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15.2.09

कनिष्का जी, आपके दुबारा जुड़ने का इंतजार रहेगा, फिलहाल तो राम-राम

अरुंधति राय को जूता मारने की वकालत करने वाले और खुद को युवा का मीडिया प्रभारी बताने वाले कनिष्का की भड़ास से सदस्यता समाप्त करने की घोषणा की जाती है। भड़ास अरुंधति, तस्लीमा और मेधा जैसी नारियों का दिल से सम्मान करता है और उनकी लेखनी, वाणी व विचार से सहमति - असहमति के बावजूद उन्हें उम्दा कोटि का संत मानता है। ये नारियां लाखों नारियों को बेहतर जीवन स्थितियों की ओर ले जाने को प्रेरित करती हैं। ये नारियां निजी सुख-सुविधाओं को छोड़कर दर-दर की ठोकरें इसलिए खाती हैं क्योंकि इनके दिल-दिमाग में देश और देश के जन का हित है। मर्दों से ज्यादा काबिल इन महिलाओं पर सभ्यता-संस्कार बचाने के नाम पर जूता मारने जैसी तालिबानी हरकत करने वाले किसी भी संगठन के लिए भड़ास को प्रचार का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

भड़ास प्रेम और ऊर्जा का हिमायती है, नफरत और विरोध का कतई नहीं। विचार का जवाब विचार हो सकता है, जूता या गाली नहीं। जूता वे फेंकते हैं जो दिमाग से काहिल होते हैं, गाली वे देते हैं जो दिल से जाहिल होते हैं। जूता और गाली के जरिए सस्ती लोकप्रियता तो पाई जा सकती है लेकिन बहुत बड़ी जन गोलबंदी नहीं की जा सकती। वरना जूता-गाली से ज्यादा प्रभावशाली गोली-बम के जरिए दुनिया को जाने कब का हथियारों के सौदागरों द्वारा हड़प-गड़प लिया गया होता। दुनिया के बड़े बदलावों और आंदोलनों के लिए जो जन गोलबंदी हुई, उसके पीछे विचार की ताकत रही है। वो चाहे भारत का स्वाधीनता आंदोलन रहा हो या अमेरिकी क्रांति।

प्रेम का जवाब प्रेम हो सकता है, नफरत नहीं। सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए विचार विहीन लोग बाहुबल के आधार पर जो ओछी हरकतें कर रहे हैं, वो इस देश की परंपरा और संस्कृति के ही खिलाफ है। हमारे देश की परंपरा मोनोलिथिक नहीं है। एकरेखीय नहीं है। विविधता ही हमारी परंपरा है। इस विविधता को जो स्वीकार नहीं करता, वही असली देशद्रोही है। एक से एक तुर्रम खां इस देश में आए, हमला किया, राज किया लेकिन आखिर उऩका हश्र क्या हुआ...। आज उनका कोई नामलेवा नहीं है। उनकी पीढ़ियां भारतीयता के रंग में रंगी हुई हैं। उनके धर्म और संप्रदाय हमारे देश की परंपराओं के समुद्र में आकर एकाकार हो गए। भई, प्यार के कोंपल खिलने दो, हर एक को बोलने दो, चिंतन-मनन करने दो....और वक्त निकालकर तुम भी ये सब काम करो। भड़ास का माडरेटर होने के नाते मुझे मजबूरन कनिष्का की भड़ास से सदस्यता समाप्त करने की घोषणा करनी पड़ रही है।

कनिष्का की सदस्यता जिस पोस्ट के चलते खत्म की गई है, वो इस प्रकार है-

मारा था जूता अरुंधति राय को

उपरोक्त पोस्ट से पहले एक पोस्ट कनिष्का ने लिखा था, इस शीर्षक से

और इस बार जूते की शिकार बनीं अरुंधति राय

इस पोस्ट में मूलतः घटनाक्रम का वर्णन है, इसलिए इसे इग्नोर किया। हालांकि इसके नीचे मैंने तुरंत कमेंट कर अरुंधति पर जूता फेंकने की घटना की निंदा की। लेकिन बाद में मारा था जूता अरुंधति राय को पोस्ट के जरिए जूता मारने की घटना को कनिष्का द्वारा कुबूल करना और खुद को 'युवा' का मीडिया प्रभारी बताकर इस घटना से जुड़ाव दर्शाना साबित करता है कि वे भड़ास के फक्कड़, सूफी, औघड़, सहज और देसज मिजाज को समझ नहीं पाये हैं या फिर हम उन्हें समझा नहीं पाये हैं। शायद, गल्ती हम लोगों की है....

जिंदगी भर के शिकवे-गिले थे बहुत
वक्त इतना कहां था कि दोहराते हम
एक हिचकी ने कह डाली सब दास्तां
हमने किस्से को यूं मुख्तसर कर दिया


आपको आपकी बख्तरबंद तोपयुक्त अनुशासनी दुनिया मुबारक, हमें अपनी निहंगई रास आ गई है....।

उम्मीद है कनिष्का दिल पर नहीं लेंगे। सोचेंगे, समझने की कोशिश करेंगे। खुल दिल-दिमाग के साथ जब भी इधर की ओर मुंह करेंगे, उनका स्वागत रहेगा। उनके लिए आखिर में बस इतना ही...

आप तो बेवफा और सितमगर नहीं
आपने किसलिए मुंह उधर कर लिया


यशवंत सिंह

15.1.09

जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मी

काले कानून के खिलाफ जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मियों का हुजूम

मीडियाकर्मी के विरोध प्रदर्शन को शूट करते मीडियाकर्मी
वक्ताओं को तन्मय होकर सुनते मीडियाकर्मी

पत्रकारिता के छात्र राकेश की अगुवाई में अंत तक डटे रहे

भाषण सुनते-सुनते शायद बोर होने लगी हैं !

काले कानून का पुतला फूंकते वक्त नारेबाजी कराते प्रदीप महाजन

...और धूं-धूं कर जल उठा मीडिया विरोधी काला कानून
बच्चू, फंस गया न, अब चल, तू भी थोड़ा बेगार कर ले!

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इससे संबंधित खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें---- जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मियों ने दिखाई एकजुटता

13.1.09

उठ जाग मुसाफिर भोर भया, अब रैन कहां कि तू सोवत है....





