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19.3.09

जी, भड़ास4मीडिया अंग्रेजी पोर्टलों का भी बाप बना !

हिंदी वाले साथी हैं इस सफलता के सूत्रधार, आपको दिल से प्रणाम

कल तक कहते थे : हिंदी मीडिया की खबरों का नंबर वन पोर्टल. अब कहेंगे : भारतीय मीडिया की खबरों का नंबर वन पोर्टल। लांच होने के दो माह बाद ही हिंदी मीडिया की खबरों का सबसे बड़ा पोर्टल बन गया था भड़ास4मीडिया। अब जबकि पहला हैप्पी बर्थडे मनाने में दो माह बाकी हैं, पूरी विनम्रता से बताना चाहता हूं, भारत में मीडिया की खबरों के किसी भी भाषा के किसी भी पोर्टल से बड़ा हो गया है आपका भड़ास4मीडिया

खासकर अंग्रेजी के जितने भी पीआर नुमा पोर्टल मीडिया की खबरों के नाम पर चलाए जा रहे हैं, भड़ास4मीडिया उनको भी पछाड़ने में कामयाब हो गया है। ऐसा हम आंकड़ों के आधार पर कह रहे हैं। प्रतिदिन चार लाख हिट्स और पचास हजार पेज व्यू के चलते भड़ास4मीडिया ने यह बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भड़ास4मीडिया को जब पिछले साल मई महीने के अंतिम सप्ताह में शुरू किया था, तो मुझे कतई अंदाजा नहीं था कि यह पोर्टल साल पूरा होने से पहले ही देश के सभी, अंग्रेजी के भी, दिग्गज पोर्टलों को मात देकर नंबर वन की कुर्सी पर पहुंच जाएगा।

यह हिंदी भाषा और हिंदी मीडियाकर्मियों के चलते हुआ, यह मैं गर्व से कह सकता हूं। इस उपलब्धि के पीछे सिर्फ और सिर्फ आप हैं। हिंदी की जय हो। हिंदी वालों की जय हो। आपने न सिर्फ सच्ची खबरों, सूचनाओं और जानकारियों को यथाशीघ्र हम तक पहुंचाकर इस पोर्टल को अपडेट व जीवंत बनाए रखने में योगदान दिया बल्कि जब-जब भी हम लोगों को निराशा हुई, धमकियां मिली, अवसादग्रस्त हुए, आपके सपोर्ट-उत्साह के बदौलत फिर ऊर्जावान होकर काम में जुटे। सच कहूं तो भड़ास4मीडिया की ताकत वो आम मीडियाकर्मी ही हैं जो अपने-अपने संस्थानों में तमाम तरह की विसंगतियों के बीच बेहतर करने-रचने की कोशिश करते हैं। मार्केटिंग क्षेत्र के कई गुरुओं ने मुझे बार-बार समझाया कि मीडिया संस्थानों के प्रबंधन के पक्ष में खड़े होइए ताकि आपको उनसे विज्ञापन मिल सके और पोर्टल को प्राफिट ओरिएंटेड बनाया जा सके। लच्छेदार बातें सुनकर कई बार मन मचला लेकिन जब-जब दुविधाग्रस्त हुआ, किसी दूर के मीडियाकर्मी साथी की ऐसी दुखभरी कहानी मेल पर देखता जिसे पढ़ने के बाद अमानवीय और अंधे प्रबंधन से घिन होने लगती। तब 'प्रबंधन और पैसे की ऐसी-तैसी' कहते हुए आम मीडियाकर्मियों के पक्ष में और तगड़े से खड़ा हो जाता।

