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10.3.09

शंकराचार्ये का बयान इस्लाम के सम्बन्ध मे !!!

दोस्तों, पिछली पोस्ट मे मैंने आपको एक शख्स के बारे मे बताया था, जिसकी सोच मुसलमानों और इस्लाम के बारे मे कितनी ग़लत थी, अब मैं आप लोगो के सामने एक विडियो पेश कर रहा हूँ इसमे एक शंकराचार्ये एक सभा को



संबोदित कर रहे हैं, अब आप लोग इनके विचार सुनिए, इस्लाम और मुसलमानों के बारे मे ! कृपया इस विडियो को देखने के बाद अपनी बहुमूल्य टिप्पणी ज़रूर दीजियेगा, धन्यवाद.

13.1.09

कंटेट कोड : तलवार से मक्खी उड़ाने की तैयारी

शाज़ी जमां

अपनी ज़रूरत और सुविधा के मुताबिक फतवा खरीदा जा सकता है! संसद में सवाल पूछने और काम करवाने के लिए सांसद दोनों हाथों नोट बटोर सकते हैं! किसी बेगुनाह को मारने के लिए पुलिस वाले सुपारी ले सकते हैं और उस बेरहम कत्ल को बड़ी सहजता से एनकाउंटर का नाम दे सकते हैं! मेटरनिटी होम के डॉक्टर बच्चों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं! अनाथालयों में पल रहे मासूमों को खरीदकर गुनाह के रास्ते पर धकेला जा सकता है! इतना ही नहीं एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष कैमरे पर दिन-दहाड़े रिश्वत लेते हुए नज़र भी आ सकते हैं। आपको इन तस्वीरों की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। पिछले कई बरसों में टीवी चैनलों पर ये तस्वीरें आपने अनगिनत बार देखी होंगी। इन ख़बरों ने देश को हिलाया था और सच परदा हटाया था। टीवी पत्रकार होने के नाते हमें इन ख़बरों पर नाज हैं। लेकिन ये ख़बरे हमारे जेहन में अचानक इसलिए बार-बार कौंध रही हैं क्योंकि न्यूज़ चैनलों के ख़िलाफ सत्ता के गलियारे में एक ख़तरनाक खेल चल रहा है।

मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद टीवी चैनलों को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश के तहत बकायदा एक अभियान चलाया रहा है। सरकारी हलकों से कंटेंट कोड की खुसफुसाहट लगातार सुनाई दे रही है। वही कोड जिसका मकसद पत्रकारिता की धार को पूरी तरह कुंद करना है और न्यूज़ चैनलों पर नकेल डालकर उन्हे पालतू बनाना है। कंटेंट कोड एक बेहद ख़तरनाक साजिश है और आंख मूंदकर इसका समर्थन करने से पहले ये समझ लेना चाहिए कि मीडिया और पूरे देश पर इसका असर क्या होगा।

निरंकुश सत्ता हमेशा ख़तरनाक होती है। निरंकुशता चाहे सरकार की हो, न्यायपालिका या फिर मीडिया की, वो अच्छी नहीं है। इतना हम भी समझते हैं कि किसी भी सभ्य समाज में मीडिया के लिए भी कोई ना कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल है-- ये लक्ष्मण रेखा कौन खीचेगा? हम बचपन से पढ़ते आये हैं कि लोकहित में सरकार के हर कदम पर नज़र रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की ये एक बुनियादी शर्त है। लेकिन कंटेट कोड के ज़रिये उल्टी गंगा बहाने की तैयारी है। यानी मीडिया सरकार पर नहीं बल्कि सरकार मीडिया पर नज़र रखेगी। जब सरकार ये तय करने लगेगी कि पब्लिक इंट्रेस्ट क्या है, तो फिर तमाम चैनल दूरदर्शन जैसे बन जाएंगे। क्या पब्लिक कभी ये चाहेगी कि इस देश के सारे चैनल दूरदर्शन मार्का हो जायें।

मैं दूरदर्शन जैसे सरकारी प्रसारण तंत्र के ख़िलाफ इसलिए नहीं हूं कि वो नीरस और उबाउ है, बल्कि असल में दूरदर्शन जनता के प्रति बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं है, जैसा कि इसे बताया जाता है। मैं टीवी पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों की सरकारी अधिकारियों से मुलाकात का एक दिलचस्प वाकया पेश करना चाहूंगा। इस मुलाकात में कुछ अधिकारियों ने ये शंका जाहिर की कि अपने काम करने के अंदाज़ से न्यूज़ चैनल दंगा करवा सकते हैं। इस पर मेरे एक पत्रकार मित्र ने जवाब दिया है-- ये क्षमता सिर्फ एक ही चैनल में है और वो है- दूरदर्शन। अपनी इस क्षमता का नमूना दूरदर्शन ने 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के कवरेज़ में पेश कर दी थी, जब भयंकर सिख विरोधी दंगे भड़के थे। ज़ाहिर है, जब सत्ता से जुड़े ऐसी समझ वाले लोग हमारी निगरानी करेंगे तो फिर उनपर नज़र कौन रखेगा। हमें अपनी कमजोरियों का पता है। इसलिए न्यूज़ चैनलों ने सेल्फ रेगुलेशन की व्यवस्था बनाई है।

कंधार विमान अपहरण कांड जैसे ही खत्म हुआ सरकार ने मीडिया को संयम बरतने के लिए धन्यवाद दिया। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उससे हमारे प्रति सरकार का नज़रिया बदल गया। क्या इसकी वजह ये थी कि न्यूज़ चैनल जनता के आक्रोश को सामने लाने का मंच बन गये? मुझे इसमें शक है। सच तो ये है कि पब्लिक के गुस्से की कहानी जब मीडिया के ज़रिये सामने आई और ये साफ हो गया कि पूरा तंत्र अपने नागरिकों की हिफाजत में नाकाम है, तो सरकार बुरी तरह हिल गई। जब हुक्मरान और सियासतदां हिले तो ऐसे-ऐसे बचकाने बयान सामने आये जो पहले कभी नहीं सुने गये। बतौर बानगी.. 'ये लिपिस्टिक लाली लगाकर हमारी बहने प्रदर्शन करती हैं'-- इस तरह के बयान सत्ता और राजनीतिक तंत्र की नाकामी के अभूतपूर्व नमूने थे।

