15.3.11
अंडमान में भी महिला सशक्तिकरण को लेकर गूंजी आवाज़
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26.1.11
11.6.08
आलोक मेहता की खबर सच है, वे नई दुनिया में प्रधान संपादक बने
सभी पत्रकार और गैर पत्रकार बंधु भ्रमित न हों...
आलोक मेहता नई दुनिया के प्रधान संपादक नियुक्त किए जा चुके हैं, इसकी पुष्टि नई दुनिया की वेबसाइट के ६ जून के अंक को देखकर की जा सकती है.
नई दुनिया दिल्ली के बाजार में शानदार तरीके से पदार्पण करने वाला है जिसकी कमान अलोक जी जैसे अनुभवी हाथों में देने के मकसद से ये फ़ैसला किया गया है. हिन्दी पत्रकारों के लिए अवसरों का एक और मौका आ गया है. नई दुनिया.
नई दुनिया सूत्रों के मुताबिक १५ अगस्त तक दिल्ली में अखबार लॉन्च करना कंपनी का मकसद है.
दूसरी बड़ी ख़बर यह की...देश के दिग्गज और तेज तर्रार राजनैतिक पत्रकार आज समाज के स्थानीय सम्पादक प्रदीप सिंह आउटलुक के नए सम्पादक नियुक्त हो सकते हैं. आज समाज प्रबंधन को उन्होने नोटिस भी दे दिया है. पुख्ता खबरें हैं की प्रदीप जी आउटलुक या अपने स्तर के किसी बड़े मीडिया संस्थान में भारी भरकम पोस्ट और पैकेज पर ज्वाइन कर सकते हैं.
प्रदीप जी इससे पहले भी आउटलुक के राजनैतिक रिपोर्टर रह चुके हैं. बेहद विनम्र और देश के कुछ गिने चुने योग्य पत्रकारों में शामिल प्रदीप जी कोहर मीडिया संस्थान अपने साथ जोड़कर गौरवान्वित होना चाहेगा. इस ख़बर की आधिकारिक पुष्टि तो प्रदीप जी ही कर सकते है लेकिन जैसा की उनकी शागिर्दी में ख़बरों को निकालने की कला मैंने सीखी है, उसके मुताबिक आप सबको थोड़ा इन्तजार भर करना है.
फिलहाल प्रदीप जी की बेहतरी, सफलता और तरक्की के लिए विनम्र बधाइयां...
तीसरी ख़बर...यह की एक साल पहले शुरू हुए दिल्ली के अपने अखबार आज समाज की हालत देश की अर्थव्यवस्था की तरह सुधरने का नाम ही नही ले रही है. संस्थान से लोग लगातार नौकरी छोड़कर जा रहे हैं और प्रबंधन उन्हे रोक पाने में असफल रहा है. हर माह तीन या चार लोगों का संस्थान छोड़ना बहुत कुछ कहता है.वीरेंदर मिश्रा, पंकज सिंह, मनोज सिंह और प्रदीप जी जैसे तेवर वाले लोगों की मौजूदगी के बावजूद अखबार का इस तरह फ्लॉप होना, सभी के लिए चिंता का सबब बना हुआ है...
हृदयेंद्र प्रताप सिंह
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hridayendra
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4.5.08
जाना पड़ा ठाकुर को
----Bhadas Breaking News----
दैनिक जागरण, लुधियाना के संपादकीय प्रभारी प्रदीप ठाकुर से इस्तीफा ले लिया गया है। प्रदीप ठाकुर की जिन कुछ खासियतों के चलते दैनिक जागरण, लुधियाना में उनकी तूती बोलती थी उसमें उनका जबर्दस्त बिजनेस लिंक है। लुधियाना कई बड़ी राष्ट्रीय कंपनियों का मुख्यालय है जिनके जरिए प्रदीप ठाकुर ने दैनिक जागरण को बड़े स्तर पर विज्ञापन और बिजनेस दिए। बाद में उन पर कई तरह के आरोप लगे और इन्हीं आरोपों के चलते उन्हें जाना पड़ा।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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19.4.08
आप बात बात में लोगों को नौकरी से निकालने की धमकी देते हैं....(एक मीडियाकर्मी का त्यागपत्र)
विषयः त्याग-पत्र
प्रति,
श्री अरूण आनंद,
कार्यकारी संपादक
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस,
1बी-, रावतुला राम मार्ग,
