पहली बात...
पत्रकार या स्टेनोग्राफर
--संजय तिवारी--
(विस्फोट ब्लाग और विस्फोट डाट काम के माडरेटर)
हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की जरूरत वहां है कितनी? या फिर निवेश करने का प्रभाव होगा या दुष्प्रभाव. हमारे बिजनेस अखबार इसे पत्रकारिता नहीं मानते. वह जो निवेश कर रहा है उससे उसे फायदा कितना होगा और समाज-पर्यावरण को कितना नुकसान इसका कोई आंकलन कभी हमारे बिजनेस पत्रकार नहीं करते. भाई कुएं में बाल्टी डालने की खबरें देते हो लेकिन उसने वहां से कितना पानी उलीचा कभी यह खबर क्यों नहीं बनाते?
इसीलिए मैं इन पत्रकारों को कंपनी पत्रकार कहता हूं. पत्रकार भी क्यों कहें? पी साईंनाथ ठीक कहते हैं कि असल में ये लोग स्टेनोग्राफर हैं. जो कंपनियों से डिक्टेशन लेते हैं. इस डिक्टेशन के बदले उन्हें तनख्वाह के अलावा कुछ गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता है.
पत्रकारिता तो शायद ही कहीं बची हो. हिन्दी टीवी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि हिन्दी लुच्चों और लफंगों की भाषा है इसलिए उनकी प्राथमिकता वही लोग हैं. बिजनेस अखबर और चैनल तो कंपनियों को रिपोर्ट करने को ही पत्रकारिता समझते हैं. लगता है फिर पश्चिम से कोई हवा आयेगी तो इन पत्रकारों की बुद्धि ठिकाने आयेगी इनकी अपनी कोई समझ तो बची नहीं है.
पत्रकारिता का एक मूलभूत सिद्धांत है कि वह खबर नहीं है जो आपके पास चलकर आती है. खबर वह है जिसके पास चलकर आप जाते हैं. और इस चलने-फिरने में भी एक बात नहीं भूलनी चाहिए आपका अंतिम लक्ष्य आम आदमी की भलाई, उसका हक-हित सुरक्षित करना है न कि कंपनियों और साम्राज्यवादी ताकतों का. लेकिन अव्वल तो पत्रकारों ने चलने-फिरने से ही तौबा कर लिया है. चलते-फिरते भी हैं तो वहीं जाते हैं जहां उन्हें ले जाया जाता है.
ज्यादा कुछ तो नहीं सिर्फ इतनी प्रार्थना करता हूं कि ऐसे स्टेनोग्राफरों से भगवान इस देश की रक्षा करें.
(साभारः http://visfot.blogspot.com/2008/04/blog-post_21.html)
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दूसरी बात...
पत्रकार फिर निशाने पर एक का अपहरण तो दूसरा जेल में
--अंबरीश कुमार--
(जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार और विरोध ब्लाग के माडरेटर)
उत्तर प्रदेश में पत्रकार फिर निशाने पर हैं। शनिवार को ही इलाहाबाद के पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा अपहृताओं के चंगुल से जन बचाकर भाग आए। उनका अपहरण पांच अप्रैल को इलाहाबाद में हुआ था। दूसरे वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान पिछले १५ दिन से जेल में हैं। ६५ साल के मेहरूद्दीन खान को अपहरण के मामले में शामिल बताया गया है। मेहरूद्दीन खान दिल्ली से निकलने वाले अखबारों में लिखते रहे हैं और शाह टाइम्स के पूर्व संपादक रहे हैं। शाह टाइम्स के संपादक शाहनवाज राणा बहुजन समाज पार्टी के विधायक हैं। दूसरी तरफ प्रेस काउंसिल ने आगामी दो मई पत्रकार समीउद्दीन नीलू के मामले में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को तलब किया हुआ है। समीउद्दीन वही पत्रकार हैं जिन्हें नौ फरवरी, 2005 को वन्य जीव तस्करी के मामले में गिरफ्तार कर लखीमपुर खीरी जिले की सीमा पर फर्जी एनकाउंटर में मारने का प्रयास किया गया था। बाद में उन्हें 20 लाख की वन्य जीव तस्करी के मामले में जेल भेज दिया गया। यह कुछ उदाहरण हैं कि किस तरह पुलिस प्रशासन और नेता फर्जी मामलों में पत्रकारों को फंसा रहे हैं। उत्तर प्रदेश वर्किग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने डा. मेहरूद्दीन की गिरफ्तारी और उनके परिवार के उत्पीड़न की तीखी निंदा की है। उन्होंने मांग की है कि डा. मेहरूद्दीन को फौरन रिहा कर दोषी अफसरों व नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जए।
