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20.8.08

तोरी मरजी है क्या बता दे बिधना रे...

मशहूर पत्रकार, ब्लागर और अब फिल्म निर्देशक पंकज शुक्ल इन दिनों अपनी फिल्म भोले शंकर के निर्माण के बारे में अपना पूरा अनुभव अपने एक नए ब्लाग क़ासिद पर लिख रहे हैं। उन्होंने एक मेल के जरिए अनुरोध किया....बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म भोले शंकर की मेकिंग इन दिनों मैं अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं, कृपया सुझावों और टिप्पणियों से अवगत कराएं। तो मैंने सोचा कि मैं अकेले क्यों सुझाव और टिप्पणियां दूं, क्यों न सारे भड़ासियों को इस शुभ काम में शामिल किया जाए। इसी उद्देश्य से पंकज के ब्लाग क़ासिद से साभार एक पोस्ट यहां डाल रहा हूं और आप सभी से उम्मीद करता हूं कि पंकज भाई के ब्लाग क़ासिद पर जाकर उनके अनुभवों से दो चार हों।
यहां यह बता दें कि पंकज भाई अपने जैसे ही सामान्य परिवार और ठेठ हिंदी पृष्ठभूमि के साथी हैं। आज वो जहां पर हैं, उसमें किसी गाडफादर का कोई हाथ नहीं है। वे सिर्फ अपनी प्रतिभा और अपने दम पर आगे बढ़ते चले गए। उनसे हम सभी को प्रेरणा मिलती है।
बरेली में अमर उजाला से करियर की शुरुआत की और पत्रकारिता में अपने मेहनत के बल पर धीरे-धीरे बढ़ते चले गए। वे अमर उजाला, कानपुर में भी रहे। इसके बाद दिल्ली आए। प्रिंट से इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर मुखातिब हो गए उसके बाद मीडिया की दुनिया को छोड़कर मायानगरी की ट्रेन पकड़ ली। वहां फिल्म बनाने का जो सपना देखा था, उसे उन्होंने अपनी प्रतिभा, अपने संघर्ष और एक जूनून के जरिए पूरा कर दिखाया। भोले शंकर फिल्म की रिलीज का इंतजार हम सभी भड़ासियों को है। इस फिल्म के पांच सौ टिकट तो हम भड़ासी खरीदेंगे ही।
पंकज भाई से बस एक अनुरोध है कि अगर अगली फिल्म कोई प्लान कर रहें हों तो उसमें मुझे और डा. रूपेश श्रीवास्तव को विलेन और उसके गैंग का रोल जरूर दे दें वरना....जानी, हम भड़ासी बड़े खूंखार और बदनाम लोग हैं। हम पत्थर से तेल और तेल से पत्थर निकालना जानते हैं.....:)
-यशवंत
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भोले शंकर (7)
गतांक से आगे..



मनोज तिवारी ने "भोले शंकर" में कुछ और भी बहुत उम्दा गीत गाए हैं। लेकिन, मनोज तिवारी और मोनालिसा पर फिल्माया गया रोमांटिक गीत - "केहू सपना में अचके जगा के" प्यार में खोए प्रेमियों के लिए सावन की फुहारें लेकर आएगा। और, इस गीत में मनोज तिवारी के लिए अपनी आवाज़ दी है मशहूर गायक उदित नारायण ने। अगर फिल्म में मेरे फेवरिट गाने की बात करें तो मुझे पसंद है फिल्म का वो विरह गाना जो पूनम ने गाया है।

सारेगामापा फाइनलिस्ट रहीं पूनम की निज़ी ज़िंदगी के बारे में सुनकर मैंने अपनी पत्नी को कई बार घर में रोते देखा है। पूनम को प्लेबैक सिंगिंग के लिए कई लोगों ने वादे किए, लेकिन कितने पूरे हुए, इस बारे में ना तो कभी ज़ी टीवी ने कुछ भी बताने की कोशिश की और ना ही कभी मीडिया में कहीं कोई चर्चा सुनाई दी। पूनम का आवाज़ में दर्द बहुत है, कुछ तो जीवन के संघर्ष का और कुछ उसकी आवाज़ पर ऋचा शर्मा का असर का। "भोले शंकर" के संगीत पर चर्चा के दौरान ही मैंने पूनम का नाम उस गाने के लिए संगीतकार धनंजय मिश्रा को सुझाया, जो फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है। भोले की बचपन की दोस्त पारवती की पूरी जवानी की कहानी इस गाने में दूसरे सिरे पर पहुंच जाती है। पूनम की गायिकी के बारे में बात करने से पहले कुछ बातें इस गीत को लिखने के बारे में भी बताता चलूं।

गीतकार बिपिन बहार ने जितनी मेहनत फिल्म के ओपनिंग सॉन्ग "रे बौराई चंचल किरनिया" के लिए की है, उससे कम मेहनत इस गाने के लिए भी नहीं हुई। मैंने बिपिन को समझाना शुरू किया। धनंजय मेरा मुंह ताक रहे हैं। मैंने बिपिन को बताया, "पारवती ने बस अभी अभी भोले को बरसों बाद देखा है। भोले बचपन में शहर जाते समय लड़कई में उससे बोले जाता है, "ए पारवती, जब हम पढ़ लिख लेम, त तोहरा से बियाह करब"। बस पारवती उसी दिन से भोले की याद में गुम है। भोले लौटता है, तो पारवती के घर पर उसकी शादी कहीं और किए जाने की बात चल रही है। दोनों संस्कारी घरों से हैं और जैसा कि अक्सर गांवों में होता है, दोनों में से कोई घरवालों का विरोध नहीं कर पाते। पारवती की शादी तय हो चुकी है। वो रात के अंधेरे में भगवान से अपने दिल का दर्द सुना रही है। गाने का ये पहला हिस्सा है। दूसरे हिस्से में आते आते हमें पारवती की शादी होते हुए दिखानी है। और तीसरे हिस्से में हमें पारवती की विदाई दिखानी है। शॉट कुछ यूं होगा कि कैमरा गांव से बाहर निकलती डोली को कैच करता है, उसे फॉलो करते हुए आगे बढ़ता है और जैसे ही डोली फ्रेम से आउट होती है, कैमरा पैन करते हुए दूर एक टीले पर खड़े भोले को कैच करता है। भोले वहां पारवती को दिलासा देने वाला गाना गा रहा है।

"बिपिन बहार पूरा नरेशन सुनने के बाद आधा घंटा तक कुछ बोले नहीं। फिर बोले, "भइया, इ कइसन होई।" मैंने कहा, "काहे ना होई।" मैंने पूरे गाने का स्टोरी बोर्ड बिपिन को फिर से समझाया। इस बार एक एक एक्शन और उसके भाव के साथ में। अब तक शांत बैठे रहे धनंजय मिश्रा के चेहरे के भाव इस बार बदलने लगे। उनके हाथों में जुंबिश हुई और मुंह से कुछ राग निकले, और साथ ही निकला गाने का पहला बोल- "तोरी मरजी है क्या, बता दे बिधना रे...., काहे मोरा पिया ना मिला...ना मिला रे...काहे मोरा पिया ना मिला।" बस इसके बाद तो जैसे बिपिन बहार को राह मिल गई। भाई ने तीन दिन में गाना लिख डाला। लेकिन आखिरी हिस्से पर आकर वो अब भी अटके हुए थे। बोले, "भइया इ बताइं, भोले को पारवती से प्यार था कि नहीं।" मैंने कहा, "जिस उमर में हमने भोले और पारवती को साथ खेलते दिखाया। उस उमर में बच्चे प्यार का मतलब समझते हैं क्या? गांव की लड़की है, बस किसी सयाने पर दिल हार बैठी। लेकिन भोले को इसका इल्म तक नहीं। हां, मां कुछ इशारा करती है तो बात उसकी समझ में आती है। लेकिन तब तक देर हो चुकी है। तो भोले क्या गाएगा?" बिपिन बहार फिर चुप, "भोले क्या गाएगा?"दो दिन तक माथा पच्ची चलती रही। और फिर निकले बोल- "किस्मत ना बा अपना हाथ में, खुश रहे तू सजनवा के साथ में।"

मनोज तिवारी वैसे तो उछल कूद वाले गाने ही खूब गाते हैं, लेकिन फिल्म में मैंने उनसे दो जगह दर्द भरे नगमे गवाए हैं। पहला तो ये और दूसरा जब वो मुंबई में होते हैं और ज़िंदगी के सबसे बड़े इम्तिहान से दो चार होते हैं। और मेरा वादा है कि मनोज तिवारी की आवाज़ का इतना बेहतरीन इस्तेमाल अभी तक उनकी किसी फिल्म में नहीं हुआ है। जिस गाने की ऊपर हम बात कर रहे हैं, उसकी शुरुआत पूनम के गाने से होती है। लखनऊ की इस लड़की को अपनी फिल्म में मौका देकर एक तरह से मैंने और धनंजय ने उत्तर प्रदेश के कलाकारों को बढ़ावा देने की अपनी अघोषित नीति को आगे बढ़ाया और पूनम ने भी अपना दिल उड़ेल कर रखा दिया है इस गाने में। गाने के बोल बहुत मार्मिक हैं और इतना ही मार्मिक है इसका पिक्चराइजेशन। पूनम तुम यूं ही जगमगाती रहो।

वैसे एक दिलचस्प बात भी आपको मैं बताना चाहता हूं। जैसा कि गांव- गलियों की लड़कियों के साथ अक्सर होता है, वैसे ही पूनम भी अब तक मुंबई की चकाचौंध देखकर घबरा जाती हैं। स्टूडियो में रिकॉर्डिंग की बात चलते ही नर्वस हो जाती हैं। ऐसे में संगीतकार के हाथ पांव फूलने ही लगते हैं। मैंने दोनों को हिम्मत बंधाई और तब जाकर ये गाना रिकॉर्ड हुआ। मौली और उज्जयनी की बात अब भी रह गई, खैर इन दोनों नगीनों की बात कल पक्की रही।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक-भोले शंकर

(साभार-पंकज शुक्ल के ब्लाग क़ासिद से)

3.8.08

हथौड़ा चालू

बड़े भाई

मेरा ब्लॉग हथौड़ा चालू हो बया है। गूगल ने आज ही उसका ताला खोला है।

आपका
अंशुमाली

(इस मामले को जानने के लिए पहले की पोस्ट पढ़ें...अंशुमाली का ब्लाग गूगल ने किया लाक)



बधाई हो अंशु भाई....अंत में सच की जीत होती ही है, थोड़ी देर व अंधेर से घबराने की जरूरत नहीं। यशवंत

2.8.08

Impact: सेक्स बनाम संचार क्रांति भाग-1

पहले मै आपको एक किस्सा सुनाता हूं।

आज से करीब पंद्रह साल पुरानी बात है। टीवी पर उन दिनों परिवार नियोजन का एक विज्ञापन आता था। तब हमारे यहां पूरे परिवार के साथ टीवी देखने का चलन था। जैसे ही वह विज्ञापन आने को होता, मेरे दादा जी मुझे पानी लाने के बहाने कमरे से बाहर भेज देते। मुझे ताज्जुब होता कि दादा जी को रोज एक निश्चित समय पर ही प्यास क्यों लगती है। बाद में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि उस समय परिवार नियोजन का विज्ञापन आता था।

लेकिन अब यह बीती बात हो गई है। अब तो दादा जी खुद विज्ञापन में बच्चों को समझाते नजर आ सकते हैं कि एड्स से बचाव के लिए सुरक्षित सेक्स कितना जरूरी है। फिल्म खुद्दार में करिश्मा कपूर पर 'सेक्सी, सेक्सी, सेक्सी मुझे लोग बोले' गाना फिल्माया गया तो हंगामा मच गया। गाने पर बैन लगा और 'सेक्सी-सेक्सी' की जगह 'बेबी-बेबी' करना पड़ा। डेढ़ दशक में ऐसा बदलाव आ गया कि अमिताभ की चीनी कम में आठ साल की एक बेबी का नाम 'सेक्सी' है।

पर यह सिर्फ फिल्मों की बात नहीं है, संचार क्रांति के साथ-साथ पूरे समाज में सेक्स क्रांति आ चुकी है। सेक्स की खुले आम चर्चा कभी वर्जित रही होगी लेकिन आज सेक्स शायद हमारी दैनिक बातचीत का हिस्सा बन गया है। वह जमाना और रहा होगा, जब लोग डॉक्टर से भी सेक्स के बारे में संकोच के साथ बात करते थे। आज सब कुछ खुला और साफ है।

सेक्सोलॉजिस्ट डॉ पी के जायसवाल से एसएमएस द्वारा ऑनलाइन प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में पूछे गए इस सवाल को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि सेक्स चर्चा अब कितनी ओपेन है। सवाल अंग्रेजी में था, मै यहां उसका शालीन भावार्थ दे रहा हूं-मैं 24 वर्षीय युवती हूं। मैं जानना चाहती हूं कि सेक्स क्षमता बढ़ाने के लिए क्या कोई दवा है? मेरे ब्वॉयफ्रेंड ने सब-कुछ आजमाकर देख लिया। मैं आपसे मदद चाहती हूं कि आप मुझे कुछ अच्छी टैबलेट्स बता दीजिए जिससे ।। धन्यवाद।

पंद्रह साल पहले पोते को पानी लाने भेजकर परिवार नियोजन का विज्ञापन न देखने देने वाले दादा जी अब इस पोते या पोती का क्या करेंगे?