प्रबंधन का पक्ष देने से गुरेज नहीं है, मीडिया हाउसों की अच्छाइयां प्रकाशित करने से परहेज नहीं है लेकिन आम मीडियाकर्मियों की आवाज न उठाने की कीमत पर प्रबंधन का फेवर भड़ास4मीडिया को कतई नहीं चाहिए, यह बिलकुल साफ-साफ कहना चाहता हूं। एक बात मीडिया के साथियों से भी कहना चाहूंगा। भड़ास4मीडिया से कई बार बहुत ज्यादा अपेक्षाएं कर लेते हैं आप। बिहार के एक टीवी पत्रकार साथी ने मेल के जरिए जानकारी दी कि उनके चैनल का एक ब्यूरो चीफ ज्यादा विज्ञापन दिलाने के चलते दूर बैठे बास का खास हो गया है। इस वरदहस्त के चलते मनमानी पर उतारू है। सबको झिड़कता और डांटता रहता है। केवल एक को बख्शता है और वह बास के साथ केबिन के अंदर कई घंटे बैठी रहती है, दरवाजा बंद करके। उस साथी की जिद थी कि यह खबर मैं हर हाल में प्रकाशित करूं पर यह अनुरोध करना भी नहीं भूले कि उनका नाम किसी रूप में सामने नहीं आना चाहिए। भई, जब महिला पत्रकार ने कोई शिकायत नहीं की, आप अपने नाम से छपवाना नहीं चाहते तो फिर खबर कैसे बनती है यह?

प्रिंट के एक साथी ने लंबी खबर भेजी कि उनके स्थानीय संपादक जी अपने केबिन में दिन भर पूजा करते रहते हैं और अंधविश्वास की खबरों को बढ़ावा देते हैं, उनके चलते बहुत सारे लोग परेशान है....आदि-आदि। वे भी जिद करते रहे कि इसे प्रकाशित करिए। अमां यार, क्यों नान न्यूज को न्यूज बनवाते हो। जिंदगी जीने का हर आदमी का अपना तरीका होता है। हर बास से ज्यादातर अधीनस्थ परेशान रहते हैं। क्या इसी आधार पर खबरें बनने लगे? फिर तो आप भी जब बास बनोगे तो ढेर सारे लोग आपसे परेशान रहेंगे। दिक्कत कई बार हमारे-आप के अंदर होती है लेकिन दोष मढ़ने के लिए दूसरे का सिर तलाशते रहते हैं। बास बेचारा सबसे आसान शिकार होता है।

ऐसा नहीं कि बास बदमाश नहीं होते बल्कि कहावत यही है कि बास बदमाशी भी करे तो उसे राइट सर कहिए। भड़ास4मीडिया ने कई बास लोगों को पोल खोली है, लेकिन तथ्यों के साथ, पत्रकारीय पैमाने को अपनाते हुए। एक तरह से कहा जाए तो मीडिया के लिए देश का हर विभाग, संस्थान, तंत्र खबर का पार्ट होता है जिसे उसके रिपोर्टर कवर करते हैं तो भड़ास4मीडिया के रिपोर्टरों के लिए एकमात्र बीट मीडिया है। तो कहीं न कहीं हमारे-आपके बीच में एक चीज साझा है वह है पत्रकारीय कसौटी, पत्रकारीय मर्यादा, पत्रकारीय गरिमा। हम दोनों कोशिश करें इसे ज्यादा से ज्यादा अपनाने की।

भड़ास4मीडिया शुरू करते वक्त मेरे दिमाग में मकसद के रूप में क्रांति करना कतई नहीं था और आज भी नहीं है। थोड़ा सा पीछे ले चलूंगा। दिल्ली में आए मुझे दो साल नहीं हुए हैं लेकिन शुरुआती एक साल में मुझे सौ तरह की परेशानियों और दिक्कतों को झेलना पड़ा। नतीजा हुआ कि अखबार से नौकरी गई। एक मित्र की मेहरबानी से मोबाइल कंपनी में मार्केटिंग के फील्ड में काम करने निकला। मार्केटिंग के गुन सीखने-आजमाने के साथ-साथ भड़ास ब्लाग के जरिए वेब ज्ञान भी सीखता रहा। तो कंटेंट, तकनालजी और मार्केटिंग को मिलाकर भड़ास ब्लाग से आगे की चीज, मीडिया सूचनाओं का एक पोर्टल प्लान किया और तुरत-फुरत एक्जीक्यूट भी कर डाला। 40 हजार रुपये के शुरुआती निवेश से शुरू हुआ भड़ास4मीडिया अब अपने ही आमदनी के बल पर एक अलग छोटे-मोटे आफिस से संचालित हो रहा है, एक टीम काम कर रही है, हम लोगों का दिल्ली में दाल-रोटी का खर्चा निकल जा रहा है, कंप्लीट जाब सैटीसफेक्शन के सुख को इंज्वाय कर रहे हैं। हम भदेस और देहाती टाइप लोगों के लिए दिल्ली की छाती पर पैर धंसाकर इतना सुख पा लेना, मेरे खयाल से ठीक-ठाक हिसाब-किताब है। कहने का आशय ये कि मीडिया की गंदगी साफ करने की मंशा से यह पोर्टल नहीं शुरू किया गया, जैसा की कई आदर्शवादी पत्रकार साथी सोचते-कहते हैं। वैसे, कहने को मैं भी गाल बजा सकता हूं कि यह क्रांति का मंच है, आदर्श पत्रकारिता का प्रहरी है पर मुझे इस तरह की शाब्दिक लफ्फाजियों से हमेशा से चिढ़ रही है। जो सच है उसे साहस के साथ कहना चाहिए। मैं हमेशा यही कहना चाहूंगा कि यह पोर्टल मेरी मजबूरियों की उपज है। या, मेरे प्रयोगधर्मी स्वभाव की देन है। या, मीडिया की अच्छी-बुरी सूचनाओं को समान भाव से सबके सामने रखने की अवचेतन सोच का प्रतिफलन है। या फिर भड़ास ब्लाग से आगे जाकर हिंदी वेब के फील्ड में एक प्रयोग करने की इच्छा का मूर्त रूप है। ...जो भी कह लीजिए।