इलाहाबाद में पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा के अपहरण का मामला अभी गर्माया ही हुआ था कि मुजफ्फरनगर से पत्रकार मेहरूद्दीन खान को गिरफ्तार कर जेल भेजने की जनकारी मिली। हालांकि शनिवार को ही कुशवाहा हरिद्वार में अपहृताओं के चंगुल से भाग निकले तो इलाहाबाद के पत्रकारों ने राहत की सांस ली। लेकिन मुजफ्फरनगर के पत्रकार अब मेहरूद्दीन खान को लेकर आहत हैं। मेहरूद्दीन खान को न सिर्फ बदसलूकी कर गिरफ्तार किया गया बल्कि उनके परिवार की बेटियां जहां-जहां ब्याही हैं, उनके घरों में भी पुलिस दबिश दे रही है। उनके पुत्र शाकिर को पहले ही गिरफ्तार किया ज चुका है। उनके परिवार की कई महिलाओं को पुलिस परेशान कर चुकी है। इस पूरे मामले में एक समाजवादी पार्टी सरकार में लोकदल कोटे से मंत्री रहे नेता पर अंगुली उठ रही है। डा. मेहरूद्दीन से कुछ पत्रकारों ने जेल में मुलाकात की तो उन्होंने कहा-मुङो फर्जी मामलों में फंसाकर परेशान किया ज रहा है। मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मेरे परिवार के लोगों का उत्पीड़न जरी है।
डा. मेहरूद्दीन को एक अपहरण के मामले में फंसाया गया है। उनके रिश्तेदार पर एक लड़की के अपहरण का मामला दर्ज किया गया था। उसी मामले में चार अप्रैल की रात कांधला पुलिस ने गाजियाबाद के थाना दादरी के गांव बढ़पुरा से डा. मेहरूद्दीन और उनके पुत्र शाकिर को मारपीट करते हुए उठाया। इस बीच घर की महिलाएं बीच में आईं तो उनके साथ भी बदसलूकी की गई। थाने ले जकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इस बीच क्षेत्र के एक पूर्व मंत्री पुलिस से लगातार संपर्क बनाए हुए थे। बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। पुलिस ने उनके खिलाफ अपहरण की साजिश रचने और अपहृत लड़की को पनाह देने जसे आरोप लगाए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रेम संबंधों को लेकर कई मामले उछले हैं जिनमें कभी पंचायतों ने बर्बर भूमिका निभाई तो कभी पुलिस और नेताओं ने। इस मामले में स्थानीय पुलिस और नेताओं की भूमिका संदिग्ध रही है।
समीउद्दीन नीलू के बाद यह दूसरा मामला है जिसमें पत्रकार को फर्जी मामलों में फंसाकर जेल भेज गया है। नीलू के मामले में तो पुलिस अधिकारी ने साफ कह दिया था-जो हम लिख देंगे, जिला की अदालत उसी को सच मानेगी। पुलिस ने तब 20 लाख रूपए मूल्य की वन्य जीवों की खालें आदि की बरामदगी भी दिखा दी थी। बाद में पुलिस से यह मामला ले लिया गया और सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में सारे मामले को फर्जी करार दिया। वर्किग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने कहा-हम लोगों ने कई साल पहले पत्रकार बंधु की स्थापना की थी ताकि पत्रकारों से जुड़े मामलों की वहां जंच-पड़ताल हो सके पर सरकार ने कोई पहल नहीं की। हम चाहते हैं कि किसी भी पत्रकार की गिरफ्तारी से पहले प्रदेश के आला अफसरों से इजजत ली जए ताकि जिला स्तर पर इस तरह की घटनाएं न हों। इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जनर्लिस्ट के अध्यक्ष के विक्रमराव रायपुर जकर छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार को नक्सली बताकर जेल भेजने का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में ६५ साल के बुजुर्ग पत्रकार को एक लड़की के अपहरण के मामले में जेल में डालने पर मीडिया के वरिष्ठ लोग हैरान हैं।
(साभारः http://virodh.blogspot.com/2008/04/blog-post_20.html)
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तीसरी बात...
