जिन्हें हम इंसान बुराई मानते हैं, गंदा कहते हैं या जिनसे हमें घृणा होती है वे अलग-अलग सामाजिक परिवेशों में सापेक्षता से कदाचित भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे कि कुछ लोग शराब का सेवन बुरा मानते हैं कुछ लोग उसे अपवित्र और बुरा मानते हैं, कुछ लोग मांसाहार करते हैं और कुछ उसी को पैशाचिक भोजन मानते हैं कहते हैं कि यह मानवीय आहार हो ही नहीं सकता और इस विरोधाभास की हद तो तब सामने आती है जब चिकित्सा से जुड़ी बात की ओर नजर डालें, लीजिये शिवाम्बु यानि कि स्वयं का मूत्र; हिन्दुओं का एक तबका इसे "शिवाम्बु" कहता है यानि कि पवित्रतम जल और वहीं दूसरी ओर इस्लाम को मानने वाले इसे इतना अपवित्र मानते हैं कि अगर एक भी बूंद कपड़ो पर रह गयी तो अपने आपको नापाकी हालत में मानते हैं। मैं सोचती हूं कि दुनिया बनाने वाले के बारे में हमारी मजहबी किताबों में ऐसे वर्णन है जैसे कि वो कोई शख्सियत हो (अब खुदा के वास्ते कोई मुझपर ये आरोप न लगाए कि मैं इस्लामिक सोच की तौहीन करने की गुस्ताखी कर रही हूं लेकिन यदि फिर भी किसी को मेरी बात से लगता है कि इस्लाम खतरे में है तो मेहरबानी करके मेरी मौत का फ़तवा जारी करने से पहले मुझसे सभ्य इंसानो की तरह बात करे और अगर फिर भी उसे लगे कि मैं गलत हूं तो तब पत्थर उठाए ; उस पत्थर उठाने वाले शख्स से पहला सवाल इसी ब्रेकेट के अंदर कर लेती हूं कि क्या अक़ीदा जबरन पैदा करा जा सकता है?)। तमाम जगहों पर खुदा के बारे में ऐसे तरीके से लिखा है कि वह फरिश्तों से कह्ता है कि आदम को सज़्दा करो या हुजूर को जिब्राइलअलैस्सलाम जो कि एक फरिश्ते हैं आकर खुदा के पैगाम दे रहे हैं,खुदा ने हम सब को अपनी इबादत के लिये बनाया। इसका अर्थ तो बस इतना है कि हम कठपुतलियों से ज्यादा और कुछ नहीं लेकिन उसने अपने मनोरंजन के लिये ये कह दिया कि तुम्हें भले बुरे की समझ दे रहा हूं और फिर फैसले के रोज जन्नत दोज़ख का खेल होगा।
दो घटनाएं, एक बच्ची ने मेरे बालों में बड़े प्यार से बेशरम(बेहया यानि bell flower) का फूल लाकर लगा दिया,सब टीचर्स हंसती रहीं लेकिन मैंने न सिर्फ दिन भर उस फूल को बालों में लगा रहने दिया बल्कि वाशी से पनवेल तक लोकल ट्रेन में और घर तक पैदल उसे लगाए हुए ही आयी। मुझे उस बच्ची के प्यार में ईश्वरीय झलक दिखी...............
अपने बड़े भाईसाहब भूपेश जी की बेटी पुका(पूर्वा) जो सवा साल की है, मैं अक्सर उसे मिलने घर चली जाती हूं आखिर बुआ जो ठहरी। कल देखा तो भाभी किचन में कुछ काम कर रहीं हैं और पुका रानी फर्श पर बैठे हुए जोर-जोर से किलकारियां मार कर खुश हो रही है और दोनो हाथों से पानी उछाल रही है मेरे नजदीक जाते ही कुछ बूंदे मेरे चेहरे पर पड़ीं। पुका ने पेशाब कर रखा था और उसी में छप-छप करके मम्म मम्म बोल कर उसे उछाल रही थी। मुझे फिर एक बार ईश्वरीय झलक दिखी इस बच्ची की किलकारी में और अपनी पेशाब के प्रति गंदगी की धारणा ध्वस्त होती नजर आईं। मुझमें साहस नही है कि मैं अपनी बेवकूफियत को इस ईश्वरीय आनंद पर थोप कर उसे रोकूं।
भगवान की मूर्ति पर बेशरम का फूल नहीं चढ़ा सकते और पेशाब से देवप्रतिमा को स्नान नही करा सकते मुझे संदेह है कि इन बातों से ईश्वर की कोई सहमति या असहमति होती होगी या हमारे अच्छे बुरे की धारणा से उसे कोई मतलब है वो तो बस चुपचाप देख रहा है कि आप उसकी बनाई दुनिया में कितना प्रेम और आनंद बांट रहे हैं
3.5.08
क्या पेशाब से देवप्रतिमा को स्नान करा सकते हैं.........???
1.5.08
.....राम-नाम सुंदर करतारी। छापो-छापो नंगी नारी।।
हमेशा की तरह इंटरनेट की उन गलियों में घुस जाता हूं जहां शराफ़त अली किस्म के लोग नहीं जाते। एक गली खोद रखी है अपने जे.पी. भइया ने और आज तो उस गली से मुझे कुछ दोहे-छंद वगैरह की आवाज आती सुनाई दी तो हमें लगा कि क्या हुआ भइया बीमार हो गये क्या जो रामायणनुमा कुछ बड़बड़ा रहे हैं; अंदर जाने पर पता चला कि रामायण नहीं बल्कि अखबारायण चल रही है। आप लोग को भी जरा पुण्य जैसा कुछ कमा लीजिये इन पवित्रता का रस टपकाते दोहों को ताकि अगर पत्रकारिता के पाप सता रहे हों तो इनके मनन-वाचन से धुल जाएं.........
......पत्तरकारों, हाय तुम्हारी यही कहानी!.......
1....
नचवावैं अखबार गोसाईं। नाचत नर मरकट की नाईं।।
2....
खबर बेंचते संता-बंता। हरि अनंत, हरि कथा अनंता।।
3....
सत्ता, श्वान, डॉन, अखबारी। सबहि ताड़ना के अधिकारी।
4.....
खबर-खबर खबराते बंदर। कूद पड़े लंका के अंदर।।
5.....
नाचो खूब, नचाओ रंभा। चोंथो-चोंथो चौथा खंभा।।
6....
सिया-राम मय सब जग जानी। पढ़ो-पढ़ाओ खबर पुरानी।।
7......
मंगल भवन, अमंगल हारी। नाम मीडिया, काम कहारी।।
8......
राम-नाम सुंदर करतारी। छापो-छापो नंगी नारी।।
9......
लिखते-लिखते खबर हुंआसी। मूड़ मूड़ाय भये संन्यासी।।
10.......
टेंशन में दिन-रात और आंखों में पानी। पत्तरकारों हाय तुम्हारी यही कहानी।।
(साभारः बेहया से)
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
3
comments
Labels: खुलासा, जेपी नारायण, पत्रकारिता, बेहया, भड़ास, हिंदी मीडिया
28.4.08
नौकरी अखबार की, बनिया-बक्काल की, जय कन्हैया लाल की...
--जेपी नारायण--
वह आज भी अपने शब्दों से सबको गाजर-मूली की तरह काट रहा है। उसी की डायरी से चुराए गए कुछ पन्ने आज यहां आप भी पढ़ लीजिए। जान जाएंगे कि हालात किस कदर संगीन हैं। भीतर कितनी बेचैनी और गुस्सा है। कैसे एक-एक जबड़े में बीस-बीस अंगुलियां घुसी हुई हैं। ....और उनके बीच से रिस-रिस कर बाहर आ रही है कविताओं के सुर में गालियों की चिंगारी....