नई दिल्ली-110022ण्
महाशय,
कल रात दिनांक 10 मार्च 2008 को डेस्क प्रभारी संजीव स्नेही जी का फोन आपके हवाले से आया कि मैंने कहीं अन्य जगह नौकरी कर ली है। उन्होंने आपके हवाले से यह भी कहा कि मैं इस्तीफा दूं। इस बावत मुझे कार्यालय से नोटिस भेजे जाने की भी तैयारी हो रही है। मेरे बीमार पड़ने से और छुट्टी पर जाने से नये लोगों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। संजीव जी से कल रात 10-15 मिनटों की बात के कुछ मुख्य बातों में से यह बातें सार हैं।
बीमार पड़ने पर कुछ दिनों की छुटि्टयां लेकर घर में आराम करने से किसी को नौकरी मिल जाती हो तो मेरे ख्याल से हम और आप सभी बीमार पड़ते रहे हैं। आपको भी कुछ समय पहले कमर में दर्द था और आपने छुट्टी की थी तो क्या आप भी कहीं नौकरी का प्रयास तो नहीं कर रहे थे! कोई पत्रकार इतना संवेदनाविहीन कैसे हो सकता है! खैर, आपने मुझसे इस्तीफे की मांग की है। मैं आपकी इस मांग को पूरा कर रहा हूं और त्याग-पत्र भेज रहा हूं।
मैंने इंडो-एशियन न्यूज सर्विस की हिन्दी सेवा में लगभग सवा तीन महीने काम किए परंतु दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मुझे इस दौरान कभी भी आपके संस्थान में काम करने का उचित माहौल महसूस नहीं हुआ। हिन्दी सेवा के कार्यकारी संपादक अरूण आनंद को अपने साथ काम करने वाले पत्रकार कर्मचारियों के साथ कभी भी मुफीद (उचित) व्यवहार करते हुए मैंने नहीं पाया। कार्यकारी संपादक का स्वभाव बहुत हद तक व्यापारिक मानसिकता से ग्रस्त है। वह अपने साथ काम करने वालों को एक ग्राहक की तरह देखते हैं और उनसे ऐसा ही वर्ताव करते हैं। उन्हें खबरों की गिनती का बहुत शौक है। आप खबरों की गिनती में विश्वास करते हैं न कि गुणवत्ता में। साक्षात्कार के समय और नियुक्ति के कुछ दिनों बाद तक आप (अरूण आनंद) बहुत ही सहिष्णु बने रहते हैं और कर्मचारियों की नब्ज टटोलते हैं। इस संस्थान की अंग्रेजी सेवा में आपके एक जूनियर साथी की भाषा में कहूं तो कार्यकारी संपादक अपने सामने अपने कर्मचारियों को समर्पित करवाने चाहते हैं। माफ कीजिए, यह सब नौकरीपेशा में एक हदतक सभी को स्वीकार्य होता है लेकिन लंबे समय तक इस गुलाम बनाने की मनोवृत्ति को ढो पाना किसी भी गैरतमंद इंसान के लिए मुिश्कल होता है। इसके बहुत से नजीर माननीय अरूण जी के सेवाकाल में देखने को मिले हैं।
आईएएनएस से मेरी जानकारी में कुछ लोग मेरी नियुक्ति के पहले भी छोड़कर जाते रहे हैं या उन्हें छोड़कर जाने को बाध्य किया जाता रहा है। मेरे इन सवा तीन महीनों के दौरान भी चार लोगों ने इनके व्यवहार के कारण नौकरी छोड़ी है। हालांकि उन्होंने नौकरी छोड़कर जाने की कई घटनाओं के बाद अपनी शैली में परिवर्तन लाया है। यह उनकी जरूरत है। उम्मीद करता हूं कि यह नई शैली उनकी आदतों में शुमार हो जाए। यह दिक्कत श्रीमान कार्यकारी संपादक के अंदर किस कारण विकसित हुआ है, यह तो कोई मनोविश्लेषक ही बता सकता है। कार्यकारी संपादक का कहना है- ‘’journalism should flow in your blood.’’ क्या पत्रकारिता कार्यकारी संपादक की धमनी और िशराओं में बहने लगे तो उनके स्वास्थ्य पर इसका विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा।