24 घंटे चलने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों ने इन बयानों पर नेताओं की बखिया उधेड़कर रख दी। 26 नवंबर के आतंकवादी हमले के बाद सरकार ने चैनलों को सुझाव दिया कि वो इसके असर को दबा दें। क्या ये जनता के सच जानने, देखने और समझने के अधिकार का हनन था? हमने भी ये महसूस किया कि मुंबई वारदात की कवरेज़ से जुड़ी तस्वीरे दिखाने से पहले उन्हे आम आदमी की संवेदनशीलता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। लेकिन क्या ये सरकार तय करेगी कि आम आदमी की संवेदनशीलता कैसी और कितनी होनी चाहिए? क्या हम सुरक्षा में हुई ऐतिहासिक चूक की वो तस्वीर हमेशा के लिए मिटा दें जो एक अरब लोगों के दिलो-दिमाग़ में कैद हो चुकी हैं। या फिर हम ये तय करे कि 26-11 को हम कभी नहीं भूलेंगे और ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने देंगे।

अगर सरकार ने न्यूज़ चैनलों पर कंटेट कोड लागू कर दिया तो आप वो तस्वीरे और ख़बरें नहीं देख पाएंगे जिनका जिक्र मैंने अपने लेख की शुरुआत में किया था। समझा जा सकता है कि कंटेट कोड के क्या नतीजे होंगे और इससे क्या हासिल होगा।

(लेखक शाज़ी जमां स्टार न्यूज के संपादक हैं)

18.10.08

एक हिन्दी शिक्षक की व्यथा

मैं एक अध्यापिका हूँ
हिन्दी पढ़ाती हूँ ।
मत पूछो दिन भर
कितना सकपकाती हूँ ।
जब भी कहीं किसी से
मिलने जाती हूँ --
बहुत आत्मविश्वास जताती हूँ ।
किन्तु प्रथम परिचय में ही-
पानी-पानी हो जाती हूँ ।
जब कोई पूछता है-
आप क्या करती हैं ?
मैं बड़े गर्व से कहती हूँ -
मैं एक अध्यापिका हूँ ।
अच्छा---?
किस विषय की -?
इस प्रश्न का सामना
कभी नहीं कर पाती हूँ ।
सुनते ही बहुत नीचे
धँस जाती हूँ ।
लगता है ये एक ब्रह्मास्त्र है ।
जो मेरे आत्मविश्वास को
खंड-खंड कर देगा ।
और मैं -चाह कर भी
अपनी रक्षा नहीं कर पाऊँगी ।
प्रश्न फिर गूँजता है--
किस विषय की ---
जी --हिन्दी की
बहुत कोशिश करके कहती हूँ ।
सभी के चेहरों का सम्मान
हवा हो जाता है ।
और आँखों में-
एक हिकारत सी आजाती है ।
मुझे लगता है--
मैं कोई बड़ा अपराध कर रही हूँ ।
अंग्रेजी प्रधान लोगों में
हिन्दी का प्रचार कर रही हूँ ।
मेरे विद्यार्थी हिन्दी से
उकता जाते हैं ।
पर जब कभी--
बहुत प्यार जताते हैं -
तब पूछ बैठते हैं -
मैम आप ने हिन्दी क्यों ली ?
उस वक्त मेरी नसें -
फड़फड़ाने लगती हैं ।
किन्तु प्रत्यक्ष में
खिसियाकर मुसकुराती हूँ ।
पर कोई ठोस कारण
नही बता पाती हूँ ।
एक बार प्रयास किया था ।
हिन्दी के महत्व पर
बड़ा सा भाषण दिया था ।
धारा प्रवाह हिन्दी का
जयगान किया था ।
किन्तु एक विद्यार्थी ने
झटके से पूछ लिया था --
क्या आगे काम आएगी ?
नौकरी दिलवाएगी ?
मेरा उत्साह शून्य में खो गया
मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी -
किन्तु मेरी ये बातें कौन सुनेगा?
हिन्दी हमारी राष्ट भाषा है--
तो हुआ करे----
वह वैग्यानिक और सरल है-
किन्तु नौकरी तो नहीं दिला सकती ।
विदेश तो नहीं भिजवा सकती ।
मुझे अपने हिन्दी पढ़ाने पर
शर्म आने लगती है ।
दूर-दूर ढूँढ़ती हूँ -
पर कहीं कोई हिन्दी प्रेमी नहीं मिलता ।
हिन्दी के लिए मान
झीना होने लगता है ।
और मुझे कुछ चेहरे
दिखाई देने लगते हैं ।
अंग्रेजी बोलते-- फ्रैंच सीखते-
और हिन्दी को दुदकारते ।
मैं इन चेहरों को पहचान
नहीं पाती हूँ ।
और तभी मुझे कोने में
डरी-सहमी हिन्दी दिखाई देती है ।
मेरी ओर बहुत कातर दृष्टि से देखती--
उसकी आँखों का सामना
नहीं कर पाती हूँ ।
टूटते शब्दों से
दिलासा पहुँचाती हूँ ।
किन्तु हिन्दी दिवस पर
अपनी भाषा को
कुछ नहीं दे पाती हूँ ।
हिन्दी दिवस मनाने वालों-
आज एक संकल्प उठाओ-
अंग्रेजी भले ही सीखो-
पर अपनी भाषा को
मत ठुकराओ ।
उसे यूँ अपरिचित ना बनाओ ।
लेखिका :-शोभा महेन्द्रू

18.7.08

समाज के मठाधीश यानी की समाज का शोषक.

