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15.5.09

...तुरंत फतवा जारी करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की आदत....

विनीत जी, एक बात और, आपने लिखा है...

...............इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तो संजय तिवारी की समझ को और न ही भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह के समर्थन को कि....आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी दिल्ली में खासकर... को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है......

उपरोक्त जो न्याय करने की आपकी बौद्धिक मुखमुद्रा है, वह दिक्कत पैदा करने वाली है और बहस को आगे बढ़ाने से रोकती है। यह खुद को पंच, महंत और मठाधीश मानकर कही गई बात है। संजय तिवारी, यशवंत सिंह, शैलेश भारतवासी ये सभी लोग अगर कोई पहले से ही कोई धीर-गंभीर महंतई नुमान निष्कर्स निकालकर प्रयोग करेंगे तो तय मानिए पिटेंगे। आप जब प्रयोग करते हैं तो आपको बेहद खुले दिल दिमाग से सब कुछ रिसीव करना होता है और उन्हें एनालाइज करना होता है। कई बार डाक्टर किसी को बता देते हैं कि आपको एड्स के लक्षण हैं, आपको हेपाटाइटिस है लेकिन जब वो बारीकी से ठीक जगह चेक कराया जाता है तो पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं है लेकिन वो बेचारा मरीज खुद को एड्स व हेपाटाइटिस का मरीज मानकर अपना आधा खून सुखा चुका होता है।

आपने एक लाइन में इस छोर और उस छोर वाली जो नारेबाजी युक्त सरलीकृत लाइन खींच दी है उससे आपने लोगों को मजबूर कर दिया है वे न खुलें और इसी लाइन रूपी मानक के इर्द गिर्द अपने विचार प्रकट करें। हो सकता है कोई मेरे जैसा हो जो साफ-साफ बताना चाहे कि वो अपने मार्केटिंग व बिजनेस के एक्सपीरियेंस के दौरान किस तरह कंपनियों के साथ बातचीत करता है, उनसे एसोसिएशन बनाता है, तो वो तो कुछ नहीं करेगा क्योंकि उसे लगेगा कि यहां तो गांधी जी की औलादें बैठी हैं और वो बेचार कहां धन कमाने के लिए यहां वहां भटकने वाला सामान्य सा आदमी।

भाई, कौव्वों की तरह किसी पर तुरंत कांव-कांव करने का काम अगर मेरे चिर विरोधी कर रहे होते तो उन्हें मैं कुछ नहीं कहता क्योंकि चरम मूर्ख और मंद बुद्धि को आप कुछ सिखा ही नहीं सकते और न ही उनसे कोई उम्मीद कर सकते हैं। मूर्ख व मंद बुद्धि कहीं जाएगा तो सबसे पहला काम वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन अपने बोलने से करेगा, वो अपनी बात नहीं करेगा, दुनिया जहान और दूसरों की लंबी-लंबी बात पेलेगा। हो सकता है एकाध मूर्ख मेरे लिखे पर गरियाने इस ब्लाग पर भी कमेंट देने आ जाएं :) लेकिन जब बात विनीत कुमार की हो रही है तो उम्मीद बंधती है कि चलो अपने समय में एकाध दो ऐसे लड़के खड़े हो रहे हैं जो चीजें को बेहद रीयलिस्टिक, माडर्न एप्रोच और तटस्थ तरीके से एनालाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। ध्यान रखिए, जल्दबाजी कभी मत करिए। किसी सूचना व तथ्य पर जब तुरंत कोई निष्कर्स निकालते हैं तो वो कुछ और होगा और थोड़े बहुत नए इनपुट व एंगल के बाद थोड़ा ठहरकर निकालेंगे तो कुछ और निकलेगा। तर्क मैथ और साइंस की तरह नहीं होता जिसमें आप दो दूना चार कर देते हैं और चैलेंज कर देते हैं कि दो दूना चार के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता। एक ही चीज के लिए लाख तरीके के निष्कर्स निकाले जा सकते हैं, यह तर्क की खूबी और खराबी होती है। यह तर्क करने वाले पर होता है कि उसे साबित क्या करना है। तो कोशिश यही हो कि चीजें ज्यादा रीयलिस्टिक और माइक्रो एनालिसिस लिए हुए हों, निष्कर्स निकालने का काम हमेशा पाठकों पर छोड़िए। जनता की तरह पाठक भी बहुत समझदार होता है, वो हर गाली और हर आशीर्वाद का मतलब समझता है।

तुरंत न्याय करने वाली और तुरंत फतवा जारी करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की प्रवृत्ति जिसमें हम किसी को तुरंत चोर और किसी को तुरंत महान बता देते हैं, दरअसल यह भी मालिक के नौकर वाली मानसिकता व माहौल की उपज है। उसी पाखंड की उपज है जिसमें आमतौर पर चोर महाराज अपने अपराधबोध को कम करने के लिए महान की मुद्रा में होते हैं और जो वाकई ईमानदार है वो अपनी ईमानदारी के आत्विश्वसा में ऐसा कुछ कर कह जाता है कि उस पर बेईमान का लेबल चस्पा हो जाता है। यही जल्दबाजी, न्यायपूर्ण और पाखंड भरी मुखमुद्रा आप लोगों से कभी भड़ास डाट काम पर दलाली होती है तो कभी यशवंत बलात्कारी हिंदी की महान शैतान कथा जैसी पोस्टें लिखने-लिखाने पर मजबूर करती हैं। आमतौर पर हम हिंदी वाले इन फतवों से बहुत डरते हैं लेकिन जिस दिन इन फतवों को जीवन का जरूरी हिस्सा मानकर सहज रूप से लेते हुए अपने को एकाग्र कर आगे चलने की कोशिश करना सीख लेते हैं, उस दिन लगने लगता है कि यार हम अब तक कहां और किस तरह के माइंडसेट के लोगों के बीच जी रहे थे!!!!!!!

संजय जी के आर्टिकल पर किसी पवनसुत ने एक लाइन का कमेंट किया है कि चुनाव में माल कमाने के बात दुकान बढ़ा रहे हो भाई। ये कमेंट संजय जी को विचलित कर गया। यह संजय जी का आंतरिक द्वंद्व है जिसमें वो किसी भीड़ की तरफ से उछाले गए जुमले से प्रभावित हो जाते हैं। आप ये मानकर चलिए कि जब आप भीड़ से थोड़ा उपर उठते हैं तो भीड़ आपको अपने हिसाब से एनालाइज करती है। कुछ बताएंगे कि चोरी से बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि दलाली किया है, कुछ कहेंगे कि मेहनती और प्रतिभाशाली था, इसलिए बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि कोई विकल्प नहीं था इसलिए मजबूरी में बढ़ गया है..... जाकी रही भावना जैसी।

संजय तिवारी जी की पोस्ट पर मैंने जो कमेंट किया है, उसमें संजय जी के दर्द को ही आगे बढ़ाया है, अपने अऩुभव को उड़ेलते हुए। संजय जी अपनी पीड़ा कह गए, हो सकता है यह पीड़ा शैलश जी और मैं कुछ दिन बाद कहूं या फिर हो सकता है कि हम लोग हाथ पांव मारकर अपने को जिला ले जाएं ...कुछ भी हो सकता है क्योंकि हम नए और कच्चे खिलाड़ी हैं बाजार के खेल के।

पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं, रिलायंस और धीरूभाई अंबानी पर उस जमाने में भ्रष्टाचार के इतने आरोप, किस्से, चर्चे क्यों थे.....??? मेरे एक वरिष्ठ उद्यमी मित्र ने बताया कि धीरूभाई अंबानी देश के बड़े उद्यमियों की जमी-जमाई जमात में अच्छे खासे तरीके से घुसपैठ कर रहे थे और उन स्थापित व परंपरागत अरबपतियों के धंधे को चुनौती पेश कर रहे थे इसलिए उन सभी ने मिलकर प्रेस व सत्ता पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए धीरूभाई को खलनायक साबित कराने की भरसक कोशिश की और इसमें काफी हद तक सफल भी हुए। उस मित्र का कहना है कि धीरूभाई ने उतना ही या उससे भी कम भ्रष्टाचार किया था जितना वे जमे-जमाए उद्यमी करते थे लेकिन धीरूभाई आरोपी इसलिए बन गए क्योंकि उन्हें बाजार के स्थापित दिग्गज यूं ही अपने बराबर खड़ा देख पाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें अपनी दुनिया में किसी देसी और नए का घुसपैठ मंजूर नहीं था। उनकी इलीट मेंटलटी उन्हें उकसा रही थी कि इस नए उद्यमी को नष्ट करो वरना हम सबके धंधे को चौपट कर देगा। बड़ी बड़ी कंपनियां सत्ता और विपक्ष में बैठे लोगों को अरबों-खरबों का चंदा इसलिए देती हैं क्योंकि उन्हें सरकारों से अपने अनुकूल नीतियां बनवानी होती हैं।

यह एक रुटीन और सहज कार्य है जो हर देश में संपादित किया जाता है लेकिन यह इतना उच्च भ्रष्टाचार होता है कि इस भ्रष्टाचार को सीबीआई रा सीआईडी जैसी तमाम खुफिया संस्थाओं के ईमानदारी के राडार कैच ही नहीं कर पाते। ऐसा क्यों है कि अनिल और मुकेश अंबानी चुनाव नतीजों से ठीक पहले आडवाणी समेत तमाम दिग्गज नेताओं से मिलने लगे हैं, क्योंकि सरकार बनवाने गिराने में इन धनपशुओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। तो ये काम उद्यमी बहुत पहले से करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे क्योकि इनके टर्मनोलोजी में यह सब कुछ करना कतई भ्रष्चाचार नहीं होता बल्कि यह उनके जीवन जीने के हिस्से का अनिवार्य 'नैतिक अंग' होता है।

नीत्शे को मैं सपोर्ट नहीं करता लेकिन उनकी जो बात है, गुलाम मानसिकता और प्रभु मानसिकता, वो काफी कुछ आधुनिक लोकतंत्रों में देखने को मिल जाता है। नीत्शे के हिसाब से देखें तो हम लोग ब्लाग पर ये जो कुछ अल्ल बल्ल सल्ल कर रहे हैं ये गुलाम मानसिकता वालों की चोंचलेबाजी है जो अपना जीवन आदर्श व सिद्धांतों के द्वंद्व के बीच ही गंवा-गुजार देते हैं। नीत्शे के मुताबिक प्रभु मानसिकता वालों के एजेंडे में ये ईमानदारी, नैतिकता, मानवीयता, करुणा जैसे शब्द होते ही नहीं। उन्हें हमेशा विजेता रहना है इसलिए वे किसी भी तरह विजेता रहना चाहते हैं और विजेता बनने के लिए वो सब कुछ करते हैं जिससे विजेता बनने की राह आसान होती हो। पर नीत्शे को सपोर्ट नहीं किया जा सकता। नीत्शे जैसे लाखों दर्शनशास्त्री हैं और इन्हें पढ़कर केवल यह जाना जा सकता है कि मनुष्यों के दुनिया देखने के तरीके कितने हैं और हमारा खुद का तरीका क्या है।

तो विनीत जी, आपसे गुजारिश है कि बहसों का निष्कर्स शुरू में ही मत निकाला करिए। यह गलती पहले मैं भी करता था लेकिन मुझे अब लगने लगा है कि मैं कुछ नहीं जानता। मुझे बहुत कुछ जानना सीखना है। जिस दिन यह समझ गया उस दिन से मैं अब कहीं भी खुद के विचार लिखने से परहेज करने लगा हूं क्योकि मैं वो नहीं लिखना चाहता जो मैं महसूस नहीं करता और जो जीता नहीं।

आभार के साथ
यशवंत

(यह कमेंट विनीत कुमार के ब्लाग गाहे-बगाहे पर प्रकाशित पोस्ट "संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ?" पर प्रकाशित किया गया है)

.........ये जो मालिक लोग हैं और ये जो उनके नौकर लोग हैं.........

विनीत जी,

आजकल मैं कुछ इस तरह से सोच रहा हूं..............मान लीजिए कि एक दुनिया है, जिसमें दो तरह के लोग होते हैं, एक मालिक लोग, दूसरे मालिक की कंपनियों में नौकरी करने वाले लोग। ये जो मालिक लोग हैं, उनका सोचने का तरीका बिलकुल अलग होता है। उनके घर पैदा हुआ लौंडा बचपन से ही बिजनेस, कंटेंट, प्रोडक्ट, मार्केटिंग, रेवेन्यू, मैन पावर, रिसेसन, प्राफिट, शेयर, सेंसेक्स, वेंचर, प्रोजेक्ट, इनवेस्टमेंट, शेयरहोल्डिंग, इनफ्रास्ट्रक्चर, इकानामिक पालिसी जैसे दर्जनों विशिष्ट शब्दों को सुनते-सीखते बढ़ता है और फिर सहज स्वाभाविक रूप से अपने बाप के अब तक के सफल (पूंजी के लिहाज से) काम को और ज्यादा सफल बनाने के लिए हर माडर्न हथियार (टेक्नालाजी, मैनेजमेंट, विजन..) का इस्तेमाल करते हुए जुट जाता है। इस मालिक की कंपनियों में काम करने वाले जो दूसरे तरह के लोग होते हैं, उनके लौंडे बचपन से गांधी जी, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, नौकरी, सिपाही, डिप्टी कलेक्टर, किसानी, भाईचारा, नैतिकता जैसे धीर-गंभीर शब्द सुनते-सीखते हैं और जब बड़े होकर बाजार में उतरते हैं तो अपने को या तो इस बाजार में फिट नहीं पाते या फिर बाजार को कोसते हुए खुद को अलग कर लेते हैं। जो बाजार में घुस जाते हैं वे काफी लंबे समय तक बाजार के फंडे को सीखने बूझने में ही वक्त लगा देते हैं और जब तक सीख समझ पाते हैं तब तक उनके रिटायरमेंट की उम्र आ जाती है।

गांव में जिस गाय-भैंस खरीदकर पशु मेले में बढ़े दाम पर बेचने वाले को दलाल कहा जाता है, इसी मुनाफे के शहरी, नियोजित और आधुनिक खेल खेलने वालों को इंटरप्रेन्योर, उद्यमी या शेयर ब्रोकर कहा जाता है। जब कोई देसज हिंदी वाला मालिक लोगों की श्रेणी में आने की कोशिश करता है तो उसकी पहली लड़ाई खुद उसी की विचारधारा से होती है। यह आंतरिक वैचारिक जंग अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग समय तक और अलग-अलग लेवल पर चलती रहती है। यह डिपेंड करता है उस व्यक्ति के माइंडसेट, उसके अनुभव, उसके पलने-पढ़ने के माहौल और सोचने के तरीके पर। जितने भी दिनों बाद, इस वैचारिक जंग में अगर आप जीतकर मालिक के माइंडसेट के करीब पहुंच जाते हैं तो आप फिर स्पष्ट विजन और लक्ष्य के साथ आगे बढ़ पाते हैं।

