Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

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13.1.09

कंटेट कोड : तलवार से मक्खी उड़ाने की तैयारी

शाज़ी जमां

अपनी ज़रूरत और सुविधा के मुताबिक फतवा खरीदा जा सकता है! संसद में सवाल पूछने और काम करवाने के लिए सांसद दोनों हाथों नोट बटोर सकते हैं! किसी बेगुनाह को मारने के लिए पुलिस वाले सुपारी ले सकते हैं और उस बेरहम कत्ल को बड़ी सहजता से एनकाउंटर का नाम दे सकते हैं! मेटरनिटी होम के डॉक्टर बच्चों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं! अनाथालयों में पल रहे मासूमों को खरीदकर गुनाह के रास्ते पर धकेला जा सकता है! इतना ही नहीं एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष कैमरे पर दिन-दहाड़े रिश्वत लेते हुए नज़र भी आ सकते हैं। आपको इन तस्वीरों की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। पिछले कई बरसों में टीवी चैनलों पर ये तस्वीरें आपने अनगिनत बार देखी होंगी। इन ख़बरों ने देश को हिलाया था और सच परदा हटाया था। टीवी पत्रकार होने के नाते हमें इन ख़बरों पर नाज हैं। लेकिन ये ख़बरे हमारे जेहन में अचानक इसलिए बार-बार कौंध रही हैं क्योंकि न्यूज़ चैनलों के ख़िलाफ सत्ता के गलियारे में एक ख़तरनाक खेल चल रहा है।

मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद टीवी चैनलों को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश के तहत बकायदा एक अभियान चलाया रहा है। सरकारी हलकों से कंटेंट कोड की खुसफुसाहट लगातार सुनाई दे रही है। वही कोड जिसका मकसद पत्रकारिता की धार को पूरी तरह कुंद करना है और न्यूज़ चैनलों पर नकेल डालकर उन्हे पालतू बनाना है। कंटेंट कोड एक बेहद ख़तरनाक साजिश है और आंख मूंदकर इसका समर्थन करने से पहले ये समझ लेना चाहिए कि मीडिया और पूरे देश पर इसका असर क्या होगा।

निरंकुश सत्ता हमेशा ख़तरनाक होती है। निरंकुशता चाहे सरकार की हो, न्यायपालिका या फिर मीडिया की, वो अच्छी नहीं है। इतना हम भी समझते हैं कि किसी भी सभ्य समाज में मीडिया के लिए भी कोई ना कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल है-- ये लक्ष्मण रेखा कौन खीचेगा? हम बचपन से पढ़ते आये हैं कि लोकहित में सरकार के हर कदम पर नज़र रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की ये एक बुनियादी शर्त है। लेकिन कंटेट कोड के ज़रिये उल्टी गंगा बहाने की तैयारी है। यानी मीडिया सरकार पर नहीं बल्कि सरकार मीडिया पर नज़र रखेगी। जब सरकार ये तय करने लगेगी कि पब्लिक इंट्रेस्ट क्या है, तो फिर तमाम चैनल दूरदर्शन जैसे बन जाएंगे। क्या पब्लिक कभी ये चाहेगी कि इस देश के सारे चैनल दूरदर्शन मार्का हो जायें।

मैं दूरदर्शन जैसे सरकारी प्रसारण तंत्र के ख़िलाफ इसलिए नहीं हूं कि वो नीरस और उबाउ है, बल्कि असल में दूरदर्शन जनता के प्रति बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं है, जैसा कि इसे बताया जाता है। मैं टीवी पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों की सरकारी अधिकारियों से मुलाकात का एक दिलचस्प वाकया पेश करना चाहूंगा। इस मुलाकात में कुछ अधिकारियों ने ये शंका जाहिर की कि अपने काम करने के अंदाज़ से न्यूज़ चैनल दंगा करवा सकते हैं। इस पर मेरे एक पत्रकार मित्र ने जवाब दिया है-- ये क्षमता सिर्फ एक ही चैनल में है और वो है- दूरदर्शन। अपनी इस क्षमता का नमूना दूरदर्शन ने 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के कवरेज़ में पेश कर दी थी, जब भयंकर सिख विरोधी दंगे भड़के थे। ज़ाहिर है, जब सत्ता से जुड़े ऐसी समझ वाले लोग हमारी निगरानी करेंगे तो फिर उनपर नज़र कौन रखेगा। हमें अपनी कमजोरियों का पता है। इसलिए न्यूज़ चैनलों ने सेल्फ रेगुलेशन की व्यवस्था बनाई है।