अभी अर्द्यसत्य पढ़ रहा था, कि मनीषा दीदी के इस ब्लॉग को पढ़ते पढ़ते इस पोस्ट पर आकर अटक गया। विचारों के झंझावात में उलझा रहा मगर समझ में ना आया कि इस पर मैं किन शब्दों में अपनी राय रखूँ, वस्तुत: ये चित्रण लैंगिक विकलांग समाज से है मगर अद्भुत कि ये तो हमारे समाज का आइना है तो क्या सभी जगह इन मठाधीशों ने अपने स्वार्थपरक कार्य के लिए अन्धकार फैलाने कि ही कोशिश कि है। पोस्ट के शब्द और भावः, मेरे पास शब्दों कि कमी हो गयी कि क्या मैं एक लैंगिक विकलांग के ब्लॉग पर घूम रहा हूँ, अगर एसा है तो सम्पूर्ण मानव के ब्लॉग से बेहतर तो हमारी दीदी हैं क्या आप उनके इस विचार से अवगत हैं नही तो एक नजर डालिए और आइना देखिये, संग ही समाज को निहारिये



सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है।


शेष के लिए यहाँ क्लिक करें




रजनीश के झा
जय जय भड़ास

1.7.08

धन्यबाद

यशवंत जी आपका और पूरी टीम का धन्यबाद। यह मेरी पहली पोस्ट है। मेरे पास भी कुछ मसाला है जिसे मैं उडेलना चाहता हूँ। समय समय पर उसे लिखता रहूँगा।

22.6.08

अरे हट जा ताऊ पाछे....दो ब्लागरों का स्वागत करें बढ़कर आगे...

दो ब्लागर साथी भड़ासी बन गए हैं। पीसी रामपुरिया और राजीव कुमार। पीसी रामपुरिया के ब्लाग का नाम है रामपुरिया....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा http://rampuriapc.blogspot.com/। राजीव कुमार के ब्लाग हैं दो टूक http://rajivguw.blogspot.com/ और विचार http://rajivkumar.mywebdunia.com/। राजीव पत्रकार हैं जो पूर्वोत्तर में हैं। पीसी रामपुरिया बिजनेसमैन हैं जो लोकल हरियाणवी लैंग्वेज में मस्त ताऊनामा पेश करते हैं। दोनों ब्लागरों की प्रोफाइल व ब्लाग जोरदार हैं। इन साथियों के भड़ासी बनने पर हम इनका सादर सत्कार करते हैं, अभिनंदन करते हैं और अपने डा. रूपेश जी व पंडित जगदीश त्रिपाठी जी से अनुरोध करूंगा कि वे जल्द ही इन दोनों भलेमानुसों को बुरामानुस बनाने की दीक्षा शुरू कर दें ताकि जो भी इन्हें देखे, पढ़े, जाने....भड़ासी है, भड़ासी है कहकर संबोधित करना शुरू कर दे और ये लोग खूब सोचकर भी यह तय न कर पाएं कि उन्हें भड़ासी कहा जाना उनका सम्मान है या अपमान है :) भई, हम तो इसे सम्मान मानते हैं पर कुछ सड़ियल भाई लोग इसे अपमान बताते हैं। ये आपको तय करना है कि सड़ियल लोगों के कहे के हिसाब से जीना है या अपनी सोच व विचार से जिंदगी के सफर को तय करना है। चलिए, भाषण काफी दे लिया, अब आप लोगों को इन दोनों ब्लागरों के ब्लाग से कुछ चीजें चुराकर पढ़ाते हैं, और हां, इनके ब्लाग को भड़ास के कोने में भी जगह दे दी गई है।
जय भड़ास
यशवंत



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ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
-पीसी रामपुरिया-
ताऊ लद्दा को भैंस चराते चराते अग्रेंजी बोलने का शौकचढ गया। और ताऊ को ठीक से हिन्दी भी नहीबोलनी आवै थी। पर क्या हो सकता है? ताऊ कै दिमागमे आ गयी, तो आ गयी। बहुत दिन तो घर पर ही प्रेक्टिस करता रहा, पर बात बणी नही। और ताऊ नैये पक्का इरादा कर लिया कि अग्रेंजी बोलना सीख के रहेगा। ताऊ बडा उदास हो रहा था। फ़िर किसी ने उसको बताया किपडोस के मोहल्ले मे एक मास्टरनी जी अग्रेंजी की क्लासलेती है और बहुत जल्दी अग्रेंजी सिखा देती है। सो मेरा मट्टा,ताऊ तो मास्टरनी के पास पहुंच लिया। और फ़ीस भी जमा करा दी । दो तीन महिने मे ताऊ थोडी बहुत अन्ग्रेजी की ऐसी तैसी करनेलग गया । इब एक दिन ताउ लद्दा के घर उसकी रिश्ते कीसाली आयी हुयी थी। ताऊ क्लास से शाम को घर आया, औरअपनी साली पर अग्रेंजी का रौब झाडने के लिये बोला -आइ लव यू ...रज्जो । साली भी पढी लिखी थी और अपने जीजा पर जान भीछिडकती थी, सो जवाब मे बोली - जीजा, आइ लव यू टू..! ताऊ लद्दा भी कहां चुप रहनै वाला था? ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
Posted by P. C. Rampuria View my complete profile