(उपरोक्त दोनों विजुअल में से कोई एक कापी करके अगर आप अपने ब्लाग पर लगाते हैं तो मीडिया के खिलाफ प्रस्तावित काले कानून से लड़ रहे मीडियाकर्मियों के प्रति अपने सक्रिय समर्थन का इजाहर करेंगे)

कंटेट कोड : तलवार से मक्खी उड़ाने की तैयारी

शाज़ी जमां

अपनी ज़रूरत और सुविधा के मुताबिक फतवा खरीदा जा सकता है! संसद में सवाल पूछने और काम करवाने के लिए सांसद दोनों हाथों नोट बटोर सकते हैं! किसी बेगुनाह को मारने के लिए पुलिस वाले सुपारी ले सकते हैं और उस बेरहम कत्ल को बड़ी सहजता से एनकाउंटर का नाम दे सकते हैं! मेटरनिटी होम के डॉक्टर बच्चों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं! अनाथालयों में पल रहे मासूमों को खरीदकर गुनाह के रास्ते पर धकेला जा सकता है! इतना ही नहीं एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष कैमरे पर दिन-दहाड़े रिश्वत लेते हुए नज़र भी आ सकते हैं। आपको इन तस्वीरों की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। पिछले कई बरसों में टीवी चैनलों पर ये तस्वीरें आपने अनगिनत बार देखी होंगी। इन ख़बरों ने देश को हिलाया था और सच परदा हटाया था। टीवी पत्रकार होने के नाते हमें इन ख़बरों पर नाज हैं। लेकिन ये ख़बरे हमारे जेहन में अचानक इसलिए बार-बार कौंध रही हैं क्योंकि न्यूज़ चैनलों के ख़िलाफ सत्ता के गलियारे में एक ख़तरनाक खेल चल रहा है।

मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद टीवी चैनलों को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश के तहत बकायदा एक अभियान चलाया रहा है। सरकारी हलकों से कंटेंट कोड की खुसफुसाहट लगातार सुनाई दे रही है। वही कोड जिसका मकसद पत्रकारिता की धार को पूरी तरह कुंद करना है और न्यूज़ चैनलों पर नकेल डालकर उन्हे पालतू बनाना है। कंटेंट कोड एक बेहद ख़तरनाक साजिश है और आंख मूंदकर इसका समर्थन करने से पहले ये समझ लेना चाहिए कि मीडिया और पूरे देश पर इसका असर क्या होगा।

निरंकुश सत्ता हमेशा ख़तरनाक होती है। निरंकुशता चाहे सरकार की हो, न्यायपालिका या फिर मीडिया की, वो अच्छी नहीं है। इतना हम भी समझते हैं कि किसी भी सभ्य समाज में मीडिया के लिए भी कोई ना कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल है-- ये लक्ष्मण रेखा कौन खीचेगा? हम बचपन से पढ़ते आये हैं कि लोकहित में सरकार के हर कदम पर नज़र रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की ये एक बुनियादी शर्त है। लेकिन कंटेट कोड के ज़रिये उल्टी गंगा बहाने की तैयारी है। यानी मीडिया सरकार पर नहीं बल्कि सरकार मीडिया पर नज़र रखेगी। जब सरकार ये तय करने लगेगी कि पब्लिक इंट्रेस्ट क्या है, तो फिर तमाम चैनल दूरदर्शन जैसे बन जाएंगे। क्या पब्लिक कभी ये चाहेगी कि इस देश के सारे चैनल दूरदर्शन मार्का हो जायें।

मैं दूरदर्शन जैसे सरकारी प्रसारण तंत्र के ख़िलाफ इसलिए नहीं हूं कि वो नीरस और उबाउ है, बल्कि असल में दूरदर्शन जनता के प्रति बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं है, जैसा कि इसे बताया जाता है। मैं टीवी पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों की सरकारी अधिकारियों से मुलाकात का एक दिलचस्प वाकया पेश करना चाहूंगा। इस मुलाकात में कुछ अधिकारियों ने ये शंका जाहिर की कि अपने काम करने के अंदाज़ से न्यूज़ चैनल दंगा करवा सकते हैं। इस पर मेरे एक पत्रकार मित्र ने जवाब दिया है-- ये क्षमता सिर्फ एक ही चैनल में है और वो है- दूरदर्शन। अपनी इस क्षमता का नमूना दूरदर्शन ने 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के कवरेज़ में पेश कर दी थी, जब भयंकर सिख विरोधी दंगे भड़के थे। ज़ाहिर है, जब सत्ता से जुड़े ऐसी समझ वाले लोग हमारी निगरानी करेंगे तो फिर उनपर नज़र कौन रखेगा। हमें अपनी कमजोरियों का पता है। इसलिए न्यूज़ चैनलों ने सेल्फ रेगुलेशन की व्यवस्था बनाई है।

कंधार विमान अपहरण कांड जैसे ही खत्म हुआ सरकार ने मीडिया को संयम बरतने के लिए धन्यवाद दिया। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उससे हमारे प्रति सरकार का नज़रिया बदल गया। क्या इसकी वजह ये थी कि न्यूज़ चैनल जनता के आक्रोश को सामने लाने का मंच बन गये? मुझे इसमें शक है। सच तो ये है कि पब्लिक के गुस्से की कहानी जब मीडिया के ज़रिये सामने आई और ये साफ हो गया कि पूरा तंत्र अपने नागरिकों की हिफाजत में नाकाम है, तो सरकार बुरी तरह हिल गई। जब हुक्मरान और सियासतदां हिले तो ऐसे-ऐसे बचकाने बयान सामने आये जो पहले कभी नहीं सुने गये। बतौर बानगी.. 'ये लिपिस्टिक लाली लगाकर हमारी बहने प्रदर्शन करती हैं'-- इस तरह के बयान सत्ता और राजनीतिक तंत्र की नाकामी के अभूतपूर्व नमूने थे।

24 घंटे चलने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों ने इन बयानों पर नेताओं की बखिया उधेड़कर रख दी। 26 नवंबर के आतंकवादी हमले के बाद सरकार ने चैनलों को सुझाव दिया कि वो इसके असर को दबा दें। क्या ये जनता के सच जानने, देखने और समझने के अधिकार का हनन था? हमने भी ये महसूस किया कि मुंबई वारदात की कवरेज़ से जुड़ी तस्वीरे दिखाने से पहले उन्हे आम आदमी की संवेदनशीलता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। लेकिन क्या ये सरकार तय करेगी कि आम आदमी की संवेदनशीलता कैसी और कितनी होनी चाहिए? क्या हम सुरक्षा में हुई ऐतिहासिक चूक की वो तस्वीर हमेशा के लिए मिटा दें जो एक अरब लोगों के दिलो-दिमाग़ में कैद हो चुकी हैं। या फिर हम ये तय करे कि 26-11 को हम कभी नहीं भूलेंगे और ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने देंगे।

अगर सरकार ने न्यूज़ चैनलों पर कंटेट कोड लागू कर दिया तो आप वो तस्वीरे और ख़बरें नहीं देख पाएंगे जिनका जिक्र मैंने अपने लेख की शुरुआत में किया था। समझा जा सकता है कि कंटेट कोड के क्या नतीजे होंगे और इससे क्या हासिल होगा।

(लेखक शाज़ी जमां स्टार न्यूज के संपादक हैं)

सरकारी बाबू चैनल के लिए फुटेज पास करेंगे और ये तय करेंगे कि क्या दिखाइए, क्या मत दिखाइए !

