीवन के हर पल में अति ईमानदारी और पूर्ण सचेत संवेदना के साथ जीने की कोशिश करने वाले अनिल के लिखे को हमेशा सराहना मिली क्योंकि वे जो लिखते हैं उसमें कोई बनावटीपन नहीं बल्कि सब कुछ संपूर्ण लाइव और बेहद ओरीजनल-रीयलिस्टिक होता है और इस रीयलिज्म में भी एक विजन व एक सचेत समझ दिखती रहती है।

यकीं न हो तो उनका लिखा नीचे वाला पढ़ लीजिए।

ब्लागिंग में अनिल के आने पर हम सब बेहद उत्साहित हैं और भड़ास उनका तहेदिल से स्वागत करता है।

ब्लाग बनाने के बाद अनिल ने एक छोटी सी मेल वाली चिट्ठी भी भेजी है, जो इस प्रकार है....

introduction ceremony

anil yadav (oopsanil@gmail.com)

like other blogs there is a new one named URL-

http://iharmonium.blogspot.com-
please attach it and introduce to rest of thedunia and enjoy hearing a new tune on harmunia.

anilyadav
lucknow


अपने ब्लाग पर उन्होंने जो खुद की प्रोफाइल बनाई है, उसमें उनके बारे में जो तीन चार जानकारियां हैं, उनमें से दो इस प्रकार हैं....

Interests- Absorbing what ever is all around.
Favorite Music- traffic tunes (unedited)

अनिल के ब्लाग को पहली नजर में देखने पर अभी कई तकनीकी कमियां दिख रहीं हैं। जैसे वहां अभी कमेंट करने वाला आप्शन दिया ही नहीं गया है। मतलब, अनिल के ब्लागिंग में आने का कोई स्वागत करे तो किस तरह करे, कोई उनके लिखे पर उन्हें गरियाना या सराहना चाहे तो किस तरह करे।

उम्मीद है, वे ये तकनीकी चीजें आज नहीं तो कल सीख लेंगे, पर हम लोगों के लिए सबसे जरूरी है उनका ब्लागिंग में लगातार सक्रिय रहना और कुछ न कुछ लिखते रहना। उम्मीद है हमेशा की तरह उनके लिखे का फैन क्लब हिंदी ब्लागिंग में भी बनेगा।

तो चलिए, पेश है उनके ब्लाग हारमोनियम से साभार,
उनकी पहली ब्लाग पोस्ट.....

यशवंत
-------------- -------------------- ------------------ ----------


क्या ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है?


- अनिल यादव-
---------------

दिन, उस छोटी सी खबर और उससे भी ज्यादा साथ छपी फोटू ने गुदगुदाया। सारनाथ गई एक घुमक्क़ड़ विदेशी युवती ने सड़क की पटरी पर बैठी बुढ़िया से दो रूपए का गाजर खरीदा और स्कूली लड़कों जैसे खिलवाड़ भाव से बिना पैसा दिए जाने लगी। हो सकता है कि युवती को उसमें अपने बचपन की कोई रिगौनी आंटी नजर आ गई हो। लेकिन उस देहातिन को जैसे आग लग गई और वह दौड़कर उस युवती से जूझ गई। युवती को वाकई मजा आ गया, शायद एक गंवई हिन्दुस्तानिन से पहली बार अनायास वास्तविक संवाद स्थापित हो गया था। पुलिस के सिपाहियों और देसी लहकटों को वह रोज झेलती होगी लेकिन उसे बर्दाश्त नहीं था कि कोई ललमुंही विदेशिन उसे उल्लू बनाकर दांताखिलखिल करती हुई चली जाए।

इसी बीच गाजर भारत-यूरोप के बीच पुल बन चुका था। फोटू में खड़े युवती के साथी का चेहरा कुछ ऐसा प्रफुल्ल था, जैसे सारनाथ के परदे पर कोई ओरियंटल फिल्म देख रहा हो। उसके आराम से खड़े होने के पीछे का आत्मविश्वास रहा होगा कि वह बुढिया, बैलेंस डाइट पर पली, दिन भर उसके साथ पैदल भारत नापने वाली उसकी छरहरी साथिन का क्या बिगाड़ पाएगी? बाई द वे यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस युगल को यह घटना जिंदगी भर याद रहेगी। इसमें हाऊ डू यू फील अबाउट बेनारस जैसी रस्मी बोरियत नहीं थी। तंत्र, मंत्र, योगा और होली गंगा का फंदा नहीं था। इसमें खांटी भारतपन था जिसे वे अपने देश जाकर लोगों को बताएंगे।

