हफ्ते भर बाद कल दिल्ली की सड़कों पर सुबह से लेकर देर रात तक घूमता रहा। दोपहर में सुमित्रा महाजन (लोकसभा सांसद) के यहां मालवा के लोक व्यंजन का दावत छका तो शाम को साहित्य अकादमी में पूर्वग्रह पत्रिका के री-लांचिंग के मौके पर आयोजित समारोह में शामिल हुआ। कई पूर्व भडा़सियों के आह्वान पर रात होते-होते पहुंच गया प्रेस क्लब जहां जमकर सुरा सेवन किया। ये पोस्ट रोजनामचा लिखने के लिए नहीं बल्कि एक मजेदार बात बताने के लिए लिख रहा हूं। हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह साहित्य अकादमी में मिले तो मैंने उन्हें प्रणाम करते हुए उनकी तरफ अपना विजिटिंग कार्ड बढ़ा दिया। वे कुछ देर तक गौर से कार्ड देखते रहे फिर बोले, भड़ास का ड़ लिखने के लिए अंग्रेजी में डी की जगह आर का इस्तेमाल करना चाहिए। या फिर अगर डी ही लिखना है तो डी लिखकर इसके नीचे एक बिंदी (डाट) लगा देनी चाहिए। फिर बोले- भारत में ड़ के लिए डी की जगह आर की स्वीकृति का पता इस बात से चलता है कि बिहार में ड़ को र ही बोला जाता है। वहां तो लोग कहते हैं- वो देखो, घोरा सरक पर पराक पराक दौर रहा है। जबकि बोलना ये चाहिए- वो देखो, घोड़ा सड़क पर पड़ाक पड़ाक दौड़ रहा है। तो इससे जाहिर होता है कि ड़ के लिए डी की जगह आर होना चाहिए।
नामवर जी के अंदाज निराले, बातें निराली। वे ठहरे महान आलोचक। जो कुछ सामने दिखेगा-मिलेगा, उसी में अच्छाई-बुराई इतने कायदे से निकाल देंगे कि सामने वाला कायल हो जाए। उनका यही अंदाज पूर्वग्रह के री-लांच के मौके पर उनके संबोधन में देखने को मिला। प्रभाकर श्रोत्रिय, अशोक वाजपेयी और मनोज श्रीवास्तव पर जो चुटकियां लीं, जो सलाहें दीं, जो आलोचनाएं की उसे सुनकर मजा आ गया। वाकई, नामवर जी जब बोलते हैं तो उन्हें सुनते रहने को दिल चाहता है। गूढ़ बातों को भी इतने सहज, सरल और आम बोलचाल की भाषा में बोलते हैं कि लगता ही नहीं कि ये प्रकांड आलोचक नामवर सिंह बोल रहे हैं। शायद, इतनी सरलता और सहजता विद्वता के चरम पर जाकर ही प्राप्त हो सकती है। बीच वाले लोग तो भारी, गरिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के जरिए श्रोताओं को मार-मार कर सुला देते हैं। खैर....मैं तो कल शाम से जब भी मौका मिल रहा है, ये जरूर कह रहा हूं क्योंकि जुबान पर चढ़ गया है- वो देखो, घोरा सरक पर पराक पराक दौर रहा है....:)
Showing posts with label नाम. Show all posts
Showing posts with label नाम. Show all posts
5.2.09
वो देखो, सरक पर घोरा पराक पराक दौर रहा है...
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
17.2.08
सन्देश एक हज़ार एक
ब्लागर्स क्यों चाह्ते हैं
अपना नाम अखबार में
छपा देखने के लिये ?
Posted by
अविनाश वाचस्पति
0
comments
Subscribe to:
Comments (Atom)