संपादकों की औकात, मालिकान सोचते हैं कि संपादक नाम का प्राणी तो बोझ है
--खुशवंत सिंह--
(जाने माने स्तंभकार और लेखक)
बात बहुत पुरानी नहीं है, जब हमारे यहां अख़बार इस लिए जाने जाते थे कि उनके संपादकों का कद कितना बड़ा है। ब्रिटिश राज के वक्त तो कई सरकारी अख़बारों, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया और स्टेट्समैन के संपादकों को नाइटहुड की उपाधि तक से सम्मानित किया गया। आजादी के बाद भी अख़बारों के एडिटर को समाज में काफ़ी सम्मान प्राप्त था। फ्रेंक मोरेस, चलपति राव, कस्तूरी रंगन अयंगर, प्रेम भाटिया आदि नामों से पाठक भली भांति परिचित थे। अस्सी के दशक में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक रहे दिलिप पदगांवकर का तो यहाँ तक कहना था कि देश में प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम उन्हीं के ज़िम्मे है। सरकार के ग़लत नीतियों की सकारात्मक आलोचना विपक्ष से नहीं बल्कि इन्ही काबिल संपादकों के बदौलत होती थी।
लेकिन टेलीविजन के आते ही हालात बदलने लगे। जो चीजें टीवी के परदे पर दिखने लगी, उसे लोग पढ़ने की जहमत नहीं उठाना चाहते थे। संपादकीय पढ़ने वालों की तादाद घटती गई। अख़बारों के मालिकान यह सोचने लगे कि संपादक नाम का प्राणी तो बोझ है और उनके बिज़नेश मैनेज़र ही टेलीविजन की चुनौतियों का बेहतर ढ़ंग से सामना कर सकते हैं। जरूरत थी तो सिर्फ़ छड़हरी बदन वाली मॉडलों, गॉशिप, विंटेज वाईन और लज़ीज़ व्यंजनों से अख़बारी पन्नों को भर देने की। और इस फार्मूला को चार फ से परिभाषित किया गया - फिल्म, फैशन, फुड और फक द एडिटर (पता नहीं हिंदी में इसका मतलब क्या हो सकता है!)। अपने जमाने के कई मशहूर कलमकार (संपादक) चौथे फ यानि फक द एडिटर के शिकार हो गए। इनमें से कुछ के नाम काबिल-ए-गौर है - फ्रेंक मोरेस (द नेशनल स्टैंडर्ड जो बाद में इंडियन एक्सप्रेस बना), गिरिलाल जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया), बी जी वर्गिज़ ( मैग्सेसे पुरस्कार विजेता - टाइम्स ऑफ इंडिया), अरुण शौरी (इंडियन एक्सप्रेस), विनोद मेहता (वर्तमान संपादक ऑउटलुक), इंदर मलहोत्रा (टाइम्स ऑफ इंडिया), प्रेम शंकर झा (हिंदुस्तान टाईम्स)। आज अगर आप पूछें कि टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाईम्स या फिर टेलिग्राफ के संपादक कौन हैं, दस में से नौ लोग शायद न बता पाएं। दिलिप पदगांवकर.....ये कौन है?
दरअसल,भारतीय पत्रकारिता की यह विडंबना है कि यहाँ मालिकान संपादक से ज्यादा अहमियत रखते हैं। पैसा, प्रतिभा पर भारी पड़ती है। पैसे के इस खेल में सबसे ताजा उदाहरण एम जे अकबर का दुर्भाग्यापुर्ण तरीके से एशियन ऐज़ से निकाला जाना है। अकबर, शायद जुझारू पत्रकारीय विरादरी के सबसे काबिल सदस्य हैं। उन्होंने कलकत्ता से निकलने वाले आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप के सहयोग से संडे और टेलिग्राफ जैसी नामी अख़बार निकाला था। वे लोक सभा के लिए भी चुने गए और तक़रीबन आधे दर्जन किताबों के लेखक भी रहे हैं। पंद्रह साल पहले अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने द एशियन एज का प्रकाशन शुरु किया था। यह एक कठिन कार्य था और अकबर ने इसे बख़ूबी से अंजाम दिया। एशियन एज़ भारत के लगभग हर मेट्रो से साथ ही लंदन से भी छपने लगा। इस अख़बार में नाम मात्र का विज्ञापन होता था लेकिन पठनीय सामग्री काफी मात्रा में थी-जो नामी ब्रिटिश और अमरीकन अखबारों से भी ली जाती थी।कुल मिलाकर यह एक मुकम्मल अखबार था।इसके आलावा, इसमें ऐसे भी लेख छपते थे जो हुक्मरानों को नागवार गुजरते थे।और शायद यहीं वजह थी जिसने अखबार में अकबर के व्यवसायिक पार्टनर को नाराज कर दिया, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक आकांक्षा को ठेस पहुंच रही थी।बस फिर क्या था-बिना किसी चेतावनी के ही अकबर को एशियन एज के मुख्य संपादक के पद से हटा दिया गया ।पैसे ने एक बार फिर से अपना नग्न और घिनौना चेहरा सामने दिखा दिया। यह कहना अभी मुश्किल है कि बदले में अब अकबर उस आदमी के साथ क्या करेंगे जिन्होने उनके और पत्रकारिता दोनों के साथ बड़े ही अपमानजनक व्यवहार किया। लेकिन अकबर को यह वाकया लंबे समय तक जरुर सालता रहेगा। वो अभी सिर्फ सत्तावन साल के हैं और न तो किसी घटना को भूलते हैं न ही अपने विरोधियों को माफ करते हैं।
