जो लोग ये सब आरोप लगा रहे हैं, लिख रहे हैं, उनकी पीड़ा को मैं समझ सकता हूं। ये लोग जब भड़ास में थे तो इसी ब्लाग पर गूगल के विज्ञापन लगाए रखता था और उसका एक बार पांच हजार रुपये का चेक भी आया लेकिन मजेदार है कि आजकल तो इस ब्लाग पर कोई कामर्शियल विज्ञापन भी नहीं हैं। जो हैं वे होम एड हैं या ब्लागों के लिंक हैं। दूसरी चीज, ब्लागिंग में आने के बाद इसकी आगे की संभावनाओं को देखते हुए डाट काम पर आया और भड़ास4मीडिया शुरू किया। इसके लिए न सिर्फ 45 हजार रुपये महीने की नौकरी छोड़ी बल्कि एक चुनौती लिया जिसमें फेल होने पर सड़क पर आ जाने का पूरी तरह खतरा था। शुरुआती दिक्कतों के बाद मामला संभलता गया और निःसंदेह भड़ास4मीडिया के बनने बढ़ने और मुझे संभालने में ऐसे कई साथियों का हाथ है जो किन्हीं कारणों से अब भड़ास ब्लाग के सदस्य नहीं हैं।
खैर, शुरू में इनके लिखे को ये मानकर उपेक्षित करता रहा कि भड़ास से हटाए जाने के चलते यह स्वाभाविक तात्कालिक गुस्सा है जो कुछ दिनों में शांत हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इन लोगों का यशवंत को दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक (दुर्गुणों, बुराइयों और कमीनगी का शहंशाह) बनाना जारी रहा। इन लोगों से मेल के जरिए और एसएमएस के जरिए अनुरोध किया कि भइयों, मान जाओ। पर मेरे अनुरोध को मेरा बनियापा समझकर ये लोग और उग्र हो गए और लगे दे दनादन कलम तोड़ने। इस प्रकरण पर मैं कोई निर्णायक स्टैंड लेना चाहता हूं। इसके लिए, मैंने कल दिन भर अपने कई वरिष्ठ अग्रजों, साथियों से विचार-विमर्श किया तो उनके अलग-अलग सुझाव आए। पहले सुझाव पढ़ें--
- एक का कहना था कि जब आप मशहूर होने लगते हैं, आपकी स्वीकृति बढ़ने लगती है, आपका नाम होने लगता है तो कुछ जले-भुने लोग आपको टारगेट पर ले लेते हैं और कुछ भी उटपटांग लिखते बकते करते दिख-मिल जाते हैं। इनका एक ही इलाज है, अंतिम हद तक इग्नोर करिए। जितना रिएक्ट करेगे उतना ये उग्र होंगे क्योंकि इससे इनका मंशा सधता है।
- दूसरे का कहना था कि इन लोगों ने वाकई हद कर दी है। साइबर सेल में रिपोर्ट दर्ज कराकर समुचित इलाज करवा देना चाहिए।
- तीसरे का कहना था कि यार यशवंत, तुम्हारे पर पहले ही कई तरह के आरोप लगते रहे हैं और उन आरोपों से तुम खुद मजबूत हुए, आरोप लगाने वाले नहीं। होने दो, इससे तुम्हारी चर्चा बनी रहेगी और आज की दुनिया में जो चर्चा या कुचर्चा में नहीं होता वो समझ लो मार्केट या मेनस्ट्रीम से बाहर है।
- चौथे साथी ने मुझसे ही पूछ दिया कि क्या किसी अनाम मंच पर आप दूसरों के लिखे चूतियापों को पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते हैं? अगर निकाल पाते हैं तो फिर आपसे बड़ा कोई चूतिया नहीं है। आप सार्थक चीजों को पढ़िए। नेट पर निर्रथक का तो अंबार लगा हुआ है। बुरा पढ़ेंगे देखेंगे सोचेंगे तो बुरा बनेंगे।
- पांचवें साथी का कहना है कि यह चरम खंडन का दौर है। इन दिनों हर वो नई चीज जो अलग हट के बनने या बनाने की कोशिश की जा रही है, वो निशाने पर है और उसे तब तक निशाने पर रखा जाता है जब तक उसे तोड़ नहीं दिया जाता या उसे खत्म नहीं कर दिया जाता। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि विरोध करने वालों का विरोध करने की बजाय नई चीज को और ज्यादा मजबूत करने, आगे ले जाने में जोर लगाना चाहिए ताकि प्लस में सृजन रहे, विरोध नहीं।
- छठें साथी का कहना है कि बेटा यशवंत, तुमने भी बहुत लोगों को गरियाया है, अब झेलो। ईश्वर इसी दुनिया में सबके साथ न्याय करता है। ये तुम्हारे लिए वाकई प्रायश्चित का वक्त है।
