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4.12.12

जी न्यूज के बहाने पत्रकारिता का अंदरखाने


आशीष कुमार
पहले दो संपादकों की गिरफ्तारी के पूरे प्रकरण पर गिरफ्तारी, गिरफ्तारी से पहले और उसके बाद के घटनाक्रमों का सिलसिलेवार तरीके से जांच पड़ताल करते हैं ताकि कुछ मथकर ऊपर आ सके। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जी न्यूज के संपादक व बिजनेस हेड़ सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक व बिजनेस हेड़ समीर अहलूवालिया को नवीन जिंदल प्रकरण में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
जिस रात दोनों को गिरफ्तार किया गया जी न्यूज के सलाहकार संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी ने रात दस बजे के अपने प्रोग्राम बड़ी खबर में इसे आपातकाल से जोड़ कर दिखाया। पुण्य प्रसून वाजपेयी अपनी स्टाईल में दोनों हाथों की हथेलियों को रगड़ते हुए, जंजीरों में जकड़े मीडिया शब्द के क्रोमा के आगे खड़े होकर बड़ी उर्जा व तर्कों के साथ इसे मीडिया पर सेंसरशिप व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के रूप में दिखा रहे थे। इस दौरान उन्होंने बहुत से वर्जनों के बीच वरिष्ट पत्रकार कमर वाहिद नकबी और ब्रॉस्डकॉस्टिंग एडिटर एसोसिएशन के अध्यक्ष एनके सिंह का वर्जन भी लिया। कमर वाहिद नकबी के बयानों को अपने पक्ष में तोड़ मरोड़कर पेश किया गया।
जी न्यूज के बिजनेस सहित सभी समाचार चैनलों पर इसे आपातकाल के दौरान की हालतों से जोड़कर दिखाया गया। विभिन्न राष्ट्रीय पार्टियों के प्रवक्ता व मुख्य नेताओं के बयानों को अपने पक्ष में दिखाया गया। टीवी के प्राइम टाइम में बहसों का दौर चला। जमकर फेसबुकबाजी हुई। खांटी पत्रकारों को पत्रकारिता की समीक्षा करने का सुनहरा मौका मिला। सरकार को मीडिया के मामले आक्रमक होने का मौका मिला। मौका दिया जी न्यूज के मालिक के व्यवसायिक हितों और उसके संपादकों व चैनल के प्रति पैसे बटोरने की हवस ने, शायद उनकी नीयत में भी कुछ रहा होगा। कोई बेवजह सफेद कपड़े पहनकर कोयले की खदान में क्यों घुसेगा।
नेताओं को तो बोलने का मौका मिलना चाहिए। जब मीडिया के साथ सांत्वना दिखाने और जी न्यूज के आंसू पोछने को मौका मिला तो वह कहां चूकने वाले थे, उन्होंने भी बिना जाने-समझे इसे अधिकारों का हनन और आपातकाल बता दिया। इस पूरे प्रकरण में छोटी सी गलती और मालिक के प्रति वफादारी दिखाने के चक्कर में पत्रकारिता जगत के छात्रों के लिए आदर्श पुण्य प्रसून वाजपेयी पर भी लोगों को उंगली उठाने का मौका मिल गया।
चलिए इसकी जड़ तक जाने के लिए सुधीर चौधरी की कुंडली और नवीन मामले की भी पड़ताल कर लेते हैं। लाइव इंडिया से जी न्यूज पहुंचे सुधीर चौधरी मल रूप हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं। उनके व्यवहार में हरियाणवी ठसक व रिस्क लेने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। पत्रकारिता जगत में उनकी कार्यशैली को लेकर पहले भी उंगली उठती रहीं हैं। नवीन जिंदल प्रकरण का मुद्दा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के संपादकों की स्वतंत्र संस्था बीईए में उठने पर सुधीर चौधरी का जवाब था कि वह एक संपादक के साथ चैनल के बिजनेस हेड़ भी हैं, जिसके नाते वह नवीन जिंदल से 100 करोड़ का विज्ञापन मांगने गए थे। यह तो यू ट्यूब पर सबके लिए उपलब्ध वीडियो को देखकर कोई आम आदमी बता सकता है कि विज्ञापन मांगा जा रहा है या और कुछ भी हो रहा है। बचाव में तरह-तरह के तर्क देने की कोशिश की गई। कहीं कुछ मछलियां हीं पूरे तलाब को गंदा तो नहीं कर रहीं। लेकिन यह सच है कि यह मछलियां कुछ जरुर हैं लेकिन बहुत बड़ी-बड़ी हैं।

जी न्यूज के कर्मचारियों का दबी जुबान से मानते हैं कि सुधीर चौधरी के जी न्यूज में आने की भी एक कहानी है। जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा को हरियाणा में रियल एस्टेट के करोबार को फैलाने में राजनीतिक कारणों से अड़चनों का सामना करना पड़ रहा था। कहा जाता है कि जी न्यूज के संपादक एनके सिंह की हुड्डा के साथ ट्यूनिंग सही नहीं थी, जिसके कारण वह सुभाष चंद्रा की व्यवसायिक अड़चनों का दूर नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में सुधीर चौधरी को मौका मिला। मुख्यमंत्री दीक्षित से जुगाड़ लगाकर व हरियाणा में रियल एस्टेट करोबार में आ रहीं दिक्कतों को दूर करने का भरोसा देकर सुधीर चौधरी जी न्यूज पहुंच गए। एके सिंह को जी न्यूज छोड़ना पड़ा। वह लाइव इंडिया पहुंच गए। बाद की कहानी जगजाहिर है।
एक मछली ने मीडिया पर उंगली उठाने का मौका दे दिया। वैसे यह मामला मीडिया की नैतिकता से जुड़ा हुआ था। सुधीर चौधरी प्रकरण मीडिया सेंसरशिप का न होकर एक आपराधिक मामला था। संपादकों की गिरफ्तारी पर मीडिया की त्वरित कार्रवाई और आपातकाल से तुलना करने के कारण उसने खुद अपने पैरों पर कुल्हाडी चलाई। सच तो यह है कि मीडिया के नियामन से जुड़ी संस्थाएं मीडियाकर्मियों या संस्थाओं के आपराधिक मामलों को नहीं देख सकतीं या देखती हैं। यदि कोई मीडिया संस्था या मीडियाकर्मी अपराध करेगा तो उसको पुलिस और न्यायपालिका ही डील करेगी। मीडिया कंटेंट और मीडियाकर्मियों के अपराधों को अलग करके देखना होगा। मीडिया के नियामक संस्थाएं कंटेंट व उसकी आचार संहिता को लेकर ही कुछ सकती हैं। मसलन, मीडिया में साफ छवि के लोग ही होने चाहिए ताकि आम आदमी का मीडिया पर विश्वास बना रहे। यदि संपादक मर्सिडिज, बीएमडब्ल्यू, फोरचूनर से चलेंगे और फाइव स्टार जीवन शैली अपनाएंगे तो उसका खर्च वहन करने के लिए ऐन केन प्रकारेण तो करना पड़ेगा जो तलाब गंदा करने का कारक भी बन सकता है। 

10.7.09

मीडिया का बढ़ता मुनाफा व पत्रकारिता की बदलती परिभाषा


श्रीराजेश
एक बंधु ने अपने ब्लाग (http://shyamnranga।blogspot.com) पर सूचना दी है कि मूल रूप से बीकानेर के रहने वाले और अब मुंबई प्रवासी श्याम लाल जी दम्माणी को विभिन्न अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिखने के लिए उनका नाम लिम्का बुक आफ रिकार्ड में दर्ज किया गया है. वह वर्ष 1991 से 2004 के बीच लगभग साढ़े चार हजार पत्र लिख चुके हैं और ये पत्र विभिन्न विषयों पर सुझाव स्वरूप या प्रतिक्रियात्मक लिखा गया है.

यह भारतीय मीडिया जगत के लिए शुभ सूचना है बावजूद इसके इस सूचनात्मक खबर के संबंध में कहीं किसी अखबार, खबरियां चैनल या फिर समाचार पोर्टल में चर्चा नहीं की. देखा जा रहा है कि इस तरह की चीजें अब अखबारों, खबरियां चैनलों व समाचार पोर्टलों से गायब ही रहते हैं. ऐसा क्यों ? यह प्रश्न भी अनायास नहीं है लेकिन इस संबंध में गंभीरता से विचार आवश्यक है.

पिछले दस वर्षों के दौरान देखा गया है कि भारतीय मीडिया का जनसरोकार से नाता धीरे-धीरे क्षीण होते जा रहा है, लेकिन फिर सवाल उठता है कि ऐसा क्यों ? हम बाजारवाद का हवाला देते हैं, यदि ठीक से देखा जाय तो भारत में बाजारवाद की बयार की 90 के दशक के सरसराहट शुरू हुई और सरकारी नीतियों के पाल के छांव में 90 के दशक के मध्य तक इसने अपना वर्चस्व जमा लिया था. मीडिया में भी बाजारवाद का प्रभाव इसी काल में शुरू हुआ, जब इंटरनेट और इंटरटेनमेंट सेक्टर में विदेशी पूंजी निवेश को 100 फीसदी की छूट दी गयी. जबकि टेलीकाम सेक्टर में 74 फीसदी, समाचारों में 26 फीसदी और एफएम, डीटीएच, केबल औप प्रिंट मीडिया में 49 फीसदी की छूट दी गयी. दरअसल, सरकार की इस नीति से खास कर प्रिंट मीडिया को नई जान तो मिली ही जो प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश से वंचित होने के कारण आर्थिक रूप से बीमार थी, उसे नई संभावनाएं दिखने लगी. बावजूद इसके विदेशी कंपनियों द्वारा इस सेक्टर में भारी पूंजी निवेश ने इस क्षेत्र की प्राथमिकताएं बदल दी और जनसरोकार का नजरियां हांसिये पर चला गया तथा अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृति बढ़ती गयी. इसका असर हाल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अखबारों के पाठकों की संख्या में पिछले तीन साल में आयी भारी गिरावट और साथ ही टैम यानी टेलीविजन आडिययंस मेरजरमेंट के आंकड़ों के विश्लेषकों के अनुसार चार साल पहले जहां देश में 210 चैनल थे जो आज बढ़ कर 324 हो गये हैं, दिखता है. जो कार्यक्रम चैनल (खबरिया चैनलों के साथ) को 10 से ज्यादा टीवीआर दे सके, ऐसे चैनल दो एक ही रह गये हैं. इसके बावजूद कुछ छोटे मोटे मीडिया घरानों को छोड़ कर आर्थिक मंदी के दौर में भी देश का मीडिया उद्योग ठीक-ठाक मुनाफा में रहा.

दूसरी ओर अखबारों, खबरियां चैनलों व समाचार पोर्टलों से जनसरोकार के मुद्दे गायब होने के साथ पत्रकारिता के स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है जिसने पाठकों और दर्शकों के आंकड़े कम करने में अहम भूमिका निभाई है. अब यह सुक्त वाक्य सच लगने लगा है कि भारतीय पत्रकारिता अपने संक्रमण काल के दौर से गुजर रही है. उपरोक्त श्याम लाल जी दम्माणी जैसा संजीदा पाठक संपादक के नाम जब पत्र लिखता है तो सामान्यतः अखबार में प्रकाशित किसी खबर या आलेख को वह पहले गंभीरता से पढ़ता है और वह उसके दिमाग से सीधे दिल तक उतरती है और उसके बाद प्रतिक्रिया स्वरूप विचारों जन्म होता है. ये पत्र अखबारों को अपनी नीतियों के निर्धारण, पत्रकारों को अपनी दृष्टि विकसित करने और विचारों को जनोन्मुखी और मंथन करने के लिए बाध्य करती है. वर्तमान दौर में पाठकों के संपादक के नाम पत्र का महत्व सिर्फ उस कालम को भरने तक ही रह गया है. अब मीडिया जगत में खबरों की परिभाषा बदल गयी है- उपभोक्ता के लिहाज से खबरें. वर्तमान दौर में देखा जा रहा है कि पत्रकार बजट व सरकारी रिपोर्टों का विलशेषण करने की क्षमता खोते जा रहे है. अखबारों में भाषण बाजी और उन्होंने कहा.... टाइप की खबरों की बाढ़ है. इस लिहाज से देखा जाय तो भले मीडिया का व्यापार बढ़ रहा हो, लेकिन पत्रकारिता पीछे छूट रही है. कई विद्वानों का कहना है कि पश्चिमी देशों, खास कर अमेरिका में पत्रकारिता का अवसान देखा जा रहा है. इसके कारण भी गिनाये गये है कि पहले वहां अखबार आये इसके बाद समाचर चैनल और फिर बाद में समाचार वाली वेबसाइटें आयीं. पत्रकारिता को ये सभी माध्यम एक-एक कर मिले और हुआ यह कि जो धार धीरे-धीरे मिलती तकनीक के साथ तेज होनी चाहिए थी वह घीस कर बोथरा गयी और पत्रकारिता पर उपभोक्तावाद हावी हो गया लेकिन भारतीय पत्रकारिता के साथ स्थिति बिलकुल अलग है. भारतीय पत्रकारिता पर केवल खबर परोसने की ही नहीं बल्कि देश व समाज को नई दिशा देने की जिम्मेदारी भी है, जो काफी पहले से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करती आ रही है लेकिन हाल में आर्थिक उदारीकरण ने इसके मायने बदल दिये हैं. भारतीय पत्रकारिता के बुजुर्गों को फिर से पत्रकारिता के पुरानी परिभाषा को लौटाने की पहल ही नहीं कोशिश करने के लिए मार्ग दर्शन करना चाहिए और युवा पत्रकारों की पीढ़ीं को नई सोंच के साथ इस लुभावन चमक-दमक से मुक्त हो कर मिशन से मशीन में तब्दील होती पत्रकारिता को उसकी मंजिल तक पहुंचाने के प्रयास तेज करने होंगे. यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इस प्रयास से पत्रकारों की आर्थिक स्थिति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं के बराबर है लेकिन इतना जोखिम तो उठाया ही जा सकता है.

10.1.09

बिहार की द्विज पत्रकारिता?

बिहार से इस समय मुख्य रूप से ६ हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं. इनमें से पांच के संपादक ब्राह्‌मण हैं. इन छह समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख के पदों पर काबिज लोगों में ४ ब्राह्‌मण १ भुमिहार व एक राजपूत हैं. यही हाल टीवी चैनलों का भी है. बिहार में हिंदी, अंग्रेजी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में शीर्ष पदों पर १०० फीसदी हिंदुओं का कब्जा है. इनमें ९९ प्रतिशत द्विज हैं. पिछड़ी जाति का कोई भी पत्रकार फैसला लेने वाले पद पर नहीं है. इन पदों पर दलित, मुसलमान व महिलाओं की उपस्थिति शून्‍य है. अब सवाल यह उठता है कि बिहार की इस द्विज पत्रकारिता ने किसका हित साधा है? किसने इसका उपयोग किया है? इसके अपने राग-द्वेष क्या हैं?

