13.3.11
सूचना आयोगों द्वारा ब्यूरोक्रेसी को बचाने के चक्कर में अपीलों का बढता अम्बार?
10.4.09
निरक्षरों के अंगूठा निशान को अंगूठा दिखाते यूपी के अफसर


Dear Friend,
Please see the following report in the form of an appeal and let me know if you would like to endorse an appeal to the Chief Election Commission Officer to look into the activities of the administration in Robertsganj and saying that it is unconstitutional to deny illiterate people the right to choose their representatives and propose candidates as well .
Also please find enclosed a report by a Jansatta correspondent on the matter describing the huge turnout in the parallel polls that are being held--it is on page 7 of 10 April, 2009 edition. Please do try to carry news-reports of this matter, in your newspapers/ blogs/ television also.
In solidarity,
Radhika Menon
radhikamenon1@gmail.com
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for Urgent attention : Lok Sabha 2009:
Robertsganj: Denying illiterate people the right to choose their representatives, after having stolen their forest rights and public funds.
In a gross violation of the democratic rights of the large mass of people who are illiterate in India and showing utter contempt for their right to elect their own representatives, in Robertsganj, in Sonebhadra district of Uttar Pradesh the candidature of 6 SC-ST candidates have been cancelled only for having proposers who put thumb impressions.
It must be noted that if there is such a high illiteracy levels amongst the dalit adivasi population, the ruling class of this country is singularly responsible for it which has denied the people the right to equitable education. Now after having done that , it is usurping the democratic rights of illiterate people by not recognizing their electoral interventions. In Robertsganj, this is being done after failing to terrorise the people the usual police machinery, assaults, and intimidation. Worse, the administrative machinery in the area is infact trying to forcibly impose candidates on the people.
Amongst the candidates whose candidature has been cancelled, it is that of Jitu Kol, the CPIML candidate. This is an established area of CPIML’s struggle and has been exposing and resisting the scams related to NREGA and forest rights, theft of public funds, feudal and state atrocities(The administration has classified this region as being Naxal affected and has made it a practice to harass tribals going about their daily lives). All this has undoubtedly made it inconvenient and difficult for the ruling class to pursue its loot and terror in the area. And making the excuse of two women proposers who had put their thumb impressions, it has rejected Kol’s candidature.
The case
Take the procedure adopted for the violation in Kol’s case and what becomes evident is the routines of the violation of the democratic rights of the poor, dalits and adivasis:
· Kol submitted his nomination paper on the prescribed form with signatures of 8 proposers and thumb impressions of two other proposers. The women put their impressions in the presence of the Assistant Returning Officer (ARO) who was the authorized officer incharge. The ARO accepted it as per the technical standpoint (chapter V, paragraph No 15.1, p47 of pdf format of the handbook for returning officers available at ECI’s website)
· No communication was made on the day by ARO about any technical flaws after examining the papers.
· Subsequently the Returning officer, Pandhari Yadav, on the final day of scrutiny of the papers summarily rejected the papers arbitrarily, violating the code that there is a presumption of validity unless contrary and if there is doubt , the benefit of doubt should go to the candidate(Chapter VI, para7) saying the ARO had not signed alongside the thumb impression to identify them.
· Note that it was the ARO who accepted the papers, but the burden of the administration’s irresponsibility was passed on to the candidate and Jitu Kol’s nomination was cancelled.
· The same procedure was followed in others cases as well.
The people in the area have come up with their own modes of protest and a parallel election called ‘Put your thumb impression and Save democracy campaign',is being organised by CPIML, a photograph of which I am attaching.
Demand
However what is important is that this violation of the rights of the poor and the illiterate to choose their representatives be not allowed and the candidates whose nominations have been cancelled for the thumb impressions be allowed to contest and the administration take responsibility for its act instead of slapping it on the candidates.
