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16.8.14

पतित पावन पतरातू - एक रेल यात्रा

हर एक वो जगह जहाँ ट्रेन रुकती है, स्टेशन नहीं होता।

उस औरत को यह मालूम न था।

ट्रेन रूकती नहीं की पूछ पड़ती -

“कौना टेशन है बबुआ?”



हर एक वो ट्रेन जो चलती है, पतरातू नहीं जाती।

उस औरत को तो यह भी न था पता।

जो भी जिस ट्रेन में कहता चढ जाती और कहती -

“पतरातू आते बतला दीहऽ बबुआ”



कुल मिलाकर वो उसकी तीसरी ट्रेन थी और वो भी पतरातू नहीं जा रही थी। लोगों से सलाह मिली धनबाद में उतर कर दूसरी ट्रेन लेने की, पर उसे कितना समझ आया वो वह ही जानती थी। वह बार-बार बंद दरवाजों और खिड़कियों को खोल बाहर झाँकना चाहती, जैसे अपनी धरती, अपने खेत, अपना घर आते हीं पहचान लेगी। पर उसे गेट और खिड़कियाँ खोलना भी नहीं आता था। बार-बार असफल प्रयास किया उसने गेट को खोलने का, फिर थक कर बैठ गयी।



उस औरत का स्लीपर से सरोकार क्या?

टिकट और जुर्माने से सरोकार क्या?

काले कोट और खाकी वर्दी वालों से सरोकार क्या?

नए रेल बजट से सरोकार क्या?



वो डब्बा स्लीपर वाला था, टिकट थी उसके पास जेनरल की और वो भी पिछले दिन की (वह पिछले दिन से सफर कर रही थी)।  कभी काले-कोट वाले फटकार कर चले जाते, कभी खाकी वर्दी, तो कभी कोई अन्य यात्री। सभी एक ही भाषा में बात करते -

“हुह!... उहाँ जाकर बईठो” ,

“होने जाओ, होने” ,

“जेनरल में जाकर बईठो”



किसी वेटिंग वाले ने संवेदना से कह दिया -

“गेटेर पाशे बोशे जान ... गेट के पास बैठ जाईए”

तो चढ़ने-उतरने वाले डाँटने लगे कि

“गेट तो छोड़ के बैठो”

  

आखिर में वो अपनी गठरी लेकर शौचालय के बाद डिब्बों के जुड़ाव वाली जगह पर बैठ गयी जहाँ गंध तो आ रही थी पर अभद्र फटकारों से अच्छी थी। जुड़ाव वाला स्थान जहाँ वो बैठी थी लहरों सा ऊपर नीचे हो रहा था। वो बगल के फाँकों से नीचे पटरियों के बीच झाँकने लगी और मुस्कुराते हुए उसी में मग्न हो गयी। उसे देख ऐसा लग रहा था कि मनो वो किसी ट्रेन में नही बल्कि एक नाव में बैठी है। नाव लहरों पर ऊपर नीचे हो रही है और वह औरत नीचे नदी की उलटी धार को चीरती हुई उसकी नाव को देख आनंदित हो रही है। उसे अपने खेवैये पति पर भी खूब भरोसा है कि वो उसे पतरातू तक जरूर ले जा पायेगा सुरक्षित। बैठे-बैठे उसकी आंखें लग गयी। फिर थोड़ी देर बाद वह वहीँ लेट गयी।



शाम से रात हो चुकी थी।



कुछ देर बाद एक भूंजा वाला पिछले डब्बे से आया और उसकी गठरी पर पैर रख दिया। अचानक उसका ध्यान टूटा और उसके मुँह से फूट पड़ा -

“अभगला, ई मोटरी में कशी बाबा के परसाद हथीन, करम फूट गेल हउ का तोहर? जो.. जो.. जो..”

भूंजा वाला कुछ बुदबुदाता चला गया।

 उस रस्ते अब कुछ और भी लोग आने लगे थे। कभी अंडा वाला, कभी पानी वाला, कभी गुटखे वाला, कभी हरा-चना वाला तो कभी चाय वाला।

इसी आने-जाने के क्रम में एक और मुसीबत आई। एक अंडे वाले की बाल्टी उसके सर पर जोर से लग गयी और वह तिलमिला उठी -

“अन्हरा मुझऊंसा मार देलक रे मार देलक...”

 अंडे वाले ने भी जबाब दिया -

“रास्ता पर बईठेगी त अईसाहीं न होगा, जेनरल में काहे नहीं जाती है”

 झगडा बढ़ने लगा और दोनो गालियों पर उतर आये। वो यात्री जिनकी अभी-अभी मीठी नींद लगी थी, जाग गए और चिल्लाने लगे दोनों पर। औरत को भी जम कर डांटा गया -

“जेनरल बना है न तुम्हारे लिए, जाओ.. जेनरल में जाकर कहे नहीं बैठती? टीटी साहेब को आने दो बेलगाते हैं तुमको यहाँ से”



काले कोट वाले साहब आये और हिदायत दिया कि “अगले स्टेशन आने पर जेनरल में नहीं गयी तो जेल में डाल देंगे”

औरत ने पूछा “जेनरल केने है?”

