Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

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5.2.09

सभी ब्लागरों से निवेदन, कृपया इसे पढ़ें और मुझे सलाह दें

दोस्तों, पिछले दिनों भड़ास से हटाए गए कुछ साथियों ने विरोध के लिए बाकायदा एक ब्लाग बनाकर हर दो दिन में एक पोस्ट यशवंत सिंह के खिलाफ डाल रहे हैं। इन पोस्टों में यशवंत सिंह को देश का सबसे बड़ा बनिया, दलाल, कमीशनखोर, स्वार्थी, धंधेबाज बताया जा रहा है और इसके पीछे वजह यह बताया जा रहा है कि भड़ास ब्लाग बनाकर और इस मंच का इस्तेमाल करते हुए भड़ास4मीडिया बनाकर और भड़ास4मीडिया के बाद अब प्रधानजी डाट काम लांच कर पैसा क्यूं कमाने लगा हूं। अगर कमा रहा हूं तो उसमें उन लोगों को क्यों नहीं दिया जा रहा है जो भड़ास से जुड़े हुए हैं या जुड़े रहे हैं।

जो लोग ये सब आरोप लगा रहे हैं, लिख रहे हैं, उनकी पीड़ा को मैं समझ सकता हूं। ये लोग जब भड़ास में थे तो इसी ब्लाग पर गूगल के विज्ञापन लगाए रखता था और उसका एक बार पांच हजार रुपये का चेक भी आया लेकिन मजेदार है कि आजकल तो इस ब्लाग पर कोई कामर्शियल विज्ञापन भी नहीं हैं। जो हैं वे होम एड हैं या ब्लागों के लिंक हैं। दूसरी चीज, ब्लागिंग में आने के बाद इसकी आगे की संभावनाओं को देखते हुए डाट काम पर आया और भड़ास4मीडिया शुरू किया। इसके लिए न सिर्फ 45 हजार रुपये महीने की नौकरी छोड़ी बल्कि एक चुनौती लिया जिसमें फेल होने पर सड़क पर आ जाने का पूरी तरह खतरा था। शुरुआती दिक्कतों के बाद मामला संभलता गया और निःसंदेह भड़ास4मीडिया के बनने बढ़ने और मुझे संभालने में ऐसे कई साथियों का हाथ है जो किन्हीं कारणों से अब भड़ास ब्लाग के सदस्य नहीं हैं।

खैर, शुरू में इनके लिखे को ये मानकर उपेक्षित करता रहा कि भड़ास से हटाए जाने के चलते यह स्वाभाविक तात्कालिक गुस्सा है जो कुछ दिनों में शांत हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इन लोगों का यशवंत को दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक (दुर्गुणों, बुराइयों और कमीनगी का शहंशाह) बनाना जारी रहा। इन लोगों से मेल के जरिए और एसएमएस के जरिए अनुरोध किया कि भइयों, मान जाओ। पर मेरे अनुरोध को मेरा बनियापा समझकर ये लोग और उग्र हो गए और लगे दे दनादन कलम तोड़ने। इस प्रकरण पर मैं कोई निर्णायक स्टैंड लेना चाहता हूं। इसके लिए, मैंने कल दिन भर अपने कई वरिष्ठ अग्रजों, साथियों से विचार-विमर्श किया तो उनके अलग-अलग सुझाव आए। पहले सुझाव पढ़ें--

  1. एक का कहना था कि जब आप मशहूर होने लगते हैं, आपकी स्वीकृति बढ़ने लगती है, आपका नाम होने लगता है तो कुछ जले-भुने लोग आपको टारगेट पर ले लेते हैं और कुछ भी उटपटांग लिखते बकते करते दिख-मिल जाते हैं। इनका एक ही इलाज है, अंतिम हद तक इग्नोर करिए। जितना रिएक्ट करेगे उतना ये उग्र होंगे क्योंकि इससे इनका मंशा सधता है।
  2. दूसरे का कहना था कि इन लोगों ने वाकई हद कर दी है। साइबर सेल में रिपोर्ट दर्ज कराकर समुचित इलाज करवा देना चाहिए।
  3. तीसरे का कहना था कि यार यशवंत, तुम्हारे पर पहले ही कई तरह के आरोप लगते रहे हैं और उन आरोपों से तुम खुद मजबूत हुए, आरोप लगाने वाले नहीं। होने दो, इससे तुम्हारी चर्चा बनी रहेगी और आज की दुनिया में जो चर्चा या कुचर्चा में नहीं होता वो समझ लो मार्केट या मेनस्ट्रीम से बाहर है।
  4. चौथे साथी ने मुझसे ही पूछ दिया कि क्या किसी अनाम मंच पर आप दूसरों के लिखे चूतियापों को पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते हैं? अगर निकाल पाते हैं तो फिर आपसे बड़ा कोई चूतिया नहीं है। आप सार्थक चीजों को पढ़िए। नेट पर निर्रथक का तो अंबार लगा हुआ है। बुरा पढ़ेंगे देखेंगे सोचेंगे तो बुरा बनेंगे।
  5. पांचवें साथी का कहना है कि यह चरम खंडन का दौर है। इन दिनों हर वो नई चीज जो अलग हट के बनने या बनाने की कोशिश की जा रही है, वो निशाने पर है और उसे तब तक निशाने पर रखा जाता है जब तक उसे तोड़ नहीं दिया जाता या उसे खत्म नहीं कर दिया जाता। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि विरोध करने वालों का विरोध करने की बजाय नई चीज को और ज्यादा मजबूत करने, आगे ले जाने में जोर लगाना चाहिए ताकि प्लस में सृजन रहे, विरोध नहीं।
  6. छठें साथी का कहना है कि बेटा यशवंत, तुमने भी बहुत लोगों को गरियाया है, अब झेलो। ईश्वर इसी दुनिया में सबके साथ न्याय करता है। ये तुम्हारे लिए वाकई प्रायश्चित का वक्त है।
  7. सातवें सज्जन के मुताबिक भड़ास जिस गाली-गलौज का प्रतीक रहा है और उसके आप अगुवा रहे हैं तो वही गाली-गलौज अगर कहीं और से आपको मिल रही है तो इसमें इतने परेशान क्यों हैं। सोचिए उनके बारे में जिन लोगों को आप लोगों ने गरियाकर न सिर्फ दुखी किया बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी धूमिल की। उन लोगों ने तो थोड़ा भी रिएक्ट नहीं किया और न पुलिस में रिपोर्ट लिखाने गए। अगर अभिव्यक्ति की इतनी ही आजादी की बातें करते हैं तो खुद को भी गरियाया जाने का स्वागतद करिए।
  8. आठवें मित्र का कहना है कि उन लोगों के लिखे को कोई नहीं पढ़ रहा है, तुम खुद अपने मित्रों को यूआरएल देकर पढ़वा रहे हो। दूसरी बात, अगर कोई पढ़ता भी है तो वो तुम्हारे बारे में तो धारणा बाद में बदलेगा या बनाएगा, जो लिख रहे हैं, उनके बारे में धारणा पहले बना लेगा इसलिए समझो मुनाफे में तुम्हीं हो। तुम्हें तो कायदे से अपने विरोध के ब्लागों का लिंक भड़ास पर लगा देना चाहिए, ये कहते हुए कि ये हैं मेरे खुले विरोधी, जिनका मैं स्वागत करता हूं, अगर आप भी मेरे खिलाफ लिखना चाहें तो इस क्लब में जुड़ जाएं। ऐसा अगर कर दिया तो समझो वाकई तुम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यक्ति बन जाओगे, जो बनना अभी बाकी है।
  9. एक अन्य दोस्त का कहना है कि यशवंत गल्ती तो तुम्हारी भी है। आप किसी को यूं ही निकाल दोगे तो उसका रिएक्ट करना स्वाभाविक है। इस प्रकरण से ही पता चलता है कि तुम भी कच्चे खिलाड़ी हो। पक्का खिलाड़ी अपने नजदीकियों को कभी नाराज नहीं करता। जो कच्चे खिलाड़ी होते हैं, वो आपस में ही लड़ जाते हैं। तो बच्चा, अभी खेल खेलना कायदे से सीख। ऐसे नहीं चल पाओगे दिल्ली में।
  10. एक सलाह ये थी कि आप लोग उनके बार बार लिखने के बावजूद उत्तेजित नहीं हो रहे हो, भड़ास पर उनके खिलाफ गालियां नहीं लिख रहे हो, उनसे पंगा नहीं ले रहे हो, यही चीज तो उन लोगों को परेशान किए जा रही है। जब जब आप उनको नोटिस करेंगे, उनके लिखे पर रिएक्ट करेंगे, तब तक उनका मकसद हल होता जाएगा। आप लोग प्लीज, चुपचाप अपना काम करें।
  11. एक दार्शनिक सलाह ये थी कि इसी दिल्ली में कोई यशवंत सिंह रिक्शाचालक भी होगा। अगर उसके खिलाफ कोई ब्लाग बनाकर लिखना शुरू कर दे तो उस रिक्शाचालक को ता-उम्र न पता चले कि उसके खिलाफ लिखा जा रहा है। कोई अगर उसे बता भी दे कि ऐ रिक्शावाले भइया, तुम्हे एक ब्लाग पर गंदी गंदी गालियां दी गई है, तो भकुवा कर इधर उधर ताकेगा, उसे समझे में नहीं आएगा कि गाली कहां दी गई है। तो यशवंत जी, आप भी भकुवाना सीखिए। खुद को रिक्शाचालक मानिए और कुंठितों को विष वमन कर अपना मन हल्का करने का मौका देते रहिए। अगर आप रिएक्ट करेंगे तो उनका मन फिर भारी हो जाएगा और भर जाएगा इसलिए अपना काम करिए।

