Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label व्यंग. Show all posts
Showing posts with label व्यंग. Show all posts

4.12.12

"रिश्वतखोरी" गुनाह या मजबूरी ?



देखो......सर मैंने कुछ नहीं किया!
रे भाई तो फिर क्या मैंने किया है, अब तो जो दंड बनता है वो तो तन्ने भरना ही पड़ेगा।

ऐसा क्यों सर जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो मैं क्यों भरू सर ये दंड!!!
देख छोरे मैं तन्ने ना जाने दू तू चाहे तो अपने आपको बचा सकता है और इस दंड से भी बच सके है।।।

एक मन तो किया की वही छोड़ के अपनी गाडी घर को लौट आऊ पर घर वालो ने पूछा तो क्या जवाब दूंगा। क्या बोलूँगा की मैंने अपनी बाईक किसी ठुल्ले को थमा दी और चला आया। फिर सोचा की दोस्त की धौस जमा के देखू शायद मैं निकल पाऊ  इन सब झमेलों से।
सर, मैं एक कॉल कर सकता हु अपने भाई को ?
क्यों रे छोरे तेरा भाई कोई तोप  हैं क्या कही का, जा करले जो करना है अब तो तेरी गाड़ी जब्त होगी!!

क्या जब्त!!!
पर क्यूँ आप मेरा चालान तो बनाओ और मुझे कही और भी जाना है।

देख छोरे इब  तो तेरा कोई चालन ना कट सके है। चाहे तू जो करले, इब तो अपनी गद्दी थाने से छुडवा लियो और करले कॉल जिसे कर रहा था। उसने जबरन मुझसे चाभिया मांगी और मैंने उसे पकड़ा दी।

फिर क्या था वो ठुल्ला मेरी बाईक ले गया और ठाणे में जमा करवा दी। मैंने भी मन ही मन सोचा हुआ था कुछ भी हो जाए इसे घूस तो बिलकुल भी नहीं देनी। हम लोगो ने ही इसे इतना बढावा दिया है हमें ही इसे रोकना चाहिए। ऐसे ही कुछ अछे विचारो का जैसे सैलाब सा उमड़ आया मेरे मन में।

सोचा घर जाके सबको बोल दूंगा की मैंने ठुल्ले को घूस ना दे कर कितना अच्छा काम किया हैं। घर पंहुचा और माँ से बोला माँ मेरी मोटर साईकिल एक ठुल्ले ने जब्त कर ली क्योंकि मेरे पास बाईक के बीमा के कागजात नहीं थे। और उसके घूस मांगने पर मैंने उसे घूस ना देकर देखो समझ पे कितना बड़ा उपकार किया हैं।

माँ चीखते हुए......ये क्या किया अभी गाडी कहाँ हैं?
गाड़ी तो ठाने में बंद हैं।
तू पागल तो नहीं हैं तुझे क्या जरूरत थी उसे गाडी की चाभी दने की, दे देता उसे 50, 100 रुपये और मामला रफा दफा करता।
मैं थोडा रुवाब झाड़ते हुए क्या माँ आप भी ऐसा क्यों बोल रहे हो? आपको तो बल्कि मुझे शाबाशी और मेरा हौसला बढाना चाहिए. आपके लड़के ने गलत का साथ नहीं दिया बल्कि सही का साथ देते हुए इस रिश्वतखोरी के खिलाफ अपना पहला कदम बढाया हैं।

बेटा जी ये जो बाते तू बोल रहा हैं न आज के समय में सिर्फ फिल्मो में या सिर्फ सुनने में ही अच्छी लगती हैं क्यूंकि असल जीवन में ये तार्किक बाते नहीं काम आती।  और रही बात समाज में फैली बुराईयों से लड़ने की बात तो बेटा उसके लिए तो वो अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी बैठे ही हैं न, फिर तू क्यूँ इन्हें अपना काम करने से रोक रहा हैं?

क्या माँ आप भी और लोगो की तरह सिर्फ अपने बारे में सोच रहे हो मैंने तो सिर्फ रिश्वतखोरी की बात ही की थी आपने तो पता नहीं कहा अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे जी जैसे महान समाज सेवियों तक बात पंहुचा दी। मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हु की समाज को शुधारने की शुरुवात तो सबसे पहले पहल तो हमें ही करनी पड़ेगी न। और रही बात बाईक की वो तो एक माफ़ी पत्र थाने में SHO के हस्ताक्षर करवा के जमा करवा देना हैं बस उसी दिन बाईक मुझे मिल जायेगी। बस इतना ही तो करना है और गलती तो मेरी ही थी न जो मैंने ध्यान नहीं दिया की बाईक का बिमा ख़त्म हुए सप्ताह बीत गया हैं। अब दूसरा बीमा भी बाईक लाते ही करवा लूँगा।

बेटा अभी तू इन थाने के चक्करों में नहीं पड़ा न, तो ऐसी बाते कर रहा हैं। चल देखते है तेरी बाईक कब छूटती हैं।
मन में मैं यही सोच रहा था की आखिर माँ ने ऐसा क्यूँ बोला। क्या इतना मुश्किल हैं इस समाज में अपने सभी दायित्वों के प्रति जागरूक होकर रहना?