टीटी साहेब बोले “पीछे का चार डब्बा छोड़ के अगला वाला डब्बा”

“आठ गो गेट छोड़ के अगला गेट”



अगला स्टेशन काफी छोटा था, ट्रेन का तो स्टॉपेज भी नहीं था सिर्फ सिग्नल के लिए रुकी थी। वह औरत झट से उतरी, गेट गिनते-गिनते जेनरल बोगी तक पहुँची पर भीड़ देख कर दंग रह गयी। जेनरल बोगी पूरी खचाखच भरी हुई थी। होली की भीड़ थी, सभी कमा कर अपने-अपने घर वापस जा रहे थे। उसने बहुत कोशिश की पर चढ़ नहीं पायी। किसी ने बोला पीछे वाले डिब्बे में जाओ तो वह पीछे चली गयी पर उधर भी वही हालत। फिर किसी ने बोला पीछे जाओ और वो पीछे चलती गयी पर किसी में भी जगह नहीं मिली उसे चढ़ने को। उसे कुछ समझ नहीं आया वो वापस अपनी पुरानी जगह लौटने लगी। इसी बीच ट्रेन खुल गयी और वो दौड़ने लगी ट्रेन से तेज पर थोड़ी देर में ट्रेन और तेज हो गयी और वो चिल्लाती रह गयी -

“रोकऽ.. रोकऽ.. रोकऽ न हो भईया..या.. टरेन रोकऽ न.....”

ट्रेन की रफ़्तार तेज होने लगी और उसकी धीमी। ट्रेन अपने पूरे होश में दौड़ने लगी और वह औरत हाँफते हुए बेसुध गिर गयी वहीँ प्लेटफार्म पर। जब तक ट्रेन थी, प्लेटफार्म पर रौशनी थी, ट्रेन जाते ही अँधेरा छा गया ठीक उसकी किस्मत के इन दो दिनों जैसा।



जिस तरह अपने किसी सहयात्री के गिरे पड़े होने से ट्रेन को कुछ फर्क नहीं पड़ता, ठीक वैसे ही ज़माने को किसी एक वर्ग के पतित-पिछड़े होने से फर्क नहीं पड़ता.. हम चलते जाते हैं उन्हें कहीं पीछे गिरा-पड़ा छोड़। – प्रकाश ‘पंकज’

4.12.12

"रिश्वतखोरी" गुनाह या मजबूरी ?



देखो......सर मैंने कुछ नहीं किया!
रे भाई तो फिर क्या मैंने किया है, अब तो जो दंड बनता है वो तो तन्ने भरना ही पड़ेगा।

ऐसा क्यों सर जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो मैं क्यों भरू सर ये दंड!!!
देख छोरे मैं तन्ने ना जाने दू तू चाहे तो अपने आपको बचा सकता है और इस दंड से भी बच सके है।।।

एक मन तो किया की वही छोड़ के अपनी गाडी घर को लौट आऊ पर घर वालो ने पूछा तो क्या जवाब दूंगा। क्या बोलूँगा की मैंने अपनी बाईक किसी ठुल्ले को थमा दी और चला आया। फिर सोचा की दोस्त की धौस जमा के देखू शायद मैं निकल पाऊ  इन सब झमेलों से।
सर, मैं एक कॉल कर सकता हु अपने भाई को ?
क्यों रे छोरे तेरा भाई कोई तोप  हैं क्या कही का, जा करले जो करना है अब तो तेरी गाड़ी जब्त होगी!!

क्या जब्त!!!
पर क्यूँ आप मेरा चालान तो बनाओ और मुझे कही और भी जाना है।

देख छोरे इब  तो तेरा कोई चालन ना कट सके है। चाहे तू जो करले, इब तो अपनी गद्दी थाने से छुडवा लियो और करले कॉल जिसे कर रहा था। उसने जबरन मुझसे चाभिया मांगी और मैंने उसे पकड़ा दी।

फिर क्या था वो ठुल्ला मेरी बाईक ले गया और ठाणे में जमा करवा दी। मैंने भी मन ही मन सोचा हुआ था कुछ भी हो जाए इसे घूस तो बिलकुल भी नहीं देनी। हम लोगो ने ही इसे इतना बढावा दिया है हमें ही इसे रोकना चाहिए। ऐसे ही कुछ अछे विचारो का जैसे सैलाब सा उमड़ आया मेरे मन में।

सोचा घर जाके सबको बोल दूंगा की मैंने ठुल्ले को घूस ना दे कर कितना अच्छा काम किया हैं। घर पंहुचा और माँ से बोला माँ मेरी मोटर साईकिल एक ठुल्ले ने जब्त कर ली क्योंकि मेरे पास बाईक के बीमा के कागजात नहीं थे। और उसके घूस मांगने पर मैंने उसे घूस ना देकर देखो समझ पे कितना बड़ा उपकार किया हैं।

माँ चीखते हुए......ये क्या किया अभी गाडी कहाँ हैं?
गाड़ी तो ठाने में बंद हैं।
तू पागल तो नहीं हैं तुझे क्या जरूरत थी उसे गाडी की चाभी दने की, दे देता उसे 50, 100 रुपये और मामला रफा दफा करता।
मैं थोडा रुवाब झाड़ते हुए क्या माँ आप भी ऐसा क्यों बोल रहे हो? आपको तो बल्कि मुझे शाबाशी और मेरा हौसला बढाना चाहिए. आपके लड़के ने गलत का साथ नहीं दिया बल्कि सही का साथ देते हुए इस रिश्वतखोरी के खिलाफ अपना पहला कदम बढाया हैं।