मुनाफे और लाभ की कोई नैतिकता नहीं होती, बल्कि यूं कहें कि मुनाफा और लाभ मूलतः अनैतिक चीज है तो कोई गलत नहीं है लेकिन यह सिस्टम इस तरह बनाया जा चुका है कि बिना मुनाफे कमाए न तो किसी किराने वाले की दुकान चल सकती है और न ही अंबानी जी की कंपनी। बिना अतिरिक्त रकम कमाए न तो कोई ब्यूरोक्रेट जी सकता है और न ही कोई राजनेता। मैं उन राजनेताओं और ब्यूरोक्रेटों की बात कर रहा हूं जो मुख्यधारा में हैं, जो सत्ता के नजदीकी हैं। सत्ता का करीबी ब्यूरोक्रेट अगर अतिरिक्त कमाई नहीं भी करता है तो वह उद्यमियों कंपनियों द्वारा तरह तरह से ओबलाइज किया जाता है। तो यह जो मुनाफा और लाभ है, वह कमाने वाले के उपर होता है कि वह अपने मुनाफे और लाभ को कितना कानूनी चोला व सामाजिक जामा पहना कर दूसरी श्रेणी वाली जनता उर्फ जनता से बने समाज को दिखा पाता है। जितना नंबर एक में दिखा पाया, दिखा दिया, बाकी दो नंबर के धन के बारे में कितना कुछ कहा लिखा जा चुका है, सब जानते हैं।

संजय जी 24 कैरट वाले पत्रकार और मनुष्य हैं। वे जिस सदभावना और नेकनीयती की अपेक्षा समाज से रखते हैं, वो सदभावना और नेकनीयती अब समाज की मानसिकता में बची नहीं क्योंकि समाज की सदभावना और नेकनीयती को अतीत में ढेरों चिटफंड कंपनियों, नेताओं, अफसरों, चोरों, उचक्कों, दलालों ने कई कई बार ठगा है इसलिए सहज रूप से किसी पर भरोसा न करने की जो प्रवृत्ति डेवलप हो रही है, वह बाजार अनुकूल जरूर है लेकिन समाज व मनुष्यता विरोधी है।

पर क्या करा जाए पार्टनर, लाख गाल बजाने के बावजूद आप और हम, इसी बाजार के कल पुर्जे हैं और हम सभी कम या ज्यादा नैतिक, अनैतिक, पाखंडी, हिप्पोक्रेट, सहज होकर हंसते-रोते इसी से जी खा रहे हैं। हर आदमी को खुद अपने लिए तलवार की धार तय करना है कि वह कितना बाजारू बनेगा, कितना अनैतिक बनेगा, कितना सामाजिक रहेगा, कितना मानवीय रहेगा, कितना लोकतांत्रिक रहेगा, कितना नैतिक रहेगा। इन्हीं मीडिया हाउसों की जिस नैतिकता की हम लोग बात करते हैं, वह भी तलवार की धार की तरह ही है। इस तलवार की धार को हर मीडिया हाउस अपने लिए अलग-अलग तरीके से व्याख्यायित करता है और जीता है। एनडीटीवी अपने चेहरे को ज्यादा मानवीय और नैतिक बताकर ज्यादा प्राफिट कमाने में जुटा रहता है तो वायस आफ इंडिया खुले तौर पर पैसे उगाहने में जुटा रहता है। काम दोनों एक ही कर रहे हैं लेकिन दोनों के आंडबर अलग-अलग हैं। दोनों की शब्दावलियां और दोनों के बाडी लैंग्वेज अलग-अलग हैं। कुछ उसी तरह जैसे एक प्रोफेशनल काल गर्ल प्रोफेशनल तरीके से क्लाइंट पटाकर ज्यादा माल मुनाफा कमा लेती है और वहीं ट्रेडिशनल वेश्या कुछ नोटों पर तन देने के लिए तैयार बैठी रहती है लेकिन उसकी तरफ थर्ड ग्रेड के क्लाइंट भी मुश्किल से ही पहुंच पाते हैं।

मैं इन सारे विषयों पर अलग से लिखने के मूड में हूं क्योंकि हिंदी वाले देसज लोगों के माइंडसेट में बदलाव की जरूरत है। हम नहीं कहते कि आप बेइमान बनिए लेकिन किसी बेइमान के अंडर में ईमानदारी से काम करते हुए भी आप कितने इमानदार रह पाते हैं, कहना मुश्किल है। आप फिर कहीं न कहीं उस बेईमान के धंधे को ही बढ़ाने का काम कर रहे हैं और इस प्रकार आप भी बेईमानों की जमात में शामिल हैं। तो ये जो ईमानदारी और बेईमानी जैसे शब्द हैं, इनकी माइक्रो व्याख्या की जरूरत है।

इस मुद्दे पर काफी कुछ कहना चाहता हूं लेकिन कमेंट में ही पोस्ट लिखने की स्थिति आ चुकी है, इसलिए विराम दे रहा हूं। उम्मीद करता हूं कि इस बहस को स्वस्थ उद्देश्य के लिए आगे बढ़ाएंगे, खुद को अति ईमानदार और अति विद्वान साबित करने के परंपरागत और सामाजिक मोह-आग्रह के बगैर।

(यह कमेंट विनीत कुमार के ब्लाग गाहे-बगाहे पर प्रकाशित एक पोस्ट संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ? पर प्रकाशित किया है।)

6.2.09

मेरठ में हो रहा है हिन्दी ब्लागिंग पर भव्य सेमिनार

हिन्दी ब्लागिंग अपना परचम दुनिया भर में लहरा कर अब जनसाधारण की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई है। अनेक देश-प्रदेशों में हिन्दी ब्लागिंग को लेकर चर्चाए और सेमिनार होते रहे है। दिल्ली में तो अब हर महिने की ब्लागिंग को लेकर छोटे बड़े सेमिनार हो रहे हैं। इस कड़ी में अब मेरठ शहर का नाम भी जुड़ने वाला है। यहां जमा हो रहे है देश के नामचीन ब्लागर।


मेरठ में ब्लागिंग के इस भव्य सेमिनार को आयोजित कर रही है चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी और रवि पब्लिकेशंस। कार्यक्रम यूनिवर्सिटी के प्रेमचंद सेमिनार हाल में 10 फरवरी को सायं 3 बजे होने जा रहा है।

इस कार्यक्रम में हिन्दी ब्लागिंग को लेकर अपने विचार रखने के लिए देश भर से ब्लागर आ रहे है। अभी तक प्राप्त सूचना के आधार पर आमंत्रित ब्लागरों में मुख्य रूप से 'भड़ास’ के यशवंत सिंह जी, 'इर्दगिर्द’ से हरि जोशी जी, 'आजकल’ से ओमकार चौधरी जी, 'दिल की बात’ से डा. अनुराग आर्य, 'हकबात’ से सलीम अख्तर सिद्दीकी जी, 'पापुलर कलाम’ से पापुलर मेरठी जी आदि ब्लागर कार्यक्रम में सम्मिलित हो रहे है। इसके अतिरिक्त अन्य ब्लागर भी हैं जिनके आगमन की सूचना है।