सभी न्यूज चैनलों का माई बाप सरकार ही है। आपको यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन केंद्र सरकार तो यही चाहती है और इसकी बाकायदा साजिश रच चुकी है। मीडिया पर सेंसर लगाकर सरकार उसे अपना पालतू बनाना चाहती है। अपने इशारे पर नचाना चाहती है। केंद्र सरकार ऐसा कानून बनाने की साजिश रच रही है, जिसमें जनता की आवाज बंद हो जाएगी। नाइंसाफी के खिलाफ जनता आंदोलन करेगी, लेकिन टीवी चैनल उसे दिखा नहीं पाएंगे। सरकारी बाबू चैनल के लिए फुटेज पास करेंगे और ये तय करेंगे कि क्या दिखाइए क्या मत दिखाइए। इमरजेंसी के वक्त भी प्रेस की आजादी पर हमला हुआ था, लेकिन वो सिर्फ कलम पर पहरा था, लेकिन मनमोहन सरकार तो आम जनता की आंखों में पट्टी बांधकर उसे अंधा करने की साजिश रच रही है। इमरजेंसी के नाम पर पत्रकारिता की आत्मा को रौंदने की ये सरकारी कोशिश परवान न चढ़ पाए, इसकी जंग शुरू हो चुकी है। इससे पहले सरकार इस तालीबानी फरमान को कानूनी जामा पहना सके, उसकी कलई खुल गई है। देश के सभी पत्रकार सरकार की इस साजिश के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। टीवी चैनलों के मुखिया भी इस मुद्दे पर मुखर हो गए हैं। पेश है कुछ संपादकों की राय--

मीडिया का गला घोटने की कोशिश : अजीत अंजुम
सरकार का इरादा टीवी चैनलों को रेगुलेट करना नहीं उन्हें अपने काबू में करना है ताकि कभी को ऐसी खबर जिससे सरकार की सेहत पर असर पड़े, चैनलों पर न चल पाए। अगर टीवी न्यूज चैनलों से मुंबई हमलों के दौरान कोई चूक हुई तो उसे सुधारने के लिए और भविष्य में ऐसी चूक न हो इसके लिए एनबीए ने अपनी गाइडलाइन जारी कर दी है। सभी न्यूज चैनलों के संपादकों के साथ बातचीत करने के बाद एनबीए आथारिटी के चेयरमैन जस्टिस जेएस वर्मा ने सेल्फ रेगुलेशन का ये गाइडलाइन लागू कर दिया है। फिर भी सरकार चैनलों सेंसरशिप की तैयारी कर रही है। ये मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है। इसे नहीं मंजूर किया जाना चाहिए और जिस हद तक मुमकिन हो इसका विरोध किया जाना चाहिए, वरना वो दिन दूर नहीं जब कोई सरकारी बाबू और अफसर नेशनल इंट्रेस्ट के नाम पर किसी भी न्यूज चैनल की नकेल कसने में जुट जाएगा। फिर कभी भी गुजरात दंगों के दौरान जैसी रिपोर्टिंग आप सबने टीवी चैनलों पर देखी है, नहीं देख पाएंगे। कभी भी सरकार या सरकारी तंत्र की नाकामी के खिलाफ जनता अगर सड़क पर उतरी और उसकी खबर को तवज्जो दी गयी तो उसे नेशनल इंट्रेस्ट के खिलाफ मानकर चैनल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर दी जाएगी। हर सूबे और हर जिले का अफसर अपने -अपने ढंग से नेशनल इंट्रेस्ट को परिभाषित करेगा और अपने ढंग से इस्तेमाल करके मीडिया का गला घोंटेगा। ( अजीत अंजुम न्यूज़ 24 के सम्पादकीय प्रमुख हैं)


जागो, नहीं तो देर हो जाएगीः मिलिंद खांडेकर
सेंसर का नाम आपने बहुत दिनों से नही सुना , लेकिन इस सरकार के इरादे ठीक नही लगते अभी सिर्फ़ टीवी को रेगुलेट करने के नाम पर कानून बनाने की बात हो रही हैं। कानून का मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ मुंबई जैसे हमले ही नही बल्कि गुजरात जैसे दंगो का कवरेज भी वैसे ही होगा जैसे सरकार चाहेगी। न तो हम अमरनाथ का आन्दोलन टीवी पर देख पाएंगे न ही पुलिस के जुल्म की तस्वीरें क्योंकि नेशनल इंटरेस्ट के नाम पर कुछ भी रोका जा सकता हैं । नेशनल इंटरेस्ट वो सरकार तय करेगी जो मुंबई में हमला नही रोक सकी।बात अगर टीवी से शुरू हुई हैं तो प्रिंट और इन्टरनेट तक भी जायेगी। अभी नही जागे तो बहुत देर हो जायेगी। (मिलिंद खांडेकर स्टार न्यूज के डिप्टी मैनिजिंग एडिटर हैं)

प्रेस की आजादी पर हमला-सतीश के सिंह
आजाद भारत के इतिहास में प्रेस की आजादी पर इससे बड़ा अंकुश लगाने की, इससे बड़ी कोशिश कभी नहीं हुई। सरकार न सिर्फ टीवी बल्कि प्रिंट और वेब मीडिया पर भी अपना अंकुश लगाना चाहती है। सरकार की ये कोशिश किसी मीडिया सेंसरशिप से कम नहीं है। प्रेस के लिए बाकायदा कानून हैं। अगर कोई विवाद की स्थिति होती है तो संस्था और पत्रकारों पर मुकदमे चलते ही हैं, लेकिन सरकार अब जो करने की कोशिश कर रही है वो प्रेस की आजादी पर हमला है, फंडामेंटल राइट्स के खिलाफ है। (सतीश के सिंह जी न्यूज के एडिटर हैं)


सरकार इतनी जल्दी में क्यों हैः आशुतोष
इस रेगुलेशन से सरकारी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं..। क्योंकि टीवी चैनल पर कुछ दिनों पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक इमरजेंसी गाइड लाइन बनाई गई थी। सारे चैनलों ने इसे लागू करने की बात भी कही थी, लेकिन सरकार ने इस इमरजेंसी गाइडलाइन को ही सिरे से नकार दिया, जबकि सरकार को इस गाइडलाइन के तहत चैनलों को काम करने देना चाहिए, जो उसने नहीं किया। सवाल ये है कि सरकार इतनी जल्दी में क्यों है? वो सेल्फ रेग्यूलेशन के खिलाफ क्यों है? ये एक बड़ा सवाल है। (आशुतोष आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर हैं)