बेटा जी ये जो बाते तू बोल रहा हैं न आज के समय में सिर्फ फिल्मो में या सिर्फ सुनने में ही अच्छी लगती हैं क्यूंकि असल जीवन में ये तार्किक बाते नहीं काम आती।  और रही बात समाज में फैली बुराईयों से लड़ने की बात तो बेटा उसके लिए तो वो अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी बैठे ही हैं न, फिर तू क्यूँ इन्हें अपना काम करने से रोक रहा हैं?

क्या माँ आप भी और लोगो की तरह सिर्फ अपने बारे में सोच रहे हो मैंने तो सिर्फ रिश्वतखोरी की बात ही की थी आपने तो पता नहीं कहा अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे महान समाज सेवियों तक बात पंहुचा दी। मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हु की समाज को शुधारने की शुरुवात तो सबसे पहले पहल तो हमें ही करनी पड़ेगी न। और रही बात बाईक की वो तो एक माफ़ी पत्र थाने में SHO के हस्ताक्षर करवा के जमा करवा देना हैं बस उसी दिन बाईक मुझे मिल जायेगी। बस इतना ही तो करना है और गलती तो मेरी ही थी न जो मैंने ध्यान नहीं दिया की बाईक का बिमा ख़त्म हुए सप्ताह बीत गया हैं। अब दूसरा बीमा भी बाईक लाते ही करवा लूँगा।

बेटा अभी तू इन थाने के चक्करों में नहीं पड़ा न, तो ऐसी बाते कर रहा हैं। चल देखते है तेरी बाईक कब छूटती हैं।
मन में मैं यही सोच रहा था की आखिर माँ ने ऐसा क्यूँ बोला। क्या इतना मुश्किल हैं इस समाज में अपने सभी दायित्वों के प्रति जागरूक होकर रहना?

सोचा की पहले पत्र  लिख लू बस फिर क्या पत्र  लिखते ही थाने पंहुचा और सीधे ही SHO साहब के कक्ष की और तेजी से चल पड़ा।  जाकर पता चला की साहब तो हैं ही नहीं वो अगले दो दिन के लिए किसी दुसरे राज्य में कोई सेमिनार में सिरकत करने हेतु गए हुए हैं। सोचा चलो कोई नहीं पत्र तो लिख ही लिया हैं दो दिन बाद फिर आ जाऊंगा और उनके हस्ताक्षर ले ही लूँगा और इसी बहाने थोडा पैदल चलने का मौका भी मिल जाएगा।

दो दिन बाद फिर से साहब के कक्ष की और गया तो पता चला साहब दौरे पर निकले हुए हैं। मैंने एक साहब से पूछा की कब तक आयेंगे तो पता चला की उनके घर पे कोई पारिवारिक त्यौहार हैं वो सीधे ही घर की और निकल जायेंगे। थोड़ी झल्लाहट हुई मन में पर उसे नकारता हुआ सोचा की चलो कोई नहीं जहा 2 दिन इन्तेजार किया वह 1 दिन और सही।

अगले दिन फिर मैं साहब के कक्ष की और बड़ा तस्सली हुई देखकर की साहब आज बैठे हुए हैं और वह आये कई लोगो के पत्रों पे पाने हस्ताक्षर करने में थोड़े व्यस्त हैं। मैं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठ गया। करीबन डेढ़ घंटे बाद जब मेरी बारी आई तो वह गेट पर खड़े एक व्यक्ति ने जो की सादे लिबास में था, ने मुझे रोका और काम पूछा की क्यूँ मिलना चाहता हु मैं SHO  साहब से?

मैंने उसे बताया की मेरी बाईक बंद हैं और इसी सिलसिले में मैंने एक माफीनामा पत्र लिखा हैं और उसी पत्र पे साहब के हस्ताक्षर लेने हैं और इसे थाने में जमा करवा कर अपनी बाईक छुडानी हैं।

उस आदमी ने मेरी तरफ देखा और बोला की भाई मैं तुम्हारे इस पात्र पे साहब के हस्ताक्षर करवा सकता हु बशर्ते मैं उसे कुछ बक्शीश या ये कहूँ की वो अप्रत्यक्ष रूप से मुझसे रिश्वत की मांग कर रहा था। मन तो मेरा ऐसा किया की उसकी शिकायत साहब को जाकर अभी कर दू पर वो कम्बखत वही दरवाजे पे अड़ा खड़ा हुआ था और उन्ही को अन्दर जाने दे रहा था जो उसकी बात मानकर उसे बक्शीश/रिश्वत दे रहे थे।

मैंने सोचा क्यूँ न सीधे ही अन्दर घूस जाऊं और साहब को इसकी शिकायत लगा दू और अपने पत्र पे उनके हस्ताक्षर करवा लूँ।

