पहली बात...
पत्रकार या स्टेनोग्राफर
--संजय तिवारी--
(विस्फोट ब्लाग और विस्फोट डाट काम के माडरेटर)
हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की जरूरत वहां है कितनी? या फिर निवेश करने का प्रभाव होगा या दुष्प्रभाव. हमारे बिजनेस अखबार इसे पत्रकारिता नहीं मानते. वह जो निवेश कर रहा है उससे उसे फायदा कितना होगा और समाज-पर्यावरण को कितना नुकसान इसका कोई आंकलन कभी हमारे बिजनेस पत्रकार नहीं करते. भाई कुएं में बाल्टी डालने की खबरें देते हो लेकिन उसने वहां से कितना पानी उलीचा कभी यह खबर क्यों नहीं बनाते?
इसीलिए मैं इन पत्रकारों को कंपनी पत्रकार कहता हूं. पत्रकार भी क्यों कहें? पी साईंनाथ ठीक कहते हैं कि असल में ये लोग स्टेनोग्राफर हैं. जो कंपनियों से डिक्टेशन लेते हैं. इस डिक्टेशन के बदले उन्हें तनख्वाह के अलावा कुछ गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता है.
पत्रकारिता तो शायद ही कहीं बची हो. हिन्दी टीवी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि हिन्दी लुच्चों और लफंगों की भाषा है इसलिए उनकी प्राथमिकता वही लोग हैं. बिजनेस अखबर और चैनल तो कंपनियों को रिपोर्ट करने को ही पत्रकारिता समझते हैं. लगता है फिर पश्चिम से कोई हवा आयेगी तो इन पत्रकारों की बुद्धि ठिकाने आयेगी इनकी अपनी कोई समझ तो बची नहीं है.
पत्रकारिता का एक मूलभूत सिद्धांत है कि वह खबर नहीं है जो आपके पास चलकर आती है. खबर वह है जिसके पास चलकर आप जाते हैं. और इस चलने-फिरने में भी एक बात नहीं भूलनी चाहिए आपका अंतिम लक्ष्य आम आदमी की भलाई, उसका हक-हित सुरक्षित करना है न कि कंपनियों और साम्राज्यवादी ताकतों का. लेकिन अव्वल तो पत्रकारों ने चलने-फिरने से ही तौबा कर लिया है. चलते-फिरते भी हैं तो वहीं जाते हैं जहां उन्हें ले जाया जाता है.
ज्यादा कुछ तो नहीं सिर्फ इतनी प्रार्थना करता हूं कि ऐसे स्टेनोग्राफरों से भगवान इस देश की रक्षा करें.
(साभारः http://visfot.blogspot.com/2008/04/blog-post_21.html)
------------------
दूसरी बात...
पत्रकार फिर निशाने पर एक का अपहरण तो दूसरा जेल में
--अंबरीश कुमार--
(जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार और विरोध ब्लाग के माडरेटर)
उत्तर प्रदेश में पत्रकार फिर निशाने पर हैं। शनिवार को ही इलाहाबाद के पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा अपहृताओं के चंगुल से जन बचाकर भाग आए। उनका अपहरण पांच अप्रैल को इलाहाबाद में हुआ था। दूसरे वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान पिछले १५ दिन से जेल में हैं। ६५ साल के मेहरूद्दीन खान को अपहरण के मामले में शामिल बताया गया है। मेहरूद्दीन खान दिल्ली से निकलने वाले अखबारों में लिखते रहे हैं और शाह टाइम्स के पूर्व संपादक रहे हैं। शाह टाइम्स के संपादक शाहनवाज राणा बहुजन समाज पार्टी के विधायक हैं। दूसरी तरफ प्रेस काउंसिल ने आगामी दो मई पत्रकार समीउद्दीन नीलू के मामले में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को तलब किया हुआ है। समीउद्दीन वही पत्रकार हैं जिन्हें नौ फरवरी, 2005 को वन्य जीव तस्करी के मामले में गिरफ्तार कर लखीमपुर खीरी जिले की सीमा पर फर्जी एनकाउंटर में मारने का प्रयास किया गया था। बाद में उन्हें 20 लाख की वन्य जीव तस्करी के मामले में जेल भेज दिया गया। यह कुछ उदाहरण हैं कि किस तरह पुलिस प्रशासन और नेता फर्जी मामलों में पत्रकारों को फंसा रहे हैं। उत्तर प्रदेश वर्किग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने डा. मेहरूद्दीन की गिरफ्तारी और उनके परिवार के उत्पीड़न की तीखी निंदा की है। उन्होंने मांग की है कि डा. मेहरूद्दीन को फौरन रिहा कर दोषी अफसरों व नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जए।
