Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

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14.4.09

हिजड़े चाँद से नहीं गिरते

(बरेली के पत्रकार साथी रहमान भी ब्लागिंग में कूद पड़े हैं। उनके ब्लाग 'आजाद आवाज' पर दो पोस्टें हैं जिनमें से एक यहां प्रकाशित कर रहा हूं। उनके ब्लाग का पता है- www.azadawaz.blogspot.com, रहमान की ब्लागिंग की पारी का हम स्वागत करते हैं- यशवंत)
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बरेली में १२ अप्रैल को हिजड़ों पर एक नेशनल सेमिनार हुआ। यहां इसकी चर्चा कई वजहों से जरूरी है। एक तो ये कि ये सेमिनार कथित सभ्य समाज और हिजड़ों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए किया गया था। दूसरे इसे एक एजूकेशनल फाउंडेशन ने आयोजित किया था और संभवतः ये उत्तर प्रदेश का पहला अपनी तरह का आयोजन था। चर्चा इसलिए भी कि ये सेमिनार कुछ सवाल छोड़ गया, जिस पर बहस जरूरी है।सैयद शाह फरजंद अली एजूकेशनल एंड सोशल फाउंडेशन आफ इंडिया के इस आयोजन में जेएनयू के दर्शन शास्त्री प्रो. सत्यपाल गौतम, मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित डा. संदीप पांडेय, अमरीका से प्रकाशित उपन्यास नेवर ट्रस्ट अ गाड से चर्चा में रहे प्रो. एमआई सिद्दीकी, अंग्रेजी लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट शारदा दुबे, गोपाल कृष्ण जैसे लोग इसमें शामिल रहे। इसमें रुहेलखंड भर से तमाम हिजड़े भी जमा हुए थे, जिनका प्रतिनिधित्व उनकी गुरू मीनाक्षी ने किया। मीनाक्षी अंग्रेजी से एमए हैं और काफी संवेदनशील और जागरूक हैं।

कार्यक्रम के बीच में दर्शकों की तरफ से शुरू की गई बहस से मीनाक्षी उद्वलित हो उठीं और उन्होंने एक ऐसा कदम उठा लिया, जिसके बारे में उस वक्त तो कोई चर्चा नहीं हुई, लेकिन कार्यक्रम के बाद वक्ताओं के बीच ये जेरेबहस रहा। मीनाक्षी के वक्तव्य के दौरान एक दर्शक ने सवाल किया कि आप लोग खुद ही समाज से दूर रहते हो और जबरन अपनी संख्या बढ़ाते हो। इस मीनाक्षी जज्बाती हो उठीं। उन्होंने जवाब में समाज को उसका ही चेहरा दिखा दिया। कहा कि हिजड़े चांद से नहीं टपकते, न ही वह जंगल से आते हैं। इसी के साथ उन्होंने हया नाम की अपनी बेटी को मंच पर बुला लिया। कुछ देर बाद ही दर्शकों के बीच से एक पांच-छह साल की एक सुंदर सी दुबली-पतली सी बच्ची गुलाबी फ्राक पहने नजरें झुकाए खड़ी थी। उसके मंच पर आते ही सन्नाटा छा गया। मीनाक्षी ने कहना शुरू कियाः ये बच्ची भी आप ही के सभ्य समाज से आई है। छह साल पहले इसके मां-बाप मेरे पास आए थे और कहा कि मीनाक्षी तुम इसे अपना लो, नहीं तो हमारे पास इसे जहर का इंजेक्शन लगवाने के अलावा कोई चारा नहीं है। मीनाक्षी ने ये कहकर हाल में सनसनी फैला दी कि ये बच्ची भी किन्नर है। उन्होंने बताया कि इसके मां-बाप पहले इसे अनाथालाय ले गए थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि ये किन्नर है तो उन्होंने इसे अपनाने से ही मना कर दिया।

उस वक्त को बात आई-गई हो गई, लेकिन इस सबके बीच एक बच्ची से उसकी सुकून और सम्मान भरी जिंदगी छीन ली गई। उसे सबके बीच में असमान्य होने का एहसास करा दिया गया था। रही-सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी। उसने बच्ची की फोटो सहित इस पूरे वाकिये को फ्लैश कर दिया। उसका चेहरा भी ब्लर करने की जहमत नहीं उठाई गई। अब ये बच्ची न तो कथित सभ्य समाज में सामान्य जीवन जी सकेगी और स्कूल में भी सभी बच्चे उसे अलग तरीके से ट्रीट करेंगे और चिढ़ाएंगे। जाहिर है कि अब उसके पढ़-लिखकर सामान्य जीवन जीने की संभावना शून्य कर दी गई।

हमारा आपसे सवाल है कि इस मामले में बुद्धिजीवियों का क्या रुख होना चाहिए था?
मीडिया का क्या सावधानी बरतनी चाहिए थी?
अब वह बच्ची सामान्य जीवन कैसे जी सकेगी?
और आखिर में, हिजड़ों पर ये आयोजन फिजियो डा. एसई हुदा की सोच का नतीजा था। मरीजों से निकल कर थर्ड जेंडर के लिए ऐसे आयोजन का जोखिम उठाना सराहनीय है।

27.6.08

सदस्य संख्या पहुंची 355, जय हिंदी, जय ब्लागिंग, जय भड़ास

भड़ास की सदस्य संख्या 355 होने पर बधाई। इस महीने हर रोज दो से लेकर चार अनुरोध भड़ास की सदस्यता के लिए आते रहे और इनमें से जिन लोगों ने अपने मोबाइल नंबर, पता और काम-धाम के बारे में जानकारी दी, उन्हें सदस्य बनने के लिए निमंत्रण भेजा गया। नए लोग न सिर्फ भड़ास से तेजी से जुड़ रहे हैं बल्कि आनलाइन कैसे हिंदी लिखना सीख कर टूटी फूटी जुबान में अपनी बात कहने की कोशिश भी कह रहे हैं। हिंदी ब्लागिंग के लिए यह बेहद शुभ है। एक तरफ जहां ढेर सारे ब्लागर अपने ब्लाग को एकला चलो रे के नारे के तहत चला रहे हैं और कई कम्युनिटी ब्लाग अपने कथित वैचारिक दीवारों के चलते नए लोगों को बाहर से ही दर्शक के रूप में बनाए रखने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं, ऐसे में भड़ास जैसा दुनिया का सबसे बड़ा ब्लाग खुले दिल दिमाग से नए लोगों को हिंदी ब्लागिंग का क ख ग सिखा रहा है और उन्हें गलत सही कुछ भी लिखने के लिए, सीखने के लिए, पोस्ट करने के लिए प्रेरित कर रहा है। उम्मीद है भड़ास के जरिए ब्लागिंग सीखने वाले हिंदी भाषी आगे चलकर आनलाइन दुनिया में हिंदी को सम्मान दिलाने के साथ साथ खुद भी आनलाइन माध्यम में अपनी सक्रियता से विशेषज्ञता हासिल कर सकेंगे।

भड़ास संचालन समिति की तरफ से सभी नए भड़ासियों का दिल खोलकर स्वागत करता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि अगर ब्लागिंग करने में किसी भी तरह की तकनीकी दिक्कत आ रही हो तो कृपया वे पोस्ट डालकर या किसी पोस्ट पर कमेंट करके पूछ सकते हैं।

कृपया कोई समाधान बताए?