कंधार विमान अपहरण कांड जैसे ही खत्म हुआ सरकार ने मीडिया को संयम बरतने के लिए धन्यवाद दिया। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उससे हमारे प्रति सरकार का नज़रिया बदल गया। क्या इसकी वजह ये थी कि न्यूज़ चैनल जनता के आक्रोश को सामने लाने का मंच बन गये? मुझे इसमें शक है। सच तो ये है कि पब्लिक के गुस्से की कहानी जब मीडिया के ज़रिये सामने आई और ये साफ हो गया कि पूरा तंत्र अपने नागरिकों की हिफाजत में नाकाम है, तो सरकार बुरी तरह हिल गई। जब हुक्मरान और सियासतदां हिले तो ऐसे-ऐसे बचकाने बयान सामने आये जो पहले कभी नहीं सुने गये। बतौर बानगी.. 'ये लिपिस्टिक लाली लगाकर हमारी बहने प्रदर्शन करती हैं'-- इस तरह के बयान सत्ता और राजनीतिक तंत्र की नाकामी के अभूतपूर्व नमूने थे।

24 घंटे चलने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों ने इन बयानों पर नेताओं की बखिया उधेड़कर रख दी। 26 नवंबर के आतंकवादी हमले के बाद सरकार ने चैनलों को सुझाव दिया कि वो इसके असर को दबा दें। क्या ये जनता के सच जानने, देखने और समझने के अधिकार का हनन था? हमने भी ये महसूस किया कि मुंबई वारदात की कवरेज़ से जुड़ी तस्वीरे दिखाने से पहले उन्हे आम आदमी की संवेदनशीलता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। लेकिन क्या ये सरकार तय करेगी कि आम आदमी की संवेदनशीलता कैसी और कितनी होनी चाहिए? क्या हम सुरक्षा में हुई ऐतिहासिक चूक की वो तस्वीर हमेशा के लिए मिटा दें जो एक अरब लोगों के दिलो-दिमाग़ में कैद हो चुकी हैं। या फिर हम ये तय करे कि 26-11 को हम कभी नहीं भूलेंगे और ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने देंगे।

अगर सरकार ने न्यूज़ चैनलों पर कंटेट कोड लागू कर दिया तो आप वो तस्वीरे और ख़बरें नहीं देख पाएंगे जिनका जिक्र मैंने अपने लेख की शुरुआत में किया था। समझा जा सकता है कि कंटेट कोड के क्या नतीजे होंगे और इससे क्या हासिल होगा।

(लेखक शाज़ी जमां स्टार न्यूज के संपादक हैं)

सरकारी बाबू चैनल के लिए फुटेज पास करेंगे और ये तय करेंगे कि क्या दिखाइए, क्या मत दिखाइए !

सभी न्यूज चैनलों का माई बाप सरकार ही है। आपको यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन केंद्र सरकार तो यही चाहती है और इसकी बाकायदा साजिश रच चुकी है। मीडिया पर सेंसर लगाकर सरकार उसे अपना पालतू बनाना चाहती है। अपने इशारे पर नचाना चाहती है। केंद्र सरकार ऐसा कानून बनाने की साजिश रच रही है, जिसमें जनता की आवाज बंद हो जाएगी। नाइंसाफी के खिलाफ जनता आंदोलन करेगी, लेकिन टीवी चैनल उसे दिखा नहीं पाएंगे। सरकारी बाबू चैनल के लिए फुटेज पास करेंगे और ये तय करेंगे कि क्या दिखाइए क्या मत दिखाइए। इमरजेंसी के वक्त भी प्रेस की आजादी पर हमला हुआ था, लेकिन वो सिर्फ कलम पर पहरा था, लेकिन मनमोहन सरकार तो आम जनता की आंखों में पट्टी बांधकर उसे अंधा करने की साजिश रच रही है। इमरजेंसी के नाम पर पत्रकारिता की आत्मा को रौंदने की ये सरकारी कोशिश परवान न चढ़ पाए, इसकी जंग शुरू हो चुकी है। इससे पहले सरकार इस तालीबानी फरमान को कानूनी जामा पहना सके, उसकी कलई खुल गई है। देश के सभी पत्रकार सरकार की इस साजिश के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। टीवी चैनलों के मुखिया भी इस मुद्दे पर मुखर हो गए हैं। पेश है कुछ संपादकों की राय--