इलाहाबाद में पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा के अपहरण का मामला अभी गर्माया ही हुआ था कि मुजफ्फरनगर से पत्रकार मेहरूद्दीन खान को गिरफ्तार कर जेल भेजने की जनकारी मिली। हालांकि शनिवार को ही कुशवाहा हरिद्वार में अपहृताओं के चंगुल से भाग निकले तो इलाहाबाद के पत्रकारों ने राहत की सांस ली। लेकिन मुजफ्फरनगर के पत्रकार अब मेहरूद्दीन खान को लेकर आहत हैं। मेहरूद्दीन खान को न सिर्फ बदसलूकी कर गिरफ्तार किया गया बल्कि उनके परिवार की बेटियां जहां-जहां ब्याही हैं, उनके घरों में भी पुलिस दबिश दे रही है। उनके पुत्र शाकिर को पहले ही गिरफ्तार किया ज चुका है। उनके परिवार की कई महिलाओं को पुलिस परेशान कर चुकी है। इस पूरे मामले में एक समाजवादी पार्टी सरकार में लोकदल कोटे से मंत्री रहे नेता पर अंगुली उठ रही है। डा. मेहरूद्दीन से कुछ पत्रकारों ने जेल में मुलाकात की तो उन्होंने कहा-मुङो फर्जी मामलों में फंसाकर परेशान किया ज रहा है। मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मेरे परिवार के लोगों का उत्पीड़न जरी है।
डा. मेहरूद्दीन को एक अपहरण के मामले में फंसाया गया है। उनके रिश्तेदार पर एक लड़की के अपहरण का मामला दर्ज किया गया था। उसी मामले में चार अप्रैल की रात कांधला पुलिस ने गाजियाबाद के थाना दादरी के गांव बढ़पुरा से डा. मेहरूद्दीन और उनके पुत्र शाकिर को मारपीट करते हुए उठाया। इस बीच घर की महिलाएं बीच में आईं तो उनके साथ भी बदसलूकी की गई। थाने ले जकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इस बीच क्षेत्र के एक पूर्व मंत्री पुलिस से लगातार संपर्क बनाए हुए थे। बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। पुलिस ने उनके खिलाफ अपहरण की साजिश रचने और अपहृत लड़की को पनाह देने जसे आरोप लगाए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रेम संबंधों को लेकर कई मामले उछले हैं जिनमें कभी पंचायतों ने बर्बर भूमिका निभाई तो कभी पुलिस और नेताओं ने। इस मामले में स्थानीय पुलिस और नेताओं की भूमिका संदिग्ध रही है।
समीउद्दीन नीलू के बाद यह दूसरा मामला है जिसमें पत्रकार को फर्जी मामलों में फंसाकर जेल भेज गया है। नीलू के मामले में तो पुलिस अधिकारी ने साफ कह दिया था-जो हम लिख देंगे, जिला की अदालत उसी को सच मानेगी। पुलिस ने तब 20 लाख रूपए मूल्य की वन्य जीवों की खालें आदि की बरामदगी भी दिखा दी थी। बाद में पुलिस से यह मामला ले लिया गया और सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में सारे मामले को फर्जी करार दिया। वर्किग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने कहा-हम लोगों ने कई साल पहले पत्रकार बंधु की स्थापना की थी ताकि पत्रकारों से जुड़े मामलों की वहां जंच-पड़ताल हो सके पर सरकार ने कोई पहल नहीं की। हम चाहते हैं कि किसी भी पत्रकार की गिरफ्तारी से पहले प्रदेश के आला अफसरों से इजजत ली जए ताकि जिला स्तर पर इस तरह की घटनाएं न हों। इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जनर्लिस्ट के अध्यक्ष के विक्रमराव रायपुर जकर छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार को नक्सली बताकर जेल भेजने का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में ६५ साल के बुजुर्ग पत्रकार को एक लड़की के अपहरण के मामले में जेल में डालने पर मीडिया के वरिष्ठ लोग हैरान हैं।
(साभारः http://virodh.blogspot.com/2008/04/blog-post_20.html)
----------------
तीसरी बात...