जब मैं इलिस्ट्रेटेड वीकली का संपादन कर रहा था तब अकबर उस छोटी सी टीम का हिस्सा थे जिसकी मदद से इलिस्ट्रेटेड वीकली का प्रसार 6,000 से बढ़कर 400,000 तक जा पहुंचा था। यह कितनी बड़ी बिडंवना है कि मुझे भी उसी तरीके से उस पत्रिका से निकाल दिया गया जिस तरीके से अकबर को इस साल एशियन एज से। तब तक टाइम्स ऑफ इंडिया समेत बेनेट कोलमेन के तमाम प्रकाशनों का मालिकाना हक सरकार द्वारा जैन परिवार को सौंपा जा चुका था। ज्योंही जैन परिवार ने कमान अपने हाथ में ली, उन्होने मेरे काम में अड़ंगा डालना शुरु कर दिया। मेरे करार को खत्म कर दिया गया और मेरे उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी गई। मुझे एक सप्ताह के भीतर इलिस्ट्रेटेड वीकली छोड़ देना था। मैंने वीकली के लिए भारी मन से भावुक होकर अपना आखिरी लेख लिखा और पत्रिका के भविष्य की सुखद कामना की। लेकिन वो कभी नहीं छपा। जब मैं सुबह अपने ऑफिस में आया तो मुझे एक चिट्ठी थमा दी गई और तत्काल चले जाने को कहा गया। मैंने अपना छाता लिया और घर वापस आ गया। मुझे बड़े ही घटिया तरीके से ज़लील किया गया। यह अभी भी रह-रह कर मुझे परेशान करता है। जैन परिवार द्वारा किया गया वह अपमान मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। आज भी मेरे सम्मान में जब कोई समारोह होता है-भले ही उसकी अध्यक्षता अमिताभ बच्चन, महारानी गायत्री देवी या खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही क्यों न करें-उसकी रिपोर्ट तो टाइम्स ऑफ इंडिया में छपती है लेकिन उसमें न तो मेरा फोटो छपता है न ही नाम होता है।और यह उदाहरण साबित करता है कि पैसा और सत्ता के मद में चूर छोटे दिमाग बाले आदमी कैसे हो सकते हैं।
(साभारः http://kissago.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html)
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(उपरोक्त तीनों आलेख दूसरे ब्लागों से लिए गए हैं। उम्मीद है, उपरोक्त ब्लागों के माडरेटर इस चोरी के लिए क्षमा करेंगे। मकसद सिर्फ इतना है कि पत्रकार समुदाय से जुड़े उपरोक्त आलेख देश के कोने कोने मौजूद पत्रकारों तक भी पहुंच जाएं....जय भड़ास, यशवंत)
21.4.08
वर्तमान पत्रकारिता और पत्रकारः ऐसे वैसे कैसे कैसे रंग रूप? ........उधार के कुछ चिल्लर लेख-आलेख
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: चोरी के माल, दशा, दिशा, पत्रकार, पत्रकारिता
20.1.08
डाक्टर साहब, भड़ास वाकई क्रांति का मंच नहीं है
अपने बेहद सक्रिय भड़ासी साथी हैं डा. रुपेश श्रीवास्तव जी। क्रांतिकारी, बेबाक और बेलौस। बिलकुल अपन लोग माफिक हैं। धांय धांय कमेंटियाते हैं। बराबर पोस्टें पढ़ते रहते हैं। जहां अच्छा लगा, तो कमेंट में अच्छा लिख दिया, जहां बुरा लगा तो कमेंट में बुरा लिख दिया। मैं इन्हें बेहद पसंद करता हूं, इसलिए कि वे वाकई मन से भड़ासी हैं। जो कुछ है उगल दो, लल्लो-चप्पो नहीं करना। यह अंदाज़ ही तो भड़ास का है।
पर डाक्टर साहब ने भड़ास से बहुत ज्यादा उम्मीदें पाल ली हैं। उम्मीदें उन्हीं से पाली जाती हैं जो उस लायक होते हैं, सो डाक्टर साहब का उम्मीद पालना गलत नहीं है पर मैं चाहता हूं कि कुछ सच्चाइयों का बयान डाक्टर साहब के सामने कर दूं, भड़ास के पैदा होने, उसके मरने और फिर पैदा होकर छा जाने के बारे में। और थोड़ी सी बातें इसके भविष्य की दशा-दिशा के बारे में भई।
लेकिन उससे पहले मैं डा. रुपेश जी के कुछ कमेंट यहां पढ़ाना चाहूंगा, जिससे भड़ास के बारे में उनकी चाहत, उनकी उम्मीद, उनकी त्वरा का पता चलता है..
