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19.10.08

फिसड्डी तहलका, पुरानी शराब नयी बोतल में.

तहलका यानी की तरुण तेजपाल, अपने नए कलेवर के साथ हिन्दी में लोगों के सामने है, शिद्दतों से लोगों की आस इस महीने पुरी हुई, मगर प्रश्न तहलका देखने के बाद कि क्या आस पर तरुण खरे उतरे ?


तहलका समाचार के पहले अंक का कलेवर

पत्रिका को हाथ में उठाते ही सबसे पहली नजर वापस गोधरा की याद दिलाती हुई, तेजपाल वापस तो आए, नए अंदाज के साथ भी मगर पत्रिका को देखने के बाद बस नए बोतल में पुरानी शराब से ज्यादा नहीलेखकों में प्रभाष जोशी, मंगेश डबराल, हरिवंश, प्रसून जोशी और अशोक चक्रधर को शामिल कर पत्रिका को मजबूती देने की कोशिश भी इन मजबूत लेखक के कमजोर लेख पत्रिका के पहले संस्करण पर शाख को बट्टा लगते से प्रतीत हो रहे हैंअपने सम्पादकीय में तरुण का "कश्ती नई,सफर वही" की स्वीकोरोक्ती जरुर प्रशंसनीय है, परन्तु बाकी के सम्मानित लेखक नए विचार के बजाये अपने पुराने बीन के साथ ही नजर रहे हैं जिसने पत्रिका के प्रभाव को और कमजोर किया है।


गोधरा के बहाने पत्रिका बेचने की कवायद, तहलका टाँय टाँय फिस्स

तहलका ने अपने आवरण कथा को गोधरा और उसके बाद हुए दंगे पर केंद्रित रखा है, आज जब सारा हिन्दुस्तान आतंक की कसौटी पर है, कौम का बंटाधार इस सर्वधर्म समभाव वाले देश में धड़ल्ले से देश के कर्णधारों की सहमती से मीडिया की देख रेख में हो रहा है, पत्रिका का वापस उसी मुद्दे को लेकर सामने आना टी आर पी के तर्ज पर देश की एकता को ताक पर रख कर पुराने घाव कुरेद बेचने की कवायद से ज्यादा नही लगती है


पत्रकारिता के विपरीत तस्वीर पत्रिका पर प्रश्नचिन्ह लगाती है

गोधरा, उसके बाद की घटना और नानावती आयोग की रिपोर्ट को जिस सनसनीखेज तरीके से पेश कर तहलका करने की कोशिश की गयी है, आज के वर्तमान परिपेक्ष में लोगों के घाव को कुरेदने का नुस्खा से ज्यादा नही लगता, बाजारवाद की शिकार भारतीय अर्थव्यवस्था में जिस तरह से खबरिया चैनल भुनाने की प्रवृति का शिकार है कमोबेश उसी से उत्प्रेरित तेजपाल की ये पत्रिका लगती है, बाढ़ से तहसनहस बिहार बंगाल उडीसा में बाढोपरांत अन्न अन्न को तरसते लोग, दूध को तरसते नन्हे बच्चे, महिलाओं की आबरू को बचाने के लिए अपर्याप्त वस्त्र, बिमारी और महामारी के शिकार लाखो भारतीय और इनके नाम पर करोडो की उगाही कर रही एन जी और सरकारी तंत्र की नि:श्क्रियता तेजपाल के तहलका का हिस्सा नही रहे.


सम्पूर्ण पत्रिका को देखने के बाद ये तहलका कम और बेस्वाद मसाला ज्यादा लगता है.



18.10.08

लाला जी की दरियादिली या घरियाली आँसू.

वैश्विक आर्थिक मंदी का असर सब जगह, सारे धंधे गाहे बगाहे प्रभावित। खबरिया चैनल हो या अखबार स्टॉक मार्केट ही स्टॉक मार्केट। मंदी का असर बाजार पर, मंदी का असर लाला जी पर, मंदी का असर ख़बर के व्यवसाय पर और मंदी से हिलती डुलती सरदार की सरकार।
इसी बीच भारत की दो बड़ी विमान सेवा कम्पनी के परस्पर व्यापारिक सहयोग का एलान और तुंरत फुरत में जेट के हजारों लोगों को कम्पनी से बाहर का रास्ता मानो खबरिया चैनल, अखबार से लेकर राज्नेतों तक के हाथ में झुनझुना आ गया हो और बैठ कर सभी इसे बजा कर राग और सुर का मिलान कर रहे हों.