1....
ढाई बजे रात को
खाता हूं पीता हूं ढाई बजे रात को।
जो जीवन जीता हूं ढाई बजे रात को।
परवरिश घर-परिवार की,
नौकरी अखबार की,
बनिया-बक्काल की,
सत्ता के दलाल दमड़ीलाल की,
धूर्त, चापलूस, चुगलखोर हैं संघाती,
घाती-प्रतिघाती,
उनके ऊपर बैठे हिटलर के नाती,
नौकरी जाये किसी की तो मुस्कराते हैं,
ठहाके लगाते हैं, तालियां बजाते हैं,
मालिक की खाते हैं,
मालिक की गाते हैं,
मालिक को देखते ही
खूब दुम हिलाते हैं,
बड़े-बड़े पत्रकार,
हू-ब-हू रंगे सियार,
इन्हीं के बीच कटी जा रही जिंदगी,
सरसों-सी छिंटी-बंटी जा रही जिंदगी,
अपनी गरीबी और मैं,
चार बच्चे, बीवी और मैं,
महंगी में कैसे जीऊं,
वही पैबंदी कैसे सीऊं,
रोज-रोज सीता हूं ढाई बजे रात को।
खाता हूं, पीता हूं ढाई बजे रात को।
बैठा है कमीशन तनख्वाह बढ़ाएगा,
सात साल हो गए
लगता है फिर मालिक पट्टी पढ़ा़एगा,
दो सौ किलो मीटर प्रतिघंटा महंगाई की चाल,
जेब ठनठन गोपाल।
मकान का किराया
और दुकान की उधारी,
रूखी-सूखी सब्जी
और रोटी की मारामारी,
साल भर से एक किलो दूध का तकादा,
इसी में फट गया कुर्ता हरामजादा,
दिमाग में गोबर, आंख में रोशनाई
फूटी कौड़ी नहीं, आज सब्जी कैसे आई,
सोचता सुभीता हूं, ढाई बजे रात को।
खाता हूं, पीता हूं, ढाई बजे रात को।
----
2.....
सुनो कालीचरन!
पत्रकारिता तो अब
जूते की नोक पर होगी कालीचरन!
क्योंकि मिशन गया तेल लेने
और कलम गयी गदहिया की गां.... में।
आगया तो आ ही गया
कंप्यूटर,
उसी पर रात-दिन छींको-पादो,
आंख फोड़ो
हाथ जोड़ो
चार पैसा कमाओ,
घर जाओ,
बाल-बच्चों का पेट पालो।
वरना ....की....चू.....
पत्रकारिता का भूत
कहीं का नहीं रहने देगा तुम्हें,
रोओगे-रिरिआओगे,
एक अदद अंडरवियर के लिए
रिक्शे के पायदान पर
हांफते नजर आओगे,
कहां धरी है नौकरी
नहीं करना तो क्यों करी?
करना है तो कर,
जूते की नोक पर,
संभाल अपना पेट, अपना घर।
कुंए में भांग पड़ी है
विदेशी पूंजी सामने खड़ी है।
वो देख,
उधर ब...न के लं...वी-सेट
आ गया इंटरनेट
गेटअप, मेकअप अप-टू-डेट,
चकाचक्क, भकाभक्क,
विश्वसुंदरी पत्रकारिता के उन्नत ...तड़ों से
झड़तीं एक से एक गोबड़उला खबरें धक्कामार
सात समुंदर आरपार,
सर्रसर्र, फर्रफर्र शेयर बाजार,
कहीं चढ़ाव, कहीं उतार,
और पूंजी की रेलमपेल
देख-देख ....दरचो....
अखबारी खेल,
मिशन गया लेने तेल
खबर गयी कलम के भो...ड़े में
स्साला भाड़
फट गयी गां....
छींक-पाद,
हरामी की औलाद
पराड़कर का च.......ओ...द्दा।
पत्रकारिता होगी अब कलम की नोक पर.............
3......
अंडू वन-डे का फोरमैन
घूर-घूर कर मुस्कराता है
छापेखाने का फोरमैन,
सनसनीखेज खबरों से अंटे अखबार की तरह
लाल-लाल डोरोंवाली एक जोड़ी आंखें...
आंखों के बीच से झांकतीं
अधपकी मूंछों तक
निरंतर तनी नासिका
और पान की जर्दीली पीक से
पपड़ाये होठों पर बार-बार
चक्कर लगाता रक्ताभ-जिह्वाग्र....
घूरते हुए मुस्काना
मुस्काते हुए डांटना,
फिर डांट-डपट, गाली-गलौज
और हाथापाई पर उतर आना फोरमैन की
बेमियादी बीमारी है।
अखबार के दफ्तर में
इकत्तीस साल से डोल रहे हैं बूढ़ी मशीनों पर
उसके जवान हाथ
जिसकी जुबान खबरचियों की खबर लेने के
सारे गुर आजमा चुकी है।
अपनी इकत्तीस साल की दुनिया का
खबरदार पन्ना है बूढ़ा फोरमैन,
जिसके होशो-हवास पर तीन दशकों का
अखबारी अतीत दर्ज है।
संपादकों, संवाददाताओं, चपरासियों, आपरेटरों, मशीनमैनों की
भीड़ जुटने से, अखबारी सुबह होने तक
इस-उस से
अथ-इति होने तक
क्या कुछ नहीं कह डालता है
अंडू वन-डे का फोरमैन...
नौसिखिये संपादकों को नहीं मालूम
कि कैसे भागती हैं खबरें,
उन्हें पकड़ना होता है पाठकों की सुबह
और सेठ की तिजोरी
एक साथ!
----------
(साभार : http://behaya.blogspot.com)
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
3
comments
Labels: कविता, जेपी नारायण, पत्रकारिता, बेहया, भड़ास, हिन्दी मीडिया
27.4.08
पत्रकारिता तो गई गदहिया के उसमें ए रामू!
जेपी नारायण
पूंजी लूटने का इस समय सबसे मजबूत मोहरा मीडिया। बातें क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस) काल्पनिक पात्रों के माध्यम से। पत्रकारों ही नहीं, पूरे सिस्टम के मन की गांठें खुद-ब-खुद खुलती जा रही हैं....कितने धूर्त और लंपट हैं मीडिया के भारतीय आकाश पर चमकते कुछ चांद-सितारे, एक-एक चेहरे पर कई-कई चेहरे चढ़ाये हुए, कर्मचारियों को हुरपेटते हुए और अपने हुजूरों के सामने दुम दुबकाए हुए, कैसे-कैसे खोखलेजी दर्शन और राजनीति के महामहोपाध्याय बने डोल रहे हैं, और अंदर खाने मचा हुआ है हाहाकार। हर अखबार या चैनल का हर तीसरा आदमी अपने हालात से उकताया हुआ कहीं और नौकरी पाने की जुगाड़ या ताक में। यानी भीतर-ही-भीतर पानी खदबदा रहा है।
1. विनोद मदहोशी जी देश के सबसे बड़े अखबार के सबसे बड़े संपादक हैं। अपनी लखटकिया नौकरी बरकरार रखने के लिए रोजमर्रा के अखबारी कुकर्म निपटाते हुए, हर किसी को हूल-पट्टी पढ़ाते हुए, अपने ऊपर वाले से रिरियाते, नीचे वाले से खिखियाते हुए, स्वदेशी से विदेशी पूंजी तक के गुणा-भाग लगाते हुए, सपने में भी एनसीआर-एनसीआर गुनगुनाते हुए हर हफ्ते अपने अखबार में चोंतभर बस्सैनी लीद फिर देते हैं। लफ्फाजी फिरना उनका पुराना शगल है। इसके बाद शुरू होता है दूसरे पायदान पर यानी दूसरे नंबर के मातहत का लाजवाब अल्हैती-गायन। वाह्ह-वाह्ह, वाह्ह-वाह्ह। आज तो आपने कलम तोड़कर रख दी। आपका लेख पढ़के अब तक सीएम-पीएम गश खा चुके होंगे। हीहीहीहीहीहीही....