इतने सारे मत आने के बाद आपकी तरह मैं भी कनफ्यूज हूं, इसीलिए ये पोस्ट लिख रहा हूं। इस मामले में क्या किया जाना चाहिए। बात यहां किसी यशवंत सिंह को किसी ब्लाग पर गाली लिखे जाने की नहीं है। ऐसे मामले में हम जैसे ब्लागर को क्या एथिकल या लीगल या मोरल स्टैंड लेना चाहिए। अभी तक के जो उदाहरण हैं वो ज्यादातर साइबर पुलिस के जरिए आरोपी ब्लागर को पकड़ने के रहे हैं।

मैं आप सभी ब्लागरों के दरबार में अपने लिए गुहार लगा रहा हूं, प्लीज, मुझे गाइड करें। इस पोस्ट को पढ़ने वाले हर शख्स से विनती करता हूं कि अपनी राय कमेंट के रूप में नीचे जरूर दे ताकि मैं कोई भी अगला कदम निजी भावावेश में उठाने के बजाय अन्य लोगों की राय के आधार पर उठाऊं जिससे यह मसाल एक नजीर बन सके।

आभार के साथ
यशवंत सिंह

1.4.08

हम 250 भड़ासीः नए लोग बोलें, थोड़ा मुंह तो खोलें

भड़ास की सदस्य संख्या आज 250 पहुंच गई। इस मौके पर सभी नए पुराने भड़ासियों को बधाई।

नए भड़ासियों से आग्रह, अनुरोध, निवेदन और आह्वान है कि वे लिखना शुरू कर दें, लगातार, रोज रोज। अपना गला खंखारिये, सुर ताल खींचिए और उगल दीजिए पतले या मोटे राग में। इन 250 लोगों में से 100 लोग भी रेगुलर नहीं लिखते, ये ठीक बात नहीं है। भड़ास की ये सदस्य संख्या सिर्फ ताकत दिखाने के लिए, बौद्धिकों पर बाहुबल आजमाने के लिए नहीं होनी चाहिए बल्कि वाचा फोड़ने, लिखने, पढ़ने, बताने, सुनाने के लिए होना चाहिए। हम हिंदी पट्टी वालों के पास दुखों सुखों की पूरी गठरी भरी पड़ी है जिसे हमें एक एक कर खोलना चाहिए। बिना झिझक, बिना शरम।

आप यकीं मानिए, आप बेहद काबिल लोगों में से हो, पर आप सिर्फ हिंदी जानने के कारण थोड़े डिप्रेस्ड, थोड़े दबे, थोड़े कुचले, थोड़े कुंठित, थोड़े इंट्रोवर्ट, थोड़े देसज से लगते दिखते या महसूस करते हैं। ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। आप हम पुराने भड़ासियों को देखिए, बेशरमी से अपनी बात कहते हैं और बताते हैं दुनिया वालों को कि भाई लोगों, दरअसल ये दुनिया ये देस तुम्हारा नहीं बल्कि असल में हम देसी और देसज लोगों का ही है। तो मैकाले की औलादों, तुम अपने पर इतराना बंद कर दो और हम देसज लोगों के लिए सफलता के दरवाजे पर दरबान बनकर मत खड़े होओ वरना हमारे ओज ताकत और उर्जा से तुम मूर्छित हो सकते हो।

इन बातों के साथ मैं भड़ास के मुख्य संरक्षक हरे प्रकाश जी और माडरेटर डा. रूपेश से अनुरोध करूंगा कि वो 250 भड़ासी होने के मौके पर सभी भड़ासियों को अपनी तरफ से साधुवाद, दिशा निर्देश, गाइडेंस, लाइन लेंथ प्रदान करने की कृपा करें।