साभारः रामपुरिया.....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा
(आपको उपरोक्त ब्लाग पर ताऊ से संबंधित आपको मजेदार मजेदार पोस्टें पढ़ने को मिलेंगी)
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आजादी नहीं, बर्बादी में लगा है उल्फा
--राजीव कुमार--
उल्फा नेता बांग्लादेश में है। संगठन के बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। कारण बांग्लादेश में बैठे उल्फा के शीर्ष नेता वहां के कट्टरवादी संगठनों की बोली बोल रहे हैं। यह उनकी मजबूरी है। नहीं तो शरण कौन देगा। इसलिए बांग्लादेश के कट्टरवादी संगठनों को खुश करने के लिए उल्फा ने बम विस्फोटों की जिम्मेवारी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर डालनी शुरु कर दी है। उल्फा अब कोई विस्फोट करता है और उसमें यदि कोई मुस्लिम व्यकि्त मारा जाता है तो वह तुरंत इससे मुकर जाता है। गुवाहाटी के आठगांव और हाजो में हुए बम विस्फोट में मुसि्लम लोग मारे गए तो उसने देर किए बिना मीडिया में इसका खंडन भेजा। इन बम विस्फोटों के पीछे असम पबि्लक वर्क्स और आरएसएस के छात्र संगठन का हाथ होने का आरोप मढ़ दिया। अन्य विस्फोटों के मामले में वह इतनी हड़बड़ी नहीं दिखाता है। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,उल्फा बांग्लादेश में बैठे अपने मास्टरों को खुश करने के लिए यह करता है। बांग्लादेश में शरण के बदले उल्फा को वह सारी बातें माननी पड़ रही है जो असम के हितों के खिलाफ है। असम को आजाद कराने का सपना देखनेवाला संगठन इस तरह असम को ही क्षति पहुंचा रहा है।

बांग्लादेश से अबाध घुसपैठ होती है। इस पर वह चुप्पी साधे हुए है। वह बोल नहीं सकता। आसरा मिलने के कारण वह बेबस है। इसके चलते बांग्लादेश की वह योजना सफल होने की ओर बढ़ रही है जिसमें उसने निचले असम के कई जिलों को लेकर वृहतर बांग्लादेश बनाने का सपना देखा है। उल्फा के कंधे पर बंदूक रखकर वह इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

उल्फा का जन्म 7 अप्रेल 1979 को शिवसागर जिले के ऍतिहासिक रंगघर में हुआ था। पर उसने बांग्लादेश में शरण दस साल बाद 1989 में ली। जब उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आशंका हुई। जब उल्फा नेताओं ने बांग्लादेश में शरण ले ली तो राज्य में धीरे-धीरे मुसि्लम आबादी बढ़ने लगी। जानकार बताते हैं कि 1989 में उल्फा का एक नेता बांग्लादेश गया। उसने बांग्लादेश नेशनल पार्टी की तत्कालीन सरकार के एक मंत्री से मुलाकात की। इस बैठक के बाद ही पाकिस्तान के पेशावर में वहां की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटलीजेंस(आईएसआई)ने उल्फा के सदस्यों को 1990-91में प्रशिक्षण दिया। यह शुरुआत थी। लेकिन इसके पहले 1983 में उल्फा के चालीस सदस्यों ने म्यांमार के काचिन में एनएससीएन से हथियारों का प्रशिक्षण पाया था। इसमें उल्फा के सेना प्रमुख परेश बरुवा भी शामिल थे।इसके बाद 1986 में काचिन में 90 उल्फा सदस्यों ने प्रशिक्षण पाया। प्रशिक्षण पानेवालों में उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा भी शामिल थे। इसके बाद ही संगठन ने बांग्लादेश का रुख किया और असम के विनाश का दौर शुरु हो गया। 1971 की जनगणना के अनुसार ग्वालपाड़ा जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 50.11प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 41.50थी। लेकिन 20साल बाद पूरी छवि ही बदल गई। 1991की जनगणना में इस जिले में हिंदुओं की आबादी घटकर 39.89प्रतिशत पर आई जबकि मुसलमानों की बढ़कर 60.46 प्रतिशत पर पहुंच गई। यही हाल धुबड़ी जिले में हुआ। 1971की जनगणना के अनुसार धुबड़ी जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 38.80 प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 60.40 थी। लेकिन 1991की जनगणना के अनुसार इस जिले में हिंदुओं की जनसंख्या घटकर 28.73प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 70.45प्रतिशत हुई।ठीक इसी तरह बरपेटा जिले में 1971 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या51.52प्रतिशत और मुसलमानों की 48.65प्रतिशत थी। पर बीस साल बाद मुसलमानों की बढ़कर 56.07प्रतिशत और हिंदुओं की घटकर 40.26पर आ गई। हाइलाकांदी जिले में 1971की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 47.48 प्रतिशत और मुसलमानों की 51.40प्रतिशत थी।लेकिन बीस साल बाद हिंदुओं की आबादी इस जिले में घटकर 43.71प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 54.79प्रतिशत हो गई।राज्य के अधिकांश जिलों में हिंदुओं की जनसंख्या घटी है जबकि मुसलमानों की बढ़ी है।वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में हिंदुओं की जनसंख्या 64.9प्रतिशत और मुसलमानों की 30.9प्रतिशत थी जबकि 1991की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या 67.1और मुसलमानों की 28.4प्रतिशत थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 36 में मुस्लिम बहुसंख्यक है। भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से बांग्लादेशी घुसपैठियों का निरतंर आना जारी है।इन सबके बीच उल्फा ने हिंदीभाषी मजदूरों की हत्या कर बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोजगार का अवसर दे दिया है।स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रसूल हक ने निचले असम के कई जिलों को लेकर मुस्लिमों के लिए अलग से स्वायत्त परिषद बनाने की मांग की है।उधर उल्फा के सहयोग से राज्य में जेहादी तत्व सक्रिय है।इन सब ने मिलकर राज्य को गर्त में ले जाने का कार्य शुरु कर दिया है।मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,असम स्वाधीन होकर नहीं रह सकता। माना कि हो भी गया तो वह पराधीन ही होगा। उल्फा नेताओं को उसे बांग्लादेश के इशारे पर ही चलाना होगा।इन सब से यह स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में आसरा लेने की कितनी बड़ी कीमत उल्फा नेता चुका रहे हैं।जो आनेवाले दिनों में असम के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी।कारण बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण राज्य में भारी जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संपर्क पता-राजीव कुमार
पोस्ट बाक्स-12,
दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660

Posted by- Rajiv Kumar View my complete profile

साभारः दो टूक

(पूर्वोत्तर को जानने, उस इलाके से जुड़े़ नीतिगत मामलों के बारे में एक पत्रकार के नजरिये को समझने के लिहाज से यह ब्लाग बेहद उपयोगी है)