'उड़नतश्तरी’ के समीरलाल जी इन दिनों भारत में है और उनका इस कार्यक्रम में आने का आश्वासन है लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी हाल ही में उनका स्वास्थ्य गड़बड़ा गया है। ईश्वर उनको जल्दी सेहतमन्द करे ताकी हम इस सेमिनार में उनको भी सुन सकें।

कार्यक्रम में ब्लागिंग पर एक पुस्तक का विमोचन भी होना है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. एस. के. काक रहने वाले है। इसके साथ ही जागरण समूह के धीरेन्द्र मोहन गुप्ता जी का सानिध्य भी प्राप्त होने वाला है तथा मशहूर लेखक असलम जमेशदपुरी जी व रवि पब्लिकेशसं के मनेष जैन जी भी कार्यक्रम में उपस्थित रहेगें। इसके अलावा और भी हिन्दी ब्लागरों के आने की सूचना मिल रही है जैसे-जैसे उनके नाम प्राप्त होते रहेगें आपको सूचित किया जाता रहेगा। आपका भी मेरठ में ब्लागिंग के इस भव्य समारोह में स्वागत है।
साभार- इरशादनामा

5.2.09

वो देखो, सरक पर घोरा पराक पराक दौर रहा है...

हफ्ते भर बाद कल दिल्ली की सड़कों पर सुबह से लेकर देर रात तक घूमता रहा। दोपहर में सुमित्रा महाजन (लोकसभा सांसद) के यहां मालवा के लोक व्यंजन का दावत छका तो शाम को साहित्य अकादमी में पूर्वग्रह पत्रिका के री-लांचिंग के मौके पर आयोजित समारोह में शामिल हुआ। कई पूर्व भडा़सियों के आह्वान पर रात होते-होते पहुंच गया प्रेस क्लब जहां जमकर सुरा सेवन किया। ये पोस्ट रोजनामचा लिखने के लिए नहीं बल्कि एक मजेदार बात बताने के लिए लिख रहा हूं। हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह साहित्य अकादमी में मिले तो मैंने उन्हें प्रणाम करते हुए उनकी तरफ अपना विजिटिंग कार्ड बढ़ा दिया। वे कुछ देर तक गौर से कार्ड देखते रहे फिर बोले, भड़ास का ड़ लिखने के लिए अंग्रेजी में डी की जगह आर का इस्तेमाल करना चाहिए। या फिर अगर डी ही लिखना है तो डी लिखकर इसके नीचे एक बिंदी (डाट) लगा देनी चाहिए। फिर बोले- भारत में ड़ के लिए डी की जगह आर की स्वीकृति का पता इस बात से चलता है कि बिहार में ड़ को र ही बोला जाता है। वहां तो लोग कहते हैं- वो देखो, घोरा सरक पर पराक पराक दौर रहा है। जबकि बोलना ये चाहिए- वो देखो, घोड़ा सड़क पर पड़ाक पड़ाक दौड़ रहा है। तो इससे जाहिर होता है कि ड़ के लिए डी की जगह आर होना चाहिए।

नामवर जी के अंदाज निराले, बातें निराली। वे ठहरे महान आलोचक। जो कुछ सामने दिखेगा-मिलेगा, उसी में अच्छाई-बुराई इतने कायदे से निकाल देंगे कि सामने वाला कायल हो जाए। उनका यही अंदाज पूर्वग्रह के री-लांच के मौके पर उनके संबोधन में देखने को मिला। प्रभाकर श्रोत्रिय, अशोक वाजपेयी और मनोज श्रीवास्तव पर जो चुटकियां लीं, जो सलाहें दीं, जो आलोचनाएं की उसे सुनकर मजा आ गया। वाकई, नामवर जी जब बोलते हैं तो उन्हें सुनते रहने को दिल चाहता है। गूढ़ बातों को भी इतने सहज, सरल और आम बोलचाल की भाषा में बोलते हैं कि लगता ही नहीं कि ये प्रकांड आलोचक नामवर सिंह बोल रहे हैं। शायद, इतनी सरलता और सहजता विद्वता के चरम पर जाकर ही प्राप्त हो सकती है। बीच वाले लोग तो भारी, गरिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के जरिए श्रोताओं को मार-मार कर सुला देते हैं। खैर....मैं तो कल शाम से जब भी मौका मिल रहा है, ये जरूर कह रहा हूं क्योंकि जुबान पर चढ़ गया है- वो देखो, घोरा सरक पर पराक पराक दौर रहा है....:)

27.8.08

हम सब चार सौ बीस है

दिल है कि बल्लियॊं उछल रहा है और इस सर्गेई बुबका छाप उछाल-कूद से न जाने और कितने रिकार्ड भड़ास पर बनने बाकी हैं। हम बुरे थे, गन्दे थे, लड़कियों को घूरने वाले थे,कुत्ते थे, सुअर थे,बंदर थे, गैंडे थे, संसार के हिंदी के सबसे बड़े ब्लाग थे और न जाने क्या-क्या थे लेकिन आज एक और उपलब्धि इस कतार में हम सब भड़ासियों से जुड़ गई है कि हम 420 हैं। जो इस बात पर खुश हो सकते हों खुश हो लें वरना आगे हम कुछ और हो जाएंगे तब आप अपनी चार सौ बीसी का उत्सव न मना पाएंगे। सभी भड़ासियों को इस चार सौ बीसी के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।
जय जय भड़ास

8.7.08

साक्षात्कारः भड़ास के आने से नकली गंभीरता, हिप्पोक्रेसी और गुडी गुडी का दौर खत्म हुआ


अंडरलाइन नामक एक मैग्जीन में ब्लागिंग और भड़ास को लेकर एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है। उसे भाई भड़ासियों तक पहुंचाने के लिए इसे यहां डाल रहा हूं। उपरोक्त चित्र पर क्लिक करके आप इसे पूरा पढ़ सकते हैं।
जय भड़ास
यशवंत

27.6.08

सदस्य संख्या पहुंची 355, जय हिंदी, जय ब्लागिंग, जय भड़ास

भड़ास की सदस्य संख्या 355 होने पर बधाई। इस महीने हर रोज दो से लेकर चार अनुरोध भड़ास की सदस्यता के लिए आते रहे और इनमें से जिन लोगों ने अपने मोबाइल नंबर, पता और काम-धाम के बारे में जानकारी दी, उन्हें सदस्य बनने के लिए निमंत्रण भेजा गया। नए लोग न सिर्फ भड़ास से तेजी से जुड़ रहे हैं बल्कि आनलाइन कैसे हिंदी लिखना सीख कर टूटी फूटी जुबान में अपनी बात कहने की कोशिश भी कह रहे हैं। हिंदी ब्लागिंग के लिए यह बेहद शुभ है। एक तरफ जहां ढेर सारे ब्लागर अपने ब्लाग को एकला चलो रे के नारे के तहत चला रहे हैं और कई कम्युनिटी ब्लाग अपने कथित वैचारिक दीवारों के चलते नए लोगों को बाहर से ही दर्शक के रूप में बनाए रखने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं, ऐसे में भड़ास जैसा दुनिया का सबसे बड़ा ब्लाग खुले दिल दिमाग से नए लोगों को हिंदी ब्लागिंग का क ख ग सिखा रहा है और उन्हें गलत सही कुछ भी लिखने के लिए, सीखने के लिए, पोस्ट करने के लिए प्रेरित कर रहा है। उम्मीद है भड़ास के जरिए ब्लागिंग सीखने वाले हिंदी भाषी आगे चलकर आनलाइन दुनिया में हिंदी को सम्मान दिलाने के साथ साथ खुद भी आनलाइन माध्यम में अपनी सक्रियता से विशेषज्ञता हासिल कर सकेंगे।

भड़ास संचालन समिति की तरफ से सभी नए भड़ासियों का दिल खोलकर स्वागत करता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि अगर ब्लागिंग करने में किसी भी तरह की तकनीकी दिक्कत आ रही हो तो कृपया वे पोस्ट डालकर या किसी पोस्ट पर कमेंट करके पूछ सकते हैं।

कृपया कोई समाधान बताए?