- सातवें सज्जन के मुताबिक भड़ास जिस गाली-गलौज का प्रतीक रहा है और उसके आप अगुवा रहे हैं तो वही गाली-गलौज अगर कहीं और से आपको मिल रही है तो इसमें इतने परेशान क्यों हैं। सोचिए उनके बारे में जिन लोगों को आप लोगों ने गरियाकर न सिर्फ दुखी किया बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी धूमिल की। उन लोगों ने तो थोड़ा भी रिएक्ट नहीं किया और न पुलिस में रिपोर्ट लिखाने गए। अगर अभिव्यक्ति की इतनी ही आजादी की बातें करते हैं तो खुद को भी गरियाया जाने का स्वागतद करिए।
- आठवें मित्र का कहना है कि उन लोगों के लिखे को कोई नहीं पढ़ रहा है, तुम खुद अपने मित्रों को यूआरएल देकर पढ़वा रहे हो। दूसरी बात, अगर कोई पढ़ता भी है तो वो तुम्हारे बारे में तो धारणा बाद में बदलेगा या बनाएगा, जो लिख रहे हैं, उनके बारे में धारणा पहले बना लेगा इसलिए समझो मुनाफे में तुम्हीं हो। तुम्हें तो कायदे से अपने विरोध के ब्लागों का लिंक भड़ास पर लगा देना चाहिए, ये कहते हुए कि ये हैं मेरे खुले विरोधी, जिनका मैं स्वागत करता हूं, अगर आप भी मेरे खिलाफ लिखना चाहें तो इस क्लब में जुड़ जाएं। ऐसा अगर कर दिया तो समझो वाकई तुम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यक्ति बन जाओगे, जो बनना अभी बाकी है।
- एक अन्य दोस्त का कहना है कि यशवंत गल्ती तो तुम्हारी भी है। आप किसी को यूं ही निकाल दोगे तो उसका रिएक्ट करना स्वाभाविक है। इस प्रकरण से ही पता चलता है कि तुम भी कच्चे खिलाड़ी हो। पक्का खिलाड़ी अपने नजदीकियों को कभी नाराज नहीं करता। जो कच्चे खिलाड़ी होते हैं, वो आपस में ही लड़ जाते हैं। तो बच्चा, अभी खेल खेलना कायदे से सीख। ऐसे नहीं चल पाओगे दिल्ली में।
- एक सलाह ये थी कि आप लोग उनके बार बार लिखने के बावजूद उत्तेजित नहीं हो रहे हो, भड़ास पर उनके खिलाफ गालियां नहीं लिख रहे हो, उनसे पंगा नहीं ले रहे हो, यही चीज तो उन लोगों को परेशान किए जा रही है। जब जब आप उनको नोटिस करेंगे, उनके लिखे पर रिएक्ट करेंगे, तब तक उनका मकसद हल होता जाएगा। आप लोग प्लीज, चुपचाप अपना काम करें।
- एक दार्शनिक सलाह ये थी कि इसी दिल्ली में कोई यशवंत सिंह रिक्शाचालक भी होगा। अगर उसके खिलाफ कोई ब्लाग बनाकर लिखना शुरू कर दे तो उस रिक्शाचालक को ता-उम्र न पता चले कि उसके खिलाफ लिखा जा रहा है। कोई अगर उसे बता भी दे कि ऐ रिक्शावाले भइया, तुम्हे एक ब्लाग पर गंदी गंदी गालियां दी गई है, तो भकुवा कर इधर उधर ताकेगा, उसे समझे में नहीं आएगा कि गाली कहां दी गई है। तो यशवंत जी, आप भी भकुवाना सीखिए। खुद को रिक्शाचालक मानिए और कुंठितों को विष वमन कर अपना मन हल्का करने का मौका देते रहिए। अगर आप रिएक्ट करेंगे तो उनका मन फिर भारी हो जाएगा और भर जाएगा इसलिए अपना काम करिए।
इतने सारे मत आने के बाद आपकी तरह मैं भी कनफ्यूज हूं, इसीलिए ये पोस्ट लिख रहा हूं। इस मामले में क्या किया जाना चाहिए। बात यहां किसी यशवंत सिंह को किसी ब्लाग पर गाली लिखे जाने की नहीं है। ऐसे मामले में हम जैसे ब्लागर को क्या एथिकल या लीगल या मोरल स्टैंड लेना चाहिए। अभी तक के जो उदाहरण हैं वो ज्यादातर साइबर पुलिस के जरिए आरोपी ब्लागर को पकड़ने के रहे हैं।
मैं आप सभी ब्लागरों के दरबार में अपने लिए गुहार लगा रहा हूं, प्लीज, मुझे गाइड करें। इस पोस्ट को पढ़ने वाले हर शख्स से विनती करता हूं कि अपनी राय कमेंट के रूप में नीचे जरूर दे ताकि मैं कोई भी अगला कदम निजी भावावेश में उठाने के बजाय अन्य लोगों की राय के आधार पर उठाऊं जिससे यह मसाल एक नजीर बन सके।
आभार के साथ
यशवंत सिंह