दो लाला ने डूबते धंधे को बचाने के लिए मिलाया हाथ, गाज गिराई कर्मचारियों पर।

कर्मचारियों का सड़क पर उतर कर पत्रकारों, और नेताओं के साथ जुगलबंदी बना कर एसा राग आलापा गया की बाजार के बड़े उस्तादों में से एक और जेट कम्पनी के मालिक नरेश गोयल को कुर्ता पायजामा में लोगों के सामने आकर निकाले गए सभी लोगों को वापस लेने का एलान करना पड़ा।


घडियाली आँसू और लाला जी साथ साथ उपस्थित हुए मीडिया के समक्ष।

जरा तर्क सुनिए लाला जी काकि ये अपने जेट परिवार के लोगों के आंखों में आँसू देख कर सभी को वापस ले रहे हैं, लाला जी के बयान की हद देखिये कहते हैं की मनेजमेंट ने जो फैसला किया उसकी जानकारी उन्हें नही थी, सी एम् दी को नही थी, जब जानकारी मिली तो सभी को वापस ले रहा हूँ क्यौंकी मैं अपने परिवार के किसी की आँखों में आंसू नही देख सकता, अपने बच्चों को भूका नही देख सकता.

लाला जी का दिलासा, रोनी सूरत पर लौटी मुस्कान, मगर ये मुस्कान कब तक ?

मंदी के इस दौर में जिस तरह से सारा बाजार नुकसान में जा रहा है, उड्डयन भी इसऐ इतर नही था, हजारो करोड़ के नुक्सान में चल रहे ये दो बड़ी कंपनियों ने अपने नुकसान से ही उबड़ने के लिए हाथ भी मिलाये थे, मगर जिस आनन् फानन में लोगों को बहार का रास्ता दिखा कर वापस लिया गया नि:संदेह इसमें दवाब की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही, और ये दवाब गोयल जी के चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता था जब वो पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे।
बहरहाल इस कदम से जेट कर्मचारियों के चेहरे पर क्षणिक मुस्कुराहट लौट आयी है, मगर मंदी का ये दौर और बाजार के पक्के धुरंधर गोयल जी से कब तक सामंजश्य रखता है, धंधा कर रहे गोयल जी मानवीय संवेदना को कब तक झेलते हैं चलिए इसका इन्तेजार करते हैं।

18.7.08

एक नजर इधर भी.......

अखबार के नाम पर टिकेट ले लो बाबा!!!!!

जरा गौर से देखिये इस तस्वीर को, शायद आपको वो दिखे जो मुझे भी दिखा ?
कुछ दिन पहले यशवंत जी ने एक पोस्ट डाली थी की नॉएडा में हिजडे एक वाहन में जा रहे थे और वहां पे लिखा था प्रेस। सच में क्या प्रेस का टैग लगना ऐसा है, जरा गौर से देखिये इस सरकारी मुलाजिम को जो मुंबई बस का कंडक्टर है मगर डिब्बे पे "सकाळ" एक मराठी दैनिक का लेबल, महोदय आप सरकारी कर्मचारी हो या इस अकबार के विज्ञापन प्रतिनिधि...
वैसे ये बड़ी बात नही है और कमोबेश सभी अखबार का विज्ञापन विभाग इस कुकृत्य को अंजाम देता है, अपने अखबारनवीश होने का धौंस देकर मनमाफिक विज्ञापन प्रचारित करवा लेता है।
तात्पर्य केवल इतना की मित्र ये व्यावसायिक दौर का समाचारपत्र व्यवसाय है, विचारों की बेला नही और अपने आपको पत्रकार कहने वाले हमारे मित्र इन व्यवसायिक घराने के जी हुजूरी करने वाले चमचे से ज्यादा नही, जिसे चमचागिरी पसंद नही वो अपने घर में रहे, लाला जी के अखबार को उसकी कोई जरूरत नही।
जय जय भड़ास