तो अखबार में छपी फोटू में परमआधुनिक यूरोप के साथ एक भारतीय देहातिन भिड़ी हुई थी। कल्पना में न समाने वाला यह पैराडाक्स लोगों को गुदगुदा रहा था। लेकिन गाजर वाली के लिए यह झूमाझटकी कोई खिलवाड़ नहीं थी। ललमुंही विदेशिन के लिए दो रूपए का मतलब कुछ सेंट या पेंस होगा लेकिन गाजरवाली के लिए इसका मतलब है। कुप्पी में डाले गए दो रूपए के तेल से कई रात घर में रोशनी रहती है।
दस-बीस के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं फिर भी गाजर का कुछ सेंटीमीटर का पुल पारकर आप उन लोगों की अर्थव्यवस्था में झांक सकते हैं जो हमारे बहुत करीब रहते हुए भी आमतौर पर हमें नजर नहीं आते। मिर्जापुर, सोनभद्र से लाकर महुए के पत्तों के बंडल पान की दुकानों पर बेचने वाले मुसहरों को पत्ता पीछे एक पैसे की आमदनी होती है। रेलवे स्टेशन पर नीम की दातुन बेचने वालों को एक छरका एक रूपए में पड़ता है और वे एक चार टुकड़े कर के आठ-आठ आने में बेचते हैं। चने का होरहा या मौसमी तरकारियां बेचने वालों को देर रात तक सड़कों पर ऐसे ग्राहकों का इंतजार रहता है जो दो रूपया कम ही देकर उनकी परात या खंचिया खाली कर दें। लोग चिप्स का पैकेट बिना दाम पूछे खरीद लेते हैं लेकिन उनसे इस अंदाज में मोल भाव करते हैं जैसे वे उन्हें ठगने के लिए ही आधीरात को सड़क पर घात लगाकर बैठे हों।

चूरन, चनामुरमुरा, गुब्बारे, फिरकी और प्लास्टिक के फूल बेचने वाले दस बीस रूपए की आमदनी के लिए सारा दिन गलियों में पैदल चलते रहते हैं। बनारस में अब भी पियरवा मिट्टी के ढेले बिकते हैं, जिन्हें शहनाज हुसैन सबसे बेहतरीन हेयर कंडीशनर बताती हैं। इन्हें बेचने-खरीदने वाले दोनों के लिए दो रूपया रकम है।

अभी मार्च के आखिरी हफ्ते में आयकर-रिटर्न भरने में सारा देश पसीना-पसीना हो रहा था। तरह-तरह के खानों वाले ठस सरकारी कागजों का अंबार था और कर विशेषग्यों की चौर्य-कला से विकसित देसी तिकड़में थी। जो चख-चख थी उसका सार यह था कि सरकार बड़ा अत्याचार कर रही है, यदि कोई ईमानदारी से इनकम-टैक्स भर तो भूखों मरेगा और उसके बच्चे भीख मांगेगे। लिहाजा बीमा के प्रीमियम, धर्माथ चंदे और मकान किराए की फर्जी रसीदों, एनएससी वगैरा के जुगाड़ं फिट किए गए ताकि अपना पैसा अपने पास रहे। .यहां कुछ हजार का सवाल था और सारनाथ की गाजरवाली के सामने अदद दो रुपयों का। क्या ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है। अगर आयकर विभाग को झांसा देकर कुछ हजार बचा लेने वाले बाबुओं और सड़क किनारे बैठी बुढ़िया के बीच खरीद-बेच के अलावा कोई और रिश्ता बचा हुआ है तो नहीं हंसा जाएगा।
वाकई, क्या ऐसा कोई रिश्ता है?