18.5.08

आरक्षण और अजीम प्रेम जी के विचार Mr. Azim Premji's comment on reservation

दैनिक जागरण, नोएडा में कार्यरत चीफ सब एडीटर और मेरे साथी विनोद पाठक (vp1975@gmail.com ) ने कई लोगों को ग्रुप में एक मेल भेजा है। इस मेल के जरिए बताया गया है कि किस तरह रिजर्वेशन बोले तो आरक्षण गैर-जरूरी है। यह बात बताने के लिए अजीम प्रेम जी के मुंह से बातें कहलवाई गईं हैं।

मुझे नहीं पता, ये बातें वाकई अजीम प्रेम जी ने कहीं हैं या नहीं क्योंकि मेल की दुनिया में ढेर सारी बातें झूठी भी प्रचारित की जाती हैं। ताजा उदाहरण उसी मेल का है जिसमें बताया गया था कि अगर अपने एटीम में अपना पिन नंबर उलटा डालते हैं तो भी पैसा निकल आएगा लेकिन वहां पुलिस पहुंच जाएगी। ऐसा तब करिए जब कोई बदमाश जबरन पैसा निकाल रहा हो। इस मेल को जब पोस्ट के रूप में डाला तो ढेरों कमेंट आए और कई पढ़े लिखे साथियों (मैं खुद को अपढ़ श्रेणी में रखता हूं क्योंकि ज्यादातर पत्रकार अपढ़ श्रेणी में ही होते हैं, वे कौन्वा कान ले गया के फंडे पर विश्वास करते हैं, कोई कुछ भी कह दे, वे उसे ब्रह्म सत्य मानकर द्रुत गति से प्रचारित करना शुरू कर देते हैं) ने शंका जाहिर की कि ऐसा संभव नहीं है।

खसकर अपने वरिष्ठ भड़ासी साथी अंकित माथुर ने पूरा शोध करके एक नई पोस्ट लिख मारी जिससे यह पूरी तरह साबित हो गया कि वो जो मेल एटीएम व पिन नंबर से संबंधित था, झूठी सूचनाओं और तथ्यों पर आधारित था। तो इस मेल के तथ्य के बारे में भी इसी तरह पता करना होगा।

अगर अजीम प्रेमजी ने ये बात कही है तो वो भी इस आरक्षण मुद्दे पर विभाजित भारत के एक पक्ष के प्रतीक हैं जो आरक्षण को या तो सही मानते हैं या गलत मानते हैं। पर मैं अपने आप को तीसरे पक्ष का मानता हूं, वो ये कि आरक्षण एक जरूरी बुराई है जिसे समाज के दलित तबके के उत्थान के साथ-साथ कम करते हुए खत्म कर देना चाहिए।
जय भड़ास
यशवंत
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Have a look at this!
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How convincingly an intelligent man speaks out his heart!!!!!!!!!!!!!!! !
Wipro chairman Mr. Azim Premji's comment on reservation:


I think we should have job reservations in all the fields। I
completely support the PM and all the politicians for promoting this. Let's
start the reservation with our cricket team. We should have 10 percent
reservation for Muslims. 30 percent for OBC, SC/ST like that. Cricket rules
should be modified accordingly.


The boundary circle should be reduced for an SC/ST player। The
four hit by an OBC player should be considered as a six and a six hit by an OBC
player should be counted as 8 runs. An OBC player scoring 60 runs should be
declared as a century.
We should influence ICC and make rules so that the
pace bowlers like Shoaib Akhtar should not bowl fast balls to our OBC
player.
Bowlers should bowl maximum speed of 80 km/ hour to an OBC
player.
Any delivery above this speed should be made illegal.
Also we
should have reservation in Olympics. In the 100 meters race, an OBC player
should be given a gold medal if he runs 80 meters.
There can be reservation
in Government jobs also. Let's recruit SC/ST and OBC pilots for aircrafts which
are carrying the ministers and politicians (that can really help the
country...)
Ensure that only SC/ST and OBC doctors do the operations for the
ministers and other politicians. (Another way of saving the country...)
Let's
be creative and think of ways and means to guide INDIA forward...Let's show the
world that INDIA is a GREAT country.Let's be proud of being an INDIAN...
May
the good breed of politicians like ARJUN SINGH long live...
"Education's
purpose is to replace an empty mind with an open one।"

13.5.08

क्या आप कर सकते है इनकार ?


इस बात से कतई इनकार नही किया जा सकता की आज के कंप्यूटर - आधारित समाज मै हम इंजिनीअर तो बखूबी बना पायेंगे , लेकिन लेखक और कलाकार नही । यानी हम एक ऐसा समाज बनायेंगे , जहा न विचारो की कोई भूमिका होगी और न संवेदना के लिए कोई जगह।

22.2.08

सृजनगाथा : प्रसंगवश

कितना उचित है उपजाऊ भूमि पर उद्योग लगाना - तनवीर जाफ़री

यह आलेख अपने चार भाइयों के साथ सृजन गाथा में मौजूद है ।

इस आलेख पर मेरी टिप्पणी है:-"इसी लिए लोग बंजर ज़मीन को भी नही छोड़ते "

28.1.08

भड़ास तुम्हारे हवाले, मैं चला समझदारी के गीत गाने...

कई दिनों से ब्लाग पर नहीं था, आगे भी यही इरादा है। घर पर बच्चों ने लैपटाप पर इस कदर काम (ब्लागिंग)करते देख ताना मारना शुरू कर दिया था.....
..पापा...मान जाओ प्लीज, बंद कर दो लैपटाप, इतने देर तक काम करोगे, तो पागल हो जाओगे।
...पापा, क्या ये तुमको होमवर्क मिलता है आफिस से?
....पापा, बहुत देर से चार्ज हो रहा है लैपटाप, अब बंद भी कर दो वरना गर्म होकर ये ब्लास्ट हो जायेगा,
.....पापा, अब तो लगता ही नहीं कि तुम घर पर हो, इससे अच्छा है कि आफिस में ही रहते, तुम न बात करते हो, न साथ में कार्टून देखते हो, न घुमाने ले जाते हो, न कोई कहानी सुनाते हो.....
...पापा, तुम्हारा दिमगवा जो है न, वो इक दिन ब्लास्ट हो जायेगा, देखो..कितना गरम है।
...पापा, तु्म्हारी आंखें खराब हो जाएंगी, तुम ही कहते हो न, लगातार टीवी नहीं देखते, तो तुम क्यों लगातार लैपटाप खोले रहते हो।
......