मुझे खुद एक दिक्कत आ रही है जिसका समाधान दूसरे वरिष्ठ ब्लागर बताने की कृपा करें। भड़ास पर पोस्ट करते समय अक्सर पोस्ट तुरंत पब्लिश नहीं होता और इरर आ जाता है। बाद में दुबारा कोशिश करने पर वह पोस्ट दो या तीन बार भड़ास पर पब्लिश हो जाती है। ऐसा क्यों होता है, समझ में नहीं आता। इसी तरह कई बार पोस्ट करते समय सर्वर इरर शो करता है। क्या यह दिक्कतें भड़ास पर ज्यादा पोस्टें होने के चलते तो नहीं आ रही? कृपया इस बारे में कोई गाइड करे।

आभार के साथ
जय भड़ास
यशवंत

14.6.08

श्रीलिपि से यूनिकोड में फॉण्ट परिवर्तन करने का तरीका

श्रीलिपि से यूनिकोड में फॉण्ट परिवर्तन करने का तरीका

यशवंत जी
ये साईट बहुत ही लाभदायक है. इसकी खूबी ये है कि इसके ज़रिये हम लोग अपने फॉण्ट को यूनिकोड में बदल सकते हैं. सबसे पहले आपको करना ये है कि आप अगर कुछ भी श्रीलिपि में लिख लेते हैं और आपको उसी चीज़ को अपने साईट में भी पोस्ट करना है, तो उसको सबसे पहले फॉण्ट कन्वर्टर की मदद से कृति में बदल लें. अब वो बदला हुआ फॉण्ट को कॉपी करके इस साईट में लेते आयें. यहाँ पेस्ट कर दें और कृति फॉण्ट सेलेक्ट करके ''बदलें'' बटन को टिप दें. आपका पूरा आर्टिकल यूनिकोड में बदल जाएगा. फ़िर आप उसको अपना ब्लॉग में पेस्ट कर दें . अगर कहीं-कहीं पर एडिटिंग की ज़रूरत हो तो अपने ब्लॉग में पोस्ट प्रकाशित करने वाला एरिया में ही एडिट कर लें. इस जानकारी को आप जितने साथियों के साथ बाँट सकते हैं, बाटें. क्यूंकि आपकी एक जानकारी किसी को हिन्दी कि दुनिया से जोड़ सकती है.

http://www.rajneesh-mangla.de/unicode.php

-- नदीम अख्तर
http://ranchihalla.blogspot.com/
द पब्लिक एजेंडा

9.6.08

वाह भाई, मेहनत करें हम भारतीय, और क्रेडिट दो तुम गूगल को!

विनीत खरे ने अपनी नीचे लिखी पोस्ट में (गूगल करे तो टेक्नालजी, कोई और करे तो अश्लीलता) गूगल पर पर कुछ आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि हिंदी लैंग्वेज में गूगल को कनवर्ट करने के बाद अगर सर्च में एस लिखिये तो गूगल अपने आप हिंदी के सेक्स वाले ढेर सारे आप्शनल सर्च के शब्द मुहैया करा देता है। इस चीज को उन्होंने गलत ठहराया। उन्हीं की पोस्ट पर एक सज्जन ने कमेंट कर तस्वीर का दूसरा रूप दिखाया है। इनका कहना है कि हम हिंदी वाले जो चीज सबसे ज्यादा सर्च करते हैं, उसी को गूगल हमें आटो सजेस्ट करता है क्योंकि उसकी तकनीक आटोमेटेड है। कहने का आशय यह कि पहले हम्ही यह काम करते हैं, फिर गूगल हमें सुझाता है।

लीजिए, विनीत की पोस्ट पर आए कमेंट को पढ़िए

यशवंत
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ab inconvenienti has left a new comment on your post "गुगल करे तो टेक्नोलॉजी, कोई और करे तो अश्लीलता !!":

वाह भाई, मेहनत करें हम भारतीय, और क्रेडिट दो तुम गूगल को!

आप गूगल के बारे में इतना सब जानते हैं तो फ़िर यह भी मालूम ही होगा की ऑटोसजेस्ट एक स्वचालित प्रक्रिया है, इसमें प्रदर्शित शब्द हिन्दी में अब तक के सबसे अधिक खोजे गए शब्द हैं.

अब अगर ठरकी हिन्दी वाले यही सब सर्च करते हैं तो बेचारा गूगल क्या करे?

गूगल 43 भाषाओं में सर्च की सुविधा देता है, पर वह चूँकि हिंदुस्तान की अति पावन संस्कृति षडयंत्र के तहत विनष्ट करना चाहता है, इसीलिए हिन्दी ऑटो सजेस्ट में ऐ से जेड तक हर अक्षर में अश्लील शब्द जानबूझकर घुसा दिए गए, हम उसका मरते दम तक विरोध करेंगे!

(और 'एस' क्या सभी अक्षरों में ऐसे ही शब्द ऑटो सजेस्ट हो रहे हैं, ज़रा ये भी पता लगा लें की हिन्दी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग (और शायद सबसे लोकप्रिय साईट भी) मस्तराम मुसाफिर ब्लॉग पर रोज़ कितने हिट्स/कमेंट्स आते हैं)


Posted by ab inconvenienti to भड़ास at 9/6/08 2:20 PM

26.4.08

भड़ास की पोस्टिंग अब दैट्सहिन्दी पर भी

दैट्स हिन्दी के होम पेज पर अब भड़ास की लेटेस्ट पोस्टिंग भी देखी जा सकती है। www.thatshindi.in ने पिछले दिनों हिन्दी में ब्लागर्स की एक्टीविटी को भी एक प्लेटफार्म देने की कोशिश की है। इसके स्पेशल सेक्शन ब्लागर्स ट्रैफिक में बड़ी संख्या में हिन्दी ब्लाग्स की लिस्ट देखी जा सकती है। इसमें ब्लाग्स को सर्च करने के कई आप्शन मौजूद हैं। कोई भी अपना ब्लाग इसमें सबमिट कर सकता है। इतना ही नहीं इसके होम पेज पर कुछ चुनिंदा ब्गाल्स की लेटेस्ट पोस्टिंग भी दिखती रहती है। इनमें भड़ास भी शामिल हैं। इनका चयन कंटेट के महत्व, ब्लाग की नियमितता और उसकी मौलिकता और विविधता के आधार पर किया गया है। ((pls see http://thatshindi.oneindia.in))