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मैंने एक पोस्ट लिखी, जल में रहकर मगर से बैर, उसमें मैंने कहा था कि चूंकि हम सब हिंदी मीडियाकर्मी किसी न किसी मीडिया हाउस में काम करते हैं इसलिए हमें भड़ास पर लिखते वक्त मीडिया हाउसों को सीधे निशाने पर लेने से बचना चाहिए ताकि किसी साथी की रोजी रोटी न प्रभावित हो, जो वहां काम कर रहा है और भड़ास से जुड़ा हुआ है। दूसरा, अखबारों में दिखने वाली छोटी मोटी गलतियों को भी नजरअंदाज करना चाहिए, उसे भड़ास पर नहीं डालना चाहिए ताकि जिस साथी से यह गलती हुई हो उसके लिए नौकरी से हाथ धोने जैसी स्थिति न आ जाए क्योंकि गलतियां इंसान ही करता है, कंप्यूटर नहीं। और अगर आप काम करेंगे तो गलतियां होंगी ही, गलतियां सिर्फ उनसे नहीं होती, जा काम नहीं करते। तीसरी बात लिखी थी कि भड़ास क्रांति का मंच नहीं है, यह सिर्फ भड़ास निकालने के लिए है ताकि हम दिल और दिमाग से स्वस्थ, कुंठामुक्त रहें। इस पर तीन प्रतिक्रियाएं आईं, दो मेरी बातों के पक्ष में, तीसरी डाक्टर साहब की जिन्हें लगता है कि क्रांति का मंच बनना चाहिए भड़ास को। तीनों टिप्पणियां पढ़िए..
Gulshan khatter said...
यशवन्त जी आप ने सही सोचा इन्सान गलतीया करता रहता हे! ओर इस का यह भी मतलब नही की किसी की थोडी सी गलती को बडाचडा कर उस को नीचा दिखाया जाये! एसा कोई भी मोका ना दे की कोई भी एरागेरा भडास मच पर उगली करे ओर कहे की अपनी टीरपी के लिये भडास एसा लिखता हे
Friday, January 18, 2008 9:45:00 PM
Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,मैं हठधर्मी कदापि नहीं हूं किन्तु सच तो यह है कि पत्रकारिता पूंजीवाद के प्रभाव में जिस प्रकार सकपकायी सी दिखती है क्या आप उसे नकार सकते हैं ? जब २३ अगस्त १९२३ को पहली बार मेरे एक पत्रकार पूर्वज स्व.मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव ,सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला",बाबू शिवपूजन सहाय और प्रेस मालिक महादेव प्रसाद जी ने एक पत्र निकाला जिसका नाम "मतवाला" था तब भी यही परिस्थितियां थीं इसीलिये मुंशी जी ’भूतनाथ तेल’ की कंपनी मे मैनेजरी करते थे ,वे जानते थे कि कब खाने के लाले पड़ जायेंगे नहीं पता । आपकी तबियत कुछ नरम है क्या जो ऐसा लिख रहे हैं ,ऐसा मत करिये वरना भड़ास का नाम फटास हो जाएगा। जिसमें दम होगा वह जुड़ेगा वरना निकल लेगा और क्रांति क्यों न होगी ? जो अपनी कमियां नहीं देख सकते उनकी भड़ास तो भौं-भौं ही होगी ।
Friday, January 18, 2008 9:54:00 PM
laa, hamau aa gaylee... said...
yashwant sir, jai badhaas. main aapse sahmat hoon.akhbaar to galtiyoun ka saahitya hi kaha jata hai, aur galti to insaan se hi hoti hai. jo koi mahanubhav ne bhadhaas per galti bataakar galti ki hai kya unke sansthaan me galti nahi hoti. mera anurodh hai bhadhaas per sirf bhadaas nikale galti nahi.
Sunday, January 20, 2008 2:07:00 AM
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मैंने एक पोस्ट लिखी हां, अगर पत्रकारिता करने का यही अंजाम है तो मैं मरना चाहता हूं-शीलेश त्रिपाठी, इस पर डाक्टर साहब बेहद उत्साहित नजर आये और उन्होंने कुछ यूं अपनी बात रखी...
Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,आज फ़िर आपकी तबियत ठीक हो गयी है जो आपने शीलेश की पीड़ा को बताना शुरू किया वरना दो दिन तो आप बीमार हो गये थे और पानी में रह कर मगर से बैर ना करने की सलाह देने लगे थे । भड़ास के पीछे आपकी क्रांतिधर्मी सोच ही है जो हमारे जैसे लोगों को भड़ास से जोड़े हुए है वरना ये कोई उगालदान नहीं है कि आया और उल्टी करके चल दिया । हम सब राष्ट्र के प्रति रचनात्मक सोच ही तो रखते हैं और अगर यह किसी को बुरा लगेगा तो उसकी किसे परवाह है फ़ाकाकशी में जी लेंगे पर ऐसे लोगों के आगे सिर न झुकाएंगे । जस्टिस सिंह को भी मत भूलिए वह मामला तो न्यायपालिका का है इस लिहाज से अधिक संवेदनशील है ।
जय भड़ास...........
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इससे पहले एक पोस्ट लिखी थी, शीलेश की ज़िंदगी के लिए हम सब एकजुट हैं, इस पर डाक्टर साहब ने कुछ यूं खुशी जाहिर की.....
Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,आपका गुस्सा ही पत्रकारिता की ऊर्जा है । ठीक ऐसी ही घटना देश की न्याय प्रणाली से जूझते हुए जस्टिस आनंद सिंह की है । आपके पत्रकारिता के तेवर आद्य पत्रकार स्व. पराड़कर जी की याद दिलाते हैं । मैं हर हाल में आपके संग हूं ,शीलेश का मोबाइल नंबर भड़ास पर दे दीजिएगा ताकि सब मिल कर इन हरामियों की औकात उन्हें याद दिला सकें ।
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मेरी एक अन्य पोस्ट, टीवी न्यूज चैनल की पायल, अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद और लखनऊ के पत्रकार शीलेश, इस पोस्ट पर डा. रुपेश भाई ने प्रोत्साहन देने वाली ये टिप्पणी दी...
Dr.Rupesh Shrivastava said...
आदरणीय दादा,आपको किन शब्दों में धन्यवाद करूं समझ नही आ रहा ;आपने जस्टिस आनंद सिंह की फोन करके खबर ली तो अब लग रहा है कि आशा की किरण नहीं बल्कि साक्षात तेजस्वी मार्तन्ड भगवान मार्ग दिखाने प्रकाश लेकर आ गए हैं । न्याय पालिका , कार्य पालिका और विधायिका को अब पत्रकारिता सही रास्ता दिखाएगी और न चलने पर कान खींच कर बाध्य भी करेगी । मैं अनुग्रहीत हूं आपके इस अनौपचारिक प्रेम से , प्रणाम स्वीकारिए .....................
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मैं यह साफ कर दूं कि तारीफ मुझे भी अच्छी लगती है, और खासकर कोई आदमी जिनुइन तारीफ करे तो और भी ज्यादा। डाक्टर साहब के शब्दों में सहजता, सरलता और सच्चाई है। उनके प्रोत्साहन का मैं आभारी हूं। पर यहां मैं इन टिप्पणियों को इसलिए उद्धृत कर रहा हूं ताकि इससे पता चल सके कि डाक्टर साहब समेत कई सारे भड़ासी साथी भड़ास से क्रांति के मंच के रूप में जो उम्मीद लगाये हैं, उस पर बहस की जा सके।
उपरोक्त टिप्पणियों पर अब मेरी टिप्पणी....
