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18.7.08

एक नजर इधर भी.......

अखबार के नाम पर टिकेट ले लो बाबा!!!!!

जरा गौर से देखिये इस तस्वीर को, शायद आपको वो दिखे जो मुझे भी दिखा ?
कुछ दिन पहले यशवंत जी ने एक पोस्ट डाली थी की नॉएडा में हिजडे एक वाहन में जा रहे थे और वहां पे लिखा था प्रेस। सच में क्या प्रेस का टैग लगना ऐसा है, जरा गौर से देखिये इस सरकारी मुलाजिम को जो मुंबई बस का कंडक्टर है मगर डिब्बे पे "सकाळ" एक मराठी दैनिक का लेबल, महोदय आप सरकारी कर्मचारी हो या इस अकबार के विज्ञापन प्रतिनिधि...
वैसे ये बड़ी बात नही है और कमोबेश सभी अखबार का विज्ञापन विभाग इस कुकृत्य को अंजाम देता है, अपने अखबारनवीश होने का धौंस देकर मनमाफिक विज्ञापन प्रचारित करवा लेता है।
तात्पर्य केवल इतना की मित्र ये व्यावसायिक दौर का समाचारपत्र व्यवसाय है, विचारों की बेला नही और अपने आपको पत्रकार कहने वाले हमारे मित्र इन व्यवसायिक घराने के जी हुजूरी करने वाले चमचे से ज्यादा नही, जिसे चमचागिरी पसंद नही वो अपने घर में रहे, लाला जी के अखबार को उसकी कोई जरूरत नही।
जय जय भड़ास

11.6.08

आलोक मेहता की खबर सच है, वे नई दुनिया में प्रधान संपादक बने

सभी पत्रकार और गैर पत्रकार बंधु भ्रमित न हों...
आलोक मेहता नई दुनिया के प्रधान संपादक नियुक्त किए जा चुके हैं, इसकी पुष्टि नई दुनिया की वेबसाइट के ६ जून के अंक को देखकर की जा सकती है.

नई दुनिया दिल्ली के बाजार में शानदार तरीके से पदार्पण करने वाला है जिसकी कमान अलोक जी जैसे अनुभवी हाथों में देने के मकसद से ये फ़ैसला किया गया है. हिन्दी पत्रकारों के लिए अवसरों का एक और मौका आ गया है. नई दुनिया.

नई दुनिया सूत्रों के मुताबिक १५ अगस्त तक दिल्ली में अखबार लॉन्च करना कंपनी का मकसद है.

दूसरी बड़ी ख़बर यह की...देश के दिग्गज और तेज तर्रार राजनैतिक पत्रकार आज समाज के स्थानीय सम्पादक प्रदीप सिंह आउटलुक के नए सम्पादक नियुक्त हो सकते हैं. आज समाज प्रबंधन को उन्होने नोटिस भी दे दिया है. पुख्ता खबरें हैं की प्रदीप जी आउटलुक या अपने स्तर के किसी बड़े मीडिया संस्थान में भारी भरकम पोस्ट और पैकेज पर ज्वाइन कर सकते हैं.

प्रदीप जी इससे पहले भी आउटलुक के राजनैतिक रिपोर्टर रह चुके हैं. बेहद विनम्र और देश के कुछ गिने चुने योग्य पत्रकारों में शामिल प्रदीप जी कोहर मीडिया संस्थान अपने साथ जोड़कर गौरवान्वित होना चाहेगा. इस ख़बर की आधिकारिक पुष्टि तो प्रदीप जी ही कर सकते है लेकिन जैसा की उनकी शागिर्दी में ख़बरों को निकालने की कला मैंने सीखी है, उसके मुताबिक आप सबको थोड़ा इन्तजार भर करना है.

फिलहाल प्रदीप जी की बेहतरी, सफलता और तरक्की के लिए विनम्र बधाइयां...

तीसरी ख़बर...यह की एक साल पहले शुरू हुए दिल्ली के अपने अखबार आज समाज की हालत देश की अर्थव्यवस्था की तरह सुधरने का नाम ही नही ले रही है. संस्थान से लोग लगातार नौकरी छोड़कर जा रहे हैं और प्रबंधन उन्हे रोक पाने में असफल रहा है. हर माह तीन या चार लोगों का संस्थान छोड़ना बहुत कुछ कहता है.वीरेंदर मिश्रा, पंकज सिंह, मनोज सिंह और प्रदीप जी जैसे तेवर वाले लोगों की मौजूदगी के बावजूद अखबार का इस तरह फ्लॉप होना, सभी के लिए चिंता का सबब बना हुआ है...
हृदयेंद्र प्रताप सिंह

17.2.08

सन्देश एक हज़ार एक

ब्लागर्स क्यों चाह्ते हैं
अपना नाम अखबार में
छपा देखने के लिये ?