सोचा की पहले पत्र  लिख लू बस फिर क्या पत्र  लिखते ही थाने पंहुचा और सीधे ही SHO साहब के कक्ष की और तेजी से चल पड़ा।  जाकर पता चला की साहब तो हैं ही नहीं वो अगले दो दिन के लिए किसी दुसरे राज्य में कोई सेमिनार में सिरकत करने हेतु गए हुए हैं। सोचा चलो कोई नहीं पत्र तो लिख ही लिया हैं दो दिन बाद फिर आ जाऊंगा और उनके हस्ताक्षर ले ही लूँगा और इसी बहाने थोडा पैदल चलने का मौका भी मिल जाएगा।

दो दिन बाद फिर से साहब के कक्ष की और गया तो पता चला साहब दौरे पर निकले हुए हैं। मैंने एक साहब से पूछा की कब तक आयेंगे तो पता चला की उनके घर पे कोई पारिवारिक त्यौहार हैं वो सीधे ही घर की और निकल जायेंगे। थोड़ी झल्लाहट हुई मन में पर उसे नकारता हुआ सोचा की चलो कोई नहीं जहा 2 दिन इन्तेजार किया वह 1 दिन और सही।

अगले दिन फिर मैं साहब के कक्ष की और बड़ा तस्सली हुई देखकर की साहब आज बैठे हुए हैं और वह आये कई लोगो के पत्रों पे पाने हस्ताक्षर करने में थोड़े व्यस्त हैं। मैं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठ गया। करीबन डेढ़ घंटे बाद जब मेरी बारी आई तो वह गेट पर खड़े एक व्यक्ति ने जो की सादे लिबास में था, ने मुझे रोका और काम पूछा की क्यूँ मिलना चाहता हु मैं SHO  साहब से?

मैंने उसे बताया की मेरी बाईक बंद हैं और इसी सिलसिले में मैंने एक माफीनामा पत्र लिखा हैं और उसी पत्र पे साहब के हस्ताक्षर लेने हैं और इसे थाने में जमा करवा कर अपनी बाईक छुडानी हैं।

उस आदमी ने मेरी तरफ देखा और बोला की भाई मैं तुम्हारे इस पात्र पे साहब के हस्ताक्षर करवा सकता हु बशर्ते मैं उसे कुछ बक्शीश या ये कहूँ की वो अप्रत्यक्ष रूप से मुझसे रिश्वत की मांग कर रहा था। मन तो मेरा ऐसा किया की उसकी शिकायत साहब को जाकर अभी कर दू पर वो कम्बखत वही दरवाजे पे अड़ा खड़ा हुआ था और उन्ही को अन्दर जाने दे रहा था जो उसकी बात मानकर उसे बक्शीश/रिश्वत दे रहे थे।

मैंने सोचा क्यूँ न सीधे ही अन्दर घूस जाऊं और साहब को इसकी शिकायत लगा दू और अपने पत्र पे उनके हस्ताक्षर करवा लूँ।

मैंने उसे थोडा पीछे की और धकेलकर आगे बढकर सीधे ही साहब की मेज की और बड़ा और साहब को अपना पत्र देते हुए कहा सर इस माफीनामे पत्र पर आपके हस्ताक्षर की जरूरत हैं। कृपया करके आप इस पर हस्ताक्षर कर दे। वही पीछे से भागता हुआ उनका चमचा आया और साहब को बोला साहब ये छोरा जबरन अन्दर आया हैं। साहब मुझे घूर के थोड़े गुस्से वाले मुद्रा में निहारने लगे।

सर मैं पंक्ति में ही था और जब मेरा नंबर आया तो ये जनाब मुझे बक्शीश की मांग करने लगे और कहने लगे की बक्शीश दो और अपना काम आराम से करवा लो। सर मैं इस बक्शीश के बिलकुल खिलाप हूँ और इसका मैं पुरजोर विरोध करता हूँ। और तो और इसने ये मांग मुझसे ही नहीं अपितु सभी से की हैं और जो लोग इसकी मांग को पूरा कर रहे हैं वो ही आपके पास तक पहुच रहे हैं।