एक के साथ एक फ्री की तरह संचार क्रांति के साथ-साथ सेक्स क्रांति भी भारत को उपहार में मिली है। जो लड़के -लड़कियां आपस में सेक्स की चर्चा करने में संकोच करते थे वे बिना हिचक नॉनवेज जोक्स एसएमएस करने लगे। रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी। एसएमएस में तो थोड़ा संकोच भी रहता है, क्योंकि उससे आपकी पहचान जुड़ी होती है, लेकिन इंटरनेट पर आप पहचान छुपाकर आसानी से सेक्सी चैट कर सकते हैं। यहां न कोई पहचान है न कोई बंधन, इसलिए बातें भी खुल्लमखुल्ला होती हैं। पर जरूरी नहीं कि वहां जो जवाब दिए जा रहे हैं वे सही ही हैं। कई बार तो लड़के -लड़की बनकर और लड़कियां लड़का बनकर चैट करती हैं। पर ये फैंटेसी की दुनिया है और इसका निर्मल आनंद लेने वाले इस चक्कर में नहीं पड़ते कि जिसे वे लड़की समझ के बात कर रहे हैं, वह भी उन्हीं की तरह कोई लड़का है। वैसे इस दुविधा से मुक्त करने की सुविधा भी बाजार ने उपलब्ध करा दी है। रसीली बातें, मजेदार बातें शीर्षक से टेलीफ्रेंडशिप के तमाम विज्ञापन छपते हैं, जिनमें दिए गए नंबर पर डायल करके आप अपना मन और जेब दोनों हलके कर सकते हैं।

अब जमाना विजुअल का है इसलिए सिर्फ आडियो से काम नहीं चल सकता, बाजार इस बात को अच्छी तरह जानता है। ब्लू फिल्मों का ट्रेंड तो काफी पहले से है। लेकिन ब्लू सीडी खरीदने के लिए आपको वीडियो पार्लर तक जाना होता था। इसमें भी संकोच होता था। संकोच सेक्स बाजार का सबसे बड़ा दुश्मन है, लिहाजा यह हर तरह का संकोच मिटा देना चाहता है। आपके छोटे से संकोच के खिलाफ अनगिनत पोर्न साइट्स हाजिर हैं। आप अपना कंप्यूटर ऑन कीजिए, सेक्सी-दुनिया आपका मनोरंजन करने को हाजिर है।

पर, जिस संस्कृति में पति-पत्नी अपने शयनकक्ष में भी दिया बुझाकर ही प्रेम करते थे, उसने क्या यूं ही सेक्स-बाजार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया? प्रतिरोध हुआ है पर बदलाव की लहर इतनी तेज थी कि तटबंध भी साथ में बह गए। ऊपर में जो मैने दादा जी वाला किस्सा बताया है, भारत में सेक्स-बूम की शुरूआत भी उसी दौर से होती है। जिस कपूर परिवार में लड़कियों को फिल्मों में काम करने की छूट नहीं थी, उसी की एक बेटी करिश्मा कपूर ने जब खुद्दार फिल्म में 'सेक्सी-सेक्सी मुझे लोग बोलें' गाया तो हड़कंप मच गया। गाने को बैन कर दिया गया तो इसे 'बेबी-बेबी मुझे लोग बोलें' करके रिलीज किया गया। हालांकि अभी भी सेक्सी-सेक्सी वाला वर्जन सुनने को मिलता रहता है। करिश्मा ने तो खुद को ही सेक्सी कहा था, लेकिन गो¨वदा तो उनसे भी दो कदम आगे बढ़कर अपनी पैंट और शर्ट को भी सेक्सी बताने लगे। इसके बाद सेक्स की जो आंधी चली उसमें प्रतिरोध के दरख्त उखड़ गए। चौदह साल पहले 'सेक्सी' को 'बेबी' बनना पड़ा था, आज बेबी को सेक्सी बना दिया गया। अमिताभ बच्चन की फिल्म चीनी कम में सात-आठ साल की एक बच्ची स्वीनी खैरा का नाम 'सेक्सी' रखा गया है। सेक्सी होना अब एक खिताब है। हाल ही में बिपाशा बसु को एशिया की सबसे सेक्सी महिला और शाहरुख को सबसे सेक्सी पुरुष का दर्जा मिला तो इनके भाव बढ़ गए।

क्रमश:.....

28.7.08

अब जर्नलिस्टों की क्लास बदल गई है, खबर समझने के लिए इन्हें खुद को डी-क्लास करना होगा- पुण्य प्रसून वाजपेयी

मशहूर पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का इंटरव्यू करते भड़ास4मीडिया के एडीटर यशवंत सिंह


''एनडीए शासनकाल ने ढेरों ऐसे जर्नलिस्ट पैदा किए जिनका खबर या समाज से कोई सरोकार ही नहीं है। इन दिनों में फेक जर्नलिस्टों की पूरी फौज तैयार हो गई। पैसे का भी आसपेक्ट है। चैनलों में एक लाख रुपये महीने सेलरी पाने वालों की फौज है। ये लोग शीशे से देखते हैं दुनिया को। इन्हें भीड़ से डर लगता है। आम जनता के बीच जाना नहीं चाहते। अब उनको आप बोलोगे कि काम करो तो वो कैसे काम करेंगे। मुझे याद है एक जमाने में 10 हजार रुपये गोल्डेन फीगर थी। हर महीने 10 हजार रुपये पाना बड़ी बात हुआ करती थी। ज्यादा नहीं, यह स्थिति सन 2000 तक थी। 10 हजार से छलांग लगाकर एक लाख तक पहुंच गई। इससे जर्नलिस्टों की क्लास बदल गई। उनको अगर वाकई असली खबरों को समझना है तो खुद को डी-क्लास करना होगा। वरना ये एक लाख महीने बचाने के लिए सब कुछ करेंगे पर पत्रकारिता नहीं कर पाएंगे क्योंकि इनका वो क्लास ही नहीं रह गया है।''

पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कई खुलासे किए। कई विचारोत्तेजक बातें कहीं। सहारा प्रकरण से लेकर आधुनिक पत्रकारिता के हाल पर अपने स्पष्ट विचार रखे।

संपूर्ण साक्षात्कार पढ़ने के लिए क्लिक करें भड़ास4मीडिया डाट काम

12.7.08

नोकिया एन सीरिज का प्रमोशन ऑफर

मित्रों,
अभी मुझे एक मेल मिला, मेल में नोकिया की तरफ़ से प्रमोशन ऑफर का जिक्र है,

FROM: NOKIA N SERIES PROMOTION
DATE: Thu, 10 Jul 2008 6:29:39 -0400
SUBJECT: NOTICE!!!(You Have Won)

FROM THE DESK OF THE MANAGER NOKIA N'SERIES PROMOTION Your e-mail was attached to ticket number 1110002786, serial number 6022345. This batch draws the lucky numbers as follows 4-13-7-37-1 bonus number 20, which consequently won the lottery in the First category. You hereby have been approved a lump sum of GBP 1,000,000.00(ONE MILLION GREAT BRITISH POUNDS).To file for your claim,Please contact our Fiduciary Agent for वलिदेशन

: Mr James Keegan।
Email: james.keegan@live.com

Regards, Dr Mrs। joys johnson
NOKIA! 2008 Lottery program

तो क्या नोकिया का ये नया व्यापार है रातोरात लखपति करोड़पति और पता नही कोन कोन सा पति।
दृष्टिपात करें.
जय जय भड़ास




भड़ास4मीडिया पर पदमजी का संपूर्ण इस्तीफानामा जल्द

हिंदी मीडिया के मशहूर खेल पत्रकार पदम पति शर्मा उन दिनों दैनिक हिंदस्तान में बनारस में सहायक संपादक हुआ करते थे। उन्होंने 26 अप्रैल 2002 को अपने अखबार के प्रधान संपादक को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा। पत्र को मेल से भेजने के तुरंत बाद उन्होंने संस्थान को टाटा बाय बाय बोल दिया। पदम जी का वह इस्तीफानामा कई मायनों में ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है। तीन दशकों तक हिंदी प्रिंट मीडिया के लिए खेल पत्रकारिता के पर्याय रहे पदम जी ने इस्तीफे में अपने पूरे खेल जीवन के मर्म को निचोड़कर रख दिया है।

इसमें उन्होंने अपने जीवन, अपने करियर, अपने मिशन, अपने दुखों, अपनी भावना, अपनी सोच को उजागर किया है। यह इस्तीफानामा भड़ास4मीडिया को एक अनाम सज्जन ने मेल के जरिए उपलब्ध कराया। पत्र पदम जी का ही है, यह कनफर्म करने के लिए भड़ास4मीडिया टीम ने पदम जी से संपर्क करने के लिए उनके पुराने दिनों के मित्रों और शिष्यों से संपर्क स्थापित किया। पदम पति का मोबाइल नंबर उपलब्ध होने पर जब उन्हें इस्तीफे में लिखी बातों को पढ़कर सुनाया गया तो पहले तो वे इस बात पर चौंके कि यह भड़ास4मीडिया तक कैसे पहुंचा, बाद में उन्होंने इस पत्र को वास्तविक बताया और इसे भूली बिसरी एक कहानी बताकर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की।

11.7.08

मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)

मुझे आजकल लगता है कि मैं कोई जमाने से यहीं खड़ा, हवा चले न चले सिर पटकता पेड़ हूं।

या कोई धूल से अटी पिचके टायर वाली जीप हूं जिसके स्टीयरिंग का पाइप काटकर मेरे गांव छोकरे लोहार से कट्टा बनवाने की सोच रहे होंगे।

या कोई हिरन हूं जिसकी सींगों को तरास कर, भुस भर दिया गया है और जिसकी कांच की आंखों में उजबकपन के सिवा कोई और भाव नहीं है।

कभी लगता है कि बीमार, मोटे, थुलथुल, सनकी, भयभीत और ताकत के नशे मे चूर लोगों से भरे एक जिम में हूं।

पसीने और परफ्यूम की बासी गंध के बीच मुझे एक ऐसी मशीन पर खड़ा कर दिया गया है जिस पर समय लंबे पट्टे की तरह बिछा हुआ है।

मैं उस पर दौड़ रहा हूं, पसीने-पसीने हूं, हांफ रहा हूं लेकिन वहीं का वहीं हूं।

कहीं नहीं पहुंचा, एक जमाना हुआ।

समय का पट्टा मुझसे भी तेज भाग रहा है।

अगर मैं उसके साथ नहीं चला तो मशीन से छिटक कर गिर पड़ूंगा और कोई और मेरी जगह ले लेगा।

मैं थक रहा हूं यानि समय जरूर कहीं न कहीं पहुंच रहा है।

मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)

जमाना हुआ, मैं कहीं गया ही नहीं।

कई बार सपनों में बेहद तेज हूक उठी लेकिन वह नींद में ही मर गई।

आखिरी बार मैं शायद............Read More......

