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2.6.09

राहुल, आप जैसे पत्रकारों से ही उम्मीद है....

क्या आप लोगों ने युवा पत्रकार राहुल का भड़ास ब्लाग पर लिखा हुआ पढ़ा? नहीं पढ़ा तो पढ़िए और राहुल को जरूर शाबासी दीजिए, इस सोच और साहस के लिए।
क्लिक करें- अगर नोट एक हजार के होते तो....

शुभकामनाओं के साथ
यशवंत

24.6.08

अनुजा का ब्लागः जिस स्त्री-विमर्श शब्द को आदि-अंत माना गया है, मैं उसे नहीं मानती

मत-विमत नामक ब्लाग अनुजा का है। इस ब्लाग को भड़ास के कोने में जोड़ने के लिए अनुजा ने मेल भेजा था। इन दिनों जो व्यस्तताएं हैं उसमें दूसरे ब्लागों पर क्या चल रहा है, क्या लिखा जा रहा है....इसे देखने जानने की फुर्सत नहीं मिलती लेकिन उन ब्लागों को एक नजर जरूर देखता हूं जिन्हें भड़ास से जोड़ने के लिए अनुरोध किया जाता है। इसी क्रम में अनुजा के ब्लाग पर पहुंचा तो वहां ज्यादा पोस्टें तो नहीं दिखीं पर जो भी थीं वो गज़ब की ओरीजनल अंदाज में लिखी गईं थीं। किसी पूर्वाग्रह और दुराग्रह से मुक्त होकर, वही कुछ लिखा है अनुजा ने जिसे उन्होंने सच माना है, जिसे उन्होंने समझा-बूझा और गुना है। आप भी मत-विमत पर जाकर पढ़िए। एक पोस्ट चोरी करके यहां प्रकाशित कर रहा हूं। सिर्फ इसी पोस्ट को पढ़ लें तो आपको काफी कुछ जानने-समझने को मिल जाएगा।

-यशवंत

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खोखला है यह स्त्री विमर्श
--अनुजा--
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अधिकांश लोग यह कहते हैं कि 'मैं स्त्री-विमर्श को समझ नहीं पाई हूं। हमेशा स्त्री-विमर्श को देह से जोड़कर उसे अश्लील बना देती हूं।'

एक महिला-ब्लॉगर ने मुझको सुझाया कि 'मैं स्त्री की सीमाओं में रहकर ही अपनी बात को कहा-लिखा करूं। यूं खुलकर स्त्री की देह पर बात करना या लिखना हमारी सभ्यता-संस्कृति-परंपरा के खिलाफ है।'

मैं हर उस क्रिया-प्रतिक्रिया का स्वागत करती हूं जो मेरे लेखन या विचार की सहमति में आए या असहमति में। असहमतियां मेरे लेखन-विचार को ज्यादा 'मजबूत' बनाती हैं क्योंकि उनमें तर्क-वितर्क की संभावनाएं अधिक होती हैं।

खैर, जिन्हें ऐसा महसूस होता है कि मैं स्त्री-विमर्श को समझने में 'कमजोर' रही हूं या स्त्री-देह पर बात अधिक करती हूं तो उनसे इतना ही कहूंगी मैं 'बंधनों में रहकर' या 'लकीर का फकीर' बने रहना नहीं चाहती। मुद्दतों से जिस शब्द स्त्री-विमर्श को आदि-अंत मानकर स्वीकार लिया गया है मैं उसे नहीं मानती। न ही इस शब्द के प्रति मेरी कोई व्यक्तिगत या लेखिकीय सहानुभूति है।

पश्चिम से उधार लिए गए इस शब्द (स्त्री-विमर्श) पर हम सदियों से बहस करते चले आ रहे हैं मगर नतीजा 'शून्य' ही रहा है। इसके शून्य रहने का कारण भी है क्योंकि हमने स्त्री-विमर्श को 'देह से आगे' और 'देह से बाहर' जाने ही नहीं दिया। स्त्री-विमर्श या देह-विमर्श से आगे भी कोई स्त्री या उसका वजूद होता है हमने कभी जानने या समझने की कोशिश ही नहीं की। करते भी क्यों और कैसे? क्योंकि हमारे बुद्धिजीवि वर्ग ने स्त्री-विमर्श को अपनी 'जोरू' बनाकर जो रख छोड़ा है।

उन्हें जब भी स्त्री-विमर्श पर बात या बहस करनी होती है पहले अपनी जोरू को चाट-पकौड़ी खिलाकर उसे चटपटी-मसालेदार बनाते हैं फिर उसकी 'देह की चाट' से अपने कथित विमर्श को शांत करते हैं। उन्हें स्त्री-विमर्श नहीं केवल स्त्री की गर्दन और कमर से नीचे का लज़ीज स्वाद चाहिए ताकि उसके दमपर स्त्री-विमर्श किया जा सके। स्त्री उनके लिए देह थी, देह है और देह ही रहेगी।

एक बात और। कुछ 'पीड़ित लेखिकाएं' कह रही हैं कि 'स्त्री-विमर्श की ताकत के सहारे अब स्त्रियां खुल रही हैं। अपनी देह के मायने समझने लगी हैं।'