संपादकों की औकात, मालिकान सोचते हैं कि संपादक नाम का प्राणी तो बोझ है
--खुशवंत सिंह--
(जाने माने स्तंभकार और लेखक)
बात बहुत पुरानी नहीं है, जब हमारे यहां अख़बार इस लिए जाने जाते थे कि उनके संपादकों का कद कितना बड़ा है। ब्रिटिश राज के वक्त तो कई सरकारी अख़बारों, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया और स्टेट्समैन के संपादकों को नाइटहुड की उपाधि तक से सम्मानित किया गया। आजादी के बाद भी अख़बारों के एडिटर को समाज में काफ़ी सम्मान प्राप्त था। फ्रेंक मोरेस, चलपति राव, कस्तूरी रंगन अयंगर, प्रेम भाटिया आदि नामों से पाठक भली भांति परिचित थे। अस्सी के दशक में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक रहे दिलिप पदगांवकर का तो यहाँ तक कहना था कि देश में प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम उन्हीं के ज़िम्मे है। सरकार के ग़लत नीतियों की सकारात्मक आलोचना विपक्ष से नहीं बल्कि इन्ही काबिल संपादकों के बदौलत होती थी।
लेकिन टेलीविजन के आते ही हालात बदलने लगे। जो चीजें टीवी के परदे पर दिखने लगी, उसे लोग पढ़ने की जहमत नहीं उठाना चाहते थे। संपादकीय पढ़ने वालों की तादाद घटती गई। अख़बारों के मालिकान यह सोचने लगे कि संपादक नाम का प्राणी तो बोझ है और उनके बिज़नेश मैनेज़र ही टेलीविजन की चुनौतियों का बेहतर ढ़ंग से सामना कर सकते हैं। जरूरत थी तो सिर्फ़ छड़हरी बदन वाली मॉडलों, गॉशिप, विंटेज वाईन और लज़ीज़ व्यंजनों से अख़बारी पन्नों को भर देने की। और इस फार्मूला को चार फ से परिभाषित किया गया - फिल्म, फैशन, फुड और फक द एडिटर (पता नहीं हिंदी में इसका मतलब क्या हो सकता है!)। अपने जमाने के कई मशहूर कलमकार (संपादक) चौथे फ यानि फक द एडिटर के शिकार हो गए। इनमें से कुछ के नाम काबिल-ए-गौर है - फ्रेंक मोरेस (द नेशनल स्टैंडर्ड जो बाद में इंडियन एक्सप्रेस बना), गिरिलाल जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया), बी जी वर्गिज़ ( मैग्सेसे पुरस्कार विजेता - टाइम्स ऑफ इंडिया), अरुण शौरी (इंडियन एक्सप्रेस), विनोद मेहता (वर्तमान संपादक ऑउटलुक), इंदर मलहोत्रा (टाइम्स ऑफ इंडिया), प्रेम शंकर झा (हिंदुस्तान टाईम्स)। आज अगर आप पूछें कि टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाईम्स या फिर टेलिग्राफ के संपादक कौन हैं, दस में से नौ लोग शायद न बता पाएं। दिलिप पदगांवकर.....ये कौन है?