मुझे खुद एक दिक्कत आ रही है जिसका समाधान दूसरे वरिष्ठ ब्लागर बताने की कृपा करें। भड़ास पर पोस्ट करते समय अक्सर पोस्ट तुरंत पब्लिश नहीं होता और इरर आ जाता है। बाद में दुबारा कोशिश करने पर वह पोस्ट दो या तीन बार भड़ास पर पब्लिश हो जाती है। ऐसा क्यों होता है, समझ में नहीं आता। इसी तरह कई बार पोस्ट करते समय सर्वर इरर शो करता है। क्या यह दिक्कतें भड़ास पर ज्यादा पोस्टें होने के चलते तो नहीं आ रही? कृपया इस बारे में कोई गाइड करे।

आभार के साथ
जय भड़ास
यशवंत

22.6.08

अरे हट जा ताऊ पाछे....दो ब्लागरों का स्वागत करें बढ़कर आगे...

दो ब्लागर साथी भड़ासी बन गए हैं। पीसी रामपुरिया और राजीव कुमार। पीसी रामपुरिया के ब्लाग का नाम है रामपुरिया....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा http://rampuriapc.blogspot.com/। राजीव कुमार के ब्लाग हैं दो टूक http://rajivguw.blogspot.com/ और विचार http://rajivkumar.mywebdunia.com/। राजीव पत्रकार हैं जो पूर्वोत्तर में हैं। पीसी रामपुरिया बिजनेसमैन हैं जो लोकल हरियाणवी लैंग्वेज में मस्त ताऊनामा पेश करते हैं। दोनों ब्लागरों की प्रोफाइल व ब्लाग जोरदार हैं। इन साथियों के भड़ासी बनने पर हम इनका सादर सत्कार करते हैं, अभिनंदन करते हैं और अपने डा. रूपेश जी व पंडित जगदीश त्रिपाठी जी से अनुरोध करूंगा कि वे जल्द ही इन दोनों भलेमानुसों को बुरामानुस बनाने की दीक्षा शुरू कर दें ताकि जो भी इन्हें देखे, पढ़े, जाने....भड़ासी है, भड़ासी है कहकर संबोधित करना शुरू कर दे और ये लोग खूब सोचकर भी यह तय न कर पाएं कि उन्हें भड़ासी कहा जाना उनका सम्मान है या अपमान है :) भई, हम तो इसे सम्मान मानते हैं पर कुछ सड़ियल भाई लोग इसे अपमान बताते हैं। ये आपको तय करना है कि सड़ियल लोगों के कहे के हिसाब से जीना है या अपनी सोच व विचार से जिंदगी के सफर को तय करना है। चलिए, भाषण काफी दे लिया, अब आप लोगों को इन दोनों ब्लागरों के ब्लाग से कुछ चीजें चुराकर पढ़ाते हैं, और हां, इनके ब्लाग को भड़ास के कोने में भी जगह दे दी गई है।
जय भड़ास
यशवंत



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ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
-पीसी रामपुरिया-
ताऊ लद्दा को भैंस चराते चराते अग्रेंजी बोलने का शौकचढ गया। और ताऊ को ठीक से हिन्दी भी नहीबोलनी आवै थी। पर क्या हो सकता है? ताऊ कै दिमागमे आ गयी, तो आ गयी। बहुत दिन तो घर पर ही प्रेक्टिस करता रहा, पर बात बणी नही। और ताऊ नैये पक्का इरादा कर लिया कि अग्रेंजी बोलना सीख के रहेगा। ताऊ बडा उदास हो रहा था। फ़िर किसी ने उसको बताया किपडोस के मोहल्ले मे एक मास्टरनी जी अग्रेंजी की क्लासलेती है और बहुत जल्दी अग्रेंजी सिखा देती है। सो मेरा मट्टा,ताऊ तो मास्टरनी के पास पहुंच लिया। और फ़ीस भी जमा करा दी । दो तीन महिने मे ताऊ थोडी बहुत अन्ग्रेजी की ऐसी तैसी करनेलग गया । इब एक दिन ताउ लद्दा के घर उसकी रिश्ते कीसाली आयी हुयी थी। ताऊ क्लास से शाम को घर आया, औरअपनी साली पर अग्रेंजी का रौब झाडने के लिये बोला -आइ लव यू ...रज्जो । साली भी पढी लिखी थी और अपने जीजा पर जान भीछिडकती थी, सो जवाब मे बोली - जीजा, आइ लव यू टू..! ताऊ लद्दा भी कहां चुप रहनै वाला था? ताऊ बोल्या --आइ लव यू थ्री ......!
Posted by P. C. Rampuria View my complete profile

साभारः रामपुरिया.....रामपुरिया का हरियाणवी ताऊनामा
(आपको उपरोक्त ब्लाग पर ताऊ से संबंधित आपको मजेदार मजेदार पोस्टें पढ़ने को मिलेंगी)
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आजादी नहीं, बर्बादी में लगा है उल्फा
--राजीव कुमार--
उल्फा नेता बांग्लादेश में है। संगठन के बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। कारण बांग्लादेश में बैठे उल्फा के शीर्ष नेता वहां के कट्टरवादी संगठनों की बोली बोल रहे हैं। यह उनकी मजबूरी है। नहीं तो शरण कौन देगा। इसलिए बांग्लादेश के कट्टरवादी संगठनों को खुश करने के लिए उल्फा ने बम विस्फोटों की जिम्मेवारी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर डालनी शुरु कर दी है। उल्फा अब कोई विस्फोट करता है और उसमें यदि कोई मुस्लिम व्यकि्त मारा जाता है तो वह तुरंत इससे मुकर जाता है। गुवाहाटी के आठगांव और हाजो में हुए बम विस्फोट में मुसि्लम लोग मारे गए तो उसने देर किए बिना मीडिया में इसका खंडन भेजा। इन बम विस्फोटों के पीछे असम पबि्लक वर्क्स और आरएसएस के छात्र संगठन का हाथ होने का आरोप मढ़ दिया। अन्य विस्फोटों के मामले में वह इतनी हड़बड़ी नहीं दिखाता है। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,उल्फा बांग्लादेश में बैठे अपने मास्टरों को खुश करने के लिए यह करता है। बांग्लादेश में शरण के बदले उल्फा को वह सारी बातें माननी पड़ रही है जो असम के हितों के खिलाफ है। असम को आजाद कराने का सपना देखनेवाला संगठन इस तरह असम को ही क्षति पहुंचा रहा है।