साभारः हारमोनियम

4.6.08

अपने पे आंखे मूँद, दूसरे की गलती देख, दूसरे की भैंस पे जोर से लाठी टेक

यशवंत जी,

नमस्कार भड़ास का नियमित पाठक हूँ. पढ़कर मन को बहुत तसल्ली मिलती है. कुछ दिन पहले मन मे विचार आया कि चलो एक ब्लॉग हम भी बनाते है सो अपने ज्ञान के आधार पे बनाने कि कोशिश की है. आपके अवलोकनार्थ प्रेषित कर रहा हूँ अगर आपको उचित लगे तो भड़ास पर एक छोटा सा कोना हमारे ब्लॉग को भी प्रदान कीजिएगा.


भड़ास के बारे मे ज्यादा कुछ तो नही कह सकता फिर भी इतना यकीन है कि अपने भड़ास को जन्म देकर उन लोगो का बहुत भला किया है जो न तो अपने मन कि व्यथा न तो घर पर और न ही ऑफिस मे कह पाते है भड़ास एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ पर लोग अपने मन की व्यथा रूपी रेलगाड़ी को मन माफिक गति से दौड़ सकते है. इतनी बात लिखने क बाद भी अप सोच रहे होंगे कि कौन है ये, सो हमारा नाम सुमित है। कानपुर में मीडिया में हूँ। आपके कानपुर प्रवास के समय आपसे कई बार भेंट भी हुई.

एक बार फिर आपको भड़ास के लिए शुभकामनाये.

अपने ब्लॉग का लिंक प्रेषित है.

http://sumit-eventmanagement.blogspot.com

आपका कनिष्ठ
सुमित


-------------------------------------------
सुमित के ब्लाग पर पड़ी इकलौती पोस्ट ये है..
-------------------------------------------

कारपोरेट चालीसा

जब नया नया कोई आता है तो मन ही मन मुस्काता है
कंपनी ये बड़ी भारी है लोग कहते है सरकारी है
ऐश यहाँ पर खुल्ली है, काम बहुत मामूली है
पर जब सच से टकराता है, सर उसका चकराता है जनता
यहाँ निराली है सारे रंगों वाली है
बारह बजे कुछ आते है कुछ ६ बजे ही जाते है
कुछ की लाइफ ऑफिस मे ही कटने वाली है
क्यूंकि न घर है न घर वाली है
यहाँ पांच पॉइंट पर रेटिंग है
कुछ असली है कुछ सेटिंग है
शो ऑफ़ का यहां पर बहुत बड़ा है खेल
थोड़ा सा काम करो और सबको भेजो मेल
प्रोजेक्ट से रोजी रोटी है पर गगरी थोडी छोटी है
प्रोजेक्ट लेने जाते है कुछ मिलते है कुछ रह जाते है
केवल क्लाइंट है जो हमको नचाता है,
उसको खुश करने मे अपने बाप का क्या जाता है.
क्यूंकि केवल क्लाइंट है जो हमारी रोज़ी रोटी चलाता है
पैसा तो मोह माया है, कंही धूप कंही छाया है
काम मी मर्जी दिल की है, तनखा तो चूहे के बिल सी है
कुछ मृग मरीचिका मे फँस जाते हैं, कुछ निकल मोक्ष को पाते हैं
अपने पे आंखे मूँद के दूसरे की गलती देख,
दूसरे की भैस पे जोर से लाठी टेक
दूसरे की गलतियाँ बॉस को बता,
शाबासी के साथ मे इनाम भी शायद पा
कैसे भी उल्लू सीधा कर वीसा लेकर भाग
कब तक सोया रहेगा अब तू मूर्ख जाग
लगा हुआ है यह संपर्को का जाला
सफल वही है जिसने कोई लिंक निकाला
काम का नाटक कर मचा नही कुछ शोर,
तेरे अंधियारे गाव में कभी तो होगी भोर।
माला ये पुरी हुई मनका एक सौ आठ,
मोक्ष को पाए वही नित्य करे जो पाठ।
---------------------------------
-सहयोगी पंकज राजपूत की रचना
---------------------------------
(भाई सुमित, आपने याद दिलाया तो बिलकुल याद आ गया। आपके ब्लाग की इकलौती रचना को भड़ास पर डाल दिया है। शानदार है कारपोरेट चालीसा। इसमें आपने सारे सचों को व्यंग्यात्मक तरीके से कह दिया है। आप अपने ब्लाग पर रेगुलर लिखते रहें। कभी दिल्ली आना हो तो फोनियाइयेगा। .....यशवंत )