6.7.08

और यूं बदला हमारा संडे एडिशन










जयपुर से नीलिमा सुखीजा अरोरा

किसी भी अखबार का स्पेशल हिस्सा होता है, संडे के दिन लोग आफिस की आपाधापी से मुक्त होते हैं और दिमाग में सिर्फ सुकून होता है, ऐसे में संडे का अखबार ऐसा होना चाहिए जो आपको पढ़ने के बाद रिलेक्स करे न किदिमाग भारी करे। अकसर संडे के अखबारों में संडे स्पेशल स्टोरीज करके अखबारको अलग होने का दावा कर दिया जाता है। लेकिन जब दैनिक भास्कर के संडेएडिशन को नया, अलग और ज्यादा करने की बारी आई तो इसे केवल संडे स्टोरी तकही सीमित नहीं किया गया।
तो कैसे बना संडे एडिशन स्पेशल
इस दिन के फ्रंटपेज को अलग करने के लिए हमारे स्टेट एडिटर कल्पेशजी ने अपनी टीम के साथ एक हजार से भी ज्यादा देशी-विदेशी अखबारों का अध्ययन किया कि जो हम शुरूकरने जा रहे हैं कहीं वो पहले से तो कहीं नहीं हो रहा है। उन्होंने अपनी टीम के साथ आइडियाज को जब शेयर किया तो कोई भी आम रोजमर्रा में इस्तेमालहोने वाला डिजायन या पेज एलिमेंट पहले ही चर्चा से बाहर कर दिया जाता था.क्योंकि हम एक ऐसा पेज बनाने वाले थे जो इतिहास रचने वाला है।
क्या रहा खास
संडे के प्रथम पृष्ठ के लिए हमने तीन एकदम नई प्रोपर्टीज खोजी , सबसेपहले था वाटर कलर। जिसमें हमने संडे के दिन सुर्खियों में रहने वाले किसीशख्सियत को चुना जो उस दिन खबरों में रहने वाला था। इस शख्सियत का वाटरकलर स्कैच बनाने का आइडिया पूरी तरह से नया था, हालांकि इससे पहले भीअखबार इस तरह के वाटर कलर स्कैच्स इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन इसे पूरीतरह से एक डेडिकेटेड पेज प्रोपर्टी बनाने का ख्याल किसी भी अखबार ने नहीं सोचा।

लगभग हर रविवार को कोई न कोई खबर ऐसी रहती है जो किसी एक आदमी केइर्द गिर्द घूमती है, चाहे वो बिल गेट्स हों या महंगाई रोक पाने में अक्षम वित्त मंत्री पी चिदम्बरम। हमारा अखबार भास्कर इस मामले में लकी भीसाबित हुआ, हमारे पास ऐसे चार बड़े कलाकार थे जिन पर हम भरोसा कर रहे थे, इंदौर से लहरी और कुमार, पंजाब से सुखवंत और कोलकाता से आए बिश्वजीत। लेकिन केवल एक बदलाव हमारा लक्ष्य नहीं थे, हमारे टीम लीडर हैं कल्पेश जी और उनके साथ काम करने वाले ही जानते हैं कि वो किस स्तर पर कामके मामले में गंभीर है। पत्रकारिता के प्रति उनका जो जुनून है वो रेअरली देखने में आता है.

दूसरी पेज प्रोपर्टी तय हुई संडे ग्राफिक जो संडे कीबड़ी खबर पर आधारित है। इसके लिए कोई भी एक विषय तय किया जाता है फिर इसपर हमारे डिजायनर्स और ग्राफिक आर्टिस्ट उसके लिए ग्राफिक्स बनाते हैं। ग्राफिक्स के मामले में भी हमारे पास एक से बढ़कर एक आर्टिस्ट हैं। मुम्बई में सुमन्त वर्मा तो नए उभरते दीपक बुडाना। इस संडे ग्राफिक्स कीखासियत भी इसकी फ्रेशनेस और एकदम अलग हटकर कन्सेप्ट रहा। हमने जितना सोचा था, उससे कहीं अच्छा रिस्पान्स हमें इन संडे पेजेस का मिला। पहले हीदिन जब नए लेआउट के साथ 15 जून को अखबार मार्केट में आया तो दिन भरपाठकों के एसएमएस आते रहे।
बात मास्टहैड की
किसी भी अखबार का लुक उसकामास्टहैड तय करता है, इसे साधारण डल मत्थे से कलरफुल, उत्साही मत्थे मेंबदलना बड़ा चैलेंज था, साथ ही जिसमें न्यूज एलिमेंट भी हों। मास्टहैड कोविजुअल अपील के लिए परफेक्ट माना गया और तब आया यह आइडिया की जो भी उसदिन का बेहतरीन फोटो होगा वो जगह बनाएगा मास्टहैड पर। 15 जून से अब तक लगातार हम तीन एडिशन निकाल चुके हैं और जो रिस्पान्स हमें मिला है वो माइंड ब्लोइंग हैं। लेकिन ये तो थी हमारी बात अब हम ये चाहते हैं कि आपलोग भी अपने सुझाव हमें दें, कमेंट्स या काम्पिलमेंट्स, सबका स्वागत है।

तीनों पेज उपर हैं, नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके भी आप इन्हें देख सकते हैं...
http://www.newspagedesigner.com/portfolios/portfolio1.php?UserID=14236

22.6.08

अरे हट जा ताऊ पाछे....दो ब्लागरों का स्वागत करें बढ़कर आगे...

दो ब्लागर साथी भड़ासी बन गए हैं। पीसी रामपुरिया और राजीव कुमार। पीसी रामपुरिया के ब्लाग का नाम है रामपुरिया....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा http://rampuriapc.blogspot.com/। राजीव कुमार के ब्लाग हैं दो टूक http://rajivguw.blogspot.com/ और विचार http://rajivkumar.mywebdunia.com/। राजीव पत्रकार हैं जो पूर्वोत्तर में हैं। पीसी रामपुरिया बिजनेसमैन हैं जो लोकल हरियाणवी लैंग्वेज में मस्त ताऊनामा पेश करते हैं। दोनों ब्लागरों की प्रोफाइल व ब्लाग जोरदार हैं। इन साथियों के भड़ासी बनने पर हम इनका सादर सत्कार करते हैं, अभिनंदन करते हैं और अपने डा. रूपेश जी व पंडित जगदीश त्रिपाठी जी से अनुरोध करूंगा कि वे जल्द ही इन दोनों भलेमानुसों को बुरामानुस बनाने की दीक्षा शुरू कर दें ताकि जो भी इन्हें देखे, पढ़े, जाने....भड़ासी है, भड़ासी है कहकर संबोधित करना शुरू कर दे और ये लोग खूब सोचकर भी यह तय न कर पाएं कि उन्हें भड़ासी कहा जाना उनका सम्मान है या अपमान है :) भई, हम तो इसे सम्मान मानते हैं पर कुछ सड़ियल भाई लोग इसे अपमान बताते हैं। ये आपको तय करना है कि सड़ियल लोगों के कहे के हिसाब से जीना है या अपनी सोच व विचार से जिंदगी के सफर को तय करना है। चलिए, भाषण काफी दे लिया, अब आप लोगों को इन दोनों ब्लागरों के ब्लाग से कुछ चीजें चुराकर पढ़ाते हैं, और हां, इनके ब्लाग को भड़ास के कोने में भी जगह दे दी गई है।
जय भड़ास
यशवंत



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ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
-पीसी रामपुरिया-
ताऊ लद्दा को भैंस चराते चराते अग्रेंजी बोलने का शौकचढ गया। और ताऊ को ठीक से हिन्दी भी नहीबोलनी आवै थी। पर क्या हो सकता है? ताऊ कै दिमागमे आ गयी, तो आ गयी। बहुत दिन तो घर पर ही प्रेक्टिस करता रहा, पर बात बणी नही। और ताऊ नैये पक्का इरादा कर लिया कि अग्रेंजी बोलना सीख के रहेगा। ताऊ बडा उदास हो रहा था। फ़िर किसी ने उसको बताया किपडोस के मोहल्ले मे एक मास्टरनी जी अग्रेंजी की क्लासलेती है और बहुत जल्दी अग्रेंजी सिखा देती है। सो मेरा मट्टा,ताऊ तो मास्टरनी के पास पहुंच लिया। और फ़ीस भी जमा करा दी । दो तीन महिने मे ताऊ थोडी बहुत अन्ग्रेजी की ऐसी तैसी करनेलग गया । इब एक दिन ताउ लद्दा के घर उसकी रिश्ते कीसाली आयी हुयी थी। ताऊ क्लास से शाम को घर आया, औरअपनी साली पर अग्रेंजी का रौब झाडने के लिये बोला -आइ लव यू ...रज्जो । साली भी पढी लिखी थी और अपने जीजा पर जान भीछिडकती थी, सो जवाब मे बोली - जीजा, आइ लव यू टू..! ताऊ लद्दा भी कहां चुप रहनै वाला था? ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
Posted by P. C. Rampuria View my complete profile

साभारः रामपुरिया.....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा
(आपको उपरोक्त ब्लाग पर ताऊ से संबंधित आपको मजेदार मजेदार पोस्टें पढ़ने को मिलेंगी)
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आजादी नहीं, बर्बादी में लगा है उल्फा
--राजीव कुमार--
उल्फा नेता बांग्लादेश में है। संगठन के बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। कारण बांग्लादेश में बैठे उल्फा के शीर्ष नेता वहां के कट्टरवादी संगठनों की बोली बोल रहे हैं। यह उनकी मजबूरी है। नहीं तो शरण कौन देगा। इसलिए बांग्लादेश के कट्टरवादी संगठनों को खुश करने के लिए उल्फा ने बम विस्फोटों की जिम्मेवारी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर डालनी शुरु कर दी है। उल्फा अब कोई विस्फोट करता है और उसमें यदि कोई मुस्लिम व्यकि्त मारा जाता है तो वह तुरंत इससे मुकर जाता है। गुवाहाटी के आठगांव और हाजो में हुए बम विस्फोट में मुसि्लम लोग मारे गए तो उसने देर किए बिना मीडिया में इसका खंडन भेजा। इन बम विस्फोटों के पीछे असम पबि्लक वर्क्स और आरएसएस के छात्र संगठन का हाथ होने का आरोप मढ़ दिया। अन्य विस्फोटों के मामले में वह इतनी हड़बड़ी नहीं दिखाता है। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,उल्फा बांग्लादेश में बैठे अपने मास्टरों को खुश करने के लिए यह करता है। बांग्लादेश में शरण के बदले उल्फा को वह सारी बातें माननी पड़ रही है जो असम के हितों के खिलाफ है। असम को आजाद कराने का सपना देखनेवाला संगठन इस तरह असम को ही क्षति पहुंचा रहा है।

बांग्लादेश से अबाध घुसपैठ होती है। इस पर वह चुप्पी साधे हुए है। वह बोल नहीं सकता। आसरा मिलने के कारण वह बेबस है। इसके चलते बांग्लादेश की वह योजना सफल होने की ओर बढ़ रही है जिसमें उसने निचले असम के कई जिलों को लेकर वृहतर बांग्लादेश बनाने का सपना देखा है। उल्फा के कंधे पर बंदूक रखकर वह इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

उल्फा का जन्म 7 अप्रेल 1979 को शिवसागर जिले के ऍतिहासिक रंगघर में हुआ था। पर उसने बांग्लादेश में शरण दस साल बाद 1989 में ली। जब उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आशंका हुई। जब उल्फा नेताओं ने बांग्लादेश में शरण ले ली तो राज्य में धीरे-धीरे मुसि्लम आबादी बढ़ने लगी। जानकार बताते हैं कि 1989 में उल्फा का एक नेता बांग्लादेश गया। उसने बांग्लादेश नेशनल पार्टी की तत्कालीन सरकार के एक मंत्री से मुलाकात की। इस बैठक के बाद ही पाकिस्तान के पेशावर में वहां की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटलीजेंस(आईएसआई)ने उल्फा के सदस्यों को 1990-91में प्रशिक्षण दिया। यह शुरुआत थी। लेकिन इसके पहले 1983 में उल्फा के चालीस सदस्यों ने म्यांमार के काचिन में एनएससीएन से हथियारों का प्रशिक्षण पाया था। इसमें उल्फा के सेना प्रमुख परेश बरुवा भी शामिल थे।इसके बाद 1986 में काचिन में 90 उल्फा सदस्यों ने प्रशिक्षण पाया। प्रशिक्षण पानेवालों में उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा भी शामिल थे। इसके बाद ही संगठन ने बांग्लादेश का रुख किया और असम के विनाश का दौर शुरु हो गया। 1971 की जनगणना के अनुसार ग्वालपाड़ा जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 50.11प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 41.50थी। लेकिन 20साल बाद पूरी छवि ही बदल गई। 1991की जनगणना में इस जिले में हिंदुओं की आबादी घटकर 39.89प्रतिशत पर आई जबकि मुसलमानों की बढ़कर 60.46 प्रतिशत पर पहुंच गई। यही हाल धुबड़ी जिले में हुआ। 1971की जनगणना के अनुसार धुबड़ी जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 38.80 प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 60.40 थी। लेकिन 1991की जनगणना के अनुसार इस जिले में हिंदुओं की जनसंख्या घटकर 28.73प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 70.45प्रतिशत हुई।ठीक इसी तरह बरपेटा जिले में 1971 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या51.52प्रतिशत और मुसलमानों की 48.65प्रतिशत थी। पर बीस साल बाद मुसलमानों की बढ़कर 56.07प्रतिशत और हिंदुओं की घटकर 40.26पर आ गई। हाइलाकांदी जिले में 1971की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 47.48 प्रतिशत और मुसलमानों की 51.40प्रतिशत थी।लेकिन बीस साल बाद हिंदुओं की आबादी इस जिले में घटकर 43.71प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 54.79प्रतिशत हो गई।राज्य के अधिकांश जिलों में हिंदुओं की जनसंख्या घटी है जबकि मुसलमानों की बढ़ी है।वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में हिंदुओं की जनसंख्या 64.9प्रतिशत और मुसलमानों की 30.9प्रतिशत थी जबकि 1991की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या 67.1और मुसलमानों की 28.4प्रतिशत थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 36 में मुस्लिम बहुसंख्यक है। भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से बांग्लादेशी घुसपैठियों का निरतंर आना जारी है।इन सबके बीच उल्फा ने हिंदीभाषी मजदूरों की हत्या कर बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोजगार का अवसर दे दिया है।स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रसूल हक ने निचले असम के कई जिलों को लेकर मुस्लिमों के लिए अलग से स्वायत्त परिषद बनाने की मांग की है।उधर उल्फा के सहयोग से राज्य में जेहादी तत्व सक्रिय है।इन सब ने मिलकर राज्य को गर्त में ले जाने का कार्य शुरु कर दिया है।मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,असम स्वाधीन होकर नहीं रह सकता। माना कि हो भी गया तो वह पराधीन ही होगा। उल्फा नेताओं को उसे बांग्लादेश के इशारे पर ही चलाना होगा।इन सब से यह स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में आसरा लेने की कितनी बड़ी कीमत उल्फा नेता चुका रहे हैं।जो आनेवाले दिनों में असम के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी।कारण बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण राज्य में भारी जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संपर्क पता-राजीव कुमार
पोस्ट बाक्स-12,
दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660

Posted by- Rajiv Kumar View my complete profile

साभारः दो टूक

(पूर्वोत्तर को जानने, उस इलाके से जुड़े़ नीतिगत मामलों के बारे में एक पत्रकार के नजरिये को समझने के लिहाज से यह ब्लाग बेहद उपयोगी है)

प्राइमरी का मास्टर

प्राइमरी के अध्यापकों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है. इस मंच पर आप अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं. एक प्राइमरी के मास्टर के रूप मे यदि आप समझते हैं की कुछ समस्याएँ हैं, तो हम भी मानते है की समस्याएँ हैं. क्यों नहीं इस मंच का प्रयोग इन समस्यायों के समाधान मे किया जाए. अगर बच्चे उस तरह नहीं सीख पाते है, जैसे उन्हे सिखाया गया है, तो क्यों नहीं उन्हें उस तरह से सिखाया जाए जैसे वो सीख सकें.