बांग्लादेश से अबाध घुसपैठ होती है। इस पर वह चुप्पी साधे हुए है। वह बोल नहीं सकता। आसरा मिलने के कारण वह बेबस है। इसके चलते बांग्लादेश की वह योजना सफल होने की ओर बढ़ रही है जिसमें उसने निचले असम के कई जिलों को लेकर वृहतर बांग्लादेश बनाने का सपना देखा है। उल्फा के कंधे पर बंदूक रखकर वह इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

उल्फा का जन्म 7 अप्रेल 1979 को शिवसागर जिले के ऍतिहासिक रंगघर में हुआ था। पर उसने बांग्लादेश में शरण दस साल बाद 1989 में ली। जब उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आशंका हुई। जब उल्फा नेताओं ने बांग्लादेश में शरण ले ली तो राज्य में धीरे-धीरे मुसि्लम आबादी बढ़ने लगी। जानकार बताते हैं कि 1989 में उल्फा का एक नेता बांग्लादेश गया। उसने बांग्लादेश नेशनल पार्टी की तत्कालीन सरकार के एक मंत्री से मुलाकात की। इस बैठक के बाद ही पाकिस्तान के पेशावर में वहां की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटलीजेंस(आईएसआई)ने उल्फा के सदस्यों को 1990-91में प्रशिक्षण दिया। यह शुरुआत थी। लेकिन इसके पहले 1983 में उल्फा के चालीस सदस्यों ने म्यांमार के काचिन में एनएससीएन से हथियारों का प्रशिक्षण पाया था। इसमें उल्फा के सेना प्रमुख परेश बरुवा भी शामिल थे।इसके बाद 1986 में काचिन में 90 उल्फा सदस्यों ने प्रशिक्षण पाया। प्रशिक्षण पानेवालों में उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा भी शामिल थे। इसके बाद ही संगठन ने बांग्लादेश का रुख किया और असम के विनाश का दौर शुरु हो गया। 1971 की जनगणना के अनुसार ग्वालपाड़ा जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 50.11प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 41.50थी। लेकिन 20साल बाद पूरी छवि ही बदल गई। 1991की जनगणना में इस जिले में हिंदुओं की आबादी घटकर 39.89प्रतिशत पर आई जबकि मुसलमानों की बढ़कर 60.46 प्रतिशत पर पहुंच गई। यही हाल धुबड़ी जिले में हुआ। 1971की जनगणना के अनुसार धुबड़ी जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 38.80 प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 60.40 थी। लेकिन 1991की जनगणना के अनुसार इस जिले में हिंदुओं की जनसंख्या घटकर 28.73प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 70.45प्रतिशत हुई।ठीक इसी तरह बरपेटा जिले में 1971 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या51.52प्रतिशत और मुसलमानों की 48.65प्रतिशत थी। पर बीस साल बाद मुसलमानों की बढ़कर 56.07प्रतिशत और हिंदुओं की घटकर 40.26पर आ गई। हाइलाकांदी जिले में 1971की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 47.48 प्रतिशत और मुसलमानों की 51.40प्रतिशत थी।लेकिन बीस साल बाद हिंदुओं की आबादी इस जिले में घटकर 43.71प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 54.79प्रतिशत हो गई।राज्य के अधिकांश जिलों में हिंदुओं की जनसंख्या घटी है जबकि मुसलमानों की बढ़ी है।वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में हिंदुओं की जनसंख्या 64.9प्रतिशत और मुसलमानों की 30.9प्रतिशत थी जबकि 1991की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या 67.1और मुसलमानों की 28.4प्रतिशत थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 36 में मुस्लिम बहुसंख्यक है। भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से बांग्लादेशी घुसपैठियों का निरतंर आना जारी है।इन सबके बीच उल्फा ने हिंदीभाषी मजदूरों की हत्या कर बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोजगार का अवसर दे दिया है।स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रसूल हक ने निचले असम के कई जिलों को लेकर मुस्लिमों के लिए अलग से स्वायत्त परिषद बनाने की मांग की है।उधर उल्फा के सहयोग से राज्य में जेहादी तत्व सक्रिय है।इन सब ने मिलकर राज्य को गर्त में ले जाने का कार्य शुरु कर दिया है।मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,असम स्वाधीन होकर नहीं रह सकता। माना कि हो भी गया तो वह पराधीन ही होगा। उल्फा नेताओं को उसे बांग्लादेश के इशारे पर ही चलाना होगा।इन सब से यह स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में आसरा लेने की कितनी बड़ी कीमत उल्फा नेता चुका रहे हैं।जो आनेवाले दिनों में असम के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी।कारण बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण राज्य में भारी जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संपर्क पता-राजीव कुमार
पोस्ट बाक्स-12,
दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660

Posted by- Rajiv Kumar View my complete profile

साभारः दो टूक

(पूर्वोत्तर को जानने, उस इलाके से जुड़े़ नीतिगत मामलों के बारे में एक पत्रकार के नजरिये को समझने के लिहाज से यह ब्लाग बेहद उपयोगी है)

चरम भड़ासी पं.जगदीश त्रिपाठी भड़ासलोक पर प्रकट, जन-गण के मन प्रसन्न

कुबुलनामा

मेरा दावा पुख्ता है

उपरोक्त दो पोस्टों को लिखने वाले जगदीश त्रिपाठी जी ने मेरे दिल में बड़े गहरे अपनी जगह बना ली है। क्या कबीराना, फक्कड़पना, सूफियाना अंदाज है, बोलने-लिखने और जीने का। पढ़िए आप। किस तरह एक व्यक्ति खुद की धुलाई कर कर बिलकुल साफ निर्मल और सरल बन जाता है। वाकई, मुझे तो बहुत दिनों बाद भड़ास पर किसी असली भड़ासी संत के दर्शन हुए हैं।

जगदीश त्रिपाठी लिखते हैं---

वरुण भाई, मैं वाकई बहुत बदतमीज,बदजुबान हूं. मेरी वाणी में मिठास रहे इसलिए आपकी भौजाई कुछ साल पहले तक मुझे सुबह उठते ही दो चम्मच चीनी खिलाती थीं.एक दिन घर में चीनी खत्म हो गई तो उस दिन मैंने उनकी दो मीठी-मीठी चुम्मी से काम चला लिया. चुम्मी चीनी की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही कारगर साबित हुई तो तब से उसी को नियमित कर दिया.