मैंने उसे थोडा पीछे की और धकेलकर आगे बढकर सीधे ही साहब की मेज की और बड़ा और साहब को अपना पत्र देते हुए कहा सर इस माफीनामे पत्र पर आपके हस्ताक्षर की जरूरत हैं। कृपया करके आप इस पर हस्ताक्षर कर दे। वही पीछे से भागता हुआ उनका चमचा आया और साहब को बोला साहब ये छोरा जबरन अन्दर आया हैं। साहब मुझे घूर के थोड़े गुस्से वाले मुद्रा में निहारने लगे।

सर मैं पंक्ति में ही था और जब मेरा नंबर आया तो ये जनाब मुझे बक्शीश की मांग करने लगे और कहने लगे की बक्शीश दो और अपना काम आराम से करवा लो। सर मैं इस बक्शीश के बिलकुल खिलाप हूँ और इसका मैं पुरजोर विरोध करता हूँ। और तो और इसने ये मांग मुझसे ही नहीं अपितु सभी से की हैं और जो लोग इसकी मांग को पूरा कर रहे हैं वो ही आपके पास तक पहुच रहे हैं।

इतना ही बोला था की साहब ने पहले तो मुझे बड़े ही अजीब ढंग से देखा और दुसरे लोगो की तरफ भी और पूछा की क्या ये लड़का सच बोल रहा हैं?
सभी ने एक साथ ही बोला जी सर ये बिलकुल सही बोल रहा हैं और ये बंद हर किसी से बक्शीश ले कर ही आप तक पहुचने दे रहा हैं।

साहब ने उसे खूब डाटा  और कहा की आगे से उसने किसी से भी बक्शीश की मांग की तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।मैं मन ही मन खुश हो रहा था की चलो कुछ तो अच्छे लोग बचे हुए हैं जो आज भी जागरूक है अपने कर्तव्यो के प्रति। साहब ने मुझसे मेरा पत्र माँगा और थोडा उसमे कुछ पढने के बाद बोले की इस पर मैं अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकता क्योंकि इस पर टिकट नहीं लगी हैं पहले वो लगा के लाओ फिर मुझसे हस्ताक्षर करवाओ।

मैं ये सब सुनकर दंग रह गया और जल्द ही टिकट लगा कर दुबारा आया और साहब की डेस्क की और बड़ा और अपना पत्र साहब की और लपकाया। साहब ने सीधे ही बिना मेरी तरफ देखे ही कहा बेटा ऑफिस बंद होने का समय हो चला हैं, अब सोमवार को आना अपनी बाईक को छुडवाने। मैंने काफी विनम्रता से अपनी मजबूरी जाहिर की साहब के सामने की सर मैं एक स्टूडेंट हूँ और मुझे बहुत दूर-दूर अपनी पढाई के सिलसिले में जाना होता है। इसलिए कृपया करके आप इस माफ़ी पत्र पर अपने हस्तांतरण कर दे। पर साहब मेरी बाते अनसुनी करते हुए चलते बने। वो बंदा जिसकी शिकायत मैंने साहब से की थी वो बड़ी ही मंद मंद हसी लिए हुए मुझे घूर रहा था मानो कह रहा हो "और कर ले शिकायत अब तो तेरी बाईक कभी नहीं तुझे मिलने वाली"।

मेरे मन में काफी झल्लाहट हुई इतना सब कुछ करने के बाद भी काम नहीं हुआ क्या फायदा हुआ शायद मुझे उसे थोड़ी सी बक्शीश दे कर अपना काम करवा लेना चाहिए था। फिर निकल कर बाहर आने लगा तो वो बंदा  मुझे देख कर मुस्कुराया और बोला भाई मेरे साहब से माफ़ी मांग ले और मुझसे भी और फिर तेरा काम हो सकता है और फिर तेरी बाईक छूट जायेगी।

मैं मन ही मन मुझे आत्मग्लानी का अनुभव सा हुआ की क्यों मैंने बेकार में ही पंगे ले लिए। कहने के लिए ही भारत एक लोकतान्त्रिक देश रह गया हैं क्यूंकि यहाँ तो मैंने सिर्फ रिश्वतखोरी के विरोध में अपनी आवाज भर बुलंद की थी। यहाँ तो क़ानून के दो मामूली नुमाईन्दे ही उसे दबाने में एकजुट हो गए। अब मुझे समझ में आया की इतने दिनों से अरविन्द केजरीवाल साहब और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी द्वारा चलाये गए मुहीम को अभी तक मंजूरी क्यूँ नहीं मिली। इनकी लडाई तो पुरे भ्रष्ट सिस्टम से हैं। खैर मुझे एक आखरी फैसला लेना ही पड़ा की मुझे आगे क्या करना चाहिए अपनी बाईक छुड़ाने के लिए।


मैंने अपने अन्दर जागे हुए जिम्मेदार नागरिक को दबाते हुए उस बन्दे की बात मानी और उसे सॉरी बोला और बोला की भाई कृपया करके वो मेरा काम करवा दे और मैं साहब से माफ़ी भी मांग लूँगा। उसने मुझसे अपनी बक्शीश ली और कहा की कल सुबह सुबह वो साहब से मेरे बारे में जरूर बात करेगा और मेरा काम करवा देगा।