वाह! क्या तर्क रखा है पीड़ित लेखिकाओं ने। स्त्री-विमर्श में अगर ताकत होती तो आज 21वीं सदी में भी स्त्री की देह और अधिकार का फैसला पुरुष नहीं स्त्री ही कर रही होती। विवाह-संस्था तब पुरुषों की नहीं स्त्रियों की गुलाम होती। शादी की पहली रात मर्द के मर्द होने का सर्टिफिकेट मर्द नहीं स्त्री उसे देती। अगर तुमने स्त्री को देह के मायने समझाए होते तो आज मर्द का स्त्री की देह पर नहीं बल्कि स्त्री का अपनी देह के साथ मर्द की देह पर भी एकाधिकार होता।

स्त्री-विमर्श की पैरवी कर रहीं पीड़ित लेखिकाओं से मेरा कहना है कि एक बार वो अपने 'खोखले विमर्श' से बाहर आकर उस स्त्री को देखें, उसके संघर्ष, उसके त्याग को समझें जो दिनभर यहां-वहां मजदूरी कर मुश्किल से 15-20 रुपए कमा पाती है और दिनभर मजदूरी के बाद घर लौटकर घर में मजदूरी करती है तब उसके पास जाकर उससे पूछें कि तुम स्त्री-विमर्श के बारे में कितना और कहां तक जानती हो? अरे, 'ठंडे कमरों' में बैठकर 'गर्म स्त्री-विमर्श' करने से न स्त्री देह से मुक्त हो पाएगी न अपनी गुलामी से।

खोखले ढकोसले गढ लेने भर से कभी कोई विमर्श सार्थक नहीं हो सकता इसलिए मैं इस कथित स्त्री-विमर्श को सिरे से नकारती हूं, अब आप जो समझें।

अनुजा के ब्लाग मत-विमत से साभार

15.6.08

40 पार यानी एक्सपायर (उन तमाम लोगों के लिए जो सोचते समझते हैं, लेकिन काम नहीं करना चाहते)


पत्रकार की कोई उम्र नहीं होती, लेकिन आजकल के भागमभाग के दौर में उसकी भी एक कैटेगरी निर्धारित हो गई है। चाहे मालिक हो या संपादक वह युवाओं को पसंद करता है। पत्रकारिता में 40 पार होने के बाद पत्रकार एक्सपायर माने जाने लगे हैं। लोगों का मानना है कि इस लाइन में जोश और जज्बे की जरूरत होती है, जोकि 40 पार होने पर संभव नहीं है। युवाओं की बात की जाए तो उन्हें भी दो कैटेगरी में रखा जा सकता है। एक सीखने का वक्त और दूसरा सिखाने का। जाब लगने के बाद काम करने और सीखने का मौका मिलता है। इस एज में युवा पूरे दमखम के साथ काम करते हैं। और इसी जोश और जज्बे की वजह से वे आगे बढ़ते रहते हैं। आजकल उन्हें खुलकर खेलने का भी मौका मिलता है। 30 साल की उम तक वे पत्रकारिता की अधिकांश सीढ़ियां चढ़ चुके होते हैं। इसके बाद वे एक स्थायी पद पर नियुक्त हो जाते हैं। हम बात कर रहे थे एक्सपायर यानी 40 पार लोगों की, जोकि जानकार तो बहुत होते हैं, लेकिन वे अपने पुराने सोच में परिवर्तन नहीं कर पाते हैं। जिस वजह से वे मात खा जाते हैं और जो अपने सोच में परिवर्तन करते रहते हैं, वे आगे चलकर संपादक बन जाते हैं। हालांकि इस तरह की खबरों को एक्सपायर लोग सिर्फ अफवाह करार देते हैं।

12.3.08

हिंदी के ये कनफ्यूज बौद्धिक ब्लागर कब सुधरेंगे??

जान लीजिए, ट्रेंड सेट करने का आपका जमाना गया और जो लोग आज ट्रेंड सेटर बने हैं, वो चाहे भड़ास हो या कोई और, उनका भी जमाना जायेगा...क्योंकि आ रहे हैं अपने जन, अपने लोग, अपनी जनता....उन गली कूचों मोहल्लो गांवों कस्बों से जहां सब कुछ आदिम और अनगढ़ है और प्रकृति के नजदीक है। आप शहरी बाबू लोग, एक्सट्रा सेंसेटिव होने के नाटक कर रहे लोग, कनफ्यूज लोग, अपने परिवार व मास से कटे हुए लोग.....केवल रोयेंगे और रोते रोते एक दिन हार्ट अटैक के कारण मर जायेंगे क्योंकि आपने जीवन में सिवाय अपने सुख, अपनी इगो, अपनी बुद्धि के अलावा कुछ जिया ही नहीं, कुछ किया ही नहीं।

झांकिए अपने अंदर
क्योंकि साथी बड़ा आसान है किसी को गरिया देना
बड़ा आसान है हर सबको प्यार करना
अपने ही जन हैं जो बिगड़े हैं
अपने ही जन हैं जो आ रहे हैं
अपने ही जन हैं जो सुधरेंगे
इन्हें प्यार करो, चूमो
इनके आने की खुशी में उत्सव करो
खुश हो, खुश रहो....
कि सदियों के जख्म भरने वाले हैं
सदियों की तपस्या पूरी होने वाली है
हिंदी की जय होगी, हिंदी वालों की जय होगी
अपनी पूरी भदेस और बिगड़ैल तेवरों के साथ
हिंदी छाती रहेगी, गाती रहेगी....
क्योंकि इनके साथ है वो अनगढ़ जनता
जिसने आज तक बचा रखा है प्रकृति को
मनुष्य को करीब, भाषा को जिंदगी के करीब