कविराज नीरव जी की कविताओं की प्रशंसा किए बिना मैं नहीं रह पा रहा हूं। उम्मीद है कि वे अपना प्यार इसी तरह हम भड़ासियों पर लुटाते रहेंगे। पंकज पराशर जी के इंडिया टुडे में मधुसूदन आनंद पर लिखी रिपोर्ट को मुंबई में मैंने रेलवे स्टेशन पर पढ़ा। उन्हें दिल से बधाई, इतना शानदार लिखे के लिए। पर पंकज भाई की भड़ास पर मौजूदगी इन दिनों दिख नहीं रही है। ये वो लोग हैं जो हिंदी में सही मायने में काम कर रहे हैं और नई पीढ़ी को इन दिल्ली वाले दिल वाले मजबूत पैरों वाले हिंदी वाले भाइयों से बड़ी उम्मीदे हैं।

रक्षंदा की अपील पर हम सभी जरूर ध्यान देंगे। अपनी बात सुनाने पढ़ाने के लिए गाली कितनी महत्वपूर्ण है, ये बहस का विषय नहीं है लेकिन हां, अगर आपका कंटेंट, विषय जोरदार है तो उसमें गाली न भी होगी तो चलेगा। और अगर लचर कंटेंट को गालियों के साथ परोसा जाए तो वो मस्तराम कैटगरी का लेखन बन जाता है।

दरअसल ये पूरा मामला ही दुधारी तलवार की तरह है। अगर आप तेवर में लिखते हुए गाली दे जाते हैं तो उसे दिल से नहीं लेना चाहिए। और लिखे में जबरन गाली घुसाते हैं तो वो गले के नीचे नहीं उतर पाता। मनीष के लेखन में मिट्टी की असली खुशबू आती है, वो खुशबू जिसमें गालियां भी हैं और गीत भी। तो हम क्यों चाहते हैं कि हम सिर्फ गीत सुनें, गालियां न सुनाई पड़ें। अगर हम इसी समाज के पार्ट हैं तो हमें इस समाज को संपूर्णता में लेना चाहिए।

मनीष ने कभी किसी छिछले मुद्दों या विषयों पर गालियां नहीं लिखी हैं। ये मेरा निजी विचार है। लेकिन मैं यह शिद्दत से महसूस करता हूं कि एक खास मानसिक स्तर पर पहुंचने के बाद गालियों को पचाना हर एक के बस की बात नहीं है। ये हमारे सौंदर्य बोध में कंकड़ की तरह जाकर फंस जाता है। तो इस गंभीर विषय पर मैं चाहूंगा कि जो भड़ास संचालक मंडल के बाकी साथी हैं, वो जरूर अपने विचार प्रकट करें। लेकिन ये तो तय है कि जब तक भड़ास रहेगा, इस पर गालियां होने या न होने को लेकर बहस चलती रहेगी।

कई बार ये हो सकता है कि आपके मुताबिक भड़ास न दिखे, लेकिन इसे अपने मुताबिक बनाने के लिए आपको लगातार सक्रिय रहना पड़ेगा। यही कम्युनिटी ब्लाग की सच्चाई है। मैं ढेर सारी चीजें भड़ास पर पसंद नहीं करता लेकिन मैं उस पर ऐतराज भी नहीं जताता क्योंकि भड़ास किसी यशवंत का नहीं बल्कि इससे जुड़े 250 लोगों का ब्लाग है। बाकी फिर कभी ...

जय भड़ास
यशवंत

8.3.08

भाषा में गंदगी देखने वाले परम (चूतिया) लोगों के लिए पेश है... काशी का अस्सी

((होली आते देख भड़ास पर साथियों ने होलियाना माहौल बनाया तो मेरा भी मन अइंठ रहा है, मुझे लखेद रहा है, बोल रहा है....अबे, तू भी कुछ लिक्ख, साला केवल पढ़ पढ़ कर मने मन मुनक्का, मने मन छुहारा होता रहेगा। सो, मन की पेलाई के बाद मेरी आत्मा जगी तो खुद लिखने के बजाय टीपने की सोचना लगा। यही तो दिक्कत है हम जैसों में। भोषणी के, जब हमारे टाइप लोग लेखक-कथाकार-कवि-साहित्यकार टाइप बन नहीं पाए, तो टिपियाने में क्या जाता है, तुम लोग लिखो, मैं उसे उठाकर चेप दूंगा अपने यहां। मेरे जैसा आदमी इसी तरह सोचते हुए होली पर कुछ टिपियाने के अभियान में गूगल बाबा के सहयोग से खोजते-खाजते पहुंच गया एक साइट पर जिसमें काशी के अस्सी के कुछ अंश दिए हुए थे। सो, मैंने बिना देर किए, उस साइट को दिल ही दिल थैंक्यू थैंक्यू बोलते, लप्प से वो मैटर टीप लिया और अपन भड़ास पर चेंप दिया, इस उम्मीद में कि जो मजा पढ़ के हम लोग लिये थे, वो इस झलकी को पढ़कर आप भी ले सकेंगे और अगर मन न भरे तो एगो काशी का अस्सी खरीद लीजिएगा। तो भई, उस साइट का नाम लेकर आभार प्रकट कर देते हैं। साइट का नाम है, भारतीय साहित्य संग्रह,....मुझे उम्मीद है कि इससे प्रेरणा लेकर वो साथी जो इस वक्त कनाट प्लेस के आसपास की किसी खूबसूरत बिल्डिंग में मौज कूट रहे हैं, वो जरूर अपनी गालियों, कविताओं और मुक्तक के प्रयोग को और आगे बढ़ाएंगे। मेरे खयाल से समझदारों के लिए इशारा काफी होता है, क्यों हरे भाई, पंकज भाई, नीरव जी....:)जय भड़ास, यशवंत)


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देख तमाशा लकड़ी का
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मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है ! जो भाषा में गन्दगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद् ‘परम’ (चूतिया का पर्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएँ-

तो सबसे पहले इस मुहल्ले का मुख्तसर-सा बायोडॉटा—कमर में गमछा, कन्धे पर लँगोट और बदन पर जनेऊ—यह ‘यूनिफॉर्म’ है अस्सी का !

हालाँकि बम्बई-दिल्ली के चलते कपड़े-लत्ते की दुनिया में काफी प्रदूषण आ गया है। पैंट-शर्ट, जीन्स, सफारी और भी जाने कैसी-कैसी हाई-फाई पोशाकें पहनने लगे हैं लोग ! लेकिन तब, जब कहीं नौकरी या जजमानी पर मुहल्ले के बाहर जाना हो ! वरना प्रदूषण ने जनेऊ या लँगोट का चाहे जो बिगाड़ा हो, गमछा अपनी जगह अडिग है !
‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है ! चाहे होली का कवि-सम्मेलन हो, चाहे कर्फ्यू खुलने के बाद पी.ए.सी और एस.एस.पी. की गाड़ी, चाहे कोई मन्त्री हो, चाहे गधे को दौड़ाता नंग-धड़ंग बच्चा—यहाँ तक कि जार्ज बुश या मार्गरेट थैचर या गोर्बाचोव चाहे जो आ जाए (काशी नरेश को छोड़कर)—सबके लिए ‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ का जय-जयकार !
फर्क इतना ही है कि पहला बन्द बोलना पड़ता है—जरा जोर लगाकर; और दूसरा बिना बोले अपने आप कंठ से फूट पड़ता है।
जमाने के लौड़े पर रखकर मस्ती से घूमने की मुद्रा ‘आइडेंटिटी कार्ड’ है इसका !
नमूना पेश है—