इतना ही बोला था की साहब ने पहले तो मुझे बड़े ही अजीब ढंग से देखा और दुसरे लोगो की तरफ भी और पूछा की क्या ये लड़का सच बोल रहा हैं?
सभी ने एक साथ ही बोला जी सर ये बिलकुल सही बोल रहा हैं और ये बंद हर किसी से बक्शीश ले कर ही आप तक पहुचने दे रहा हैं।

साहब ने उसे खूब डाटा  और कहा की आगे से उसने किसी से भी बक्शीश की मांग की तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।मैं मन ही मन खुश हो रहा था की चलो कुछ तो अच्छे लोग बचे हुए हैं जो आज भी जागरूक है अपने कर्तव्यो के प्रति। साहब ने मुझसे मेरा पत्र माँगा और थोडा उसमे कुछ पढने के बाद बोले की इस पर मैं अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकता क्योंकि इस पर टिकट नहीं लगी हैं पहले वो लगा के लाओ फिर मुझसे हस्ताक्षर करवाओ।

मैं ये सब सुनकर दंग रह गया और जल्द ही टिकट लगा कर दुबारा आया और साहब की डेस्क की और बड़ा और अपना पत्र साहब की और लपकाया। साहब ने सीधे ही बिना मेरी तरफ देखे ही कहा बेटा ऑफिस बंद होने का समय हो चला हैं, अब सोमवार को आना अपनी बाईक को छुडवाने। मैंने काफी विनम्रता से अपनी मजबूरी जाहिर की साहब के सामने की सर मैं एक स्टूडेंट हूँ और मुझे बहुत दूर-दूर अपनी पढाई के सिलसिले में जाना होता है। इसलिए कृपया करके आप इस माफ़ी पत्र पर अपने हस्तांतरण कर दे। पर साहब मेरी बाते अनसुनी करते हुए चलते बने। वो बंदा जिसकी शिकायत मैंने साहब से की थी वो बड़ी ही मंद मंद हसी लिए हुए मुझे घूर रहा था मानो कह रहा हो "और कर ले शिकायत अब तो तेरी बाईक कभी नहीं तुझे मिलने वाली"।

मेरे मन में काफी झल्लाहट हुई इतना सब कुछ करने के बाद भी काम नहीं हुआ क्या फायदा हुआ शायद मुझे उसे थोड़ी सी बक्शीश दे कर अपना काम करवा लेना चाहिए था। फिर निकल कर बाहर आने लगा तो वो बंदा  मुझे देख कर मुस्कुराया और बोला भाई मेरे साहब से माफ़ी मांग ले और मुझसे भी और फिर तेरा काम हो सकता है और फिर तेरी बाईक छूट जायेगी।

मैं मन ही मन मुझे आत्मग्लानी का अनुभव सा हुआ की क्यों मैंने बेकार में ही पंगे ले लिए। कहने के लिए ही भारत एक लोकतान्त्रिक देश रह गया हैं क्यूंकि यहाँ तो मैंने सिर्फ रिश्वतखोरी के विरोध में अपनी आवाज भर बुलंद की थी। यहाँ तो क़ानून के दो मामूली नुमाईन्दे ही उसे दबाने में एकजुट हो गए। अब मुझे समझ में आया की इतने दिनों से अरविन्द केजरीवाल साहब और अन्ना हजारे जी जैसे समाज सेवी द्वारा चलाये गए मुहीम को अभी तक मंजूरी क्यूँ नहीं मिली। इनकी लडाई तो पुरे भ्रष्ट सिस्टम से हैं। खैर मुझे एक आखरी फैसला लेना ही पड़ा की मुझे आगे क्या करना चाहिए अपनी बाईक छुड़ाने के लिए।


मैंने अपने अन्दर जागे हुए जिम्मेदार नागरिक को दबाते हुए उस बन्दे की बात मानी और उसे सॉरी बोला और बोला की भाई कृपया करके वो मेरा काम करवा दे और मैं साहब से माफ़ी भी मांग लूँगा। उसने मुझसे अपनी बक्शीश ली और कहा की कल सुबह सुबह वो साहब से मेरे बारे में जरूर बात करेगा और मेरा काम करवा देगा।