है किसी में हिम्मत जो इतनी सहजता से इतनी बड़ी बड़ी बातें कह दे। फटे पाजामे टाइप के लोग पूरे दिन इस कोशिश में रहते हैं कि किस तरह लोग उन्हें अच्छा और भला कहें, इस चक्कर में वो ढोंग पर ढोंग, पाखंड पर पाखंड, झूठ पर झूठ बोलते कहते जीते जाते हैं और नतीजा होता है कि वे एक सड़े हुए आदमी की तरह भेड़चाल के हिस्से बन जाते हैं, न अच्छे बन पाते हैं, न बुरे हो पाते हैं, बस बीच में चकरघिन्नी की तरह घूमते घामते निपट जाते हैं।

जगदीश जी की कुछ लाइनें और पढ़िए

मैं २४ कैरेट का शुद्ध ब्राह्मण हूं. ब्राह्मण यानि कि भूसुर यानि की पृथ्वी लोक के देवता. शास्त्रों के अनुसार जो सुरा का सेवन करते हैं वे सुर होते हैं और जो सुरा का सेवन नहीं करते वे असुर होते हैं. २४ कैरेट के शुद्ध भूसुर होने के नाते देवसुलभ प्रवृत्ति अर्थात सुरा पान करना, अप्सराओं पर मोहित होना मेरे स्वाभाव में है. हां इतना जरूर है कि सुंदरियों से अभिसार मात्र मानिसक ही होता है.इसके दो कारण हैं. पहला मैं दुनिया के हर दुष्कर्म बेहिचक कर लेता हूं लेकिन किसी के भरोसे को चोट पहुंचाना मेरी फितरत में नहीं है. दूसरा कारण यह भी है कि कहीं इस बात का पता मेरी लैला को चल गया तो वह लैला अली बन जाएंगी और मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा.

अपनी नवीनतम पोस्ट में जगदीश जी लिखते हैं....

बंधु मैं, सुर हूं. भूसुर. असुर नहीं. जो सुरा का सेवन करते हैं वे सुर होते हैं. जो नहीं करते वे असुर होते हैं. आपने मुझे असुर कह कर मेरी तौहीन की है. यह घोर अपराध है. आपको इसका प्रायशिचत करना होगा. उत्कृष्ट कोटि का सुरापान कराना होगा अन्यथा...मैं रोने लगूंगा, श्राप दे नहीं सकता क्योंकि छोटे भाई हो.

.....देवसुलभ गुण मसलन सुरा सेवन, परस्त्री आसक्ति के साथ-साथ देवत्व के लिए अनिवार्य न्यूनतम धूर्तताएं एवं छल प्रपंच कर येन-केन-प्रकारेण जीत हासिल करने जैसी योग्यताएं होना आवश्यक हैं. बंधुओं मेरे भीतर ये सारे गुण प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं. इसलिए मैं भला आदमी होने का दावा नहीं करता लेकिन २४ कैरेट का ब्राह्रमण होने का दावा जरूर करता हूं,क्योंकि मैं हूं. आपको बता दूं कि २४ कैरेट का ब्राह्णण होने के लिए मदिरा पान ही नहीं, मुर्ग भक्षण भी आवश्यक है.क्यों ? अगले अपलेख में बताऊंगा.....

जगदीश जी, मैं तो आपके लिखे का फैन हो गया। अपने हरे भइया, पंडित सुरेश नीरव जी, डाक्टर साहब समेत समस्त सुर असुर भड़ासी जनों से निवेदन करता हूं कि चरम भड़ासी जगदीश जी के भड़ासलोक पर प्रकट होकर समस्त जन गण के मन को तृप्त करने के इस मौके पर उनका हार्दिक अभिनंदन किया जाए, वंदन किया जाए और उनके सम्मान में कुछ शब्द बोले-गढ़े-पेले जाएं।
जय भड़ास
यशवंत

13.6.08

पराठे में आइसक्रीम..........Hasya Gazal Sir

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जय नीरव, जय यशवंत, जय भड़ास।

यशवंत दादा के सम्मान में, महीने भर से मन में दबे गुबार के दबाव में एक हास्य गजल भेज रहा हूं। आशा है मंच देंगे, आभारी रहूंगा। भड़ास को घर-आंगन मानता हूं इसलिए भेज रहा हूं।

मुलाहिजा-----

शीर्षक- पराठे में आइसक्रीम

त्वचा है भैंस की, चेहरे पर विनम्र बैल की मुस्कान है।
बख्शीश लेते देखा मोहल्ले में तो लगा वाकई महान है।।

विचार तस्करी के हैं, एनजीओ की आढ़त से थोक लाता है।
डाल के चुग्गा दिहाड़ी पर रेजा से फटकता, बिनवाता है।।

इंटलेक्चुअल है, रिभोलूसनरी है, ग्यान की बरखा है।
प्रभात से रात तक चलता चमचों का चरखा है।।

आदमी अच्छा है, बस एक पोशीदा बीमारी है।
जो इसके ईगो को आंख मार दे बलात्कारी है।।

नैतिक इतना है कि आइसक्रीम लपेटी है पराठे में।
इसका हर राजदार सिसकता मिला है घाटे में।।

बाप मास्टर है प्राइमरी का प्रोफेसर बताता है।
खाई मकुनी दरभंगा में दिल्ली में बर्गर बताता है।

कर्ज देते कहता- दोस्त है, दास है, दासानुदास है।
न आना फंदे में किसान यह कर्नाटक की कपास है।।

वीरेंदर गठवाला
-किसान-
मुजफ्फर नगर, यूपी।

(भड़ास के लिए आई एक मेल)

2.6.08

बोलना आज की डेट में कई लोगों को खटक सकता है, इसलिए चुप ही रहते हैं

(कुमार विनोद जी ने एक मेल के जरिए अपने ब्लाग के बारे में जानकारी दी तो उत्सुकतावश क्या सीन है http://kyascenehai.blogspot.com के पास पहुंच गया। इसमें सबसे मजेदार मुझे उनकी प्रोफाइल लगी जो कितनी सच्ची और खरी-खरी खुद के बारे में कही गई है। सच में, ये तो साक्षात भड़ासी जान पड़ते हैं। तो लीजिए कुमार विनोद के बारे में और उनके ब्लाग के बारे में जानिए। यह कवायद दूसरे अच्छे ब्लागों व ब्लागरों को प्रमोट करने के क्रम में की जा रही है ताकि उनके लिखे को पूरी दुनिया के हिंदी वाले जान सकें, पढ़ सकें.....यशवंत)