खड़ाऊँ पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला—‘किस दुनिया में हो गुरू ! अमरीका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घण्टे-भर से पान घुला रहे हो ?’’
मोरी में ‘पंचू’ से पान की पीक थूककर बोले—‘देखौ ! एक बात नोट कर लो ! चन्द्रमा हो या सूरज—भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। तन्नी गुरू टस-से-मस नहीं होंगे हियाँ से ! समझे कुछ ?’
‘जो मजा बनारस में; न पेरिस में, न फारस में’—इश्तहार है इसका।
यह इश्तहार दीवारों पर नहीं, लोगों की आँखों में और ललाटों पर लिखा रहता है !
‘गुरू’ यहाँ की नागरिकता का ‘सरनेम’ है।
न कोई सिंह, न पांड़े, न जादो, न राम ! सब गुरू ! जो पैदा भया, वह भी गुरू, जो मरा, वह भी गुरू !
वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतन्त्र है यह :

गिरिजेश राय (भाकपा), नारायण मिश्र (भाजपा), अम्बिका सिंह (कभी कांग्रेस, अभी जद) तीनों की दोस्ती पिछले तीस सालों से कायम है और न आने वाली कई पीढ़ियों तक इसके बने रहने के आसार हैं ! किसी मकान पर कब्जा दिलाना हो, कब्जा छुड़ाना हो, किसी को फँसाना हो या जमानत करानी हो—तीनों में कभी मतभेद नहीं होता ! वे उसे मंच के लिए छोड़ रखते हैं...अस्सी के मुहावरे में अगर तीनों नहीं, तो कम-से-कम दो—एक ही गाँड़ हगते हैं।
अन्त में, एक बात और। भारतीय भूगोल की एक भयानक भूल ठीक कर लें। अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं। अस्सी ‘अष्टाध्यायी’ है और बनारस उसका ‘भाष्य’ ! पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से ‘पूँजीवाद’ के पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी ‘टीका’ हो जाए...मगर चाहने से क्या होता है ?
अगर चाहने से होता तो पिछले खाड़ी युद्ध के दिनों में अस्सी चाहता था कि अमरीका का ‘व्हाइट हाउस’ इस मुहल्ले का ‘शुलभ शौचालय’ हो जाए ताकि उसे ‘दिव्य निपटान’ के लिए ‘बहरी अलंग’ अर्थात् गंगा पार न जाना पड़े...मगर चाहने से क्या होता है ?


इति प्रस्तावना।
तो मित्रो, यही अस्सी मेरा बोधगया है और अस्सीघाट पर गंगा के किनारे खड़ा वह पीपल का दरख्त बोधिवृक्ष, जिसके नीचे मुझे निर्वाण प्राप्त हुआ था !
अन्तर्कथा यह है कि सन् ’53 में मैं गाँव से बनारस आया था। मँझले भैया रामजी सिंह के साथ। आगे की पढ़ाई के लिए। उन्हें बी.ए. प्राइवेट पढ़ना था घर की खेती-बारी सँभालते हुए। और मुझे इंटर में। वे बेहद सख्त गार्जियन थे—कुछ-कुछ प्रेमचन्द के ‘बड़े भाई साहब’ की तरह ! इस बात का भी मुझे आश्चर्य होता था और उन्हें भी कि अपने अध्यापकों से अधिक ज्ञान के बावजूद, अपने ही मित्रों को पढ़ा-पढ़ाकर पास कराने के बावजूद वे खुद फेल कैसे हो जाते हैं ?
उन्होंने एक बार अपने पास चेले को पकड़ा। रिजल्ट आया ही आया था। उन्होंने पूछा, ‘‘बे लालजी ! हम तुझे पढ़ाए, जो-जो नहीं आता था तुझे सब बताए, लिखाए, रटाए; तू पास हो गया, हम कइसे फैल हो गए ?’ लालजी बोले—‘गुरू, ऐसा है कि आप जो पढ़ाए, वह तो हम पढ़े ही। बाकी आपकी चोरी-चोरी भी कुछ पढ़े थे।’

उन्हें उसके उत्तर से संतोष नहीं हुआ। मुझसे पूछा—‘अन्दाजा लगाओ तो जरा ! क्या बात हो सकती है ? इसमें अन्दाजा लगाने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन मैं अन्दाजा लगाने लगा और नहीं लगा पाया। कारण, कि भैया के शब्दकोश में व्याकरण के लिए कोई जगह नहीं थी ! ‘ने’, ‘में’, ‘का’, ‘पर’, ‘से’ आदि को वे फालतू और बेमतलब समझते थे ! सीधे-सादे वाक्य में अड़ंगेबाजी के सिवा और कोई काम नहीं नजर आता था इनको ।...लेकिन यह बताता तो लात खाता !
बहरहाल, बात ‘निर्वाण’ की।
एक दिन भैया ने कहा—‘तुम्हारी अंग्रेजी कमजोर है। वह बातचीत होने लायक होनी चाहिए। कोई तुमसे अंग्रेजी में कुछ पूछे और तुम उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने लगो, यह अच्छा नहीं। तुम अस्सी के चुडुक्कों के साथ खेलना छोड़ो और चलो, अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करो।’

भैया मुझे इसी पीपल के पास ले आए। शाम के समय। घाट पर भीड़-भाड़ कम थी। उन्होंने मुझे एक सीढ़ी के पास बिठा दिया और कहा—‘डेली शाम को यहाँ आकर अभ्यास करो !—ऐसे !’
वे पन्द्रह गज दूर खड़े हो गए—अटेंशन की मुद्रा में और पेड़ से बोले—‘व्हाट इज योर नेम ?’ फिर पेड़ के पास ले गए और सामने देखते हुए उसी मुद्रा में बोले, ‘सर, माई नेम इज रामजी सिंह !’ फिर वहाँ से पन्द्रह गज दूर—व्हाट इज योर फादर्स नेम ?’ फिर पेड़ के पास से—‘सर, माई फादर्स नेम इज श्री नागर सिंह !’ इस तरह वे तब तक पीपल के पास आते-जाते रहे, जब तक पसीने-पसीने नहीं हो गए !
‘हाँ, चलो अब तुम ?’ वे सीढ़ी पर मेरी जगह बैठकर सुस्ताने लगे।
मित्रो ! भगवान झूठ न बुलवाएँ तो कहूँ कि अंग्रेजी बोलना तो मुझे नहीं आया, हाँ, इतना जरूर समझा कि पसीने से ज्ञान का बड़ा गहरा सम्बन्ध है !