तो मैं कह रहा था कि भड़ास4मीडिया का मकसद मीडिया में क्रांति करना कतई नहीं रहा है। यह पोर्टल मीडिया के एडिटोरियल सेक्शन से जुड़े लोगों की सूचनाओं, गतिविधियों, जानकारियों को एक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया। हम पत्रकार अफवाहों और कनबतियों के आधार पर अपने प्रोफेशन की सूचनाओं-खबरों को पाने के आदी रहे हैं जिसमें ज्यादातर सूचनाएं झूठी या फिर नमक-मिर्च लगाकर उड़ाई-फैलाई जाती रही हैं। भड़ास4मीडिया ने मीडिया के अंदरखाने चलने वाले खेल-तमाशे के सच-झूठ को ईमानदारी से आप तक पहुंचाने की कोशिश की है। इन खबरों के आने से कई बार स्वनामधन्य मान्यवरों के चेहरे की चमक कम हुई है और इसके चलते वे लोग हम लोगों को तरह-तरह से धमकाने-चेताने को प्रेरित हुए हैं लेकिन हमने किसी के त्वरित गुस्से के कारण रिएक्शन में जाकर कुछ अनाप-शनाप लिखने-करने से परहेज किया। धैर्य के साथ दूसरे पक्ष की बातों को भी सुना गया और उसे ईमानदारी के साथ प्रकाशित भी किया गया।

किसी भी नए उद्यम, उपक्रम, मंच या संगठन को चलाने के लिए आर्थिक मदद बेहद जरूरी होता है। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि जिन लोगों को मैंने अपना समझा था, जो लोग मेरे 14 साल के पत्रकारीय जीवन की घनिष्ठ दोस्ती की उपलब्धि थे, जिनका मैंने हर संभव भला किया, जो मेरे सबसे करीब व खास हुआ करते थे, उन लोगों में से दो तिहाई से ज्यादा ने भड़ास4मीडिया के शुरू होने के बाद मेरी किसी तरह से कोई मदद नहीं की। आर्थिक तो छोड़िए, नैतिक मदद तक देने में कंजूसी बरती। जिन लोगों से जुमा-जुमा दो-चार महीनों का परिचय रहा, नेट के जरिए दोस्ती हुई, भड़ास ब्लाग के जरिए अपनापा हुआ, भड़ास4मीडिया के कारण परिचय हुआ, उन सभी ने मेरी हर तरह से मदद की और ऐसे ही लोगों के चलते भड़ास4मीडिया आज न तो घाटे में है और न ही हम लोग भुखमरी के कगार पर हैं। इन सभी लोगों का हृदय से धन्यवाद। आप लोगों को भी सबक ले लेना चाहिए। जिसे आप अपना मानते हैं, जरा टेस्ट लेकर देखिए, कहीं किसी लालच से तो आपसे नहीं जुड़े हैं वे जनाब। वो लालच बहुत छोटा भी हो सकता है। इतना छोटा कि आप से रोजाना वे दो घंटे बात कर अपना मूड फ्रेश कर लेते हों, अपनी भड़ास निकाल लेते हों और आप इसलिए झेलते रहते हैं कि मेरे प्रिय हैं। जिंदगी है बाबू। हर रोज कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। हम देहाती तो भोग-भोग के ही सीखते हैं। जितना झेलते हैं, उतना सीखते जाते हैं। बस, गिरने पर हिम्मत न हारिए। उठिए, धूल पोंछिए और फिर जुट जाइए सामने वाले को पटकने में।