2. मदहोशी जी होश-हुनर के पूरे हैं, पक्के पहाड़ी घूरे हैं। आज कल मैदानी क्षेत्रों में मैदान किए जा रहे हैं। उनके अखबार में नौकरी की पहली शर्त है पहाड़ी होना। आप पहाड़ के नहीं तो किसी काम के नहीं। उनकी लालटेन सिर्फ पहाड़ पर जलती है। मैदानी के नाम पर भुकभुकाने लगती है। मीडिया में ये खफ्तुलहवासी किस्म का क्षेत्रीयतावाद कहा जा सकता है। उनके इर्द-गिर्द पल रहे मैदानी भाई-बंधु मन-ही-मन कलपते रहते हैं, मसोसते रहते हैं कि काश हम भी होते पहाड़ के डब्लू-बब्लू ....। सालो से पहाड़ी दर्रे में बेमतलब दरकचा रहे हैं। न कोई इंक्रीमेंट, न प्रमोशन। ऐसे लोग धीरे-धीरे या तो इधर-उधर, अगल-बगल के ठिकानों की ओर लपक रहे हैं, खिसक रहे हैं या झक्क में शाम को तीन-चार पैग सूत कर पट्ट हो ले रहे हैं।
3. एक हैं मिहिर जी। देश के धक्काड़ जर्नलिस्ट। तीन दशक से दिल्ली के चुनिंदा मठाधीशों में एक। उनका एक अदद मकसद होता है सत्ता के चरणों में लार पौटाते रहना। लार पौटाते-पौटाते फूलकर गैंडा हो चुके हैं। सियासत और मीडिया के विविध आयामों के साथ इन दिनों करोड़ों में खेल रहे हैं। उनकी पत्रकारिता से भौचक्के कई और वनगैंडे ताल-में-ताल मिलाकर वैसा ही हो लेने के लिए सालो से बेकरार हैं, लेकिन किल्ली-कांटा बैठ नहीं रहा। सो, यदा-कदा मिहिर जी के साथ मय-मेहमानी के दौरान कसीदे पढ़ते रहते हैं, अभिभूत होते रहते हैं, देश-विदेश की राजनीति पर अपनी पंडिताई झाड़ते रहते हैं। इन अट्ठों-पट्ठों की नब्ज से पूरी तरह वाकिफ मिहिर जी उनकी बातों पर भंगेड़ी धृटराष्ट्र की तरह मंद-मंद मुस्काते रहते हैं। खुदा-न-खास्ता किसी पर मेहरबान हुए तो किसी विदेशी थैलीचोर से दो-चार करोड़ का सौदा कराते हुए कहते हैं, जाओ वत्स! अपने स्वामी के चरणों में लोट जाओ....!!
4. बकचोद जी किसी टाइम्स-फाइम्स के कलमगीर रहे हैं। देश के नामी सटायरबाज हैं। अपने और अपने संस्थान को छोड़ पूरी दुनिया पर अपनी कुंद-कलम के बंदूक चलाते फिरते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके पीछे सीख-पढ़कर पास दो-तीन दर्जन कुख्यात पत्रकारों का गिरोह बटमारी करता रहता है। यूपी के माफियाओं के साथ उनकी अच्छी ऊठक-बैठकी है। उनके साथ तूतक-तूतक तूतिया करते-करते बकचोद जी खुद को ही एक समय में तो पत्रकारिता का सबसे बड़ा माफिया मानने लगे। अपनी इज्जत-बेइज्जत से बेफिक्र, मान-सम्मान से परे संतई मुद्रा में कुछ दिनों से इतने आभाहीन और पिनकी हो चुके हैं कि अपने अखबार समूह के पुरखों को भद्दी-भद्दी गालियां देते रहते हैं। कहते हैं...कितना-कुछ किया हरामखोरों के लिए, झुंड-के-झुंड पत्रकार कौड़ियों में टांग लाये, पन्ना-का-पन्ना विज्ञापनों के अंबार लगा दिए और आज मुझे ये दिन देखने पड़ रहे हैं। कभी सिर्फ विदेशों में पिकनिक किया करते थे, आजकल मोहल्ले वालों से पान मसाला के पैसे मांगने पड़ते हैं।
5. प्रणामी जी, अभी कुछ ही दिन हुए प्रधान संपादक पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। सारा खून अपने अखबार को पिलाकर पूरा देह ठठरी भर बचा है। रिटायरमेंट के दो ही महीने में चेहरा आरके लक्ष्मणन का कार्टून हो चला है। पत्रकारिता पर किताबें लिखते रहे हैं। उनके पढ़े शिष्य कभी-कभार दिलासा देते रहते हैं कि अफसोस मत करो गुरू जी, अंत में सबकी यही गत होती है। आपको कंधा देने वालों की लाइन लग जाएगी। क्या खूब हेडिंग लगाते थे आप, क्या खूब संपादकीय लिखते थे। ...और आज आपका कोई नामलेवा नहीं। अगर आप अपने आखिरी दिनों में बौरा नहीं गए होते तो आज ये दिन नहीं देखने पड़ते। आपसे मिलने आना चाहता हूं, लेकिन आपकी कटखनी बीवी से बड़ा डर लगता है, अब तो वह और सठिया गई होगी।
6. बिरजू प्रधान मीडिया में लच्छू घराने से आये हैं। लच्छू घराना पत्रकारिता के लक्ष्योन्मुखी मिशन के लिए मशहूर रहा है। सबसे पहले पराड़कर जी ने इस घराने को दीक्षित किया था। आजकल इस घराने के ज्यादातर लोग कटहल छील रहे हैं। बिरजू प्रधान की कटहली-पत्रकारिता से अभिभूत एक भूतपूर्व सीएम ने उन्हें उनके घर पहुंचकर एक लाख की कट्टू उपाधि से नवाजा था। बिरजू प्रधान का मझला बेटा कुछ दिनो पहले ब्लू फिल्मो की सीडी सप्लाई करते हुए पकड़ा गया है।
7. मीडिया जगत में दिगंबर दादा के नाम से प्रसिद्ध दिग्गू जी रिटायर होने के बाद भी कर्मचारियों का खून पी रहे हैं। चंदन-टीका लगाकर ठीक दस बजे दफ्तर में आकर बैठ जाते हैं। दिन भर भीतर मालिक से तीया-पांचा भिड़ाते रहते हैं, बाहर संपादकीय कर्मियों में से किसी घर की बिजली ठीक कराने, किसी को मोहल्ले की सड़क पर डामर डलवाने, किसी को अपनी खटारा (जो कभी मालिक की थी ) की सर्विस कराने तो किसी को लादकर घर पहुंचाने का हुकुम सुनाते रहते हैं। सबसे ज्यादा आजिज तो दफ्तर का चपरासी रामभरोसे। भुनभुनाता रहता है....लगता है मुझे ही चार डंडा बजाकर इसे निपटाना पड़ेगा, नौकरी रहे चाहे जाय। साला बात-बात पर तू-तड़ाक करता है, दिन भर में पचास गिलास पानी पीता है, आधा थूकदान में गुड़गुड़ा देता है।
8. महासंपादक भुवनचंद्र आज कल इस बात से बहुत हैरान-परेशान हैं कि हर कर्मचारी उनके पीठ पीछे उन्हें गाली क्यों देता है? गाली भी कोई हल्की-फुल्की नहीं कि पीछे से डालकर आगे से निकाल लूंगा। क्यों? .....कि मालिक के चेंबर में बैठकर हम लोगों की चारपाई बुनता रहता है। अब बहुत हो गया। बुनो चारपाई, हम तो इकट्ठे खाट खड़ी करने वाले हैं। तब न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। बहुत हो गई नौकरी....पीछे से डालकर आगे से निकाल लूंगा। ...ऐं...सच्ची....ऐसा क्या? आखिर इतने गुस्से की कोई खास वजह? हां-हां, है ना। दफ्तर की लड़कियों से पेंच लड़ाता रहता है। वे भी सब समझती हैं। कहीं लड़कियां ही न किसी दिन बीच दफ्तर बीन बजा दें।
9. मीडिया की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए हैं। टुंडा ने अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए जो तरकीबें इजाद की हैं, बाकी सभी चैनल पीछे-पीछे उसी राह पर चल पड़े हैं। वेश्याओं का स्टिंग आपरेशन करो। हिरोइनो को चड्ढी-चोली में कैटवाक कराओ। नई पीढ़ी के साथ कोकशास्त्र पर डिबेट करो। एकरिंग के लिए पहली शर्त होगी बार गर्ल होना या जेंट्स है तो एक झटके में नीड अद्धा सुड़ुक जाना। नारी उत्थान कार्यक्रम में सहवास की दशा-दिशा से दर्शकों को रू-ब-रू कराना। नुस्खे कामयाब रहे। टीआरपी धांय-धांय बढ़ रही है। कोठों पर मुर्दनी छायी हुई है। ब्ल्यू सीडी का धंधा करने वालों को सांप सूंघ गया है। टुंडा मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। अब वे सीडी के बजाय डाइरेक्ट इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सरकार से लाइसेंस मांगने वाले हैं। कोठा तो कोठा, एक कोठा और सही।
10. आइए आखिर में स्तंभकार जोगिंदर जी की चार लाइनें आपको भी सुनवाइ देते हैं.....