मीडिया का गला घोटने की कोशिश : अजीत अंजुम
सरकार का इरादा टीवी चैनलों को रेगुलेट करना नहीं उन्हें अपने काबू में करना है ताकि कभी को ऐसी खबर जिससे सरकार की सेहत पर असर पड़े, चैनलों पर न चल पाए। अगर टीवी न्यूज चैनलों से मुंबई हमलों के दौरान कोई चूक हुई तो उसे सुधारने के लिए और भविष्य में ऐसी चूक न हो इसके लिए एनबीए ने अपनी गाइडलाइन जारी कर दी है। सभी न्यूज चैनलों के संपादकों के साथ बातचीत करने के बाद एनबीए आथारिटी के चेयरमैन जस्टिस जेएस वर्मा ने सेल्फ रेगुलेशन का ये गाइडलाइन लागू कर दिया है। फिर भी सरकार चैनलों सेंसरशिप की तैयारी कर रही है। ये मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है। इसे नहीं मंजूर किया जाना चाहिए और जिस हद तक मुमकिन हो इसका विरोध किया जाना चाहिए, वरना वो दिन दूर नहीं जब कोई सरकारी बाबू और अफसर नेशनल इंट्रेस्ट के नाम पर किसी भी न्यूज चैनल की नकेल कसने में जुट जाएगा। फिर कभी भी गुजरात दंगों के दौरान जैसी रिपोर्टिंग आप सबने टीवी चैनलों पर देखी है, नहीं देख पाएंगे। कभी भी सरकार या सरकारी तंत्र की नाकामी के खिलाफ जनता अगर सड़क पर उतरी और उसकी खबर को तवज्जो दी गयी तो उसे नेशनल इंट्रेस्ट के खिलाफ मानकर चैनल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर दी जाएगी। हर सूबे और हर जिले का अफसर अपने -अपने ढंग से नेशनल इंट्रेस्ट को परिभाषित करेगा और अपने ढंग से इस्तेमाल करके मीडिया का गला घोंटेगा। ( अजीत अंजुम न्यूज़ 24 के सम्पादकीय प्रमुख हैं)


जागो, नहीं तो देर हो जाएगीः मिलिंद खांडेकर
सेंसर का नाम आपने बहुत दिनों से नही सुना , लेकिन इस सरकार के इरादे ठीक नही लगते अभी सिर्फ़ टीवी को रेगुलेट करने के नाम पर कानून बनाने की बात हो रही हैं। कानून का मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ मुंबई जैसे हमले ही नही बल्कि गुजरात जैसे दंगो का कवरेज भी वैसे ही होगा जैसे सरकार चाहेगी। न तो हम अमरनाथ का आन्दोलन टीवी पर देख पाएंगे न ही पुलिस के जुल्म की तस्वीरें क्योंकि नेशनल इंटरेस्ट के नाम पर कुछ भी रोका जा सकता हैं । नेशनल इंटरेस्ट वो सरकार तय करेगी जो मुंबई में हमला नही रोक सकी।बात अगर टीवी से शुरू हुई हैं तो प्रिंट और इन्टरनेट तक भी जायेगी। अभी नही जागे तो बहुत देर हो जायेगी। (मिलिंद खांडेकर स्टार न्यूज के डिप्टी मैनिजिंग एडिटर हैं)

प्रेस की आजादी पर हमला-सतीश के सिंह
आजाद भारत के इतिहास में प्रेस की आजादी पर इससे बड़ा अंकुश लगाने की, इससे बड़ी कोशिश कभी नहीं हुई। सरकार न सिर्फ टीवी बल्कि प्रिंट और वेब मीडिया पर भी अपना अंकुश लगाना चाहती है। सरकार की ये कोशिश किसी मीडिया सेंसरशिप से कम नहीं है। प्रेस के लिए बाकायदा कानून हैं। अगर कोई विवाद की स्थिति होती है तो संस्था और पत्रकारों पर मुकदमे चलते ही हैं, लेकिन सरकार अब जो करने की कोशिश कर रही है वो प्रेस की आजादी पर हमला है, फंडामेंटल राइट्स के खिलाफ है। (सतीश के सिंह जी न्यूज के एडिटर हैं)