5.1.08

पांच प्रतिशत से बढे पाठक चालीस प्रतिशत... है न कमाल का पेज

बाजार मीडिया की जरूरत है या मीडिया बाजार की जरूरत इस बहस में न पढते हुए मैं कुछ नए प्रयोगों जो सफल भी हुए हैं कि ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूं. अब सही पद होगा कुछ नए सफल प्रयोगों की ओर ध्यान.... अशीष ने हाल ही में जागरण के पहले कारोबारी अखबार निकालने के दावे की हवा निकालते हुए कुछ तथ्यों को रखा था... मैं हाल ही में दैनिक भास्कर द्वारा किए गए अखबारी दुनिया के एक बेहतरीन प्रयोग पर बात कर रहा हूं.... लुधियाना में भास्कर की लांचिंग कई मायनों में अनूठी रही. शानदार रही जानदार रही. बाकी चालू अखबारों के फाख्ते तो पहले ही उडे हुए थे.. 15 दिसंबर को पेज सात और आठ पर माई बिजनेस ने भी पत्रकारीय दुनिया को यहां चौंकाया.... यह था पिंक सीट पर अखबारों के आम पाठक से सबसे अधिक दूर रहने वाले बाजार को लोगों की भाषा में उनके कंसर्न का मैटर देना... जिसे संपादक राजीव सिंह जी ने नाम दिया- माई बिजनेस... माई बिजनेस यानी गुरविंदर कौर का बिजनेस... पिंकू मल्होत्रा का बिजनेस... जेब में बाजार की सबसे जरूरी चीज रखने वाले नरेश नाथ बाजबा के इस पेज में टारगेट किया गया था उस 28 से 40 वर्ष की उम्र के युवा को जो कमाता है खाता है जोडता है और अपनी पूंजी को बढाकर सपने देखता है बेहतर लाइफ के शानदार लाइफ के.. जिसे शेयर की समझ नहीं म्यूचुअल फंड उसकी डिक्शनरी का हिस्सा नहीं लेकिन वह इन्हें जानना चाहता है पढना चाहता है अपनी भाषा में अपनी शब्दावली में.... तीन घंटे की माथा पच्ची के बाद कुछ चीजें निकली. दिल्ली, भोपाल, इंदौर, जयपुर के अलावा चंडीगढ, अमृतसर, जालंधर में बैठे कामर्स के साथियों के साथ आइडिया शेयर किया... कुछ ने सराहा कुछ ने मीन मेख निकाली.. सराहने वालों को धन्यवाद देकर मीन मेख निकालने वालों को उकसाया गया... यह नहीं तो क्या ऐसे नहीं तो कैसे... की शक्ल में सवाल तैरे सवालों में 30 साला अनुभव भी था जबावों में तीन साला जोश था... प्रश्नवाचक चिन्हों में शुरुआत करनेवालों की हुस्ट थी तो चीजें तरतीब से रखने में पक चुके बालों की उम्र थी.... दादा और शशि जी ने अगले पांच दिनों तक सिर्फ और सिर्फ इसी के ले आउट पर काम किया.... हैडर को एप्रूवल के लिए भोपाल भेजा तो टका सा जबाव मिला यह नहीं चलेगा... फिर शुरु हुई कवायद.... मैटर के पांच सेट तैयार किए गए... हर वाक्य पर माथा पच्ची हर शब्द का पर्याय खोजने की थकाऊ लेकिन मजेदार प्रक्रिया.... और फिर सामने आया भास्कर लुधियाना के यूएसपीज में से एक माई बिजनेस.... 15 दिसंबर को अखबार लोगों तक पहूंचा और विशेषज्ञों के अनुसार अब तक हिंदी अखबारों के बाजार पेज की रीडरशिप जो 5 से 7 प्रतिशत होती थी माई बिजनेस ने 40 फीसदी का आकडा छू लिया है.... हैरत होगी उन लोगों को जो मानते हैं कि आर्थिक जटिलताएं अखबार की सबसे निचली संपादकीय विधा हैं.... हां मानता हूं कि इसमें लुधियाना के इंड्रस्टीयल मिजाज का भी बढा हाथ रहा है.... चलिए आप भी देखिए कुछ पन्ने और देखिए इस प्रयोग की एक बानगी....... पेज देखने के लिए यहां चटकारा लगाएं

सचिन श्रीवास्तव

दैनिक भास्कर, लुधियाना