और श्रीमती जी क्या कहतीं, पूछिए न....एक बानगी सुनिये...

...एजी, इ का बवाल आफिस से ले आए, ओहरे रख देते, पहले थोड़ा घर पर हंस बोल लेते थे, अब तो जब देखो इहे लैपटाप खोले और चश्मा लगाए बैठे घूरते रहते हैं, चलो ठीक है, भड़ास है, पर क्या इसे भरसांय बना देंगे कि इसकी आंच से परान निकल जाए....


शायद, ब्लागिंग का पागलपन जिसे लग जाए वो उस प्रेमी जैसा हो जाता है जिसे चाहे कंकड़ मारो या पत्थर, वो लैला लैला कहता रहेगा। वो शूली चढ़ जाएगा, जान दे देगा, राज्य और राष्ट्र से द्रोह कर लेगा पर आशिकी न छोड़ेगा। इसी तरह ब्लागिंग है, आफिस में माहौल खिलाफ बन जाए, नौकरी चली जाए, धंधा मंदा हो जाए, परिवार नाराज हो जाए, बच्चे-बीबी त्रस्त हो जाएं....पर ब्लागिंग न जाये। पहले तो सीमित था। जब तक दैनिक जागरण में था, आफिस से ब्लागिंग करता रहा, विरोधों और आरोपों के बावजूद। जब दैनिक जागरण से निकाला गया तो घर पर कंप्यूटर न होने की वजह से साइबर कैफे में ब्लागिंग करता रहा, सैकड़ों रुपये खर्च करने के बाद एक दिन इस चूतियापे को खत्म कर देने की ठानी। और ऐसे महान फैसले हमेशा दारू की अभिन्न शिवत्व की अवस्था में ही लिये जाते हैं। सो ले लिया। उस ब्लाग को डिलीट कर दिया, जिस ब्लाग के कारण इतनी गालियां मिलीं आफिस में, इतनी गालियां मिलीं विरोधी ब्लागरों से।

पर भड़ास ने, मेरी एक पहचान तो बना ही दी थी, बुरी ही सही। नई नौकरी में ब्लागिंग को न सिर्फ प्रमोट किया गया बल्कि भड़ास को फिर से बनाने व चलाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। सो अब भड़ास पहले से ज्यादा तेवर और ज्यादा भड़ासियों के साथ हाजिर हुआ। भड़ास डिलीट करने के बाद से दिल में एक अपराधबोध था, दोस्त व सीनियर ब्लागर साथियों के समझाने का असर था व भड़ासियों की दुआ थी, सो भड़ास फिर उसी जैसा जन्म गया। एक ऐसा पुर्नजन्म जिसमें पुरानी यादें सारी ताजा हों। सो, भड़ास के फिर आने के बाद से मेरे दिल से बोझ उतर गया। आफिस ने जो लैपटाप दिया उससे घर पर बैठकर ब्लागिंग करता रहा। पिछले सालभर में कुल जितनी पोस्टें लिखी गईं भड़ास में, इसी महीने उतनी संख्या में भड़ासियों द्वारा पोस्टें लिख दी गईं। भड़ासियों का जनबल भी 184 पर पहुंच चुका है। मीडिया में ब्लागिंग के साथ भड़ास भी खूब छाया हुआ है। मतलब....बल्ले बल्ले है भड़ास और भड़ासियों के। अभी परसों ही तो, नवभारत टाइम्स में रविवार के फोकस पेज पर दो तिहाई पेज में ब्लागिंग पर कवरेज था और उसमें जिन चार ब्लागों के माडरेटरों से बातचीत थी, उसमें भड़ास ब्लाग भी था। और अपुन की फोटू भी। चलो, जीते जी अपन का छपा हुआ फोटो देख लिया अखबार में, जाने मरने पर लगे ना लगे...:):O:

तो मैं कहना ये चाह रहा था कि पिछले तीन रोज लैपटाप आफिस के हवाले कर घर पर खुल्ला खुल्ला रहा तो लगा फिर से ज़िंदगी लौट आई। खूब खाए, पकाए, घूमे-घुमाए। फिल्म, कार्टून और सीरियल देखे। बच्चों संग खेला। लगा, ब्लागिंग से जो ज़िंदगी चली गई थी, वो लौट आई। इसमें गलती लैपटाप की या मेरी या घर की या आफिस की नहीं, अतिवाद का है, जो मेरे व मेरे जैसा साथियों के साथ दिक्कत है। जो भी करेंगे इतना करेंगे कि उसकी गांड़ में घुस जायेंगे और परान दे देंगे।

जो समझदार लोग होते हैं, संतुलित लोग होते हैं, दुनियादार होते हैं, विजनरी होते हैं, दृष्टि वाले होते हैं...हर काम उतना ही करते हैं जितना जरूरी होता है। पर अपन तो ठहरे भुच्च देहाती। भावना वाले। दिल वाले। इमोशन वाले। पार्टी अच्छी लगी तो चल दिए क्रांति करने। सेक्स उफान मारने लगा तो एकदम से हां कर दिया बियाह के लिए, बिना लड़की देखे। मां के आंसू देखे तो चल दिए नौकरी करने, झोला उठाकर। पत्रकारिता शुरू की तो लगे तेल लगाने जीभरकर। जब मन भर गया व तेल गाने से उबकाई आने लगी तो लगे तेल उतारने, जिनको जिनको लगाया उनसे उनसे हिसाब बराबकर करके तेल निकाल। सारा तेल वापस ले लिया, मय सूद के। इसी तरह ब्लाग शुरू किया तो ऐसा किया कि अपनी ही गांड़ में ब्लाग घुसा दिया और खुद हो गए पैदल....। और अब दुबारा ब्लागिंग शुरू की तो फिर घर में मुसीबत। मतलब, हरामीपने की हद है। जो करेंगे तो इतना की या तो सामने वाला बांय बांय चिल्लाकर डर के मारे भागने लगे या गरियाने लगे या खुद की अपनी ही फट जाए।