पत्रकारिता का लेना, देना केवल पैसों, नियुक्ति दे सकने का सामथ्र्य रखने, महज कुछ समर्थ लोगों से अपने संबंध बेहतर बनाकर रखने या खबरों की गिनती रखने से नहीं होता है। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पत्रकारिता की नींव रखने और उसे सींचने वाले लोगों का मन शायद इन क्षणिक महत्व रखनेवाली बातों में कभी नहीं गया था। पत्रकारिता को सींचने वाले लोगों में संवेदनाएं कूट-कूटकर भरी हुई थीं। कार्यकारी संपादक में इसका सर्वथा अभाव है। हमारे कहने से, लिखने से और संस्थान छोड़ देने से उनका हृदय परिवर्तित हो जाएगा, मैं ऐसा नहीं मानता हूं। माननीय कार्यकारी संपादक को इसके लिए बहुत मेहनत की जरूरत होगी ठीक उसी तरह जिस तरह मुझे अपनी कॉपी बेहतर से बेहतर बनाने के लिए कहा जाता रहा है। शायद इससे भी ज्यादा मेहनत की जरूरत होगी। मैं आपके व्यवहार के कारण बहुत पहले ही संस्थान छोड़ देता लेकिन मैं भागने वालों में से नहीं हूं। मैं आपसे मेेरी अपनी कॉपी के लिए अच्छे रिमार्क्स देने को मजबूर करवाना चाहता था। मेरी कॉपी के लिए आप ‘excelent copy’ कह चुके हैं। मैं अपनी चुनौतियों से पार पा गया हूं। अनुवाद विशेषकर खबरों का मेरे लिए नया काम था। नये काम में समय लगता है, सो मुझे भी लगा।
‘original copy’ आपके हिसाब से मैं बहुत अच्छी लिखता हूं। ऐसा डेस्क प्रभारियों ने भी कई मौकों पर कहा है। खैर, इसके लिए मुझे आपके प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। आपके साथ काम करते हुए मुझे दो बड़े संस्थानों ने आईएएनएस से बेहतर पगार और पद की पेशकश की थी लेकिन मैं अपनी चुनौतियों से पीछे नहीं हटना चाहता था। सो, मैंने इन प्रस्तावों को तव्वजो नहीं दी। आपने नियुक्ति के समय senior-sub editior की पेशकश की थी और बाद में जब नियुक्ति पत्र देने की बात आई तब आपने मेरा पद कम करके sub-editor कर दिया। अपनी बात से पीछे हटना आपकी फितरत है। नियुक्ति के समय 10-12 खबरों का अनुवाद तथा 8 घंटे काम करवाने की बात आपने की थी लेकिन दो हफ्तों के बाद आपने अपने काम करवाने की परिभाषा ही बदल डाली और मेरे एक सहकर्मी से कहा-``पत्रकारिता में कार्यालय आने का समय होता है लेकिन कार्यालय से जाने का कोई समय नहीं होता है।´´ मुझे लगता है कि कार्यकारी संपादक को working journalist act जरूर पढ़ लेना चाहिए।
आप बात-बात में लोगों को यह धमकी देते हैं कि यहां से नौकरी से निकाले जाने के बाद कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। यह एक किस्म का फतवा है। आपने जिन लोगों को आईएएनएस से बाहर का रास्ता दिखाया है या बाहर का रास्ता देखने को मजबूर किया है, माफ कीजिए वे सारे लोग देश के नामी-गिरामी संस्थानों में अपनी बेहतर सेवा दे रहे हैं। कुछ लोग पत्रकारिता में व्यवहारिक होकर नौकरी खोजकर संस्थान छोड़कर चले गए। मैं नौकरी और भविष्य की चिंता किए बगैर आपकी नौकरी से इस्तीफा दे रहा हूं। पत्रकारिता में कुछ साल या बहुत साल बिताने से पत्रकारिता और मानवीयता की समझ नहीं आ जाती है। जिसको पत्रकारिता और मानवीयता की समझ आनी होती है उसे कुछ समय में ही आ जाती है। शायद मैं अपनी बात आपको समझा पाया हूं। इसी उम्मीद के साथ।
आपका शुभेच्छु
स्वतंत्र मिश्र
11 मार्च 2008
सी-1/118, मुस्कान अपार्टमेंट सेक्टर-17, रोहिणी, दिल्ली-110089, मो,-09868851301
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(कारवां से साभार)
3.3.08
क्या लालू यादव से डायलागबाजी के चलते निकाले गए पुण्य प्रसून?