नाचो खूब नचाओ रंभा....
चोंथो-चोंथो चौथा खंभा....
पत्रकारिता तो गई गदहिया के उसमें ए रामू!
सभी नाम काल्पनिक, बाकी सब सही-सही
((पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पापः भाग चार : साभार : बेहया http://behaya.blogspot.com))
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
6
comments
Labels: जेपी नारायण, पत्रकारिता, बेहया, भड़ास, हिन्दी मीडिया
26.4.08
पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप, टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!, बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!
1--------
पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप
पत्रकारिता के लिए आज सबसे फिट और एकल संबोधन है...मीडिया मार्केट। कोई मिशन-फिशन नहीं रहा। शुद्ध धंधा। जैसी की पहली पोस्ट पर कुछ मित्रों की लिखित-मौखिक प्रतिक्रियाएं रहीं, उनके या अन्य किसी के अंदेशे का मैं यहां समन करने नहीं जा रहा, न ही सोदाहरण इस पर यहां कुछ लिखने-पढ़ने या भंडाफोड़ जैसी सनसनी परोसने की मेरी मंशा है। क्योंकि शीत-पीत पत्रकारिता के झंडाबरदार इस पर पहले ही काफी कुछ कागजी शेखियां बघार चुके हैं। यहां मैं अपनी बात क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस)काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखने जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जाएंगे....
.....घीसू-माधव एक ही अखबार में काम करते हैं। घीसू (आत्मा से) मर चुका है। माधव मर रहा है। दोनों ने तिल-तिल मौत का रिहर्सल और एहसास भी किया है।
....घीसू का बेटा शहर के सबसे महंगे कान्वेंट स्कूल में पढ़ रहा है। उसके पास एसी गाड़ी, शहर के सबसे पॉश इलाके में शानदार बंगला और पत्रकारिता की दुनिया में उसका क्या खूब बिकाऊ-टिकाऊ नाम है।
....माधव अभी पत्रकारिता के पराड़करी तर्पण में अस्तव्यस्त है। गर्मियां मटके के पानी में बीत जाती हैं, बच्चे गांव की पाठशाला में नाक पोंछ रहे हैं। पत्नी १८ की उमर में ३८ की हो चली है। बूझो तो जानें कि माधव की मौत और घीसू की जिंदगी के अर्थ क्या हैं?
......घीसू क्राइम रिपोर्टर है। माधव को दफ्तर में अपने बड़ों के पैर छूने नहीं आता। घीसू को मालूम है कि किस सर के घर शराब की पेटी पहुंचानी है, किस सर के खाने की टिफिन उनकी मेज पर लगानी है, किस सर के कपड़े प्रेस कराना है, किस सर का बच्चा जब जोर जोर से रोता है तो कौन सी टाफी खिलाने पर चुप हो जाता है।
.....एक बार घीसू अपने स्वामी के चेंबर में दबे पांव घुसा कई कुंतल विनम्रता ओढ़े हुए, पूरी आस्था से दांत निपोरे हुए। बोला, सर आपको देखकर मुझे अपने पिता की याद आती है। आप मेरे पिता समान है। स्वामी बोले, वो तो मेरे यहां नौकरी करने वाला हर कर्मचारी मुझे पापा कहता है। जब दूसरे अखबार में जाता है तो वहां के स्वामी उसके पापा हो जाते हैं। तुम जैसे कर्मचारियों के बीच मैं यूं ही टकलू नहीं हुआ हूं।
....एक बार स्वामी को हंसते हुए देखकर माधव को हंसी आ गई। स्वामी का चौंकना स्वाभाविक था कि जब मेरे इर्द-गिर्द खड़े इतने बड़े-बड़े महानुभाव (दर चापलूस) मेरी हंसी के डर से घर तक पत्नी-बच्चों को डांट भगाते हैं, फिर इस ट्रेनीज कमीनगी के मायने क्या हो सकते हैं? माधव आज तक स्वामी की हंसी और अपने डिमोशन का अंतर नहीं समझ पाया।
....घीसू की बीवी एक कथित राष्ट्रीय दल की जब्बर दलैत है। बेटा थानों से चौथ वसूलता है। (पुत्र के परमानेंट होने के बाद से) पिता शहर के नामी समाजसेवी हैं। हर महीने, हर थाने से उनके नाम सफेद लिफाफा आता है। अखबार के फोटोग्राफर ने घीसू के बच्चों की अब तक आठ दर्जन से ज्यादा तस्वीरें खींचीं हैं। शहर के सिपाहियों के दबादले की सूची घीसू की माता जी बनाती हैं।
....माधव की मां तपेदिक से मर चुकी है। पिता गठिया का मरीज है। बाकी बीवी-बच्चों के बारे में हर किसी को पता है।
......घीसू के पास कई बीवियां हैं। कई दुकानों से उसके यहां शराब की पेटियां आती हैं। हर रिक्शे वाला उसके बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए लालायित रहता है। बीवियां थाने से नीलामी की गाड़ियां उठवाती हैं।
.....ड्यूटी से छूटने के बाद माधव शराब पीता है और गालियां देता है। कहता है, आज तक मुझे कभी जेल की सजा नहीं हुई। सोचता हूं, एक बार ३०७ में जेल हो आऊं!
------------------------------------
2-----------------
टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!