उपरोक्त बातें लिखने के पीछे का संदर्भ भी जान लें आप। अभी मैं मुंबई के एक कथित बौद्धिक हिंदुस्तानी ब्लागर की पोस्ट पढ़ रहा था। उन्हें उबकाई और छी छी आ रही है। भड़ास के ज्यादा पढ़े जाने, भड़ास के सर्वाधिक पसंद किए जाने, भड़ास की भाषा, भड़ास के ट्रेंड सेटर बनते जाने.....से उन्हें बड़ी दिक्कत है। उन्हें पूरे हिंदी समाज पर तरस आ रहा है। उथलेपन पर रोना आ रहा है। और आज उन्हें कुछ नहीं मिला तो इसी पर पेल दिया अपना आलेख। ब्लागवाणी की टाप रैंकिंग की फोटो खींची और जुट गए की-बोर्ड पटकने में। गरियाओ, सबको गरियाओ....तभी तुम महान बन सकते हो। और एक ही लेख में उन सबको, जिनसे जिनसे उन्हें उबकाई आती है, गरिया दिया। और अंत में हर विद्वान लेखक की तरह...द इंड करते समय हिंदी समाज, देश व संस्कृति आदि की चिंता जताते हुए हाय हाय करते हुए आंसू बहाते हुए ....लेख खत्म कर दिया और कंप्यूटर टर्नआफ करके निकल लिए। अपनी रोजी रोटी पर, अगली सुबह फिर खोलेंगे कंप्यूटर और सोचेंगे कि आज किसे थू थू करके गरिया दिया जाए या क्या लंतरानी पेल दी जाए ताकि लोग पढ़ें और कहें, वाह वाह वाह वाह, आप महान, अदभुत, शानदार, बिलकुल सही कहा.....तो, ठीक है भइये....लगे रहो......रणनीति अच्छी है.....।

वो मुंबई का कथित बौद्धिक ब्लागर कोई एकमात्र नहीं है। ब्लागिंग में ऐसे ढेर सारे दुखी आत्मपीड़ित और कोई काम न होने पर देश समाज की दशा दिशा पर हाय हाय करने वाले ब्लागर हैं। पिछले दिनों इन्हीं दुखों से दुखी लोगों की ऐसी ही कई पोस्टें आईँ, आ रही हैं, और भी आएंगी.....

ये लोग कौन हैं? इन्हें जानना बहुत जरूरी है। क्योंकि दरअसल ये चाहे भले कुछ न करे, कनफ्यूजन तो फैला ही देते हैं। और मालूम है, सबसे ज्यादा कनफ्यूजन कौन फैलाते हैं, जो खुद सबसे ज्यादा कनफ्यूज लोग होते हैं।

मेरा बहुत साफ मानना है कि दरअसल हिंदी समाज में अब भी खुले दिल दिमाग वाले बुद्धिजीवियों का घोर अकाल है। और जो बुद्धिजीवी हैं वो घोर कनफ्यूज लोग हैं। अपनी जड़ों से कटकर शहर आए और आत्मकेंद्रित होकर बैठ गए। अपने लिए कमाना, अपने लिए जीना और लिखना पढ़ना पूरी दुनिया और देश के लिए। जिनके जीवन में कहीं सामूहिकता न हो, जो अपने लोगों अपने परिजनों को दुत्कारता हो, अपने लाभ और अपने हित के लिए किसी हद तक गिर उठ सकता हो....ऐसे लोगों को अगर आप बुद्धिजीवी मानेंगे तो हो चला काम।

सवाल उठता है बुद्धिजीवी होता कौन है?

मैं जो अब तक समझ बूझ पाया हूं उसके मुताबिक बुद्धिजीवी समाज व देश का असल प्रतिनिधि होता है, उसे अपने लोगों, अपने समाज, अपने देश का हर रोयां रेशा ठीक-ठीक पता होता है। मैं बात आंकड़ों की नहीं, लोगों के दिल, लोगों के समूह, लोगों के संप्रदाय, लोगों की जाति, लोगों की पीड़ा, लोगों के सुख, लोगों की प्रवृत्ति, लोगों की दिक्कतें, लोगों का इतिहास, लोगों की कुंठाएं, लोगों के सपनों...... । असल और अपने जन का बुद्धिजीवी कभी कनफ्यूज नहीं होता, कभी हाय हाय नहीं करता, कभी रोता नहीं। उसका विजन अपने जन को लेकर, अपनी भाषा को लेकर, अपनी संस्कृति को लेकर बिलकुल साफ होता है। उसे अपने दुश्मन ठीक ठीक पता होता है। वो अपने जन का बुद्धिजीवी अपने बच्चों को कभी नहीं डांटता, उनकी कमजोरियों पर कभी नहीं चिल्लाता, उन्हें प्यार से समझाता बुझाता और उनके ही अनुभव के आधार पर उन्हें सही दिशा में ले जाने की कोशिश करता है क्योंकि उसे पता होता है कि ये मिट्टी के घड़े हैं, ये ऊर्जावान हैं, ये नई पीढ़ी हैं, इन्हें मस्त रहने दो, इन्हें विचरने दो, इन्हें छाती फुलाकर सांस भर लेने दो, इन्हें आसमान के तारे गिन लेने दो,,,क्योंकि कल ये ही लोग अपन जन को नेतृत्व देंगे, अपने जन के लिए लड़ेंगे मरेंगे.....। तो जो अपने जन का बुद्धिजीवी होता है उसे कभी गुस्सा नहीं होता, दादा जी की तरह क्योंकि उन्हें सब पता होता है।

