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5.2.09

सभी ब्लागरों से निवेदन, कृपया इसे पढ़ें और मुझे सलाह दें

दोस्तों, पिछले दिनों भड़ास से हटाए गए कुछ साथियों ने विरोध के लिए बाकायदा एक ब्लाग बनाकर हर दो दिन में एक पोस्ट यशवंत सिंह के खिलाफ डाल रहे हैं। इन पोस्टों में यशवंत सिंह को देश का सबसे बड़ा बनिया, दलाल, कमीशनखोर, स्वार्थी, धंधेबाज बताया जा रहा है और इसके पीछे वजह यह बताया जा रहा है कि भड़ास ब्लाग बनाकर और इस मंच का इस्तेमाल करते हुए भड़ास4मीडिया बनाकर और भड़ास4मीडिया के बाद अब प्रधानजी डाट काम लांच कर पैसा क्यूं कमाने लगा हूं। अगर कमा रहा हूं तो उसमें उन लोगों को क्यों नहीं दिया जा रहा है जो भड़ास से जुड़े हुए हैं या जुड़े रहे हैं।

जो लोग ये सब आरोप लगा रहे हैं, लिख रहे हैं, उनकी पीड़ा को मैं समझ सकता हूं। ये लोग जब भड़ास में थे तो इसी ब्लाग पर गूगल के विज्ञापन लगाए रखता था और उसका एक बार पांच हजार रुपये का चेक भी आया लेकिन मजेदार है कि आजकल तो इस ब्लाग पर कोई कामर्शियल विज्ञापन भी नहीं हैं। जो हैं वे होम एड हैं या ब्लागों के लिंक हैं। दूसरी चीज, ब्लागिंग में आने के बाद इसकी आगे की संभावनाओं को देखते हुए डाट काम पर आया और भड़ास4मीडिया शुरू किया। इसके लिए न सिर्फ 45 हजार रुपये महीने की नौकरी छोड़ी बल्कि एक चुनौती लिया जिसमें फेल होने पर सड़क पर आ जाने का पूरी तरह खतरा था। शुरुआती दिक्कतों के बाद मामला संभलता गया और निःसंदेह भड़ास4मीडिया के बनने बढ़ने और मुझे संभालने में ऐसे कई साथियों का हाथ है जो किन्हीं कारणों से अब भड़ास ब्लाग के सदस्य नहीं हैं।

खैर, शुरू में इनके लिखे को ये मानकर उपेक्षित करता रहा कि भड़ास से हटाए जाने के चलते यह स्वाभाविक तात्कालिक गुस्सा है जो कुछ दिनों में शांत हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इन लोगों का यशवंत को दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक (दुर्गुणों, बुराइयों और कमीनगी का शहंशाह) बनाना जारी रहा। इन लोगों से मेल के जरिए और एसएमएस के जरिए अनुरोध किया कि भइयों, मान जाओ। पर मेरे अनुरोध को मेरा बनियापा समझकर ये लोग और उग्र हो गए और लगे दे दनादन कलम तोड़ने। इस प्रकरण पर मैं कोई निर्णायक स्टैंड लेना चाहता हूं। इसके लिए, मैंने कल दिन भर अपने कई वरिष्ठ अग्रजों, साथियों से विचार-विमर्श किया तो उनके अलग-अलग सुझाव आए। पहले सुझाव पढ़ें--