चौथे खंभे को धराशायी करने की साजिशः सुप्रिय प्रसाद
लोकतंत्र के सबसे चौथे खंभे को उखाड़ने की कोशिशें सिर उठा रही हैं। इस खंभे को कमजोर करने की कोशिश कोई दुश्मन नहीं कर रहा है। मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप थोपकर केंद्र सरकार उसे नख दंतविहीन बना देना चाहती है। अपने हक की लड़ाई लड़ रही जनता पर अगर सरकारी दमन हुआ और उसके फुटेज आपके पास हैं तो उसे आप दिखा नहीं पाएंगे। मुंबई पर हुए हमलों की कवरेज का बहाना बनाकर सरकार अपना छिपा एजेंडा लागू करना चाहती है। वो न्यूज चैनलों को अपना गुलाम बनाना चाहती है। अगर सरकार अपनी मंशा में कामयाब हो गई तो कोई दावा नहीं कर पाएगा कि सच दिखाते हैं हम। क्योंकि सच वही होगा, जो सरकार कहेगी। आपके फुटेज धरे के धरे रह जाएंगे। दंगा हो या आतंकवादी हमला। इमरजेंसी की हालत में सरकारी मशीनरी ज्यादातर मूक दर्शक बनी रहती है। सरकार चाहती है कि मीडिया भी उसी तरह मूक दर्शक बनी रहे। हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखती रहे। ये वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नहीं है। मीडिया पर सेंसरशिप लगाने की इस साजिश को नाकाम करने का वक्त है। (सुप्रिय प्रसाद न्यूज 24 चैनल के न्यूज डायरेक्टर हैं।)


पाक मीडिया हमसे ज्यादा आजादः विनोद कापड़ी
सबसे ब़ड़ा सवाल ये है कि सरकार पर नजर रखने के लिए मीडिया बनी है या मीडिया पर नजर रखने के लिए सरकार बनी है। मीडिया का काम ही यही है कि वो सरकार पर नजर रखे, जनता की बात जनता तक पहुंचाए, सरकार को बताए कि वो ये गलत कर रही है। लेकिन यहां तो स्थिति बिल्कुल उलटी हो चुकी है। सरकार मीडिया को बता रही है कि ये गलत है और ये सही है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। आप पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की हालत देखिए। कितनी अराजकता है, लोकतंत्र नाम की चीज नहीं है, लेकिन वहां का मीडिया हमसे ज्यादा आजाद है। हमारी सरकार को क्या ये नहीं दिखाई देता। मीडिया पर सेंसरशिप का सरकारी ख्याल कतई लोकतांत्रिक नहीं है। ये प्रेस की आजादी पर हमला है। (विनोद कापड़ी इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर हैं)

प्रस्तावित काले कानून के खिलाफ प्रधानमंत्री से मिलेंगे संपादक

मीडिया पर सेंसरशिप थोपने के लिए प्रस्तावित काले कानून के खिलाफ मीडिया के दिग्गज एकजुट हो गए हैं। सभी न्यूज चैनलों के हेड और संपादकीय प्रमुख अपना विरोध दर्ज कराने के लिए जल्द ही प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिलने वाले हैं। पता चला है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के सभी दिग्गज संपादकों के हस्ताक्षरों वाला एक आवेदन प्रधानमंत्री को भेजा जाएगा और उनसे मिलने का वक्त मांगा जाएगा। हस्ताक्षर का अभियान शुरू हो चुका है और लगभग दर्जन भर संपादकों के दस्तखत हो गए हैं। दस्तखत करने वालों में आईबीएन7 के राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, एनडीटीवी की बरखा दत्त, पंकज पचौरी, स्टार न्यूज के शाजी जमां, मिलिंद खांडेकर, न्यूज 24 के अजीत अंजुम, सुप्रिय प्रसाद, इंडिया टीवी के विनोद कापड़ी एवं ईटीवी के एनके सिंह शामिल हैं। एक और हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत सभी न्यूज चैनलों के मीडियाकर्मियों से दस्तखत कराया जा रहा है। हजारों हस्ताक्षरों से युक्त यह विरोध पत्र भी सरकार को सौंपा जाएगा।

मीडिया को अपने अधीन करने की सरकारी कोशिशों को बेपर्दा करने के लिए एक नया ब्लाग भी बना दिया गया है। http://www.returnofcensor.blogspot.com/ नाम के इस ब्लाग के माध्यम से पत्रकारों को एकजुट करने की मुहिम शुरू की जा चुकी है। इस ब्लाग पर कई पत्रकारों ने अपने विचार रखे हैं।

इधर, सरकार द्वारा लाए जाने वाले काले कानून पर मीडिया की रणनीति के बारे में न्यूज 24 के मैनेजिंग एडीटर अजीत अंजुम ने कहा कि हम सभी इस प्रस्तावित कानून का विरोध करते हैं और जरूरत पड़ने पर सड़क पर उतरने से भी नहीं हिचकेंगे। सरकार पहले से ही मीडिया पर शिकंजा कसना चाहती थी और मुंबई हमला का प्रकरण उसे एक बहाने के रूप में मिल गया है। आज वह इलेक्ट्रानिक मीडिया को घेर रही है तो कल सरकार का निशाना प्रिंट मीडिया और ब्लाग की दुनिया भी हो सकती है। लोकतंत्र के चौथे खंभे मीडिया की स्वतंत्रता छीनने की कोशिश खतरनाक है। अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया से चूक हुई है तो उसके लिए एनबीए ने गाइडलाइन जारी कर दिया है। ऐसे में फिर सरकार सेंसरशिप क्यों लाना चाहती है? मुंबई हमले के कवरेज के दौरान जो भी हुआ उसके लिए सरकारी चूक भी जिम्मेवार था। इलेक्ट्रानिक मीडिया को ठीक से ब्रीफ नहीं किया गया। सरकार ने जब अगले दिन लाइव दिखाने को मना किया तो हमने माना भी। जो नया कानून सरकार ला रही है, उसके लागू होने के बाद सरकार जिस घटना को चाहेगी ‘नेशनल इंटरेस्ट में नहीं है’ कहते हुए इसके प्रसारण को रुकवा देगी। इससे देश की आम जनता की आवाज दबी की दबी रह जाएगी।

12.1.09

आइए, विरोध करें ताकि हम मुंह दिखा सकें

  • मीडिया के लिए प्रस्तावित काले कानून का विरोध
  • 15 जनवरी को दिन में 12 बजे जंतर-मंतर पहुंचे
  • काली पट्टियां बांध काला दिवस मनाने का ऐलान

मीडिया की आजादी फिर खतरे में है। केंद्र और राज्य सरकारों ने मीडिया को गुलाम बनाने की कोशिशें अतीत में भी कई बार की लेकिन इन साजिशों को मीडियाकर्मियों और लोकतंत्र में आस्था रखने वालों ने सफल नहीं होने दिया। एक बार फिर ऐसा ही संकट का समय हमारे करीब आ चुका है। काला कानून तैयार है। कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने के मंसूबे बनाए है। यह कानून संसद के जरिए नहीं, चुपचाप बनाया जा रहा है।


इसे मंत्रिमंडल की बैठक में पारित करके लागू करने की तैयारी है। इस अंतिम कदम से ठीक पहले का काम केंद्र सरकार कर चुकी है। कैबिनेट नोट सभी मंत्रालयों में भेजा जा चुका है। अब सिर्फ बैठक होने और मुहर लगने की औपचारिकता मात्र शेष है। हमारे आपके मन में टीवी न्यूज चैनलों को लेकर कई तरह की असहमतियां हो सकती हैं लेकिन इस तरह की असहमतियां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को लेकर भी है। तो फिर इसका यह मतलब नहीं कि हम लोकतंत्र की मूल भावना को ही तिलांजलि दे दें और देश के जितने भी स्तंभ हैं उनकी आजादी छीन लें। उनकी स्वायत्तता भंग कर दें। उन्हें सरकारी बाबूओं-अफसरों के अधीन कर दें।