पर हाय अपने हिंदी के नफासतपसंद बुद्धिजीवी। देसज लोगों की भाषा हिंदी और गांवों की भाषा हिंदी और उत्तर प्रदेश बिहार की भाषा हिंदी के बुद्धिजीवी दरअसल बुद्धिजीवी नहीं बल्कि वो कुंठित पलायित और भटके हुए लोग हैं जिन्होंने जीवन में कभी सामूहिकता को जी ही नहीं सके है। और तो और, इन्हें अगर अपने ही दादा चाचा काका मामा की ज्वाइंट फेमिली के साथ रहने को कह दिया जाए तो कुछ ही दिनों में ये अपने घर वालों को ही चूतिया घोसित कर नालायक व बेवकूफ बताकर अकेले चूल्हा जलाने को निकल लेंगे।

तो भइये....मुंबई के कथित बौद्धिक ब्लागर ने जो उबकाई और थू थू और छी छी महसूस की है, वो अभी और भी ढेर सारे लोग महसूस करेंगे क्योंकि अब इनका बौद्धिक प्रलाप टार रेटिंग से उतर रहा है तो इन्हें कष्ट होना लाजिमी है। दूसरा, हम हिंदी वाले अनगढ़ और देसज लोग अगर अपनी अनगढ़ भाषा व बोली में अपनी बात पूरी चिल्ल पों के साथ कह रख रहे हैं तो इन भगोड़े देसजों को खराब लगेगा ही।

ये नास्टेल्जिक लोग हैं जो अपनी मिट्टी व अपने गांव को सिर्फ इसलिए महसूस करते हैं क्योंकि उससे लेखन में बड़ी उर्जा मिलती है और खुद को बुद्धिजीवी साबित करने का मौका मिल जाता है। पर ये भटके हुए हिंदी के चिंतकों के पास अपनी भाषा और अपनी माटी और अपने जनों की मुक्ति के लिए कोई भी सामूहिक संकल्प, योजना, मिशन, सपना....हो, कतई संभव नहीं। क्योंकि ये सब करने के लिए आदमी को फक्कड़, औघड़, सूफी, फकीर बनना पड़ता है और अपना सब छोड़कर दूसरों को अपना मानकर एक सामूहिक जीवन जीना पड़ता है। जो लोग अपना परिवार और अपने परिजनों को नहीं संभाल सकते, वे दूसरों को कैसे गालियां देकर गंदा बता सकते हैं, मुझे समझ में नहीं आता।

हमें इंतजार रहेगा उन बड़े हृदय, सहज आत्मा, सरल व्यक्तित्व के हिंदी बुद्धिजीवियों का जो गाली से लेकर सौंदर्य तक के पीछे छिपे दर्शन को बेहद सहजता से समझते हों और उन्हें एक दिशा में निरुपित करने में मास्टर हों।

हे बौद्धिकों, बड़ा आसना होता है चिंता करना, गरियाना, थू थू करना....पर बेहद मुश्किल होता है अपने जनों को प्यार करना, उनमें अच्छाई देखना, उनकी बुराई को अच्छाई में तब्दील कर पाने की क्षमता रखना....। आखिर इसी अपने समाज के बुरे भदेस देहाती लड़कों, लड़ाकों, साथियों, पढ़े लिखों, अपढ़ों की ताकत के साथ ही हम हिंदी समाज में काया पलट कर पाने की सोच सकते हैं और आप चूतिये इन्हीं को गरिया रहे हो और अपने को महान बता रहे हो तो जरूर कोई खोट आपकी सोच में है। वरना, लोग आप को हिंदी समाज का नेता मानकर आपके घर के सामने नारे लगा रहे होते...। पर हाय, आप तो अपनों की फोन पर भी खबर नहीं लेते, पूरी हिंदी समाज के कल्याण उत्थान के लिए कैसे कुछ कर सकते हो।

बस केवल आप गाल बजा सकते हो, हवा में शब्द उछाल सकते हो....और फिर रोजी रोटी कमाने के लिए चमकती शर्ट व कोट पहनकर निकल जाते हो.....।

तो हे हिंदी के कनफ्यूज लोगों, एक बात गांठ बांध लो, आप लोगों का वजदू बस केवल कुछ दिनों का है। ये जो नई खेप आ रही है ना, उसमें अगर मैं खुद भी उनके प्यारे साथी के रूप में काम नहीं कर पाया तो वे लात मारकर भगा देंगे और कहेंगे कि निकल जाओ चूतियों, हम अपनी लड़ाई खुद लड़ लेंगे, तुम जैसे कनफ्यूज की जरूरत नहीं।