  1. एक का कहना था कि जब आप मशहूर होने लगते हैं, आपकी स्वीकृति बढ़ने लगती है, आपका नाम होने लगता है तो कुछ जले-भुने लोग आपको टारगेट पर ले लेते हैं और कुछ भी उटपटांग लिखते बकते करते दिख-मिल जाते हैं। इनका एक ही इलाज है, अंतिम हद तक इग्नोर करिए। जितना रिएक्ट करेगे उतना ये उग्र होंगे क्योंकि इससे इनका मंशा सधता है।
  2. दूसरे का कहना था कि इन लोगों ने वाकई हद कर दी है। साइबर सेल में रिपोर्ट दर्ज कराकर समुचित इलाज करवा देना चाहिए।
  3. तीसरे का कहना था कि यार यशवंत, तुम्हारे पर पहले ही कई तरह के आरोप लगते रहे हैं और उन आरोपों से तुम खुद मजबूत हुए, आरोप लगाने वाले नहीं। होने दो, इससे तुम्हारी चर्चा बनी रहेगी और आज की दुनिया में जो चर्चा या कुचर्चा में नहीं होता वो समझ लो मार्केट या मेनस्ट्रीम से बाहर है।
  4. चौथे साथी ने मुझसे ही पूछ दिया कि क्या किसी अनाम मंच पर आप दूसरों के लिखे चूतियापों को पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते हैं? अगर निकाल पाते हैं तो फिर आपसे बड़ा कोई चूतिया नहीं है। आप सार्थक चीजों को पढ़िए। नेट पर निर्रथक का तो अंबार लगा हुआ है। बुरा पढ़ेंगे देखेंगे सोचेंगे तो बुरा बनेंगे।
  5. पांचवें साथी का कहना है कि यह चरम खंडन का दौर है। इन दिनों हर वो नई चीज जो अलग हट के बनने या बनाने की कोशिश की जा रही है, वो निशाने पर है और उसे तब तक निशाने पर रखा जाता है जब तक उसे तोड़ नहीं दिया जाता या उसे खत्म नहीं कर दिया जाता। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि विरोध करने वालों का विरोध करने की बजाय नई चीज को और ज्यादा मजबूत करने, आगे ले जाने में जोर लगाना चाहिए ताकि प्लस में सृजन रहे, विरोध नहीं।
  6. छठें साथी का कहना है कि बेटा यशवंत, तुमने भी बहुत लोगों को गरियाया है, अब झेलो। ईश्वर इसी दुनिया में सबके साथ न्याय करता है। ये तुम्हारे लिए वाकई प्रायश्चित का वक्त है।
  7. सातवें सज्जन के मुताबिक भड़ास जिस गाली-गलौज का प्रतीक रहा है और उसके आप अगुवा रहे हैं तो वही गाली-गलौज अगर कहीं और से आपको मिल रही है तो इसमें इतने परेशान क्यों हैं। सोचिए उनके बारे में जिन लोगों को आप लोगों ने गरियाकर न सिर्फ दुखी किया बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी धूमिल की। उन लोगों ने तो थोड़ा भी रिएक्ट नहीं किया और न पुलिस में रिपोर्ट लिखाने गए। अगर अभिव्यक्ति की इतनी ही आजादी की बातें करते हैं तो खुद को भी गरियाया जाने का स्वागतद करिए।
  8. आठवें मित्र का कहना है कि उन लोगों के लिखे को कोई नहीं पढ़ रहा है, तुम खुद अपने मित्रों को यूआरएल देकर पढ़वा रहे हो। दूसरी बात, अगर कोई पढ़ता भी है तो वो तुम्हारे बारे में तो धारणा बाद में बदलेगा या बनाएगा, जो लिख रहे हैं, उनके बारे में धारणा पहले बना लेगा इसलिए समझो मुनाफे में तुम्हीं हो। तुम्हें तो कायदे से अपने विरोध के ब्लागों का लिंक भड़ास पर लगा देना चाहिए, ये कहते हुए कि ये हैं मेरे खुले विरोधी, जिनका मैं स्वागत करता हूं, अगर आप भी मेरे खिलाफ लिखना चाहें तो इस क्लब में जुड़ जाएं। ऐसा अगर कर दिया तो समझो वाकई तुम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यक्ति बन जाओगे, जो बनना अभी बाकी है।
  9. एक अन्य दोस्त का कहना है कि यशवंत गल्ती तो तुम्हारी भी है। आप किसी को यूं ही निकाल दोगे तो उसका रिएक्ट करना स्वाभाविक है। इस प्रकरण से ही पता चलता है कि तुम भी कच्चे खिलाड़ी हो। पक्का खिलाड़ी अपने नजदीकियों को कभी नाराज नहीं करता। जो कच्चे खिलाड़ी होते हैं, वो आपस में ही लड़ जाते हैं। तो बच्चा, अभी खेल खेलना कायदे से सीख। ऐसे नहीं चल पाओगे दिल्ली में।
  10. एक सलाह ये थी कि आप लोग उनके बार बार लिखने के बावजूद उत्तेजित नहीं हो रहे हो, भड़ास पर उनके खिलाफ गालियां नहीं लिख रहे हो, उनसे पंगा नहीं ले रहे हो, यही चीज तो उन लोगों को परेशान किए जा रही है। जब जब आप उनको नोटिस करेंगे, उनके लिखे पर रिएक्ट करेंगे, तब तक उनका मकसद हल होता जाएगा। आप लोग प्लीज, चुपचाप अपना काम करें।
  11. एक दार्शनिक सलाह ये थी कि इसी दिल्ली में कोई यशवंत सिंह रिक्शाचालक भी होगा। अगर उसके खिलाफ कोई ब्लाग बनाकर लिखना शुरू कर दे तो उस रिक्शाचालक को ता-उम्र न पता चले कि उसके खिलाफ लिखा जा रहा है। कोई अगर उसे बता भी दे कि ऐ रिक्शावाले भइया, तुम्हे एक ब्लाग पर गंदी गंदी गालियां दी गई है, तो भकुवा कर इधर उधर ताकेगा, उसे समझे में नहीं आएगा कि गाली कहां दी गई है। तो यशवंत जी, आप भी भकुवाना सीखिए। खुद को रिक्शाचालक मानिए और कुंठितों को विष वमन कर अपना मन हल्का करने का मौका देते रहिए। अगर आप रिएक्ट करेंगे तो उनका मन फिर भारी हो जाएगा और भर जाएगा इसलिए अपना काम करिए।