डाक्टर रुपेश जी, आपकी बातों का मैं सम्मान करता हूं और कद्र करता हूं। लेकिन मुझे लगता है कि इस दौर में जब बाजार चीजें निर्धारित करने की भूमिका में है, और हर प्रोडक्ट की तरह मीडिया हाउस भी ज्यादा लाभ कमाने के लिए प्रसार और टीआरपी पर जोर दे रहे हैं, उनसे किसी सामाजिक बदलाव की कल्पना करना बेमानी है। इसी तरह जब प्रोडक्ट और मीडया हाउस का लक्ष्य तय है तो वहां जो साथी काम करते हैं, उनकी भी दिशा वही होगी। उन्हें अपने मीडिया हाउस के लक्ष्य के साथ खुद को एकाकार करके काम करना होता है, सो वो पत्रकारिता मिशन के तहत करने की मंशा की बजाय एक नौकरी करने और उसमें बेहतर परफारमेंस देकर ज्यादा पैसा और बड़ा पद पाने की इच्छा रखते हैं। और ये इच्छा रखना पाप नहीं क्योंकि हम सब आम लोगों की तरह ही हैं, कोई देवता या भगवान या क्रांतिकारी विजन से लक्ष्य हार्डकोर कार्यकर्ता नहीं। हर मां बाप की तरह हमारे मां पिता ने भी सपना देखा है कि हम बड़े पद पर जाएं, ज्यादा पैसा कमाएं, बच्चों की अच्छी शिक्षा दिलाएं, सो अगर इसके लिए हम नौकरी करते रहना चाहते हैं, और नौकरी करते रहने के लिए जो फंडे अपनाये जाते हैं, उसे अपनाते हैं, तो गलत क्या है।
तीसरी बात, आजादी के दिनों में जिन पत्रकारों ने अपने व्यक्तित्व और कलम के जरिये आजादी व सच्चाई के पक्ष में चेतना पैदा की, अखबारों को क्रांति का हथियार बनाया, वो लोग उस दौर की डिमांड के तहत कर रहे थे। वे दरअसल सच्चे अर्थों में आजादी के सिपाही थे, क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपना हथियार कलम को बनाया। और भी क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपना हथियार बंदूक को बनाया, और भी क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपना हथियार अहिंसा और आंदोलन को बनाया। ऐसे में उन दिनों के मीडिया हाउस, जो कि हाउस बने भी नहीं थे, शुरुआत भर थे, का लक्ष्य पैसा कमाना नहीं बल्कि आजादी दिलाना था। आजादी के बाद इन अखबारों, घरानों ने अपने लोकप्रिय व प्रभावकारी पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करते हुए खुद को काफी बड़ा संस्थान बना लिया और बाद में देश में बदलाव की बयार में बहते हुए खुद को धीर धीरे बाजार के अनुकूल बदलने लगे। अब जो मीडिया हाउस हैं, उनका लक्ष्य प्रसार और टीआरपी में नंबर वन बनना है ताकि इसके जरिये वे रेवेन्यू और बिजनेस में भी नंबर वन बन सकें।
मैंने भड़ास पर ही पिछले दिनों एक लेख लिखा था, आज के दौर में मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, इस लेख को क्लिक कर जरूर पढ़ियेगा, आपको यह लगेगा कि दरअसल आज की मीडिया से हम लोगों ने जो अपेक्षाएं पाली हैं, वो वास्तविकता की धरातल पर नहीं बल्कि भावनात्मक जरूरत के लिहाज से है, और यह गलत भी नहीं है। पर दूसरे पक्ष की हकीकत को भी समझना चाहिए वरना हम लोग दीवार में सिर टकराते रहेंगे।
एक बात और, भड़ास की जो शुरुआत की गई थी, वो इसकी पंचलाइन से जाहिर है कि गले में अटकी बात उगलने के लिए ही की गई थी ताकि मन हल्का हो सके। और वो दिशा आज भी प्रमुख दिशा है। चूंकि भड़ास प्रमुख तौर पर हिंदीमीडियाकर्मियों
का मंच है तो जाहिर सी बात है कि हम लोगों कि ज्यादातर भड़ास मीडिया और सिस्टम और मानवता से जुड़ी होती है।
तीसरी बात, हम लोग जो कुछ पहल कर रहे हैं, वो चाहे न्यायाधीश अंगद सिंह का मामला हो या पत्रकार शीलेश त्रिपाठी का, इसके पीछे सिर्फ इतना भर है कि चूंकि हम लोग एक बेहतर मनुष्य भी बने रहना चाहते हैं, संवेदनशील प्राणी हैं, मीडिया से जुड़े हैं सो इतना फर्ज अगर नौकरी करते निभा लिया जाय जिससे किसी परेशान व्यक्ति की मदद हो जाये तो इसे करने में कोई दिक्कत नहीं है। हम भड़ास मंच के जरिये ऐसे सामाजिक और मानवीय काम करते रहेंगे लेकिन इससे यह अंदाजा लगाना कि भड़ास एक क्रांतिकारी मंच या संगठन है, गलत होगा। यह उम्मीद करना कि भविष्य में पूंजीवाद, मीडिया हाउसेज, सत्ता आदि की खामियों को उजागर करते हुए उनसे निपटने की मुहिम शुरू की जायेगी, सरासर नाउम्मीद करने वाला है। चूंकि हम इस सिस्टम के पार्ट भी हैं, उनके लिए उनके लक्ष्य के हिसाब से काम भी करते हैं सो इनके खिलाफ जाने का सवाल ही नहीं उठता। दिलीप मंडल जी के शब्दों में कहें तो लाला के पैसे से क्रांति नहीं होती। क्रांति के लिए आपको अपने संसाधन बनाने पड़ते हैं, जनता के बीच में जाना पड़ता है, चौबीसों घंटे समाज और देश के लिए निकालना पड़ता है।