अक्तूबर में लांचिंग के बाद संतुलित रफ्तार से आगे बढ़ने वाला हिन्दी न्यूज पोर्टल दैट्स हिन्दी देखते-देखते बीते कुछ महीनों में हिन्दी के प्रमुख न्यूज पोर्टल्स में शामिल हो गया है। खास बात यह है कि सिर्फ दैट्स हिन्दी आईटी प्रोफेशनल्स और मीडिया कर्मियों द्वारा संचालित होने वाला स्वायत्त न्यूज पोर्टल है, जबकि बीबीसी हिन्दी, एनडीटीवी खबर, जोश18, जागरण याहू और वेबदुनिया जैसे पोर्टल किसी न किसी बड़े समूह का एक अतिरिक्त उप्रकम हैं, मगर इस सबके वाबजूद गूगल सर्च इंजन में दैट्स हिन्दी ने इनके समकक्ष अपनी मौजूदगी दिखाई है, न सिर्फ खबरों की तात्कालिकता में बल्कि उनके दिलचस्प प्रस्तुतिकरण में भी।

दैट्स हिन्दी ने पहले से बने-बनाए फारमेट की बजाय यूजर की दिलचस्पी के आधार पर अपना प्रोफाइल और लेआउट तय किया और उसके सकारात्मक नतीजे सामने आए। इस पोर्टल में वीडियो देखने, गाने सुनने, खबरें, मनोरंजन, ज्योतिष जैसे तमाम सेक्शन हैं। इसके अलावा इसके बुकमार्क सेक्शन में यूजर अपना यूनीक बुकमार्किंग यूआरएल बना सकता है।

21.4.08

रोको मत पतवार मुझे तुम

रोको मत पतवार मुझे तुम
देखें कितनी ताकत है इन लहरोंवाले सागर में
रखते हैं अणुधर्मी ऊर्जा हम शब्दों की गागर में
नाव नहीं जो डूब जाऊंगा मुझको आंधी-सा बहने दो
रोको मत पतवार मुझे तुम मुझको सागर सहने दो
दुख की फुहार में भीगे पर छीजे नहीं कभी
सुख के डिस्को में भी नाचे पर रीझे नहीं कभी
नपी-तुली सुविधा के सपने डगर-मगर ढहने दो
रोको मत पतवार मुझे तुम मुझको सागर सहने दो
बहुत किया शोषण लहरों का अब सब लहरें बागी हैं
खारापन तुम रहे पिलाते अब सभी मछलियां जागी हैं
मौसम की मुद्रा में परिवर्तन है हार जाओगे रहने हो
रोको मत पतवार मुझे तुम मुझको सागर सहने दो
पं. सुरेश नीरव
.९८१०२४३९६६

7.4.08

हैप्पी "विक्रम संवत २०६५" यानि न्यू ईयर

आज सुबह सुबह जब आंख खुलने ही वाली थी कि एक राजाओं जैसे हुलिये वाला शख्स सामने से आता दिखा तो मुझे लगा कि ये सपना शायद किसी माइथोलाजिकल बैकग्राउंड से संबंधित है। लेकिन उस शख्स ने बताया कि वो तो महाराज विक्रमादित्य हैं। दिमाग पर काफ़ी जोर देने पर याद आया कि अरे बाप रे ये तो बड़े प्रतापी महाराज हैं। उन्होंने मुझसे बड़ी रिक्वेस्ट-सिक्वेस्ट करी कि अरे तुम भड़ासी तो हिंदी वाले हो और न जाने क्या बात थी पौष माह की एकादशी को "हैप्पी न्यू ईयर" चिल्ला चिल्ला कर एक दूसरे को बधाई दे रहे थे, मदिरा आदि का सेवन करके पगलाए जा रहे थे। मैंने स्वर्ग में सबसे पूछा तो मुझे बताया गया कि आज मानव जाति ईसा मसीह के नाम से वर्ष की शुरूआत मानती है इसलिये यह उन्माद है। इसलिये हे भड़ासी प्राणी,आज अगर तुम हिंदी का दंभ भरते हो तो मेरे नाम से चल रहे विक्रम संवत के शुरुआत की भी जनसामान्य को शुभेच्छा दे दो कि आज से विक्रम संवत २०६५ प्रारंभ हो गया है। यदि तुम मुझे भूल गये तो दोष तुम्हारा नहीं है यह तो समय का प्रभाव है लेकिन तुम सब तो धारा के विपरीत चलने का साहस करते हो। अचानक आंख खुल गयी और उठते ही महाराज विक्रमादित्य आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठा कर अद्रश्य हो गये। मैं उनके निवेदन पर यह पोस्ट डाल रहा हूं अगर मन करे तो एक दूसरे को शुभेच्छा दे दो वरना अगले साल फिर महाराज याद दिलाने आयेंगे।

12.3.08

हिंदी के ये कनफ्यूज बौद्धिक ब्लागर कब सुधरेंगे??

जान लीजिए, ट्रेंड सेट करने का आपका जमाना गया और जो लोग आज ट्रेंड सेटर बने हैं, वो चाहे भड़ास हो या कोई और, उनका भी जमाना जायेगा...क्योंकि आ रहे हैं अपने जन, अपने लोग, अपनी जनता....उन गली कूचों मोहल्लो गांवों कस्बों से जहां सब कुछ आदिम और अनगढ़ है और प्रकृति के नजदीक है। आप शहरी बाबू लोग, एक्सट्रा सेंसेटिव होने के नाटक कर रहे लोग, कनफ्यूज लोग, अपने परिवार व मास से कटे हुए लोग.....केवल रोयेंगे और रोते रोते एक दिन हार्ट अटैक के कारण मर जायेंगे क्योंकि आपने जीवन में सिवाय अपने सुख, अपनी इगो, अपनी बुद्धि के अलावा कुछ जिया ही नहीं, कुछ किया ही नहीं।

झांकिए अपने अंदर
क्योंकि साथी बड़ा आसान है किसी को गरिया देना
बड़ा आसान है हर सबको प्यार करना
अपने ही जन हैं जो बिगड़े हैं
अपने ही जन हैं जो आ रहे हैं
अपने ही जन हैं जो सुधरेंगे
इन्हें प्यार करो, चूमो
इनके आने की खुशी में उत्सव करो
खुश हो, खुश रहो....
कि सदियों के जख्म भरने वाले हैं
सदियों की तपस्या पूरी होने वाली है
हिंदी की जय होगी, हिंदी वालों की जय होगी
अपनी पूरी भदेस और बिगड़ैल तेवरों के साथ
हिंदी छाती रहेगी, गाती रहेगी....
क्योंकि इनके साथ है वो अनगढ़ जनता
जिसने आज तक बचा रखा है प्रकृति को
मनुष्य को करीब, भाषा को जिंदगी के करीब


उपरोक्त बातें लिखने के पीछे का संदर्भ भी जान लें आप। अभी मैं मुंबई के एक कथित बौद्धिक हिंदुस्तानी ब्लागर की पोस्ट पढ़ रहा था। उन्हें उबकाई और छी छी आ रही है। भड़ास के ज्यादा पढ़े जाने, भड़ास के सर्वाधिक पसंद किए जाने, भड़ास की भाषा, भड़ास के ट्रेंड सेटर बनते जाने.....से उन्हें बड़ी दिक्कत है। उन्हें पूरे हिंदी समाज पर तरस आ रहा है। उथलेपन पर रोना आ रहा है। और आज उन्हें कुछ नहीं मिला तो इसी पर पेल दिया अपना आलेख। ब्लागवाणी की टाप रैंकिंग की फोटो खींची और जुट गए की-बोर्ड पटकने में। गरियाओ, सबको गरियाओ....तभी तुम महान बन सकते हो। और एक ही लेख में उन सबको, जिनसे जिनसे उन्हें उबकाई आती है, गरिया दिया। और अंत में हर विद्वान लेखक की तरह...द इंड करते समय हिंदी समाज, देश व संस्कृति आदि की चिंता जताते हुए हाय हाय करते हुए आंसू बहाते हुए ....लेख खत्म कर दिया और कंप्यूटर टर्नआफ करके निकल लिए। अपनी रोजी रोटी पर, अगली सुबह फिर खोलेंगे कंप्यूटर और सोचेंगे कि आज किसे थू थू करके गरिया दिया जाए या क्या लंतरानी पेल दी जाए ताकि लोग पढ़ें और कहें, वाह वाह वाह वाह, आप महान, अदभुत, शानदार, बिलकुल सही कहा.....तो, ठीक है भइये....लगे रहो......रणनीति अच्छी है.....।