मीडिया से जुड़े लोगों और लोकतंत्र को चाहने वालों के लिए मुश्किल वक्त है। समय बिलकुल नहीं बचा है। सड़क पर आकर सरकार को यह बताने भर का समय शेष है कि हम अभी मरे नहीं हैं। हम जिंदा हैं। मीडिया को दूरदर्शन न बनने देंगे। मीडिया को सरकार का प्रवक्ता न होने देंगे।
कैबिनेट नोट की प्रतियां फूंकने और काला दिवस मनाने के लिए भड़ास4मीडिया ने पहल की है। विस्फोट डाट काम और तीसरा स्वाधीनता आंदोलन जैसे पोर्टल और संगठन कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार हो चुके हैं। आपसे भी अनुरोध है। आपको भी न्योता है।


15 जनवरी को दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिन में 12 बजे इकट्ठा हों और काली पट्टियां हाथ-पांव-सिर में बांधकर काला दिवस मनाएं। प्रस्तावित काले कानून के मसौदे को फूंकें। सरकार में बैठे लोगों तक विरोध का संदेश भेजें। उन तक गुस्से को पहुंचाएं। देश के हर जिले के मीडियाकर्मियों से अनुरोध है कि वे जिला मुख्यालयों पर काली पट्टियां बांधकर धरना दें, उपवास करें। काले कानून के मसौदे की प्रतियां फूकें। इन आंदोलनों की सचित्र रिपोर्ट हम तक पहुंचाएं ताकि विरोध की आवाज की अनुगूंज दुनियाभर में सुनाई पड़ने लगे।


इस मसले पर आपको अगर कुछ कहना, कुछ जानना है तो आप bhadas4media@gmail.com पर मेल करें।

साभारः भड़ास4मीडिया

मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के लिए 'काला कानून' !

सरकार मीडिया को अपने इशारे पर नचाने की तैयारी कर चुकी है। शुरुआत टीवी न्यूज चैनलों से की जा रही है। केंद्र सरकार इस महीने एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जिसके अमल में आते ही किसी भी तरह के उपद्रव, बवाल, दंगा, अपहरण, बंधक, जन विक्षोभ, आंदोलन को कवर करने से टीवी न्यूज चैनलों को रोक दिया जाएगा। अगर चैनलों ने इन घटनाओं को शूट कर भी लिया तो उन्हें दिखाने की इजाजत न होगी। वे वही दिखा पाएंगे जो पुलिस अफसर या ब्यूरोक्रेट तय करेंगे। वे वही सच दुनिया के सामने ला सकेंगे जो सरकार बताएगी। मीडिया पर सेंसरशिप लागू करने से संबंधित प्रस्ताव केंद्र सरकार तैयार कर चुकी है और इसे सभी केंद्रीय मंत्रियों के बीच वितरित करा चुकी है। इस कैबिनेट नोट पर मंत्रिमंडल की अगली किसी भी बैठक में मुहर लगते ही इसे कानून का रूप दे दिया जाएगा।


मुंबई पर आतंकी हमलों को लेकर टीवी न्यूज चैनलों ने केंद्र सरकार, नेताओं, खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की विफलता को जिस आक्रामक ढंग से देश के सामने पेश किया, उससे चिढ़ी सरकार अब मीडिया का 'संपूर्ण इलाज' करने की ओर कदम बढ़ा चुकी है। सूत्रों का कहना है कि टीवी न्यूज चैनलों पर बनाए जा रहे कानून के अमल में आने के बाद अगला निशाना प्रिंट और वेब मीडिया के माध्यम होंगे। मुंबई आतंकी हमलों को कवर करने के तरीके को लेकर टीवी न्यूज चैनलों के खिलाफ लोगों में गुस्से को देख सरकार इस गुस्से को अपने हित में भुनाने की साजिश रच चुकी है। इस साजिश का पता इसी बात से चलता है कि जिस कैबिनेट नोट को मंत्रियों में वितरित किया गया है उसमें साफ-साफ कहा गया है कि नेशनल क्राइसिस और इमरजेंसी सिचुएवशन (incidents of terror, communal riots, hijacking, hostage situations and incidents that are perceived to be a threat to national security) में टीवी न्यूज चैनल को सरकारी फुटेज मुहैया कराएगी और वे सिर्फ वही फुटेज दिखाने को बाध्य होंगे। मीडिया के जानकारों का कहना है कि इमरजेंसी सिचुएशन का मतलब सरकार अपने हिसाब से गढ़ेगी और ऐसे हर जनांदोलन को कवर करने से रोक देगी जिससे सरकार की छवि पर असर पड़ता हो।

अपने उपर शिकंजा कसते देख मीडिया के एक बड़े हिस्से में सुगबुगाहट तेज हो गई है। भड़ास4मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार देश के सभी छोटे-बड़े टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों ने पिछले दिनों एक आपात बैठक कर सरकार के इस कदम की निंदा की है और मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप थोपने के काले कानून को वापस लेने की मांग केंद्र सरकार से की है। टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों का कहना है कि सरकार पब्लिक के गुस्से को किसी भी तरह मीडिया में मुद्दा न बनने देने की ठान चुकी है जो लोकतंत्र में आजाद मीडिया की मूल भावना पर कुठाराघात है। सरकार अमरनाथ प्रकरण और गुर्जर आंदोलन जैसे मामलों को भी इमरजेंसी सिचुवेशन बता रही है। इसी से साफ पता चलता है कि कल अगर दिल्ली में जनता ब्लू लाइन बसों की अराजकता के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं तो सरकार इसे इमरजेंसी सिचुवेशन कहकर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने से मना कर सकती है। मीडिया के लिए ऐसा काला कानून बनाना किसी भी लोकतांत्रिक देश में मीडिया का गला घोंटने जैसा है। ऐसे में अगर देश के सभी मीडियाकर्मी उठ खड़े नहीं हुए तो फिर मीडिया एक तरह से सरकार के इशारे पर संचालित होने वाला उपक्रम बनकर रह जाएगा।

इन संपादकों का यह भी कहना है कि टीवी न्यूज चैनलों ने अपनी कमियों से खुद सबक लेते हुए अपने को ठीक करने के लिए एनबीए के तहत गाइडलाइऩ बना दी है और कई अन्य कदम उठाए हैं। पर सरकार जिस जल्दबाजी में नया कानून ला रही है, वह बताता है कि नेताओं की मंशा ठीक नहीं है। कहीं न कहीं टीवी न्यूज चैनलों को अपना गुलाम बनाने की तैयारी है। जिस तरह राजनीति में हजार तरह की गड़बड़ियों के बावजूद देश में मिलिट्री राज नहीं लागू किया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के कई गलत फैसलों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट को सरकार के अधीन नहीं किया जा सकता है उसी तरह मीडिया को भी उसकी कुछ गल्तियों के लिए हमेशा के लिए सरकार का गुलाम नहीं बनाया जा सकता है।
इलेक्ट्रानिक मीडिया को पंगु बनाने के लिए केंद्र सरकार जो कानून ला रही है, उसका कई स्तरों पर विरोध भी शुरू हो चुका है। ज्यादा जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें और मामले की गंभीरता को समझें-

I&B guidelines on media coverage soon
Return of the Censor
Mind the minders

साभारः भड़ास4मीडिया

17.12.08

मेरे सामने तो शर्म भी आकर शर्म से डूब मरेः जार्ज बुश

पत्रकार- सुना है आप पर जूता फैंका गया है?

