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28.9.13

राइट टू रिजैक्‍ट शुभ, मगर कितना.... ?

राइट टू रिजेक्‍ट स्‍वस्‍थ लोकतंत्र के लिए शुभ माना जा सकता है, मगर कितना? इस पर भी सोचा जाना चाहिए। खासकर इसलिए कि क्‍या अब तक नकारात्‍मक वोटों से संसद या विधानसभाओं में पहुंचने वाले इससे रुक पाएंगे। शायद जानकार मानेंगे कि उनका जवाब ना में ही होगा। कारण कुछ लोग जो पहले भी वोट नहीं देते थे, क्‍या वह देश की राजनीतिक व्‍यवस्‍था पर प्रश्‍नचिह्न नहीं था? हां अब इतना फर्क होगा कि नकारात्‍मक वोट की संख्‍या सार्वजनिक हो जाएगी। लेकिन फिर वही सवाल कि क्‍या इससे फायदा होगा?
मेरा मानना है कि राइट टू रिजेक्‍ट से बड़ा बदलाव आए या नहीं, लेकिन देश के शिक्षित वर्ग के रुझान का पता जरुर चल सकता है। कारण, देश में अब तक अनपढ़ों को किसी के भी पक्ष में बरगलाने में इसी वर्ग का सबसे बड़ा हाथ रहा है, और यही वर्ग चुनाव के बाद हरबार राजनीतिक प्रणाली, राजनेताओं, पार्टियों को बीच चौराहे बातों बातों में गालियां भी देता रहा है। सो साफ है कि अब उसे वोट के इस्‍तेमाल से पहले अपने चयन पर किंतु-परंतु के साथ मुहर लगानी होगी। वरना उसकी भूमिका, अंधभक्ति, स्‍वार्थ को भी सब जान जाएंगे।
हां एक बात अवश्‍य कही जा सकती है कि इससे निकलने वाली ध्‍वनि लोकतंत्र के कथित पहरुओं को भविष्‍य के लिए कोई कड़ा संदेश जरुर दे सकती है। और इससे राजनीतिक गलियारों में यदाकदा कोई साफ सुथरी छवि, ध्‍येय, निष्‍ठा वाला पहुंच सकता है। इस लिहाज से दीर्घकालीन योजनाओं की तरह राइट टू रिजेक्‍ट प्रणाली से भरोसा बांधा जा सकता है।
यह पहल एक और तरफ भी इशारा करती दिख रही है कि लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाओं के समय का पहिया घुमने लगा है। जो कि राइट टू रिजेक्‍ट से राइट टू रिकॉल और फिर निर्वाचन के लिए 50+1 के मानक तक पहुंच सकती है। जिससे धनबल, बाहुबल, उन्‍माद, भावनात्‍मक शोषण जैसी कुटील चालों का बल निकाल सकती है।
यहां आप से अनुरोध कि सफाई के इस अभियान पर अपनी प्रतिक्रिया तो दें ही, साथ ही उस शिक्षित (अनपढ़) वर्ग को भी समझाने का प्रयास करें। शायद यह हमारे लिए देशभक्ति जताने का एक अच्‍छा माध्‍यम बन जाए। जो देश के साथ ही हमारी, आने वालों की जिंदगियों को सुरक्षित और खुशहाल बना सके।

धनेश

24.11.09

देख तमाशा नेतों का......