2.6.08

बोलना आज की डेट में कई लोगों को खटक सकता है, इसलिए चुप ही रहते हैं

(कुमार विनोद जी ने एक मेल के जरिए अपने ब्लाग के बारे में जानकारी दी तो उत्सुकतावश क्या सीन है http://kyascenehai.blogspot.com के पास पहुंच गया। इसमें सबसे मजेदार मुझे उनकी प्रोफाइल लगी जो कितनी सच्ची और खरी-खरी खुद के बारे में कही गई है। सच में, ये तो साक्षात भड़ासी जान पड़ते हैं। तो लीजिए कुमार विनोद के बारे में और उनके ब्लाग के बारे में जानिए। यह कवायद दूसरे अच्छे ब्लागों व ब्लागरों को प्रमोट करने के क्रम में की जा रही है ताकि उनके लिखे को पूरी दुनिया के हिंदी वाले जान सकें, पढ़ सकें.....यशवंत)


कुमार विनोद की प्रोफाइल

कुमार विनोद
Age: 33
Gender: Male
Astrological Sign: Cancer
Zodiac Year: Tiger
Industry: Telecommunications
Location: अब तो दिल्ली वाले हो गए हैं : क्रांति प्रदेश : India
About Me
पेशा तो है हमारा- आप कहें और हम जानें का, क्योंकि हमारे पेशे में सुनने की सख्त हिदायत है. मगर लगातार सुनते रहने की क्रिया कालांतर में ऐसी प्रतिक्रिया करती है कि अगर 'रसायन' को बाहर न आने दें तो खाज शुरू हो जाती है. लेकिन दिक्कत ये है कि बोलना आज की डेट में कई लोगों को खटक सकता है, इसलिए अक्सर चुप ही रहते हैं-(वैसे भी डेस्क जॉब इसकी ज्यादा गुंजाईश भी नहीं छोड़ता)लेकिन प्रकृति का नियम है, 'जो अंदर जाता है वो बाहर आता है, भले ही निकलने का अनुपात अलग हो.' इस तरह अपने लेखन को उत्सर्जन कह सकते हैं- और कहें भी क्या?

कुमार विनोद के ब्लाग से


कमिंग अप...

अरसा हो गया आपसे मुखातिब हुए.

आप उपरोक्त वाक्य की नाटकीयता पर मत जाइए, वाकई अरसा हो गया खामोश हुए.

आप कह सकते हैं इस खामोशी को निर्जन चुप्पी, एक मरी हुई खामोशी. मैंने अपने होने का आखिरी निशान (पोस्ट) मोहब्बत के पर्व से ठीक एक दिन पहले दिया था (13 फरवरी), और आज जब मैं अपना होना फिर से साबित कर रहा हूं, ये आतंक की अगली रात है- जयपुर ब्लास्ट के गुबार से भरी हुई, खून में सनी, कराहों में लथपथ, टूटे हुए भरोसों की एक काली रात...

बात जिस निर्लज्ज नायक के साथ खत्म हुई थी, ये रात उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हो चुकी है. वो नायक अपनी करतूतों की वजह से खुद हास्यास्पद हो गया है, वो जितनी जोर से मराठा राग अलापता है, खुद को महाराष्ट्र का अकेला हितैषी बताता है, लोग अब उतनी ही जोर से बोलने लगे हैं- देखो, फिर बोला राज, अगर हमारी टीवी की भाषा में कहें तो राज ने फिर उगली आग, फिर उगला जहर, अब आखिर हम कितनी बार कहें फिर, हर दूसरी बात तो ये फिर-फिर हो जा रहा है, 'राज' के साथ खबर की स्क्रिप्ट भी हास्यास्पद होती जा रही है, सो मैंने रियेक्ट करना छोड़ दिया...क्या मुंह लगाना!