वो मुंबई का कथित बौद्धिक ब्लागर कोई एकमात्र नहीं है। ब्लागिंग में ऐसे ढेर सारे दुखी आत्मपीड़ित और कोई काम न होने पर देश समाज की दशा दिशा पर हाय हाय करने वाले ब्लागर हैं। पिछले दिनों इन्हीं दुखों से दुखी लोगों की ऐसी ही कई पोस्टें आईँ, आ रही हैं, और भी आएंगी.....

ये लोग कौन हैं? इन्हें जानना बहुत जरूरी है। क्योंकि दरअसल ये चाहे भले कुछ न करे, कनफ्यूजन तो फैला ही देते हैं। और मालूम है, सबसे ज्यादा कनफ्यूजन कौन फैलाते हैं, जो खुद सबसे ज्यादा कनफ्यूज लोग होते हैं।

मेरा बहुत साफ मानना है कि दरअसल हिंदी समाज में अब भी खुले दिल दिमाग वाले बुद्धिजीवियों का घोर अकाल है। और जो बुद्धिजीवी हैं वो घोर कनफ्यूज लोग हैं। अपनी जड़ों से कटकर शहर आए और आत्मकेंद्रित होकर बैठ गए। अपने लिए कमाना, अपने लिए जीना और लिखना पढ़ना पूरी दुनिया और देश के लिए। जिनके जीवन में कहीं सामूहिकता न हो, जो अपने लोगों अपने परिजनों को दुत्कारता हो, अपने लाभ और अपने हित के लिए किसी हद तक गिर उठ सकता हो....ऐसे लोगों को अगर आप बुद्धिजीवी मानेंगे तो हो चला काम।

सवाल उठता है बुद्धिजीवी होता कौन है?

मैं जो अब तक समझ बूझ पाया हूं उसके मुताबिक बुद्धिजीवी समाज व देश का असल प्रतिनिधि होता है, उसे अपने लोगों, अपने समाज, अपने देश का हर रोयां रेशा ठीक-ठीक पता होता है। मैं बात आंकड़ों की नहीं, लोगों के दिल, लोगों के समूह, लोगों के संप्रदाय, लोगों की जाति, लोगों की पीड़ा, लोगों के सुख, लोगों की प्रवृत्ति, लोगों की दिक्कतें, लोगों का इतिहास, लोगों की कुंठाएं, लोगों के सपनों...... । असल और अपने जन का बुद्धिजीवी कभी कनफ्यूज नहीं होता, कभी हाय हाय नहीं करता, कभी रोता नहीं। उसका विजन अपने जन को लेकर, अपनी भाषा को लेकर, अपनी संस्कृति को लेकर बिलकुल साफ होता है। उसे अपने दुश्मन ठीक ठीक पता होता है। वो अपने जन का बुद्धिजीवी अपने बच्चों को कभी नहीं डांटता, उनकी कमजोरियों पर कभी नहीं चिल्लाता, उन्हें प्यार से समझाता बुझाता और उनके ही अनुभव के आधार पर उन्हें सही दिशा में ले जाने की कोशिश करता है क्योंकि उसे पता होता है कि ये मिट्टी के घड़े हैं, ये ऊर्जावान हैं, ये नई पीढ़ी हैं, इन्हें मस्त रहने दो, इन्हें विचरने दो, इन्हें छाती फुलाकर सांस भर लेने दो, इन्हें आसमान के तारे गिन लेने दो,,,क्योंकि कल ये ही लोग अपन जन को नेतृत्व देंगे, अपने जन के लिए लड़ेंगे मरेंगे.....। तो जो अपने जन का बुद्धिजीवी होता है उसे कभी गुस्सा नहीं होता, दादा जी की तरह क्योंकि उन्हें सब पता होता है।

पर हाय अपने हिंदी के नफासतपसंद बुद्धिजीवी। देसज लोगों की भाषा हिंदी और गांवों की भाषा हिंदी और उत्तर प्रदेश बिहार की भाषा हिंदी के बुद्धिजीवी दरअसल बुद्धिजीवी नहीं बल्कि वो कुंठित पलायित और भटके हुए लोग हैं जिन्होंने जीवन में कभी सामूहिकता को जी ही नहीं सके है। और तो और, इन्हें अगर अपने ही दादा चाचा काका मामा की ज्वाइंट फेमिली के साथ रहने को कह दिया जाए तो कुछ ही दिनों में ये अपने घर वालों को ही चूतिया घोसित कर नालायक व बेवकूफ बताकर अकेले चूल्हा जलाने को निकल लेंगे।

तो भइये....मुंबई के कथित बौद्धिक ब्लागर ने जो उबकाई और थू थू और छी छी महसूस की है, वो अभी और भी ढेर सारे लोग महसूस करेंगे क्योंकि अब इनका बौद्धिक प्रलाप टार रेटिंग से उतर रहा है तो इन्हें कष्ट होना लाजिमी है। दूसरा, हम हिंदी वाले अनगढ़ और देसज लोग अगर अपनी अनगढ़ भाषा व बोली में अपनी बात पूरी चिल्ल पों के साथ कह रख रहे हैं तो इन भगोड़े देसजों को खराब लगेगा ही।

ये नास्टेल्जिक लोग हैं जो अपनी मिट्टी व अपने गांव को सिर्फ इसलिए महसूस करते हैं क्योंकि उससे लेखन में बड़ी उर्जा मिलती है और खुद को बुद्धिजीवी साबित करने का मौका मिल जाता है। पर ये भटके हुए हिंदी के चिंतकों के पास अपनी भाषा और अपनी माटी और अपने जनों की मुक्ति के लिए कोई भी सामूहिक संकल्प, योजना, मिशन, सपना....हो, कतई संभव नहीं। क्योंकि ये सब करने के लिए आदमी को फक्कड़, औघड़, सूफी, फकीर बनना पड़ता है और अपना सब छोड़कर दूसरों को अपना मानकर एक सामूहिक जीवन जीना पड़ता है। जो लोग अपना परिवार और अपने परिजनों को नहीं संभाल सकते, वे दूसरों को कैसे गालियां देकर गंदा बता सकते हैं, मुझे समझ में नहीं आता।

हमें इंतजार रहेगा उन बड़े हृदय, सहज आत्मा, सरल व्यक्तित्व के हिंदी बुद्धिजीवियों का जो गाली से लेकर सौंदर्य तक के पीछे छिपे दर्शन को बेहद सहजता से समझते हों और उन्हें एक दिशा में निरुपित करने में मास्टर हों।