ये प्रस्तावना/भूमिका है एक ब्लाग का जिसका नाम है प्राइमरी का मास्टर http://primarykamaster.blogspot.com/। इस ब्लाग को चलाते हैं प्रवीण त्रिवेदी जो फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) जिले के रहने वाले हैं। उनके ब्लाग पर काफी अच्छी पोस्टें और अलग टेस्ट की पोस्टें पढ़ने को मिलेंगी। भाई प्रवीण जी ने भड़ासी बनने के लिए और अपने ब्लाग को भड़ास से जोड़ने का अनुरोध पत्र भेजा था तो मैं उनके ब्लाग को देखने पहुंच गया। काफी जोरदार और पठनीय ब्लाग है।

रवीश कुमार ने दैनिक हिंदुस्तान के कालम में प्रवीण के इस ब्लाग की तारीफ भी की है। रवीश ने लिखा है- फतेहपुर जनपद के प्राइमरी के एक मास्टर का अनुभव दिल्ली में होने वाली बहसों से हटकर ताजगी भरा लगता है।

आप भी प्रवीण के ब्लाग पर जाकर उनका उत्साहवर्धन कर सकते हैं। प्रवीण जी, आपके ब्लाग को मैंने भड़ास के भाई भड़ासियों के कोने में जोड़ लिया है।

जय भड़ास

यशवंत

19.6.08

ब्लागिंग में बृजेशः नेता जी की साली से विधायकजी ने दिल लगाया

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश सिंह भी हिंदी ब्लागिंग के मैदान में चुपके से कूद पड़े हैं। उन्होंने शुरुआत ही चौके छक्के से करी है। बृजेश जी ने अपने ब्लाग का प्यारा सा नाम रखा है- शहरनामा। दैनिक जागरण में शहरनामा नाम से कई संस्करणों में शहर की उन खबरों पर कालम छपता है जिन पर कोई खबर नहीं छापी जा सकती क्योंकि इन खबरों के सबूत नहीं होते लेकिन ये खबरें होती बिलकुल पुष्ट हैं। तो ऐसी सच्ची कनबतियां खबरों के लिए शहरनामा नामक ब्लाग बृजेश जी ने तैयार किया है। वे इस ब्लाग पर शहरयार नाम से लिख रहे हैं। चुटीले और कसे लेखन के मास्टर बृजेश जी इस वक्त दैनिक जागरण के दिल्ली प्रदेश के एक हिस्से के ब्यूरो इंचार्ज हैं।

आप भी शहरनामा की यात्रा कर आइए और कुछ मजेदार पोस्टों को पढ़ डालिए, साथ ही बृजेश जी का हौसला बढ़ाने के लिए उनकी पोस्टों पर कमेंट कर आइए। फिलहाल एक मजेदार पोस्ट को यहां डाल रहा हूं, शहरनामा से साभार....


नेता जी की साली से विधायकजी ने दिल लगाया

कांग्रेस में चमचागीरी की पुरानी परंपरा है.चमचागीरी के चक्कर में कांग्रेस के एक राष्ट्रीय महासचिव ने दिल्ली के एक विधायक को अपना मानस पुत्र बना लिया. कांग्रेस आलाकमान के दाहिने हाथ माने जाने वाले भारीभरक कद वाले इस नेता के घर विधायक बराबर का आना जाना था. बड़े नेता अक्सर व्यस्त रहते थे इसलिए घर की कुछ जिम्मेदारियां यह विधायक स्वेच्छा से उठाने लगे. इस बहाने नेताजी के घर में उनकी अच्छी पैठ बन गई.

यहां तक तो ठीक था किंतु आका की सेवा करते-करते विधायक जी का दिल घर की एक सुंदरी पर आ गया.यह सुंदरी कोई और नहीं बड़े नेता जी की साली साहिबा हैं.इन्हें विधायक जी कई बार मानस पुत्र के नाते यहां वहां ले आते जाते रहे हैं. जब तक इश्क चलता रहा लोगों ने ज्यादा कान नहीं दिया किंतु पहले से शादीशुदा विधायक जी को महासचिव की साली इतनी पसंद आई कि वह उससे शादी करने का ख्वाब पालने लगे.विधायक जी जो कभी कांग्रेसी दिग्गज नेता को पिता तुल्य तथा उनकी पत्नी को मातृवत मानते थे वे अब मौसी तुल्य उन्ही नेता की साली को पत्नी बनाना चाहते थे.

एक तो विधायक व युवती का अलग-अलग धरम ऊपर से बेटा बन घर में सेंध लगाने का यह रवैया नेताजी को पसंद नहीं आया, लिहाजा कभी इन्हीं नेता के नाम का रुआब गांठने वाले विधायक को घर में इंट्री बंद हो गई है. अब आगामी चुनाव के मद्देनजर विधायक के टिकट पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं. इन दिनों कांग्रेसियों में बेटा बन नेता की साली पर लाइन मारने वाले इन विधायक महोदय की चरचा आम है.

प्रस्तुतकर्ता- shaharyar


साभारः शहरनामा

18.6.08

अविनाश दास की एनडीटीवी से विदाई

खबर है कि एनडीटीवी के आउटपुट एडीटर अविनाश दास अब इस संस्थान के हिस्से नहीं रहे। वे कहां गए हैं, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी है। अविनाश दास मशहूर ब्लागर हैं और वे मोहल्ला नामक चर्चित ब्लाग के माडरेटर हैं। एनडीटीवी प्रबंधन ने अभी आधिकारिक रूप से अविनाश दास के बारे में कोई बात नहीं कही है पर एनडीटीवी के सूत्रों का कहना है कि.....

पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें भड़ास4मीडिया.काम bhadas4media.com

14.6.08

अनिल यादव का ब्लाग हारमोनियम, उनकी पहली पोस्ट ललमुंही विदेशिन व बुढ़िया के गुत्थमगुत्था होने पर

हारमोनियम मेरे लिए खास ब्लाग है। हालांकि यह ब्लाग अभी बना ही बना है। इसमें सिर्फ बोहनी वाली एकमात्र पोस्ट पड़ी है। और उस इकलौती पोस्ट को चुराकर भड़ास पर डाल रहा हूं। खास ब्लाग इसलिए कि इस ब्लाग को जिसने शुरू किया है, वो मेरे रोल माडल की तरह हैं। नाम है अनिल यादव। इन दिनों लखनऊ में द पायनियर अखबार में हैं।

इससे पहले वे दैनिक हिंदुस्तान वाराणसी, अमर उजाला लखनऊ, दैनिक जागरण लखनऊ, अमर उजाला मेरठ, अमर उजाला नोएडा आदि जगहों पर कार्य कर चुके हैं। मैं जब बीएचयू से पत्रकारिता का कोर्स कंप्लीट कर और छात्र राजनीति से भागकर लखनऊ पहुंचा तो राज्य की राजधानी लखनऊ में मेरा कोई ऐसा परिचित नहीं था जिसके यहां रुक सकूं और नौकरी खोजने के लिए संघर्ष कर सकूं। अनिल यादव से हलकी सी मुलाकात और छोटा सा परिचय था। वे अपने छोटे भाई कामरेड सुनील यादव के बीएचयू में छात्रसंघ के अध्यक्षी चुनाव में प्रचार के लिए कुछ दिनों के लिए आए थे। उस दौरान मैं उनके संपर्क में आया। उनसे काफी प्रभावित हुआ।

आइसा से भागकर जब लखनऊ पहुंचा तो सीधे अनिल के यहां पहुंचा। उसके बाद अगले साल भर तक निश्चिंत भाव से बेरोजगार और कभी कभार मौसमी रोजगारशुदा होने के बावजूद अनिल के घर पर रहकर और उनके पैसे पर हर रोज होली-दीवाली मनाता रहा। ढेर सारे खट्टे-मीठे पल गुजरे और मैं हर पल को संपूर्णता में जीने/सहेजने/सीखने की कोशिश करता रहा।

अगर मुझसे पूछा जाय कि किसी एक व्यकित का नाम बताओ जिसके प्रति तुम ताज़िंदगी कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहते हो तो मैं अनिल यादव का नाम लूंगा। हालांकि मुझे पता है कि अनिल भाया और शिल्पी माते पिछले कई महीनों, नहीं, बल्कि वर्षों से मुझसे नाराज चल रहे हैं लेकिन उनकी नाराजगी अपनी जगह और मेरा प्यार अपनी जगह।

पत्रकारिता से लेकर जीवन के हर पल में अति ईमानदारी और पूर्ण सचेत संवेदना के साथ जीने की कोशिश करने वाले अनिल के लिखे को हमेशा सराहना मिली क्योंकि वे जो लिखते हैं उसमें कोई बनावटीपन नहीं बल्कि सब कुछ संपूर्ण लाइव और बेहद ओरीजनल-रीयलिस्टिक होता है और इस रीयलिज्म में भी एक विजन व एक सचेत समझ दिखती रहती है।

यकीं न हो तो उनका लिखा नीचे वाला पढ़ लीजिए।

ब्लागिंग में अनिल के आने पर हम सब बेहद उत्साहित हैं और भड़ास उनका तहेदिल से स्वागत करता है।

ब्लाग बनाने के बाद अनिल ने एक छोटी सी मेल वाली चिट्ठी भी भेजी है, जो इस प्रकार है....

introduction ceremony

anil yadav (oopsanil@gmail.com)

like other blogs there is a new one named URL-

http://iharmonium.blogspot.com-
please attach it and introduce to rest of thedunia and enjoy hearing a new tune on harmunia.

anilyadav
lucknow


अपने ब्लाग पर उन्होंने जो खुद की प्रोफाइल बनाई है, उसमें उनके बारे में जो तीन चार जानकारियां हैं, उनमें से दो इस प्रकार हैं....

Interests- Absorbing what ever is all around.
Favorite Music- traffic tunes (unedited)

अनिल के ब्लाग को पहली नजर में देखने पर अभी कई तकनीकी कमियां दिख रहीं हैं। जैसे वहां अभी कमेंट करने वाला आप्शन दिया ही नहीं गया है। मतलब, अनिल के ब्लागिंग में आने का कोई स्वागत करे तो किस तरह करे, कोई उनके लिखे पर उन्हें गरियाना या सराहना चाहे तो किस तरह करे।

उम्मीद है, वे ये तकनीकी चीजें आज नहीं तो कल सीख लेंगे, पर हम लोगों के लिए सबसे जरूरी है उनका ब्लागिंग में लगातार सक्रिय रहना और कुछ न कुछ लिखते रहना। उम्मीद है हमेशा की तरह उनके लिखे का फैन क्लब हिंदी ब्लागिंग में भी बनेगा।

तो चलिए, पेश है उनके ब्लाग हारमोनियम से साभार,
उनकी पहली ब्लाग पोस्ट.....

यशवंत
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क्या ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है?