इसीलिए जब लोग पूछते हैं कि तुम्हें इतना अधिक पसीना क्यों होता है या बूढ़े बकरे की तरह गन्धाते हो तो मैं उनकी मूर्खता पर हँसकर रह जाता हूँ। अरे भले आदमी, ज्ञानी को ज्ञानोद्रेक से पसीना नहीं आएगा तो क्या कँपकँपी छूटेगी ?
लेकिन साहब, मेरे ज्ञान की बधिया बैठा दी मुहल्ले के ‘आदिवासियों’ ने।
इधर ‘प्रामाणिक अनुभूती’ और उधर ‘भोगा हुआ यथार्थ’ और यथार्थ को पसीने से परहेज !
एक थे हमारे बापजान जो पैना उठाए हमें किताबें-कापियों में जोते रखते थे—‘सालो, खेती तो गई सरकार के ‘उसमें’। अगर यह भी नहीं करोगे तो भीख माँगोगे !’ दूसरी ओर मुहल्ले के बाप थे जो अपने बच्चों का स्कूल में नाम लिखाते थे—पढ़ने के लिए नहीं, सरकार की ओर से मुफ्त बँटने वाली ‘दलिया’ के लिए ! वे केवल ‘रेसस पीरियड’ में ही स्कूल में नजर आते।
उनका एक जीवन-दर्शन था—‘जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?’

पूरा मुहल्ला पीढ़ियों से उसी शैली से जीता चला आ रहा था—गाता-बजाता, झूमता, मदमाता ! किसी के पास कोई डिग्री नहीं, रोजगार नहीं, व्यवसाय नहीं, काम नहीं; परलोक सिधारते समय पंडित महाराज ने पत्रा-पोथी लपेटे हुए एक लाल बेठन खोंस दिया बेटे की काँख में—बस ! वे तख्त पर बेठन रखे हुए जनेऊ से पीठ खुजा रहे हैं और जजमान का इन्तजार कर रहे हैं !
जजमान रोज-रोज नहीं आते, ग्रह-नक्षत्र भी रोज-रोज खराब नहीं होते, मुंडन, शादी-ब्याह, जनेऊ जैसे संस्कार भी रोज-रोज नहीं होते और न रोज-रोज फत्ते गुरु की कन्धे पर कुम्हड़ा होता है। फत्ते गुरू कुम्हड़े का पूरा वजन उठाए हुए मुहल्ले-भर को सुनानेवाली आवाज में आत्मलाप करते आ रहे हैं—‘पालागी फत्ते गुरू !’ जय हो जजमान !’’ सट्टी गए थे का गुरू ?’ कवन भँड़ुआ सट्टी जाता है जजमान ?’ अरे तो इतना बड़ा कोंहड़ा ? हफ्ते-भर तो चलेगा ही गुरू !’ हफ्ते-भर तुम्हारे यहाँ चलता होगा। यहाँ तो दो जून के लिए भी कम है !’

मुहल्ला अपने दरवाजों, खिड़कियों, छतों से आँखें फाड़ फत्ते गुरू का कोंहड़ा देख रहा और उनके भाग्य से जल-भुन रहा है। सन्तोष है तो यह कि आज का दिन फत्ते गुरू का, कल का दिन किसी और गुरू का ! कौन जाने हमारा ही हो ?
कहते हैं, बुढ़ापे में तुलसी बाबा कुछ-कुछ ‘पिड़काह’ और चिड़-चिड़े हो चले थे। मुहल्ले वालों ने उनसे जरा भी छेड़छाड़ की, पिनक गए और शाप दे डाला—‘जाओ, तुम लोग मूर्ख दरिद्र रह जाओगे !’
मित्रो, मेरा मतभेद है इससे। शान्तिप्रिय द्वेवेदी को जितना तंग किया मुहल्ले ने, उससे अधिक तंग तो नहीं ही किया होगा बाबा को और अगर उन्हें शाप ही देना था तो जाते-जवाते इनके हाथ ‘मानस’ पोथी क्यों पकड़ा जाते ? फिर भी ये कहते हैं, तो हम मान लेते हैं; लेकिन सरापकर भी क्या कर लिया बाबा ने ? माथे पर चंदन की बेंदी, मुँह में पान और तोंद सहलाता हाथ ! न किसी के आगे गिड़गिड़ाना, न हाथ फैलाना। दे तो भला, न दे तो भला ! उधर मंदिर, इधर गंगा; और घर में सिलबट्टा ! देनेवाला ‘वह’; जजमान भोंसड़ी के क्या देगा ? भाँग छानी, निपटे और देवी के दर्शन के लिए चल पड़े।
चौके में कुछ नहीं, मगर जिए जा रहे हैं—ताव के साथ ! चेहरे पर कोई तनाव नहीं, कहीं कोई फिक्र नहीं और उधर से लौटे तो साथ में कभी-काल, एक जजमान—‘सुन बे रजुआ, खोल केवाड़ी, आयल हौ जजमान चकाचक !’’
तो साहब ! कच्ची उमर और बाला जोबन ! अपन को भा गया यह दर्शन !

काहे की है-है और काहे की खट्-खट् ! साथ तो जाना नहीं कुछ ! फिर क्यों मरे जा रहे हो चौबीसों घंटे ? सारा कुछ जुटाए जा रहे हो, फिर भी किसी के चेहरे पर खुशी नहीं ! यह नहीं है, तो वह नहीं है ! इसे साड़ी, तो उसे फ्रॉक, तो इसे फीस, तो उसे टिफिन, तो इसे दवा, तो उसे टॉनिक, तो इसे...कुछ करो तब भी और न करो तब भी यह दुनिया चल रही है और चलती रहेगी...
प्यारेलाल ! अपनी भी जिन्दगी जियो, दूसरों की ही नहीं !
ऐसे में ही गया था सब्जी लेने अस्सी पर ! लुंगी और जाकिट पहने हुए !
लगभग दो बजे दोपहर।
सन् ’70 के जाड़ों के दिन।
सलीम की दुकान पर खड़ा हुआ ही था कि सड़क से आवाज आई—डॉक्टर !
मैंने मुड़कर देखा तो एक परिचित मित्र ! रिक्शे पर ! इससे पहले एक-दो बार की ही भेंट थी उससे।
मैं पास पहुँचा तो उसने पूछा, ‘आवारगी करने का मन है डॉक्टर ?’
‘क्या मतलब ?’