मैं घर पंहुचा और माँ को सब हाल सुनाया। माँ ने मेरी तरफ देखा और कहा बेटा मैंने तो तुझे पहले ही कहा था की इन समाज सेवा वाले चक्करों में न पड देखा आखिर में थक हार कर तुझे ही झुकना पड़ा। क्यूंकि तू एक आम आदमी है जिसे कोई भी औधे पर बैठे सरकारी अधिकारी के आगे झुकना ही पड़ता है। वरना अंत में परिणाम ऐसा ही निकलता हैं।

माँ आप शायद ठीक बोल रहे हो आगे से मैं भी इस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बनने में देरी नहीं करूँगा। कल ही जाकर अपनी बाईक छुडवाता  हूँ। बस इतना कहते ही अपने कमरे में जाते हुए मैं बस एक ही बात सोच रहा था की सभी लोग ऐसी परिस्थिति में आते होंगे और वो क्या करते होंगे? क्या वो भी झुकने को मजबूर हो जाते होंगे इस भ्रष्ट सिस्टम के आगे।

खैर मैं अभी भी थोडा सा भ्रमित हूँ की "रिश्वतखोरी" एक गुनाह हैं या मजबूरी हैं? अब आप ही बताये? ये कहानी एक काल्पनिक कहानी है जिसकी प्रेणना मुझे एक मित्र के साथ हुई आप-बीती से मिली। अगर किसी व्यक्ति विशेष को मेरी किसी बात का बुरा लगा हो तो मैं माफ़ी चाहूँगा।



via : Pawan Mall

29.1.11

आखिरी खत...


प्रिय मीनू,
हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैंने कभी भी तुम्‍हारा दिल दुखाना नहीं चाहा था, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसका मुझे जरा सा भी अहसास नहीं था। हां यह जरूर सच है कि उस वाक्‍ये से तुम्‍हे तकलीफ हुई होगी और तुम्‍हारे दिल को ठेस लगी होगी। तुम मुझे बेवफा भी समझ रही होगी। कुछ हद तक यह सच भी है लेकिन वास्‍तविकता क्‍या है इसे सिर्फ और सिर्फ मैं ही जानता हूं।
मुझे याद है वह दिन, जब हम मिले थे। तुमसे पहले भी कई लडकियां मिलीं लेकिन उनसे सिर्फ दोस्‍ताना रहा। तुममे मुझे एक अलग ही कशिश दिखी। फिर क्‍या था, मैं तुम्‍हारी ओर आ‍कर्षित होता चला गया। हमारी मुलाकातें बढती चली गईं। दिल तो चाहता था कि तुमसे बहुत कुछ कहूं पर तुम्‍हारे सामने आने पर मानो जुबान पर ताले पड जाते। कहते हैं न कि जो बात मुहब्‍बत में जुबान नहीं कह पाती वह नजरें कह जाती हैं। यही हमारे साथ हुआ। समय गुजरता रहा। जुबां खामोश रही। नजरों से बात होती रही। और एक दिन...।

पूरी कहानी पढने के लिए मेरे ब्‍लाग पते पर जाने की कृपा करें। मेरा ब्‍लाग पता है- 
http://atulshrivastavaa.blogspot.com 



2.4.10

एक सच्ची प्रेम कहानी (चाईना)

दोस्तों मैं तो सिर्फ ये ही सोचता था की ये प्यार व्यार जैसी चीज अब कहीं नहीं बची हैं लेकिन कई बार हमारे सामने कुछ ऐसे वाकये या ऐसे लोग ज़नूनी कुछ ऐसा कर जाते हैं की हमें मानना पड़ता हैं की आज के टाइम में भी प्यार जिन्दा और अपना वजूद बचाए हुए हैं. देखिये नीचे मैंने कुछ ऐसे ही प्यार के द्योतक को आपके सामने प्रस्तुत किया हैं, आशा करता हु की आप सभी को अच्छा लगेगा.


एक चाईनीज आदमी ने 8 दिन पहले मरी हुई लड़की से शादी की
Chinese Man Married Dead Bride Who Died for 8 Days

A 26-year-old Chinese man Zhuang Huagui has married his dead girlfriend Hu Zhao, 21, who was murdered 8 days ago. The couple originally planned to get married on February 4, but on January 28, one week before their wedding, the girl was stabbed to death by two break-in thieves. With all the pain, lost and love, the man still decided to marry his dead girlfriend. More images after the break...
एक  26 साल के युवक ज्हुंग हौगाई ने अपनी प्रेमिका हु ज्हाओ जो की 21 साल की हैं, 8 दिन पहले जिसका क़त्ल हो गया था,से शादी रचाई. इस जोड़े ने असल में 4 फरवरी को शादी करने का प्लान बनाया था लेकिन जनवरी 28 को ठीक शादी से एक हफ्ता पहले ही लड़की का देहांत हो गया. लेकिन इन सब के बावजूद लड़के ने अपनी मरी हुई प्रेमिका से शादी करने का फैसला किया....नीचे उसी शादी के कुछ लम्हे दिए गए हैं.....
Their wedding ceremony was held at a funeral parlor in Zhangzhou, Fujian, China, and family from both sides witnessed their wedding. The bride was dressed with beautiful wedding gown and lying in a crystal coffin.
 इनकी शादी फनरल पार्लर जोकि जहन्घौ, फुजैन, चाईना में स्थित हैं, में शानदार तरीके से रचाई गयी और लड़के और लड़की दोने के परिवार वाले इनकी शादी के गवाह बने. दुल्हन को एक शानदार शादी का गाउन पहना हुआ था और एक क्रिस्टल कॉफिन में पड़ी हुई थी.
Zhuang Huagui held his wife’s wedding photo in front of the funeral parlor to welcome the guests for coming to the wedding.
ज्हुंग हौगाई ने फनरल पार्लर में अपनी प्रेमिका की तस्वीर को अपने हाथो में उठाये हुए शादी में आये हुए सारे महमानों का स्वागत किया.
The groom gave wedding ring to his dead wife.
फिर  दुल्हन को अंगूठी पहनायी गयी.