- अनिल यादव-
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दिन, उस छोटी सी खबर और उससे भी ज्यादा साथ छपी फोटू ने गुदगुदाया। सारनाथ गई एक घुमक्क़ड़ विदेशी युवती ने सड़क की पटरी पर बैठी बुढ़िया से दो रूपए का गाजर खरीदा और स्कूली लड़कों जैसे खिलवाड़ भाव से बिना पैसा दिए जाने लगी। हो सकता है कि युवती को उसमें अपने बचपन की कोई रिगौनी आंटी नजर आ गई हो। लेकिन उस देहातिन को जैसे आग लग गई और वह दौड़कर उस युवती से जूझ गई। युवती को वाकई मजा आ गया, शायद एक गंवई हिन्दुस्तानिन से पहली बार अनायास वास्तविक संवाद स्थापित हो गया था। पुलिस के सिपाहियों और देसी लहकटों को वह रोज झेलती होगी लेकिन उसे बर्दाश्त नहीं था कि कोई ललमुंही विदेशिन उसे उल्लू बनाकर दांताखिलखिल करती हुई चली जाए।

इसी बीच गाजर भारत-यूरोप के बीच पुल बन चुका था। फोटू में खड़े युवती के साथी का चेहरा कुछ ऐसा प्रफुल्ल था, जैसे सारनाथ के परदे पर कोई ओरियंटल फिल्म देख रहा हो। उसके आराम से खड़े होने के पीछे का आत्मविश्वास रहा होगा कि वह बुढिया, बैलेंस डाइट पर पली, दिन भर उसके साथ पैदल भारत नापने वाली उसकी छरहरी साथिन का क्या बिगाड़ पाएगी? बाई द वे यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस युगल को यह घटना जिंदगी भर याद रहेगी। इसमें हाऊ डू यू फील अबाउट बेनारस जैसी रस्मी बोरियत नहीं थी। तंत्र, मंत्र, योगा और होली गंगा का फंदा नहीं था। इसमें खांटी भारतपन था जिसे वे अपने देश जाकर लोगों को बताएंगे।

तो अखबार में छपी फोटू में परमआधुनिक यूरोप के साथ एक भारतीय देहातिन भिड़ी हुई थी। कल्पना में न समाने वाला यह पैराडाक्स लोगों को गुदगुदा रहा था। लेकिन गाजर वाली के लिए यह झूमाझटकी कोई खिलवाड़ नहीं थी। ललमुंही विदेशिन के लिए दो रूपए का मतलब कुछ सेंट या पेंस होगा लेकिन गाजरवाली के लिए इसका मतलब है। कुप्पी में डाले गए दो रूपए के तेल से कई रात घर में रोशनी रहती है।
दस-बीस के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं फिर भी गाजर का कुछ सेंटीमीटर का पुल पारकर आप उन लोगों की अर्थव्यवस्था में झांक सकते हैं जो हमारे बहुत करीब रहते हुए भी आमतौर पर हमें नजर नहीं आते। मिर्जापुर, सोनभद्र से लाकर महुए के पत्तों के बंडल पान की दुकानों पर बेचने वाले मुसहरों को पत्ता पीछे एक पैसे की आमदनी होती है। रेलवे स्टेशन पर नीम की दातुन बेचने वालों को एक छरका एक रूपए में पड़ता है और वे एक चार टुकड़े कर के आठ-आठ आने में बेचते हैं। चने का होरहा या मौसमी तरकारियां बेचने वालों को देर रात तक सड़कों पर ऐसे ग्राहकों का इंतजार रहता है जो दो रूपया कम ही देकर उनकी परात या खंचिया खाली कर दें। लोग चिप्स का पैकेट बिना दाम पूछे खरीद लेते हैं लेकिन उनसे इस अंदाज में मोल भाव करते हैं जैसे वे उन्हें ठगने के लिए ही आधीरात को सड़क पर घात लगाकर बैठे हों।

चूरन, चनामुरमुरा, गुब्बारे, फिरकी और प्लास्टिक के फूल बेचने वाले दस बीस रूपए की आमदनी के लिए सारा दिन गलियों में पैदल चलते रहते हैं। बनारस में अब भी पियरवा मिट्टी के ढेले बिकते हैं, जिन्हें शहनाज हुसैन सबसे बेहतरीन हेयर कंडीशनर बताती हैं। इन्हें बेचने-खरीदने वाले दोनों के लिए दो रूपया रकम है।

अभी मार्च के आखिरी हफ्ते में आयकर-रिटर्न भरने में सारा देश पसीना-पसीना हो रहा था। तरह-तरह के खानों वाले ठस सरकारी कागजों का अंबार था और कर विशेषग्यों की चौर्य-कला से विकसित देसी तिकड़में थी। जो चख-चख थी उसका सार यह था कि सरकार बड़ा अत्याचार कर रही है, यदि कोई ईमानदारी से इनकम-टैक्स भर तो भूखों मरेगा और उसके बच्चे भीख मांगेगे। लिहाजा बीमा के प्रीमियम, धर्माथ चंदे और मकान किराए की फर्जी रसीदों, एनएससी वगैरा के जुगाड़ं फिट किए गए ताकि अपना पैसा अपने पास रहे। .यहां कुछ हजार का सवाल था और सारनाथ की गाजरवाली के सामने अदद दो रुपयों का। क्या ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है। अगर आयकर विभाग को झांसा देकर कुछ हजार बचा लेने वाले बाबुओं और सड़क किनारे बैठी बुढ़िया के बीच खरीद-बेच के अलावा कोई और रिश्ता बचा हुआ है तो नहीं हंसा जाएगा।
वाकई, क्या ऐसा कोई रिश्ता है?

साभारः हारमोनियम

10.6.08

उत्तराखंडियों के लिए एक नई वेबसाइट - घुघूती

Hi,

I would like to share with a website (www.ghughuti.com) with an objective of providing an interactive platform to Uttarakhandis. We have so many websites on Uttrakhand/ Uttranchal but we never had an interactive website before, which has concept of social networking. This website provides us all that features which we need from an interactive site, chat, blogs, quizz, polls, gallery, news, games, music, video, my village, forum, business director etc..

Regards
Neelkant Dobriyal

(भड़ास के लिए प्रेषित एक मेल)

9.6.08

please publish on your bhadas for all veiwer

सैंया मोर मिला हल्का भगवन कसम

सैंया मोर मिला हल्का भगवान कसम,
न चले वो चेनाल्का भगवान् कसम,
मछरी मुर्गा ऊ कबहु न खावे
दूध दही घी त मानहु न भावे ,
चाटे चटनी ऊ गलका भगवान कसम १
बड़े जतन से जन उके जगाई,
ऊ दिखाई दिए गलवा से लड़ाई,
बतिया तल दिए गलका भगवान् कसम, २
बीती जाए रे हमरी जवानिया
सुखा जाए रे देहिया के पनिया
जोवान्वा जाए रे ढलका भगवान् कसम ३
लागल्वे बनी हा त आसरा
बतिया भुजे ला सिर्फ़ दिवासरा
कहियो दहन होई होलिका भगवान् कसम ४
सैंया मोर मिला हल्का भगवन कसम,
न चले वो चेनाल्का भगवान् कसम,

अगर इस गाने को पुरा सुनना हो टू इस लिंक पर क्लिक्क करे सुने --

http://bhojpurimp3.blogspot.com

धन्यवाद
अखिलेश
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(अखिलेश जी, भड़ास पे डाल तो दिया पर मुझे कुछ शब्दों के अर्थ समझ में नहीं आ रहे और कुछ गलत थे तो उन्हें बदल दिया। जैसे छाटी की जगह हमने चाटी किया। मतलब चटनी चाटना न कि छाटना। इसी तरह चेनाल्क का मतलब क्या है, ये समझ में नहीं आ रहा। हालांकि ये सही है कि मैंने इस गाने को अभी सुना नहीं है वरना मेरी समस्या हल हो गई होती.....धन्यवाद....यशवंत)

7.6.08

तुमने अब तक जितने लोगों को आलिंगन किया था, वे भी तकिए से ज्यादा नहीं थे

((भड़ास के साथी रमाशंकर शर्मा ने सेक्स एजुकेशन के लिहाज से एक प्यारा सा ब्लाग बनाया था सेक्सक्या.ब्लागस्पाट.काम नाम से। पर इसकी सफलता भी भाई लोगों को रास नहीं आई और तीन तिकड़म करके इस ब्लाग को बंद करवा दिया। रमाशंकर जी ने मुश्किलों और चुनौतियों से नई राह खोजने की कवायद के तहत तुरंत ब्लाग से निकलकर एक कदम आगे बढ़ गए और सेक्सक्या को डाट काम पर ले आए। अब उनके ब्लाग या पोर्टल या साइट तक पहुंचने का नया पता इस प्रकार है...www.sexkya.com इन्हीं की साइट से एक जोरदार पीस भड़ासियों के लिए पेश किया जा रहा है। रजनीश का लिखा ये पीस वाकई माइंड ब्लोइंग है। ....यशवंत))

... जब तुम किसी को आलिंगन में लेते हो, तब दूसरे का हड्डी-मांस-मज्जा ही तुम्हारे हाथ में आती है। वह कुछ तकिए से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। आखिर हड्डी या मांस या चमड़ी तकिए से कैसे ज्यादा मूल्यवान हो सकती है ? बस तुम्हारा खयाल है कि दूसरा मौजूद है। इसलिए तुम अपने प्रेम को विस्तीर्ण कर पाते हो।

जब तुम किसी आदमी के सिर पर चोट करते हो, तो उस चोट में और एक तकिए पर लकड़ी से चोट करने में क्या फर्क है ? फर्क तुम्हें दिखाई पड़ता है, क्योंकि तुम मानते हो, दूसरा वहां है और तकिया तो कोई भी नहीं। फर्क दिखाई पड़ता है, क्योंकि दूसरे से प्रत्युत्तर मिलेगा और तकिए से प्रत्युत्तर नहीं मिलेगा, इतना ही फर्क है। दूसरा जवाब देगा।

जब तुम प्रेम से किसी व्यक्ति को आलिंगन में लोगे, तो वह भी तुम्हें आलिंगन में लेगा। उससे तुम्हें प्रेम करने में सुविधा पड़ेगी, क्योंकि प्रत्युत्तर जगाएगा, प्रत्युत्तर उत्तेजित करेगा और श्रृंखला निर्मित हो जाएगी।

तकिए के साथ कठिनाई यह है कि तुम अकेले हो। तकिया कोई उत्तर न देगा। सब कुछ तुम्हें ही निर्मित करना पड़ेगा। लेकिन यह प्राथमिक कठिनाई सभी वेगों में होगी-काम हो, क्रोध हो या कोई भी वेग हों। थोड़े ही क्षणों में, थोड़े ही दिनों में, तुम समर्थ हो जाओगे। और तब तुम्हें बड़ी हंसी आएगी कि तुमने अब तक जितने लोगों को आलिंगन किया था, वे भी तकिए से ज्यादा नहीं थे, वे भी निमित्त थे।

प्रेम भी तुम्हारा एकांत ध्यान बने, इसमें कई अड़चनें हैं। अड़चनें संस्कार की हैं। अड़चनें ऐसी हैं कि बचपन से कुछ बातें सिखाई गई हैं, और वे बाधा डालेंगी। जैसे पुरुष है, अगर कामवासना तकिए पर प्रकट करे, तो यह भी हो सकता है कि उसका वीर्य स्खलित हो जाए। तो भय है। वह भय बचपन से सिखाया गया है कि वीर्य की एक बूंद भी स्खलित हो जाए, तो महागर्त में गिर रहे हो, बड़ी जीवन-ऊर्जा नष्ट हो रही है।

हिंदू मानते हैं कि चालीस दिन में भोजन करने से एक बूंद वीर्य बनता है। सरासर असत्य है, झूठ बात है, इसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं। लेकिन बच्चों को डराने के लिए ईजाद की गई है। और बच्चे डरते हैं वह तो ठीक है बूढ़े भी डरते हैं। एक साधारण पुरुष सत्तर वर्ष के जीवन में आसानी से कोई चार हजार बार संभोग कर सकता है। प्रत्येक संभोग में कोई एक करोड़ से लेकर दस करोड़ तक वीर्याणु स्खलित होते हैं। एक शरीर के भीतर इतने वीर्याणु हैं कि अगर प्रत्येक वीर्याणु गर्भस्थ हो जाए, तो इस पृथ्वी पर जितनी जनसंख्या है, वह एक जो़ड़े से पैदा हो सकती है। चार अरब व्यक्ति एक स्त्री और एक पुरुष से पैदा हो सकते हैं।और यह जो वीर्य है, यह कोई आपके भीतर संचित संपदा नहीं है कि रखा हुआ है, इसमें से कुछ निकल गया, तो कुछ कम हो जाएगा। यह वीर्य प्रतिफल पैदा हो रहा है। शरीर श्वास ले रहा है भोजन कर रहा है, व्यायाम कर रहा है-यह वीर्य पैदा हो रहा है।