‘कहीं चलना चाहते हो ? कलकत्ता, बम्बई, दार्जलिंग, कालिंगपाँग, नेपाल कहीं भी !’
मैं चकित ! बोला—‘रुको ! सब्जी देकर आते हैं तो बात करते हैं।’
उसने रिक्शे पर बैठे-बैठे मेरा हाथ पकड़ा—‘एक बात का उत्तर दो। महीने में कितने दिन होते हैं ? तीस दिन। इनमें से कितने दिन तुम्हारे अपने दिन हैं ? ‘अपने’ का मतलब जिसमें माँ-बाप, भाई-बहन, बीवी, बेटा-बेटी किसी का दखल न हो। जैसे चाहो, वैसे रहो, जैसा चाहो, वैसा जियो।’
मैं सोच में पड़ गया।
‘एक दिन, दो दिन, तीन दिन ?’ वह उसी गम्भीरता से बोलता रहा।
मैं चुप।

‘सुनो ! महीने के सत्ताइस दिन दे दो बीवी को बाल-बच्चों को, पूरे खानदान को ! उनसे कहो कि भैया, ये रहे तुम्हारे दिन ! लेकिन ये तीन दिन मुझे दे दो। मेरी भी अपनी जिन्दगी है, उसके साथ जुल्म न करो, समझा ?’
‘और सुनो ! कार्यक्रम बनाकर जीने में तो सारी जिन्दगी गँवा रहे हैं हम ! हम घर से निकलते ही कहते हैं कि सुनो, अमुक जगह जा रहे हैं और इतने बजे आएँगे। और कहीं बाहर जाना हुआ तो हफ्ते-भर के राशन-पानी, साग-सब्जी का बन्दोबस्त करके जाते हैं !...इन सबका कोई मतलब है क्या ? आवारगी करने का भी कार्यक्रम बनाया जाता है क्या ?’
‘ठीक है यार ! मैं सलीम को बता तो दूँ कि सब्जी पहुँचा के घर पर बोल देगा !’
‘लो, फिर वही बात ! अरे, जिन्हें खाना है, वे ले जाएँगे; चलो तुम !’
‘अच्छा चलो !’ मैं भी बगल के रिक्शे पर बैठ गया—‘तुम भी क्या कहोगे ?’

और साहब ! मैंने सोचा था कि शहर से ही कहीं सिनेमा वगैरह देख-दाखकर शाम नहीं तो रात तक लौट आएँगे, लेकिन पहुँच गए पंजाब मेल से सचमुच कलकत्ता, वहाँ के डायमंड हार्बर, फिर वहाँ से काकद्वीप। छककर रास्ते-भर खाया-पिया—मौज मनाई ! पसीने के बगैर जिन्दगी का मजा लिया।...वही लुंगी और जाकिट, हवाई चप्पल, जेब में दस नए पैसे। आन का आँटा, आन का घी। भोग लगावैं बाबाजी !
पाँच दिन बाद लौटे थे घर !
मौज तो बहुत आई, लेकिन लौटानी ट्रेन में ही एक दूसरा ज्ञानोदय हुआ।
जो भी तुम पर पैसा खर्च करता है, वह तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए। प्यारेलाला ! ट्रेन छूटनेवाली है, लपक के जरा दो टिकट तो ले आओ !...जरा उस तरफ बैठ जाओ तो थोड़ा बदन सीधा कर लें...यार, कैसे दोस्त हो, कहीं से एक गिलास पानी नहीं पिला सकते ?...जरा वो तौलिया तो पकड़ाना, ‘फ्रेश’ हो लिया जाए ?...गुरू, सिगरेट तो है मगर माचिस छूट गई, डिब्बे में नजर दौड़ाओ ! कोई-न-कोई जरूर बीड़ी सिगरेट पी रहा होगा !...अगर आप दोस्त के लिए इतना भी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ?

घर में ऐसा कुहराम मचा था कि न पूछिए ! कई दिनों से चूल्हा नहीं जला था और बीवी ने बेवा होने की पूरी तैयारी कर ली थी !
मुझे जल्दी ही अहसास हो गया कि माया-मोह के जंजाल में फँसा मैं—अस्सी का प्रवासी—इस दर्शन के काबिल नहीं !
अस्सी पर प्रवासियों की एक ही नस्ल थी शुरू में—लेखकों-कवियों की !
आजादी के बाद देश में जगह-जगह ‘केन्द्र’ खुलने शुरू हो गए थे—‘मुर्गी-पालन केन्द्र’, ‘मत्स्य पालन केन्द्र’, ‘सुअर-पालन केन्द्र’, ‘मगर-घड़ियाल-पालन केन्द्र’। इन कवियों-लेखकों ने भी अपना एक केन्द्र खोल लिया—केदार चायवाले की दुकान में। ‘कवि-पालन केन्द्र’। कोई साइनबोर्ड नहीं था, लेकिन जनता इसे इसी रूप में जानती थी। सुबह हो या दोपहर या शाम—केदार, विजयमोहन, अक्ष्योभ्येश्वरी प्रताप, शालिग्राम, अधीर, आनन्द भैरवशाही, विद्यासागर नौटियाल, विश्वनाथ त्रिपाठी (देहलवी), श्याम तिवारी, विष्णुचन्द्र शर्मा, बाबा कारन्त—इनमें से किसी को भी समूह में या अलग-अलग यहीं पाया जाता था !

इसके मानद इंचार्ज थे समीक्षक नामवार सिंह और पर्यवेक्षक थे त्रिलोचन। ये कवि प्रायः यहीं से ‘काव्य-भोज’ के लिए ‘तुलसी पुस्तकालय’ या ‘साधु वेला आश्रम’ की ओर रवाना होते।
मगर हास्य ! ’60 के शुरू होते-होते भी ‘फुर्र’ हो गए और केन्द्र भी टूट गया !
सन् ’65 के आस-पास जब धूमिल का आविर्भाव हुआ तो उसने गुरु के चरण-चिह्नों पर चलते हुए केदार चायवाले के सामने हजारी की दुकान को ‘केन्द्र’ बनाने की कोशिश की। हजारी के बगल में कन्हैया हलवाई की दुकान। वह कन्हैया के यहाँ से चार आने की जलेबी लेता और चार आने का सेव-दालमोठ और हजारी की दुकान में आ बैठता। इधर-उधर से कवियाये दूसरे लोग भी आते और नागानन्द भी। कवियों की नज़र अखबार या बहस पर होती, नागानन्द की जलेबी-नमकीन के दोनों पर !
ऐसे में केन्द्र क्या चलता !

मगर बाद के कई वर्षों तक—जिस प्रकार गोला दीनानाथ के इलाके में घुसते ही मसालों की गन्ध से नाक परपराने लगती है, उसी प्रकार अस्सी पर खड़े होने वाले किसी भी आदमी के कान के पर्दे काव्य-चर्चा से फटने लगते थे। धूमिल काव्य द्रोहियों के लिए परशुराम था और उसकी जीभ फरसा !
अस्सी से धूमिल क्या गया, जैसे आँगन से बेटी विदा हो गई। घर सूना और उदास।
इधर सुनते हैं कि कोई बुढ़ऊ-बुढ़ऊ से हैं कासीनाथ-इनभर्सीटी के मास्टर जो कहानियाँ-फहानियाँ लिखते हैं और अपने दो-चार बकलोल दोस्तों के साथ ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर ‘राजेश ब्रदर्स’ में बैठे रहते हैं ! अकसर शाम को ! ‘ए भाई ! ऊ तुमको किधर से लेखक-कवि बुझाता है जी ? बकरा जइसा दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाने से कोई लेखक कवि न थोड़े नु बनता है ? देखा नहीं था दिनकरवा को ? अरे, उहै रामधारी सिंघवा ? जब चदरा-ओदरा कन्हियाँ पर तान के खड़ा हो जाता था—छह फुट ज्वान; तब भह्-भह् बरता रहता था। आउर ई भोंसड़ी के अखबार पर लाई-दाना फइलाय के, एक पुड़िया नून और एक पाव मिरचा बटोर के भकोसता रहता है ! कवि-लेखक अइसै होता है का ?
सच्चा कहें तो नमवर-धूमिल के बाद अस्सी का साहित्य-फाहित्य गया एल.के.डी. (लौंडा के दक्खिन) !’’
मित्रो, इमर्जेंसी के बाद और ’80 के आस-पास से गजब हो गया !