इतने सारे मत आने के बाद आपकी तरह मैं भी कनफ्यूज हूं, इसीलिए ये पोस्ट लिख रहा हूं। इस मामले में क्या किया जाना चाहिए। बात यहां किसी यशवंत सिंह को किसी ब्लाग पर गाली लिखे जाने की नहीं है। ऐसे मामले में हम जैसे ब्लागर को क्या एथिकल या लीगल या मोरल स्टैंड लेना चाहिए। अभी तक के जो उदाहरण हैं वो ज्यादातर साइबर पुलिस के जरिए आरोपी ब्लागर को पकड़ने के रहे हैं।

मैं आप सभी ब्लागरों के दरबार में अपने लिए गुहार लगा रहा हूं, प्लीज, मुझे गाइड करें। इस पोस्ट को पढ़ने वाले हर शख्स से विनती करता हूं कि अपनी राय कमेंट के रूप में नीचे जरूर दे ताकि मैं कोई भी अगला कदम निजी भावावेश में उठाने के बजाय अन्य लोगों की राय के आधार पर उठाऊं जिससे यह मसाल एक नजीर बन सके।

आभार के साथ
यशवंत सिंह

13.2.08

आज ब्‍लॉग संगत है, हजारों-लाखों में आएं

आज दीवान-ए-सराय में एक ब्‍लॉग संगत जम रही है। सराय ने पिछले दिनों हिंदी की नयी बनती बस्तियों का लगातार ख़ैर-मक़दम किया है। खासकर ब्‍लॉग को लेकर गंभीर चर्चा-चिंता की जितनी जगह सराय के कमरों में है, उतनी न तो हिंदो के आलोचकों की बगल वाली कुर्सी पर है, न ही हिंदी किताब छाप कर कार-मकान जुटाने वाले हिंदी के प्रकाशकों के छापेखाने में है। यह अच्‍छी बात है और सराय की इन अच्‍छाइयों से छलक कर कुछ अमृत और हमारे हिस्‍से में आ रहा है।

ढाई बजे से ब्‍लॉग संगत जमेगी। आमंत्रण खुला है। हिंदी ब्‍लॉग के सफ़र और उसके आयामों पर बात होगी और जो कुछ ब्‍लॉगर इस संगत को लीड करेंगे, उनमें सुनील दीपक, मसिजीवी, दिलीप मंडल, नीलिमा-सुजाता, रवीश कुमार और मैथिली गुप्‍त अहम नाम हैं। आधे घंटे का एक छोटा सत्र सुनील दीपक से बातचीत को होगा, जो इटली के Bologna शहर से छुट्टी बिताने हिंदुस्‍तान की सरज़मीं पर अभी-अभी पधारे हैं। इस वक्‍त भुवनेश्‍वर में हैं। सुनील दीपक हिंदी के शुरुआती ब्‍लॉगरों में से रहे हैं और मोहल्‍ले की पहली पोस्‍ट उनकी ही मदद से देवनागरी में लिखी जा सकी थी।
हम तमाम ब्‍लॉगर बंधुओं को सराय की तरफ से ब्‍लॉग संगत में आमंत्रित कर रहे हैं। व्‍यक्तिगत मेल लिखना संभव नहीं हो पाएगा। ज़माने भर का ग़म और एक ब्‍लॉगिंग का ग़म के बीच संतुलन शाइरी के अर्थों में संभव नहीं हो पा रहा है, इसलिए। उम्‍मीद है, आप ज़रूर आएंगे और हिंदी ब्‍लॉगिंग पर विमर्श की एक नयी आधा‍रशिला रखेंगे।