1. पत्रकारिता एक माल है, निजी संपत्ति जुटाने का खेल है, इसलिए युवतियों की नंगी फोटो छापो। नंगी फोटो छापना भी कोठे चलाने की एक विधा है। आज-कल संपादक लंपट सिंह इस काम में सबसे बोल्ड लीचड़ माने जाते हैं।
2. टीवी पत्रकारिता टीआरपी की भड़ैती में व्यस्त और मस्त-मस्त है। अब तो निर्वस्त्र दृश्यों से भी उनका काम नहीं चल रहा है, सो कोठेबाजी को आयुष्मान बनाए रखने के लिए हंसोड़ों की फौज लेफ्ट-राइट करने लगी है। ऐसे निर्लज्ज हंसोड़, जो अपनी मां-बहन को छोड़ पूरी दुनिया की औरतों के जिस्मानी चटखारे लेने का धंधा करने लगे हैं। गंदे जोक के नाम पर एंकरिंग की दुकान भी पूरी बेहयायी से कंडोम और चोली-घाघरा की तिजारत करने लगी है। ऐसे दो भड़ैत भड़भूज बुद्धू और चेंकर चुम्मन दांत चियारे, हाथ पसारे आजकल करोड़ों में खेल रहे हैं। तुर्रा यह कि दुनिया को हंसा रहे हैं। जरा अपनी मां-बहन को नंगा नचाकर दुनिया वालों को हंसाओ तो जानें।
3. लंपट सिंह कहते हैं कि सेठ जी की मौत की खबर तीन कालम में पेज के टॉप पर लगेगी। लू-ठंड और मुफ्लिसी की मिर्गी से मरने वालों को संक्षेप कॉलम में कहीं किनारे चेंप कर छुट्टी पाओ। समझे कि नहीं समझे! उठावनी के विज्ञापनों से अच्छी कमाई हो रही है। खबरें हटाकर उठावनी छापो, तभी तो तुम्हारी सेलरी का जुगाड़ होगा।
4. एक साहित्य संपादक भांड़ेन्द्र जी मुद्दत से स्री-विमर्श में तल्लीन हैं। ओक्का-बोक्का, तीन चलोक्का, लइया-लाची, चंदन काटी, इजयी-न-विजयी, पान-फूल ढोंड़वा पचक्क। अपने लीद-लेखों में वे अक्सर लिखा करते हैं कि स्त्री के पास एक देह ही तो ऐसी चीज है, दिखाने-भुनाने के लिए। उसकी लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार उसका देह है। वैसे संपादक जी की स्री-पटकथा से भला कौन वाकिफ नहीं।
5.चूंकि देश की राजधानी में रहते हैं, इसलिए टीरापी सिंह, भांड़ेन्द्र जी और लंपट सिंह रोजाना शाम सात-आठ बजे मुफ्त के तीन-चार पैग सूतने के बाद देश-दुनिया और अखबारी मालिकाने पर गंभीर चर्चाएं-मंत्रणाएं किया करते हैं। आखिरकार उनकी बैठकी यह सिद्धकर ही समाप्त होती है कि सेठ, सांसद और अफसरशाह महान हैं। भारत भुक्खड़ों का देश है।
6.लंपट सिंह पहले जहां काम करते थे, एक दिन स्वामि-भक्ति की पिनक में अखबार-मालिक को त्यागपत्र थमा बैठे। बदकिस्मती से स्वामिभक्ति गच्चा दे गई। इस्तीफा मंजूर हो गया। अगले दिन सिक्योर्टी ने जनाब को प्रेस में घुसने से रोक दिया तो पहुंच गए मालिक के बंगले पर। बर्फी और कॉफी से अगवानी के बाद मालिक सर बोलेः भाई रिजायन कर दिया है तो क्या हो गया, कभी कोई दिक्कत-परेशानी अकेले मत झेलना, मुझे खबर कर देना, मदद कर दिया करूंगा। अब नौकरी करके क्या करोगे। लंपट जी चक्कर खाकर गिर पड़े। वहीं खून की बोमेटिंग हुई। अब बेचारे सालों की बेरोजगारी के बाद उठावनी और अश्लील तस्वीरें छापने के नए आइडिया के साथ दिल्ली में नमूदार हुए हैं।
7. सभी न्यूज चैनलों को मालूम है कि टीआरपी सिंह देश का सबसे बड़ा आइडिया-चोर है। पूरा-का-पूरा पैकेज चुटकियों में टिपवाकर अपने यहां कर देता है...फ्लैश-फ्लैश!! चोखा-चटनी-घी-अचार के बावजूद बाकियों का जायका फिस्स। यानी टीआरपी खुश, बाकी फुस्स। इसे कहते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, समझे-कि-नहीं समझे!
8.लंपट सिंह बड़े विद्वान और बाल-साहित्य-विशेषज्ञ हैं। रोजाना जब तक दो-चार कर्मचारियों के बच्चों के पेट पर लात न मार लें, उनको खाना हजम नहीं होता है। अब तक छप्पन दर्जन लात मार चुके हैं। वैसे वह मारपीट और गाली-गलौज के सख्त खिलाफ हैं। सशस्त्र-वार्ता के बाद एक बार थाने में अनायास पसीने-पसीने हो गए थे।
9.टीआरपी सिंह लड़कियों के करारे शौकीन हैं। गीत-गजल अच्छी लिखते हैं। भंडाफोड़ होते ही बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने-रिरियाने लगते हैं। अपनी जिस्मानी लुच्चई के फेर में अब तक कई चैनल बदल चुके हैं। कई बार पिटे-पिटाये भी हैं। अब तरह की दैहिक समीक्षा के आदती हो चले हैं। दिल्ली में सब चलता है।
10.लंपट, टीआरपी, भाड़ेंद्र, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। नक्षत्र क्या, चांद-सूरज या सप्तऋषि-मंडल हैं। मंडली के आगे सरकार, पीछे कई पुश्तों का बैंक-बैलेंस है। पराड़कर जी ने इसीलिए तो बनारसी मालदार बाबू शिवप्रसाद गुप्त की चौखट पर मत्था टेक कर इस देश में पत्रकारिता के आदर्श रचे थे। जय हो! जय हो!!
-करतूतें सच्ची, नाम काल्पनिक।
------------------------------------
3--------------------
बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!
(यहां मैं चरित्रहीन मीडिया की बातें क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस) काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखता जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों ही नहीं, पूरे मीडिया-सिस्टम के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जा रहे हैं....लंपट दुबे, टीआरपी सिंह, भाड़ेंद्र जादो, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं....से आगे पढ़ें आज...पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पापःतीन.....बड़ा नाम करेगा चुगलू मादर......च्च्च्च्चो!)
1.बिगांडू महतो अभी साल-छह महीने से अखबार के पेशे में आया है। हक्का-बक्का है। चपड़दंती मुंह बाए दिन भर शहर के इस कोने से उस कोने तक ड्यूटी बजाता फिरता है। शाम को इकट्ठे पूरी रिपोर्ट मुंह जुबानी एडिटोरियल इंचार्ज को देनी होती है। ड्यूटी भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, खबर-सबर की नहीं, लिखने-पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं, सब साबुत-साबुत मुंह-जुबानी। ......कि हमारे अखबार का रिपोर्टर आज हमारे प्रतिद्वंद्वी अखबार के किन-किन रिपोर्टरों से मिला। ....कि किस रिपोर्टर ने आज हमारी कौन-सी खबर लीक की। ....कि फलां कार्यक्रम के इनोग्रेशन में फलां संपादक को क्यों बुलाया गया, हमें क्यों नहीं। .....कि पत्रकार संघ के चुनाव में हमारे अखबार का कंडीडेट विरोधी अखबार के कंडीडेट से क्यों हार गया, मतदान में कौन-कौन से हमारे-अपने विभीषण रहे?