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यशवंत सिंह yashwant singh
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12.1.09
आइए, विरोध करें ताकि हम मुंह दिखा सकें
- मीडिया के लिए प्रस्तावित काले कानून का विरोध
- 15 जनवरी को दिन में 12 बजे जंतर-मंतर पहुंचे
- काली पट्टियां बांध काला दिवस मनाने का ऐलान
मीडिया की आजादी फिर खतरे में है। केंद्र और राज्य सरकारों ने मीडिया को गुलाम बनाने की कोशिशें अतीत में भी कई बार की लेकिन इन साजिशों को मीडियाकर्मियों और लोकतंत्र में आस्था रखने वालों ने सफल नहीं होने दिया। एक बार फिर ऐसा ही संकट का समय हमारे करीब आ चुका है। काला कानून तैयार है। कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने के मंसूबे बनाए है। यह कानून संसद के जरिए नहीं, चुपचाप बनाया जा रहा है।
इसे मंत्रिमंडल की बैठक में पारित करके लागू करने की तैयारी है। इस अंतिम कदम से ठीक पहले का काम केंद्र सरकार कर चुकी है। कैबिनेट नोट सभी मंत्रालयों में भेजा जा चुका है। अब सिर्फ बैठक होने और मुहर लगने की औपचारिकता मात्र शेष है। हमारे आपके मन में टीवी न्यूज चैनलों को लेकर कई तरह की असहमतियां हो सकती हैं लेकिन इस तरह की असहमतियां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को लेकर भी है। तो फिर इसका यह मतलब नहीं कि हम लोकतंत्र की मूल भावना को ही तिलांजलि दे दें और देश के जितने भी स्तंभ हैं उनकी आजादी छीन लें। उनकी स्वायत्तता भंग कर दें। उन्हें सरकारी बाबूओं-अफसरों के अधीन कर दें।
मीडिया से जुड़े लोगों और लोकतंत्र को चाहने वालों के लिए मुश्किल वक्त है। समय बिलकुल नहीं बचा है। सड़क पर आकर सरकार को यह बताने भर का समय शेष है कि हम अभी मरे नहीं हैं। हम जिंदा हैं। मीडिया को दूरदर्शन न बनने देंगे। मीडिया को सरकार का प्रवक्ता न होने देंगे।
कैबिनेट नोट की प्रतियां फूंकने और काला दिवस मनाने के लिए भड़ास4मीडिया ने पहल की है। विस्फोट डाट काम और तीसरा स्वाधीनता आंदोलन जैसे पोर्टल और संगठन कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार हो चुके हैं। आपसे भी अनुरोध है। आपको भी न्योता है।
15 जनवरी को दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिन में 12 बजे इकट्ठा हों और काली पट्टियां हाथ-पांव-सिर में बांधकर काला दिवस मनाएं। प्रस्तावित काले कानून के मसौदे को फूंकें। सरकार में बैठे लोगों तक विरोध का संदेश भेजें। उन तक गुस्से को पहुंचाएं। देश के हर जिले के मीडियाकर्मियों से अनुरोध है कि वे जिला मुख्यालयों पर काली पट्टियां बांधकर धरना दें, उपवास करें। काले कानून के मसौदे की प्रतियां फूकें। इन आंदोलनों की सचित्र रिपोर्ट हम तक पहुंचाएं ताकि विरोध की आवाज की अनुगूंज दुनियाभर में सुनाई पड़ने लगे।
इस मसले पर आपको अगर कुछ कहना, कुछ जानना है तो आप bhadas4media@gmail.com पर मेल करें।
साभारः भड़ास4मीडिया
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यशवंत सिंह yashwant singh
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24.10.08
सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन
Written by B4M Reporter
Friday, 24 October 2008 01:30
एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।
इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।
दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।
बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।
भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।
विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''
लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।
बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।
बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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8.7.08
अंशुमाली का ब्लाग गूगल ने किया लाक
28.6.08
ये रही करुणाकर की तस्वीर और उनकी आरकुट प्रोफाइल के डिटेल

smoking: no
drinking: no
living: alone, friends visit often
music: SOFT OLD SONGS
tv shows: INDIAN IDEAL PART TWO
movies: MUNNA BHAI MBBS;PARDESH;
ideal match: that is in pending
first thing you will notice about me: MY simplicity
my idea of a perfect first date: i do't like dating becoc i will do all these things after achieving all my goals
from my past relationships i learned: i do't have any relationship inspite of my parents and sister brothere and from these i am learning continously no endpoints
five things I cant live without: i can live without anything in the presense of air water and food
in my bedroom you will find: i have't here bedroom but i have my flat in that me and my freinds lives together so u find alot of things like MY PC,MY freinds laptop and as i am student then
5.5.08
ब्लागवाणी वालों ने विस्फोट पर भी कहर बरपा दिया
ब्लागवाणी जो ब्लागों का एग्रीगेटर है, उसने एक दूसरे कम्युनिटी ब्लाग विस्फोट.ब्लागस्पाट.काम को भी अपने यहां से हटा दिया है। ऐसा मेरे समेत कई भड़ासियों के विस्फोट का सदस्य बन जाने के चलते किया गया है।
हालांकि ब्लागवाणी के इस सामंती और तानाशाही भरे बर्ताव से न तो भड़ास की लोकप्रियता में कमी आई और न विस्फोट की लोकप्रियता कम होगी, बल्कि ये दोनों और ज्यादा फूलेंगे फलेंगे। पर इससे यह जरूर साफ हो गया है कि धंधेबाज लोगों के हाथों एग्रीगेटर का काम होने से हिंदी ब्लागिंग का कितना नुकसान हो रहा है।
इस कृत्य से जाहिर हो गया है कि ब्लागवाणी के संचालक मंडल के पास अपना कोई विवेक नहीं है। वे चंद मठाधीश ब्लागरों के एक गुट के द्वारा निर्देशित और संचालित होते हैं।
हम मैथिली समेत ब्लागवाणी संचालक मंडल की इस कुकृत्य के लिए निंदा करते हैं और सभी ब्लागरों से ब्लागवाणी के बहिष्कार की अपील करते हैं।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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8.4.08
रामेंद्र कुशवाहा को लेकर हम चिंतित हैं....
इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार रामेंद्र कुशवाहा के बारे में ताजा अपडेट क्या है, मुझे नहीं पता लेकिन दो दिन पहले इलाहाबाद से दो साथियों के फोन आए कि सीनियर सब एडीटर रामेंद्र जी गायब हैं। आज मेल चेक कर रहा था तो एक ब्लागर साथी ने पत्रकार के गायब होने की खबर मुझे मेल की थी। अपनी व्यस्तता के चलते भड़ास पर वक्त न दे पाने से मैं इस खबर को डाल नहीं पा रहा था पर मन ही मन यह उम्मीद जरूर कर रहा था कि इलाहाबाद या कानपुर का कोई भड़ासी या गैर भड़ासी साथी पत्रकार साथी के गायब होने संबंधी सूचना को जरूर भड़ास पर पोस्ट कर देगा क्योंकि भड़ास हिंदी पत्रकारों की सामूहिक ताकत से उपजा एक सामूहिक ब्लाग है। सो, इस पर हिंदी पत्रकारों से जुड़ी किसी सूचना को पोस्ट करने का एक मात्र अधिकार सिर्फ किसी यशवंत सिंह को नहीं मिला हुआ है बल्कि हर हिंदी पत्रकार का यह दायित्व है कि वो हिंदी मीडिया के साथियो् के बारे में दुख सुख से जुड़ी कोई भी खबर भड़ास तक पहुंचाए, मौखिक, फोन से, मेल से या खुद भड़ासी बनकर अपनी बात पोस्ट करके...।
फिलहाल मैं कानपुर और आसपास के भड़ासी साथियों से अनुरोध करूंगा कि वे इस मामले में ताजे अपडेट्स से भड़ासियों को सूचित करें क्योंकि देश के हर हिस्से में रहने वाला हिंदी पत्रकार रामेंद्र कुशवाहा की सलामती के लिए मन ही मन दुवाएं कर रहा है। प्लीज, अपनी दुनिया में लीन रहने की हम सब की मजबूरी के बावजूद हम सब का यह बेहद जरूरी (भले ही तकलीफदेह लगे) दायित्व है कि हम अपने दूसरे साथियों के दुख में खड़े हों। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो यह भी सोच लीजिए कि कल जब आप अकेले होंगे तो आपके कंधे से कंधा जोड़ने कौन पहुंचेगा। हम अलग अलग और अकेले अकेले बेहद लाचार और कमजोर हैं, एक होते ही हम एक ऐसी विस्फोटक ताकत बन जाते हैं जिससे हम बड़े बड़ों को फाड़ सकते हैं। तो साथियों, रामेंद्र के बारे में दुवाएं करिए, उनके परिजनों की संवेदना को समझने की कोशिश करिए, उनके आने की फिक्र करिए...