हिंदी के उत्थान, अभियान, व मुक्ति के इस दौर में हम सभी हिंदी बुद्धिजीवियों को अपने सभी अच्छे बुरे लोगों को एक साथ लेकर चलने की सोचना चाहिए। इसके लिए हिंदी बुद्धिजीवियों को अपने एक किलो के इगो को खत्म करना होगा और अपने जन की सोच व सुंदरता को समझने की कूव्वत रखना होगा।

खैर, एक कहावत है न, लात के भूत बात से नहीं मानते तो हिंदी बुद्धिजीवियों के साथ भी यही है। जब उनके ही जन उन्हें लतियायेंगे तो वो समझ पायेंगे कि दरअसल वो गलत सोच रहे थे और फिर वे खुशी खुशी अपने जन की सामूहिक सोच व खुशी के साथी बन सकेंगे।

जय भड़ास
यशवंत

20.1.08

डाक्टर साहब, भड़ास वाकई क्रांति का मंच नहीं है

अपने बेहद सक्रिय भड़ासी साथी हैं डा. रुपेश श्रीवास्तव जी। क्रांतिकारी, बेबाक और बेलौस। बिलकुल अपन लोग माफिक हैं। धांय धांय कमेंटियाते हैं। बराबर पोस्टें पढ़ते रहते हैं। जहां अच्छा लगा, तो कमेंट में अच्छा लिख दिया, जहां बुरा लगा तो कमेंट में बुरा लिख दिया। मैं इन्हें बेहद पसंद करता हूं, इसलिए कि वे वाकई मन से भड़ासी हैं। जो कुछ है उगल दो, लल्लो-चप्पो नहीं करना। यह अंदाज़ ही तो भड़ास का है।

पर डाक्टर साहब ने भड़ास से बहुत ज्यादा उम्मीदें पाल ली हैं। उम्मीदें उन्हीं से पाली जाती हैं जो उस लायक होते हैं, सो डाक्टर साहब का उम्मीद पालना गलत नहीं है पर मैं चाहता हूं कि कुछ सच्चाइयों का बयान डाक्टर साहब के सामने कर दूं, भड़ास के पैदा होने, उसके मरने और फिर पैदा होकर छा जाने के बारे में। और थोड़ी सी बातें इसके भविष्य की दशा-दिशा के बारे में भई।

लेकिन उससे पहले मैं डा. रुपेश जी के कुछ कमेंट यहां पढ़ाना चाहूंगा, जिससे भड़ास के बारे में उनकी चाहत, उनकी उम्मीद, उनकी त्वरा का पता चलता है..
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मैंने एक पोस्ट लिखी, जल में रहकर मगर से बैर, उसमें मैंने कहा था कि चूंकि हम सब हिंदी मीडियाकर्मी किसी न किसी मीडिया हाउस में काम करते हैं इसलिए हमें भड़ास पर लिखते वक्त मीडिया हाउसों को सीधे निशाने पर लेने से बचना चाहिए ताकि किसी साथी की रोजी रोटी न प्रभावित हो, जो वहां काम कर रहा है और भड़ास से जुड़ा हुआ है। दूसरा, अखबारों में दिखने वाली छोटी मोटी गलतियों को भी नजरअंदाज करना चाहिए, उसे भड़ास पर नहीं डालना चाहिए ताकि जिस साथी से यह गलती हुई हो उसके लिए नौकरी से हाथ धोने जैसी स्थिति न आ जाए क्योंकि गलतियां इंसान ही करता है, कंप्यूटर नहीं। और अगर आप काम करेंगे तो गलतियां होंगी ही, गलतियां सिर्फ उनसे नहीं होती, जा काम नहीं करते। तीसरी बात लिखी थी कि भड़ास क्रांति का मंच नहीं है, यह सिर्फ भड़ास निकालने के लिए है ताकि हम दिल और दिमाग से स्वस्थ, कुंठामुक्त रहें। इस पर तीन प्रतिक्रियाएं आईं, दो मेरी बातों के पक्ष में, तीसरी डाक्टर साहब की जिन्हें लगता है कि क्रांति का मंच बनना चाहिए भड़ास को। तीनों टिप्पणियां पढ़िए..

Gulshan khatter said...

यशवन्त जी आप ने सही सोचा इन्सान गलतीया करता रहता हे! ओर इस का यह भी मतलब नही की किसी की थोडी सी गलती को बडाचडा कर उस को नीचा दिखाया जाये! एसा कोई भी मोका ना दे की कोई भी एरागेरा भडास मच पर उगली करे ओर कहे की अपनी टीरपी के लिये भडास एसा लिखता हे
Friday, January 18, 2008 9:45:00 PM


Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,मैं हठधर्मी कदापि नहीं हूं किन्तु सच तो यह है कि पत्रकारिता पूंजीवाद के प्रभाव में जिस प्रकार सकपकायी सी दिखती है क्या आप उसे नकार सकते हैं ? जब २३ अगस्त १९२३ को पहली बार मेरे एक पत्रकार पूर्वज स्व.मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव ,सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला",बाबू शिवपूजन सहाय और प्रेस मालिक महादेव प्रसाद जी ने एक पत्र निकाला जिसका नाम "मतवाला" था तब भी यही परिस्थितियां थीं इसीलिये मुंशी जी ’भूतनाथ तेल’ की कंपनी मे मैनेजरी करते थे ,वे जानते थे कि कब खाने के लाले पड़ जायेंगे नहीं पता । आपकी तबियत कुछ नरम है क्या जो ऐसा लिख रहे हैं ,ऐसा मत करिये वरना भड़ास का नाम फटास हो जाएगा। जिसमें दम होगा वह जुड़ेगा वरना निकल लेगा और क्रांति क्यों न होगी ? जो अपनी कमियां नहीं देख सकते उनकी भड़ास तो भौं-भौं ही होगी ।
Friday, January 18, 2008 9:54:00 PM


laa, hamau aa gaylee... said...
yashwant sir, jai badhaas. main aapse sahmat hoon.akhbaar to galtiyoun ka saahitya hi kaha jata hai, aur galti to insaan se hi hoti hai. jo koi mahanubhav ne bhadhaas per galti bataakar galti ki hai kya unke sansthaan me galti nahi hoti. mera anurodh hai bhadhaas per sirf bhadaas nikale galti nahi.
Sunday, January 20, 2008 2:07:00 AM


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मैंने एक पोस्ट लिखी हां, अगर पत्रकारिता करने का यही अंजाम है तो मैं मरना चाहता हूं-शीलेश त्रिपाठी, इस पर डाक्टर साहब बेहद उत्साहित नजर आये और उन्होंने कुछ यूं अपनी बात रखी...

Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,आज फ़िर आपकी तबियत ठीक हो गयी है जो आपने शीलेश की पीड़ा को बताना शुरू किया वरना दो दिन तो आप बीमार हो गये थे और पानी में रह कर मगर से बैर ना करने की सलाह देने लगे थे । भड़ास के पीछे आपकी क्रांतिधर्मी सोच ही है जो हमारे जैसे लोगों को भड़ास से जोड़े हुए है वरना ये कोई उगालदान नहीं है कि आया और उल्टी करके चल दिया । हम सब राष्ट्र के प्रति रचनात्मक सोच ही तो रखते हैं और अगर यह किसी को बुरा लगेगा तो उसकी किसे परवाह है फ़ाकाकशी में जी लेंगे पर ऐसे लोगों के आगे सिर न झुकाएंगे । जस्टिस सिंह को भी मत भूलिए वह मामला तो न्यायपालिका का है इस लिहाज से अधिक संवेदनशील है ।
जय भड़ास...........


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इससे पहले एक पोस्ट लिखी थी, शीलेश की ज़िंदगी के लिए हम सब एकजुट हैं, इस पर डाक्टर साहब ने कुछ यूं खुशी जाहिर की.....

Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,आपका गुस्सा ही पत्रकारिता की ऊर्जा है । ठीक ऐसी ही घटना देश की न्याय प्रणाली से जूझते हुए जस्टिस आनंद सिंह की है । आपके पत्रकारिता के तेवर आद्य पत्रकार स्व. पराड़कर जी की याद दिलाते हैं । मैं हर हाल में आपके संग हूं ,शीलेश का मोबाइल नंबर भड़ास पर दे दीजिएगा ताकि सब मिल कर इन हरामियों की औकात उन्हें याद दिला सकें ।


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मेरी एक अन्य पोस्ट, टीवी न्यूज चैनल की पायल, अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद और लखनऊ के पत्रकार शीलेश, इस पोस्ट पर डा. रुपेश भाई ने प्रोत्साहन देने वाली ये टिप्पणी दी...

Dr.Rupesh Shrivastava said...
आदरणीय दादा,आपको किन शब्दों में धन्यवाद करूं समझ नही आ रहा ;आपने जस्टिस आनंद सिंह की फोन करके खबर ली तो अब लग रहा है कि आशा की किरण नहीं बल्कि साक्षात तेजस्वी मार्तन्ड भगवान मार्ग दिखाने प्रकाश लेकर आ गए हैं । न्याय पालिका , कार्य पालिका और विधायिका को अब पत्रकारिता सही रास्ता दिखाएगी और न चलने पर कान खींच कर बाध्य भी करेगी । मैं अनुग्रहीत हूं आपके इस अनौपचारिक प्रेम से , प्रणाम स्वीकारिए .....................


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मैं यह साफ कर दूं कि तारीफ मुझे भी अच्छी लगती है, और खासकर कोई आदमी जिनुइन तारीफ करे तो और भी ज्यादा। डाक्टर साहब के शब्दों में सहजता, सरलता और सच्चाई है। उनके प्रोत्साहन का मैं आभारी हूं। पर यहां मैं इन टिप्पणियों को इसलिए उद्धृत कर रहा हूं ताकि इससे पता चल सके कि डाक्टर साहब समेत कई सारे भड़ासी साथी भड़ास से क्रांति के मंच के रूप में जो उम्मीद लगाये हैं, उस पर बहस की जा सके।

उपरोक्त टिप्पणियों पर अब मेरी टिप्पणी....