भारत पर तो बेशक हमले हुए—यवनों के, हूणों के, कुषाणों के, लेकिन अलग-अलग और बारी-बारी, मगर अस्सी पर एक ही साथ कई राज्यों और जिलों से हमले हुए—आरा, सासाराम, भोजपुर, छपरा, बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया जाने कहाँ-कहाँ से ‘जुवा’ लड़के युनिवर्सिटी में पढ़ने आए और चौराहे पर डेरा-डंडा गाड़ चले !
इनमें नई नस्लें थीं !
एक नस्ल पैदा हुई ‘फाइन आर्ट्स’ के शौक से ! ये लड़के ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर पेंसिल और स्केचबुक लिये बैठे रहते हैं और ‘संघ की ओर से बँटनेवाली खिचड़ी या रोटियों के इन्तजार में बैठी या लेटी गायों, कुत्तों और भिखमंगों कि चित्र बनाया करते हैं !
दूसरी नस्ल ‘तुलसीघाट’ पर आयोजित होने वाले ‘ध्रुपद मेला’ से निकली ! यह गायकों-वादकों और उनकी कला पर फिदा होकर सिर हिलानेवालों की नस्ले हैं ! ये कढ़ाई किए हुए रंग-बिरंगे कुर्ते और चूड़ीदार पाजामा पहने, कन्धे पर झूलते लम्बे बाल बढ़ाए किसी गुरू या चेली के साथ बगल में तानपूरा दबाए इधर-उधर आते-जाते नजर आते हैं।
तीसरी नस्ल और भी जालिम है—पत्रकारों की ! तलवार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’ वालो की। ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है ! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं ! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है !
एक चौथी नस्ल भी है गोवर्धनधारियों की जो कानी उँगली पर ‘राष्ट्र’ उठाए किसी चेले के ‘हीरो-हाण्डा’ पर दस बारह साल से मुस्की मार रहे हैं। लेकिन इनके बारे में बाद में !
(भारतीय साहित्य संग्रह से साभार)

21.2.08

भड़ास और गालियाँ पर मेरी दो टिप्पणियों पर गौर फरमाएं

टिप्पणी एक

गाली न देना भला
लेना तो कोई चाहता ही नहीं
न देंगे आप तो ही लाभ
बिना गालियों के भी तो
कर सकते हैं प्रलाप
आलाप विलाप
सता सकते हैं संताप
बुझ सकते हैं
दिमाग के ताप
फिर क्यों गाली
जो हैं गन्दी नाली
उसे सूंघ सूंघ कर
भाषा गन्दी कर डाली
डाली होती है अच्छी
फूलों की हो या पेड़ की
डाली पर क्यों उगे गाली
चलो गाली वाली डाली
तोड़ डालें यशवंत भाई आप
कुछ गलत हो गया हो
तो कर दें माफ
पर मत करें गालियों में बात.

टिप्पणी दो

डाक्टर साहब,
आप तो इलाज करने वाले हैं, भगवान के समरूप.
यह तो मैं भी जानता हूं कि मेरे कहने से कुछ नहीं होने जाने वाला.
मैं कुछ करूंगा भी नहीं, इतना तो है आपको विश्वास भी.
मुझे भी है विश्वास कि आप सुधार कर नहीं पढ़ेंगे, पर उम्मीद है कायम कि जो सुधरना चाहते हैं, वे सुधर ही जाते हैं, वैसे इसके अपवाद भी हैं बहुत. इसके ही क्यों, अपवाद तो सभी के होते हैं. आप न तो सुधरें, न सुधार कर ही पढ़ें, हमने सारे जमाने का ठेका थोड़ी ले रखा है, न ही इच्छा रखते हैं.
आप कह भी चुके हैं कि हम क्या कर लेंगे, हमने स्वीकार भी लिया है कि हम कुछ नहीं करेंगे और करना भी नहीं चाह्ते हैं.
रही बात तानाशाही की तो मुझे तो किसी भी कोण से यशवंत भाई न तो ताना देने वाले ही लगते हैं, और जो ताना नहीं देगा उसकी फितरत में तानाशाही तो होगी ही नहीं.
आप न जाने क्यों उन्हें हिटलर बताना चाह रहे हैं.हमें तो वे जन जन के चहेते, हर जन के चहेते नज़र आ रहे हैं,उनकी दिनोंदिन बढ़्ती लोकप्रियता तो यही जतला रही है. आप ही बतलायें कि क्या वे आपके चहेते नहीं हैं या आप उनके चहेते नहीं हैं. हम भी उनके चहेते हैं, वे भी हमारे चहेते हैं, इसलिये हम भी चहक रहे हैं, पर क्या आपको लगता है कि बहक रहे हैं.
हरे प्रकाश उपाध्याय जी का कहना भी सही है कि नियम नहीं बन सकता, मैं भी कहता हूं नियम नही बनना चाहिये क्योंकि नियम में है यम चिपका. और चिपकाना चिपकना पिचकना नहीं कभी भी अच्छा.
हम फिर भी कहेंगे कि गाली नहीं बन सकती कभी अच्छा रस्ता. न बनें इतना सस्ता. शेयर की तरह चढ़ें, पर गिरें मत शेयर की तरह. रहें शेर की तरहा, जैसे रहते हैं यशवंत प्रहा (भाई).