दरअसल,भारतीय पत्रकारिता की यह विडंबना है कि यहाँ मालिकान संपादक से ज्यादा अहमियत रखते हैं। पैसा, प्रतिभा पर भारी पड़ती है। पैसे के इस खेल में सबसे ताजा उदाहरण एम जे अकबर का दुर्भाग्यापुर्ण तरीके से एशियन ऐज़ से निकाला जाना है। अकबर, शायद जुझारू पत्रकारीय विरादरी के सबसे काबिल सदस्य हैं। उन्होंने कलकत्ता से निकलने वाले आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप के सहयोग से संडे और टेलिग्राफ जैसी नामी अख़बार निकाला था। वे लोक सभा के लिए भी चुने गए और तक़रीबन आधे दर्जन किताबों के लेखक भी रहे हैं। पंद्रह साल पहले अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने द एशियन एज का प्रकाशन शुरु किया था। यह एक कठिन कार्य था और अकबर ने इसे बख़ूबी से अंजाम दिया। एशियन एज़ भारत के लगभग हर मेट्रो से साथ ही लंदन से भी छपने लगा। इस अख़बार में नाम मात्र का विज्ञापन होता था लेकिन पठनीय सामग्री काफी मात्रा में थी-जो नामी ब्रिटिश और अमरीकन अखबारों से भी ली जाती थी।कुल मिलाकर यह एक मुकम्मल अखबार था।इसके आलावा, इसमें ऐसे भी लेख छपते थे जो हुक्मरानों को नागवार गुजरते थे।और शायद यहीं वजह थी जिसने अखबार में अकबर के व्यवसायिक पार्टनर को नाराज कर दिया, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक आकांक्षा को ठेस पहुंच रही थी।बस फिर क्या था-बिना किसी चेतावनी के ही अकबर को एशियन एज के मुख्य संपादक के पद से हटा दिया गया ।पैसे ने एक बार फिर से अपना नग्न और घिनौना चेहरा सामने दिखा दिया। यह कहना अभी मुश्किल है कि बदले में अब अकबर उस आदमी के साथ क्या करेंगे जिन्होने उनके और पत्रकारिता दोनों के साथ बड़े ही अपमानजनक व्यवहार किया। लेकिन अकबर को यह वाकया लंबे समय तक जरुर सालता रहेगा। वो अभी सिर्फ सत्तावन साल के हैं और न तो किसी घटना को भूलते हैं न ही अपने विरोधियों को माफ करते हैं।
जब मैं इलिस्ट्रेटेड वीकली का संपादन कर रहा था तब अकबर उस छोटी सी टीम का हिस्सा थे जिसकी मदद से इलिस्ट्रेटेड वीकली का प्रसार 6,000 से बढ़कर 400,000 तक जा पहुंचा था। यह कितनी बड़ी बिडंवना है कि मुझे भी उसी तरीके से उस पत्रिका से निकाल दिया गया जिस तरीके से अकबर को इस साल एशियन एज से। तब तक टाइम्स ऑफ इंडिया समेत बेनेट कोलमेन के तमाम प्रकाशनों का मालिकाना हक सरकार द्वारा जैन परिवार को सौंपा जा चुका था। ज्योंही जैन परिवार ने कमान अपने हाथ में ली, उन्होने मेरे काम में अड़ंगा डालना शुरु कर दिया। मेरे करार को खत्म कर दिया गया और मेरे उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी गई। मुझे एक सप्ताह के भीतर इलिस्ट्रेटेड वीकली छोड़ देना था। मैंने वीकली के लिए भारी मन से भावुक होकर अपना आखिरी लेख लिखा और पत्रिका के भविष्य की सुखद कामना की। लेकिन वो कभी नहीं छपा। जब मैं सुबह अपने ऑफिस में आया तो मुझे एक चिट्ठी थमा दी गई और तत्काल चले जाने को कहा गया। मैंने अपना छाता लिया और घर वापस आ गया। मुझे बड़े ही घटिया तरीके से ज़लील किया गया। यह अभी भी रह-रह कर मुझे परेशान करता है। जैन परिवार द्वारा किया गया वह अपमान मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। आज भी मेरे सम्मान में जब कोई समारोह होता है-भले ही उसकी अध्यक्षता अमिताभ बच्चन, महारानी गायत्री देवी या खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही क्यों न करें-उसकी रिपोर्ट तो टाइम्स ऑफ इंडिया में छपती है लेकिन उसमें न तो मेरा फोटो छपता है न ही नाम होता है।और यह उदाहरण साबित करता है कि पैसा और सत्ता के मद में चूर छोटे दिमाग बाले आदमी कैसे हो सकते हैं।
(साभारः http://kissago.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html)