This is true love, the girl in heaven will be touched…





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24.2.10

और हाथ छोड़ दिया....

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhdMbT8h1EGEwGvchlT0hyVbQCZnJan80RUq9_G4GYNVKOvQHnsQYS8G8qgRZB-_hLr6pKgkLjYkIAcbfPF4SNsn6_4v8wo4unZA7IVSlUI1ggLrNjIb__-zzcXd8otCP0r0rjfoSMB42JZ/एक फिल्म अभिनेत्री 15 वें माले पर स्थित अपने आवास की बालकनी में रेलिंग पर खड़ी अपने प्रशंसकों का अभिवादन कर रही थी कि अचानक संतुलन खो बैठी और नीचे गिरने लगी। 12 वें माले की रेलिंग पर खड़े हुये एक नौजवान ने उसे अपनी बांहों में पकड़ लिया और पूछा - ''मुझसे शादी करोगी ?''''कभी नहीं''- अभिनेत्री ने नफरत से जवाब दिया । ''तो जाओ मरो!'' कहकर नौजवान ने उसे छोड़ दिया और वह फिर नीचे गिरने लगी। 11 वें माले पर खड़े एक अधेड़ ने हाथ बढ़ाकर उसे फिर पकड़ लिया और पूछा - ''मेरी प्रेमिका बनोगी ?''''हर्गिज नहीं!'' उसका इतना कहना था कि इस आदमी ने भी उसे छोड़ दिया। बेचारी अभिनेत्री को अब मौत साक्षात नजर आने लगी। वह ईश्वर से एक और मौका देने की प्रार्थना करने लगी कि तभी आठवें माले पर खड़े एक आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया। ''मैं तुमसे शादी कर लूंगी......! मैं तुम्हारी प्रेमिका बनूंगी.....! रखैल बनूंगी ! सब कुछ करूंगी!'' अभिनेत्री आदमी के कुछ बोलने के पहले ही भयातुर होकर कहने लगी। ''बदचलन औरत..... !'' आदमी ने कहा और हाथ छोड़ दिया।

16.3.09

गिल्लो रानी, कहो तो अभी जान दे दूं....उर्फ एक स्ट्रिंगर का दर्द



आप पढ़े-लिखे हैं, विचारवान हैं, लेखक हैं, ईमानदार व सीधे-साधे हैं तो पत्रकारिता की बात छोड़िए, इस दुनिया में जीने में आपका दम निकलेगा। दुखों के दंश से गुजरना होगा। दर्द को दवा मानकर जीना होगा। कुछ यही हाल आशुतोष का है। वे पटना के पत्रकार हैं। मनुष्यों की नगरी में मनुष्यों द्वारा मिला दुख जब बढ़ जाता है तो वो गैर-मनुष्यों के पास चले जाते हैं। उनकी प्रिय गिल्लो रानी न सिर्फ उनका स्वागत करती हैं बल्कि उनके देह पर कूद-फांद कर दुख-दर्द हर लेती हैं। आशुतोष बिहार के एक रीजनल टीवी न्यूज चैनल के पटना आफिस में कई बरस से स्ट्रिंगर हैं। पिछले दिनों उनकी सेकेंड हैंड बाइक आफिस के नीचे से चोरी चली गई। तब आशू झोला टांगकर पैदल ही रिपोर्टिंग पर निकलने लगे।

जितनी खबर चलेगी, उतना पैसा मिलेगा के फंडे पर जीने वाले स्ट्रिंगरों में से एक आशुतोष के लिए पैदल चलना मुश्किल न था पर खबरें वो बहुत कम कवर कर पाते। बाद में उन्हें नजदीक के एसाइनमेंट दिए जाने लगे। ज्यादा पैदल चलने से देह में जो दर्द शुरू होता, उससे निजात पाने के लिए आशुतोष गांधी मैदान के पास स्टेट बैंक के क्षेत्रीय हेडक्वार्टर की बिल्डिंग के बगल के पीपल के पेड़ के नीचे बैठ जाते। पीपल पर रहने वाली गिलहरियां अनजान पथिक को देर से बैठे देख सूंघते-सरकते नीचे आने लगीं। कुछ दिनों तक दूर से चौकन्ने होकर निहारने के बाद अब सरक कर करीब पहुंचने लगीं। शून्य में निगाह गड़ाए आशुतोष की नजर जब इन पर गई तो भावुक हो गए। पुचकारने और पुकारने लगे, आहिस्ते-आहिस्ते, हौले-हौले। गिलहरियां बेजुबान भले थीं पर बेअक्ल नहीं। वैसे भी, मनुष्यों को पहचानने के मामले में ये बड़ी तेज होती हैं। उन्हें पता होता है आदमियों के हरामीपने, सो उन्होंने आशुतोष पर एकदम से यकीं नहीं किया। पास आती गईं, दूरियां सिमटती गई पर फासले कुछ न कुछ बने रहे।