हे बौद्धिकों, बड़ा आसना होता है चिंता करना, गरियाना, थू थू करना....पर बेहद मुश्किल होता है अपने जनों को प्यार करना, उनमें अच्छाई देखना, उनकी बुराई को अच्छाई में तब्दील कर पाने की क्षमता रखना....। आखिर इसी अपने समाज के बुरे भदेस देहाती लड़कों, लड़ाकों, साथियों, पढ़े लिखों, अपढ़ों की ताकत के साथ ही हम हिंदी समाज में काया पलट कर पाने की सोच सकते हैं और आप चूतिये इन्हीं को गरिया रहे हो और अपने को महान बता रहे हो तो जरूर कोई खोट आपकी सोच में है। वरना, लोग आप को हिंदी समाज का नेता मानकर आपके घर के सामने नारे लगा रहे होते...। पर हाय, आप तो अपनों की फोन पर भी खबर नहीं लेते, पूरी हिंदी समाज के कल्याण उत्थान के लिए कैसे कुछ कर सकते हो।

बस केवल आप गाल बजा सकते हो, हवा में शब्द उछाल सकते हो....और फिर रोजी रोटी कमाने के लिए चमकती शर्ट व कोट पहनकर निकल जाते हो.....।

तो हे हिंदी के कनफ्यूज लोगों, एक बात गांठ बांध लो, आप लोगों का वजदू बस केवल कुछ दिनों का है। ये जो नई खेप आ रही है ना, उसमें अगर मैं खुद भी उनके प्यारे साथी के रूप में काम नहीं कर पाया तो वे लात मारकर भगा देंगे और कहेंगे कि निकल जाओ चूतियों, हम अपनी लड़ाई खुद लड़ लेंगे, तुम जैसे कनफ्यूज की जरूरत नहीं।

हिंदी के उत्थान, अभियान, व मुक्ति के इस दौर में हम सभी हिंदी बुद्धिजीवियों को अपने सभी अच्छे बुरे लोगों को एक साथ लेकर चलने की सोचना चाहिए। इसके लिए हिंदी बुद्धिजीवियों को अपने एक किलो के इगो को खत्म करना होगा और अपने जन की सोच व सुंदरता को समझने की कूव्वत रखना होगा।

खैर, एक कहावत है न, लात के भूत बात से नहीं मानते तो हिंदी बुद्धिजीवियों के साथ भी यही है। जब उनके ही जन उन्हें लतियायेंगे तो वो समझ पायेंगे कि दरअसल वो गलत सोच रहे थे और फिर वे खुशी खुशी अपने जन की सामूहिक सोच व खुशी के साथी बन सकेंगे।

जय भड़ास
यशवंत

10.2.08

श्रीराम ठाकुर दादा

दादा वहाँ न जाइए जहाँ मिलै न चाय....!
जबलपुर के चुटीले व्यंग्यकार ठाकुर दादा का परिचय आपसे शेयर करना चाह रहा हूँ.......!

17.1.08

भड़ासियों, अंग्रेजी को लात मारो, हिंदी को प्यार करो, हिंदी में लिखो, ऐसे...

भड़ासियों ने अब अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। रोज कई नए लोग लिख रहे हैं। कुछ लोग नियमित रूप से लिखने लगे हैं। ये अच्छी बात है। क्योंकि दरअसल जब लिखते हैं तो न सिर्फ लिखते हैं, बल्कि बहुत कुछ नया सीखते हैं, अपने एकाकी व्यक्तित्व को एक्सपोजर देते हैं, खुद की भड़ास से दुनिया को रूबरू कराते हैं।

कुछ साथियों ने साहस करते हुए इंग्लिश में ही लिखना शुरू कर दिया है। इनका तो मैं खासतौर पर स्वागत करूंगा क्योंकि अगर ये कुछ लिखेंगे ही नहीं तो आगे फिर सीखेंगे कैसे? एक साथी पिस्सू लखनवी जी अपनी चार लाइनों की धारधार कविता दो दिनों से भड़ास पर पोस्ट कर रहे हैं, लेकिन अंग्रेजी में।

मैं इन साथी को जानता तो नहीं पर उनको मैंने मेल करके कहा है कि आप हिंदी किस तरह लिख सकते हैं। मैं हालांकि तकनीक का जानकार तो नहीं हूं लेकिन मुझे जितना ज्ञान था वो सब उनके सामने उगल दिया, ताकि दिमाग हलका रहे:)

पर अगर आपमें से किसी साथी को नीचे हिंदी लिखने के तीन फंडों के अलावा कोई फंडा आता हो तो प्लीज उसे हम लोगों को भी बताएं, ताकि साथी लोग अपना हाथ आजमा सकें। उम्मीद है सीखने सिखाने का यह दौर चल पड़ेगा और जिन भी साथियों को कोई दिक्कत हो वे भड़ास पर पोस्ट डालकर सवाल पूछ सकते हैं।

हिंदी में लिखने के वास्त मैं आपको तीन तरीके बता रहा हूं, इन्हें पढ़ें और क्लिक करें तो शायद समस्या का हल हो सके....

1--पहला तो गूगल वाला है, जिसमें आप रोमन इंग्लिश में लिखेंगे तो वो अपने आप हिंदी में कर देगा। इस पर लिखने के बाद इसे कापी करके भड़ास के नये पोस्ट पर पेस्ट कर दीजिए। नीचे के लिंक पर क्लिक करें....
गूगल का रोमन से हिंदी कनवर्टर

2--और ये दूसरा डायरेक्ट फोनेटिक हिंदी में है। इस पर लिखकर कापी करके भड़ास के नये पोस्ट पर पेस्ट कर दीजिए। क्लिक करें..
डायरेक्ट फोनेटिक में लिखें

3--उपरोक्त के अलावा हिंदी यूनीकोड टूलकिट फोनेटिक को अपने कंप्यूटर में ही इंस्टाल कर दें ताकि रोज-रोज के झंझट से मुक्ति मिले। इसे डाउनलोड करने के बाद अपने कंप्यूटर में इंस्टाल करने के बाद आप उसी तरह लिख सकते हैं जैसे अपने आफिस में अखबार या मैग्जीन या टीवी या नेट के लिए हिंदी में लिखते हैं। इसके लिए यहां क्लिक करें...
हिंदी यूनीकोड फोनेटिक टूलकिट


इन तीनों को आजमाए, मदद न मिलें तो बताएं, कुछ और तोड़ सोचते हैं। इन तीनों के अलावा अन्य ढेरों तरीके भी हिंदी लिखने के हैं पर मुझे उनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। अगर दूसरे ब्लागर साथियों या तकनीकी रूप से मझे हुए मित्रों के पास हिंदी लिखने के अन्य फंडे हों तो कृपया उसे भड़ास पर कमेंट के रूप में या फिर पोस्ट के रूप में डालें ताकि आनलाइन माध्यम में हिंदी लिखने वालों की संख्या बढ़ाई जा सके और नए ब्लागर भी पैदा किए जा सकें।

और हां, इस मौके पर मैं रवि रतलामी जी और अविनाश जी को याद करना नहीं भुलूंगा जिनकी बदौलत मैं आनलाइन माध्यम में हिंदी लिखने और ब्लागिंग करने को और भड़ास शुरू करने को प्रेरित हुआ। अच्छा शिष्य कभी अपने गुरुओं को नहीं भूलता, और मैं यह परंपरा निभा रहा हूं, उम्मीद है गुरु लोग आगे भी गाइडलाइन देते रहेंगे ताकि उनकी गाइडलाइन के आधार पर मैं अपने बाकी भड़ासियों साथी को कुछ नई जानकारी दे सकूं।

जय हो हिंदी की
जय भड़ास
यशवंत