बुश - देखिए, मैं अमेरिका का राष्‍ट्रपति हूं। दुनिया के सबसे बेशर्म-कमीने-गलीज़ अपराधियों का सरगना। मुझे इन छोटी-मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।

पत्रकार - लेकिन फिर भी क्‍या यह आपके लिए शर्मनाक घटना नहीं है?

बुश - अगर शर्म ही करनी होती तो मैं राजनीति में ही क्‍यों आता और वैसे भी मैंने इतना झूठ बोला है, इराक-अफगानिस्‍तान-फिलीस्‍तीन से लेकर दुनिया के हर हिस्‍से में इतने नरसंहार करवाये हैं कि मेरे सामने तो शर्म भी आकर शर्म से डूब मरे।

पत्रकार - आप पर जूता क्‍यों फेंका गया?

बुश - लोकतंत्र की वजह से। देखिये मुक्‍त समाजों में ही ऐसा संभव है। इससे साबित होता है कि इराक में लोकतंत्र जड़ें जमा चुका है।

पत्रकार - क्‍या आपको डर नहीं लग रहा?

बुश - (ऑफ द रिकार्ड) सच बताऊं, डर के मारे तो मेरी हालत खराब है लेकिन क्‍या करुं। ये सीट ही ऐसी है, जी कड़ा करके, नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा हूं।

पत्रकार - आखिरी सवाल, इस घटना का अमेरिका पर क्‍या असर पड़ेगा?

बुश - देखिये आजकल पूरी दुनिया में मंदी चल रही है। हमारे देश में सबसे ज्‍यादा हालत पतली है। मैंने इन सड़े जूतों को संभाल कर अपने पास रख लिया है। मैं इन्‍हें अमेरिका ले जाकर फुटवियर उद्योग को बेलआऊट पैकेज में दे दूंगा। हमारी अर्थव्‍यवस्‍था में इनसे थोड़ा सुधार जरूर आएगा।

(यह इंटरव्यू मेल के जरिए लोगों में खूब वितरित हो रहा है। एक पत्रकार साथी ने मुझे भी फारवर्ड किया तो सोचा, भड़ासी साथियों को भी पढ़ा दूं। यशवंत)

11.7.08

उनको अपने भले की चिन्ता है, मुल्क की क्या करें भलाई वे

ग़ज़ल
देश की दे रहे दुहाई वे.
बांट खायेंगे फिर मलाई वे.

लोटे बिन पेंदी के लुढ़क करके,
दे रहे देखो अब सफाई वे.

गांड फाड़े है सब की मँहगाई,
बुश से करने चले सगाई वे.

चोर-चोरों में मौसिया रिश्ता,
हैं तो आपस में भाई भाई वे.

उनको अपने भले की चिन्ता है,
मुल्क की क्या करे भलाई वे.

भाँड निकले हैं फिर तमाशे को,
कर रहे देखो जगहँसाई वे .

हमने जिन पे था एतबार किया,
आज करते हैं बेवफ़ाई वे.

रोज़ ताज़ा वो ज़ख्म देते हैं,
हँस के बांटे हैं फिर दवाई वे।
-डॉ.सुभाष भदौरिया, अहमदाबाद.

4.6.08

विरोध करना महंगा पड़ा

राजस्थान विश्वविद्यालय में इन दिनों हास्टल वाडर्न छात्राओं के पीछे पड़ी हुई है। हुआ यूं कि लक्ष्मीबाई गर्ल्स हास्टल में कुछ छात्राओं ने वहां की अव्यवस्थाओं का विरोध किया। छात्राएं प्रदर्शन कर रहीं थीं। मीडिया को इसकी जानकारी मिल गई। फोटो जनर्लिस्ट भी वहां पहुंच गए। अखबारों में फोटो सहित इसकी खबर छप गई। अब हास्टल वाडर्न के तेवर बदल गए। उन्होंने एक छात्रा की मैस सुविधा बंद करा दी। बाकी के खिलाफ पुलिस थाने में रिपोर्ट करा दी। उनका गुस्सा मीडिया पर भी उतरा। उनका कहना था कि आखिर गर्ल्स हास्टल में मीडिया कैसे चला गया। हास्टल में मंगलवार को पुलिस आ गई। छात्राओ में भय बना हुआ है। उनका कहना है कि पुलिस ने आने के लिए कुलसचिव, चीफ वाडर्न, चीफ प्रोक्टर की इजाजत नहीं ली। उनसे पूछताछ की जा रही है। इन सारे तथ्यों से अनजान कुलपति डा. एन.के. जैन दिल्ली में अपने घर आराम फरमा रहे है। छात्राएं और वाडर्न आमने-सामने है।

भडास के लिए
जयपुर से
एक पाठक

(भड़ास के लिए आई मेल को यहां डाल रहा हूं....यशवंत)

5.5.08

ब्लागवाणी वालों ने विस्फोट पर भी कहर बरपा दिया

ब्लागवाणी जो ब्लागों का एग्रीगेटर है, उसने एक दूसरे कम्युनिटी ब्लाग विस्फोट.ब्लागस्पाट.काम को भी अपने यहां से हटा दिया है। ऐसा मेरे समेत कई भड़ासियों के विस्फोट का सदस्य बन जाने के चलते किया गया है।

हालांकि ब्लागवाणी के इस सामंती और तानाशाही भरे बर्ताव से न तो भड़ास की लोकप्रियता में कमी आई और न विस्फोट की लोकप्रियता कम होगी, बल्कि ये दोनों और ज्यादा फूलेंगे फलेंगे। पर इससे यह जरूर साफ हो गया है कि धंधेबाज लोगों के हाथों एग्रीगेटर का काम होने से हिंदी ब्लागिंग का कितना नुकसान हो रहा है।

इस कृत्य से जाहिर हो गया है कि ब्लागवाणी के संचालक मंडल के पास अपना कोई विवेक नहीं है। वे चंद मठाधीश ब्लागरों के एक गुट के द्वारा निर्देशित और संचालित होते हैं।

हम मैथिली समेत ब्लागवाणी संचालक मंडल की इस कुकृत्य के लिए निंदा करते हैं और सभी ब्लागरों से ब्लागवाणी के बहिष्कार की अपील करते हैं।

जय भड़ास
यशवंत

10.4.08

श्यामेंद्र के अपहरण में बसपा विधायक गुरुप्रसाद मौर्य का हाथ?