प्यार और मनुष्यता को जीने वाले आशू ने जिद ठान ली इन गिलहरियों के प्यार की परीक्षा में सफल होने की। आशुतोष जब खुद चाय पीते तो गिलहरियों को बिस्कुट के टुकड़े तोड़कर खिलाने लगे। आशुतोष जब आते तो गिल्लो रानी उन्हें देखते ही पूरे कुनबे के साथ उपर से नीचे सरक आतीं और दूर से निहारते हुए इठलातीं, बलखातीं और चंचल-शोख हसीना की माफिक मुस्कातीं। आशू इन्हें जब प्यार से अपने बिस्कुट का टुकड़ा डालते तो वे फटाक से आगे बढ़कर चुग तो लेतीं पर फिर सतर्क अंदाज में पीछे आ जातीं। आखिर वो घड़ी आ ही गई जब आशू-गिल्लो के बीच का फासला मिट गया। अब जब आशू आते तो दो दर्जन से ज्यादा गिलहरियां खुशी के बोल बोलते उनकी देह पर चढ़ने लग जातीं और उन्हें सहलाने-पुचकारने में जुट जातीं।

आसपास के चायवालों के लिए यह दृश्य शुरू में कुछ अनोखा था लेकिन बाद में इन लोगों ने आशुतोष को बेचारा मानकर 'पेड़, गिलहरी, आदमी और प्यार' के इस अजीब दृश्य को रूटीन में शामिल मान लिया। तभी तो पेड़ के पास के चाय वाले दुकानदार कन्हैया राय कहते हैं- ये गिलहरियां उनके न आने पर इंतजार करती हैं और जब देर से आते हैं तो वे गुस्सा दिखाती हैं। बगल के पाने वाले दुकानदार कहते हैं कि हम लोग इन्हें ज्यादा तो नहीं जानते लेकिन इनकी हरकत देखकर लगता है कि ये बेचारे अच्छे आदमी हैं। आशुतोष की इच्छा इन गिलहरियों पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की है पर पास में फूटी कौड़ी नहीं सो ढेर सारे सपनों के बीच ये सपना भी फिलहाल आर्काइव हो चुका है।

इस वक्त ईटीवी, पटना के कंट्रोल रूम में स्क्राल उर्फ टिकर (टीवी स्क्रीन पर नीचे की तरफ खबरों की चलने वाली पट्टी) डेस्क पर कार्यरत आशू का सात महीने से जो अफेयर गिल्लो रानी से चल रहा है, इसके चर्चे दूर-दूर तक होने लगे हैं। आई-नेक्स्ट, पटना में जब गिलहरियों को बिस्कुट खिलाते आशुतोष की तस्वीर प्रकाशित हुई तो आशुतोष चर्चित आदमी हो गए। अब तो दोस्तों के पूछने पर कि कहां जा रहे हो, आशुतोष मुस्करा कर कहते हैं, मेरी दो दर्जन गर्ल फ्रेंड मेरा इंतजार कर रही हैं, चलोगे उनसे मिलने!

आशुतोष ने बिहार के आरा जिले के वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया है और पटना विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा का कोर्स किया हुआ है। वर्ष 2002 से 2004 तक जनसत्ता, हिंदुस्तान और जागरण जैसे अखबारों के लिए लिखते रहे। प्रभाष जोशी को अपना आदर्श मानने वाले आशुतोष वर्ष 2004 में बतौर स्ट्रिंगर ईटीवी में भर्ती हुए और आज भी स्ट्रिंगर बने हुए हैं। आप गिल्लो रानी तक कोई संदेश पहुंचाना चाहते हैं तो 09431813609 या 09905908187 के जरिए आशू के कान में फूंक मार सकते हैं। मेल से उनसे संपर्क ashutosh_etv@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है।

साभार - भड़ास4मीडिया डाट काम

23.4.08

कैसे कैसे कामरेड बनाम रोहिणी में एक दढ़ियल कुत्ता!

--जेपी नारायण--

...वह रोहिणी (दिल्ली) की गलियों में दाढ़ी बढ़ाकर घूम रहा है। पहचानो उसे, मार भगाओ। वह एक शातिर मठाधीश है। कुत्ते की तो भी एक दियानतदारी होती है। मजदूरों के नाम पर उसने अपनी दुकानदारी जमा रखी है। पहचानो उसे। पहचानो। उसकी दुकान में तरह-तरह के माल है। समाजवादी माल। जनवादी माल। वह पुस्तक-फरोश क्रांतिकारिता का अलमबरदार बना छुट्टा घूम रहा है। अपने तरफदारों के बीच कहता है कि वह भूमिगत है। नक्सलवादी है लेकिन हकीकत ये है कि वह कुछ और ही कारनामो को अंजाम दे रहा है। पहचानो उसे। पहचानो!