कुमार विनोद की प्रोफाइल

कुमार विनोद
Age: 33
Gender: Male
Astrological Sign: Cancer
Zodiac Year: Tiger
Industry: Telecommunications
Location: अब तो दिल्ली वाले हो गए हैं : क्रांति प्रदेश : India
About Me
पेशा तो है हमारा- आप कहें और हम जानें का, क्योंकि हमारे पेशे में सुनने की सख्त हिदायत है. मगर लगातार सुनते रहने की क्रिया कालांतर में ऐसी प्रतिक्रिया करती है कि अगर 'रसायन' को बाहर न आने दें तो खाज शुरू हो जाती है. लेकिन दिक्कत ये है कि बोलना आज की डेट में कई लोगों को खटक सकता है, इसलिए अक्सर चुप ही रहते हैं-(वैसे भी डेस्क जॉब इसकी ज्यादा गुंजाईश भी नहीं छोड़ता)लेकिन प्रकृति का नियम है, 'जो अंदर जाता है वो बाहर आता है, भले ही निकलने का अनुपात अलग हो.' इस तरह अपने लेखन को उत्सर्जन कह सकते हैं- और कहें भी क्या?

कुमार विनोद के ब्लाग से


कमिंग अप...

अरसा हो गया आपसे मुखातिब हुए.

आप उपरोक्त वाक्य की नाटकीयता पर मत जाइए, वाकई अरसा हो गया खामोश हुए.

आप कह सकते हैं इस खामोशी को निर्जन चुप्पी, एक मरी हुई खामोशी. मैंने अपने होने का आखिरी निशान (पोस्ट) मोहब्बत के पर्व से ठीक एक दिन पहले दिया था (13 फरवरी), और आज जब मैं अपना होना फिर से साबित कर रहा हूं, ये आतंक की अगली रात है- जयपुर ब्लास्ट के गुबार से भरी हुई, खून में सनी, कराहों में लथपथ, टूटे हुए भरोसों की एक काली रात...

बात जिस निर्लज्ज नायक के साथ खत्म हुई थी, ये रात उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हो चुकी है. वो नायक अपनी करतूतों की वजह से खुद हास्यास्पद हो गया है, वो जितनी जोर से मराठा राग अलापता है, खुद को महाराष्ट्र का अकेला हितैषी बताता है, लोग अब उतनी ही जोर से बोलने लगे हैं- देखो, फिर बोला राज, अगर हमारी टीवी की भाषा में कहें तो राज ने फिर उगली आग, फिर उगला जहर, अब आखिर हम कितनी बार कहें फिर, हर दूसरी बात तो ये फिर-फिर हो जा रहा है, 'राज' के साथ खबर की स्क्रिप्ट भी हास्यास्पद होती जा रही है, सो मैंने रियेक्ट करना छोड़ दिया...क्या मुंह लगाना!

लेकिन, ये चुप्पी ठीक नहीं थी...

पता नहीं आज ऐसा क्यों लग रहा है, क्यों लग रहा है कि आदमी का अपनी खोल में दुबक जाना खुदकुशी के बराबर है, गुलाबी शहर की जख्मी गलियों ने जागती आंखों के तमाम सपने बेमानी कर दिए हैं, डर लगता है अब कभी खुद को लेकर खुशफहमी पालने में, जिंदगी इतनी सस्ती हो चुकी है नफरत के सौदगारों के लिए. वैसे साबित तो इन्होंने कई बार किया है- कि जब जब कोई मजहब या पंथ, राष्ट्र या समुदाय का अगुवा बनने की कोशिश करता है, उसका इकलौता हितेषी होने का दावा करता है, वो फिर इंसान नहीं रह जाता, क्योंकि वो इंसानियत की कीमत पर अपने संबंधित समुदाय का अस्तित्व चाहता है, इसे हासिल करने के लिए वो लाशें बिछा सकता है, और जब उसका अस्तित्व कायम हो जाए, तो भी लाशें बिछाने का सिलसिला नहीं थमता, क्योंकि तब वो अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए वो
तरकीब लगाता है- डिवाइड एंड रूल...

किसी को लग नहीं रहा है, लेकिन ये फार्मूला आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हो चुका है. धमाके अब दहशत पैदा करने से ज्यादा, भाईचारा तोड़ने के लिए किये जा रहे हैं. आतंकवादी तो आतंकवादी दुनिया भर के सियासतदान भी यही फार्मूला अपना रहे हैं.

ये बेहद खतरनाक समय है, ये वक्त खामोश रहने का नहीं हैं, जिंदगी को हमें हमेशा 'टीज'* करते रहना होगा, ताकि अगली सांसों को चलते रहने का भरोसा पहले ही मिल जाए, टूटते हुए भरोसे को जुड़े रहने का आस मिल जाए, घुटती हुई आस को ख्वाबों का जहां मिल जाए, और दर्द से कराहते जहां के जख्म को इंसानी मरहम मिल जाए. So, lets fire the band- Coming up next

*(टीवी की भाषा में टीज करना ब्रेक से पहले अगली खबर की झलक दिखाने को कहते हैं, ये दर्शको को बुलेटिन से बांधे रखने का पॉपुलर फार्मूला है.)

कुमार विनोद के ब्लाग क्या सीन है http://kyascenehai.blogspot.com से साभार

30.5.08

आदमी या कुत्ते

yasawant ji

pahali bar BHADAS par POST bhej raha hu. par usame type nahi kar pata is liye word ki file send kar raha hu, ho sake to jagah dejiyega.