(बिहार के एक पत्रकार साथी ने मेल कर मुझसे ये सवाल पूछा है। क्या कोई इसका जवाब दे सकता है?....यशवंत)

16.12.08

पेशे से पत्रकार हूं लेकिन जो आप को भेज रहा हूं उसे छाप नहीं सकता

वह मासूम छात्रा उन दारिंदों के हाथ का खिलौना बन कर रह गयी


भाई यशवन्‍त, पेशे से पत्रकार हूं लेकिन जो आप को भेज रहा हूं उसे छाप नहीं सकता। न छाप पाने की वजह से भारी कुण्‍ठा में हूं। वैसे भी किसी भी संवेदनशील और जागरूक व्‍यक्ति को हिला कर रख देने वाली है यह घटना। पूरा मामला जानने के बाद आप भी हिल जायेंगे और शायद सारे भडासी भी। इसलिये आपसे अनुरोध भी है और आपको चुनौती भी। इस पूरे विवरण को अपने ब्‍लाग पर लाकर भडासियों की एक मुहीम खडी करने की।

मेरे शहर गोरखपुर में एक प्रतिष्ठित विद्यालय है। शैक्षिक सत्र की शुरुआत होने पर उसमें अपने बच्‍चों को दाखिला दिलाने के लिये जबरदस्‍त मारामारी होती है। उसी विद्यालय में पिछले दिनों एक सनसनीखेज घटना हुई। उस विद्यालय में सांतवीं कक्षा में पढने वाली एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली।

बताते हैं कि विद्यालय में अंग्रेजी पढाने वाले एक शिक्षक ने कुछ छात्रों के साथ मिल कर उस छात्रा का एमएमएस तैयार किया। इसके लिये उन्‍होंने अश्‍लील फिल्‍म में उसकी तस्‍वीर जोड दी और उसे यू ट़यूब में डाल दिया। इतना ही नहीं छात्रों और अंग्रेजी शिक्षक ने उस छात्रा का मनचाहा इस्‍तेमाल भी करना शुरू कर दिया। वह मासूम छात्रा उन दारिंदों के हाथ का खिलौना बन कर रह गयी। सभी मिल कर उसका मनचाहा इस्‍तेमला करने लगे। छात्रों के इस गिरोह में सभी बडे परिवरों के बच्‍चे शामिल थे।

इससे तंग आकर छात्रा ने 6 दिसम्‍बर 08 को अपने घर के अंदर पंखे से झूल कर खुदकुशी कर ली। सूत्र बताते हैं कि छात्रा ने इस संबंध में सुसाइड नोट भी छोडा था। जिससे छात्रा के परिवार वालों को पूरी बात पता चली। हालांकि परिवार वाले इस मामले में मुंह नहीं खोले। लेकिन दूसरे दिन 7 दिसम्‍बर 08 को जब विद्यालय के शिक्षक छात्रा के घर पहुंचे तो छात्रा के परिजनों का आक्रोस फूट पडा। उन्‍होंने शिक्षकों को जम कर धुन दिया।


गौर करने की बात यह है कि इस पूरी घटना के बारे में विद्यालय के हर बच्‍चे को मालूम है। उस विद्यालय में पढने वाले बच्‍चे रिक्‍शे और बसों में इस घटना के बारे में चर्चा करते रहते हैं। बच्‍चों के माध्‍यम से यह बात अन्‍य घरों में भी पहुंच गयी है। अभिभावक सहमे हुये है। खास कर पूरे मामले में विद्यालय के शिक्षक की भूमिका का पता चलने के बाद। लेकिन बच्‍चों की भविष्‍य की चिंता की वजह कोई कुछ बोल नहीं रहा है। विद्यालय परिसर में भी इन दिनों अजीब सा सन्‍नाटा पसरा हुआ है। मगर छात्रा के परिजन अपनी इज्‍जत बचाने के लिये कुछ बोल नहीं रहे हैं।

स्‍थानीय के चलते यह खबर यहां छप नहीं सकती। हालांकि पत्रकार होने की वजह से मैने यह खबर लिखी जरूर है। यदि इस खबर को अपने ब्‍लाग पर जगह देंगे तो मेरे मन में इस घटना को लेकर पल रही कुंठा निकल जायेगी। आपसे अनुरोध है कि इसे भड़ासियों के बीच लाकर मासूमों के पक्ष में आवाज बुलंद करें। आभारी रहूंगा।

नवनीत
गोरखपुर

4.12.08

पत्रकार विनोद कुमार के लिए प्रश्न?

भाई विनोद कुमार पत्रकार हैं, और टोटल टी वी के अपराध संवाददाता भी। भड़ास फॉर मीडिया पर उन्होंने टी वी पत्रकारिता के बारे में प्रश्न किए हैं, वस्तुतः ये प्रश्न ना होकर खबरिया चैनल के पत्रकार की व्यथा ज्यादा लगती है। भाई विनोद का कहना है की समाज उनकी अच्छाइयों को स्वीकारने के बजाय चैनल पर दोषारोपण करते हैं और अखबार जगत इनके सुर में सुर मिलाती हैं, मगर इन व्यथाओं के बीच में इन्होने खुली चुनोती भी कर दी की मुझे पढो और मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, सो चलिए इनको भी निबटाते चलते हैं। वैसे भी जनता जिस तरह से राजनेता के ख़िलाफ़ हो गयी है और इस भगदड़ में राजनेता आंय बांय बयान दे रहे हैं, खतरे की घंटी पत्रकारों के लिए ही तो है, क्यौंकी राजनेता की तरह लोग पत्रकारिता से भी उब ही तो चुके हैं, घरों में लोग बिग बॉस और सास बहु सरीखे को तवज्जो देते हैं बनिस्पत खबरिया चैनल के और इसका प्रमाण टी आर पी की वोह रेटिंग है जो निरंतर बता रही है की लोगों की रुची समाचारों के चैनलों में कम होती जा रही है।

भाई विनोद के ढेरक प्रश्न हैं
  • मुंबई पर हमले की जानकारी ज्यादातर लोगों को टीवी न्यूज चैनलों से ही क्यों मिली? ,
    क्यों अमिताभ बच्चन पिस्तौल रखकर सोए?
    क्यों सुरों की सरताज लता मंगेशकर तीन दिन में तीन सौ बार रोईं?
    क्यों तीन दिन तक उन्होंने टीवी बंद नहीं किया?
    क्यों शिल्पा शेट्टी को जैसे ही हमले का फोन आया तो उन्होंने तुरंत टीवी आन किया?

हर कोई कहता दिखा कि हमला भयावह था, ये किस आधार पर कह रहा था? सिर्फ सुनकर या पढ़कर। (जी नहीं, टीवी चैनल की स्क्रीन पर एके 47 लिए खड़े आतंकी को देखकर, गोलियों की आवाज और स्टेशन पर मची अफरातफरी को देखकर। जलता ताज देखकर। सैंकड़ों की तादाद में कमांडो देखकर।)
भाई आपके प्रश्न बेहतरीन हैं, लाजवाब और आपके दर्द को भी बयां करता है मगर आपके सभी प्रश्न का उत्तर क्या सिर्फ़ इतना नही की व्यावसायिकता की दौड़ में आप तमाम लोगों ने पत्रकारिता का बलात्कार कर दिया है, निसंदेह कर रहे हैं। अयोध्या हो या गोधरा, बम के धमाके हों या मुंबई पर आतंकी हमला, आरुशी काण्ड हो या मोनिंदर काण्ड, आप सिर्फ़ एक प्रश्न के उत्तर दीजिये की क्या आपने और आपके जैसे तमाम लोगों ने, बड़ी बड़े पत्रकारों ने, पत्रकारिता के भीष्म ने सिर्फ़ पत्रकारिता की या निर्णयकर्ता बन गए ? प्रश्न सिर्फ़ टी वी पत्रकारिता से नही है अपितु अखबारों से भी।

मुम्बई का आतंकी हमला भारत पर हमला था और ख़बर में जैसा की आपने लिखा अमिताभ बच्चन, लता मंगेशकर, शिल्पा शेट्टी, यानी की बम के हादसे में भी टी वी की चमक दमक को भुनाने की लिए सितारे का सहारा, माफ़ कीजिये और याद कीजिये बहुत से नाम आपने छोर दिए हैं?

शायद आपको याद हो आपने आरुशी के पिता को आरुशी का हत्यारा साबित कर दिया था।

प्रिन्स का गढ्ढे में होने से निकालने तक आपकी तत्परता हमने टी वी में देखी है, या फ़िर यूं कहिये की देश ने झेली है, चलिए अब पत्रकारिता पर आ जाते हैं, ज्यादा पुरानी बात नही है जब पत्रकारिता ने व्यावसायिक रूप नही लिया था। पत्रकारिता के आधार स्तम्भ कहीं से पत्रकारिता पढ़ लिख कर नही आए, नाम मैं नही कहूंगा क्यौंकी आप ख़ुद जानते हैं। जो पढ़ लिख कर नही आए उन्होंने पत्रकारिता को जिया है, पत्रकारिता के लिए एक आयाम कायम किया है क्यौंकी वोह लाला जी के हाथों की कठपुतली नही हुआ करते थे, उनके पत्रकारिता में व्यावसायिकता नही हुआ करती थी, जो खंती पत्रकार हुआ करते थे और (वरिष्ट पत्रकार स्वर्गीय गजेन्द्र नारायण चौधरी के शब्दों में पत्रकारिता कभी पढ़ लिख कर नही आ सकती क्यौंकी ये वो शय है जो लहू में दौड़ती है, जब एक पत्रकार साँस लेता है तो वोह पत्रकारिता से भरी होती है। आँखें खुलती है तो पत्रकारिता दिखता है, मगर इस के लिए पत्रकार होना जरुरी है और मॉस कॉम तथा जर्नलिजम करके आप व्यावसायिकता सीख सकते हें पत्रकारिता नही) ना की धंधेबाज, व्यावसायिक पत्रकार को इस से बेहतर शब्द नही मिल सकते।

भाई आप तो अपराध संवाददाता हैं, पत्रकार भी क्या आपको पता है की
  • जस्टिस आनंद सिंह कौन हैं?
  • क्या किसी टी वि चैनल पर आपने इन्हें देखा है?
  • क्या किसी जज को पाँच साल की सजा मिलती है वोह मीडिया नजर से दूर हो सकता है?
    बाईज्जत रिहा होने के बाद एक जज को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नही होने दिया जाता है आपको ख़बर है?

शायद आप जवाब दें ?


सेना का गुणगान करने वाली ये ही मीडिया अभी कुछ दिनों पूर्व मालेगाव कांड पर साध्वी के साथ सेना को जम कर कोस रही थी क्यौंकी ये ही तो पत्रकारिता है?


आज हमारा लोकतंत्र अपने चारो पाये से भले ही जर्जर हो चुका हो मगर हमारे देश के लोग एक हैं और हमारी एकता आज दुनिया देख रही है।


न्यायपालिका, व्यव्हारपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता के शोषण और दोहन से आजिज लोगों का एक होकर इन चरों जरजर पाये का मरम्मत करना तय है।


जाति-पाती, कॉम धर्म, प्रान्त क्षेत्र, भाषा बोली से ऊपर एक भारतीयता का बिगुल बज चुका है,
बस और बस............................


15.11.08

पत्रकारिता का निष्ठा, पत्रकार के नाम.

बचपन से पत्रकार और पत्रकारिता को देखता आया हूँ। बहुत छोटा सा था जब पटना से प्रकाशित और हिन्दुस्तान के कुछ सबसे पुराने और प्रतिष्ठित अखबार के अन्ग्रेज़ी संस्करण "दी इंडियन नेशन" के सम्पादक मेरे एक नाना जी हुआ करते थे, बड़ा हुआ तो घर में मीडिया संस्थान से जुड़े लोगों की बाढ़ सी आ गयी, कोई सम्पादकीय में तो कोई विज्ञापन में सर्कुलेशन से लेकर प्रोडक्शन तक में मेरे घर के लोग आ चुके थे पत्रकारिता और राजनीति का चोली दमन का साथ होता है सो हमारे घर में भी था। बताता चलूँ की मैं अपने ननिहाल की बात कर रहा हूँ क्यौंकी मेरा बचपन ननिहाल में ही बीता है।
नाना जी का इंडियन नेशन और इसी का हिन्दी संस्करण आर्यावर्त हमेशा से मेरा पसंदीदा रहा कारण साफ़ है की अपने कंटेंट ने सर्चलाइट पब्लिशिंग को हमेशा प्रतिष्ठा में बनाये रखा। मेरी अखबारों में रूचि और उसका विश्लेषण करना मेरे नाना जी को हमेशा भाता रहा और ये ही कारण था की वो हमेशा चाहते थे की मैं पत्रकारिता में आऊं। मगर बाद के पीढी के मीडिया में आने और उस से बने मीडिया की छवि ने हमारे घर के माहोल को बदला और सभी मेरे ख़िलाफ़ की मैं पान की दूकान कर लूँ मगर इस क्षेत्र में मुझे ना जाने दिया जायेगा।
यानि की निष्ठा पर प्रश्न, पत्रकार की निष्ठा पर प्रश्न, पत्रकारिता की निष्ठा पर प्रश्न, मीडिया की व्यवसायीकता में कुचले पत्रकारिता की निष्ठां पर प्रश्न। मैंने बड़े करीब से इसे देखा और इस प्रश्नचिन्ह को स्वीकार भी किया।
माफ़ी चाहूँगा शायद कुछ ज्यादा ही लिख गया जो शब्दों को जाया करना हो सकता है, बहरहाल चर्चा एक घटना मात्र की करूंगा जिसे मैंने देखा और बस देखता रहा, ऊपर की जो मेरी अभिव्यक्ती है को इस तरह के घटनाक्रम ने हमेशा बल दिया और आज मुझे ये कहने से कोई गुरेज नही की सभी जगह से समाप्त निष्ठां का लोकतंत्र के चौथे खम्भे ने प्रचार प्रसार की ठिकेदारी तो ली मगर अपने निष्ठा का चीरहरण ख़ुद किया है।
कुछ महीने पूर्व मुंबई में था, रोज ही वाशी स्टेशन से परेल तक दुपहरी में जाता और गए रात वापस आता था। ये ऐसा समय था जब अमूमन पत्रकार लोग भी ट्रेन में ही होते हैं। अपने आप में मस्त गेट से खड़ा होकर जब रेल में सफर करता तो आस पास पत्रकारों के टोली की बातें आकर्षित करती थी मगर अपने धुन में रहने वाला इन से सम्पर्कित होने के प्रयास से इतर ही रहा।
खैर चर्चा सिर्फ़ एक घटना की करूंगा जिसने मेरे अंतरात्मा तक को हिला कर रख दिया। वापसी में लगभग रोज ही परेल स्टेशन पर एक युवा जोड़ी मुझे दिखता जो साथ ही एक ही डब्बे में वाशी तक आता था। ना सुनने की इच्छा के बावजूद इतना कह सकता हूँ की दोनों ही अलग अलग अखबार में काम करने वाले शायद दम्पति थे। कभी कभी बैठने के कारण इतना जान पाया की दोनों हिन्दुस्तान के दो बड़े ही प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार थे।
एक रात का ये हादसा है जब हम बैठे हुए थे आमने सामने, दोनों में से एक ने वहां का एक स्थानीय अखबार निकाला, अपने जिज्ञासा पर दोनों ने बहस किया, अखबार का मजाक उडाया और अंत में दंपत्ति ने, पत्रकार दंपत्ति ने, पत्रकारों की जोड़ी ने उस अखबार को चलती हुई ट्रेन से यूँ फेंका मानो कचरे के डब्बे से कचड़ा बीने वाले के हाथ गंदगी से भी ज्यादा गंदा हाथ में आ गया हो।
जहाँ पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ हो, पत्रकार लोक की आवाज और निष्ठां के प्रति जवाबदेह भी, मगर जब एक पत्रकार अपने पत्रकारिता के प्रति निष्ठित ना हो, अपने धर्म के प्रति निष्ठित न हो अपने कर्म के प्रति निष्ठित न हो, व्यावसायिकता की अंधी दौड़ में मेरा अखबार बढिया बाकी सभी औने पौने के साथ लाला जी की चाकरी करता हो, मगर अहम् का दंभ सबसे ज्यादा
सबको निष्ठा की सीख देने वाला क्या अपने प्रति निष्ठित है, अपने धर्म के प्रति निष्ठित है।
प्रश्न इसलिए क्यूंकि जिम्मेदारी और संवेदना से भरा हुआ है। मगर बदलते दौर के साथ बदलती पत्रकारिता में व्यवसायिकता का रस ने पत्रकारों से जिम्मेदारी और निष्ठा समाप्त कर दिया है। हमें कोई ऐतराज नही यदि आप व्यवसायिक पत्रकार हैं, मगर कहना सिर्फ़ इतना की आप व्यावसायिक हैं तो समाज का आइना मत बनिए। लाला जी का चाकर हमारा चौथा खम्भा कभी नही हो सकता।