बाबारी का जिन्न फिर बाहर आगया है। कहने को ये घटना आज से सत्रह साल पुरानी है, जिसे कोई शर्म,कोई शौर्य और धैर्य का अवसान मानता है। लेकिन सच में ये घटना थी क्या..क्या वास्तव में किसी विदेशी अक्रांता की बनाई गई जागीर को तोड़ देना अपने धर्म और जाति के लिए कर्तव्य परायणता होगी या फिर राष्ट्रवाद होगा क्या हमने इस विवादित ढांचे को गिरा कर बाबर की बर्बरता और उसकी पौध याने औरंगज़ेब की ज़्यादितियों को भुला दिया या इतिहास में दर्ज़ इस सच को पौछ पाये..शायद जवाब आसान नहीं होगा।
एक बार फिर आंतक के लिए एक जुट होते देश के सामने वही दो सवाल आएंगे एक आंख मेरी धर्म कहलाती है दूसरी राष्ट्र..मैं किसे क़ुर्बान करूं...मुस्लिम कठमुल्लों को पटरी पर दौड़ती ज़िंदगी को फिर एक बार पाक में बैठे आक़ाओं की उस बात को साबित करने का मौक़ा मिल गया है जिसमें वो अक्सर भारतीय मुस्लिमों को हिंदुओं से दूर रहने की सलाह देते हैं..कहा करते है उनके हित भारत में नहीं बल्कि भारत के भीतर एक और पाकस्तान बनाने में हैं....सीमापार के ये तथाकथित इस्लाम के प्रचारक सक्रिय हो गये हैं..और सबसे बड़ी बात इस रिपोर्ट की ये है कि इससे निकलने वाले राज़ दरअसल राज़ हैं ही नहीं...सब खुली ख़िताब की तरह पढ़ा, समझा जा सकता है। रिपोर्ट लीक हुई अफसोस ये नहीं जिस वक्त लीक हुई वो समय राष्ट्रीय एकता और गौरव को नये आयाम देने वाला है...इसी महीने के आखिरी सप्ताह में मुम्बई हमले की सालग़िरह होगी और देश के दूसरी बड़ी आबादी इस बात से आशंकित और आतंकित होगी कि कहीं फिर भगवा सेना सक्रिय होकर कुछ ऐंसा ना करने लग जाए जो 1992 का दोहराव हो....उनके हाथों में ज़रूर शोक के प्रतीक कैंडल,काली पट्टी या कुछ और हो सकता है हो मगर दिल में एक भय खौफ और ख़तरनाक यादें होंगी वो जो बात उस पीढ़ी को नहीं बताना चाहते थे जो उस वक्त पैदा नहीं हुई थी...वो पीढ़ी ख़ुद ही सब जान जाएगी...
अब सवाल ये उठता है कि आखिर रिपोर्ट इसी वक्त क्यों लीक हुई या कराई गई...ये कोई परीक्षा का पर्चा नहीं जो बदमाशों ने लीक किया हो या गैस पेपर नहीं है..बल्कि देश की अस्मिता औऱ मान गौरव सम्मान के साथ राष्ट्रीय शांति का मसला है...इसके पीछे सरकार का हाथ है या जो भी है, कोई माइने नहीं रखता ये बात अल्हदा है।
इस रिपोर्ट के नजदीकी बुरे असर और दूरगामी बुरे असर दोनो पर हम इन बिंदुओं पर सोचते हुए विचार कर सकते हैं..
पहला देश के मुखिया का बाहर होना और रिपोर्ट का लीक होना-मनमोहन सिंह एक मंझे हुए खिलाड़ी है वे इसका ठीकरा अपने सिर नहीं लेना चाहते अब तक उनकी छवि सीधे सरल औऱ काम के प्रति निष्ठावान की बनी हुई है..औऱ फिर वे अपने वाक् चातुर्य के आभाव में गरम मुद्दे पर बहस में बुरे फंस भी सकते थे..