डाक्टर रुपेश जी, आपकी बातों का मैं सम्मान करता हूं और कद्र करता हूं। लेकिन मुझे लगता है कि इस दौर में जब बाजार चीजें निर्धारित करने की भूमिका में है, और हर प्रोडक्ट की तरह मीडिया हाउस भी ज्यादा लाभ कमाने के लिए प्रसार और टीआरपी पर जोर दे रहे हैं, उनसे किसी सामाजिक बदलाव की कल्पना करना बेमानी है। इसी तरह जब प्रोडक्ट और मीडया हाउस का लक्ष्य तय है तो वहां जो साथी काम करते हैं, उनकी भी दिशा वही होगी। उन्हें अपने मीडिया हाउस के लक्ष्य के साथ खुद को एकाकार करके काम करना होता है, सो वो पत्रकारिता मिशन के तहत करने की मंशा की बजाय एक नौकरी करने और उसमें बेहतर परफारमेंस देकर ज्यादा पैसा और बड़ा पद पाने की इच्छा रखते हैं। और ये इच्छा रखना पाप नहीं क्योंकि हम सब आम लोगों की तरह ही हैं, कोई देवता या भगवान या क्रांतिकारी विजन से लक्ष्य हार्डकोर कार्यकर्ता नहीं। हर मां बाप की तरह हमारे मां पिता ने भी सपना देखा है कि हम बड़े पद पर जाएं, ज्यादा पैसा कमाएं, बच्चों की अच्छी शिक्षा दिलाएं, सो अगर इसके लिए हम नौकरी करते रहना चाहते हैं, और नौकरी करते रहने के लिए जो फंडे अपनाये जाते हैं, उसे अपनाते हैं, तो गलत क्या है।

तीसरी बात, आजादी के दिनों में जिन पत्रकारों ने अपने व्यक्तित्व और कलम के जरिये आजादी व सच्चाई के पक्ष में चेतना पैदा की, अखबारों को क्रांति का हथियार बनाया, वो लोग उस दौर की डिमांड के तहत कर रहे थे। वे दरअसल सच्चे अर्थों में आजादी के सिपाही थे, क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपना हथियार कलम को बनाया। और भी क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपना हथियार बंदूक को बनाया, और भी क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपना हथियार अहिंसा और आंदोलन को बनाया। ऐसे में उन दिनों के मीडिया हाउस, जो कि हाउस बने भी नहीं थे, शुरुआत भर थे, का लक्ष्य पैसा कमाना नहीं बल्कि आजादी दिलाना था। आजादी के बाद इन अखबारों, घरानों ने अपने लोकप्रिय व प्रभावकारी पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करते हुए खुद को काफी बड़ा संस्थान बना लिया और बाद में देश में बदलाव की बयार में बहते हुए खुद को धीर धीरे बाजार के अनुकूल बदलने लगे। अब जो मीडिया हाउस हैं, उनका लक्ष्य प्रसार और टीआरपी में नंबर वन बनना है ताकि इसके जरिये वे रेवेन्यू और बिजनेस में भी नंबर वन बन सकें।

मैंने भड़ास पर ही पिछले दिनों एक लेख लिखा था, आज के दौर में मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, इस लेख को क्लिक कर जरूर पढ़ियेगा, आपको यह लगेगा कि दरअसल आज की मीडिया से हम लोगों ने जो अपेक्षाएं पाली हैं, वो वास्तविकता की धरातल पर नहीं बल्कि भावनात्मक जरूरत के लिहाज से है, और यह गलत भी नहीं है। पर दूसरे पक्ष की हकीकत को भी समझना चाहिए वरना हम लोग दीवार में सिर टकराते रहेंगे।

एक बात और, भड़ास की जो शुरुआत की गई थी, वो इसकी पंचलाइन से जाहिर है कि गले में अटकी बात उगलने के लिए ही की गई थी ताकि मन हल्का हो सके। और वो दिशा आज भी प्रमुख दिशा है। चूंकि भड़ास प्रमुख तौर पर हिंदीमीडियाकर्मियों
का मंच है तो जाहिर सी बात है कि हम लोगों कि ज्यादातर भड़ास मीडिया और सिस्टम और मानवता से जुड़ी होती है।

तीसरी बात, हम लोग जो कुछ पहल कर रहे हैं, वो चाहे न्यायाधीश अंगद सिंह का मामला हो या पत्रकार शीलेश त्रिपाठी का, इसके पीछे सिर्फ इतना भर है कि चूंकि हम लोग एक बेहतर मनुष्य भी बने रहना चाहते हैं, संवेदनशील प्राणी हैं, मीडिया से जुड़े हैं सो इतना फर्ज अगर नौकरी करते निभा लिया जाय जिससे किसी परेशान व्यक्ति की मदद हो जाये तो इसे करने में कोई दिक्कत नहीं है। हम भड़ास मंच के जरिये ऐसे सामाजिक और मानवीय काम करते रहेंगे लेकिन इससे यह अंदाजा लगाना कि भड़ास एक क्रांतिकारी मंच या संगठन है, गलत होगा। यह उम्मीद करना कि भविष्य में पूंजीवाद, मीडिया हाउसेज, सत्ता आदि की खामियों को उजागर करते हुए उनसे निपटने की मुहिम शुरू की जायेगी, सरासर नाउम्मीद करने वाला है। चूंकि हम इस सिस्टम के पार्ट भी हैं, उनके लिए उनके लक्ष्य के हिसाब से काम भी करते हैं सो इनके खिलाफ जाने का सवाल ही नहीं उठता। दिलीप मंडल जी के शब्दों में कहें तो लाला के पैसे से क्रांति नहीं होती। क्रांति के लिए आपको अपने संसाधन बनाने पड़ते हैं, जनता के बीच में जाना पड़ता है, चौबीसों घंटे समाज और देश के लिए निकालना पड़ता है।