----------------------
(उपरोक्त तीनों आलेख दूसरे ब्लागों से लिए गए हैं। उम्मीद है, उपरोक्त ब्लागों के माडरेटर इस चोरी के लिए क्षमा करेंगे। मकसद सिर्फ इतना है कि पत्रकार समुदाय से जुड़े उपरोक्त आलेख देश के कोने कोने मौजूद पत्रकारों तक भी पहुंच जाएं....जय भड़ास, यशवंत)
21.4.08
वर्तमान पत्रकारिता और पत्रकारः ऐसे वैसे कैसे कैसे रंग रूप? ........उधार के कुछ चिल्लर लेख-आलेख
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
Labels: चोरी के माल, दशा, दिशा, पत्रकार, पत्रकारिता
19.4.08
आप बात बात में लोगों को नौकरी से निकालने की धमकी देते हैं....(एक मीडियाकर्मी का त्यागपत्र)
विषयः त्याग-पत्र
प्रति,
श्री अरूण आनंद,
कार्यकारी संपादक
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस,
1बी-, रावतुला राम मार्ग,
नई दिल्ली-110022ण्
महाशय,
कल रात दिनांक 10 मार्च 2008 को डेस्क प्रभारी संजीव स्नेही जी का फोन आपके हवाले से आया कि मैंने कहीं अन्य जगह नौकरी कर ली है। उन्होंने आपके हवाले से यह भी कहा कि मैं इस्तीफा दूं। इस बावत मुझे कार्यालय से नोटिस भेजे जाने की भी तैयारी हो रही है। मेरे बीमार पड़ने से और छुट्टी पर जाने से नये लोगों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। संजीव जी से कल रात 10-15 मिनटों की बात के कुछ मुख्य बातों में से यह बातें सार हैं।
बीमार पड़ने पर कुछ दिनों की छुटि्टयां लेकर घर में आराम करने से किसी को नौकरी मिल जाती हो तो मेरे ख्याल से हम और आप सभी बीमार पड़ते रहे हैं। आपको भी कुछ समय पहले कमर में दर्द था और आपने छुट्टी की थी तो क्या आप भी कहीं नौकरी का प्रयास तो नहीं कर रहे थे! कोई पत्रकार इतना संवेदनाविहीन कैसे हो सकता है! खैर, आपने मुझसे इस्तीफे की मांग की है। मैं आपकी इस मांग को पूरा कर रहा हूं और त्याग-पत्र भेज रहा हूं।
मैंने इंडो-एशियन न्यूज सर्विस की हिन्दी सेवा में लगभग सवा तीन महीने काम किए परंतु दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मुझे इस दौरान कभी भी आपके संस्थान में काम करने का उचित माहौल महसूस नहीं हुआ। हिन्दी सेवा के कार्यकारी संपादक अरूण आनंद को अपने साथ काम करने वाले पत्रकार कर्मचारियों के साथ कभी भी मुफीद (उचित) व्यवहार करते हुए मैंने नहीं पाया। कार्यकारी संपादक का स्वभाव बहुत हद तक व्यापारिक मानसिकता से ग्रस्त है। वह अपने साथ काम करने वालों को एक ग्राहक की तरह देखते हैं और उनसे ऐसा ही वर्ताव करते हैं। उन्हें खबरों की गिनती का बहुत शौक है। आप खबरों की गिनती में विश्वास करते हैं न कि गुणवत्ता में। साक्षात्कार के समय और नियुक्ति के कुछ दिनों बाद तक आप (अरूण आनंद) बहुत ही सहिष्णु बने रहते हैं और कर्मचारियों की नब्ज टटोलते हैं। इस संस्थान की अंग्रेजी सेवा में आपके एक जूनियर साथी की भाषा में कहूं तो कार्यकारी संपादक अपने सामने अपने कर्मचारियों को समर्पित करवाने चाहते हैं। माफ कीजिए, यह सब नौकरीपेशा में एक हदतक सभी को स्वीकार्य होता है लेकिन लंबे समय तक इस गुलाम बनाने की मनोवृत्ति को ढो पाना किसी भी गैरतमंद इंसान के लिए मुिश्कल होता है। इसके बहुत से नजीर माननीय अरूण जी के सेवाकाल में देखने को मिले हैं।
आईएएनएस से मेरी जानकारी में कुछ लोग मेरी नियुक्ति के पहले भी छोड़कर जाते रहे हैं या उन्हें छोड़कर जाने को बाध्य किया जाता रहा है। मेरे इन सवा तीन महीनों के दौरान भी चार लोगों ने इनके व्यवहार के कारण नौकरी छोड़ी है। हालांकि उन्होंने नौकरी छोड़कर जाने की कई घटनाओं के बाद अपनी शैली में परिवर्तन लाया है। यह उनकी जरूरत है। उम्मीद करता हूं कि यह नई शैली उनकी आदतों में शुमार हो जाए। यह दिक्कत श्रीमान कार्यकारी संपादक के अंदर किस कारण विकसित हुआ है, यह तो कोई मनोविश्लेषक ही बता सकता है। कार्यकारी संपादक का कहना है- ‘’journalism should flow in your blood.’’ क्या पत्रकारिता कार्यकारी संपादक की धमनी और िशराओं में बहने लगे तो उनके स्वास्थ्य पर इसका विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा।