तो ये जो अतिवादी आदत है, उसे बदलने की कोशिश करनी होगी। इसी के तहत ब्लागिंग से एक समझदार दूरी बनाना चाह रहा हूं। हालांकि शायद ये अतिवादी आदत ही सच बोलने पर मजबूर करती है, भड़ास निकालने और भड़ास चलाने को कहती है, वरना समझदार और मध्यमार्गी लोग तो सब कुछ इतना स्ट्रेटजिक करते हैं कि पता ही नहीं चलता कब तीर निशान पर जाकर लग गया और वे एकदम से इस्टाइल में चौंकते हुए बोल पड़ेंगे....अच्छा, गुड, मुझे तो पता ही नहीं चला कि तीर कब छूटा था और तीर कब लक्ष्य भेद गया। हालांकि मन में भड़ास वो भी भरे रहते हैं लेकिन निकालते नहीं और एक दिन बस उनका इकट्ठा परान ही निकलता है, भड़ास की जगह। हर्ट अटैक आयेगा, समझदार लोगों को लो जाएगा। लेकिन जो भी हो, मैं तो समझदार बनना चाहता हूं, हर्ट अटैक आएगा तो देखा जाएगा।

समझदारों के गीत गाओ। समझदारों की तरह जियो। समझदारों की संगत करो। कहां भड़ास और भड़ासियों के बीच फंसे हो आप लोग। अनगढ़ लोगों की जमात है। देहातियों का बकवास है। असफल लोगों की बात है।


अपने डा. रुपेश जी हैं, जिद्दी हैं, समझाने पर भी नहीं मानते हैं, पेले रहते हैं, हम्ही लोगों को समझाते हैं, क्रांति के लिए उकसाये रहते हैं। अब तो उनके सपने भी आने लगे हैं। डंडा लिये खड़े हैं सिर पर, कह रहे हैं....

...
बोलो यशवंत बोले, क्रांति का मंच है कि नहीं भड़ास, और मैं चिल्ला कर कह रहा हूं...बस, मेरी मारना नहीं, मेरी लेना नहीं, बाकी जो कहोगे, कहूंगा, जैसे कहोगे, चलाऊंगा। और वो अट्टाहस करके हंस रहे हैं...देखा, साला कितना पोंकू है, डंडा देखते ही पोंकने लगा। थूं....तुम जैसे फट्टू भड़ासी पर।


तो भई भड़ासियों, अब भड़ास तुम्हारे हवाले, मैं चला समझदारी के गीत गाने। लेकिन जाते जाते कुछ हिसाब क्लीयर करना है, कुछ लोगों से। एक एक कर हिसाब क्लीयर करता हूं...


पहला हिसाब विनीत कुमार डीयू वाले शोधार्थी से ...
बच्चा, बहुत सच्चा-सच्चा लिखते हो, ऋचा आईबीएन-7 वाली चाहे जो करे लेकिन वो तुमको याद जरूर रखेगी, अगर कभी गए आईबीएन इंटरव्यू देने और उसने तुम्हे देख लिया तो डंडा डंडा मारेगी और दरबानों से उठवाकर फेंकवा देगी, सो उधरे शोध वोध करके मास्टरी करने की सोचना, अब टीवी में तो तुमको नौकरी नहीं मिलेगी.....:) सच कहने की कुछ तो सजा मिलनी चाहिए तुम्हें....।


दूसरा हिसाब पीडी भाई टेक्नोक्रेट से ...
पीडी भइया, दिल्ली की गर्मी गांड़ फाड़े है और आप फगुवा रहे हैं। मेरे बुरे सपनों के बारे में सबको बताकर काहें मेरी चड्ढी उतार रहे हैं। सपने तो साले ऐसे आते हैं, आते हैं, और आते रहेंगे कि अगर वो लिख दिया जाए तो सबकी फट जाएगी क्योंकि दरअसल सच्ची कहें तो सपने और भड़ास यही दो हैं जहां आदमी हलका होता है, जो नहीं कर पाता है कर लेता है, जो नहीं कह पाता है कह लेता है। अगर ये न हों तो आदमी साला पत्थर की मूर्ति बन जाए जिस पर कुक्कुर आकर मुत्ती कर दे और वो चूं तक न कर सके। ....लेकिन आपने याद दिलाकर अच्छा किया, भौजी की खोज वाली बात तो मैं भूल ही चुका था। ढेर सारी महिला ब्लागर हैं मैदान में, वो जिन महिलाओं ने भड़ास को खास भाव नहीं दिया है, उनमें से ही किसी को घोषित कर देंगे भड़ास की भौजी। दूसरा यह भी हो सकता है कि भड़ास की भौजी के लिए इस समय जितनी महिला ब्लागर हैं, उनके नाम पर भड़ासियों से वोट करा लिया जाए। जिसे ज्यादा वोट मिले, उसे घोषित कर दिया जाए।


तीसरा हिसाब अपने डा. रुपेश श्रीवास्वत जी से......
डाग्डर साहेब। आपसे बहुते उम्मीद है। एक डाग्डर साहेब लोहिया जी रहेन। जिनके चेले आजतक डाग्डर साहब का नाम लेकर अक्सर भांजने लगते हैं। दूसरे आप हैं, कम से कम मैं तो आपका चेला बन ही गया हूं। पर क्या बात है, आप कुछ नाराज हैं क्या, आपको मैंने एक पत्र भेजा था, मेल से। जवाब नहीं आया। अगर फुरसत मिले तो मुझे फोनिया लीजिएगा। आपका ब्लाग देखा, फाड़ू है। उसे आगे बढ़ाइए। मैं कमेंट नहीं कर पाया, बुरा न मानियेगा।