24.6.08

जिस शहर में अख़बार ख़ुद ही हॉबी क्लासेस चलायें और उसे ही सांस्कृतिक विकास का पैमाना मानें, उस शहर में सांस्कृतिक पत्रकारिता का यह हश्र तो होना ही था

प्रेमचंद गाँधी

जयपुर शहर की पत्रकारिता में इन दिनों एक नया चलन देखने में आया है। मुख्य धारा के बड़े अखबारों ने शहर की खबरों से साहित्य कला और संस्कृति की खबरों का स्थान बेहद सीमित कर दिया है। शहर में यह हाल सिर्फ़ हिन्दी साहित्य और गंभीर सांस्कृतिक आयोजनों की रिपोर्टिंग में देखा जा सकता है। अंग्रेज़ी वालों के लिए, मुम्बैया, सेलेब्रिटी, कारपोरेट पूँजी से पोषित आयोजनों में इन अखबारों की पत्रकारिता यूँ लगाती है जैसे साहित्य-संस्कृति का सच्चा हाल इन दो कौडी के आयोजनों की तफसीली रिपोर्टिंग से ही सामने आएगा। कितना बुरा लगता है यह देखकर कि अपने ही साथी भाई बन्धु कलमकार कि मौत तक को छापने में इन अखबारों को तकलीफ होती है। आप हिन्दी साहित्य का राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आयोजन करके देख लें उसकी रिपोर्टिंग ऐसे होगी जैसे गली-मुहल्ले के किसी मन्दिर में होने वाले पौष बड़ों के कार्यक्रम से भी उसका स्तर बहुत छोटा हो। जयपुर के सांस्कृतिक संवाददाता अपने आप को किसी सिद्ध ज्ञानी-कलामनीशी से कम नही समझते हैं। खैर वो बेचारे तो कम वेतन वाले पार्ट टाइम नौसिखिये पत्रकार हैं उन्हें क्यों दोष दें।असल दोष तो उन लोगों का है जो ऊंचे ओहदों पे बैठे यह तय करते हैं कि अखबार में किस ख़बर को क्या महत्व मिलना चाहिए? शायद उन लोगों की नज़र में धार्मिक आयोजन ही सांस्कृतिक पत्रकारिता का पर्याय है, तभी तो जयपुर के अखबारों में आप धार्मिक खबरों से लिथडा हुआ, एक किस्म की साम्प्रदायिक बदबू से बजबजाता हुआ, अज्ञात कुलशील-अज्ञानी-महिला विरोधी-ढोंगी और प्रपंची साधू संतों के चूतिया किस्म के प्रवचनों से आच्छादित कूडेदान लायक पूरे का पूरा पेज रोजाना पढ़ सकते हैं। एक भेद की बात यह भी है कि अनेक मंदिरों के महंत सांस्कृतिक संवाददाताओं को प्रसाद के नाम पर खबरें छपवाने के लिए मोटे लिफाफे देते हैं, शायद इसलिए भी शहर की सांस्कृतिक पत्रकारिता में यह नया चलन आम हो रहा है। एक शानदार सांस्कृतिक परम्परा की विरासत वाला खूबसूरत शहर अखबारों में संस्कृति के नाम पर अवैज्ञानिक साम्प्रदायिकता की हद तक धार्मिक खबरों से लहूलुहान हो रहा है।एक वक्त था जब साहित्यकार को पत्रकार का बड़ा भाई कहा जाता था, वो इसलिए कि लेखक भाषा का नवाचार सिखाता है, लेकिन जयपुर शहर के अखबारों ने उन दो भाइयों को हिन्दी सिनेमा के डाइरेक्टर प्रोड्यूसर कि तर्ज़ पर बचपन में ही बिछुड़ा दिया है। पता नहीं इस पटकथा में इन दो भाइयों का मिलन लिखा भी है कि नहीं, कोई नहीं जानता। शहर के कलाकार-कलमकार पत्रकारिता में आए इस नए चलन से दुखी हैं लेकिन क्या किया जाए?जिस शहर में अख़बार के दफ्तर में सम्पादक अपने पत्रकार को अवज्ञा के कारण मुर्गा बना दे उस शहर की पत्रकारिता में संस्कृति की हालत सहज ही समझी जा सकती है। जिस शहर में अख़बार ख़ुद ही हॉबी क्लासेस चलायें और उसे ही सांस्कृतिक विकास का पैमाना मानें, उस शहर में सांस्कृतिक पत्रकारिता का यह हश्र तो होना ही था। और क्या कहें सिवाय इसके कि "बक रहा हूँ जुनून में क्या-क्या, कुछ न समझे खुदा करे कोई"।

19.6.08

मिशनरी पत्रकारिता के खिलाफ एक मिशनरी

दिग्गज पत्रकार और एसपी के बेहद करीबी रहे निर्मलेंदु जी ने पत्रकारिता के वर्तमान सन्दर्भों और दिक्कतों पर लेख लिखा है. उम्मीद है भड़ास के पाठक इस लेख को पढ़कर एसपी को कुछ-बहुत समझ सकेंगे। लेख का शीर्षक है....''मिशनरी पत्रकारिता के ख़िलाफ़ एक मिशनरी''

-हृदयेंद्र
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मिशनरी पत्रकारिता के ख़िलाफ़ एक मिशनरी
-निर्मलेंदु-
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नाम- एसपी सिंह
जन्म- 28 अप्रैल 1947
मृत्यु- 27 जून 1997

एसपी की मृत्यु पर हिंदीभाषी समाज में जो हार्दिक शोक देखा गया, वह अप्रत्याशित था। अप्रत्याशित इस अर्थ में की हिंदीभाषी समाज अपने लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों से एक तरह का तादात्म्य बोध नहीं रखता है, जिस तरह बांग्लाभाषी या मराठी भाषी समाज रखता है। इसके बहुत सारे कारण हैं, जिनकी जांच-पड़ताल का यहां अवकाश नहीं। हां, प्रसंग उपस्थित होने पर सिर्फ एक कारण की सामान्य चर्चा की जाएगी। इस बात में शक की कोई गुंजाइश ही नहीं की सुरेंद्र प्रताप सिंह के प्रति हिंदी समाज के प्रेम और उनकी मृत्यु से गहरा शोक-बोध करने के पीछे टेलीविजन पर उनका समाचार कार्यक्रम 'आज तक' था। उनके अधिकाँश प्रेमियों के मन में 'रविवार' के प्रखर सम्पादक के रूप में उनकी कोई खास पहचान नहीं थी। हो सकता है की 'आज तक' के कुछ दर्शक और श्रोताओं को 'रविवार' की स्मृति हो, पर उनकी संख्या नगण्य ही मानी जानी चाहिए।

प्रकारांतर से हम यहां एक सवाल जान-बूझ कर उठा रहे हैं की क्या टेलीविजन एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा कोई समाज, किसी से तादात्म्य बोध कर सके। हमारे खयाल में अगर टेलीविजन के माध्यम से तादात्म्य बोध होता भी है तो वह बहुत सतही स्तर पर होता है। गांधी जी को 'श्रवण पितृभक्त नाटक' पढ़कर और 'हरिश्चंद्र' नाटक देखकर श्रवण कुमार और हरिश्चंद्र से जो तादात्म्य बोध हुआ था, वैसा बोध कराने की क्षमता टेलीविजन के किसी उत्कृष्ट प्रोडक्शन में नहीं हो सकती, यह तो मान लेना चाहिए।

दरअसल, यह एक ऐसा माध्यम है, जो देखने वाले की जानकारी के स्तर को पार कर बोध के स्तर पर पहुंचने में अपनी ''प्रकृति'' से ( यह गलत शब्द है सही शब्द तंत्र होगा) ही अक्षम है। अपने इस एकतरफा स्वरूप के चलते टेलीविजन किसी समाज की सांस्कृतिक जड़ों तक नहीं पहुंच पाता और इन तक न पहुंच पाने के कारण वह दर्शक और श्रोता को एक सामाजिक व्यक्ति या समाज व्यक्ति के रूप में अपने को और दूसरों को पहचानने का अवकाश नहीं देता। फिर भी टेलीविजन को हम एक निष्प्राण भाषा की संज्ञा दे ही सकते हैं, क्यूंकि वह तादात्म्य का संचार तक नहीं कर सकती। वह एक वर्ग को देश के विशाल जन-समुदाय से अपने को अलग और विशिष्ट मानने का एकदम घटिया और सस्ते किस्म का आत्मसंतोष भर प्रदान कर सकती है। दूसरे, जब कोई समाज किसी से तादात्म्य अनुभव करता है, तो उसके कारण गहरे होते हैं। यह संयोग नहीं है की औद्योगिक व शहरी सभ्यता व्यक्ति-मानस में जो नीरसता और बेगानापन (एलिनिएशन) पैदा करती है, वही टेलीविजन मनोरंजन प्रदान करने की कोशिश में कर डालता है। टेलीविजन मनुष्य के बेगानेपन का एक चरम माध्यम है। यहां एसपी के संदर्भ में टेलीविजन के माध्यम पर मन में घुमड़ती कुछ पढ़ी-सुनी, अनुभव की गई बातें सरसरी तौर पर लिखी गई हैं, तो उनका उद्देश्य है आगे लिखी जाने वाली बात के लिए पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य प्राप्त करना। हमारा मानना तो यही है की एसपी से हिंदी समाज के तादात्म्य बोध का कारण हिंदी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा होना है और वह एक चरम बिंदु पर पहुंचने की प्रक्रिया में राजनैतिक बन जाता है-टेलीविजन के माध्यम से एकदम परे चला जाता है और टेलीविजन एक माध्यम के बजाय एक सुलभ साधन मात्र बन कर रह जाता है। एक अंतरविरोधी बात हमने लिखी है- एक तरफ हम एसपी के प्रति हिंदी समाज के तादात्म्य का कारण टेलीविजन को बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ एसपी से हिंदी जगत के तादात्म्य के कारणों को टेलीविजन के माध्यम से परे बता रहे हैं। इस अंतरविरोध को हमने एसपी की मृत्यु के दो महीने बाद पहचाना है, सो उसे बताने की थोड़ी ललक भी है। उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद टेलीविजन की दुनिया से ताल्लुक रखने वाले कुछ युवा लोगों से हमारी बातचीत हुई, कोलकाता में, तो हमने उनसे सुरेंद्र प्रताप सिंह के टेलीविजनी रूप या चरित्र के बारे में जानना चाह। उन्होंने जो कहा, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे, क्यूंकि हम यह माने बैठे थे की एसपी एक सफल टेलीविजन हस्ती थे.. सार रूप में इन युवा लोगों का कहना था- 'एसपी का कार्यक्रम बहुत अच्छे स्तर का नहीं था.. यह टैब्लाइड किस्म का यानी सनसनीखेज पत्र-पत्रिकाओं जैसा था। प्रणय राय के कार्यक्रम से उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती।

एस.पी. के पक्ष में अगर कोई बात कही जा सकती है, तो यही की वे हिंदी के दूरदर्शनी अंधों में काने राजा थे। उनका कार्यक्रम प्रणय राय की नकल था।

''एस.पी. ने कोई पायनियरिंग काम (नई शुरुआत करने वाला) नहीं किया।''

हमारे मन में आया की अजूबा पोशांको वाले, अपने को प्रकृति में पंगा मानने वाले इन अंगेरजीदां युवकों से पूछें की अगर प्रणय राय की मृत्यु हो जाए (ऐसी कामना करने का कोई सवाल ही नहीं उठता, यह तो बात को स्पष्ट करने के लिए लिखा जा रहा है) तो क्या उन लोगों को भी, जो प्रणव राय को महान मानते हैं और उनकी हर अदा पर फिदा हैं, वही शोक होगा, जो गरीब और लगभग निरक्षर हिंदीभाषियों को एसपी की मृत्यु पर हुआ है?

हमने उनसे अपने मन का सवाल नहीं किया, पर यह जरूर पूछा की 'एसपी की मृत्यु पर इतने हार्दिक शोक का आपको क्या कारण नजर आता है?

उनका उत्तर था, 'दूरदर्शन का चैनल सर्वत्र उपलब्ध है, दूसरे चैनल नहीं।

एसपी को यह चैनल उपलब्ध था.. यह एक हास्यास्पद जवाब था, पर मजे की बात तो यही है कि यही हास्यास्पदता तो 'ग्लोबल' के नाम से मशहूर है।

इस थोड़ी-सी कटु बातचीत से दो-तीन बातें दिमाग में काफी स्पष्ट हुईं- प्रणय राय भले ही देश के एक-डेढ़ प्रतिशत सुविधाभोगी और परजीबी अंग्रेजीदां वर्ग और इसमें शामिल होने को इच्छुक लोगों के लिए ''ikan'' (एक ऐसी प्रतिमा, जिसका भंजन बुरा माना जाता है) हां, पर इस एक-डेढ़ प्रतिशत वर्ग के लोगों के हृदय में भी (यदि वह हैं तो) प्रणय राय की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती, यदि अंग्रेजी छुट्टे बाजार और बहुराष्ट्रीय कमपनियों की सारी ताकतें लग जाएं, तो भी नहीं?