भड़ास4मीडिया के लिए देश के कई हिस्सों में मीडियाकर्मी कंटेंट व विज्ञापन के लिए कार्य कर रहे हैं। इसके जरिए वे भड़ास4मीडिया को मजबूती देने के साथ-साथ अपने लिए भी एक नया विकल्प तैयार कर रहे हैं। इससे लगता है कि भड़ास4मीडिया का सेकेंड फेज शुरू हो गया है, विस्तार का। हमें हर जिले में ऐसे साथी चाहिए। भड़ास4मीडिया पर विज्ञापन देकर कई मैग्जीनों-अखबारों-संस्थानों ने अपनी पहचान, धमक और संपर्क बनाने-बढ़ाने में सफलता हासिल की है। कम पूंजी वाले अखबारों-मैग्जीनों-संस्थानों के लिए भड़ास4मीडिया ने बेहद कम दर पर विज्ञापन प्रकाशित करने की व्यवस्था शुरू की है। देश भर के हजारों छोटे-मझोले मीडिया हाउसों के संचालकों से अपील करना चाहूंगा कि वे भड़ास4मीडिया को अपने मंजिल का हमराही मानें। अपने मीडिया माध्यम की पहचान बढ़ाने व विस्तार करने के लिए भड़ास4मीडिया की मदद लें।

पत्रकार साथियों से कहना चाहूंगा कि सिर्फ नौकरी पर टिके रहने के बजाय अब अपने लिए भी कुछ काम शुरू करने का मन बनाएं। बाटी-चोखा डॉट कॉम से लेकर तंदूरी चिकन का ठेला लगाने तक की योजना मेरे दिमाग में चलती रहती है लेकिन वक्त नहीं मिलता कि और कुछ करूं। काम कोई छोटा और बुरा नहीं होता। हर छोटा काम एक दिन बड़ा बनने की संभावना रखता है। जरूरत केवल साहस, सोच और समझ की होती है। व्यापार (बिजनेस, उद्यम) को नौकरी से हमेशा अच्छा माना गया है। हिंदी पट्टी वालों की नौकरी करते रहने की ट्रेडिशनल सोच को अब बदलने की जरूरत है। बिना एमबीए किए एमबीए वालों से ज्यादा अच्छा बिजनेस करके दिखाने की जरूरत है और यह माद्दा हिंदी वालों में है। मंदी, छंटनी और नो वैकेंसी के इस दौर में जो भी पत्रकार साथी कुछ नया करना चाहेगा, भड़ास4मीडिया उसे हर तरह से मदद करने को तैयार रहा है और रहेगा। अब जबकि भड़ास4मीडिया देश भर के मीडियाकर्मियों के बीच पहुंचने वाला नंबर वन पोर्टल हो गया है, मैं इंतजार कर रहा हूं कुछ ऐसे साथियों का जो भड़ास4मीडिया के भविष्य के साथ अपना भविष्य देख रहे हों और नया रचने (विजन), नया बनाने (तक्नालजी), मुद्रा उपजाने (सेल्स), खबर लिखने (कंटेंट) से लेकर नाजायज के खिलाफ सड़क पर उतर कर जंग लड़ने तक का हर काम सहज भाव से करने को तैयार हों। धरती वीरों से खाली नहीं है, यह मैं हमेशा मानता रहा हूं, जरूरत बस वीरों को तलाश पाने का है।

उम्मीद करता हूं आप सभी मेरे लिखे की गल्तियों को माफ करेंगे और अच्छाइयों को याद रखेंगे। मैं उन सभी लोगों को माफ कर चुका हूं जिन्होंने कभी किसी तरह से मेरा अहित किया है। मैं हमेशा आगे देखता हूं।