जनवाद और समाजवाद के नाम पर हजारो कथित कामरेड ऐसे भी है जो लेबी के पैसे से कोढियों की तरह पल रहे हैं। ठाट की जिंदगी जी रहे हैं। बेटे-बेटी के शादी व्याह रचा रहे हैं। विदेशी ब्राड के कपड़े पहन कर मारुति से दिल्ली की गलियों में घूम रहे हैं। उन्हीं में एक जनाब ऐसे हैं जो मीडिया की आड़ में पुस्तक का धंधा कर रहे हैं। इन कथित क्रांतिकारियों ने अब तक हजारो लोगों को चूना लगाया है। सैकड़ो लोगो के घर-मकान बिकवा दिए। और दर्जनों लोगों के साथ ऐसा शर्मनाक कृत्य किया, जिसे सुन कर कोई भी शर्म से गड़ जाए। ऐसे लोगों को इन धंधेबाजों ने पहले तो विचारों की घुट्टी पिलाकर संगठन में शामिल किया, रूपये-पैसे दुहे, जब वह आर्थिक मदद देने लायक नहीं रहा तो निकाल बाहर किया।

----एक ऐसी ही लड़की, अपना घर-परिवार छोड़कर पति के साथ इन धंधेबाजों के चंगुल में फंस गई। इस बीच उसके पति का आर्थिक दोहन चलता रहा। इसी बीच वह लड़की प्रीगनेंट हो गई। तब तक इस दंपत्ति का भरपूर दोहन किया जा चुका था। ...और फिर उनके साथ भी वही हुआ, जो अब तक दर्जनों के साथ हो चुका था। उन्हें संगठन से खदेड़ दिया गया। वे दिल्ली की गलियों में काफी समय तक दर-दर भटकते रहे।

........कारनामा यही तक होता तो गनीमत थी। इन धंधेबाजों का एक और हैरतअंगेज कारनामा। वे क्रांति के लिए संघर्ष का नारा देते हुए शोषण का जोरदार आइडिया भी बखूबी आजमा रहे हैं। उन्होंने दिल्ली में एक ट्रांसलेशन ब्यूरो खोल रखा है। ब्यूरो में युवाओं को रोजगार के नाम पर चूसा जा रहा है। ब्यूरो के कर्ता-धर्ता प्रकाशकों से या अन्य सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों से ट्रांसलेशन के लिए मैटर जुगाड़ लाते हैं। बेरोजगार युवा उन्हें अनूदित करते हैं। एक-एक युवक प्रति माह २५ से ३० हजार रुपये तक का काम कर देता है। उसमें छह से आठ हजार रुपये उसे पकड़ा दिए जाते हैं, बाकी रकम धंधेबाजों के जेब में चली जाती है, जिससे वे ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं, समाजवाद पर लंबे-लंबे आख्यान देते हैं। और धंधेबाजों का दावा होता है कि ट्रांसलेशन ब्यूरो की लंबी कमाई क्रांति के कारोबार में लगाई जा रही है।

...उनकी करनी अनंत है, यहां कितना गिनाएं-बताएं। इन मुफ्तखोरों के आए दिन मैग्जीनों में लंबे-लंबे लेख छपते हैं। जनवाद-समाजवाद की बातें होती हैं और अंधेरे की करतूतें ऐसी कि वामपंथ गया तेल लेने।

....और तरह-तरह के रंगे-सियार वामपंथ के नाम पर १९५० के दशक से जो कुछ कर रहे हैं, नांदीग्राम जैसी पटकथाएं लिखते हुए आजकल प.बंगाल में पूंजी निवेश के लिए पाजामा खोले खड़े हैं। उनके हजारो-हजार कथित कम्युनिस्ट कार्यकर्ता फिल्ड में नित-नए कीर्तिमान रच रहे हैं। कोई इप्टा के नाम पर धंधा चला रहा है तो कोई भाकपा-माकपा के नाम पर। कोई गोली-बंदूक लेकर बीहड़ में चौथ वसूली कर रहा है तो हथियारों की तस्करी तक में लिप्त है।

इस तरह देखिए-जानिए कि कम्युनिज्म के नाम पर देश में कितना बड़ा कारोबार चल रहा है। शर्म है ऐसे कथित वामपंथियों पर, धिक्कार है उनकी काली करतूतों को। बात सियासत तक ही नहीं, एक-से-एक घाघ बुद्धिजीवी बहसों में, कविताओं, लेखों में, मंचों पर, गोष्ठियों में इस तरह नमूदार होते हैं, मानो वाह-वाह झुग्गी-झोपड़ी का क्या खूब दर्द उड़ेला है, और अपनी निजी जिंदगी में वातानुकूलित कमरों, हवाई उड़ानों के आनंद से लबरेज होते हैं। कोई स्री-विमर्श के नाम पर दिल्ली में मजे कर रहा है तो कोई एनजीओ के कारोबार में लाखों की कमाई में अस्तव्यस्त है। ....फिलहाल तो इतना ही।

-जेपी नारायण के ब्लाग बेहया (http://behaya.blogspot.com) से साभार