SAGAR S PATIl
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(सागर भाई, आपने जो मैटर भेजा था, वो चाणक्या फांट में था। उसे मैंने फांट कनवर्टर के सहारे चाणक्या से यूनीकोड में करके यहां प्रकाशित कर रहा हूं। ....यशवंत)
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आदमी या कुत्ते

सागर एस पाटिल
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आज एक मोबाइल वालों की दुकान में जाने का मौका मिला। वहां दरवाजे पर एक जानवर बना था और नीचे लिखा था हैप्पी टू सी यू और वो जानवर था कुत्ता। तो मन में आया अब यहीं दिन रह गया था देखने के लिए कि एक कुत्ता हमें देखकर खुश हो रहा है। अब आदमी और आदमियत बची ही नहीं हमें देखकर खुश होने के लिए।

खैर जब पत्रकारिता में आया था तभी से कुछ जानवरों की श्रेणी में आ गया था। तब लगा कि शायद यही कीमत रह गई है मेरी और मेरे जैसे और ग्राहकों की जो उस मोबाइल सेवा को ले रहे हैं या लेने की सोच रहे हैं। पर अंदर गया तो कुछ शानदार कपड़े पहने लोग थे। मुझे तो लगा था कि उसी तरह के कुछ जानवर होंगे अंदर।

रिसेप्शन पर एक कुतिया बैठी होगी जीभ निकालकर और लिखा होगा मे आई हैल्प यू या एनी प्राब्लम से टू मी। एक कुत्ता बैठा होगा और लिखा होगा एक्जीक्यूटिव या मैनेजर या और कुछ। लेकिन वैसा कुछ भी नहीं दिखा वहां तो सब आदमी जैसे दिखने वाले ही जानवर थे। मैंने एक सज्जन से मदद मांगी तो उन्होंने पूरे उत्साह के साथ मदद की। जब मैं चलने को हुआ तो देखा उस वैल ड्रेस तथाकथित पढ़ लिखे आदमी की शर्ट पर लिखा था हैपी टू हैल्प यू और नीचे उन सज्जन का नाम लिखा था। तो मुझे लगा कि उन महाशय इनकी पढ़ाई तो गई बेकर क्योंकि बाहर लिखा था हैप्पी टू सी यू और अंदर लिखा है हैप्पी टू हैल्प यू।

मन में इन खयालों को लेकर मैं निकल आया उस दुकान से और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी भी जीभ लटक गई है मेरी भी पूंछ निकल आई है। हड़बड़ा कर चेक किया तो तसल्ली हुई कि नहीं अभी उस जानवर और मुझमे इतना तो फर्क है कि मेरी जीभ नहीं लटकी है और न ही मेरी पूंछ निकली है। लेकिन क्या पता कब तक..........

sagar s patil
srp1330@gmail.com

22.5.08


विद्रोहिनी
मैं प्रतीक हूँ बदलती भारतीय नारी का जो विद्रोहिनी है अपनी राहें ख़ुद बनती है आजाद है अपनी सीमा ख़ुद निर्धारित करती है. It’s a space of changed Indian woman..
Tuesday, May 20, 2008

बलात्कार करेंगे
बहुत देखें हैं ऐसे जो हमे तन ढकने की धमकी देते हैं,न ढको तो बलात्कार करेंगेबहुत देखें हैं ऐसे जो हमे जो कमाने खाने के लिए घर से न निकलने की धमकी देतें है,निकलोगी तो बलात्कार करेंगेबहुत देखें हैं हमने ऐसे जो परम्परा का रोना रोते है, न मानोगी तो बलात्कार करेंगेबेटी बहन माँ या पत्नी बन के रहो न रहोगी तो बलात्कार करेंगेहमारी बराबरी न करो,हमारे साथ नही पीछे चलो न मानोगी तो बलात्कार करेंगेकितनी बार बलात्कार करोगे हम जिए हैं जीते रहेंगेडर ख़त्म हो गया है हमारा अब समर है हमारा नारा
Posted by मेरा कोई नाम नही मैं विचारधारा हूँ,एक क्रांति हूँ.. एक विद्रोह हूँ -विद्रोहिनी at 5:26 AM

3 comments:
शोभा said...
बहुत बढ़िया लिखा है। अगर ऐसा आत्मविश्वास आजाए तो कुछ भी बदला जा सकता है। बधाई
May 21, 2008 8:14 AM
अमिताभ फौजदार said...
डर ख़त्म हो गया है हमारा अब समर है हमारा नाराvery nice !! with best compliments amitabh
May 21, 2008 10:22 AM
Lovely kumari said...
chubhti sachayi.
May 21, 2008 10:37 AM
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मेरा कोई नाम नही मैं विचारधारा हूँ,एक क्रांति हूँ.. एक विद्रोह हूँ -विद्रोहिनी
About Me
ध्यान से देखो मैं तुम्हारे आस पास विचरती मिल जाउंगी.मैं समाज मे सर्वत्र हूँ, फिर भी मैं असामाजिक हूँ.मैंने अपनी परिभाषा ख़ुद बनाई है.मैं अपने चरित्र निर्धारण के लिए वेदों-पुराणों या घिसी-पिटी सामाजिक मान्यताओं का मुह नही जोहती. हाँ मैं विद्रोहिनी हूँ, मैं क्रांतिकरिणी हूँ


Blog Name

विद्रोहिनी

5.5.08

महानगरों में पत्रकारिता का सच... (अक्षत सक्सेना की भड़ास)

भड़ास ज्वाइन करने के लिए रोजाना छह से दस मेल मेरे पास आती हैं। इनमें से एक मेल अक्षत सक्सेना की भी है। उन्हें मैंने भड़ास ज्वाइन करने के लिए इनवीटेशन तो भेज दिया है पर उन्होंने अपनी भड़ास निकालने के लिए मेंबर बनने के बाद लिखने की जहमत उठाने के बजाय, लिखकर मुझे डायरेक्ट मेल कर दिया। उनकी भावना का कद्र करते हुए उनकी भड़ास को हू ब हू प्रकाशित कर रहा हूं। उम्मीद है, आगे से अक्षत जी भड़ास का सदस्य बनकर खुद ही अपनी बात यहां सीधे सीधे लिख सकेंगे क्योंकि भड़ास की खासियत यही है कि यहां जितने भी भड़ासी सदस्य हैं (290) वो खुद ही संपादक हैं। उनके लिखे को कोई संपादित नहीं करता। वे लिखते हैं और तुरंत पोस्ट कर देते हैं और फिर सारी दुनिया पढ़ती है।

क्योंकि हम यह मानते हैं कि इस देश का हर पढ़ा लिखा पत्रकार और हर पत्रकार संपादक होने की हैसियत रखता है। हमें अपने साथियों के विवेक पर भरोसा है।

आप सभी साथी अक्षत जी के लिखे को पढ़ें और इस पोस्ट को उनकी पहली पोस्ट मानकर उनका गर्मजोशी से स्वागत करें।


जय भड़ास
यशवंत

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महानगरों में पत्रकारिता का सच

आज के इस बदलते युग में हर इंसान अपनी पहचान बनाने में लगा हुआ है फिर इसके लिए उसे कुछ भी कर गुजरना पड़े और इसके लिए सबसे बढिया रास्ता है की आप पत्रकार बन जाओ।