लेकिन, ये चुप्पी ठीक नहीं थी...

पता नहीं आज ऐसा क्यों लग रहा है, क्यों लग रहा है कि आदमी का अपनी खोल में दुबक जाना खुदकुशी के बराबर है, गुलाबी शहर की जख्मी गलियों ने जागती आंखों के तमाम सपने बेमानी कर दिए हैं, डर लगता है अब कभी खुद को लेकर खुशफहमी पालने में, जिंदगी इतनी सस्ती हो चुकी है नफरत के सौदगारों के लिए. वैसे साबित तो इन्होंने कई बार किया है- कि जब जब कोई मजहब या पंथ, राष्ट्र या समुदाय का अगुवा बनने की कोशिश करता है, उसका इकलौता हितेषी होने का दावा करता है, वो फिर इंसान नहीं रह जाता, क्योंकि वो इंसानियत की कीमत पर अपने संबंधित समुदाय का अस्तित्व चाहता है, इसे हासिल करने के लिए वो लाशें बिछा सकता है, और जब उसका अस्तित्व कायम हो जाए, तो भी लाशें बिछाने का सिलसिला नहीं थमता, क्योंकि तब वो अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए वो
तरकीब लगाता है- डिवाइड एंड रूल...

किसी को लग नहीं रहा है, लेकिन ये फार्मूला आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हो चुका है. धमाके अब दहशत पैदा करने से ज्यादा, भाईचारा तोड़ने के लिए किये जा रहे हैं. आतंकवादी तो आतंकवादी दुनिया भर के सियासतदान भी यही फार्मूला अपना रहे हैं.

ये बेहद खतरनाक समय है, ये वक्त खामोश रहने का नहीं हैं, जिंदगी को हमें हमेशा 'टीज'* करते रहना होगा, ताकि अगली सांसों को चलते रहने का भरोसा पहले ही मिल जाए, टूटते हुए भरोसे को जुड़े रहने का आस मिल जाए, घुटती हुई आस को ख्वाबों का जहां मिल जाए, और दर्द से कराहते जहां के जख्म को इंसानी मरहम मिल जाए. So, lets fire the band- Coming up next

*(टीवी की भाषा में टीज करना ब्रेक से पहले अगली खबर की झलक दिखाने को कहते हैं, ये दर्शको को बुलेटिन से बांधे रखने का पॉपुलर फार्मूला है.)

कुमार विनोद के ब्लाग क्या सीन है http://kyascenehai.blogspot.com से साभार

9.5.08

सिद्धार्थ जोशी के नए कम्युनिटी ब्लाग कहावतें का स्वागत करें

(सिद्धार्थ जोशी ने मुझे मेल करके जानकारी दी है कि उन्होंने एक नया कम्युनिटी ब्लाग कहावतें नाम से शुरू किया है। मैं उनके मेल को भड़ास पर डाल रहा हूं, इस उम्मीद के साथ कि नए ब्लाग बनने और खासकर कम्युनिटी ब्लाग बनने से न सिर्फ हिंदी का भला होगा बल्कि हिंदी वालों का भी भला होगा। आप सभी से अनुरोध है कि सिद्धार्थ का इस नए कम्युनिटी ब्लाग के लिए हौसलाअफजाई करें....यशवंत)

-------------------------------
कहावतें
http://kahawatein.blogspot.com/
------------------------------
कहवातें...इस थीम पर आप सभी का सहयोग मिले तो ब्लॉग के जरिए एक ओर हम रोजाना नई नई कहावतों से रुबरू हो सकेंगे वहीं दूसरी ओर यह विधा अधिक समृद्ध होगी।
कम से कम इस पर आपके सुझाव तो अमूल्य ही रहेंगे। ब्लॉग की सदस्यता के लिए भी आप आमंत्रित हैं
अपना ई मेल पता और जानकारी मुझे भेजिए, मैं ब्लॉग लेखक के रूप में आपको आमंत्रण भेजता हूं।

बेहतर भविष्य और बेहतर ज्ञान की आशा के साथ...