सरकार इतनी जल्दी में क्यों हैः आशुतोष
इस रेगुलेशन से सरकारी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं..। क्योंकि टीवी चैनल पर कुछ दिनों पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक इमरजेंसी गाइड लाइन बनाई गई थी। सारे चैनलों ने इसे लागू करने की बात भी कही थी, लेकिन सरकार ने इस इमरजेंसी गाइडलाइन को ही सिरे से नकार दिया, जबकि सरकार को इस गाइडलाइन के तहत चैनलों को काम करने देना चाहिए, जो उसने नहीं किया। सवाल ये है कि सरकार इतनी जल्दी में क्यों है? वो सेल्फ रेग्यूलेशन के खिलाफ क्यों है? ये एक बड़ा सवाल है। (आशुतोष आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर हैं)

चौथे खंभे को धराशायी करने की साजिशः सुप्रिय प्रसाद
लोकतंत्र के सबसे चौथे खंभे को उखाड़ने की कोशिशें सिर उठा रही हैं। इस खंभे को कमजोर करने की कोशिश कोई दुश्मन नहीं कर रहा है। मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप थोपकर केंद्र सरकार उसे नख दंतविहीन बना देना चाहती है। अपने हक की लड़ाई लड़ रही जनता पर अगर सरकारी दमन हुआ और उसके फुटेज आपके पास हैं तो उसे आप दिखा नहीं पाएंगे। मुंबई पर हुए हमलों की कवरेज का बहाना बनाकर सरकार अपना छिपा एजेंडा लागू करना चाहती है। वो न्यूज चैनलों को अपना गुलाम बनाना चाहती है। अगर सरकार अपनी मंशा में कामयाब हो गई तो कोई दावा नहीं कर पाएगा कि सच दिखाते हैं हम। क्योंकि सच वही होगा, जो सरकार कहेगी। आपके फुटेज धरे के धरे रह जाएंगे। दंगा हो या आतंकवादी हमला। इमरजेंसी की हालत में सरकारी मशीनरी ज्यादातर मूक दर्शक बनी रहती है। सरकार चाहती है कि मीडिया भी उसी तरह मूक दर्शक बनी रहे। हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखती रहे। ये वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नहीं है। मीडिया पर सेंसरशिप लगाने की इस साजिश को नाकाम करने का वक्त है। (सुप्रिय प्रसाद न्यूज 24 चैनल के न्यूज डायरेक्टर हैं।)


पाक मीडिया हमसे ज्यादा आजादः विनोद कापड़ी
सबसे ब़ड़ा सवाल ये है कि सरकार पर नजर रखने के लिए मीडिया बनी है या मीडिया पर नजर रखने के लिए सरकार बनी है। मीडिया का काम ही यही है कि वो सरकार पर नजर रखे, जनता की बात जनता तक पहुंचाए, सरकार को बताए कि वो ये गलत कर रही है। लेकिन यहां तो स्थिति बिल्कुल उलटी हो चुकी है। सरकार मीडिया को बता रही है कि ये गलत है और ये सही है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। आप पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की हालत देखिए। कितनी अराजकता है, लोकतंत्र नाम की चीज नहीं है, लेकिन वहां का मीडिया हमसे ज्यादा आजाद है। हमारी सरकार को क्या ये नहीं दिखाई देता। मीडिया पर सेंसरशिप का सरकारी ख्याल कतई लोकतांत्रिक नहीं है। ये प्रेस की आजादी पर हमला है। (विनोद कापड़ी इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर हैं)