जी हां, आपको पढ़ कर हसी आ रही होगी पर अब ये हकीक़त है।

अगर हम महानगरों की बात करे तो यह पर आपको बहुत से ऐसे लोग मिल जायेंगे जो अपने आप को किसी भी प्रठिस्तित अख़बार या न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर बताएँगे हालाकि उनका सीधे तौर पर उस संस्थान से कोई सम्बन्ध न हो पर आख़िर किसी न किसी ने उनको ये दर्जा दिया है जिसका वो फायदा उठा रहे है। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगो को जो उन लोगो के हाथो में ऐसी बागडोर को दिए हुए है जिनका पत्रकारिता जगत से कोई सम्बन्ध नही है। आज हर पत्रकार टि आर पी के चक्कर में अपनी नैतिक जिम्मेदारी भूल चुका है। मैं स्पेसिल्ली इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकारों के बारे में कह रहा हू। चूँकि मै प्रिंट मीडिया से उतना मुताखिब नही हू इस वजह से उस पर कोई भी टिप्परी करना अनुचित होगा। लेकिन कही न कही खोट उसमे भी होगी।

आज महानगरों की तो ये स्थिती हो चुकी है की हर दूसरा व्यक्ति आपको एक ही न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर मिल जाएगा। हर व्यक्ति की गाड़ी में आपको बड़े बड़े अक्षरों में प्रेस लिखा मिल जाएगा।

लीजिये साहब हो गए पत्रकार।
अब इनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता है।
अब ये बेरोक रोक टोक कही पर भी आ जा सकते है।
कुछ भी कर सकते है।
किसी से भी लड़ सकते है।
उसे मार सकते है या उसके खिलाफ थाने में झूटी रिपोर्ट लिखा सकते है।

जी हा, ये सब कुछ कर सकते है और आख़िर करे भी क्यों न। आख़िर उन सबके पीछे हाथ भी तो इनके बिग बॉस का है। मतलब असली रिपोर्टर का भाई। सीधा हिसाब है। अब चैनल को चाहिए ख़बर ओर ख़बर के लिए रिपोर्टर को तो पूरे सहर में दौड़ना पड़ेगा न। अब इतने बड़े महानगरों में कोई अकेला रिपोर्टर कैसे काम करे। तो चलिए संस्थान नही तो क्या हुआ हम ही रिपोर्टर नियुक्त करे देते है। बस आपके पास एक अदद कैमरा और मोटर साइकिल होनी चाहिए। आप भले ही आठवी पास हो इस से कोई फर्क नही पड़ता है। यहाँ आपकी एडुकेशन के बारे में कोई भी कुछ नही पूछेगा। बस आप को जल्द से जल्द ख़बर ख़बर ले के आनी है। आपकी नौकरी पक्की। अब बात पेमेंट की तो साहब कुछ दे देते है वरना कुछ ने तो कह रखा है जैसे कही वसूल कर सको कर लेना यार कोई कुछ कहे तो हमे बता देना हम संभाल लेंगे। लीजिये साहब, बची कुची कसर भी अब पुरी हो गई। अब हर वो दूसरा व्यक्ति जो टेंपो स्टैंड पर काम करता था या जो सब्जी का ठेला लगता था या वो जो पहले अपराधी थे पुलिस से बचने के लिए पत्रकार हो गए। अब ऐसे ही लोग महानगरों की पत्रकारिता कर रहे है।

अब आप ख़ुद अंदाजा लगा सकते है की इस टि वी पत्रकारिता ने वास्तव में खबरों का स्वरूप बदल कर रख दिया है। अब खबर होती नही है, खबर करवाई जाती है ताकि जो असली पत्रकार है उनकी नौकरी बची रहे और जो पत्रकारिता का चोला पहन कर घूम रहे है उनका धंधा भी चलता रहे। अब ये हकीक़त लोगो को समझ में आ रही है और अब आम जन मानस अब इस चीज़ को पहचान चुका है। अब समय आ गया है की हर पत्रकार अपनी जिम्मेदारी को ख़ुद संभाले और इन व्यक्तियों को कम से कम पत्रकारिता जगत से तो हटा दे ताकि सच्ची पत्रकारिता जिंदा रहे !

--अक्षत सक्सेना (AKSHAT SAXENA)
akshatindia53@gmail.com

15.1.08

कूड़ा कबाड़ा दिल दिमाग से निकालिये, आदमी बनिये

भड़ासियों की संख्या जिस कदर बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए मेरे एक मित्र ने मजाक किया कि आने वाले समय का सबसे सक्रिय और आक्रामक और सच्चा मीडिया दस्ता बनेगा भड़ास। भड़ास जिसे एजेंडे पर ले लेगा उसे कायदे से निपटायेगा। भड़ास जिस मुहिम को लेकर चलेगा, उसे सफल करायेगा। उनके मजाक का आशय था कि अच्छे लोगों का एक जबर्दस्त ग्रुप जो हर तरह के चूतियापे, कुंठा, असुरक्षाबोध, हीनभावना, मठाधीशी, मक्खनबाजी आदि की ऐसी तैसी करने में सक्षम होगा और चूतियों को उनकी औकात में रखने का माध्यम बनेगा।

पर मैं मित्र के इस कथन से असहमत भी हूं और सहमत भी। असहमत इसलिए कि आज के दौर में भड़ास कोई क्रांति नहीं करने जा रहा और न ही इससे क्रांति की अपेक्षा की जानी चाहिए। भड़ास निकाल पाना अपने आप में एक बड़ी परिघटना है जिससे बुरे लोग खुब ब खुद सचेत हो जाते हैं और अच्छे लोग खिल खिल जाते हैं।

तो बंधु, बस मन की गांठें खोलिए और देखिए किस तरह चीजें आसान हो जाती हैं। हो सकता है, शुरुआत में इससे थोड़ी दिक्कत भी महसूस हो क्योंकि जो लोग अपनी भड़ास नहीं निकाल पाते वो भड़ास निकालने वालों को डराते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वो खुद असुरक्षा बोध से ग्रस्त होते हैं और दूसरों को भी इसी दायरे में जीते देखना चाहते हैं। लेकिन आप एक बार अपने असुरक्षाबोध को जीत लीजिये, फिर देखिए, दुनिया आपके कदमों में होगी।