सिद्धार्थ जोशी
बीकानेर
imjoshig@gmail.com

29.1.08

नयी उम्मीद

भड़ास की वजह से मैं खुद भी ब्लागिंग की दुनिया में उतर गया हूं। मैंने नया ब्लाग आखिरकार बना ही लिया। इसे आप देखें और आप अपनी राय जरूर दें। हौसलाअफजाई करेंगे तो ब्लागर के रूप में काम करने में मजा आएगा। मेरे ब्लाग का नाम है, नई उम्मीद


धन्यवाद
दिलीप
http://naiumeed.blogspot.com

18.12.07

एक नया ब्लाग-- बेहया, आइए स्वागत करें

आजकल दौरे पर हूं। आगरा में। आफिसियल काम निपटाने के साथ साथ मित्रों-दोस्तों और अग्रजों से भी मिलना जुलना हो रहा है। इसी क्रम में एक ऐसे पुराने साथी मिले जो बनारस से लेकर मेरठ तक आफिस और परिवार के हिस्से बने रहे। आजकल आगरा में है। नाम है जेपी नारायण। पेशे से पत्रकार हैं लेकिन दिल से कवि और एक अच्छा इंसान। अपनी जमीन और अपने मनुष्यों की फिकिर चिंता में हमेशा बेचैन से रहते हैं। इस मतलबपरस्त दौर में अपने दिल का हाल कहें तो किससे कहें। सो, संवेदनाओं को शब्दों का रूप देकर उसे कागज पर उतार देते हैं। देखते देखते एक दशक बीत गया और उनके पास इकट्ठी हो गईं ढेरों कविताएं। संकोची स्वभाव के कारण वे कभी कोशिश नहीं किए कि इन कविताओं को पुस्तक का रूप दिया जाए। बाद में जब दोस्तों ने उनकी कविताओं को कई बार सुना तो सलाद दे डाली कि इन्हें तो प्रकाशित कराया जाना चाहिए लेकिन जेपी जी टालते रहे। आखिर में मित्रों के दबाव में उन्हें अपने कविताओं को प्रकाशन के लिए देना पड़ा।

दो कविता संग्रह हैं उनके। ज्यादातर वक्त आफिस में बीतता है और बाकी वक्त घर गृहस्थी चलाने में सो इंटरनेट और ब्लागिंग से दूर ही रहते लेकिन जब मैं आगरा में उनके घर मिला और ब्लागिंग के बारे में जानकारी दी, साथ ही उनके कंप्यूटर पर उन्हें ढेर सारे ब्लाग दिखाए तो उनका भी मन हुआ की हिंदी के इस विश्व विजय के इस अभियान में वे भी शरीक होना चाहेंगे, अपने ब्लाग के जरिए। बस क्या था, नेकी और पूछ पूछ। मैंने तुरत फुरत उनका ब्लाग बनवा डाला। एक आपरेटर की तरह उन्हें ब्लाग के तकनीकी और क्रिएटिव पक्ष समझाता रहा और वे एक ब्लागर की तरह अपने ब्लाग के नाम से लेकर उसकी पंचलाइन तक पर सोचते विचारते और सुझाते रहे। इस क्रम में जन्मा बेहया। आप जब उनके ब्लाग पर जाएंगे तो उनकी जो पहली इंट्रोडक्ट्री पोस्ट हैं उसमें ब्लाग के नाम के बारे में व्याख्या भी पाएंगे।

तो मैं सभी ब्लागर दोस्तों, भड़ासियों और पाठकों से अनुरोध करूंगा कि वो बेहया ब्लाग को जरूर पढ़ें और जेपी नारायण जी का उत्साहवर्द्धन करें ताकि हिंदी ब्लागरों की दुनिया में एक नये शख्स का मनोबल बढ़ सके। उनके ब्लाग का यूआरएल इस तरह है....
http://behaya.blogspot.com

आगरा के बाद मथुरा और वृंदावन जाना है, वहां से लौटकर आने पर फिर तफसील से बात होगी, तब तक के लिए जय भड़ास...
यशवंत