2. फटीचर मंडल सर्कुलेशन इंचार्ज हैं। उनको आज-कल एक ही चिंता खाए जा रही है। एबीसी वाले शहर में डेरा डाल चुके हैं। अब क्या होगा। साल भर रिपोर्ट तो नंबर दो में बनी है। अब वे खंगालेंगे एक-एक रिकार्ड। बाहर रास्ते में अखबार के बंडल से लदी गाड़ियां चेक करेंगे। मंडल साहब एक बार फिर उसी आजमाये पुराने फार्मूले को भिड़ाने में जुटे हैं कि सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। चार-पांच जोड़ी जूते, चार-पांच दर्जन चूड़ियां और साड़ियां, दस किलो मिठाई, प्रति कंडीडेट दो-दो सेट कपड़े...। ऐं, ये क्या है? सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल से पूछिए!!
3. सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल की एक टेंशन हो तो झेल भी जाएं, रोज चार तरह के टेंशन। आज-कल एजेंटों का फिर माथा फिरा हुआ है। सवेरे अखबार के बंडल उठाने की बजाय सेंटर पर पहले मीटिंग करते हैं। नेतागीरी का शौक चढ़ा है। कहते हैं, आज हम अखबार नहीं उठाएंगे। पहले एक रुपया हमारा कमीशन बढ़ाओ। अब कमीशन कहां से बढ़ाएं। अखबार का रेट बढ़ाते ही ग्राहक बोलते हैं, ई कूड़ा-कबाड़ा हमे नहीं पढ़ना, कल से अखबार बंद कर दो। अब रेट बढ़ाएं तो सांसत, न बढ़ाएं तो। इसी चक्कर में रोजाना सर्कुलेशन गिर रहा है। लगता है कि इन पर भी वहीं पुराना फार्मूला एक बार फिर आजमाना पड़ेगा....दै डंडा, दै डंडा, पट्ट कर दो सबों को एक साथ। अभी क्राइम रिपोर्टर से तिग्गी भिड़ाता हूं कि पिटाई के समय कोई पुलिस वाला बीच में न आए।
4. मुच्छड़ दुबे पुराने गुंडे हैं। कालेज के दिनो के। बेचारे ने अखबार में नौकरी कर ली है। अब उसे रोज अपने संपादक को बताना है कि कौन, किसके कान में क्या फुसफुसा रहा था। किस रिपोर्टर की किससे ज्यादा पटती है, मुझसे किसकी ज्यादा फटती है। आज कल डेस्क वाले शाम को आने वाली मिठाइयों को क्यों दबा जा रहे हैं। खुद ही खा जा रहे हैं। चुनाव का मौसम है। फिल्ड से मिठाइयों के इतने पैकेट रोजाना आ रहे हैं, मेरी मेज तक एक भी नहीं पहुंचे। जरा पता तो लगाओ, इसके पीछे शरारत किसकी है, किसका दिमाग इतना तेज काम कर रहा है, अभी दुरुस्त करता हूं। आखिर मैं भी बाल-बच्चेदार हूं, दो-चार पैकेट मुझे भी तो घर के लिए चाहिए। आज-कल रिपोर्टरों को फिल्ड में खूब गिफ्ट भी मिल रहा, सो अलग से। सब दबाके बैठ जा रहे हैं, जरा कस के पता करो, बाकी सब काम-धाम छोड़ दो। ठीक-ठीक पता कर लिये तो इस बार प्रमोशन-इंक्रीमेंट डबल। इसी तरह लगे रहो, लंबी रेस का घोड़ा बनोगे, पत्रकारिता में आगे चल कर बड़ा नाम करोगे पट्ठे। और क्या, तुम कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े ही कर रहे हो दुबे जी। सबसे पक्का काम कर्मचारियों की जासूसी और इधर-उधर का लगाना यानी चुगलखोरी। तुम भी खुश, हम भी खुश। अखबार जाए चूल्हे भाड़ में।
5. चिंटू-पिंटू की ड्यूटी है कि सबके उसमे (.....) डंडा किए रहो। किस-किस के उसमें (.....) डंडा करना है सर? अरे!! ये भी कोई पूछने की बात है! दाढ़ी-मूंछ सफेद कर लिये प्रेस की नौकरी में, और ये तक पता नहीं कि किस-किसके उसमें (....) डंडा किये रहा जाता है? होटल वालों के, थाने वालों के, सिनेमा वालों के, मंडी वालों के, मिठाई वालों के, शो रूम वालों के, बिजली वालों के, पानी वालों के, मीट-मुर्गा वालों के, फल-सब्जी वालों के, ठेकेदारों के, नेताओं के, उठावनी के विज्ञापन देने वालों के.....। सर, तब तो पूरे शहर के उसमें (.....) डंडा करना पड़ेगा! हां, और क्या। तुम्हे रक्खा किसलिए गया है चिंटू-पिंटू। कुछ मालूम है, चूतिया कहीं के! मादर......च्च्च्च्चो।
6. तरकर जी बड़े सीनियर जर्नलिस्ट हैं। अब तक देश के उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम के दर्जन भर से ज्यादा अखबारों में नाम कमा चुके हैं। हर शहर में उनकी बस दो ही जरूरतें रहीं हैं, एक बीवी और एक मकान। इस तरह अब तक करोड़ों की नाजायज जायदाद और दर्जन से ज्यादा नाजायज औलाद के विधाता बन चुके हैं। तो भी तरकर की व्यथा-कथा अनंता। दर्दे-दिल ये कि सब कुछ अपने ही डकारते रहे, अपने ऊपर वालों से बेखबर। सो फ्रस्टेशन बढ़ता गया, बढ़ता गया। मुद्दत से सब-एडिटरी। यानी जिंदगी बीती जा रही, हाई स्कूल पास न हुए। जब जोरू-जायदाद खुद ही सब डकार जाओगे तो प्रमोशन-इंक्रीमेंट क्या खाक मिलेगा।
7. लुच्चा पंडित ने पत्रकारिता में कमाई-धमाई का अव्वल आइडिया अख्तियार कर रखा है। साल में सिर्फ दो प्रोग्राम कराते हैं और फूल कर लाल हो जाते हैं, जैसे अमेरिकी सुअर। उनकी एक जुगाड़ मुंबई है। उसके आशीर्वाद से समर सीजन में फिल्म वालों का प्रोग्राम। दूसरा दिल्ली-कलकत्ता में। उसका काम है खेल-खिलाड़ियों के साथ तिग्गी भिड़ाना। सो जाड़े में नेशनल टूर्नामेंट। बस। ना काहू की चुगली, ना काहू की दलाली। पंडी जी का यह डबल गेम उनके ऊपर वालों को लट्टू किए हुए है। कमाई में दस परसेंट ऊपर वालों के बाल-बच्चों के लिए। तुम भी खुश, हम भी खुश। यही सब तरकर जी को नहीं करने आया वरना आज एडिटर की कुर्सी पर होते।
8. सत्येंद्र नरवार तबादले की कौवा हंकनी से परेशान हैं, क्या ससुरा सिर पर पत्तरकारिता का भूत चढ़ा था, इस पेशे में चला आया। इतनी पढ़ाई-लिखाई सब व्यर्थ। लगता है लुच्चा पंडित वाला रास्ता ही धरना पड़ेगा, वरना हर छमाही तबादला। कहां तक झेलें। टाइम आफिस वाले कहते हैं, ऐसा सार्टिफिकेट लेकर अखबार में क्या करने चले आए। यहां तो चुगलुओं का राजपाट चलता है। अरे चोगद जी, बन जाओ चुगलू मादर...च्च्च्च्चो....तुम भी उसकी तरह मजे करोगे। फिर कभी न होगा तबादला। इंक्रीमेंट-प्रमोशन अलग से। समझे बच्चू सतेंदर नरवार!