और आप हैरान होंगे कि जो आधुनिक खोजें हैं चिकित्साशास्त्र की, वे बड़ी भिन्न हैं, विपरीत हैं। वे कहती हैं, जो व्यक्ति जितना वीर्य का उपयोग करेगा, उतने ज्यादा दिन तक पुंसत्व उसमें शेष रहेगा। जो जितनी जल्दी भय से बंद कर देगा वीर्य का उपयोग या संभोग उतने जल्दी उसका वीर्य खो जाएगा। क्योंकि जब तुम वीर्य का उपयोग करते हो, तो तुम्हारे पूरे शरीर को फिर वीर्य पैदा करने की क्रिया में संलग्न होना पड़ता है। जब तुम वीर्य का उपयोग नहीं करते, तो शरीर को संलग्न नहीं होना पड़ता। धीरे-धीरे शरीर की क्षमता वीर्य को पैदा करने की कम हो जाती है।

यह बहुत उलटा दिखाई पड़ेगा। जो लोग जितना ज्यादा संभोग करेंगे, उतनी लंबी उम्र तक संभोग करने में समर्थ रहेंगे। जो लोग जितना कम संभोग करेंगे, उतनी जल्दी रिक्त हो जाएंगे और चुक जाएंगे। तो पश्चिम में चिकित्सक समझाते हैं कि बुढ़ापे तक, सत्तर और अस्सी वर्ष और नब्बे वर्ष तक भी अगर संभोग जारी रखा जा सके, तो तुम्हारे ज्यादा जीने की संभावना है। क्योंकि शरीर तुम्हारा ताजा रहेगा। वीर्य बाहर जाता है, तो नया वीर्य शरीर पैदा करता है। और नए वीर्य में शक्ति होती है, ताजगी होती है। पुराना वीर्य धीरे-धीरे बासा हो जाता है, जड़ हो जाता है। और वीर्य की जड़ता के साथ तुम्हारे पूरे शरीर में जड़ता व्याप्त हो जाती है।हमें यहां हैरानी होती है-पश्चिम में हम सुनते हैं, कोई नब्बे वर्ष का व्यक्ति शादी कर रहा है। हमें बहुत हैरानी होती है कि शादी का क्या प्रयोजन है अब? लेकिन पश्चिम में नब्बे वर्ष का बूढ़ा भी संभोग कर सकता है। और करने का कारण सिर्फ यह है कि वीर्य के संबंध में सारी धारणा बदल गई है। और वैज्ञानिक धारणा सच्चाई के ज्यादा करीब है।जीवन के सभी अंगों में यह बात सच है कि उनका तुम उपयोग करो, तो वे सक्षम रहते हैं। एक आदमी चलता रहे, बुढ़ापे तक चलता रहे, तो पैर मजबूत रहते हैं चलना बंद कर दे, पैर कमजोर हो जाते हैं। एक आदमी मस्तिष्क का उपयोग करता रहे आखिरी क्षण तक, जो मस्तिष्क ताजा रहता है। उपयोग बंद कर दे, मस्तिष्क जड़ हो जाता है।

सारी इंद्रियों का जीवन उपयोग पर निर्भर है, क्रियात्मकता पर निर्भर है। तुम जिन इंद्रियों का उपयोग करते हो, वे उतने ही ज्यादा दिन तक ताजी रहेंगी। और वीर्य भी एक इंद्रिय है। उसके लिए कोई अपवाद नहीं है। वह भी शरीर का ही अंग है। शरीर का नियम है कि तुम जितना ज्यादा उपयोग लोगे, उतना ज्यादा जीवंत रहेगा। तुम भयभीत हुए डरे, उपयोग बंद किया, उतनी ही जल्दी शरीर क्षीण हो जाएगा।और यह एक दुष्टचक्र है। क्योंकि जो व्यक्ति डरता है, कम उपयोग करता है, शरीर क्षीण होता है। क्षीण होने से और डरता है। और डरने से अपने को और रोकता है। और रोकने से और क्षीण होता है। फिर कोई उपाय नहीं। फिर उसने एक रास्ता पकड़ लिया, जिस पर वह जल्दी ही मिट जाएगा। भय रोकता है, रोकने से हम मरते हैं। निर्भय होकर जीवन को ऐसा उपयोग करो-रोजा लक्जेंबर्ग ने, एक जर्मन महिला ने कहा है-जैसे कोई मशाल दोनों तरफ से जले, ऐसे जलो।घबड़ाओ मत, तुम ज्यादा जलोगे, जीवन बड़ा विराट है। तुम्हारे दीए में बहुत तेल है। लेकिन तुम जलाओ ही नहीं बाती को, भयभीत हो जाओ, तो तुम डूब जाओगे।सारी दुनिया में पुरानी संस्कृति और सभ्यताओं ने वीर्य के संबंध में बड़ा भयभीत किया है लोगों को। इसके कारण हैं। क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति वीर्य के संबंध में भयभीत हो जाता है, उसे गुलाम बनाना आसान है। आपने उसकी जड़ पकड़ ली। वीर्य जड़ है। अगर किसी व्यक्ति को कामवासना के संबंध में बहुत अपराध से भर दिया, तो वह व्यक्ति न तो विद्रोही रह जाएगा, न शक्तिशाली रह जाएगा। और सदा अपराध की भावना इसको दबाएगी।

अपराधी को दबाना बहुत आसान है। तो राज्य भी चाहता है कि आप अपराध अनुभव करें, समाज भी चाहता है। सभी-जिनके हाथ में सत्ता है-चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, जो पैदा हो, वह भयभीत रहे। भयभीत रहे, तो उसकी मालकियत की जा सकती है, उसका मालिक हुआ जा सकता है। निर्भय हो जाए, तो वह सब बंधन तोड़ देगा, सब रास्ते, वह स्वतंत्रता से जीएगा। विद्रोही हो जाएगा।तो बचपन से हम बच्चों को सिखाते हैं कि वीर्य का स्खलन न हो जाए, सम्हालना। वीर्य के संबंध में हम कंजूसी सिखाते हैं। और इसको हम ब्रह्मचर्य कहते हैं।यह ब्रह्मचर्य नहीं है। कृपणता ब्रह्मचर्य नहीं है। और न वीर्य को जबर्दस्ती रोक लेने से ब्रह्मचर्य का कोई संबंध है। ब्रह्मचर्य तो एक ऐसे आनंद की घटना है, जब आपका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया; और इसलिए व्यक्ति के साथ संभोग की कोई जरूरत नहीं रह जाती। यह जरा कठिन है समझना। और अगर मैं कहूं तो बहुत बेचैनी होगी।

संत वैसा व्यक्ति है, जिसका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया। वहां कोयल कूकती है, तो उसका पूरा शरीर संभोग के आनंद को अनुभव करता है। वहां वृक्ष में फूल खिलते हैं, तो उसके पूरे शरीर पर, जैसी संभोग में आपको थिरक अनुभव होती है, उसका रोआं-रोआं वैसा थिरकता है और नाचता है। सुबह सूरज उगता है, रात चांद आकाश में होता है तो हर घड़ी संभोग की समाधि उसे उपलब्ध होती रहती है। उसका रोआं-रोआं संभोग में समर्थ हो गया है; आपका केवल जननेंद्रिय संभोग में समर्थ है।इस संबंध में एक बात समझ लेनी जरूरी है। कभी खयाल भी नहीं आया होगा ! हमने शिव की प्रतिमा, शिवलिंग निर्मित की है। शिव जैसे पूरे के पूरे लिंग हैं, इसका मतलब यह होता है। इसका मतलब होता है, शिव के पास न आंखें हैं, न हाथ हैं, न पैर हैं, मात्र लिंग है, सिर्फ जननेंद्रिय है।

यह संतत्व की आखिरी दशा है, जब व्यक्ति का पूरा शरीर जननेंद्रिय हो गया। इसका प्रतीक अर्थ यह हुआ कि अब वह पूरे शरीर के साथ जगत के साथ संभोग में रत है। अब यह संभोग लोकल नहीं है। यह जननेंद्रिय और जननेंद्रिय का मिलना नहीं है, अब यह अस्तित्व और अस्तित्व का मिलना है।शिव का शिवलिंग हमने निर्मित करके जगत को एक ऐसी धारणा दी है, जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है।लेकिन हिंदू भी यह अर्थ नहीं करेगा। अर्थ बिलकुल साफ है। अंधे हम हैं। हम इतने भयभीत हैं कि हम यह अर्थ ही नहीं करेंगे। हम तो छिपाने की कोशिश करते हैं।पश्चिम में बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ कार्ल गुस्ताव जुंग। वह भारत आया यात्रा पर। तो वह पुरी, कोणार्क, खजुराहो के मंदिर देखने गया। जब वह कोणार्क के मंदिर को देखने गया, तो जो पंडित उसे मंदिर दिखा रहा था, वह बड़ा बेचैन परेशान था-क्योंकि जगह-जगह नग्न-मैथुन की प्रतिमाएं थीं-और बहुत गिल्टी, अपराधी अनुभव कर रहा था। और जुंग बहुत प्रभावित था। क्योंकि जुंग इस सदी के उन थोड़े से लोगों में है, जिन्होंने मनुष्य की चेतना में बड़ा गहरा प्रवेश किया है।

और जितनी गहराई में प्रवेश होगा, उतना ही मैथुन अर्थपूर्ण होगा। क्योंकि मैथुन से ज्यादा गहरा आपके भीतर कुछ भी नहीं जाता। शायद मैथुन के क्षण में आप जिस अवस्था में होते हैं, उससे ज्यादा गहरी अवस्था में साधारणत: आप कभी नहीं लेते। जिस दिन समाधि उपलब्ध होगी, उस दिन ही मैथुन के पार आप जाएंगे, उससे गहरी अवस्था उपलब्ध होगी।जो जुंग तो बहुत आनंद से देख रहा था। वह पंडित बहुत परेशान था। उसको लग रहा था कि क्या गलत चीजें हम दिखा रहे हैं। और यह आदमी पश्चिम में खबर ले जाएगा, तो हमारी संस्कृति के बाबत क्या सोचेंगे ?और ऐसा वह पंडित ही सोचता था, ऐसा नहीं है। गांधीजी तक सोचते थे कि कोणार्क और खजुराहों को मिट्टी के ढेर में दबा देना चाहिए, ताकि हमारी बदनामी न हो।एक लोग थे इस मुल्क में, जिन्होंने खजुराहो बनाया, कोणार्क बनाया। और बनाया था संतों के निर्देशन में क्योंकि ये मंदिर हैं। फिर महात्मा हमारे मुल्क में होने लगे जो उन्हें मिटा देना चाहते हैं या दबा देना चाहते हैं।गांधी को मैं कभी भी हिंदू नहीं मान पाता। वह ईसाई है। उनकी शिक्षा-दीक्षा उनकी पकड़ ईसाई की है। ईसाई बहुत डरा हुआ है इस तरह की चीजों से। ईसाई सोच ही नहीं सकता कि चर्च में और मैथुन की प्रतिमा हो सकती है, या शिवलिंग हो सकता है।जैसे ही मंदिर से विदा होने लगे जुंग, तो उस आदमी ने, पंडित ने, कान में कहा कि क्षमा करें, यह विकृति अतीत में कुछ लोगों के मन की प्रतिछवि है; यह कोई हमारा राष्ट्रीय प्रतीक नहीं है। और ऐसा मत सोचना आप कि यह हमारा धर्म या हमारा दर्शन है। यह तो कुछ विकृत मस्तिष्कों का उपद्रव है।

जुंग ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं हैरान हुआ कि इतनी महत्वपूर्ण प्रतिमाएं हैं, और इतने गहरे गई प्रतिमाएं हैं। लेकिन आज को हिंदू की यह दृष्टि है ! हिंदू भी कमजोर हो गया है।शिवलिंग का अर्थ है : एक ऐसी दशा, जब तुम्हारा पूरा शरीर रोएं-रोएं से संभोग अनुभव कर सकता है। तभी तुम्हें जननेंद्रिय के संभोग से छुटकारा मिलेगा और ब्रह्मचर्य उपलब्ध होगा।तो ब्रह्मचर्य भोग से मुक्ति नहीं है, परमभोग का आस्वाद है। लेकिन भोग इतना परम हो जाता है कि तु्म्हें उसे करने की अलग से जरूरत नहीं होती। हवा का झोंका आता है, तो तुम्हारा रोआं-रोआं उस पुलक को अनुभव करता है, जो प्रेमी अपनी प्रेयसी के स्पर्श से अनुभव करेगा।लेकिन हमने बच्चों को डराया हुआ है। उनको इतना डरा दिया है कि कभी काम में ठीक संभोग उपलब्ध ही नहीं हो पाता। वह भय बना ही रहता है। कंजूसी कृपणता बनी ही रहती है। डर बना ही रहता है कि कहीं शक्ति खो न जाए। एक-एक दर्जन बच्चों के मां-बाप हो जाने के बाद भी लोगों को यह डर बना रहता है कि शक्ति कहीं खो न जाए।