मुश्किलें बहुत हैं पर हौसला है, पंख कटे हैं पर जज्बा-जुनूं है।।

हर दिन युद्ध-सा लड़ता-जीता हूं, हर दिन नया सबक सीखता हूं।।

गर न रहे तो भी रहेगी बात, याद रहेंगे कुछ को मेरे जज्बात।।

भई, अभी लिखा है, अपना ही शेर है :) तवज्जो चाहूंगा, yashwant@bhadas4media.com This e-mail address is being protected from spambots, you need JavaScript enabled to view it पर मेल का इंतजार करूंगा।

आभार के साथ

यशवंत

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(साभार- भड़ास4मीडिया)

इस मौके पर मैं अपने सभी नए-पुराने, पूर्व-वर्तमान भड़ासी साथियों को दिल से याद करना चाहूंगा, आभार जताना चाहूंगा जिनके सहयोग-समर्थन के बदौलत ही भड़ास ब्लाग के बाद भड़ास4मीडिया शुरू कर सका, और आज यह पोर्टल देश के किसी भी मीडिया न्यूज पोर्टल से बड़ा बन चुका है। ...यशवंत

24.10.08

सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन

Written by B4M Reporter
Friday, 24 October 2008 01:30

एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।

इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।

दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।

बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।

भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।

विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''

लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।

बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।

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अगर आप भी कोई ब्लाग या वेबसाइट या वेब पोर्टल चलाते हैं और वेब पत्रकार संघर्ष समिति में शामिल होना चाहते हैं तो aloktomar@hotmail.com पर मेल करें। वेब माध्यमों से जुड़े लोगों का एक संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। आप सबकी भागीदारी का आह्वान है।
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((इस पोस्ट को कापी करके आप अपने-अपने ब्लागों-वेबसाइटों पर प्रकाशित करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह संदेश पहुंचाया जा सके और वेब माध्यम के जरिए सुशील कुमार की लड़ाई को विस्तार दिया जा सके।))
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29.7.08

फूल और कांटे

कुछ ऐसे बदनसीब होते हैं जिनके जीवन में फूल हैं पर फ़िर भी आंखो में आंसू तैरते हैं पता है क्योंकि कांटो वाला हिस्सा उनका होता है और उन्हें फूल भी चुभन ही दे रहे होते हैं। आप कम कर सकते हैं इसकी आंखो का एक आंसू और कांटो की चुभन को अपनी प्रेमिका के लिये एक फूल खरीद कर..................






15.7.08

मुंबई की रात को बयान करती ये तस्वीरें...........

जब अक्खा दुनिया सोती है तो मुंबई जागता है, ऐसा मुंबई वाले कहते हैं । मुंबई से जो बाहर रहते हैं वो इसे सुनते हैं और मानते हैं, मगर इनके जागने का क्या कारण है...... इनका मायानगरी होना, मायानगरी की चमक दमक, ग्लेमर को लुभाती रात या फ़िर कुछ और ????

दुनिया सोये या जगे, माया का पता लग सके.....





मायानगरी की माया तो ट्रेन है



मुंबई के स्टेशन बन्दों की दरगाह




लाइफलाइन यानी मुंबईरेल और स्टेशन यानी पल पल का जीवन




मुंबई का सच, रात को जगते ये माली कि मुंबई को दिन में खुशबू दे सकें।


ये एक सच उनके लिए जो मुंबई कि माया में जा के खो जाना चाहते हैं मगर हकीकत से अनजान. क्या इन तस्वीरों को हम अपने जीवन से आत्मसात कर सकते हैं ? क्या सरकार, प्रशासन के साथ आम जन के कर्त्तव्य की सीमा रेखा से परे हैं ?विचार विचार और सिर्फ विचार नहीं मित्र कार्य की दरकार है और ये मुंबई की कहानी नहीं हमारे हिन्दुस्तान की जुबान है. विकसित भारत, शक्तिशाली भारत, अणु और परमाणु वाला भारत मगर जिसकी रीढ़ की हड्डी ये तस्वीरें हैं. हमारे देश की हमारी तस्वीर।

जय जय भड़ास