कुछ कारणों के चलते हिंदीभाषी समाज का एसपी से तादात्म्य हुआ और यह तादात्म्य उस कोटि तक पहुंचा, जिस कोटि में बांग्लाभाषी या मराठीभाषी या समाज अपने लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों से तादात्म्य बोध करता है.. हम यहां जब 'हिंदी समाज' कह रहे हैं तो हमारा आशय एक ऐसी समाज से है, जो अंग्रेजीदां न होने के कारण खास अर्थ में 'वर्ग विहीन' है, क्यूंकि जिसमें 800-1000 रुपये की मासिक आय पर पांच व्यक्तियों का परिवार चलाने वाले नि:स्वार्थ लोगों के साथ देश के 30-45 हजार रुपये तक मासिक खर्च करने वाले हिंदीभाषी और अंग्रेजियत तक पहुंच न पाए परिवार भी आएंगे। एसपी की मृत्यु पर उम्रदराज धनी हिंदीभाषी का शोक या अंग्रेजियत से कोसों दूर कस्बों के केंद्रीय सरकारी आइएएस की प्रिलिमिनरी (प्राथमिक) परीक्षा तक पास न कर पाने वाले हिंदीभाषी युवक का शोक एकाकार हो जाता है। एकाकार होने का कारण अंग्रेजी और अंग्रेजियत से वंचित लोगों के बीच एकता और और एकजुटता पैदा करने की संभावना का संकेत देता है, भले ही अभी वह नजर तक न आती हो..

टेलीविजन पर एसपी का समाचार कार्यक्रम सिर्फ ऐसे ही लोग नहीं देखते थे, जिनको अंग्रेजी बिल्कुल समझ में नहीं आती हमें यह जान थोड़ा अचरज हुआ की अंग्रेजी समझ सकने वाले हिंदी भाषी भी उस ''आज तक'' को देखते थे.. शायद इसीलिए यहां एक बात का खुलासा करना आवश्यक प्रतीत होता है..अंग्रेजी समझ सकने वाले हिंदुस्तानियों में तरह-तरह के स्तर हैं.. हमारे देश में तरह-तरह की
क्रांतियां हो रही हैं- संचार-क्रांति (जिसमें मोहल्ले की घटना का पता, वह जिस तरह घटी, उसके एक दम उलट अखबार या टेलीविजन में दिखाई देता है) पुरस्कार-क्रांति ( लेखन, गायन, वादन की ऐसी बाढ़ आ गई है, जिसे पुरस्कारों द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है) और शोध-क्रांति (जिसमें विश्वविद्यालयों से लेकर एनजीओ (स्वयंसेवी संगठनों) के तत्वावधान में हजारों की तादाद में शोध प्रबंध लिखे जा रहे हैं और सर्वेक्षण कराए जा रहे हैं) शोध क्रांति ने कुछ ऐसे क्षेत्रों को एकदम वर्जनीय मान रखा है, जिनसे नकल की असलियत का पता लगता हो।

अंग्रेजी जानने वाले या समझ सकने वाले हिंदुस्तानियों का सर्वेक्षण किया जाए और उन पर कोई शोध प्रबंध लिखा जाए तो बहुत अचरज भरी बातें सामने आएंगी..अंग्रेजी अखबार पढऩे वाले हिंदुस्तानी यह मानते हैं की वे अंग्रेजी जानते-समझते हैं, क्यूंकि ऐसा मानना उनके मानसिक स्वास्थ्य के बने रहने के लिए आवश्यक है.. विडंबना तो यह है की ऐसे हिंदुस्तानियों में हम खुद भी हैं.. लेकिन हमारे जैसे हिंदुस्तानियों में लालू यादव या इंद्र गुजराल या आडवाणी या बाल ठाकरे के बयानों और हत्या, बलात्कार, आगजनी की खबरों से आगे कुछ समझने का सामथ्र्य ही नहीं होता..

इस सिलसिले में मजाक के तौर पर पढ़ा गया एक चुटकुला यह है की खुशवंत सिंह का निहायत सादा सीदा कॉलम सिर्फ इसलिए पढ़ा जाता है, क्योंिक उसकी अंग्रेजी सटाक या फटाक से समझ में आ जाती है और हम दीन-हीन हिंदुस्तानियों को अंग्रेजी में लिखे एक हजार शब्द पूरी तरह समझ आ जाने पर परम संतोष का लाभ भी होता है..अंग्रेजी समझ सक ने वाले हिंदी भाषी हिंदी में समाचार नहीं सुनते.. मान-मर्दन के बोध के अलावा दो-तीन जायज कारण भी हैं.. हिंदी के समाचार अंग्रेजी के अनुवाद होते हैं और अक्सर अंग्रेजी की मक्खी पर हिंदी की मक्खी बैठाए जाने के कारण उन्हें समझने के लिए अंग्रेजी की मक्खी की कल्पना करनी पड़ती है या उसका अनुमान लगाना पड़ता है, इसके साथ अंग्रेजी समझने वाले हिंदीभाषी यह भी जानते हैं कि हिंदी समाचारों के चयन और उनकी पेश करने की शैली सम-सामयिक और नकल भी नहीं होती..

ऐसे में हिंदी में समाचार वे लोग ही चुनते हैं, जिन्हें अंग्रेजी बिल्कुल समझ में नहीं आती, हालांकि ये लोग इस हिंदी को भी अंग्रेजी भाषा के अनुवाद, कृत्रिमता और जीवन से दूर होने के कारण पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पाते, एक असंतोष उनमें रहता है, जिससे उन्हें मजबूरी में संतोष करना पड़ता है, इससे उनके मन में एक झूठ पैदा होता है कि हिंदी है ही एक ऐसी भाषा, जो सहज व बोधगम्य होना तो दूर रहा, कृत्रिम और अबूझ भी है, फिर 'ग्लोबीकरण' के जमाने में टेलीविजन कार्यक्रम पेश करने वाली कंपनियों ने अपने समाचार बुलेटिनों में जबरन अंग्रेजी शब्दों को ठूंस कर इस झूठ को और पक्का कर दिया है, ऐसे में एसपी ने बोलचाल और अपनी प्रकृति के अनुरूप हिंदी का व्यवहार कर अंग्रेजी न जानने वाले हिंदी भाषी को वह भरोसा दिलाया कि उसकी भाषा कोई गई-गुजरी भाषा नहीं- जाहिर है भरोसा हमेशा तादात्म्य स्थापित करता है, प्रेम पैदा करता है, जो कम बड़ी बात नहीं है।

यह लेख एसपी की मृत्यु पर एक श्रद्धांजलि के रूप में उनकी पत्रकारिता को ध्यान में रखकर लिखा जाना था, लेकिन कलम उठाते ही उनकी मृत्यु पर जो हार्दिक शोक दिखाई दिया, वह दिमाग पर छा गया, ऐसा शोक हिंदीभाषी समाज में कम ही देखा गया है।

एसपी का बाल्यकाल कलकत्ता से 40 किलोमीटर दूर श्याम नगर के गारुलिया में बीता था, 40-45 हजार की आबादी गारुलिया में है, एसपी की मृत्यु की खबर पहुंचते ही वहां की सारी दुकानें स्वत: बंद हो गईं, यह एक अनहोनी-सी बात लगी, क्योंकि अब दुकानें स्वत: बंद नहीं होतीं, बल्कि वे भय से ही बंद होती हैं, कोई समाजशास्त्री दुकानों के बंद होने के पीछे एक स्थानीय व्यक्ति के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने की बात कहेगा, वह शायद गलत भी नहीं कह रहा हो, पर अर्धसत्य जरूर कह रहा होगा, इस मामले में अर्धसत्य में ही सुंदरता निहित है, गारुलिया के लोगों के शोक को एसपी की ख्याति से जोडऩा भले ही कुछ अंशों में सही क्यों न हो, अन्यायपूर्ण लगता है, हम जिनका रौब मानते हैं, उनकी दिल से इज्जत नहीं करते, लेकिन गारुलिया के लोगों का मामला 'दिल' का मामला था। प्रकारांतर से यह हिंदीभाषी समाज के 'दिल' का भी मामला है, सो, लेख भटक गया और एसपी की पत्रकारिता पर लिखना रह गया, एक संपादक और पत्रकार के रूप में एसपी ने हिंदी पत्रकारिता में एक नई शुरुआत करने की कोशिश की, यह सोच-समझ कर नहीं, बल्कि उनके अपने व्यक्तित्व के कारण की जाने वाली कोशिश थी सो, उसे 'कोशिश' कहना हमें कहीं एसपी के साथ जबरदस्ती करना या उन्हें महिमामंडित करना ही जान पड़ता है, कोशिश हमेशा प्रयत्न साध्य होती है और वह वस्तुस्थिति को बदलने और एक आदर्श स्थिति पैदा करने के संकल्प के साथ जुड़ी होती है। ऐसे संपादक और पत्रकार के रूप में तत्काल एक ही नाम याद आता है और वह है गणेश शंकर विद्यार्थी,बाबू बालमुकुंद गुप्त, विष्णु पराड़कर जी और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का भी, विद्यार्थी जी ने अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में अपना अखबार भी निकाला 'प्रताप' देश सेवा का एक मिशन था।

विद्यार्थी जी की छवि सामने रखने पर एसपी की पत्रकारिता को समझने में सुविधा होगी, विद्यार्थी जी एक आदर्श पुरुष थे, और एसपी एक 'रोल मॉडल' रोल मॉडल का ठीक -ठीक हिंदी अनुवाद संभव नहीं, क्योंकि यह औद्योगिक संस्कृति का शब्द है, जबकि हिंदी एक कृषि संस्कृति की नागर भाषा है।

औद्योगिक संस्कृति में आदर्श नहीं होते, उत्पादन के लक्ष्य होते हैं, 'रोल मॉडल' का हिंदी में आशय एक ऐसे व्यक्ति से होगा, जिसका अनुसरण कर उत्कृष्टता प्राप्त की जा सके या अपना काम करते हुए दिमाग में जिसका प्रतिरूप हमारे सामने रहे, विद्यार्थी जी को सामने रखना किसी भी संपादक -पत्रकार को छोटा दिखाने के लिए पर्याप्त है, लेकिन हम यहां एक उल्टी कोशिश कर रहे हैं-उन्हें सामने रख कर एसपी की विशिष्टता बताना चाह रहे हैं, हमारे खयाल में एसपी हिंदी के पहले पत्रकार और संपादक थे, जिन्होंने अखबार को न केवल एक उद्योग के रूप में देखा, बल्कि पहचाना भी, शायद इसीलिए वे मानते थे कि अखबार भी रोजी-रोटी का एक माध्यम है, विद्यार्थी जी के जमाने में अखबार उद्योग नहीं था, इसके बावजूद उन्होंने अपनी दूरदृष्टि से यह जरूर पहचाना था कि अखबारों का आगे जाकर क्या स्वरूप हो सकता है, इस पहचान में अखबार के स्वयं एक उद्योग बन जाने की बात निहित न थी, यह कौन कल्पना कर सकता था कि आजादी के 58 वर्ष बाद आजाद हिंदुस्तान की सरकार देश को आर्थिक गुलामी की जंजीरों में कस देगी। अखबारों के उद्योग बनने की प्रक्रिया आजादी के बाद शुरू हुई और अब वह अपने वीभत्स रूप में सबको दिखाई पड़ रही है, एसपी की खूबी यह है कि उन्होंने अन्य संपादकों और पत्रकारों की तरह मिशनरी बनाने की 'पाखंडपूर्ण' बातें न कर इस वास्तविकता को रचनात्मक रूप देने की भरपूर कोशिश की पाखंड न करना एक गुण है, पर दरअसल, वह एक नकारात्मक गुण ही है, सकारात्मक नहीं, मसलन, मधु दंडवते भ्रष्टाचारी नहीं हैं, पर उनके भ्रष्टाचारी न होने की कोई सार्थकता नहीं है, क्योंकि उन नीतियों का, जिन्हें गलत मानने की वे सार्वजनिक मंच से घोषणा कर चुके हैं, पालन कर रहे हैं, एसपी में पाखंड नहीं था, यही उनको हिंदी के दूसरे संपादकों की तुलना में प्रशंसनीय बनाता है।

उसकी प्रशंसा करने के अन्य बहुतेरे कारण हैं, हमारा खयाल है कि पाखंड से अपनी सहज स्वाभाविक चिढ़ के कारण उन्होंने स्वयं अपने को गलत समझने की गल्ती की, जब हम यह लिख रहे हैं, तो कोई द्रविड़ प्राणायाम कर उनकी प्रशंसा करने का कौशल अपना नहीं रहे हैं, वरन एक मार्मिक सत्य को उजागर करने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी मृत्यु से लगभग दो सप्ताह पहले जनसत्ता ने उन पर पूरे एक पृष्ठ की सामग्री छापी थी, जिसमें उनका एक इंटरव्यू भी था, इसमें उन्होंने कहा मैंने किसी मिशन के तहत पत्रकारिता नहीं की, मेरी प्रतिबद्धता मेरे पेशे के प्रति है। दरअसल, उनके इस कथन से यह साफ झलकता है कि वे पत्रकारिता को एक पेशे के अलावा और कुछ भी नहीं मानते थे। लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि उनकी प्रतिबद्धता उनके पेशे के प्रति है, हालांकि एसपी ने तो यह बात कह दी, लेकिन कहते वक्त शायद वे यह भूल गये कि किसी भी पेशे के प्रति प्रतिबद्धता होने का मतलब यह है कि वे एक मिशन के तहत काम कर रहे हैं, किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता अंतत: मिशनरी ही होती है, मुझे लगता है कि शब्दों के छिछोरे इस्तेमाल ने मिशन शब्द का अर्थ ढोंग बना दिया है,एसपी के व्यक्तित्व का एक नकारात्मक पक्ष यह है कि उन्होंने कभी खुद अपने कृतित्व को पत्रकार की दृष्टि से नहीं देखा, दरअसल, इंटरव्यू लेनेवाले को एसपी के इस जवाब पर पलट कर यह पूछना चाहिए था कि क्या किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता अंतत: मिशनरी नहीं बन जाती? यह इंटरव्यू लेने वाले ने नहीं पूछा और हम नहीं जानते कि एसपी इसका क्या जवाब देते?