शक्ति खोने का डर नास्तिक को हो सकता है। आस्तिक को नहीं होना चाहिए। आस्तिक कृपण हो जाए, बिलकुल समझ में नहीं आता। उस भय के कारण तुम्हें एकांत में प्रेम बड़ा मुश्किल मालूम पड़ेगा।लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ, भय छोड़ो। और जैसा तुमने क्रोध तकिए पर प्रकट किया है, वैसा ही तुम प्रेम तकिए पर प्रकट करो। जो भी परिणाम हों, परिणामों की फिक्र जल्दी मत करो। यह भी हो सकता है कि प्राथमिक चरणों में तुम इतने उत्तेजित हो जाओ कि वीर्य-स्खलन हो जाए। उस स्खलन को तुम परमात्मा के चरणों में समर्पण ही समझना। जिससे ऊर्जा आती है, उसी में वापस चली गई। तुम उससे भयभीत मत होना।जल्दी ही वह क्षण आ जाएगा, जब इस प्रेम के ध्यान में वीर्य का स्खलन नहीं होगा। और जब यह ध्यान गहन होगा और वीर्य का स्खलन न होगा, तब तुम एक नए स्वाद को उपलब्ध होओगे। वह स्वाद है बिना शक्ति को खोए आनंद के अनुभव का। शक्ति जब तुम्हारे भीतर दौड़ती है प्रगाढ़ता से, तुम एक तूफान बन जाते हो शक्ति के, तुममें एक ज्वार आता है, लेकिन यह ज्वार तुम उलीचकर फेंक नहीं देते, यह ज्वार एक नृत्य बनकर तुममें ही लीन हो जाता है।इस फर्क को ठीक से समझ लें। एक तो साधारण जीवन का ढंग है, जिसको हम भोग कहते हैं, वह ढंग यह है कि तुममें एक ज्वार आता है, वह ज्वार भी जैसे चाय की प्याली में आया तूफान, क्योंकि लोकल है, जननेंद्रिय से संबंधित है। तो सारे शरीर में जो भी तरंगें उठती हैं, वे जननेंद्रिय पर जाकर केंद्रित हो जाती है। एक दो क्षण में चुक जाता है ज्वार। एक हवा आई, तुम आंदोलित हुए, जननेंद्रिय ने सारी ऊर्जा को लेकर निष्कासित कर दिया। जैसे फुग्गे से हवा निकल गई, तुम मुर्दा पड़ गए, सो गए। यह जो क्षणभर के लिए ज्वार आना और खो जाना है, इसको तुमने भोग समझा है। यह तो भोग का अ, ब, स भी नहीं है।भोग की तंत्र की जो व्याख्या है, वह है, तुम्हारा पूरा शरीर ज्वार से भर जाए। रोआं-रोआं तरंगित हो, तुम अपने को इस तरंगायित स्थिति में बिलकुल विस्मृत ही कर जाओ, तुम्हें याद भी न रहे कि मैं हूं। नृत्य रह जाए, नर्तक न बचे। गीत रह जाए, गायक न बचे। तुम्हारा पूरा अस्तित्व एक्सटेटिक हो, समाधिस्थ हो, तो तुम एक ऊंचाई पर पहुंचोगे-ऊंचाई पर-रोज ऊंचाई बढ़ती जाएगी।और ध्यान रहे : यह जो ऊंचाई के बढ़ने की प्रतीति है, यह तुम्हारे पूरे शरीर को होगी, जैसे तुम्हारा पूरा शरीर स्पंदित हो रहा है, सजग हो रहा है। अभी जननेंद्रिय में तुम स्पंदन अनुभव करते हो, सजगता अनुभव करते हो। तब पूरा शरीर शिवलिंग हो जाएगा और तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारे शरीर की जो रूपरेखा है, वह खो गई है।शिवलिंग कविता नहीं है, एक अनुभव है। और जब पूरे ज्वार से जीवन भर जाता है और तुम्हारा सारा शरीर रोमांचित होता है, तब तुम अपने आसपास ठीक शिवलिंग की आकृति में प्रकाश का एक वर्तुल देखोगे। तुम पाओगे कि तुम्हारे पूरे शरीर की रूपरेखा खो गई और शिवलिंग बन गया। एक प्रकाश का अंडाकार रूप, जिसमें तुम्हारी आंखें नहीं होंगी, नाक नहीं होगी, कान नहीं होंगे, हाथ नहीं होंगे, सिर्फ एक अंडाकार रूप रह जाएगा।

यह ज्योतिर्मय जो रूप हैं, यह जो अंडाकार रूप है, यही तुम्हारी आत्मा का रूप है। जिस दिन तुम मां के गर्भ में प्रवेश हुए, ठीक शिवलिंग की आकृति का एक प्रकाश-बिंदु मां के गर्भ में प्रविष्ट हुआ। शरीर तो तुम्हें गर्भ के भीतर मिला। जब तुम शरीर को छोड़ेगो, मृत्यु घटित होगी-पहले भी घटित हुई है-तब तुम्हारा शरीर आकार पड़ा रह जाएगा; शिवलिंग ज्योतिर्मय पिंड तुमसे उठेगा और दूसरी यात्रा पर निकल जाएगा।

जिस दिन तुम संभोग की परम अवस्था में आओगे और पूरा शरीर रोमांचित होगा, उस दिन तुम जैसे जन्म के समय में घटना घटी थी, मृत्यु के समय में घटी थी, लेकिन जन्म के समय तुम मूर्च्छित थे, मृत्यु के समय फिर तुम मूर्च्छित हो जाओगे, इस संभोग के क्षण में-इस संभोग का कोई संबंध दूसरे से नहीं है, इस संभोग का संबंध तुम्हारे भीतर शरीर के सब बांध को तोड़कर तुम्हारी चेतना का शिवलिंग बन जाने से है-तुम्हें पहली दफा अपने स्वरूप को अनुभव होगा। और यह स्वरूप अस्तित्व के साथ जो आनंद का अनुभव करता है, उसको तंत्र ने संभोग कहा है।यह एकांत में भी घट सकता है, किसी के साथ भी घट सकता है।लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, एकांत की ही तुम चिंता करना, क्योंकि दूसरे के साथ भी घटेगा, तो भी तुम जानोगे कि इसका दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं है। यह घटना स्वतंत्र है। रोएं-रोएं से प्रकाश निकलता है, तुम्हारे भीतर एक ज्वार उठता है।और जो फर्क है...जब तुम्हारे भीतर पूर्ण ज्वार होता है, तो उस पूर्ण ज्वार का कोई भी स्खलन नहीं है। वह स्खलित होगा भी कैसे ? और जो अंडाकार आकृति है, वह स्खलन को रोकती है। उसमें कहीं छिद्र भी नहीं है, जहां से स्खलन हो सके। ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। और धीरे-धीरे, धीरे-धीरे तुममें फिर लीन हो जाती है, तुमसे बाहर नहीं जाती। तुममें उठती है, तुममें लीन हो जाती है। जैसे सागर में ज्वार आता है, फिर लीन हो जाता है। कहीं कुछ खोता नहीं।...


... यह अंश ओशो लिखित "ध्यान की कला" के हैं.
साभारः भारतीय साहित्य संग्रह
प्रेषकः डॉ. अरुण सिंह

(साभारःwww.sexkya.com)

4.6.08

अपने पे आंखे मूँद, दूसरे की गलती देख, दूसरे की भैंस पे जोर से लाठी टेक

यशवंत जी,

नमस्कार भड़ास का नियमित पाठक हूँ. पढ़कर मन को बहुत तसल्ली मिलती है. कुछ दिन पहले मन मे विचार आया कि चलो एक ब्लॉग हम भी बनाते है सो अपने ज्ञान के आधार पे बनाने कि कोशिश की है. आपके अवलोकनार्थ प्रेषित कर रहा हूँ अगर आपको उचित लगे तो भड़ास पर एक छोटा सा कोना हमारे ब्लॉग को भी प्रदान कीजिएगा.


भड़ास के बारे मे ज्यादा कुछ तो नही कह सकता फिर भी इतना यकीन है कि अपने भड़ास को जन्म देकर उन लोगो का बहुत भला किया है जो न तो अपने मन कि व्यथा न तो घर पर और न ही ऑफिस मे कह पाते है भड़ास एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ पर लोग अपने मन की व्यथा रूपी रेलगाड़ी को मन माफिक गति से दौड़ सकते है. इतनी बात लिखने क बाद भी अप सोच रहे होंगे कि कौन है ये, सो हमारा नाम सुमित है। कानपुर में मीडिया में हूँ। आपके कानपुर प्रवास के समय आपसे कई बार भेंट भी हुई.

एक बार फिर आपको भड़ास के लिए शुभकामनाये.

अपने ब्लॉग का लिंक प्रेषित है.

http://sumit-eventmanagement.blogspot.com

आपका कनिष्ठ
सुमित


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सुमित के ब्लाग पर पड़ी इकलौती पोस्ट ये है..
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कारपोरेट चालीसा

जब नया नया कोई आता है तो मन ही मन मुस्काता है
कंपनी ये बड़ी भारी है लोग कहते है सरकारी है
ऐश यहाँ पर खुल्ली है, काम बहुत मामूली है
पर जब सच से टकराता है, सर उसका चकराता है जनता
यहाँ निराली है सारे रंगों वाली है
बारह बजे कुछ आते है कुछ ६ बजे ही जाते है
कुछ की लाइफ ऑफिस मे ही कटने वाली है
क्यूंकि न घर है न घर वाली है
यहाँ पांच पॉइंट पर रेटिंग है
कुछ असली है कुछ सेटिंग है
शो ऑफ़ का यहां पर बहुत बड़ा है खेल
थोड़ा सा काम करो और सबको भेजो मेल
प्रोजेक्ट से रोजी रोटी है पर गगरी थोडी छोटी है
प्रोजेक्ट लेने जाते है कुछ मिलते है कुछ रह जाते है
केवल क्लाइंट है जो हमको नचाता है,
उसको खुश करने मे अपने बाप का क्या जाता है.
क्यूंकि केवल क्लाइंट है जो हमारी रोज़ी रोटी चलाता है
पैसा तो मोह माया है, कंही धूप कंही छाया है
काम मी मर्जी दिल की है, तनखा तो चूहे के बिल सी है
कुछ मृग मरीचिका मे फँस जाते हैं, कुछ निकल मोक्ष को पाते हैं
अपने पे आंखे मूँद के दूसरे की गलती देख,
दूसरे की भैस पे जोर से लाठी टेक
दूसरे की गलतियाँ बॉस को बता,
शाबासी के साथ मे इनाम भी शायद पा
कैसे भी उल्लू सीधा कर वीसा लेकर भाग
कब तक सोया रहेगा अब तू मूर्ख जाग
लगा हुआ है यह संपर्को का जाला
सफल वही है जिसने कोई लिंक निकाला
काम का नाटक कर मचा नही कुछ शोर,
तेरे अंधियारे गाव में कभी तो होगी भोर।
माला ये पुरी हुई मनका एक सौ आठ,
मोक्ष को पाए वही नित्य करे जो पाठ।
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-सहयोगी पंकज राजपूत की रचना
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(भाई सुमित, आपने याद दिलाया तो बिलकुल याद आ गया। आपके ब्लाग की इकलौती रचना को भड़ास पर डाल दिया है। शानदार है कारपोरेट चालीसा। इसमें आपने सारे सचों को व्यंग्यात्मक तरीके से कह दिया है। आप अपने ब्लाग पर रेगुलर लिखते रहें। कभी दिल्ली आना हो तो फोनियाइयेगा। .....यशवंत )

रफ़्तार आगाज है इंटरनेट पर अंग्रेजी के एकाधिकार की समाप्ति का

पिछले कुछ महीनों में इंटरनेट जगत में हिंदी की पैठ बहुत तेजी से बढ़ी है। दर्जनों नयी वेबसाइट, हजारों नये ब्लॉग के साथ भारी संख्या में हिंदी प्रेमी लोग, लेखक, विचारक, पत्रकार और देश–विदेश के मीडिया समूह इंटरनेट पर हिंदी के इस नये उभार के साथ तेजी से जुड़ते जा रहे हैं। रफ़्तार इन सभी प्रयासों को साझा मंच प्रदान करने तथा हर हिंदीभाषी को इंटरनेट के नये संसार से जोड़ने की सबसे उन्नत तथा अनूठी पहल है