...चौथा हिसाब हिंदी मीडियाकर्मी साथियों से....
भड़ास में दोबारा वो कालम शुरू किया था, कनबतियां मीडिया जगत वाला, चल चला चल नाम से, उससे पहले बढ़ते जाना रे। लेकिन उसे लोगों ने रिस्पांस ठीक नहीं दिया। सूचनाएं मिल नहीं रहीं थीं, सो उसे बंद कर दिया। अब वो कालम इसलिए भी नहीं चलाना चाहता कि उससे अपुन का तो कोई फायदा नहीं, टाइम अलग से लगाना पड़ता था। दूसरे, कई ब्लागर साथी पत्रकारों की आवाजाही से संबंधित कालम चलाने लगे हैं, सो उसकी जरूरत पूरी होती रहेगी। मुझे मुक्ति भी मिल गई। आप लोगों से अनुरोध है कि ये कालम बंद करने के लिए माफ करेंगे और बोल हल्ला ब्लाग पर चल रहे इस कालम में सूचनाएं देकर उसे अपडेट रखेंगे।

अंत में....एक सूचना, हरिद्वार में ब्लागर मिलन होगा......
कल से हरिद्वार हूं, हफ्ते भर के प्रवास पर। वहां दो ब्लागरों से मिलने का प्रोग्राम है, डा. अजीत तोमर जी और डा. बुधकर जी। वहां से लौटकर जरूर अपने अनुभवों के बारे में आप लोगों से शेयर करूंगा।

फिलहाल इतना ही, अब देखो कब मिलते हैं, जय भड़ास
यशवंत सिंह
yashwantdelhi@gmail.com

25.1.08

हम फकीरों से जो उलझे उनका भी भला...

सप्ताह का ब्लागरः यशवंत सिंह...कौन कहता है साला कि...

उपरोक्त लिंक पर क्लिक करेंगे तो अपने आशीष महर्षि, बोलहल्ला ब्लाग वाले के ब्लाग पर पहुंच जाएंगे और उन्होंने जो सप्ताह का ब्लागर कालम शुरू किया है, उसमें सबसे पहले मुझे ही पकड़ कर हलाल किया है, को पढ़ पाएंगे।

किसी दुखी अनाम सज्जन से इंटरव्यू मेरा पढ़ा नहीं गया और उन्होंने अनाप शनाप कमेंट शुरू कर दिया। बाद में उन कमेंट को आशीष ने हटा दिया।

खैर, हम, फकीरों से जो उलझे उनका भी भला, जो न उलझे उनका भी भला। क्या लेके आए हैं जो लेके जाएंगे। ज़िंदगी के चार दिन, दो आरजू में कट गए, दो इंतज़ार में....। तो सहज व सरल तरीके से जीकर गुजार लिया जाए। और इस प्रक्रिया में हम चाहें जितने सफल और असफल बन जाएं, अगर एक संवेदनशील मनुष्य खुद को बनाए रख सकें, तो यही सफलता होगी।

आप लोग पढ़िए और अपनी राय वहीं बोलहल्ला पर ही दर्ज कराइए।

जय भड़ास
यशवंत सिंह

21.1.08

अबे, सुन बे, ओ लड़कियां, दीदी जी, हरामी साले को

तुमको सुनता हूं
पढ़ता हूं
तो अट्टाहस करता हूं
तरस खाता हूं तुम पर
हम मर्द हरामी के,
कितना समझदार हो गए हैं
सोचते हैं रोज, हर रोज
हरामीपने के तोड़
और तुम हो कि
बस, वही जीती रहती हो
अपनी खोल में
सती सावित्री से लेकर
नीलिमा, घुघूती, मनीषा
प्रेमिका, दोस्त, पत्नी
बीवी, भाभी, बहन...
जो भी हो तुम लोग
लेकिन बहुत पर्सनल
होती हैं तुम्हारी बातें
सरेआम होते हुए भी
जीती रहती हो अपने
दर्द, और अपनी दुनिया में
कितना गैप है तुममें और हममें
मेरी जान ताकि
तुम लोग भी खुल के
निकाल सको अपनी भड़ास
अपने किसी भड़ासी मंच पर
बिना रोये, बिना बताये
साफ साफ,सहज, सरल, तरीके से
कि कहती कि हां, मैं....
तुम कुत्तों में से
किसी एक के साथ भी
रहने के कायल नहीं
क्योंकि तुम हो जो
लड़ते समझते हो
ना जाने किन मुद्दे
विषयों, हरामजदगियों
सूअरपनों, कुत्तेपनों को
और हम लोग हैं
जो हमेशा कहते
बोलते आते हैं कि
हम लोग जो हैं
सो हैं, समझो
पर.....
पता नहीं तुम लोग
और हम लोग में
इतना गैप है कि
अगर कभी पाटने की कोशिश करो
तो खुद मैं चिल्ला उठूंगा
क्या कर रही हो तुम सब
चुप, बंद, बस करो....

शायद....
इस गैप को पाटने
न पाटने के बीच
के बीच की जन्मी है ये खाई
क्योंकि तुम छायावादी लोग हो
और जो होती हो क्रांतिकारी तो
तुम औरत होने के काबिल
नहीं कही जाती

बावजूद इसके कहना चाहूंगा
कि बनाओ सब औरतें
एक कामन ब्लाग
अनाम नाम से
और गाओ
अपनी मस्त धुन
बिना मस्त कमेंट पाने
और चाहने की इच्छा के बगैर
ताकि ढेर सानी अनाम लड़कियां
जी सकें कई जनरेशन से आगे
ये मानते हुए
कि वे हो गई हैं
बराबर इन कुत्तों के
जिनके अगल बगल उन्हें
उठना बैठना जीना खाना पड़ता है
.......
.......
........
......


((शायद मैं अपनी बात कह नहीं पा रहा हूं, माफ करें औरतें, और गरियायें मर्द....सालों कि परवाह न करना....जय भड़ास.....यशवंत))