लेकिन इतना निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वे भारी परेशानी में पड़ते, यदि वे यह कहते कि वे मिशन के तहत पत्रकारिता कर रहे हैं, क्योंकि अपने को किसी भी रूप में मिशनरी मानना उनके लिए असंभव था सो, गणेश जी ने ही लगभग 6 से 7 साल पहले या शायद उससे भी पहले पत्रकारिता के व्यावसायिक हो जाने के खतरे पर एक लम्बा लेख लिखा था, इस लेख में मंत्री जी ने व्यावसायिकता के खतरे को स्वीकार करते हुए अपने पेशे के प्रति पत्रकार की प्रतिबद्धता को ही व्यावसायिकता की काट बताया था, उस वक्त हमें यह लगा था कि मंत्री जी एक अति सरलीकृत बात कह रहे हैं, लेकिन आज जब पत्रकारिता एक दम बाजारू हो गयी है, तो उनकी बात का मर्म समझ में आता है, एक वैकल्पिक
पत्रकारिता के विकसित होने और सत्तारूढ़ होने के लिए बाजार की शक्तियों यानी पूंजीवाद के खिलाफ जनशक्ति का उत्थान आवश्यक है, याद रखें, एक सच्ची वैकल्पिक पत्रकारिता तभी संभव हो सकती है, जब वह विज्ञापनों से मुक्त हो जहां विज्ञापनों के लिए जगह नहीं होगी, वहीं सच्ची पत्रकारिता हो सकती है, क्योंकि बाजारवाद इस तरह से हावी है कि आप चाह कर भी पत्रकारिता नहीं कर सकते? और यह एसपी को बहुत पहले ही समझ आ गयी थी, इसीलिए वे कभी मिशनरी की बात नहीं किया करते थे, बल्कि उन्हें मिशनरी कहने वालों से सख्त चिढ़ थी।

यानी वे कहना यही चाहते थे कि यदि अपने पेशे के प्रति पत्रकार समर्पित हों, तो पत्रकारिता बची रह सकती है, निष्ठा और ईमानदारी से किया हुआ काम कभी भी बेकार नहीं जाता, वे यही कहना चाहते थे शायद दरअसल, हर चीज के विकल्प हमेशा होते हैं और उन्हें मौजूदा व्यवस्था में ही ढूंढना पड़ता है, मंत्री जी (गणेश ) का वह लेख एसपी को याद था या नहीं, यह तो हमें पता नहीं, पर हमारे खयाल से जब वह अपनी प्रतिबद्धता की बात कर रहे थे, तो उनका मतलब निश्चय ही पत्रकारिता से प्रतिबद्धता का वह अर्थ नहीं था, जो अमूमन लोग लगाते हैं।

किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता, जैसे किसी लेख के लिए सबसे बड़ी प्रतिबद्धता उनके अपने लेखन से है, वैसे किसी पत्रकार के लिए प्रतिबद्धता पत्रकारिता से होना बहुत ही स्वाभाविक है, टालस्टॉय महान लेखक थे, तो उनकी महानता का कारण उनके विचार नहीं थे, बल्कि लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी, जो सत्य को पहचानती थी, और यही लेखन उन्हें महान बनाता है, इसका मतलब यह है कि अपने पेशे से प्रतिबद्धता न रखना एक डॉक्टर और एक शिक्षक को ही नहीं, बल्कि एक व्यापारी तक को समाज के प्रति दायित्वहीन बना सकता है, अपने पेशे के प्रति अगर पत्रकार प्रतिबद्ध हों, तो कितने ही बड़े बड़े पूंजीपति पत्रकार क्यों न बन जाएं, क्यों न जन्म ले लें, अंतत: पत्रकारिता बची ही रहेगी, उस पर किसी तरह की आंच नहीं आएगी...

1.5.08

.....राम-नाम सुंदर करतारी। छापो-छापो नंगी नारी।।

हमेशा की तरह इंटरनेट की उन गलियों में घुस जाता हूं जहां शराफ़त अली किस्म के लोग नहीं जाते। एक गली खोद रखी है अपने जे.पी. भइया ने और आज तो उस गली से मुझे कुछ दोहे-छंद वगैरह की आवाज आती सुनाई दी तो हमें लगा कि क्या हुआ भइया बीमार हो गये क्या जो रामायणनुमा कुछ बड़बड़ा रहे हैं; अंदर जाने पर पता चला कि रामायण नहीं बल्कि अखबारायण चल रही है। आप लोग को भी जरा पुण्य जैसा कुछ कमा लीजिये इन पवित्रता का रस टपकाते दोहों को ताकि अगर पत्रकारिता के पाप सता रहे हों तो इनके मनन-वाचन से धुल जाएं.........


......पत्तरकारों, हाय तुम्हारी यही कहानी!.......

1....
नचवावैं अखबार गोसाईं। नाचत नर मरकट की नाईं।।

2....
खबर बेंचते संता-बंता। हरि अनंत, हरि कथा अनंता।।

3....
सत्ता, श्वान, डॉन, अखबारी। सबहि ताड़ना के अधिकारी।

4.....
खबर-खबर खबराते बंदर। कूद पड़े लंका के अंदर।।

5.....
नाचो खूब, नचाओ रंभा। चोंथो-चोंथो चौथा खंभा।।

6....
सिया-राम मय सब जग जानी। पढ़ो-पढ़ाओ खबर पुरानी।।

7......
मंगल भवन, अमंगल हारी। नाम मीडिया, काम कहारी।।

8......
राम-नाम सुंदर करतारी। छापो-छापो नंगी नारी।।

9......
लिखते-लिखते खबर हुंआसी। मूड़ मूड़ाय भये संन्यासी।।

10.......
टेंशन में दिन-रात और आंखों में पानी। पत्तरकारों हाय तुम्हारी यही कहानी।।

(साभारः बेहया से)

28.4.08

नौकरी अखबार की, बनिया-बक्काल की, जय कन्हैया लाल की...

--जेपी नारायण--

वह आज भी अपने शब्दों से सबको गाजर-मूली की तरह काट रहा है। उसी की डायरी से चुराए गए कुछ पन्ने आज यहां आप भी पढ़ लीजिए। जान जाएंगे कि हालात किस कदर संगीन हैं। भीतर कितनी बेचैनी और गुस्सा है। कैसे एक-एक जबड़े में बीस-बीस अंगुलियां घुसी हुई हैं। ....और उनके बीच से रिस-रिस कर बाहर आ रही है कविताओं के सुर में गालियों की चिंगारी....

1....
ढाई बजे रात को

खाता हूं पीता हूं ढाई बजे रात को।
जो जीवन जीता हूं ढाई बजे रात को।
परवरिश घर-परिवार की,
नौकरी अखबार की,
बनिया-बक्काल की,
सत्ता के दलाल दमड़ीलाल की,
धूर्त, चापलूस, चुगलखोर हैं संघाती,
घाती-प्रतिघाती,
उनके ऊपर बैठे हिटलर के नाती,
नौकरी जाये किसी की तो मुस्कराते हैं,
ठहाके लगाते हैं, तालियां बजाते हैं,
मालिक की खाते हैं,
मालिक की गाते हैं,
मालिक को देखते ही
खूब दुम हिलाते हैं,
बड़े-बड़े पत्रकार,
हू-ब-हू रंगे सियार,
इन्हीं के बीच कटी जा रही जिंदगी,
सरसों-सी छिंटी-बंटी जा रही जिंदगी,
अपनी गरीबी और मैं,
चार बच्चे, बीवी और मैं,
महंगी में कैसे जीऊं,
वही पैबंदी कैसे सीऊं,
रोज-रोज सीता हूं ढाई बजे रात को।
खाता हूं, पीता हूं ढाई बजे रात को।
बैठा है कमीशन तनख्वाह बढ़ाएगा,
सात साल हो गए
लगता है फिर मालिक पट्टी पढ़ा़एगा,
दो सौ किलो मीटर प्रतिघंटा महंगाई की चाल,
जेब ठनठन गोपाल।
मकान का किराया
और दुकान की उधारी,
रूखी-सूखी सब्जी
और रोटी की मारामारी,
साल भर से एक किलो दूध का तकादा,
इसी में फट गया कुर्ता हरामजादा,
दिमाग में गोबर, आंख में रोशनाई
फूटी कौड़ी नहीं, आज सब्जी कैसे आई,
सोचता सुभीता हूं, ढाई बजे रात को।
खाता हूं, पीता हूं, ढाई बजे रात को।


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2.....
सुनो कालीचरन!

पत्रकारिता तो अब
जूते की नोक पर होगी कालीचरन!
क्योंकि मिशन गया तेल लेने
और कलम गयी गदहिया की गां.... में।
आगया तो आ ही गया
कंप्यूटर,
उसी पर रात-दिन छींको-पादो,
आंख फोड़ो
हाथ जोड़ो
चार पैसा कमाओ,
घर जाओ,
बाल-बच्चों का पेट पालो।
वरना ....की....चू.....
पत्रकारिता का भूत
कहीं का नहीं रहने देगा तुम्हें,
रोओगे-रिरिआओगे,
एक अदद अंडरवियर के लिए
रिक्शे के पायदान पर
हांफते नजर आओगे,
कहां धरी है नौकरी
नहीं करना तो क्यों करी?
करना है तो कर,
जूते की नोक पर,
संभाल अपना पेट, अपना घर।
कुंए में भांग पड़ी है
विदेशी पूंजी सामने खड़ी है।
वो देख,
उधर ब...न के लं...वी-सेट
आ गया इंटरनेट
गेटअप, मेकअप अप-टू-डेट,
चकाचक्क, भकाभक्क,
विश्वसुंदरी पत्रकारिता के उन्नत ...तड़ों से
झड़तीं एक से एक गोबड़उला खबरें धक्कामार
सात समुंदर आरपार,
सर्रसर्र, फर्रफर्र शेयर बाजार,
कहीं चढ़ाव, कहीं उतार,
और पूंजी की रेलमपेल
देख-देख ....दरचो....
अखबारी खेल,
मिशन गया लेने तेल
खबर गयी कलम के भो...ड़े में
स्साला भाड़
फट गयी गां....
छींक-पाद,
हरामी की औलाद
पराड़कर का च.......ओ...द्दा।
पत्रकारिता होगी अब कलम की नोक पर.............


3......
अंडू वन-डे का फोरमैन

घूर-घूर कर मुस्कराता है
छापेखाने का फोरमैन,
सनसनीखेज खबरों से अंटे अखबार की तरह
लाल-लाल डोरोंवाली एक जोड़ी आंखें...
आंखों के बीच से झांकतीं
अधपकी मूंछों तक
निरंतर तनी नासिका
और पान की जर्दीली पीक से
पपड़ाये होठों पर बार-बार
चक्कर लगाता रक्ताभ-जिह्वाग्र....
घूरते हुए मुस्काना
मुस्काते हुए डांटना,
फिर डांट-डपट, गाली-गलौज
और हाथापाई पर उतर आना फोरमैन की
बेमियादी बीमारी है।
अखबार के दफ्तर में
इकत्तीस साल से डोल रहे हैं बूढ़ी मशीनों पर
उसके जवान हाथ
जिसकी जुबान खबरचियों की खबर लेने के
सारे गुर आजमा चुकी है।
अपनी इकत्तीस साल की दुनिया का
खबरदार पन्ना है बूढ़ा फोरमैन,
जिसके होशो-हवास पर तीन दशकों का
अखबारी अतीत दर्ज है।
संपादकों, संवाददाताओं, चपरासियों, आपरेटरों, मशीनमैनों की
भीड़ जुटने से, अखबारी सुबह होने तक
इस-उस से
अथ-इति होने तक
क्या कुछ नहीं कह डालता है
अंडू वन-डे का फोरमैन...

नौसिखिये संपादकों को नहीं मालूम
कि कैसे भागती हैं खबरें,
उन्हें पकड़ना होता है पाठकों की सुबह
और सेठ की तिजोरी
एक साथ!

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(साभार : http://behaya.blogspot.com)

27.4.08

पत्रकारिता तो गई गदहिया के उसमें ए रामू!

जेपी नारायण

पूंजी लूटने का इस समय सबसे मजबूत मोहरा मीडिया। बातें क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस) काल्पनिक पात्रों के माध्यम से। पत्रकारों ही नहीं, पूरे सिस्टम के मन की गांठें खुद-ब-खुद खुलती जा रही हैं....कितने धूर्त और लंपट हैं मीडिया के भारतीय आकाश पर चमकते कुछ चांद-सितारे, एक-एक चेहरे पर कई-कई चेहरे चढ़ाये हुए, कर्मचारियों को हुरपेटते हुए और अपने हुजूरों के सामने दुम दुबकाए हुए, कैसे-कैसे खोखलेजी दर्शन और राजनीति के महामहोपाध्याय बने डोल रहे हैं, और अंदर खाने मचा हुआ है हाहाकार। हर अखबार या चैनल का हर तीसरा आदमी अपने हालात से उकताया हुआ कहीं और नौकरी पाने की जुगाड़ या ताक में। यानी भीतर-ही-भीतर पानी खदबदा रहा है।

1. विनोद मदहोशी जी देश के सबसे बड़े अखबार के सबसे बड़े संपादक हैं। अपनी लखटकिया नौकरी बरकरार रखने के लिए रोजमर्रा के अखबारी कुकर्म निपटाते हुए, हर किसी को हूल-पट्टी पढ़ाते हुए, अपने ऊपर वाले से रिरियाते, नीचे वाले से खिखियाते हुए, स्वदेशी से विदेशी पूंजी तक के गुणा-भाग लगाते हुए, सपने में भी एनसीआर-एनसीआर गुनगुनाते हुए हर हफ्ते अपने अखबार में चोंतभर बस्सैनी लीद फिर देते हैं। लफ्फाजी फिरना उनका पुराना शगल है। इसके बाद शुरू होता है दूसरे पायदान पर यानी दूसरे नंबर के मातहत का लाजवाब अल्हैती-गायन। वाह्ह-वाह्ह, वाह्ह-वाह्ह। आज तो आपने कलम तोड़कर रख दी। आपका लेख पढ़के अब तक सीएम-पीएम गश खा चुके होंगे। हीहीहीहीहीहीही....

2. मदहोशी जी होश-हुनर के पूरे हैं, पक्के पहाड़ी घूरे हैं। आज कल मैदानी क्षेत्रों में मैदान किए जा रहे हैं। उनके अखबार में नौकरी की पहली शर्त है पहाड़ी होना। आप पहाड़ के नहीं तो किसी काम के नहीं। उनकी लालटेन सिर्फ पहाड़ पर जलती है। मैदानी के नाम पर भुकभुकाने लगती है। मीडिया में ये खफ्तुलहवासी किस्म का क्षेत्रीयतावाद कहा जा सकता है। उनके इर्द-गिर्द पल रहे मैदानी भाई-बंधु मन-ही-मन कलपते रहते हैं, मसोसते रहते हैं कि काश हम भी होते पहाड़ के डब्लू-बब्लू ....। सालो से पहाड़ी दर्रे में बेमतलब दरकचा रहे हैं। न कोई इंक्रीमेंट, न प्रमोशन। ऐसे लोग धीरे-धीरे या तो इधर-उधर, अगल-बगल के ठिकानों की ओर लपक रहे हैं, खिसक रहे हैं या झक्क में शाम को तीन-चार पैग सूत कर पट्ट हो ले रहे हैं।

3. एक हैं मिहिर जी। देश के धक्काड़ जर्नलिस्ट। तीन दशक से दिल्ली के चुनिंदा मठाधीशों में एक। उनका एक अदद मकसद होता है सत्ता के चरणों में लार पौटाते रहना। लार पौटाते-पौटाते फूलकर गैंडा हो चुके हैं। सियासत और मीडिया के विविध आयामों के साथ इन दिनों करोड़ों में खेल रहे हैं। उनकी पत्रकारिता से भौचक्के कई और वनगैंडे ताल-में-ताल मिलाकर वैसा ही हो लेने के लिए सालो से बेकरार हैं, लेकिन किल्ली-कांटा बैठ नहीं रहा। सो, यदा-कदा मिहिर जी के साथ मय-मेहमानी के दौरान कसीदे पढ़ते रहते हैं, अभिभूत होते रहते हैं, देश-विदेश की राजनीति पर अपनी पंडिताई झाड़ते रहते हैं। इन अट्ठों-पट्ठों की नब्ज से पूरी तरह वाकिफ मिहिर जी उनकी बातों पर भंगेड़ी धृटराष्ट्र की तरह मंद-मंद मुस्काते रहते हैं। खुदा-न-खास्ता किसी पर मेहरबान हुए तो किसी विदेशी थैलीचोर से दो-चार करोड़ का सौदा कराते हुए कहते हैं, जाओ वत्स! अपने स्वामी के चरणों में लोट जाओ....!!