भड़ास क्रांति का मंच नहीं बनेगा तो ऐसा भी नहीं कि इस देश में क्रांति नहीं होगी। पारंपरिक मीडिया को आइना दिखाने के लिए और उसकी कमियों से मुक्त होकर न्यू मीडिया भी आ गया है जिसमें ब्लागिंग भी एक पार्ट है। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी ढेर सारी क्रांतिकारी पार्टियां, लोग, एनजीओ, संगठन आदि जनता के बीच सक्रिय हैं जो उन्हें बदलाव के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मतलब, क्रांति करनी है तो फिर क्रांति के वास्तविक मंचों की शिनाख्त की जानी चाहिए। अवास्तविक मंच से उम्मीद करने से ऊर्जा और समय ही नष्ट होगा। मैं निजी तौर पर उपरोक्त क्रांतिकारी मंचों, संगठनों, पार्टियों, न्यू मीडिया प्लेटफार्मों का कभी कम तो कभी ज्यादा, कभी सक्रिय तो कभी निष्क्रिय समर्थन देता रहता हूं। और यह कार्य ढेर सारे मेरे आप जैसे लोग कर रहे हैं।
भड़ास को उगालदान मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, भड़ास को फंटास मानने या संडास मानने में भी कोई दिक्कत नहीं, भड़ास को बकवास मानने में भी मुझे कोई दिक्कत नहीं। हम भड़ासी औघड़ लोग हैं, सूफी लोग हैं, बिंदास लोग हैं जो अपनी आलोचनाओं को अपना आभूषण मानते हैं। क्योंकि जो साहस कहकर सच बोलता है उसे हमेशा से तमाम तरह की उपाधियों से विभूषित किया जाता है। कहीं भी कुछ उगलेंगे तो दूसरों को अरुचिकर लगेगा ही और वे अपनी प्रतिक्रिया किसी न किसी रूप में व्यक्त करेंगे।
तो साथी रुपेश जी, ये जो बहस है, वो हमारे आपके बीच की नहीं बल्कि एक ट्रेंड पर बहस है जिसे एक तरफ आप तो दूसरी तरफ मैं प्रकट कर रहा हूं। आपके साथ ढेर सारे साथी आप जैसे विचार वाले होंगे और मेरे साथ ढेर सारे साथी मेरे विचार वाले होंगे। और इसका मतलब यह भी नहीं होता कि अगर मेरे साथ ज्यादा साथी हुए तो मैं जीता हुआ मानूं या आपके साथ ढेर सारे साथी हों तो आप जीता हुआ मानें।
भड़ास की खासियत यही है कि यहां शंकर जी की बारात है। मुंडे मुंडे मर्तिभिन्ना। हर विचारधारा, संपद्राय, पेशे, उम्र, सोच के लोग यहां हैं, इसलिए किसी पर किसी को अपनी सोच थोपनी नहीं चाहिए। मैं भी अपनी सोच नहीं थोप रहा। मैं केवल भड़ास की हकीकत को बयान करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि हम सभी पौने दो सौ भड़ासियों का भड़ास को लेकर विजन क्लियर रहे।
भड़ास क्या है, इस बारे में भड़ास में ही बाईं तरह के हिस्से में, भड़ास क्या है शीर्षक से ठीकठाक साइज में इंट्रोडक्शन लिखा है, उसका एक अंश यहां दे रहा हूं, इसमें भड़ास के मकसद का साफ साफ व्याख्यायित किया गया है। यह एक तरह से भड़ास के दशा-दिशा के लिए बेसिक गाइडलाइन की तरह है---
हम सहज, सरल और बिंदास लोग हैं जो जिंदगी को पूरी गंभीरता के साथ-साथ पूरी सहजता व मस्ती के साथ जीते हैं। हर तरह की वैचारिक, भाषाई व जातीय-धार्मिक भेदभावों को भुलाकर हम सब सिर्फ हिंदीवाले हैं, दिलवाले हैं और हमेशा हिंदी का झंडा ऊंचा करेंगे। ज़िंदगी के किसी मोड़ पर या किसी क्षण में भड़ास आपके काम आ जाए, आपका मनोबल बढ़ाए, आपके एहसास को सब तक पहुंचा पाए, यही इसका मकसद है।
डाक्टर साहब, आपसे भले नहीं मिला हूं पर दूर से ही, आपके विचार व तेज देखकर मैं आपका प्रशंसक बन गया हूं, आप जैसे लोग अगर इस देश में हैं तो हम जैसे लोग जरूर अच्छे काम के लिए प्रेरित होते रहेंगे। उम्मीद है कि मेरे और आपके बहाने जो बातें हुई हैं उससे ढेर सारे लोग इस बहस को आगे बढ़ाने के लिए सोचेंगे और अपनी सोच से हमें आपको अवगत करायेंगे।
जय भड़ास
यशवंत