खैर, यहां भाषण देने का मूड नहीं। बस यह बताने का कि भड़ासियों की संख्या अब 163 हो चुकी है। ये जो 12 नए भड़ासी बढ़े हैं, उनका हृदय से स्वागत, साथ में अनुरोध कि भड़ास निकालते रहें, कूड़ा कबाड़ा दिल दिमाग से घटाते रहें। ताकि जीवन और दुनिया जीने लायक बन सके। अभी तो जो हालत है उसमें आदमी वो कहता नहीं, जिसे करता है और आदमी वो करता नहीं जिसे कहता है। इस उलटबांसी को बदलना है। जो दिखो, जो सोचो, वो कहो, वो करो।

दरअसल, मनुष्य बहुत सहज चीज बनकर पैदा होता है जिसे सिस्टम धीरे धीरे इतना हरामी और पक्क्वाला बना देता है कि वो जीने के मायने भूल जाता है। इतना धूर्त, इतना फर्जी, इतना चूतिया बन चुका होता है कि उसे अपने अंदर झांकने का वक्त ही नहीं मिलता। सोते, उठते, जागते, घूमते, आफिस में, घर में, दोस्तों में,.....हर जगह वह झूठ जीने लगता है और फिर झूठ को ही असल जीवन और सच को किताबी बातें मानने लगता है।

ऐसे में हम भड़ासी दरअसल इन्हीं चूतियों को, जो मीडिया में तो भरपूर मात्रा में हैं, हमारे आपके गली मोहल्ले में भी अड़ोस पड़ोस में भारी संख्या में मिल जाएंगे, को फिर से जीने का ककहरा सिखना होगा और खुद भी सीखना होगा।

इसका पहला चरण भड़ास निकालना है। जब हम भड़ास निकालते हैं तो अपने अंदर की सच्चाई को साहस के साथ बाहर लाने की कोशिश करते हैं। अंदर की कुंठा को बाहर लाकर खुद को कुंठामुक्त करते हैं। और इससे शुरू होती है साहस, सहजता और सच को पूरी सुंदरता के साथ समझने और जीने की यात्रा।

मक्रर संक्रांति और लोहरी की शुभकामनाओं-बधाइयों के साथ अपने नए भड़ासी मनोज के जन्मदिन पर बधाई। मनोज ने अपनी पोस्ट में अपना जन्मदिन आज होने की बात कही है और साथ में ये भी कि वो कार्टूनिस्ट हैं, अब शब्दों से भड़ास निकालना चाहते हैं। आपका स्वागत है।

जय भड़ास
यशवंत

14.1.08

ये क्या है....15 taareekh hi last date hai

15 taareekh hi last date hai
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Hind Yugm to subhneerav, me, prabhakar.softy, उमाशंकर, आशेन्द्र, अरविंद, zakia, zaighamimam, yogesh, YO-gesh, yashwant, yashwant_kumar, yashpsd, yashpal, yaminimj, Wish, vrijnandan, vrij_jmi, vote, vnsuman2000, vnsuman1, vividha, vivekdse, vivekdse, vishwanath, vishwa
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Mitro,

Yadi abhi tak aapne Kaviyon aur pathakon ke mahakumbh 'Hind Yugm Unikavi awam Unipathak Pratiyogita' mein bhaag nahin lia to jaldi kijiye... kal hi yaani 15 Jan 2008 kavita bhejane ki akhiri tithi hai...

Adhik jaankari ke liye dekhen http://merekavimitra.blogspot.com/2008/01/2008.html

Dhanyvaad.

Vineet-
Hind Yugm
www.hindyugm.com

उल्लास उमंग भरे त्योहारों की बात ही निराली

happy makar sankranti

//प्रणाम.//
मकर संक्रांति , झारखण्ड के
वनवासियों का महान पर्व
टुसू, लोह्डी और पोंगल..
कहीं अलाव के चारो तरफ घूमकर
खुशियों की दुआएं , कहीं
प्रकृति पूजा, कहीं फसल की
कटाई तो कहीं
गुड-दही-चुडा-तिलकूट की बहार.
उल्लास, उमंग भरे त्योहारों
की बात ही निराली...
छायी रहे हर-पल आपके जीवन
में खुशहाली..

स्वीकार करे आज का अभिवादन...
This message was sent to you by Manish Chaturvedi. To see Manish's
profile click:
http://www.orkut.com/...

अरुण जी, ये नया धंधा (फंडा) क्या है?

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ARUN ARORA to Aseem, editorlokmanch, editor.h.b, Raman, raviratlami, rajneesh_mangla, rajroshan, Rishabha, Ani, दीपक, tripathianujku., me, yogesh, Yogesh, yashwant, unmukt.s, info, Pramod, Obhishek.aggar., patcpl08, Pramendra, Johnson, pandeypiyush07, Amiya, Shastri, alok
show details 13:57 (9 hours ago)

तुरंत नामांकन कराये साल २००७-८ के लिये नामांकन शुरु है..
नियम यहा देखे http://pangebaj.blogspot.com/2008/01/8.html
संकोच ना करे आखिर आपका भी हक है सर्वश्रेष्ठ ब्लोगर कहलाने पर ..और ये हम आपको बनायेगे..
आपका अपना

--
अरूण अरोरा
Coating & Equipments

विनीत, किसी को रिसपेक्ट देने की जरूरत नहीं, बराबरी पर रहिये और जीइए....आप मेंबर बन सकते हैं, भड़ास ध्यान से पढ़िए

i am vineet Inbox
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सहजता सबसे बड़ी चीज है। इसे पाने, जीने और अमल में लाने की कोशिश करिये। कोई दिक्कत होगी तो मैं आपके साथ हूं। किसी तरह का टेंशन लेने का नहीं। --यशवंत

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vineet singh to me
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respected sir'
i can join your blog bhanas. this is very interesting, glorias and exlent idea. your and your team members vision and thot such a gret. i hope you will considor to my arrgument.

विनीत, किसी को रिसपेक्ट देने की जरूरत नहीं, बराबरी पर रहिये और जीइए....आप मेंबर बन सकते हैं, भड़ास ध्यान से पढ़िए

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vineet singh to me
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मृदुल, भड़ास केवल बहादुर निकाल सकते हैं, कायरों की कोई आवाज नहीं होती, आपका स्वागत है

[भड़ास] New comment on देखती आठो पहरिया हो नजरिया भर के ना. Inbox
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mridul to me
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mridul has left a new comment on your post "देखती आठो पहरिया हो नजरिया भर के ना":

mai bhadas ka naya rangruut hu.apki lekhani ka mureed ho gaya hun. vichar itne belaag aur nirmal hain ki apse katai navakif mai apki shakhsiyat aaine ki mafiq dekh raha hun. saadhuvad. aur ha, ye xhadim kai-lekhak aur kalasameekshak hai. abhi gumshuda hun...magar ab khol se bahar ane ko jee chahta hai.
thanx for the motivation.