समूचे हिंदी जगत को यदि किसी एक ही साइट पर खंगाला जा सकता है तो वह है रफ्तार डॉट इन। रफ्तार के माध्यम से हिंदी इंटरनेट के अथाह जगत की संपूर्ण गतिविधियों तक सरलता से पहुंचा जा सकता है। इंटरनेट यूजर की जरूरतों और पसंद के साथ रफ्तार ने तारतम्य बिठाया है और इसी के तहत गानों, समाचार, ब्लॉग, मनोरंजन और साहित्य की खोज को रफ्तार में प्रमुखता दी गई है।
रफ़्तार डॉट इन (http://www.raftaar.in/) की अनेकों विशेषताओं में से प्रमुख है कि यह हिंदी का पहला संपूर्ण सर्च इंजन है। एक ऐसा सर्च इंजन जो इंटरनेट उपभोक्ता को हिंदी के असीमित संसार से जोड़ता है। समाचार से ले कर साहित्य तक एवं विज्ञान से ले कर किचन तक, रफ़्तार डॉट इन (http://www.raftaar.in/) इंटरनेट पर मौजूद हिंदी का सारा कंटेट आपको उपलब्ध करवाता है।

सर्च इंजन के अलावा रफ़्तार डॉट इन (http://www.raftaar.in/) पल–पल की घटनाएं और खबरें एक साथ एक होमपेज पर आपको मुहैया करवाता है। देश, दुनिया, खेल, कारोबार, विचित्र, जुर्म, साहित्य, देसी–विदेशी फिल्मी दुनिया से संबंधित समाचार अब देश की राष्ट्रभाषा में एक क्लिक की दूरी पर हैं।
इस पहल के कर्ताधर्ता हैं विख्यात अर्थशास्त्री और कंपनी के चेयरपर्सन डॉक्टर लवीश भंडारी एवं रफ़्तार डॉट इन (http://www.raftaar.in/) के निदेशक और सह संस्थापक पीयूष बाजपेई। डॉक्टर लवीश का कहना है, ''रफ़्तार उस कस्बाई व्यक्ति की जरूरतों को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है जो अंग्रेज़ी नहीं जानता मगर इंटरनेट का प्रयोग करना चाहता है।'' कहते हैं पीयूष, ''रफ़्तार युवाओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है जो सूचना और मनोरंजन के असीमित संसार से अपनी भाषा में जुड़ना चाहता है। संभवतः यही वजह है कि इसमें मनोरंजन और जीवनशैली को खास तवज्जो दी गई है।'' पीयूष के अनुसार, भविष्य में इसमें किए जाने वाले बदलाव भी इंटरनेट प्रयोग करने वाले की अभिरुचि एंव जरूरत के अनुसार ही किए जांएगे।

इंटरनेट जगत में हिंदी में मौजूद सभी राशियों का राशिफल एक साथ यहां पढ़ सकते हैं। नए और पुराने, सभी तरह के गानों, के अलावा तस्वीरों (फोटो) संबंधी आपकी खोज यहां आ कर पूर्ण हो जाती है।
हिंदी इंटरनेट जगत का नया प्रयोग यानी ब्लॉगिंग को यहां विशेष स्थान दिया गया है। रफ़्तार के होमपेज का एक महत्वपूर्ण कोना सिर्फ ब्लॉगिंग को समर्पित है।
कारोबार और बाजार पर हिंदी का बढ़ता असर यहां भी दिखाई दे रहा है। इसीलिए, कारोबार और शेयर बाजार की खबरों के अतिरिक्त सेंसेक्स सूचकांक को भी यहां प्रमुखता से जोड़ा गया है।
दरअसल, रफ़्तार आगाज है इंटरनेट पर अंग्रेजी के एकाधिकार की समाप्ति का। अब समय आ गया है कि हम इंटरनेट से अपनी भाषा में अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सकें!
(रफ्तार.इन की तरफ से भड़ास को प्रेषित प्रेस विज्ञप्ति)

2.6.08

वकीलों को विज्ञापन की अनुमति मिली

अब आपको कानूनी पचड़ों से निपटने के लिए निपुण वकीलों की तलाश में भटकना नहीं पडेग़ा। कुछ बंदिशों के साथ वकीलों को अब वेबसाइट पर विज्ञापन का अधिकार मिल गया है। अधिवक्ताओं के लिए नीति निर्धारित करने वाली बार काउंसिल ऑफ इण्डिया (Bar Council of India) ने बार काउंसिल ऑफ इण्डिया के नियमों में संशोधन के बाद विज्ञापन के लिए एक सारणी निर्धारित की है। अधिवक्ता इसके अनुसार ही बिन्दुवार जानकारी वेबसाइट पर जारी कर सकेंगे। इससे अलावा किसी भी तरह का विज्ञापन या विवरण जारी करना एडवोकेट्स एक्ट-1961 के अन्तर्गत व्यावसायिक दुराचरण माना जाएगा। नियमों में संशोधन को मुख्य न्यायाधीश ने मंजूरी दे दी है।

बार काउंसिल ऑफ इण्डिया नियमावली में संशोधन के बाद जारी सारणी के मुताबिक अधिवक्ता अपना नाम, पता, टेलीफोन नम्बर, ई-मेल, नामांकन संख्या, नामांकन की तिथि, स्टेट बार काउंसिल का नाम एवं अधिवक्ता की सदस्यता वाली बार एसोसिएशन का नाम वेबसाइट पर जारी करेंगे। इसके अलावा व्यावसायिक व अकादमिक योग्यता तथा प्रेक्टिस के क्षेत्र मसलन सिविल, फौजदारी, टैक्सेशन, लेबर आदि के बारे में भी जानकारी दे सकेंगे। इसमें उल्लेखित जानकारी के सही होने की घोषणा भी करनी होगी।निर्धारित बिन्दुओं के अलावा किसी तरह के विज्ञापन पर एडवोकेट्स एक्ट-1961 के सेक्शन 35 व 36 के अन्तर्गत अधिवक्ता के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। वेबसाइट के अलावा किसी अन्य माध्यम से विज्ञापन पर भी अधिनियम में सख्त पाबंदी है।

साभारः लोकेश के ब्लाग अदालत http://adaalat.blogspot.com से

2.4.08

रोती जाती है काम करती जाती है पति के आने तक.... (पंकज पराशर की कविताएँ)

((पंकज पराशर ब्लागर तो हैं ही, एक अच्छे कवि, पत्रकार, लेखक और मनुष्य भी हैं। मैं निजी तौर पर उन्हें नहीं जानता, जो भी जानता हूं उनके ब्लाग और भड़ास पर उनके लेखन के जरिए। आज जब मैं उनके ब्लाग को देख रहा था तो उसमें बहुत पीछे जाने पर उनकी लिखी कुछ कविताएं मिलीं। भड़ास के संचालक मंडल के सीनियर साथी पंकज पराशर का ब्लाग भड़ास के भाई भड़ासियों का कोना में भी दर्ज है। अपने साथियों के लेखन और उनके ब्लाग को प्रमोट करने की मुहिम में पंकज पराशर जी के ब्लाग ख्वाब का दर का उल्लेख यहां कर रहा हूं। इस ब्लाग को देखने के लिए आपको यह यूआरएल कंपोज करना होगा http://khwabkadar.blogspot.com। इनके ब्लाग पर आपको ढेर सारे मुद्दों, व्यक्तियों, स्थितियों के बारे में आपको पंकज की बेबाकबयानी दिख मिल जाएगी। कुल मिलाकर आपके एक अच्छे ब्लाग पर टहलने और पढ़ने गुनने का मजा मिलेगा। आप फिलहाल पंकज जी की कविता पढ़ें और उन्हें साधुवाद उनके ब्लाग पर जाकर किसी पोस्ट के नीचे कमेंट के रूप में दें। पंकज पराशर ने अपने ब्लाग पर अपनी जो प्रोफाइल बनाई है उसमें उन्हें अपने बारे में बस इतना बताया है....हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयां और...

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हस्त चिन्ह
(बनारस के घाटों को देखते हुए)
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पुरखों के पदचिन्ह पर चलने वालों
कभी उनके हस्तचिन्हों को देखकर चलो तो समझ सकोगे
हाथ दुनिया को कितना सुंदर बना सकते हैं

ख़ैबर दर्रा से आए धनझपटू हाथ
जब मचा रहे थे तबाही
वे बना रहे थे मुलायम सीढ़ियाँ
सुंदर-सुंदर घाट और मिला रहे थे गंगा की निर्मलता को
मन की कोमलता से

तलवारें टूट गईं
मिट्टी में मिल गए ख़ून सने हाथ
कोई जानता तक नहीं उन हाथों को
जिसके मलबे के नीचे सदियों तक दबी रही दुनिया

याद करो उन हाथों को जिन्होंने बनाए ताजमहल
बड़े-बड़े राजमहल
और पूरे बनारस में इतने सारे घाट
आज किसे है याद?

ढूँढ़ सको तो ढूँढ़ो इतिहास में उन हाथों को
जिन्होंने बेघर होकर बनाए लोगों के घर
लेकिन अफसोस! वहाँ दीखते हैं वही हाथ
जिन्होंने चंद सिक्के देकर ख़रीदे ग़रीब मजूरों के
अमीर हाथ

जान की परवाह किए बग़ैर जो उकेरते रहे
राजाओं के नाम और जूझते रहे सालों
छेनी-हथौड़ी लिए पत्थरों से
उन हाथों की लकीर किस हर्फ़ में दबी है
ज़रा उसे ढँढ़ो तो अपने मुल्क के इतिहास में?

वे जो इन सीढ़ियों से पहुँचते हैं
विद्युत अभिमंत्रित सरकाऊ सीढ़ियों तक
क्या बना सकते हैं कोई एक ऐसा घाट
जहाँ पी सकें पानी एक साथ
बकरी और बाघ?


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बऊ बाज़ार
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यहाँ आई तो थी किसी एक की बनकर ही
लेकिन बऊ बाज़ार में अब किसी एक की बऊ नहीं रही मैं

ओ माँ!
अब तो उसकी भी नहीं जिसने सबके सामने
कुबूल, कुबूल,कुबूल कहकर कुबूल किया था निकाह
और दस सहस्र टका मेहर भी भरी महफिल में

उसने कितने सब्ज़बाग दिखाए थे तुम्हें
बाबा को गाड़ी और तुम्हें असली तंतु की साड़ी
माछ के लिए छोटा पोखर और धान के लिए खेत
जिसकी स्वप्निल हरियाली कैसे फैल गई थी तुम्हारी आँखों में
और...न जाने कहाँ खो गई थी तुम माँ!

यह जानकर तुम्हारी छाती फट जाएगी
कि जब लाठी और लात से नहीं बन सकी पालतू
तो भूख से हराया गया तुम्हारी बेटी को
जिससे हारते हुए मैंने तुम्हें बचपन से देखा है

रात के तीसरे पहर के निविड़ अंधकार में
सोचती हूँ कैसे बचे होंगे
इस बार की वृष्टि में पिसी माँ की बाड़ी
और चिंदी-चिंदी तुम्हारी साड़ी

मैं तो कुछ भी नहीं जान पाती यहाँ
कि छुटकी के रजस्वला होते ही
बाबा ने क्या उसे भी ब्याह दिया या क़िस्मत की धनी
वह अब तक है कुँआरी?

तुम्हें तो रतौंधी है माँ यह याद है मुझे
कि तुम देख नहीं सकती कुछ भी साँझ घिरते ही

चलो यह अच्छा ही हुआ कि तुम
देख नहीं सकती शाम को जो हर रोज़ उतरती है
मेरी ज़िंदगी में और-और स्याह बनकर

कभी पान खाकर कभी इलायची चबाकर
दारू की गंध को छिपाने की कोशिश करता हुआ
मेरा खरीददार खींच-खींचकर अलग करता है
मेरी देह से एक-एक कपड़ा

जैसे रोहू माछ की देह से उतार रहा हो एक-एक छिलका
छोटे-छोटे टुकड़ों में तलकर परोसने के लिए
आदमजात की थाली में.


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रात्रि से रात्रि तक
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सूरज ढलते ही लपकती है
सिंगारदान की ओर
और घंटी बजते ही खोलकर दरवाज़ा
मधुशालीन पति का करती है स्वागत
व्योमबालाई हँसी के साथ
जल्दी-जल्दी थमाकर चाय का प्याला
घुस जाती है रसोई में
खाना बनाते बच्चों से बतियाते होमवर्क कराते हुए
खिलाकर बच्चों को पति को
फड़फड़ाती है रात भर कक्ष-कफ़स में तन-मन से घायल

जल्दी उठकर तड़के नाश्ता बनाती बच्चों को उठाती
स्कूल भेजकर पहुँचाती है पति के कक्ष में चाय
फ़ोन उठाती सब्जी चलाती हुई भागती है दरवाज़े तक
दूधवाले की पुकार पर

हर पुकार पर लौटती है स्त्री खामोश कहीं खोई हुई

जब तक सहेजती हुई सब कुछ लौटती है पति तक
हाथ में थाली लिए जलपान की

पति भूखे ही जा चुके होते हैं दफ़्तर
एक और दिन उसके जीवन में बन जाता है पहाड़

रोती जाती है काम करती जाती है पति के आने तक
मकान को घर बनाती हुई स्त्री
सूरज ढलते ही करने लगती है पुनः स्वयं को तैयार
व्योमबालाई हँसी के लिए