4. बकचोद जी किसी टाइम्स-फाइम्स के कलमगीर रहे हैं। देश के नामी सटायरबाज हैं। अपने और अपने संस्थान को छोड़ पूरी दुनिया पर अपनी कुंद-कलम के बंदूक चलाते फिरते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके पीछे सीख-पढ़कर पास दो-तीन दर्जन कुख्यात पत्रकारों का गिरोह बटमारी करता रहता है। यूपी के माफियाओं के साथ उनकी अच्छी ऊठक-बैठकी है। उनके साथ तूतक-तूतक तूतिया करते-करते बकचोद जी खुद को ही एक समय में तो पत्रकारिता का सबसे बड़ा माफिया मानने लगे। अपनी इज्जत-बेइज्जत से बेफिक्र, मान-सम्मान से परे संतई मुद्रा में कुछ दिनों से इतने आभाहीन और पिनकी हो चुके हैं कि अपने अखबार समूह के पुरखों को भद्दी-भद्दी गालियां देते रहते हैं। कहते हैं...कितना-कुछ किया हरामखोरों के लिए, झुंड-के-झुंड पत्रकार कौड़ियों में टांग लाये, पन्ना-का-पन्ना विज्ञापनों के अंबार लगा दिए और आज मुझे ये दिन देखने पड़ रहे हैं। कभी सिर्फ विदेशों में पिकनिक किया करते थे, आजकल मोहल्ले वालों से पान मसाला के पैसे मांगने पड़ते हैं।

5. प्रणामी जी, अभी कुछ ही दिन हुए प्रधान संपादक पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। सारा खून अपने अखबार को पिलाकर पूरा देह ठठरी भर बचा है। रिटायरमेंट के दो ही महीने में चेहरा आरके लक्ष्मणन का कार्टून हो चला है। पत्रकारिता पर किताबें लिखते रहे हैं। उनके पढ़े शिष्य कभी-कभार दिलासा देते रहते हैं कि अफसोस मत करो गुरू जी, अंत में सबकी यही गत होती है। आपको कंधा देने वालों की लाइन लग जाएगी। क्या खूब हेडिंग लगाते थे आप, क्या खूब संपादकीय लिखते थे। ...और आज आपका कोई नामलेवा नहीं। अगर आप अपने आखिरी दिनों में बौरा नहीं गए होते तो आज ये दिन नहीं देखने पड़ते। आपसे मिलने आना चाहता हूं, लेकिन आपकी कटखनी बीवी से बड़ा डर लगता है, अब तो वह और सठिया गई होगी।

6. बिरजू प्रधान मीडिया में लच्छू घराने से आये हैं। लच्छू घराना पत्रकारिता के लक्ष्योन्मुखी मिशन के लिए मशहूर रहा है। सबसे पहले पराड़कर जी ने इस घराने को दीक्षित किया था। आजकल इस घराने के ज्यादातर लोग कटहल छील रहे हैं। बिरजू प्रधान की कटहली-पत्रकारिता से अभिभूत एक भूतपूर्व सीएम ने उन्हें उनके घर पहुंचकर एक लाख की कट्टू उपाधि से नवाजा था। बिरजू प्रधान का मझला बेटा कुछ दिनो पहले ब्लू फिल्मो की सीडी सप्लाई करते हुए पकड़ा गया है।

7. मीडिया जगत में दिगंबर दादा के नाम से प्रसिद्ध दिग्गू जी रिटायर होने के बाद भी कर्मचारियों का खून पी रहे हैं। चंदन-टीका लगाकर ठीक दस बजे दफ्तर में आकर बैठ जाते हैं। दिन भर भीतर मालिक से तीया-पांचा भिड़ाते रहते हैं, बाहर संपादकीय कर्मियों में से किसी घर की बिजली ठीक कराने, किसी को मोहल्ले की सड़क पर डामर डलवाने, किसी को अपनी खटारा (जो कभी मालिक की थी ) की सर्विस कराने तो किसी को लादकर घर पहुंचाने का हुकुम सुनाते रहते हैं। सबसे ज्यादा आजिज तो दफ्तर का चपरासी रामभरोसे। भुनभुनाता रहता है....लगता है मुझे ही चार डंडा बजाकर इसे निपटाना पड़ेगा, नौकरी रहे चाहे जाय। साला बात-बात पर तू-तड़ाक करता है, दिन भर में पचास गिलास पानी पीता है, आधा थूकदान में गुड़गुड़ा देता है।

8. महासंपादक भुवनचंद्र आज कल इस बात से बहुत हैरान-परेशान हैं कि हर कर्मचारी उनके पीठ पीछे उन्हें गाली क्यों देता है? गाली भी कोई हल्की-फुल्की नहीं कि पीछे से डालकर आगे से निकाल लूंगा। क्यों? .....कि मालिक के चेंबर में बैठकर हम लोगों की चारपाई बुनता रहता है। अब बहुत हो गया। बुनो चारपाई, हम तो इकट्ठे खाट खड़ी करने वाले हैं। तब न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। बहुत हो गई नौकरी....पीछे से डालकर आगे से निकाल लूंगा। ...ऐं...सच्ची....ऐसा क्या? आखिर इतने गुस्से की कोई खास वजह? हां-हां, है ना। दफ्तर की लड़कियों से पेंच लड़ाता रहता है। वे भी सब समझती हैं। कहीं लड़कियां ही न किसी दिन बीच दफ्तर बीन बजा दें।

9. मीडिया की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए हैं। टुंडा ने अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए जो तरकीबें इजाद की हैं, बाकी सभी चैनल पीछे-पीछे उसी राह पर चल पड़े हैं। वेश्याओं का स्टिंग आपरेशन करो। हिरोइनो को चड्ढी-चोली में कैटवाक कराओ। नई पीढ़ी के साथ कोकशास्त्र पर डिबेट करो। एकरिंग के लिए पहली शर्त होगी बार गर्ल होना या जेंट्स है तो एक झटके में नीड अद्धा सुड़ुक जाना। नारी उत्थान कार्यक्रम में सहवास की दशा-दिशा से दर्शकों को रू-ब-रू कराना। नुस्खे कामयाब रहे। टीआरपी धांय-धांय बढ़ रही है। कोठों पर मुर्दनी छायी हुई है। ब्ल्यू सीडी का धंधा करने वालों को सांप सूंघ गया है। टुंडा मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। अब वे सीडी के बजाय डाइरेक्ट इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सरकार से लाइसेंस मांगने वाले हैं। कोठा तो कोठा, एक कोठा और सही।

10. आइए आखिर में स्तंभकार जोगिंदर जी की चार लाइनें आपको भी सुनवाइ देते हैं.....

नाचो खूब नचाओ रंभा....
चोंथो-चोंथो चौथा खंभा....
पत्रकारिता तो गई गदहिया के उसमें ए रामू!

सभी नाम काल्पनिक, बाकी सब सही-सही
((पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पापः भाग चार : साभार : बेहया http://behaya.blogspot.com))

26.4.08

पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप, टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!, बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!

1--------
पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप


पत्रकारिता के लिए आज सबसे फिट और एकल संबोधन है...मीडिया मार्केट। कोई मिशन-फिशन नहीं रहा। शुद्ध धंधा। जैसी की पहली पोस्ट पर कुछ मित्रों की लिखित-मौखिक प्रतिक्रियाएं रहीं, उनके या अन्य किसी के अंदेशे का मैं यहां समन करने नहीं जा रहा, न ही सोदाहरण इस पर यहां कुछ लिखने-पढ़ने या भंडाफोड़ जैसी सनसनी परोसने की मेरी मंशा है। क्योंकि शीत-पीत पत्रकारिता के झंडाबरदार इस पर पहले ही काफी कुछ कागजी शेखियां बघार चुके हैं। यहां मैं अपनी बात क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस)काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखने जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जाएंगे....

.....घीसू-माधव एक ही अखबार में काम करते हैं। घीसू (आत्मा से) मर चुका है। माधव मर रहा है। दोनों ने तिल-तिल मौत का रिहर्सल और एहसास भी किया है।

....घीसू का बेटा शहर के सबसे महंगे कान्वेंट स्कूल में पढ़ रहा है। उसके पास एसी गाड़ी, शहर के सबसे पॉश इलाके में शानदार बंगला और पत्रकारिता की दुनिया में उसका क्या खूब बिकाऊ-टिकाऊ नाम है।

....माधव अभी पत्रकारिता के पराड़करी तर्पण में अस्तव्यस्त है। गर्मियां मटके के पानी में बीत जाती हैं, बच्चे गांव की पाठशाला में नाक पोंछ रहे हैं। पत्नी १८ की उमर में ३८ की हो चली है। बूझो तो जानें कि माधव की मौत और घीसू की जिंदगी के अर्थ क्या हैं?

......घीसू क्राइम रिपोर्टर है। माधव को दफ्तर में अपने बड़ों के पैर छूने नहीं आता। घीसू को मालूम है कि किस सर के घर शराब की पेटी पहुंचानी है, किस सर के खाने की टिफिन उनकी मेज पर लगानी है, किस सर के कपड़े प्रेस कराना है, किस सर का बच्चा जब जोर जोर से रोता है तो कौन सी टाफी खिलाने पर चुप हो जाता है।

.....एक बार घीसू अपने स्वामी के चेंबर में दबे पांव घुसा कई कुंतल विनम्रता ओढ़े हुए, पूरी आस्था से दांत निपोरे हुए। बोला, सर आपको देखकर मुझे अपने पिता की याद आती है। आप मेरे पिता समान है। स्वामी बोले, वो तो मेरे यहां नौकरी करने वाला हर कर्मचारी मुझे पापा कहता है। जब दूसरे अखबार में जाता है तो वहां के स्वामी उसके पापा हो जाते हैं। तुम जैसे कर्मचारियों के बीच मैं यूं ही टकलू नहीं हुआ हूं।

....एक बार स्वामी को हंसते हुए देखकर माधव को हंसी आ गई। स्वामी का चौंकना स्वाभाविक था कि जब मेरे इर्द-गिर्द खड़े इतने बड़े-बड़े महानुभाव (दर चापलूस) मेरी हंसी के डर से घर तक पत्नी-बच्चों को डांट भगाते हैं, फिर इस ट्रेनीज कमीनगी के मायने क्या हो सकते हैं? माधव आज तक स्वामी की हंसी और अपने डिमोशन का अंतर नहीं समझ पाया।

....घीसू की बीवी एक कथित राष्ट्रीय दल की जब्बर दलैत है। बेटा थानों से चौथ वसूलता है। (पुत्र के परमानेंट होने के बाद से) पिता शहर के नामी समाजसेवी हैं। हर महीने, हर थाने से उनके नाम सफेद लिफाफा आता है। अखबार के फोटोग्राफर ने घीसू के बच्चों की अब तक आठ दर्जन से ज्यादा तस्वीरें खींचीं हैं। शहर के सिपाहियों के दबादले की सूची घीसू की माता जी बनाती हैं।

....माधव की मां तपेदिक से मर चुकी है। पिता गठिया का मरीज है। बाकी बीवी-बच्चों के बारे में हर किसी को पता है।

......घीसू के पास कई बीवियां हैं। कई दुकानों से उसके यहां शराब की पेटियां आती हैं। हर रिक्शे वाला उसके बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए लालायित रहता है। बीवियां थाने से नीलामी की गाड़ियां उठवाती हैं।

.....ड्यूटी से छूटने के बाद माधव शराब पीता है और गालियां देता है। कहता है, आज तक मुझे कभी जेल की सजा नहीं हुई। सोचता हूं, एक बार ३०७ में जेल हो आऊं!

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2-----------------
टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!


1. पत्रकारिता एक माल है, निजी संपत्ति जुटाने का खेल है, इसलिए युवतियों की नंगी फोटो छापो। नंगी फोटो छापना भी कोठे चलाने की एक विधा है। आज-कल संपादक लंपट सिंह इस काम में सबसे बोल्ड लीचड़ माने जाते हैं।

2. टीवी पत्रकारिता टीआरपी की भड़ैती में व्यस्त और मस्त-मस्त है। अब तो निर्वस्त्र दृश्यों से भी उनका काम नहीं चल रहा है, सो कोठेबाजी को आयुष्मान बनाए रखने के लिए हंसोड़ों की फौज लेफ्ट-राइट करने लगी है। ऐसे निर्लज्ज हंसोड़, जो अपनी मां-बहन को छोड़ पूरी दुनिया की औरतों के जिस्मानी चटखारे लेने का धंधा करने लगे हैं। गंदे जोक के नाम पर एंकरिंग की दुकान भी पूरी बेहयायी से कंडोम और चोली-घाघरा की तिजारत करने लगी है। ऐसे दो भड़ैत भड़भूज बुद्धू और चेंकर चुम्मन दांत चियारे, हाथ पसारे आजकल करोड़ों में खेल रहे हैं। तुर्रा यह कि दुनिया को हंसा रहे हैं। जरा अपनी मां-बहन को नंगा नचाकर दुनिया वालों को हंसाओ तो जानें।

3. लंपट सिंह कहते हैं कि सेठ जी की मौत की खबर तीन कालम में पेज के टॉप पर लगेगी। लू-ठंड और मुफ्लिसी की मिर्गी से मरने वालों को संक्षेप कॉलम में कहीं किनारे चेंप कर छुट्टी पाओ। समझे कि नहीं समझे! उठावनी के विज्ञापनों से अच्छी कमाई हो रही है। खबरें हटाकर उठावनी छापो, तभी तो तुम्हारी सेलरी का जुगाड़ होगा।

4. एक साहित्य संपादक भांड़ेन्द्र जी मुद्दत से स्री-विमर्श में तल्लीन हैं। ओक्का-बोक्का, तीन चलोक्का, लइया-लाची, चंदन काटी, इजयी-न-विजयी, पान-फूल ढोंड़वा पचक्क। अपने लीद-लेखों में वे अक्सर लिखा करते हैं कि स्त्री के पास एक देह ही तो ऐसी चीज है, दिखाने-भुनाने के लिए। उसकी लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार उसका देह है। वैसे संपादक जी की स्री-पटकथा से भला कौन वाकिफ नहीं।

5.चूंकि देश की राजधानी में रहते हैं, इसलिए टीरापी सिंह, भांड़ेन्द्र जी और लंपट सिंह रोजाना शाम सात-आठ बजे मुफ्त के तीन-चार पैग सूतने के बाद देश-दुनिया और अखबारी मालिकाने पर गंभीर चर्चाएं-मंत्रणाएं किया करते हैं। आखिरकार उनकी बैठकी यह सिद्धकर ही समाप्त होती है कि सेठ, सांसद और अफसरशाह महान हैं। भारत भुक्खड़ों का देश है।

6.लंपट सिंह पहले जहां काम करते थे, एक दिन स्वामि-भक्ति की पिनक में अखबार-मालिक को त्यागपत्र थमा बैठे। बदकिस्मती से स्वामिभक्ति गच्चा दे गई। इस्तीफा मंजूर हो गया। अगले दिन सिक्योर्टी ने जनाब को प्रेस में घुसने से रोक दिया तो पहुंच गए मालिक के बंगले पर। बर्फी और कॉफी से अगवानी के बाद मालिक सर बोलेः भाई रिजायन कर दिया है तो क्या हो गया, कभी कोई दिक्कत-परेशानी अकेले मत झेलना, मुझे खबर कर देना, मदद कर दिया करूंगा। अब नौकरी करके क्या करोगे। लंपट जी चक्कर खाकर गिर पड़े। वहीं खून की बोमेटिंग हुई। अब बेचारे सालों की बेरोजगारी के बाद उठावनी और अश्लील तस्वीरें छापने के नए आइडिया के साथ दिल्ली में नमूदार हुए हैं।

7. सभी न्यूज चैनलों को मालूम है कि टीआरपी सिंह देश का सबसे बड़ा आइडिया-चोर है। पूरा-का-पूरा पैकेज चुटकियों में टिपवाकर अपने यहां कर देता है...फ्लैश-फ्लैश!! चोखा-चटनी-घी-अचार के बावजूद बाकियों का जायका फिस्स। यानी टीआरपी खुश, बाकी फुस्स। इसे कहते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, समझे-कि-नहीं समझे!