प्रस्तावित काले कानून के खिलाफ प्रधानमंत्री से मिलेंगे संपादक

मीडिया पर सेंसरशिप थोपने के लिए प्रस्तावित काले कानून के खिलाफ मीडिया के दिग्गज एकजुट हो गए हैं। सभी न्यूज चैनलों के हेड और संपादकीय प्रमुख अपना विरोध दर्ज कराने के लिए जल्द ही प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिलने वाले हैं। पता चला है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के सभी दिग्गज संपादकों के हस्ताक्षरों वाला एक आवेदन प्रधानमंत्री को भेजा जाएगा और उनसे मिलने का वक्त मांगा जाएगा। हस्ताक्षर का अभियान शुरू हो चुका है और लगभग दर्जन भर संपादकों के दस्तखत हो गए हैं। दस्तखत करने वालों में आईबीएन7 के राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, एनडीटीवी की बरखा दत्त, पंकज पचौरी, स्टार न्यूज के शाजी जमां, मिलिंद खांडेकर, न्यूज 24 के अजीत अंजुम, सुप्रिय प्रसाद, इंडिया टीवी के विनोद कापड़ी एवं ईटीवी के एनके सिंह शामिल हैं। एक और हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत सभी न्यूज चैनलों के मीडियाकर्मियों से दस्तखत कराया जा रहा है। हजारों हस्ताक्षरों से युक्त यह विरोध पत्र भी सरकार को सौंपा जाएगा।

मीडिया को अपने अधीन करने की सरकारी कोशिशों को बेपर्दा करने के लिए एक नया ब्लाग भी बना दिया गया है। http://www.returnofcensor.blogspot.com/ नाम के इस ब्लाग के माध्यम से पत्रकारों को एकजुट करने की मुहिम शुरू की जा चुकी है। इस ब्लाग पर कई पत्रकारों ने अपने विचार रखे हैं।

इधर, सरकार द्वारा लाए जाने वाले काले कानून पर मीडिया की रणनीति के बारे में न्यूज 24 के मैनेजिंग एडीटर अजीत अंजुम ने कहा कि हम सभी इस प्रस्तावित कानून का विरोध करते हैं और जरूरत पड़ने पर सड़क पर उतरने से भी नहीं हिचकेंगे। सरकार पहले से ही मीडिया पर शिकंजा कसना चाहती थी और मुंबई हमला का प्रकरण उसे एक बहाने के रूप में मिल गया है। आज वह इलेक्ट्रानिक मीडिया को घेर रही है तो कल सरकार का निशाना प्रिंट मीडिया और ब्लाग की दुनिया भी हो सकती है। लोकतंत्र के चौथे खंभे मीडिया की स्वतंत्रता छीनने की कोशिश खतरनाक है। अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया से चूक हुई है तो उसके लिए एनबीए ने गाइडलाइन जारी कर दिया है। ऐसे में फिर सरकार सेंसरशिप क्यों लाना चाहती है? मुंबई हमले के कवरेज के दौरान जो भी हुआ उसके लिए सरकारी चूक भी जिम्मेवार था। इलेक्ट्रानिक मीडिया को ठीक से ब्रीफ नहीं किया गया। सरकार ने जब अगले दिन लाइव दिखाने को मना किया तो हमने माना भी। जो नया कानून सरकार ला रही है, उसके लागू होने के बाद सरकार जिस घटना को चाहेगी ‘नेशनल इंटरेस्ट में नहीं है’ कहते हुए इसके प्रसारण को रुकवा देगी। इससे देश की आम जनता की आवाज दबी की दबी रह जाएगी।

8.5.08

थू थू भेंट करने पर अरुण अरोरा बोले--आप ही रखो जी, हम घटिया चीजें नहीं स्वीकारते

भड़ासी गांधीगिरी उर्फ थू थू अभियान रंग लाने लगा है। आज जीमेल खोला तो देखा कि वहां ब्लागवाणी के पीआरओ अरुण अरोरा जी आनलाइन हैं। मैंने देर न करते हुए उन्हें झट से चैट के रास्ते थू भेज दिया। वो जाने उनके शरीर के किस हिस्से पर पड़ा, वो तिलमिलाये और मुझे भी थोड़ी लानत मलानत सभ्य शब्दों में भेज दी। भई, हम भड़ासी तो ठहरे असभ्य और गंवार लोग। आपने (ब्लागवाणी वालों ने) भड़ास और विस्फोट ब्लाग के साथ जो कुछ किया है, उसका बदला तो लेना ही है, और ये बदला निजी तौर पर नहीं बल्कि गांधीगिरी के जरिए सामूहिक आंदोलन से लिया जा रहा है। अरुण जी ने लास्ट में लिखा कि आखिरी नमस्कार। मेरा कहना है कि अरुण भाई, आपकी तरफ से आखिरी नमस्कार हो सकता है, हम लोग तो आपको जहां देखेंगे, सर कहेंगे और थूकेंगे। ताकि आप लोगों को याद आए कि आप लोगों ने क्या कुछ किया है।