सराय का पता है 29 राजपुर रोड, दिल्‍ली 110054... ये कश्‍मीरी गेट के बाद सिविल लाइंस मेट्रो स्‍टेशन से एकदम नज़दीक का पता है। हालांकि एक बार मसिजीवी ने कहा था कि इस जगह से तीसहजारी मेट्रो स्‍टेशन भी ज़्यादा दूर नहीं। बहरहाल, पता तफ़सील से बताने से बेहतर है कि आपमें जुनून इतना हो कि आप खोज कर ब्‍लॉग संगत में आकर जम जाएं।

31.1.08

हरिद्वार की ठंडी, धर्म की सरगर्मी, डा. बुधकर और तोमर संग चाय की चुस्की

हरिद्वार की भयंकर ठंडी ने तो दिल्ली की सर्दी को पछाड़ दिया। उंगलियां कड़कडा के यूं ऐंठी हैं कि हिलने डुलने से मना कर रही हैं। इस शहर में आज दूसरा दिन है और दो दिनों में इतनी सारी बातें हुईं कि अगर सभी को बताने बैठूंगा तो जाने कितनी पोस्टें किलो किलो भर की लिखनी पड़ेंगी। संक्षेप में, कुछ बातें...

-इंटरनेट की आभाषी दुनिया के जरिये बने मित्रों से वास्तविक दुनिया में मिलन हुआ। डा. कमलकांत बुधकर और डा. अजीत तोमर, दोनों ही ब्लागर, से मिलना न सिर्फ यह भरोसा दिलाने वाला था कि कमीनों की इस दुनिया में अच्छे अभी बड़ी संख्या में हैं, और ये संख्या, इंशाअल्लाह, ब्लागिंग व ब्लागरों के चलते और ज्यादा बढ़ने वाली है।

-हरिद्वार में उतरने से पहले ही डा. अजीत तोमर का स्नेहिल आमंत्रण आ चुका था कि आप पहले मेरे यहां आएंगे, चाय पियेंगे, फिर जाना हो जाएंगे। मैं हरिद्वार में सिंहद्वार पर उतरा और थोड़ी ही देर में डा. अजीत हाजिर। उनकी बाइक पर उनके कमरे पहुंचा। दो दो पैग चाय के बाद बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं और देखते देखते उनकी जि़द आ गई कि आज रात यहीं गुजारें। उनके साधिकार अनुरोध को टाल न पाया। बतियाते बतियाते कब नींद आ गई, पता न चला।

-सुबह सवेरे उठने की मेरी कोशिशें हमेशा बेकार होती हैं सो देर से उठा और फिर डा. कमलकांत बुधकर जी का आदेश पहुंचा कि यशवंत जी को लेकर मेरे घर आओ। हम दोनों डा. बुधकर जी के यहां पहुंचे। विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के रीडर डा. बुधकर न सिर्फ बेहद अच्छे इंसान बल्कि एक सच्चे दोस्त बन गए, थोड़ी ही देर की बातचीत के बाद। लगे हाथ उन्होंने भड़ास की मेंबरशिप ले ली और इंट्रोडक्टरी पोस्ट भी प्रेषित कर दी।

-धूप में चाय पीते हुए बुधकर जी को सुनना मजेदार अनुभव रहा। महाराष्ट्र के सतारा के बुध गांव के होने के नाते बुधकर पर जब बुध गांव पहुंचे तो वहां कोई अपने नाम में बुधकर नहीं लगाता, पता चला कि जो लोग अपने गांव से बाहर निकले उन्होंने ही अपने नाम में गांव के नाम के साथ कर जोड़ लिया....गावस्कर, बुधकर, मंजरेकर.....आदि आदि। डा. बुधकर जी ने ब्लागर मीटिंग का प्रस्ताव भी रखा, जिसे उन्होंने अपनी पोस्ट में भी लिखा है।