9. एक जनाब मणिसाना वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने की बेकरारी में इतने सस्वर हो उठे कि आजकल रेलवे रोड पर चाय-पान का खोखा चला रहे हैं। मालिक को फूटी आंखों नहीं सुहा रहे थे। निकाल बाहर किया। तेरी ये हिमाकत। यहां लोग अट्ठारह-अट्ठारह घंटे मरा रहे हैं, चूं तक नहीं कर रहे और तू पत्रकार का चोद्दा, दस घंटे काम करके मणिसाना-मणिसाना चिल्ला रहा है....ऐं!!
10. एक और थे। भीतर-ही-भीतर यूनियनबाजी के पर्चे बांट रहे थे। मनीजर बाबू को किसी चुगलू से भनक लग गई। ऐसा संट किया कि आज कल दिल्ली में आईटीओ पर आटो चला रहे हैं। लेकिन हैं बड़ी मस्ती में। अखबार का नाम लेते ही एक सांस में सौ-सौ गालियां धाराप्रवाह ...... मादर.... च्च्चो .... फादर.... च्च्च्चो...... बाहन.... च्च्च्च्चो...... बेटी..... च्च्च्च्चो....
-(सभी नाम काल्पनिक, बाकी सब सही-सही)
(हिंदी पत्रकारिता के पाप का खुलासा करने का बीड़ा उठाया है जेपी नारायण ने। बेहया नामक अपने ब्लाग पर वे लगातार हिंदी पत्रकारिता पर लिख रहे हैं। उन्हीं के ब्लाग बेहया http://behaya.blogspot.com से उपरोक्त तीनों पोस्टें उठायी गई हैं। आप सभी भड़ासियों से अनुरोध है कि उपरोक्त तीनों पोस्टों को गंभीरता से पढ़ें और एक एक लाइन धैर्य के साथ पढ़ें। आपको जरूर लगेगा कि दरअसल ये प्रतीकात्मक कहानियां आपके आसपास की वो कड़वी सच्चाइयां ही हैं जिनसे आप रोजाना की जिंदगी में हमेशा दो-चार होते रहते हैं। जय भड़ास...यशवंत)
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
0
comments
Labels: खुलासा, जेपी नारायण, पत्रकारिता, पाप, बेहया, ब्लाग, भड़ास, हिंदी मीडिया
23.4.08
कैसे कैसे कामरेड बनाम रोहिणी में एक दढ़ियल कुत्ता!
--जेपी नारायण--
...वह रोहिणी (दिल्ली) की गलियों में दाढ़ी बढ़ाकर घूम रहा है। पहचानो उसे, मार भगाओ। वह एक शातिर मठाधीश है। कुत्ते की तो भी एक दियानतदारी होती है। मजदूरों के नाम पर उसने अपनी दुकानदारी जमा रखी है। पहचानो उसे। पहचानो। उसकी दुकान में तरह-तरह के माल है। समाजवादी माल। जनवादी माल। वह पुस्तक-फरोश क्रांतिकारिता का अलमबरदार बना छुट्टा घूम रहा है। अपने तरफदारों के बीच कहता है कि वह भूमिगत है। नक्सलवादी है लेकिन हकीकत ये है कि वह कुछ और ही कारनामो को अंजाम दे रहा है। पहचानो उसे। पहचानो!
जनवाद और समाजवाद के नाम पर हजारो कथित कामरेड ऐसे भी है जो लेबी के पैसे से कोढियों की तरह पल रहे हैं। ठाट की जिंदगी जी रहे हैं। बेटे-बेटी के शादी व्याह रचा रहे हैं। विदेशी ब्राड के कपड़े पहन कर मारुति से दिल्ली की गलियों में घूम रहे हैं। उन्हीं में एक जनाब ऐसे हैं जो मीडिया की आड़ में पुस्तक का धंधा कर रहे हैं। इन कथित क्रांतिकारियों ने अब तक हजारो लोगों को चूना लगाया है। सैकड़ो लोगो के घर-मकान बिकवा दिए। और दर्जनों लोगों के साथ ऐसा शर्मनाक कृत्य किया, जिसे सुन कर कोई भी शर्म से गड़ जाए। ऐसे लोगों को इन धंधेबाजों ने पहले तो विचारों की घुट्टी पिलाकर संगठन में शामिल किया, रूपये-पैसे दुहे, जब वह आर्थिक मदद देने लायक नहीं रहा तो निकाल बाहर किया।
----एक ऐसी ही लड़की, अपना घर-परिवार छोड़कर पति के साथ इन धंधेबाजों के चंगुल में फंस गई। इस बीच उसके पति का आर्थिक दोहन चलता रहा। इसी बीच वह लड़की प्रीगनेंट हो गई। तब तक इस दंपत्ति का भरपूर दोहन किया जा चुका था। ...और फिर उनके साथ भी वही हुआ, जो अब तक दर्जनों के साथ हो चुका था। उन्हें संगठन से खदेड़ दिया गया। वे दिल्ली की गलियों में काफी समय तक दर-दर भटकते रहे।
........कारनामा यही तक होता तो गनीमत थी। इन धंधेबाजों का एक और हैरतअंगेज कारनामा। वे क्रांति के लिए संघर्ष का नारा देते हुए शोषण का जोरदार आइडिया भी बखूबी आजमा रहे हैं। उन्होंने दिल्ली में एक ट्रांसलेशन ब्यूरो खोल रखा है। ब्यूरो में युवाओं को रोजगार के नाम पर चूसा जा रहा है। ब्यूरो के कर्ता-धर्ता प्रकाशकों से या अन्य सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों से ट्रांसलेशन के लिए मैटर जुगाड़ लाते हैं। बेरोजगार युवा उन्हें अनूदित करते हैं। एक-एक युवक प्रति माह २५ से ३० हजार रुपये तक का काम कर देता है। उसमें छह से आठ हजार रुपये उसे पकड़ा दिए जाते हैं, बाकी रकम धंधेबाजों के जेब में चली जाती है, जिससे वे ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं, समाजवाद पर लंबे-लंबे आख्यान देते हैं। और धंधेबाजों का दावा होता है कि ट्रांसलेशन ब्यूरो की लंबी कमाई क्रांति के कारोबार में लगाई जा रही है।
...उनकी करनी अनंत है, यहां कितना गिनाएं-बताएं। इन मुफ्तखोरों के आए दिन मैग्जीनों में लंबे-लंबे लेख छपते हैं। जनवाद-समाजवाद की बातें होती हैं और अंधेरे की करतूतें ऐसी कि वामपंथ गया तेल लेने।
....और तरह-तरह के रंगे-सियार वामपंथ के नाम पर १९५० के दशक से जो कुछ कर रहे हैं, नांदीग्राम जैसी पटकथाएं लिखते हुए आजकल प.बंगाल में पूंजी निवेश के लिए पाजामा खोले खड़े हैं। उनके हजारो-हजार कथित कम्युनिस्ट कार्यकर्ता फिल्ड में नित-नए कीर्तिमान रच रहे हैं। कोई इप्टा के नाम पर धंधा चला रहा है तो कोई भाकपा-माकपा के नाम पर। कोई गोली-बंदूक लेकर बीहड़ में चौथ वसूली कर रहा है तो हथियारों की तस्करी तक में लिप्त है।
इस तरह देखिए-जानिए कि कम्युनिज्म के नाम पर देश में कितना बड़ा कारोबार चल रहा है। शर्म है ऐसे कथित वामपंथियों पर, धिक्कार है उनकी काली करतूतों को। बात सियासत तक ही नहीं, एक-से-एक घाघ बुद्धिजीवी बहसों में, कविताओं, लेखों में, मंचों पर, गोष्ठियों में इस तरह नमूदार होते हैं, मानो वाह-वाह झुग्गी-झोपड़ी का क्या खूब दर्द उड़ेला है, और अपनी निजी जिंदगी में वातानुकूलित कमरों, हवाई उड़ानों के आनंद से लबरेज होते हैं। कोई स्री-विमर्श के नाम पर दिल्ली में मजे कर रहा है तो कोई एनजीओ के कारोबार में लाखों की कमाई में अस्तव्यस्त है। ....फिलहाल तो इतना ही।
-जेपी नारायण के ब्लाग बेहया (http://behaya.blogspot.com) से साभार
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
5
comments
Labels: करतूत, कहानी, कामरेड, चेतावनी, जेपी नारायण, पर्दाफाश, बेहया, सावधान
15.4.08
जो रहे काशी, उसको कहां उदासी, जय भोले!