दूसरा इसी बीच उनका पाकस्तान के लोकतांत्रिक अस्तित्व पर सवाल खड़ा करना कि कौन है वहां जिससे बात की जा सके याने पाकस्तान की ज़म्हूरियत भारत की नज़र में बोगस है असल ताकत वहा के सेना नायकों और तालिबानियों में है...जो कि सच भी है..इस बयान ने वैश्विक पटल पर एक नई सोच और बहस दोनों ही समान रूप से रखी हैं..जिसमें शर्म-अल-शेख के साझां बयान का पश्चाताप भी शामिल है..
तीसरा गन्ना के गड़ने से कांग्रेस नीति संप्रग में ठीकराबाज़ी से लोगों औऱ विपक्ष का ध्यना पूरी तरह से हटाना....
तीसरा स्पेकट्रम घोटाले को सेफसाइड करना....चौथा कोड़ा पर पड़ रहे कोड़ों को भले ही केंद्र ने ही परोक्ष समर्थन दिया हो लेकिन पार्टी इसे तह तक नहीं ले जाना चाहती कांग्रेस के पुराने सहयोगी कोड़ा ने घोटाला नहीं किया बल्कि झारखण्ड के सीएम की करतूत है..याने कोड़ा और कांग्रेस का मेल कमतर दिखाना...पांचवा औऱ आखिरी भाजपा ने राव को घेरा तो कांग्रेस कैसे चुप रहे वो ऐंसा काला चिठ्ठा लेकर आई जिसने उसे फिर बूस्ट कर दिया।
वास्तव में सियासी दांव बड़े गहरे होते हैं...बाबरी के जिन्न को निकालना...वंदेमातरम् पर फतवे वाली सभा में परोक्ष रूप से रहना सबके बड़े गहरे माइने हैं...जिन्हे आम आदमी नहीं समझना नहीं चाहता..
इससे जो देश का माहौल बनेगा वो भाजपा या किसी औऱ भगवा का नुकसान नहीं होगा..बल्कि डूबती बिखरती पार्टी को फिर एक बार स्थापित होने का मौका मिलेगा वहीं सपा जो मुस्लिम परस्ती से कुछ दिन बाहर आई थी वो फिर उसी कूप में डूब जाएगी..वहीं ये सत्र तो गया जिसमें देश के बड़े मुद्दों पर चर्चा होनी थी..कुल मिला कर ऐंसा लगा कांग्रेस को मुद्दों से बचने का फायदा..भाजपा को रिस्टेंड होने का फायदा सपा को फिरका ताकतों का प्यार दोबारा मिलने की संभावनाओ का फायदा होता दिखाई दे रहा है जो साबित करता है कि शायद ये सर्वदलिय रमनीति थी जो सर्वदिलीए भारत को सियासी सौहवत के बुरे असरों के रूप में मिल रहीं है..
लिब्रहान रिपोर्ट लीक हुई कराई गई जो भी हुआ मतलव नहीं बहरहाल इससे ये ज़रूर लगता है कि जनता को अब नेता खुले आम मूर्ख बनाने लगे हैं..जिसमें कोई हिंदू नहीं कोई मुस्लिम नहीं हौ बल्कि सिर्फ एक आदमी है जिसे नेता वोटर कहते हैं। कल्याण कब भगवा भगवान छोड़ सपाई हो जाते हैं..मौहभंग होने या उपेक्षा से फिर भगवा छत्ते के आस-पास मंडराने लगते है कब उमा को पार्टी की उपेक्षा बुरी लगती है औऱ कब वो अटल आजवाणी को बाप समान कहने लगती है पवार कांग्रसे से अलग होते हैं लेकिन फिर वही लोगो के बीच साझा हो जाते है.शिबु कल तक साथ आज नहीं लालू संप्रग के घटक रहे तो लगने लगा वे इससे बड़े हो गये हैं तो बिहार में कैसे कांग्रेस को आने दे झगड़ा कुर्सी टेबल सब कुछ नाचक ..ना जाने कब किस नेता को क्या अच्छा बुरा लग जाता है पता नहीं चलता इतना खुल कर किसी राज या युग में जनता को नहीं छला गया। इसलिए किसी रिपोर्ट, सर्वे, और साराशों पर ना जाए बल्कि सीधे सियासत की अंधी चाल को समझें...
वरुण के सखाजी
पत्रकार ज़ी24घंटे,छत्तीसगढ़
रायपुर
09009986179
sakhajee@yahoo.co.in