-डा. बुधकर से मिलना, उनको सुनना, उनके लिखे को पढ़ना....बेहद सुखद अनुभव है। अनुभवों की जो थाती, शब्दों का जो शिल्प, बयान करने का अंदाज़, व्यक्तित्व की सहजता...ये सब चीजें उन्हें कुल मिलाकर ऐसा बना देती हैं कि उनसे बार बार बतियाने गपियाने सुनने और जीने का मन करता है।

-डा. अजीत मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं और गुरुकुल कांगड़ी विवि में ही शोध किया और अब यहीं अध्यापन करने लगे हैं। उम्र तो ज्यादा नहीं है लेकिन संवेदना इतनी गहन की जैसे छोटी सी छोटी चीज उनकी निगाह से छूट नहीं पाती। इन चीजों को वे कविता के रूप में आकार देने की कोशिश करते हैं। उनके ब्लाग पर आप कविताएं ही पायेंगे। उनकी मेहमाननवाजी देखकर मैं सोचने लगा कि इस शख्स से पहले कभी मिला नहीं और पहली ही मुलाकात में इतना अपनापा। शायद एक समान सोच व संवेदना के लोग जब मिलते हैं तो लगता है कि जमाने से मिले हुए हैं, बिछ़ड़े ही कब थे।

-डा. अजीत के साथ हरिद्वार घूमने के बाद आज मैंने उन्हें विदा किया और फिर खुद घूमने निकला। हर की पैड़ी के साथ साथ आसपास के पूरे इलाके को घूमा। कुछ यूं दिखा सारा मंज़र...

हर जगह धर्म से जुड़ी दुकानें
कंठी, माला, कपड़े, शंख,
किताबें, प्रसाद, कैसेट,
पूजा का सामान, तस्वीरें
पंडे, लाइन से बैठे भिखारी,
गंगा में डुबकी लगाते श्रद्धालु,
पैसे लेकर ग्रुप फोटो खींचते फोटोग्राफर,
गंगा में डुबकी लगाकर पैसे बीनते लड़के,
रसीद काटकर पैसे मांगती महिलाएं,
गरीबों को भोजन खिलाने का
आह्वान करते ठेले वाले दुकानदार,
धार्मिक गीतों का शोर मचाकर सीडी
व कैसेट बेचते लौंडे,
पतली-पतली गलियां,
ताजी ताजी छनतीं पूड़ियां,
बड़े बड़े धर्मशाले, गेरुआ धारी साधु संत
और इन सबको अगल बगल बसाये
कल कल करतीं बहतीं पावन गंगा,
गंगा को चुनरी ओढ़ाये खड़े बड़े पहाड़
चुपचाप देखते निहारते सदियों से.....
सब कुछ धर्ममय और सबके पीछे पैसे का खेल
बस निष्पाप और निष्कलुष गंगा दिखीं
और पहाड़ दिखे, बाकी सब के मन में
थोड़ा थोड़ा खोट,
जैसे पैसे की जगह
मांग रहे हों रुपये रूपी वोट...
हरिद्वार की ठंडी को मात करती है
सिर्फ धर्म के धंधे की जोरदार गर्मी
लगता है जैसे मौसम सिर्फ धर्म
और भक्ति को बेचकर पैसे बनाने का है।


बातचीत करने पर पता चला कि स्थानीय लोग तो सिर्फ धर्म के नाम पर पैसे बनाकर जीवन चलाने में जुटे रहते हैं और बाहर के लोग सिर्फ धर्म को जीने और बूझने आते हैं।

मुझे जो दो चीजें अच्छी लगीं उनमें से एक था टेलीस्कोप जिससे दूर पहाड़ पर स्थित मंदिरों को साफ देखा जा सकता था, गंगा के बीच में बनी गंगा की प्रतिमा को साफ देखा जा सकता था और टी सीरिज वालों की तरफ से बनाई गई शंकर की विशालकाय मूर्ति की जटा में गंगा की शक्ल को देखा जा सकता था। पांच रुपये लिए सिर्फ ये चीजें दिखाने के लिए।

फिलहाल इतना ही
फिर मिलेंगे
जय भड़ास
यशवंत सिंह