20.2.08

गालियां भीतर न रखें, गाली देकर ऊर्जा व्यय न करें

डा.रुपेश साहब के एक पुराने परिचित मुझसे मिलने आए। उन्होंने एक किस्सा सुनाया। एक सच्ची घटना। उन्होंने बताया कि एक बार ग्रामीण लोगों के बीच हुए झगड़े को सुलझाने गए डा. रूपेश को एक पक्ष के बहुत ही बदतमीज किस्म के आदमी ने कहा कि ,"ए डाक्टर तू चुप रह ,तेरी मां की चूत.....।

इस बात पर जो झगड़ा था उसका मुद्दा ही बदल गया कि उस आदमी ने जनाब को गाली दी । आप सोच भी नहीं सकते कि जनाब डा. रूपेश ने क्या बोला होगा; मुझे डा.साहब के मित्र ने बताया कि ये गम्भीर मुद्रा में बोले,... देखिए आप लोग बात बिलकुल मत बदलिए इस आदमी ने कुछ गलत नही कहा यह तो शाश्वत सत्य है जैसे सूरज पूरब से निकलता है इसबात पर सन्नाटा हो गया डा.साहब ये क्या कह रहे हैं । वे बोले कि इसने जो भी कहा क्या कोई भी उस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखता कि मेरी मां की चूत है तो क्या मैं पेड़ से टपका हूं ? मेरी ही क्या आप सबकी मांओ की चूत है इस बात को पलटिए मत और जिस बात पर विवाद है उस पर चर्चा करिए ।

यकीन जानिए जिस आदमी ने ऐसा बोला था उसी के ग्रुप के लोग उसे मारने उठ पड़े थे लेकिन डा.साहब की इस बात से सब न सिर्फ़ शान्त हो गए बल्कि पहला विवाद भी खत्म हो गया । वो आदमी आज डा.साहब का मुरीद है । ऐसे हैं हमारे डा.साहब । मनीष भाई ने कहा कि डा.साहब खुद गाली देते हैं और हमें मना करते हैं ,पूजा की बात की प्रशंसा करते हैं । मनीष भाई इस दुनिया में एटम से लेकर पूरी कायनात में सय्यारे तक द्विध्रुवी हैं । दरअसल आप समझ नहीं पा रहे हैं कि यशवंत भाईसाहब और डा.साहब अलग हैं ही नहीं बल्कि वे दोनो भड़ास नामक चुम्बक के दो ध्रुव हैं और आपको पता है कि चुम्बक के दोनो ध्रुव समान रूप से लोहे को अपनी ओर खींचते हैं ,विपरीत ध्रुव एकदूसरे को अपनी ओर खींचते हैं समान ध्रुव तो एकदूसरे परे धकेलते हैं । ठीक ऐसे ही यशवंत भाईसाहब और डा.साहब भी भड़ास के दो ध्रुव हैं जिन्होंने इसे वजूद दिया है अगर यशवंत भाईसाहब "भड़ास" के भारी-भरकम ,भुनभुनाते ,भन्नाए हुए ,भदेस भाषाई "भ" है तो सौफ़्ट ,सिल्की ,सनसनाते हुए ,संजीदा भाषाई "स" हैं डा.साहब बाकी हम लोग तो बीच के "ड़ा" हैं जिससे कोई सार्थक शब्द तक नहीं शुरू हो पाता है शायद । भड़ास पर लामबन्दी ठीक नही जान पड़ती ये कोई राजनीतिक मंच नहीं है कि किसी को अपनी प्रभुता सिद्ध करना हो ।
डा.साहब कहते हैं कि गाली दे देने से आपकी ऊर्जा व्यय हो जाती है ,कोई भी कार्य मन वचन और कर्म से करा जा सकता है तो अगर कार्य करना है तो सौ प्रतिशत ऊर्जा प्रयोग करो गाली देकर उसे ज़ाया मत करो बल्कि उद्देश्य की पूर्ति में लगाओ तो काम बन जाएगा । जैसे कि मार्शल आर्ट्स के माहिर हुंकार का हर हमले में इस्तेमाल नहीं करते ,जब प्रतिद्वन्दी बहुत सारे हों तब ऊर्जा एकाग्र करके आक्रमण किया जाता है "की या" में नहीं बांटी जाती । गाली वहां दीजिए जहां आपको लगता हो कि आपका विरोध वहां घूंसे की शक्ल में नहीं जा सकता जैसे बुश या मुशर्रफ़ या फिर दाउद या ओसामा तो गाली देकर ही विरोध जताना ठीक है ऐसे में तो इतनी गालियां और इतनी गन्दी-गन्दी गालियां दीजिए कि अगर उन गालियों में से एक भी उस तक पहुंच जाए तो वो शर्म से खुद ही मर जाए तब गाली की सार्थकता होती है ।
यशवंत भाईसाहब और डा.साहब जैसे लोग ही मिलकर समाज और मुल्क को तरक्की की दिशा देते हैं । पूजा से इल्तजा है कि वे भड़ास पर साहित्यिक कंटेंट न तलाशें ,अगर कोई गाली देना चाहता है तो देने दीजिए उससे वह मेरी तरह रोगमुक्त हो जाएगा लेकिन अगर गालियां भीतर रह गयीं तो उसे ही खा लेंगी ।
भड़ास ज़िन्दाबाद

19.2.08

निरर्थक बहस!

एक मोहतरमा ने भडास में ज़रा दिलचस्पी सी लेकर पोस्ट क्या कर दी सब की पछा़डी में बवासीर हो गई है, पतली खून से सनी टट्टी कर रहे हैं। उसे लगा इस बहाने मेरी टी आर पी भी बढ़ जायेगी। "भडास आंदोलन में तो सभी लोग बहती गंगा समझ कर हाथ पांव धोने चले आते हैं फ़िर वो चाहे भडासी कैटेगरी में फ़िट होते हैं या नही इससे उन्हे कोई सरोकार नही।" करने दो बकर साला कितनी बकर करेगा कोई? एक बार पहले भी नीलिमा चौहान ने इसी से मिलता जुलता मुद्दा उठाया था कि (भडास पर महिलाओं की सहभागिता नगण्य क्यों है?) और मेरी व कुछ अन्य की इस विषय में काफ़ी अच्छी, लम्बी बहस हुई थी, पर लगता है इस बार तो सभी अपनी अपनी उल्टी और खूनी टट्टी उतारे चले जा रहे हैं। ना जाने क्या कहना चाह रहे है? भई कुंठित हो, पीडित हो जो भी हो साला हाथ पौर धो कर किसी के पीछे पड़ जाना भी तो सही नही है। खामख्वाह किसी की टी आर पी इतनी भी न बढाईये कि लोगो को अपने बारे में गलतफ़हमी सी होने लगे। काफ़ी सोचा कि मै कम से कम इस मुद्दे पर चुप रहूंगा लेकिन जब देखा कि भडासी हैं कि चुप्पा टाइट कर ही नही रहे हैं तो सोचा एक शिगूफ़ा मैं भी छोड़ दूं। देखिये इस प्रकार की निरर्थक सी बहस में शामिल होने से कुछ हासिल नही है, हर व्यक्ति की भडास की अपनी अपनी परिभाषायें हो सकती हैं और हमें शायद कोई अधिकार नही है कि उस पर किसी प्रकार का सेंसर लगाया जाये। गाली दो यार कोई प्राबलम नही है, लेकिन वहीं दो जहां बिना मा बहन करे अभिव्यक्ति (भड़ास) की कोई पहचान ही ना बन पा रही हो। जबरिया किसी की खाट खडी करने को गाली देने में क्या मज़ा है? तो आदरणीय और सम्मानित भड़ासियों तिल का ताड़ ना बनाओ। और जिसे जैसी उल्टी करनी है करने दो, हमारी ....... पर भी फ़र्क नही पड़ता। क्यों भई कैसी रही। धन्यवाद... अंकित माथुर...