इलाहाबाद के पत्रकार श्यामेंद्र कुशवाहा के अपहरण मामले में मुझे जो डेवलपमेंट पता चले हैं वो इस प्रकार हैं....


1- बीते रोज इलाहाबाद के सभी व्यापारियों, नेताओं, पत्रकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों ने सिविल लाइंस चौराहे से इकट्ठा होकर कचहरी तक विरोध जुलूस निकाला और दैनिक जागरण के वरिष्ठ उप संपादक श्यामेंद्र कुशवाहा की सकुशल बरामदी न कर पाने पर पुलिस प्रशासन की निंदा की। इस जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन को आम जनता और दुकानदारों का भी समर्थन हासिल था।

2- कल यानि अगले दिन इलाहाबाद बंद का आह्वान वहां के पत्रकारों, व्यापारियों, नेताओं, साहित्यकारों, रंगकर्मियों आदि ने किया है। इस बंद के पीछे एकमात्र मांग वरिष्ठ पत्रकार श्यामेंद्र कुशवाहा का पता लगाना और उन्हें सकुशल छुड़ाना है।

3- सूत्रों ने स्पष्ट तौर पर बताया है कि इलाहाबाद में बसपा के गंगा पार नेता गुरुप्रसाद मौर्य और बिल्डर दानिश, इन दोनों में से ही किसी एक का हाथ वरिष्ठ पत्रकार श्यामेंद्र के अपहरण के पीछे संभव है। इन दोनों की भूमिका को लेकर पुलिस जांच कर रही है। पर सूत्रों का कहना है कि बसपा विधायक के प्रभाव में जिला पुलिस प्रशासन है क्योंकि वो यूपी की मुख्यमंत्री के खासमखास में से है।

4-पता चला है कि कल जब पुलिस कुछ लोगों को हिरासत में लेकर गहराई से पूछताछ कर रही थी तो बसपा विधायक गुरुप्रसाद मौर्य सीधे उस पूछताछ कक्ष में घुस गए और वहां अपने तरीके से पुलिस वालों को निर्देशित किया। इससे जाहिर है कि सत्ताधारी पार्टी का विधायक होने के कारण इस मामले में पुलिस पर काफी दबाव भी बनाया जा रहा होगा।

उपरोक्त जानकारियां मुझे मिली थीं, जिसे मैंने बिना संपादित किये आप लोगों तक पहुंचा दिया। अब आप लोगों से अपील है कि अपने अपने स्तर से इलाहाबाद में रहने वाले अपने साथियों से संपर्क कर इस मामले के डेवलपमेंट पता करते रहें और भड़ास पर पोस्ट करते रहें जिससे हम लोग सारी दुनिया को बता सकें कि इस मामले में सच्चाई क्या है।

देश भर के हिंदी पत्रकारों और गैर पत्रकारों से अपील है कि वो श्यामेंद्र के अपहरण की निंदा और उनकी सकुशल बरामदगी की मांग करते हुए भड़ास पर अपनी टिप्पणी दर्ज कराएं ताकि उसे हम इलाहाबाद पुलिस प्रशासन और यूपी की मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों अफसरों तक पहुंचा सकें जिससे श्यामेंद्र की बरामदगी के लिए दबाव और ज्यादा बनाया बढ़ाया जा सके।

जय भड़ास
यशवंत

9.4.08

पत्रकार श्यामेंद्र के अपहरण के पीछे बिल्डर लॉबी? इलाहाबाद के पत्रकार आज निकालेंगे विरोध जुलूस

हर्षवर्धन has left a new comment on your post "रामेंद्र कुशवाहा को लेकर हम चिंतित हैं....":

यशवंतजी
रामेंद्र नहीं श्यामेंद्र कुशवाहा गायब हुए हैं। और, पत्रकारों के दबाव की वजह से पुलिस इस मामले में पूरी तरह लगी हुई है। लेकिन, अभी तक कोई खबर नहीं है। दैनिक जागरण में श्यामेंद्र पिछले करीब डेढ़ दशक से नगर निगम कवर करते थे। लोग मान रहे हैं कि श्यामेंद्र के अपहरण के पीछे बिल्डर लॉबी हो सकती है। आज इलाहाबाद के पत्रकार जुलूस निकालकर विरोध करेंगे।


Posted by हर्षवर्धन to भड़ास at 9/4/08 6:56 AM

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शुक्रिया हर्षवर्धन भाई, नाम करेक्ट कराने के लिए। दरअसल नाम की गलती इस वजह से हुई कि जिस वेबसाइट की खबर मुझे मिली थी, उसमें रामेंद्र ही लिखा गया था। मैं माफी मांगता हूं और सभी से अनुरोध करता हूं कि वे नीचे वाली पोस्ट में नाम रामेंद्र की जगह श्यामेंद्र पढ़ें।

हम सभी भड़ासी इलाहाबाद के पत्रकारों की एकजजुटता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। इलाहाबाद के साथियों से अपील है कि वे इलाहाबाद के एसएसपी, डीआईजी, आईजी समेत प्रदेश के डीजीपी और मुख्यमंत्री की मेल आईडी भड़ास को मुहैया कराएं ताकि हम लोग श्यामेंद्र की बरामदगी को लेकर मेल अभियान चला सकें।

आभार के साथ
जय भड़ास
यशवंत

31.3.08

दैनिक भास्कर का नई दिल्ली आफिस सील, दिल्ली पुलिस और प्रशासन का निंदनीय कृत्य

----ब्रेकिंग न्यूज----

भड़ास को मिली पुख्ता सूचना के मुताबिक मीडिया हाउस दैनिक भास्कर के नई दिल्ली स्थित गोल मार्केट वाले आफिस को सील कर दिया गया है। यहां कुछ ही दिनों पहले दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण का कार्यालय नोएडा से शिफ्ट किया गया था। होली से पहले दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण का आफिस नोएडा में हुआ करता था। गोल मार्केट वाले आफिस में दैनिक भास्कर के नेशनल ब्यूरो की टीम, लोकल ब्यूरो की टीम, फीचर की टीम, मार्केटिंग व मैनेजमेंट की टीम बैठा करती थी।

भास्कर प्रबंधन ने तय किया कि दिल्ली संस्करण के प्रकाशन से जुड़ी पूरी टीम भी गोल मार्केट वाले आफिस में ही शिफ्ट कर दी जाए। इसी के तहत कई महीनों से गोल मार्केट वाले आफिस में निर्माण कार्य चल रहा था। और होली के छुट्टी वाले दिन नोएडा से सारे स्टाफ व सारे सामानों को गोल मार्केट वाले आफिस शिफ्ट कर दिया गया। अभी वहां शिफ्ट हुए कुछ ही दिन हुए थे कि स्थानीय नागरिकों की शिकायत पर पुलिस पहुंच गई। तब किसी तरह मामले को दबाया गया।

बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस ने रेजीडेंशियल इलाके में व्यावसायिक कार्य न होने के आधार पर दैनिक भास्कर के आफिस को सील कर दिया। इससे परेशान दैनिक भास्कर प्रबंधन ने हर कीमत और हर मुश्किल के बावजूद अखबार प्रकाशित करने की ठानी है। इस मुहिम के तहत अपने सारे स्टाफ को गोल मार्केट आफिस में इकट्ठा होकर गाड़ियों के जरिए पानीपत आफिस पहुंचने को कहा है। फिर से नोएडा में आफिस शिफ्ट किए जाने तक दैनिक भास्कर, दिल्ली संस्करण का प्रकाशन पानीपत से ही हुआ करेगा।

हर हाल में अखबार प्रकाशित किए जाने की चुनौती दैनिक भास्कर के पत्रकारों ने स्वीकार कर ली है। वे कपड़े लत्ते से भरे बैग लेकर दैनिक भास्कर के पानीपत आफिस के लिए कूच कर चुके हैं। भड़ास की तरफ से इन सभी योद्धा पत्रकार साथियों को शुभकामनाएं। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही दैनिक भास्कर इस मुश्किल से उबरेगा और अखबार का प्रकाशन हर हालत में सुनिश्चित करेगा ताकि अखबार प्रकाशन रोकने का मंसूबा पाले पुलिस व प्रशासन को करारा सबक सिखाया जा सके।

भड़ास का मानना है कि इस मामले में पुलिस और प्रशासन ने जल्दबाजी दिखाई और मामले को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिशों के बजाय अखबार का प्रकाशन बंद करने की साजिश रची। इस सरकारी साजिश का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए। इसी दिल्ली में एक से एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक मगरमच्छ न जाने क्या क्या कर रहे हैं पर दिल्ली पुलिस उन पर नजर इसलिए नहीं डालती क्योंकि सत्ता की तेजाबी नजर से उसकी आंख फूट सकती है। उसने इस मामले में इसलिए जल्दबाजी दिखाई ताकि एक बड़े मीडिया हाउस को बदनाम किया जा सके। हम पुलिस और प्रशासन के इस कृत्य की निंदा करते हैं और सभी पत्रकार साथियों से अपील करते हैं कि वो इस साजिश के खिलाफ खुलकर बोलें।

जय भड़ास
यशवंत

17.3.08

मैथिली जी...आप धन्धेबाज़ लोग केवल फायदे नुकसान का गणित देखिये

मैथिली जी और सिरिल जी
कर्ताधर्ता ब्लागवानी डाट काम

कृपया आप भड़ास की किसी फीड को किसी रूप में अपने ब्लाग एग्रीगेटर पर इस्तेमाल ना करें. आप ने कुछ ब्लाग मठाधीशों और उनके चेलों की शह पर भड़ास को अश्लील कैटेगरी में डाल कर हम भड़ास वालों की भावनावों का अपमान किया है. इसके लिए हम लोग किसी हाल में आप को माफ़ नहीं कर सकते.

अश्लीलता के बारे में बिना समझे जाने जो तानाशाही भरा निर्णय आप लोगों ने किया है, वही आपसे उम्मीद भी थी क्योंकि वणिक मानसिकता में डेमोक्रेटिक होने की गुन्जायिश नहीं होती. आप लोगों की सोच के बारे में डॉ. रूपेश ने पहले ही भड़ास पे लिख दिया था जिसमें उन्होने बताया था की किस तरह एक मेडिकल एड्वयिजरी वाला ब्लॉग आयुषवेद आपको अश्लील लगता है. इस पैमाने पर तो इस देश के सारे अखबार और पत्र पत्रिकाएँ अश्लील घोषित कर दी जानी चाहिऐ क्योंकि उसमे डाक्टरों से पाठकों के सेक्स से संबंधित सवाल जवाब भी छापे जाते हैं. मुझे आपसे कोई तर्क नहीं करना क्योंकि तर्क वहाँ किया जाता है जहाँ अगले के पास तर्क को जी पाने का दम हो. आप धन्धेबाज़ लोग केवल फायदे नुकसान का गणित देखिये और कुछ ब्लागरों से तेल मालिश वगैरह करवाते रहिये, इसी में आपको बुद्धिजीवि होने का सुख मिलता रहेगा. आपको क्या पड़ी है अश्लीलता, चेतना, समाज, बहस, तर्क और सौंदर्य के बारे में समझने और बूझने की. आप तो चार कुत्त्तों के भौकने पर डर जाते हैं और चार कुत्तों के दुम हिलाने पर खुश हो जाते हैं.

आप जैसे लोग हिन्दी का आधुनिक सोच वाला ब्लाग एग्रीगेटर चला ही नहीं सकते. आप केवल दुकान चला सकते हैं. खैर, मेरी बातों को दिल पर मत लीजियेगा, दिमाग से सोचियेगा, अगर दिमाग हो तब.

हम उम्मीद करते हैं की आप भड़ास ब्लॉग का किसी भी तरह उपयोग न करें. हम खुद अपना ब्लाग एग्रीगेटर बना लेंगे. इसमे थोडा वक्त लग सकता है लेकिन हम दिखायेंगे की आप जैसे कम दिमाग वाले लोगों के आगे भी जहाँ है और ऐसे भी लोग हैं जो बेहद डेमोक्रेटिक तरीके से ब्लाग एग्रीगेटर बना और चला सकते हैं.

आभार के साथ
यशवंत सिंह
(भड़ास संचालक मंडल की तरफ से)

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हिन्दी के ब्लागरों से अपील

भड़ास को एक ब्लॉग एग्रीगेटर ब्लागवानी डाट काम ने अश्लील मानते हुवे आर कैटेगरी में डालकर जो निंदनीय काम किया है, उसका पुरजोर विरोध करते हुए एक ऐसे ब्लॉग एग्रीगेटर बनाने की तरफ सोचा जाना चाहिऐ, जो वाकई डेमोक्रेटिक तरीके से काम करता हो.

इस दिशा में में नारद ब्लॉग एग्रीगेटर की तारीफ करूँगा जो बिना किसी भेदभाव के सभी ब्लागों की पोस्टों के बारे में अद्यतन जानकारी देता रहता है. हम चाहते हैं की नारद अगर अपने मूल रूप को थोडा और बदलकर क्रिएटिव कर ले या फिर कोई और बंधु सामने आयें जो चाहतें हों को वाकई हिन्दी का एक आधुनिक सोच वाला ब्लाग एग्रीगेटर बनाया जाना चाहिऐ, तो भड़ास उनके साथ मिलकर काम करने को तैयार है. अगर कोई अपनी बात इस दिशा में कहना चाहता है तो कृपया मुझे मेल करें...yashwantdelhi@gmail.com

हिन्दी के ब्लागरों से अपील है की वो कुछ ब्लॉग मठाधीशों के इशारे पर चलाये जा राहे ब्लॉग एग्रीगेटर ब्लागवानी डाट काम की हरकत का विरोध करें और भविष्य के बडे विजन वाले एक ब्लॉग एग्रीगेटर को बनाने, क्रिएट करने के बारे में गंभीरता से सोचें.

आभार के साथ
यशवंत
(भड़ास संचालक मंडल की तरफ से)