अगर अब भी जमीर हो तो विस्फोट ब्लाग के संजय तिवारी और भड़ास ब्लाग के डा. रूपेश से माफी मांग लो, लिखित या मौखिक, दोनों आप्शन खुले हैं, वरना हम भड़ासी ता-उम्र थू थू अभियान चलाते रहेंगे, जहां मिलोगे वहां थू थू करते रहेंगे।

जय भड़ास
यशवंत

पेश है वो चैट जिसमें भड़ास की तरफ से मैंने ब्लागवाणी के अरुण अरोरा को थू थू भेंट किया...
aroonarora@gmail.com
yashwantdelhi@gmail.com

date 8 May 2008 04:40
subject Chat with Arun Arora
mailed-by gmail.com

04:40 me: sir, thoo.....
maithili ko bhi thoo
Arun: आप ही रखो जी, हम घटिया चीजें नहीं स्वीकारते
ना ही, घटिया बातों में पड़ते हैं जी
आखिरी नमस्कार

29.2.08

सभी भड़ासियों को गोली मार दो

सभी भड़ासियों को गोली मार दो
बहुत हो गया। नाक के ऊपर से पानी बहने लगा है। अब बस। अभी नही तो कभी नही। सभी भड़ासियों के ब्लाग को प्रतिबंधित कर दो। न रहेगी बांस न बजेगी बांसुरी। और हाँ, हो सके तो उनके मां-बहन को गलियां दो। मन न भरे तो जहाँ मिले भड़ासियों को गोली मार दो।
इसके लिए यशवंत जी को सभी भड़ासियों के नाम सार्वजनिक करने चाहिए। दो लोगों के लड़ाई में पूरा जमात शामिल है। समस्या का समाधान मत खोजो। सभी हनुमान के वंशज हैं। बूटी तो ला नही सकते पहाड़ ही उठा लायेंगे। ये बही लोग हैं, जो बातचीत से समस्या का समाधान नही करेंगे बल्कि गाँव से अपने भाइयों को खदेड़ कर ही मानेंगे।
मन की पिछले कुछ दिनों से मनीषा जी को लेकर जो लिखा गया, उसमे ग़लत था। इस का मतलब यह नही की मैं भड़ास या मनीषा जी का वकालत कर रहा हौं। मुझे इस मामले से कोई लेना देना नही है। लेकिन जब विभीषण घर में पैदा हो को रावन को मरने से कौन बचा सकता है। यही बात भड़ास को लेकर है।
बताते चलूं मोहल्ला हो, टूटी- बिखरी हो या भड़ास सभी को मोडरेट करने वाले एक अच्छे दोस्त हैं, बेवकूफ बन रही है तो मनीषा और पूरी ब्लागर दुनिया।

भड़ास पर मैंने खुद ही एडल्ट कंटेंट की पाबंदी लगाई थी, लीजिए अब हटा रहा हूं....

हुवां हुवां हुवां हुवां.....जिधर देखो, उधर हुवां हुवां हो रहा है, भड़ास को लेकर। दरअसल भड़ास चीज ही ऐसी है कि शीशे के घरों में रहने वालों को यह कतई नहीं पच सकता, बर्दाश्त हो सकता। दुख तो इस बात का है कि पहले के स्वतंत्रा सेनानी अब आज के नए तानाशाह बन बैठे हैं और वो सारी हरकतें कर रहे हैं जिसे कोई भी प्रगतिशील, समझदार और जमीन से जुड़ा साथी नहीं कर सकता। अच्छा है, रहिमन दुख हो भला जो थोड़े दिन होए....। कम से कम शिनाख्त तो हुई कि इन नकाब ओढ़े चेहरों के पीछे का सच क्या है। भड़ास ने इनके नकाब को एक झटके में उतार फेंका है।