पत्रकारिता का लेना, देना केवल पैसों, नियुक्ति दे सकने का सामथ्र्य रखने, महज कुछ समर्थ लोगों से अपने संबंध बेहतर बनाकर रखने या खबरों की गिनती रखने से नहीं होता है। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पत्रकारिता की नींव रखने और उसे सींचने वाले लोगों का मन शायद इन क्षणिक महत्व रखनेवाली बातों में कभी नहीं गया था। पत्रकारिता को सींचने वाले लोगों में संवेदनाएं कूट-कूटकर भरी हुई थीं। कार्यकारी संपादक में इसका सर्वथा अभाव है। हमारे कहने से, लिखने से और संस्थान छोड़ देने से उनका हृदय परिवर्तित हो जाएगा, मैं ऐसा नहीं मानता हूं। माननीय कार्यकारी संपादक को इसके लिए बहुत मेहनत की जरूरत होगी ठीक उसी तरह जिस तरह मुझे अपनी कॉपी बेहतर से बेहतर बनाने के लिए कहा जाता रहा है। शायद इससे भी ज्यादा मेहनत की जरूरत होगी। मैं आपके व्यवहार के कारण बहुत पहले ही संस्थान छोड़ देता लेकिन मैं भागने वालों में से नहीं हूं। मैं आपसे मेेरी अपनी कॉपी के लिए अच्छे रिमार्क्स देने को मजबूर करवाना चाहता था। मेरी कॉपी के लिए आप ‘excelent copy’ कह चुके हैं। मैं अपनी चुनौतियों से पार पा गया हूं। अनुवाद विशेषकर खबरों का मेरे लिए नया काम था। नये काम में समय लगता है, सो मुझे भी लगा।
‘original copy’ आपके हिसाब से मैं बहुत अच्छी लिखता हूं। ऐसा डेस्क प्रभारियों ने भी कई मौकों पर कहा है। खैर, इसके लिए मुझे आपके प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। आपके साथ काम करते हुए मुझे दो बड़े संस्थानों ने आईएएनएस से बेहतर पगार और पद की पेशकश की थी लेकिन मैं अपनी चुनौतियों से पीछे नहीं हटना चाहता था। सो, मैंने इन प्रस्तावों को तव्वजो नहीं दी। आपने नियुक्ति के समय senior-sub editior की पेशकश की थी और बाद में जब नियुक्ति पत्र देने की बात आई तब आपने मेरा पद कम करके sub-editor कर दिया। अपनी बात से पीछे हटना आपकी फितरत है। नियुक्ति के समय 10-12 खबरों का अनुवाद तथा 8 घंटे काम करवाने की बात आपने की थी लेकिन दो हफ्तों के बाद आपने अपने काम करवाने की परिभाषा ही बदल डाली और मेरे एक सहकर्मी से कहा-``पत्रकारिता में कार्यालय आने का समय होता है लेकिन कार्यालय से जाने का कोई समय नहीं होता है।´´ मुझे लगता है कि कार्यकारी संपादक को working journalist act जरूर पढ़ लेना चाहिए।
आप बात-बात में लोगों को यह धमकी देते हैं कि यहां से नौकरी से निकाले जाने के बाद कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। यह एक किस्म का फतवा है। आपने जिन लोगों को आईएएनएस से बाहर का रास्ता दिखाया है या बाहर का रास्ता देखने को मजबूर किया है, माफ कीजिए वे सारे लोग देश के नामी-गिरामी संस्थानों में अपनी बेहतर सेवा दे रहे हैं। कुछ लोग पत्रकारिता में व्यवहारिक होकर नौकरी खोजकर संस्थान छोड़कर चले गए। मैं नौकरी और भविष्य की चिंता किए बगैर आपकी नौकरी से इस्तीफा दे रहा हूं। पत्रकारिता में कुछ साल या बहुत साल बिताने से पत्रकारिता और मानवीयता की समझ नहीं आ जाती है। जिसको पत्रकारिता और मानवीयता की समझ आनी होती है उसे कुछ समय में ही आ जाती है। शायद मैं अपनी बात आपको समझा पाया हूं। इसी उम्मीद के साथ।
आपका शुभेच्छु
स्वतंत्र मिश्र
11 मार्च 2008
सी-1/118, मुस्कान अपार्टमेंट सेक्टर-17, रोहिणी, दिल्ली-110089, मो,-09868851301
------------
(कारवां से साभार)