9.6.09

सागर की छाती पर बन गया पुल

कानूनी दावं पेंच सियासी अखाडे की जंग और स्थानीय लोगों की नाराजगी झेलकर मुंबई करों के स्वागत के लिए सागर की छाती पर बांद्रावरली सी लिंक बनाकर तैयार हो गया है। २००१ में पुल बनाने की नींव शुरू हुई थी। और २००४ में बनाकर तैयार होना था। लेकिन इस योजना को नज़र लग गयी और काम धीरे धीरे खटाई में पड़ता चला गया। चार सौ करोड़ रुपये में बनकरतैयार होने वाला ये पुल १६०० करोड़ रुपये बनकरतैयार हुआ। प्रोजेक्ट पर काम जैसे ही काम शुरू हुआ। तो सागर की अथाह गहराई की तरह अड़चने आने शुरू हों गयी। कभी मछिमारों की मार तो कभी पर्यावरण विदों ने अड़ंगा डालते रहे। रही सही कसर सियासत भी होती रही । और नतीजे ये निकलते रहे की प्रोजेक्ट ख़ुद सागर में गोताखाने लगा। लेकिन पुल को बनाने वाली कंपनी हिन्दुस्तान कन्स्ट्रशन ने हार नहीं मानी । और सागर की अथाह गहराईको नापने के लिए आतुर रही। लगभग ५० मंजिल की ईमारत की ऊंचाई पर बनाये गए इस पुल को केबल से बांधा गया है। और इसके केबल चीन से मंगाए गए हैं। एक केबल तकरीबन ८०० टन का वजन सहन कर सकता है।सात किलोमीटर के लंबे इस पुल ५.१ किलोमीटर का समुद्री मार्ग है। इस पुल से हर दिन करीबन सवा लाख गाड़िया गुजरेंगी। मुसाफिरों को जो रास्ता तय करने में 40 मिनट का समय खर्च करना पड़ता था, अब यह दूरी महज 6-7 मिनट में तय की जा सकेगी। करीबन साढ़े सात किलोमीटर लम्बे इस अजूबे में ट्रैफिक का दबाव न पड़े इसके लिए इस पुल को आठ लेन का बनाया गया है। इस पुल की ऊंचाई समुद्रीय सतह से 126 मीटर से भी ज्यादा है। आम लोगों की भाषा में कहे तो मुंबई की 50 माले वाली बिल्डिंग से भी ज्यादा ऊंचा है। पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरा पुल केबल्स की मदद से बांधकर खड़ा किया गया है। पुल में लगे केबल्स चीन से मंगवाए गए हैं। करीबन 432 केबल्स द्वारा बांधे गए इस पुल को जंग से बचाने के लिए खास पेस्ट और पोलिथीन से कवर किया गया है। इसके अलावा पुल में कंक्रीट और स्टील का ही ज्यादातर इस्तेमाल किया गया है। इस सुहाने सफर के लिए लोगों को अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ेगी और सरकार की कमाई भी खूब होगी। इस पुल से एक दिन में लगभग 80 लाख रुपये बतौर टोल टैक्स के रूप में मिलेंगे।एक अनुमान के मुताबिक पुल से हर दिन करीबन एक लाख तीस हजार गाड़ियां गुजरेंगी। लेकिन मोटरसाइकिल प्रेमियों के लिए निराशा भरी बात यह है कि इस पुल पर मोटरसाइकिल चलाने की अनुमति नहीं दी गई है।क्योंकि लम्बा समुद्री पुल होने की वजह से मोटरसाइकिल चालकों के लिए यह पुल खतरनाक साबित हो सकता है जो की तेज हवाएं और गाड़ियों की रफ्तार के चलते मोटरसाइकिल चालक का संतुलन कभी भी बिगाड़ सकती है।इस पुल से करीबन 1।30 लाख गाड़िया गुजरेंगी। एक गाड़ी से औसत टोल टैक्स 60 रुपये भी मान लिया जाए तो 78 लाख रुपये होता है इसको देखते हुए माना जा रहा है कि एक दिन में इस पुल से करीबन 80 लाख रुपये टोल टैक्स के रुप में वसूला जाएगा। पुल की खासियत को देखकर आई आई बी ई ने ब्रिज को देश का सर्वश्रेष्ठ ब्रिज का एवार्ड दिया है। अब इस ब्रिज को जल्द ही आम जनता के हाथों में आ जाएगा जिससे सभी लोग ऊंचाई से सागर का नज़ारा ले सकते है। और भारत की आधुनिक तकनीक और बुलंद इरादों के बल पर देश का पहला समुद्री पुल बनकर तैयार हो गया है। जो सागर की गहराई और आसमान की ऊंचाई नाप रहा है। सागर की छाती पर बनकर पूरे देशवासियों का तहे दिल से स्वागत कर रहा है।

11.7.08

उनको अपने भले की चिन्ता है, मुल्क की क्या करें भलाई वे

ग़ज़ल
देश की दे रहे दुहाई वे.
बांट खायेंगे फिर मलाई वे.

लोटे बिन पेंदी के लुढ़क करके,
दे रहे देखो अब सफाई वे.

गांड फाड़े है सब की मँहगाई,
बुश से करने चले सगाई वे.

चोर-चोरों में मौसिया रिश्ता,
हैं तो आपस में भाई भाई वे.

उनको अपने भले की चिन्ता है,
मुल्क की क्या करे भलाई वे.

भाँड निकले हैं फिर तमाशे को,
कर रहे देखो जगहँसाई वे .

हमने जिन पे था एतबार किया,
आज करते हैं बेवफ़ाई वे.

रोज़ ताज़ा वो ज़ख्म देते हैं,
हँस के बांटे हैं फिर दवाई वे।
-डॉ.सुभाष भदौरिया, अहमदाबाद.