8.लंपट सिंह बड़े विद्वान और बाल-साहित्य-विशेषज्ञ हैं। रोजाना जब तक दो-चार कर्मचारियों के बच्चों के पेट पर लात न मार लें, उनको खाना हजम नहीं होता है। अब तक छप्पन दर्जन लात मार चुके हैं। वैसे वह मारपीट और गाली-गलौज के सख्त खिलाफ हैं। सशस्त्र-वार्ता के बाद एक बार थाने में अनायास पसीने-पसीने हो गए थे।

9.टीआरपी सिंह लड़कियों के करारे शौकीन हैं। गीत-गजल अच्छी लिखते हैं। भंडाफोड़ होते ही बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने-रिरियाने लगते हैं। अपनी जिस्मानी लुच्चई के फेर में अब तक कई चैनल बदल चुके हैं। कई बार पिटे-पिटाये भी हैं। अब तरह की दैहिक समीक्षा के आदती हो चले हैं। दिल्ली में सब चलता है।

10.लंपट, टीआरपी, भाड़ेंद्र, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। नक्षत्र क्या, चांद-सूरज या सप्तऋषि-मंडल हैं। मंडली के आगे सरकार, पीछे कई पुश्तों का बैंक-बैलेंस है। पराड़कर जी ने इसीलिए तो बनारसी मालदार बाबू शिवप्रसाद गुप्त की चौखट पर मत्था टेक कर इस देश में पत्रकारिता के आदर्श रचे थे। जय हो! जय हो!!

-करतूतें सच्ची, नाम काल्पनिक।


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3--------------------
बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!


(यहां मैं चरित्रहीन मीडिया की बातें क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस) काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखता जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों ही नहीं, पूरे मीडिया-सिस्टम के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जा रहे हैं....लंपट दुबे, टीआरपी सिंह, भाड़ेंद्र जादो, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं....से आगे पढ़ें आज...पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पापःतीन.....बड़ा नाम करेगा चुगलू मादर......च्च्च्च्चो!)


1.बिगांडू महतो अभी साल-छह महीने से अखबार के पेशे में आया है। हक्का-बक्का है। चपड़दंती मुंह बाए दिन भर शहर के इस कोने से उस कोने तक ड्यूटी बजाता फिरता है। शाम को इकट्ठे पूरी रिपोर्ट मुंह जुबानी एडिटोरियल इंचार्ज को देनी होती है। ड्यूटी भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, खबर-सबर की नहीं, लिखने-पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं, सब साबुत-साबुत मुंह-जुबानी। ......कि हमारे अखबार का रिपोर्टर आज हमारे प्रतिद्वंद्वी अखबार के किन-किन रिपोर्टरों से मिला। ....कि किस रिपोर्टर ने आज हमारी कौन-सी खबर लीक की। ....कि फलां कार्यक्रम के इनोग्रेशन में फलां संपादक को क्यों बुलाया गया, हमें क्यों नहीं। .....कि पत्रकार संघ के चुनाव में हमारे अखबार का कंडीडेट विरोधी अखबार के कंडीडेट से क्यों हार गया, मतदान में कौन-कौन से हमारे-अपने विभीषण रहे?

2. फटीचर मंडल सर्कुलेशन इंचार्ज हैं। उनको आज-कल एक ही चिंता खाए जा रही है। एबीसी वाले शहर में डेरा डाल चुके हैं। अब क्या होगा। साल भर रिपोर्ट तो नंबर दो में बनी है। अब वे खंगालेंगे एक-एक रिकार्ड। बाहर रास्ते में अखबार के बंडल से लदी गाड़ियां चेक करेंगे। मंडल साहब एक बार फिर उसी आजमाये पुराने फार्मूले को भिड़ाने में जुटे हैं कि सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। चार-पांच जोड़ी जूते, चार-पांच दर्जन चूड़ियां और साड़ियां, दस किलो मिठाई, प्रति कंडीडेट दो-दो सेट कपड़े...। ऐं, ये क्या है? सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल से पूछिए!!

3. सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल की एक टेंशन हो तो झेल भी जाएं, रोज चार तरह के टेंशन। आज-कल एजेंटों का फिर माथा फिरा हुआ है। सवेरे अखबार के बंडल उठाने की बजाय सेंटर पर पहले मीटिंग करते हैं। नेतागीरी का शौक चढ़ा है। कहते हैं, आज हम अखबार नहीं उठाएंगे। पहले एक रुपया हमारा कमीशन बढ़ाओ। अब कमीशन कहां से बढ़ाएं। अखबार का रेट बढ़ाते ही ग्राहक बोलते हैं, ई कूड़ा-कबाड़ा हमे नहीं पढ़ना, कल से अखबार बंद कर दो। अब रेट बढ़ाएं तो सांसत, न बढ़ाएं तो। इसी चक्कर में रोजाना सर्कुलेशन गिर रहा है। लगता है कि इन पर भी वहीं पुराना फार्मूला एक बार फिर आजमाना पड़ेगा....दै डंडा, दै डंडा, पट्ट कर दो सबों को एक साथ। अभी क्राइम रिपोर्टर से तिग्गी भिड़ाता हूं कि पिटाई के समय कोई पुलिस वाला बीच में न आए।

4. मुच्छड़ दुबे पुराने गुंडे हैं। कालेज के दिनो के। बेचारे ने अखबार में नौकरी कर ली है। अब उसे रोज अपने संपादक को बताना है कि कौन, किसके कान में क्या फुसफुसा रहा था। किस रिपोर्टर की किससे ज्यादा पटती है, मुझसे किसकी ज्यादा फटती है। आज कल डेस्क वाले शाम को आने वाली मिठाइयों को क्यों दबा जा रहे हैं। खुद ही खा जा रहे हैं। चुनाव का मौसम है। फिल्ड से मिठाइयों के इतने पैकेट रोजाना आ रहे हैं, मेरी मेज तक एक भी नहीं पहुंचे। जरा पता तो लगाओ, इसके पीछे शरारत किसकी है, किसका दिमाग इतना तेज काम कर रहा है, अभी दुरुस्त करता हूं। आखिर मैं भी बाल-बच्चेदार हूं, दो-चार पैकेट मुझे भी तो घर के लिए चाहिए। आज-कल रिपोर्टरों को फिल्ड में खूब गिफ्ट भी मिल रहा, सो अलग से। सब दबाके बैठ जा रहे हैं, जरा कस के पता करो, बाकी सब काम-धाम छोड़ दो। ठीक-ठीक पता कर लिये तो इस बार प्रमोशन-इंक्रीमेंट डबल। इसी तरह लगे रहो, लंबी रेस का घोड़ा बनोगे, पत्रकारिता में आगे चल कर बड़ा नाम करोगे पट्ठे। और क्या, तुम कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े ही कर रहे हो दुबे जी। सबसे पक्का काम कर्मचारियों की जासूसी और इधर-उधर का लगाना यानी चुगलखोरी। तुम भी खुश, हम भी खुश। अखबार जाए चूल्हे भाड़ में।

5. चिंटू-पिंटू की ड्यूटी है कि सबके उसमे (.....) डंडा किए रहो। किस-किस के उसमें (.....) डंडा करना है सर? अरे!! ये भी कोई पूछने की बात है! दाढ़ी-मूंछ सफेद कर लिये प्रेस की नौकरी में, और ये तक पता नहीं कि किस-किसके उसमें (....) डंडा किये रहा जाता है? होटल वालों के, थाने वालों के, सिनेमा वालों के, मंडी वालों के, मिठाई वालों के, शो रूम वालों के, बिजली वालों के, पानी वालों के, मीट-मुर्गा वालों के, फल-सब्जी वालों के, ठेकेदारों के, नेताओं के, उठावनी के विज्ञापन देने वालों के.....। सर, तब तो पूरे शहर के उसमें (.....) डंडा करना पड़ेगा! हां, और क्या। तुम्हे रक्खा किसलिए गया है चिंटू-पिंटू। कुछ मालूम है, चूतिया कहीं के! मादर......च्च्च्च्चो।

6. तरकर जी बड़े सीनियर जर्नलिस्ट हैं। अब तक देश के उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम के दर्जन भर से ज्यादा अखबारों में नाम कमा चुके हैं। हर शहर में उनकी बस दो ही जरूरतें रहीं हैं, एक बीवी और एक मकान। इस तरह अब तक करोड़ों की नाजायज जायदाद और दर्जन से ज्यादा नाजायज औलाद के विधाता बन चुके हैं। तो भी तरकर की व्यथा-कथा अनंता। दर्दे-दिल ये कि सब कुछ अपने ही डकारते रहे, अपने ऊपर वालों से बेखबर। सो फ्रस्टेशन बढ़ता गया, बढ़ता गया। मुद्दत से सब-एडिटरी। यानी जिंदगी बीती जा रही, हाई स्कूल पास न हुए। जब जोरू-जायदाद खुद ही सब डकार जाओगे तो प्रमोशन-इंक्रीमेंट क्या खाक मिलेगा।

7. लुच्चा पंडित ने पत्रकारिता में कमाई-धमाई का अव्वल आइडिया अख्तियार कर रखा है। साल में सिर्फ दो प्रोग्राम कराते हैं और फूल कर लाल हो जाते हैं, जैसे अमेरिकी सुअर। उनकी एक जुगाड़ मुंबई है। उसके आशीर्वाद से समर सीजन में फिल्म वालों का प्रोग्राम। दूसरा दिल्ली-कलकत्ता में। उसका काम है खेल-खिलाड़ियों के साथ तिग्गी भिड़ाना। सो जाड़े में नेशनल टूर्नामेंट। बस। ना काहू की चुगली, ना काहू की दलाली। पंडी जी का यह डबल गेम उनके ऊपर वालों को लट्टू किए हुए है। कमाई में दस परसेंट ऊपर वालों के बाल-बच्चों के लिए। तुम भी खुश, हम भी खुश। यही सब तरकर जी को नहीं करने आया वरना आज एडिटर की कुर्सी पर होते।

8. सत्येंद्र नरवार तबादले की कौवा हंकनी से परेशान हैं, क्या ससुरा सिर पर पत्तरकारिता का भूत चढ़ा था, इस पेशे में चला आया। इतनी पढ़ाई-लिखाई सब व्यर्थ। लगता है लुच्चा पंडित वाला रास्ता ही धरना पड़ेगा, वरना हर छमाही तबादला। कहां तक झेलें। टाइम आफिस वाले कहते हैं, ऐसा सार्टिफिकेट लेकर अखबार में क्या करने चले आए। यहां तो चुगलुओं का राजपाट चलता है। अरे चोगद जी, बन जाओ चुगलू मादर...च्च्च्च्चो....तुम भी उसकी तरह मजे करोगे। फिर कभी न होगा तबादला। इंक्रीमेंट-प्रमोशन अलग से। समझे बच्चू सतेंदर नरवार!

9. एक जनाब मणिसाना वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने की बेकरारी में इतने सस्वर हो उठे कि आजकल रेलवे रोड पर चाय-पान का खोखा चला रहे हैं। मालिक को फूटी आंखों नहीं सुहा रहे थे। निकाल बाहर किया। तेरी ये हिमाकत। यहां लोग अट्ठारह-अट्ठारह घंटे मरा रहे हैं, चूं तक नहीं कर रहे और तू पत्रकार का चोद्दा, दस घंटे काम करके मणिसाना-मणिसाना चिल्ला रहा है....ऐं!!

10. एक और थे। भीतर-ही-भीतर यूनियनबाजी के पर्चे बांट रहे थे। मनीजर बाबू को किसी चुगलू से भनक लग गई। ऐसा संट किया कि आज कल दिल्ली में आईटीओ पर आटो चला रहे हैं। लेकिन हैं बड़ी मस्ती में। अखबार का नाम लेते ही एक सांस में सौ-सौ गालियां धाराप्रवाह ...... मादर.... च्च्चो .... फादर.... च्च्च्चो...... बाहन.... च्च्च्च्चो...... बेटी..... च्च्च्च्चो....

-(सभी नाम काल्पनिक, बाकी सब सही-सही)


(हिंदी पत्रकारिता के पाप का खुलासा करने का बीड़ा उठाया है जेपी नारायण ने। बेहया नामक अपने ब्लाग पर वे लगातार हिंदी पत्रकारिता पर लिख रहे हैं। उन्हीं के ब्लाग बेहया http://behaya.blogspot.com से उपरोक्त तीनों पोस्टें उठायी गई हैं। आप सभी भड़ासियों से अनुरोध है कि उपरोक्त तीनों पोस्टों को गंभीरता से पढ़ें और एक एक लाइन धैर्य के साथ पढ़ें। आपको जरूर लगेगा कि दरअसल ये प्रतीकात्मक कहानियां आपके आसपास की वो कड़वी सच्चाइयां ही हैं जिनसे आप रोजाना की जिंदगी में हमेशा दो-चार होते रहते हैं। जय भड़ास...यशवंत)

21.4.08

वर्तमान पत्रकारिता और पत्रकारः ऐसे वैसे कैसे कैसे रंग रूप? ........उधार के कुछ चिल्लर लेख-आलेख

पहली बात...
पत्रकार या स्टेनोग्राफर
--संजय तिवारी--
(विस्फोट ब्लाग और विस्फोट डाट काम के माडरेटर)

हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की जरूरत वहां है कितनी? या फिर निवेश करने का प्रभाव होगा या दुष्प्रभाव. हमारे बिजनेस अखबार इसे पत्रकारिता नहीं मानते. वह जो निवेश कर रहा है उससे उसे फायदा कितना होगा और समाज-पर्यावरण को कितना नुकसान इसका कोई आंकलन कभी हमारे बिजनेस पत्रकार नहीं करते. भाई कुएं में बाल्टी डालने की खबरें देते हो लेकिन उसने वहां से कितना पानी उलीचा कभी यह खबर क्यों नहीं बनाते?

इसीलिए मैं इन पत्रकारों को कंपनी पत्रकार कहता हूं. पत्रकार भी क्यों कहें? पी साईंनाथ ठीक कहते हैं कि असल में ये लोग स्टेनोग्राफर हैं. जो कंपनियों से डिक्टेशन लेते हैं. इस डिक्टेशन के बदले उन्हें तनख्वाह के अलावा कुछ गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता है.