कई ब्लागर इसी की खबर दे रहे हैं कि भड़ास पर पाबंदी लगा दी गई है। अरे भइया, सुबह सुबह आनलाइन होते ही तमाशा देखकर पहला काम यही किया मैंने एडल्ट कंटेंट वाला टैग लगा दिया, सेटिंग में जाकर ताकि तुम मूर्खों को यह लग सके तुम्हारी मूर्खता सफल हुई। अब जबकि तुम सभी को भरोसा हो चुका है कि भड़ास पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, तो लो, मैं इस प्रतिबंध को खुद हटा देता हूं। अब तुम भड़ास खोलोगे तो देखोगे कि कोई वार्निंग नहीं दिखेगी, सीधे भड़ास खुलेगा और तुम्हारे चेहरे पर एक झापड़ लगेगा.....चटाक से, भड़ास के इतने सरल व सहज तरीके से खुलने को लेकर।

कल हमारा क्या होगा, तुम्हारा क्या होगा, ये तो किसी को नहीं पता पर आज की जंग तो हम भड़ासियों ने जीत ली है। तुम लोगों की खुशफहमी पर पानी फेरकर कि भड़ास प्रतिबंधित हो गया।

लगे रहो भाइयों...भड़ास पर पाबंदी लगवाने में, हम भी लगे हैं तुम्हें नंगा कराने में.....
जय भड़ास
यशवंत

भड़ास विरोधी मोर्चाः ये तो होना ही था.....ये तो होता ही है...ये तो होकर ही रहेगा...!!!

आखिर वो घड़ी आ ही गई जब भड़ास के खिलाफ सारे शीर्षस्थ ब्लागरों ने मोर्चा खोल दिया। अपने अविनाश जी मोहल्ले वाले, इरफान जी टूटी हुई बिखरी हुई वाले और प्रमोद सिंह अजदक वाले ने अपने-अपने ब्लागों पर भड़ास को तुरंत प्रतिबंधित करने के लिए आह्वान कर दिया है। मतलब, एक साथ, एक बार मिलकर हमला किया है भाइयों ने। चलो, अच्छा किया। मेरा जो कैलकुलेशन था उसके हिसाब से अभी इस काम में वक्त लगना था लेकिन अच्छा हुआ, इनके मन की भड़ास एक साथ और अतिशीघ्र निकल गई।

तीनों पोस्टों को पढ़ने के बाद मुझे क्या महसूस हुआ? सच्ची बताऊं....केवल एक लाइन में....वो ये कि....ये तो होना ही था, ये तो होता ही है, ये तो होकर ही रहेगा...

इसलिए क्योंकि इतिहास और सदियां गवाह हैं, जो भी बने बनाये रस्ते से अलग हटकर चला, उसे ढेर सारे फर्जी आरोपों में कैद कर तुरत फुरत सूली पर चढ़ा दिया जाता है ताकि वो क्रांति की मसाल जो जलनी शुरू हुई है लावा बनने से पहले ही दफन हो जाये।

और उपरोक्त तीनों साथियों अविनाश जी, इरफान जी, प्रमोद जी के आरोप क्या हैं....जो मैं लब्बोलुवाब के तौर पर लिख रहा हूं और जो इन्होंने अपनी अपनी पोस्टों में लगाये हैं....


1- मनीषा हिज हाइनेस नामक जो भड़ासी हैं वो फर्जी हैं और उनके जरिये मनीषा पांडेय को प्रताड़ित किया जा रहा है

2- भड़ास पर गालियों और अश्लीलता की भरमार है, इसलिए इसे तुरत फुरत प्रतिबंधित किया जाए, खासकर मनीष राज ने जो कुछ पीस लिखे हैं, उसका खास उल्लेख किया गया है

और भी कुछ आरोप होंगे, पर मुझे ये ही दो प्रमुख दिखे....

मेरा इस बारे में कहना है....