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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1.4.08
हम 250 भड़ासीः नए लोग बोलें, थोड़ा मुंह तो खोलें
भड़ास की सदस्य संख्या आज 250 पहुंच गई। इस मौके पर सभी नए पुराने भड़ासियों को बधाई।
नए भड़ासियों से आग्रह, अनुरोध, निवेदन और आह्वान है कि वे लिखना शुरू कर दें, लगातार, रोज रोज। अपना गला खंखारिये, सुर ताल खींचिए और उगल दीजिए पतले या मोटे राग में। इन 250 लोगों में से 100 लोग भी रेगुलर नहीं लिखते, ये ठीक बात नहीं है। भड़ास की ये सदस्य संख्या सिर्फ ताकत दिखाने के लिए, बौद्धिकों पर बाहुबल आजमाने के लिए नहीं होनी चाहिए बल्कि वाचा फोड़ने, लिखने, पढ़ने, बताने, सुनाने के लिए होना चाहिए। हम हिंदी पट्टी वालों के पास दुखों सुखों की पूरी गठरी भरी पड़ी है जिसे हमें एक एक कर खोलना चाहिए। बिना झिझक, बिना शरम।
आप यकीं मानिए, आप बेहद काबिल लोगों में से हो, पर आप सिर्फ हिंदी जानने के कारण थोड़े डिप्रेस्ड, थोड़े दबे, थोड़े कुचले, थोड़े कुंठित, थोड़े इंट्रोवर्ट, थोड़े देसज से लगते दिखते या महसूस करते हैं। ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। आप हम पुराने भड़ासियों को देखिए, बेशरमी से अपनी बात कहते हैं और बताते हैं दुनिया वालों को कि भाई लोगों, दरअसल ये दुनिया ये देस तुम्हारा नहीं बल्कि असल में हम देसी और देसज लोगों का ही है। तो मैकाले की औलादों, तुम अपने पर इतराना बंद कर दो और हम देसज लोगों के लिए सफलता के दरवाजे पर दरबान बनकर मत खड़े होओ वरना हमारे ओज ताकत और उर्जा से तुम मूर्छित हो सकते हो।
इन बातों के साथ मैं भड़ास के मुख्य संरक्षक हरे प्रकाश जी और माडरेटर डा. रूपेश से अनुरोध करूंगा कि वो 250 भड़ासी होने के मौके पर सभी भड़ासियों को अपनी तरफ से साधुवाद, दिशा निर्देश, गाइडेंस, लाइन लेंथ प्रदान करने की कृपा करें।
कविराज नीरव जी की कविताओं की प्रशंसा किए बिना मैं नहीं रह पा रहा हूं। उम्मीद है कि वे अपना प्यार इसी तरह हम भड़ासियों पर लुटाते रहेंगे। पंकज पराशर जी के इंडिया टुडे में मधुसूदन आनंद पर लिखी रिपोर्ट को मुंबई में मैंने रेलवे स्टेशन पर पढ़ा। उन्हें दिल से बधाई, इतना शानदार लिखे के लिए। पर पंकज भाई की भड़ास पर मौजूदगी इन दिनों दिख नहीं रही है। ये वो लोग हैं जो हिंदी में सही मायने में काम कर रहे हैं और नई पीढ़ी को इन दिल्ली वाले दिल वाले मजबूत पैरों वाले हिंदी वाले भाइयों से बड़ी उम्मीदे हैं।
रक्षंदा की अपील पर हम सभी जरूर ध्यान देंगे। अपनी बात सुनाने पढ़ाने के लिए गाली कितनी महत्वपूर्ण है, ये बहस का विषय नहीं है लेकिन हां, अगर आपका कंटेंट, विषय जोरदार है तो उसमें गाली न भी होगी तो चलेगा। और अगर लचर कंटेंट को गालियों के साथ परोसा जाए तो वो मस्तराम कैटगरी का लेखन बन जाता है।
दरअसल ये पूरा मामला ही दुधारी तलवार की तरह है। अगर आप तेवर में लिखते हुए गाली दे जाते हैं तो उसे दिल से नहीं लेना चाहिए। और लिखे में जबरन गाली घुसाते हैं तो वो गले के नीचे नहीं उतर पाता। मनीष के लेखन में मिट्टी की असली खुशबू आती है, वो खुशबू जिसमें गालियां भी हैं और गीत भी। तो हम क्यों चाहते हैं कि हम सिर्फ गीत सुनें, गालियां न सुनाई पड़ें। अगर हम इसी समाज के पार्ट हैं तो हमें इस समाज को संपूर्णता में लेना चाहिए।
मनीष ने कभी किसी छिछले मुद्दों या विषयों पर गालियां नहीं लिखी हैं। ये मेरा निजी विचार है। लेकिन मैं यह शिद्दत से महसूस करता हूं कि एक खास मानसिक स्तर पर पहुंचने के बाद गालियों को पचाना हर एक के बस की बात नहीं है। ये हमारे सौंदर्य बोध में कंकड़ की तरह जाकर फंस जाता है। तो इस गंभीर विषय पर मैं चाहूंगा कि जो भड़ास संचालक मंडल के बाकी साथी हैं, वो जरूर अपने विचार प्रकट करें। लेकिन ये तो तय है कि जब तक भड़ास रहेगा, इस पर गालियां होने या न होने को लेकर बहस चलती रहेगी।
कई बार ये हो सकता है कि आपके मुताबिक भड़ास न दिखे, लेकिन इसे अपने मुताबिक बनाने के लिए आपको लगातार सक्रिय रहना पड़ेगा। यही कम्युनिटी ब्लाग की सच्चाई है। मैं ढेर सारी चीजें भड़ास पर पसंद नहीं करता लेकिन मैं उस पर ऐतराज भी नहीं जताता क्योंकि भड़ास किसी यशवंत का नहीं बल्कि इससे जुड़े 250 लोगों का ब्लाग है। बाकी फिर कभी ...
जय भड़ास
यशवंत