दुबे जी को वही जाने, जिसने कभी उनका जीवट देखा हो। नौकरी और रोजगार के एक-से-एक दमदार नुस्खे, जोरदार आइडियाज। जो सुने, कायल हो जाए। वाह-वाह कर उठे। वाकई दुबे जी जो बताते हैं, आज के रोजगार उस पर अमल करने लगें तो किसी के आगे हाथ फैलाने, दांत चियारने की नौबत न आए। कुछ इसी तरह की तरकीबों और दांव-पेंच से सत्तू नरायन हो गए श्रीसत्यनारायाण दुबे जी!
दुबे जी कहते हैं, आज के जमाने में भी नौकरियां उन्हें नहीं मिल रही हैं, जो नौकरियां खोज रहे हैं। उल्टे हजार-हजार नौकरियां उन्हें खोज रही हैं, और वे हैं कि बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं। लाखो-करोड़ों रुपये हवा में उड़ रहे हैं। बस पकड़ने का हुनर चाहिए। जिनके पास अक्ल है, उन्हें नौकरियां खोज रही हैं, उनके ही हाथों में उड़ते नोट सट्ट-सट्ट आ रहे हैं। उनके लिए दुनिया स्वर्ग है, हरी-भरी है, खूब भरी-पूरी है। जो अक्ल के पैदल और आंख के अंधे हैं, उनके लिए दुनिया नर्क है, मुश्किलों का अखाड़ा है, न नोट उनकी पकड़ में आ पाता है, न नौकरी। बात 1980 की है।
दुबे जी बताते कि....हजारों युवा लखैरों की तरह घूम रहे हैं। उन्हें देखकर तरस आता है और गुस्सा भी। तुम भी तो बेरोजगार हो। तुम क्या, तुम्हारे साथ दस और बेरोजगारों को बैठे-ठाले काम मिल जाएगा। बस, मैं जैसा बताता हूं, वह कर डालो। बगल में बनारस है। गंगा मैया वहां से गुजरती हैं। अपने दस बेरोजगार साथियों में से पांच को दिन की ड्यूटी पर लगाओ, पांच को रात की ड्यूटी पर। करना ये है कि बनारस से मुगल सराय जाने वाले रोड के गंगा-पुल पर नदी-तल में एक बड़ा-सा जाल बिछा दो। जो भी वाहन-ट्रेनें आदि पुल से जब गुजरते हैं तो सवारियां गंगा मैया के नाम पर पुल के नीचे पैसा फेंकती हैं। रोजाना हजारों रुपये। सारा पैसा जाल में इकट्ठा होता जाएगा। सुबह-शाम जाल समटे कर पैसे बटोर लिया करो दोनों हाथों से। लगे हर्र-न-फिटकरी, कमाई लाखों की। जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले! दुबे जी की महिमा अपरंपार।
एक दिन बोले कि तुम्हे ऐसा काम बताता हूं, करोड़ों की कमाई हो जाएगा, लागत बस हजार-पांच सौ की। तुम्हारे कवि-गुरू श्याम नारायण पांडेय, अरे वही हल्दीघाटी वाले, यहीं बगल के गांव डुमरांव में रहते हैं। हल्दीघाटी महाकाव्य को कौन नहीं जानता। पांडेय जी के रोम-रोम में पैसा है। उनके रोम-रोम को बेंच डालो। कैसे कि......एक हजार पर्ची छपवाओ, उस पर स्लोगन होगा...हल्दीघाटी द्वार का निर्माण। कहां बनेगा हल्दी घाटी द्वार.... पंडित जी के गांव में। तुम बताओगे कि लागत आएगी पांच-दस करोड़। द्वार के लिए पंडित जी से एक पत्र लिखवा लो। उसकी एक हजार फोटो स्टेट करा लो। पर्ची और पत्रों का गट्ठर लेकर राजस्थान निकल जाओ। वहां के रजवाड़े-रईस महाराणा प्रताप के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं। उन्हें एक-एक पर्ची और पत्र की फोटो स्टेट थमाते जाओ, अपनी थैली भरते जाओ। एकाध महीने बाद इधर हल्दीघाटी द्वार के लिए डुमरांव रोड पर दो-चार हजार ईंटे गिरवा दो। फिर तो बेटा पर्ची काटते रहो, काटते रहो, थैली भरते रहो, भरते रहो। वैसे भी पंडित जी के पांव कब्र में लटके हैं, जाने कब टपक जाएं, फिर कौन पूछने वाला कि हल्दीघाटी द्वार के चंदे का क्या हुआ, अपना ठाट से गंगाघाट पर घर-मकान बनाकर काशी के हो जाओ। सात पुश्तें मजा करेंगी। जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!वाकई दुबे जी कमाल के। पांच साल में उन्होंने पांच कारखाने खोले। एक-एक कर पांचों का दीवाला। दस परसेंट अफसरों को थमा कर बाकी करोड़ों का लोन गया दुबे जी के बैंक खाते में।
एक दिन दुबे जी ने कहा। भाई लोग हट्टे-कट्टे हैं। नौकरी के लिए दांत चियारे दर-दर भटक रहे हैं। और नौकरी पांव में पड़ी है। एक काम और। हजारों को रोजगार मिल जाएगा घर बैठे। क्या कि..... ज्यादातर बेरोजगार किसानों के बेटे हैं। सबके यहां खूब गेंहूं होता है। सौ-पचास दुकानदारों से एडवांस में आर्डर लो। गेहूं का दलिया पिसवाओ, गांव की मजदूरिनों से पैकेटिंग करवाओ, दनादन सप्लाई करो। हर किसान सरसों उगाता है। इसी तरह सरसो के तेल की सप्लाई करो। हमारे इलाके में तो चावल भी खूब होता है, इसके भी तरह-तरह के आइटम तैयार करो, बेंचो। दस तरह के आइटम गुड़ से बनते हैं। भैंस पालो, दूध बेंचो। देखो न, दूध के लिए कितनी मारामारी मची है। अरे कुछ नहीं, तो पत्ते से कितने तरह के सामान बनते हैं। उनकी बगल के बनारस में ही खूब खपत है। पत्ते बीनो, बेंचो। मालदार बन जाओ। कौन रोकता है तुम्हें ऐं! जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!
((उपरोक्त लेख जेपी नारायण के ब्लाग बेहया से साभार लिया गया है))
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
Labels: किस्सा, जेपी त्रिपाठी, पत्रकार, बाजार, बेहया, भड़ास, मार्केट, संस्मरण
