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9.4.09

अरे ब्लागरों, थोड़ा बच्चा बन जाओ, जरा बाल सजग पर घूम आओ

कविता- बंदर
कटी दल पर बैठा बन्दर
ले कर केला और चुकंदर
लम्बी चोटी उसके सर पर
लम्बी पूंछ है उसके ऊपर
कभी - कभी वह घर के अन्दर
लेकर सिर पर एक कलेंडर
लेके बंदरिया अपने संग
करने लगा रंग में भंग
-सोनू
कुमार
अपना घर

कक्षा 7
पेंटिंग:- आदित्य कुमार
अपना घर
कक्षा 6

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आजकल जब लोग मैं मैं मैं मैं करते हुए लिखते पढ़ते पढ़ाते बतियाते गरियाते चले जा रहे हैं, ऐसे में कोई शख्स बच्चों की बात करे, उनकी कविताओं और पेंटिंग को प्रकाशित करे, वो भी एक डेडिकेटेड ब्लाग बनाकर तो उसकी भूरि भूरि तारीफ की जानी चाहिए। लेकिन हम लोगों की आदत तो सनसनी पढ़ने पढ़ाने बतियाने और सुनाने की होती है। किसी ने किसी को गरिया दिया तो वो सब खूब पढ़ा जाएगा लेकिन कोई किसी दूसरे के हित में जी रहा है तो उस पर कोई ध्यान नहीं देगा। बाल सजग ब्लाग के महेश जी का मेल मिला कि उनके ब्लाग को भड़ास के कोने में दर्ज करें तो इस ब्लाग को खोला। मजा आ गया। क्या कविताएं हैं बच्चों की। कहानियां हैं। पेंटिंग हैं। प्लीज, आप लोग एक बार बाल सजग पर जाएं और महेश जी की हौसलाअफजाई जरूर करें, इतना शानदार ब्लाग बनाने और चलाने के लिए....।
उपरोक्त रचना बाल सजग से साभार ली गई है।
बाल सजग का पता है-
http://balsajag.blogspot.com
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आभार
यशवंत

10.3.08

मैं कोई बड़ा ग्राहक हूं.....



आज पहली बार किसी ऐसे मुद्दे पर लिखने की कोशिश करती हूं कि जो शायद मेरे जैसे लैंगिक विकलांग लोगो से संबंधित नहीं है । कल मैं रेड लाइट एरिया में वीकली रिपोर्ट क्लेक्ट करने गयी थी । हमारे डा. भाई के बार बार बोलने पर उनका दिया हुआ खादी का कुर्ता पैजामा पहन कर गयी । मुझे साड़ी पहनने की आदत है तो कुछ और पहनना अजीब लगता है । उधर जाने पर एक घटना हुई जो आप बड़ी-बड़ी बाते बताने वालों के लिये दिलचस्प न हो क्योंकि मैं दुनिया देश और समाज की बड़ी बातों के बारे में सोच ही नहीं पायी कभी भी । मेरे उधर पहुंचने पर एक छोटा बच्चा जो मुझे नहीं पहचानता था लेकिन सुन्दर सा भगवान बालगोपाल की तरह सा ,तो मैंने उसे गोद में उठा लिया और प्यार किया एक टाफ़ी भी दी खाने को तो अगले ही पल वह बच्चा मेरी गोद से कूद कर मां के पास भागा यह चिल्लाता हुआ कि मम्मी कोई बड़ा ग्राहक आया है । ये बात शाय्द पहले भी सुनी होगी पर ध्यान ही नहीं गया था लेकिन आज खादी के कुर्ते ने जहां मुझे यह बात सुनने के लिये कान दिये तो दूसरी ओर उस बच्चे को मेरे बारे में ऐसी सोच कि मैं कोई बड़ा ग्राहक हूं जो उसके लिये टाफ़ी भी लाया हूं । यह बच्चा कल बड़ा होकर परिवार,समाज और देश को क्या देगा आप बड़े मुद्दों पर बात करने वाले लोग सोचिये ,मैंने तो वो कपड़े ही समुन्दर की खाड़ी में फेंक दिये लेकिन उसकी सोच कैसे बदलूं उन कपड़ों के लिये.......................
नमस्ते ,जय भड़ास