पुण्य प्रसून वाजपेयी की विदाई और लालू यादव-- इन दोनों में कोई योग संयोग या दुर्योग तो नहीं दिख रहा पर हुआ कुछ ऐसा ही। जानकारों का कहना है कि सहारा समय के सर्वेसर्वा पुण्य प्रसून जब रेल बजट के दौरान लालू यादव का इंटरव्यू करने पहुंचे तो लालू ने पूछ दिया की पंडी जी आप कब पहुंच गए सहारा समय? पुण्य प्रसून ने जो जवाब दिया उसका लब्बोलुवाब ये था कि सहारा समय को सुधारने के लिए चले आए हम। इसके जवाब में संभवतः लालू ने कहा कि सहारा ग्रुप को कोई सुधार पाया है जो आप सुधार पाएंगे? और जब ये सब बातें हो रही थी तो सब कुछ लाइव और आन एयर था। बताते हैं कि प्रसून जी के साथियों व अन्य लोगों ने सुझाव दिया कि इतना हिस्सा हटा देना चाहिए पर प्रसून जी ने इसे सहजता का संवाद बताकर चलने देने को कहा। और यही बात सहारा ग्रुप के मैनेजमेंट को नागवार गुजरी। तुरत फुरत निर्णय लिया गया और प्रसून जी को एंकरिंग करने से मना कर दिया गया। दो दिन अवकाश पर रहे और जब अगले दिन आफिस आए तो मैनेजमेंट निर्णय ले चुका था। बताते है कि थोड़ी नोंकझोंक के बाद प्रसून जी और उनकी पूरी टीम नारेबाजी करते हुए बाहर निकल गई और अंदर सहारा समय के बचे हुए स्टाफ ने जश्न मनाना शुरू कर दिया।
तो देखा आपने, लालू जी के डायलाग और प्रसून जी की सहजता के कारण यह सब इतना बड़ा कांड हो गया।
जानकारों का कहना है कि प्रसून जी ने अपने व्यवहार के चलते सहारा समय के ढेर सारे लोगों को अपने खिलाफ कर लिया था। सहारा की एक बड़ी लाबी प्रसून जी को लेकर लगातार अभियान चलाए हुए थी और उनकी विदाई की अफवाहें हर समय उड़ाया करती थी। प्रसून जी अति-आत्मविश्वास और स्ट्रेट फारवर्ड बिहैवियर के कारण कामकाज तो अच्छा करते कराते रहे पर लोगों में अलोकप्रिय होते गए। दरअसल एक लीडर के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह खुद अच्छा कार्यकर्ता हो, उसमें जरूरी गुण ये है कि वो कार्यकर्ताओं में अव्वल दर्जे का जोश ओ खरोश बनाए रखे और उन्हें बार बार शाबासी व दिशा देते रहे। पर कई बार हम कुछ लोग जो खुद काम में बहुत अच्छे होते हैं, टीम लीडर बनने के बाद खुद ही अच्छा कर दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं और बाकी लोगों से खुद द्वारा किए गए काम के स्तर के काम की अपेक्षा करने लगते है। इसके चलते दिन ब दिन खाई बढ़ती जाती है और आखिरकार एक दिन ऐसा होता है कि दो तिहाई टीम आपके खिलाफ खड़ी हो गई। और जिस संस्थान में दो तिहाई लोग किसी नेता के खिलाफ हो जाते हैं तो वहां काम का मौहाल नहीं रहता और कोई बेस्ट रिजल्ट नहीं दे सकता।
खैर, जो हुआ सो हुआ। आना जाना तो जीवन का एक बड़ा छोटा हिस्सा है लेकिन बौने टाइप के लोग इसे सबसे बड़ा कांड और सदी की सबसे बड़ी घटना के रूप में पेश करते हैं। दरअसल जो लोग हर साल दो साल में कुछ नया करते रहते हैं उनसे ही ज्यादा कुछ अपेक्षाएं होती हैं। वरना एक जगह रूका हुआ पानी तो सड़ ही जाता है।
नया सवाल ये उठ रहा है कि अब प्रसून जी अपनी टीम लेकर किस गली की ओर जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि उनके पास अब त्रिवेणी ग्रुप के आने वाले नए चैनल का आप्शन है जहां वो कुछ कम ज्यादा में बारगेन कर अपनी टीम सहित जा सकते हैं। और रामकृपाल सिंह को भी अभी तक किसी एक ऐसे चेहरे की तलाश है जो उनके नए चैनल की रीढ़ बने और एक विजन दे सके। तो राम मिलाये जोड़ी। उम्मीद है, जल्द ही प्रसून जी अपने लोगों के साथ किसी नई जगह पर झंडे गाड़ते नजर आएंगे। उन्हें भड़ास की तरफ से शुभकामनाएं। अगर कोई मीडियाकर्मी साथी यह बता सके कि प्रसून जी के साथ किस किस ने सहारा समय छोड़ा है, तो बड़ी कृपा होगी।
उपरोक्त जो बातें लिखी कही गई हैं, वो इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ वरिष्ठ साथियों द्वारा बताई गई बातों पर आधारित है और इसे कई जगहों से क्रास चेक भी किया गया है। अगर किसी को कोई आपत्ति हो या उपरोक्त बातों में कोई तथ्य गलत हो तो कृपया जरूर ध्यान आकृष्ट कराएं, नीचे कमेंट करके।
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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