1- मनीषा हिज हाइनेस नामक भड़ासी वाकई एक मनीषा हिजड़ा हैं जो मुंबई में हैं और डा. रूपेश श्रीवास्तव उनसे जुड़े हैं, उन्हें ब्लागिंग सिखा रहे हैं। मनीषा नामक जिस हिजड़ा साथी को लेकर मनीषा पांडेय को यह भय है कि उन्हें परेशान करने के लिए यह चरित्र गढ़ा गया है तो मैं सभी ब्लागरों (खासकर मुंबई वालों) से अनुरोध करता हूं कि वो मुंबई में डा. रूपेश से संपर्क कर मनीषा हिजड़ा से मुलाकात कर लें और उनकी ठीक तरह से जांच कर पता कर लें कि मनीषा हिजड़ा नामक जो साथी भड़ासी है और जिसने अभी हिजड़ों का एक ब्लाग डा. रूपेश की मदद से शुरू किया है, वो वाकई में है या नहीं है।

मतलब, मनीषा हिजड़ा की शख्सीयत है, इनका उल्लेख डा. रूपेश श्रीवास्तव अपने पोस्टों में पहले से करते रहे हैं जिस समय मनीषा पांडेय से कोई वैचारिक बहस या मतभेद भी न हुआ था।

2- रही बात गालियों की, तो अगर इस आधार पर भड़ास को अश्लील माना जा रहा है और इसे प्रतिबंधित करने की बात कही जा रही है तो आप शौक से प्रतिबंध लगवा लीजिए। आपही की तरह लोगों ने डा. सुभाष भदौरिया का एक ब्लाग प्रतिबंधित करा दिया था पर उससे डा. सुभाष भदौरिया ब्लागिंग से तो नहीं चले गए। वे आज भी हैं। आप भड़ास को प्रतिबंधित कराओगे तो भड़ास दूसरे नाम से बेहद लोकप्रिय होकर आ जाएगा।

तो मैंने दो बातें कहीं, एक तो मनीषा हिजड़ा की आईडेंटिटी को लेकर जो बवाल मचा हुआ है, उसकी निष्पक्ष जांच करा ली जाए और दूसरी बात गालियों के चलते भड़ास पर प्रतिबंध लगवाना चाहते हैं तो शौक से लगवा लीजिए।

आप लोगों के कदमों से हम लोगों का तो जो कुछ बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा, लेकिन आप लोगों की असली सूरत दुनिया के सामने आ रही है, और आएगी.....इस बात की पूरी व्यवस्था आप लोगों ने खुद ही कर ली है।

चूंकि आप लोगों के प्रति मेरे मन में आज भी सम्मान है, इसलिए मैं अपना धैर्य नहीं खोउंगा, पूरी विनम्रता से आप लोगों से लड़ूंगा.......


भड़ासियों से अनुरोध है कि वे भी इस मामले में संयम से काम लें। किसी के प्रति अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल न करें। अविनश जी, इराफन जी, प्रमोद जी...ये सभी लोग किसी न किसी रूप में मेरे प्रिय रहे हैं, हैं और रहेंगे। इसलिए इनके प्रति मेरे मन में जो श्रद्धा और आदर है, वो है तो आगे भी रहेगी, ऐसे छोटे मोटे विषयों से इन रिश्तों व संबंधों के खत्म होने का कोई मतलब नहीं होता। ब्लागिंग जीवन का एक पार्ट है, पूरी ज़िंदगी नहीं है। इसलिए आप सभी भड़ासी भाई, अपनी भड़ास निकालते रहें.....फागुन गाते रहें, बाते बतातें रहें.....भड़ास बंद करा दिया जाएगा तो क्या हुआ, फिर एक नया ब्लाग बना लिया जाएगा....और मुझे पता है कि मैं एक आवाज दूंगा तो आप सभी फिर वहां दौड़े दौड़े चले आओगे....

मैं थोड़ा इमोशनलिया रहा हूं, जैसे अर्जुन कौरवों से लड़ने से पहले हुए थे, लेकिन उन्हें तो कृष्ण ने समझाबुझाकर लड़वा दिया था, पर मैं नहीं चाहता कि मैं किसी हालत में अपने दिल के करीब भाइयों से लड़ूं। कोई कृष्ण समझावें तो भी नहीं। इसलिए आप सभी वरिष्ठ कनिष्ठ भड़ासियों सो अनुरोध करता हूं कि इस मामले में पूरी तरह संयम और धैर्य का परिचय दें। ये दिन भी कट जाएगा, हजार मुश्किलों से पहले ही गुजर चुके हैं।

जय भड़ास
यशवंत