पत्रकारिता तो शायद ही कहीं बची हो. हिन्दी टीवी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि हिन्दी लुच्चों और लफंगों की भाषा है इसलिए उनकी प्राथमिकता वही लोग हैं. बिजनेस अखबर और चैनल तो कंपनियों को रिपोर्ट करने को ही पत्रकारिता समझते हैं. लगता है फिर पश्चिम से कोई हवा आयेगी तो इन पत्रकारों की बुद्धि ठिकाने आयेगी इनकी अपनी कोई समझ तो बची नहीं है.

पत्रकारिता का एक मूलभूत सिद्धांत है कि वह खबर नहीं है जो आपके पास चलकर आती है. खबर वह है जिसके पास चलकर आप जाते हैं. और इस चलने-फिरने में भी एक बात नहीं भूलनी चाहिए आपका अंतिम लक्ष्य आम आदमी की भलाई, उसका हक-हित सुरक्षित करना है न कि कंपनियों और साम्राज्यवादी ताकतों का. लेकिन अव्वल तो पत्रकारों ने चलने-फिरने से ही तौबा कर लिया है. चलते-फिरते भी हैं तो वहीं जाते हैं जहां उन्हें ले जाया जाता है.

ज्यादा कुछ तो नहीं सिर्फ इतनी प्रार्थना करता हूं कि ऐसे स्टेनोग्राफरों से भगवान इस देश की रक्षा करें.
(साभारः http://visfot.blogspot.com/2008/04/blog-post_21.html)
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दूसरी बात...
पत्रकार फिर निशाने पर एक का अपहरण तो दूसरा जेल में
--अंबरीश कुमार--
(जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार और विरोध ब्लाग के माडरेटर)

उत्तर प्रदेश में पत्रकार फिर निशाने पर हैं। शनिवार को ही इलाहाबाद के पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा अपहृताओं के चंगुल से जन बचाकर भाग आए। उनका अपहरण पांच अप्रैल को इलाहाबाद में हुआ था। दूसरे वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान पिछले १५ दिन से जेल में हैं। ६५ साल के मेहरूद्दीन खान को अपहरण के मामले में शामिल बताया गया है। मेहरूद्दीन खान दिल्ली से निकलने वाले अखबारों में लिखते रहे हैं और शाह टाइम्स के पूर्व संपादक रहे हैं। शाह टाइम्स के संपादक शाहनवाज राणा बहुजन समाज पार्टी के विधायक हैं। दूसरी तरफ प्रेस काउंसिल ने आगामी दो मई पत्रकार समीउद्दीन नीलू के मामले में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को तलब किया हुआ है। समीउद्दीन वही पत्रकार हैं जिन्हें नौ फरवरी, 2005 को वन्य जीव तस्करी के मामले में गिरफ्तार कर लखीमपुर खीरी जिले की सीमा पर फर्जी एनकाउंटर में मारने का प्रयास किया गया था। बाद में उन्हें 20 लाख की वन्य जीव तस्करी के मामले में जेल भेज दिया गया। यह कुछ उदाहरण हैं कि किस तरह पुलिस प्रशासन और नेता फर्जी मामलों में पत्रकारों को फंसा रहे हैं। उत्तर प्रदेश वर्किग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने डा. मेहरूद्दीन की गिरफ्तारी और उनके परिवार के उत्पीड़न की तीखी निंदा की है। उन्होंने मांग की है कि डा. मेहरूद्दीन को फौरन रिहा कर दोषी अफसरों व नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जए।

इलाहाबाद में पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा के अपहरण का मामला अभी गर्माया ही हुआ था कि मुजफ्फरनगर से पत्रकार मेहरूद्दीन खान को गिरफ्तार कर जेल भेजने की जनकारी मिली। हालांकि शनिवार को ही कुशवाहा हरिद्वार में अपहृताओं के चंगुल से भाग निकले तो इलाहाबाद के पत्रकारों ने राहत की सांस ली। लेकिन मुजफ्फरनगर के पत्रकार अब मेहरूद्दीन खान को लेकर आहत हैं। मेहरूद्दीन खान को न सिर्फ बदसलूकी कर गिरफ्तार किया गया बल्कि उनके परिवार की बेटियां जहां-जहां ब्याही हैं, उनके घरों में भी पुलिस दबिश दे रही है। उनके पुत्र शाकिर को पहले ही गिरफ्तार किया ज चुका है। उनके परिवार की कई महिलाओं को पुलिस परेशान कर चुकी है। इस पूरे मामले में एक समाजवादी पार्टी सरकार में लोकदल कोटे से मंत्री रहे नेता पर अंगुली उठ रही है। डा. मेहरूद्दीन से कुछ पत्रकारों ने जेल में मुलाकात की तो उन्होंने कहा-मुङो फर्जी मामलों में फंसाकर परेशान किया ज रहा है। मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मेरे परिवार के लोगों का उत्पीड़न जरी है।

डा. मेहरूद्दीन को एक अपहरण के मामले में फंसाया गया है। उनके रिश्तेदार पर एक लड़की के अपहरण का मामला दर्ज किया गया था। उसी मामले में चार अप्रैल की रात कांधला पुलिस ने गाजियाबाद के थाना दादरी के गांव बढ़पुरा से डा. मेहरूद्दीन और उनके पुत्र शाकिर को मारपीट करते हुए उठाया। इस बीच घर की महिलाएं बीच में आईं तो उनके साथ भी बदसलूकी की गई। थाने ले जकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इस बीच क्षेत्र के एक पूर्व मंत्री पुलिस से लगातार संपर्क बनाए हुए थे। बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। पुलिस ने उनके खिलाफ अपहरण की साजिश रचने और अपहृत लड़की को पनाह देने जसे आरोप लगाए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रेम संबंधों को लेकर कई मामले उछले हैं जिनमें कभी पंचायतों ने बर्बर भूमिका निभाई तो कभी पुलिस और नेताओं ने। इस मामले में स्थानीय पुलिस और नेताओं की भूमिका संदिग्ध रही है।

समीउद्दीन नीलू के बाद यह दूसरा मामला है जिसमें पत्रकार को फर्जी मामलों में फंसाकर जेल भेज गया है। नीलू के मामले में तो पुलिस अधिकारी ने साफ कह दिया था-जो हम लिख देंगे, जिला की अदालत उसी को सच मानेगी। पुलिस ने तब 20 लाख रूपए मूल्य की वन्य जीवों की खालें आदि की बरामदगी भी दिखा दी थी। बाद में पुलिस से यह मामला ले लिया गया और सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में सारे मामले को फर्जी करार दिया। वर्किग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने कहा-हम लोगों ने कई साल पहले पत्रकार बंधु की स्थापना की थी ताकि पत्रकारों से जुड़े मामलों की वहां जंच-पड़ताल हो सके पर सरकार ने कोई पहल नहीं की। हम चाहते हैं कि किसी भी पत्रकार की गिरफ्तारी से पहले प्रदेश के आला अफसरों से इजजत ली जए ताकि जिला स्तर पर इस तरह की घटनाएं न हों। इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जनर्लिस्ट के अध्यक्ष के विक्रमराव रायपुर जकर छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार को नक्सली बताकर जेल भेजने का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में ६५ साल के बुजुर्ग पत्रकार को एक लड़की के अपहरण के मामले में जेल में डालने पर मीडिया के वरिष्ठ लोग हैरान हैं।
(साभारः http://virodh.blogspot.com/2008/04/blog-post_20.html)
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तीसरी बात...
संपादकों की औकात, मालिकान सोचते हैं कि संपादक नाम का प्राणी तो बोझ है
--खुशवंत सिंह--
(जाने माने स्तंभकार और लेखक)

बात बहुत पुरानी नहीं है, जब हमारे यहां अख़बार इस लिए जाने जाते थे कि उनके संपादकों का कद कितना बड़ा है। ब्रिटिश राज के वक्त तो कई सरकारी अख़बारों, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया और स्टेट्समैन के संपादकों को नाइटहुड की उपाधि तक से सम्मानित किया गया। आजादी के बाद भी अख़बारों के एडिटर को समाज में काफ़ी सम्मान प्राप्त था। फ्रेंक मोरेस, चलपति राव, कस्तूरी रंगन अयंगर, प्रेम भाटिया आदि नामों से पाठक भली भांति परिचित थे। अस्सी के दशक में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक रहे दिलिप पदगांवकर का तो यहाँ तक कहना था कि देश में प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम उन्हीं के ज़िम्मे है। सरकार के ग़लत नीतियों की सकारात्मक आलोचना विपक्ष से नहीं बल्कि इन्ही काबिल संपादकों के बदौलत होती थी।


लेकिन टेलीविजन के आते ही हालात बदलने लगे। जो चीजें टीवी के परदे पर दिखने लगी, उसे लोग पढ़ने की जहमत नहीं उठाना चाहते थे। संपादकीय पढ़ने वालों की तादाद घटती गई। अख़बारों के मालिकान यह सोचने लगे कि संपादक नाम का प्राणी तो बोझ है और उनके बिज़नेश मैनेज़र ही टेलीविजन की चुनौतियों का बेहतर ढ़ंग से सामना कर सकते हैं। जरूरत थी तो सिर्फ़ छड़हरी बदन वाली मॉडलों, गॉशिप, विंटेज वाईन और लज़ीज़ व्यंजनों से अख़बारी पन्नों को भर देने की। और इस फार्मूला को चार फ से परिभाषित किया गया - फिल्म, फैशन, फुड और फक द एडिटर (पता नहीं हिंदी में इसका मतलब क्या हो सकता है!)। अपने जमाने के कई मशहूर कलमकार (संपादक) चौथे फ यानि फक द एडिटर के शिकार हो गए। इनमें से कुछ के नाम काबिल-ए-गौर है - फ्रेंक मोरेस (द नेशनल स्टैंडर्ड जो बाद में इंडियन एक्सप्रेस बना), गिरिलाल जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया), बी जी वर्गिज़ ( मैग्सेसे पुरस्कार विजेता - टाइम्स ऑफ इंडिया), अरुण शौरी (इंडियन एक्सप्रेस), विनोद मेहता (वर्तमान संपादक ऑउटलुक), इंदर मलहोत्रा (टाइम्स ऑफ इंडिया), प्रेम शंकर झा (हिंदुस्तान टाईम्स)। आज अगर आप पूछें कि टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाईम्स या फिर टेलिग्राफ के संपादक कौन हैं, दस में से नौ लोग शायद न बता पाएं। दिलिप पदगांवकर.....ये कौन है?


दरअसल,भारतीय पत्रकारिता की यह विडंबना है कि यहाँ मालिकान संपादक से ज्यादा अहमियत रखते हैं। पैसा, प्रतिभा पर भारी पड़ती है। पैसे के इस खेल में सबसे ताजा उदाहरण एम जे अकबर का दुर्भाग्यापुर्ण तरीके से एशियन ऐज़ से निकाला जाना है। अकबर, शायद जुझारू पत्रकारीय विरादरी के सबसे काबिल सदस्य हैं। उन्होंने कलकत्ता से निकलने वाले आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप के सहयोग से संडे और टेलिग्राफ जैसी नामी अख़बार निकाला था। वे लोक सभा के लिए भी चुने गए और तक़रीबन आधे दर्जन किताबों के लेखक भी रहे हैं। पंद्रह साल पहले अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने द एशियन एज का प्रकाशन शुरु किया था। यह एक कठिन कार्य था और अकबर ने इसे बख़ूबी से अंजाम दिया। एशियन एज़ भारत के लगभग हर मेट्रो से साथ ही लंदन से भी छपने लगा। इस अख़बार में नाम मात्र का विज्ञापन होता था लेकिन पठनीय सामग्री काफी मात्रा में थी-जो नामी ब्रिटिश और अमरीकन अखबारों से भी ली जाती थी।कुल मिलाकर यह एक मुकम्मल अखबार था।इसके आलावा, इसमें ऐसे भी लेख छपते थे जो हुक्मरानों को नागवार गुजरते थे।और शायद यहीं वजह थी जिसने अखबार में अकबर के व्यवसायिक पार्टनर को नाराज कर दिया, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक आकांक्षा को ठेस पहुंच रही थी।बस फिर क्या था-बिना किसी चेतावनी के ही अकबर को एशियन एज के मुख्य संपादक के पद से हटा दिया गया ।पैसे ने एक बार फिर से अपना नग्न और घिनौना चेहरा सामने दिखा दिया। यह कहना अभी मुश्किल है कि बदले में अब अकबर उस आदमी के साथ क्या करेंगे जिन्होने उनके और पत्रकारिता दोनों के साथ बड़े ही अपमानजनक व्यवहार किया। लेकिन अकबर को यह वाकया लंबे समय तक जरुर सालता रहेगा। वो अभी सिर्फ सत्तावन साल के हैं और न तो किसी घटना को भूलते हैं न ही अपने विरोधियों को माफ करते हैं।


जब मैं इलिस्ट्रेटेड वीकली का संपादन कर रहा था तब अकबर उस छोटी सी टीम का हिस्सा थे जिसकी मदद से इलिस्ट्रेटेड वीकली का प्रसार 6,000 से बढ़कर 400,000 तक जा पहुंचा था। यह कितनी बड़ी बिडंवना है कि मुझे भी उसी तरीके से उस पत्रिका से निकाल दिया गया जिस तरीके से अकबर को इस साल एशियन एज से। तब तक टाइम्स ऑफ इंडिया समेत बेनेट कोलमेन के तमाम प्रकाशनों का मालिकाना हक सरकार द्वारा जैन परिवार को सौंपा जा चुका था। ज्योंही जैन परिवार ने कमान अपने हाथ में ली, उन्होने मेरे काम में अड़ंगा डालना शुरु कर दिया। मेरे करार को खत्म कर दिया गया और मेरे उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी गई। मुझे एक सप्ताह के भीतर इलिस्ट्रेटेड वीकली छोड़ देना था। मैंने वीकली के लिए भारी मन से भावुक होकर अपना आखिरी लेख लिखा और पत्रिका के भविष्य की सुखद कामना की। लेकिन वो कभी नहीं छपा। जब मैं सुबह अपने ऑफिस में आया तो मुझे एक चिट्ठी थमा दी गई और तत्काल चले जाने को कहा गया। मैंने अपना छाता लिया और घर वापस आ गया। मुझे बड़े ही घटिया तरीके से ज़लील किया गया। यह अभी भी रह-रह कर मुझे परेशान करता है। जैन परिवार द्वारा किया गया वह अपमान मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। आज भी मेरे सम्मान में जब कोई समारोह होता है-भले ही उसकी अध्यक्षता अमिताभ बच्चन, महारानी गायत्री देवी या खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही क्यों न करें-उसकी रिपोर्ट तो टाइम्स ऑफ इंडिया में छपती है लेकिन उसमें न तो मेरा फोटो छपता है न ही नाम होता है।और यह उदाहरण साबित करता है कि पैसा और सत्ता के मद में चूर छोटे दिमाग बाले आदमी कैसे हो सकते हैं।
(साभारः http://kissago.blogspot.com/2008/04/blog-post_18.html)
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(उपरोक्त तीनों आलेख दूसरे ब्लागों से लिए गए हैं। उम्मीद है, उपरोक्त ब्लागों के माडरेटर इस चोरी के लिए क्षमा करेंगे। मकसद सिर्फ इतना है कि पत्रकार समुदाय से जुड़े उपरोक्त आलेख देश के कोने कोने मौजूद पत्रकारों तक भी पहुंच जाएं....जय भड़ास, यशवंत)