भड़ास क्रांति का मंच नहीं बनेगा तो ऐसा भी नहीं कि इस देश में क्रांति नहीं होगी। पारंपरिक मीडिया को आइना दिखाने के लिए और उसकी कमियों से मुक्त होकर न्यू मीडिया भी आ गया है जिसमें ब्लागिंग भी एक पार्ट है। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी ढेर सारी क्रांतिकारी पार्टियां, लोग, एनजीओ, संगठन आदि जनता के बीच सक्रिय हैं जो उन्हें बदलाव के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मतलब, क्रांति करनी है तो फिर क्रांति के वास्तविक मंचों की शिनाख्त की जानी चाहिए। अवास्तविक मंच से उम्मीद करने से ऊर्जा और समय ही नष्ट होगा। मैं निजी तौर पर उपरोक्त क्रांतिकारी मंचों, संगठनों, पार्टियों, न्यू मीडिया प्लेटफार्मों का कभी कम तो कभी ज्यादा, कभी सक्रिय तो कभी निष्क्रिय समर्थन देता रहता हूं। और यह कार्य ढेर सारे मेरे आप जैसे लोग कर रहे हैं।

भड़ास को उगालदान मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, भड़ास को फंटास मानने या संडास मानने में भी कोई दिक्कत नहीं, भड़ास को बकवास मानने में भी मुझे कोई दिक्कत नहीं। हम भड़ासी औघड़ लोग हैं, सूफी लोग हैं, बिंदास लोग हैं जो अपनी आलोचनाओं को अपना आभूषण मानते हैं। क्योंकि जो साहस कहकर सच बोलता है उसे हमेशा से तमाम तरह की उपाधियों से विभूषित किया जाता है। कहीं भी कुछ उगलेंगे तो दूसरों को अरुचिकर लगेगा ही और वे अपनी प्रतिक्रिया किसी न किसी रूप में व्यक्त करेंगे।

तो साथी रुपेश जी, ये जो बहस है, वो हमारे आपके बीच की नहीं बल्कि एक ट्रेंड पर बहस है जिसे एक तरफ आप तो दूसरी तरफ मैं प्रकट कर रहा हूं। आपके साथ ढेर सारे साथी आप जैसे विचार वाले होंगे और मेरे साथ ढेर सारे साथी मेरे विचार वाले होंगे। और इसका मतलब यह भी नहीं होता कि अगर मेरे साथ ज्यादा साथी हुए तो मैं जीता हुआ मानूं या आपके साथ ढेर सारे साथी हों तो आप जीता हुआ मानें।

भड़ास की खासियत यही है कि यहां शंकर जी की बारात है। मुंडे मुंडे मर्तिभिन्ना। हर विचारधारा, संपद्राय, पेशे, उम्र, सोच के लोग यहां हैं, इसलिए किसी पर किसी को अपनी सोच थोपनी नहीं चाहिए। मैं भी अपनी सोच नहीं थोप रहा। मैं केवल भड़ास की हकीकत को बयान करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि हम सभी पौने दो सौ भड़ासियों का भड़ास को लेकर विजन क्लियर रहे।

भड़ास क्या है, इस बारे में भड़ास में ही बाईं तरह के हिस्से में, भड़ास क्या है शीर्षक से ठीकठाक साइज में इंट्रोडक्शन लिखा है, उसका एक अंश यहां दे रहा हूं, इसमें भड़ास के मकसद का साफ साफ व्याख्यायित किया गया है। यह एक तरह से भड़ास के दशा-दिशा के लिए बेसिक गाइडलाइन की तरह है---

हम सहज, सरल और बिंदास लोग हैं जो जिंदगी को पूरी गंभीरता के साथ-साथ पूरी सहजता व मस्ती के साथ जीते हैं। हर तरह की वैचारिक, भाषाई व जातीय-धार्मिक भेदभावों को भुलाकर हम सब सिर्फ हिंदीवाले हैं, दिलवाले हैं और हमेशा हिंदी का झंडा ऊंचा करेंगे। ज़िंदगी के किसी मोड़ पर या किसी क्षण में भड़ास आपके काम आ जाए, आपका मनोबल बढ़ाए, आपके एहसास को सब तक पहुंचा पाए, यही इसका मकसद है।


डाक्टर साहब, आपसे भले नहीं मिला हूं पर दूर से ही, आपके विचार व तेज देखकर मैं आपका प्रशंसक बन गया हूं, आप जैसे लोग अगर इस देश में हैं तो हम जैसे लोग जरूर अच्छे काम के लिए प्रेरित होते रहेंगे। उम्मीद है कि मेरे और आपके बहाने जो बातें हुई हैं उससे ढेर सारे लोग इस बहस को आगे बढ़ाने के लिए सोचेंगे और अपनी सोच से हमें आपको अवगत करायेंगे।

जय भड़ास
यशवंत