मैं घर पंहुचा और माँ को सब हाल सुनाया। माँ ने मेरी तरफ देखा और कहा बेटा मैंने तो तुझे पहले ही कहा था की इन समाज सेवा वाले चक्करों में न पड देखा आखिर में थक हार कर तुझे ही झुकना पड़ा। क्यूंकि तू एक आम आदमी है जिसे कोई भी औधे पर बैठे सरकारी अधिकारी के आगे झुकना ही पड़ता है। वरना अंत में परिणाम ऐसा ही निकलता हैं।

माँ आप शायद ठीक बोल रहे हो आगे से मैं भी इस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बनने में देरी नहीं करूँगा। कल ही जाकर अपनी बाईक छुडवाता  हूँ। बस इतना कहते ही अपने कमरे में जाते हुए मैं बस एक ही बात सोच रहा था की सभी लोग ऐसी परिस्थिति में आते होंगे और वो क्या करते होंगे? क्या वो भी झुकने को मजबूर हो जाते होंगे इस भ्रष्ट सिस्टम के आगे।

खैर मैं अभी भी थोडा सा भ्रमित हूँ की "रिश्वतखोरी" एक गुनाह हैं या मजबूरी हैं? अब आप ही बताये? ये कहानी एक काल्पनिक कहानी है जिसकी प्रेणना मुझे एक मित्र के साथ हुई आप-बीती से मिली। अगर किसी व्यक्ति विशेष को मेरी किसी बात का बुरा लगा हो तो मैं माफ़ी चाहूँगा।



via : Pawan Mall

4.4.11

गधे बन गए बाप?- `माही` (धोनी)

गधे बन गए बाप?- `माही` (धोनी)


  http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html


============
 

`माही..माही..माही..भाई, ये तुमने क्या कही..!!`
 गधे बन गए बाप, बता क्या ग़लत, क्या सही?"

 

============
 

प्रिय भाई, श्रीमहेन्द धोनी उर्फ माही,
 

सबसे पहले तो क्रिकेट विश्व कप जीतने की खुशी में, हम सभी ब्लॉगर्स बंधु-भगिनी की ओर से ढेर सारी बधाई ।
 

मगर..मगर..मगर?  फाइनल मैच जीतने के पश्चात हुए साक्षात्कार में, एक सवाल के जवाब में, तुमने ये बात क्यों कही और कैसे कही ?
 

प्रिय माही,शायद तुम्हें पता होगा, रोमन तत्व चिंतक,छटादार वक़्ता, राजनीतिक, प्रसिद्ध न्यायविद और रोमन साम्राज्य के संविधान के रचनाकार, मार्कस ट्यूलिस सिसेरो (कार्यकाल, ३ जनवरी १०६ बीसी से ७ दिसम्बर ४३ बीसी) ने, भले ही कहा हो की, " हमें यही कल्पना करनी चाहिए, सारी अखिल सृष्टि (पृथ्वी) और समग्र मानव जाति, एक अखंड राष्ट्र समूह है । परमेश्वर और सारे मानव इस राष्ट्र समूह का हिस्सा है । (वसुधैव कुटुंबकम ।)
 

मिस्टर मार्कस ट्यूलिस सिसेरो की, ये बेतुकी बात, माही तुमने क्यों दोहराई? ऐसा कोई करता है क्या?
 

तुमने कहा," हम टॉस भले की हार गए, पर आज दोनों टीम, अच्छे टीम स्पिरिट के साथ, एक होकर खेली, क्रिकेट विश्व में खेल भावना की जीत हुई..!!"
 

क्यों भाई, जीतने के बाद, थकी-हारी विरोधी `अतिथि टीम` को, ऐसा चुटकुला कोई सुनाता है क्या? हमारे देश की `अतिथि देवो भवः।` की परंपरा भूल गए क्या?
 

( भूल गए हो तो, हमारे कई ब्लॉगर, तुम्हारे ब्लॉग पर टिप्पणी करके याद दिला सकते हैं, भेज दूँ, क्या उन सब को?)
 

हमारे कई  ब्लॉगर मित्रों का यह मत है की, तुमसे एक सीधा सा सवाल किया गया था, इसका मतलब ये नहीं है, हँसी-मज़ाक समझकर, शालीनता त्याग कर कोई भी, कैसा भी मन चाहा, अंट शंट उत्तर दे दो..!! हँसी मज़ाक भी एक मर्यादा में हो तो ही बेहतर होता है ।  `हे..माँ, मा..ता..जी..!!` 


मैं भी अपने मित्रों की इस बात से सहमत हूँ, यह सब कुछ ज्यादा हो गया..!!
 

हमें अपनी इन्सानियत नहीं छोड़नी चाहिए । बेशक, वर्ल्ड कप के फाइनल में हिंदुस्तान ने,श्रीलंका को हराया, मगर ये एक खेल है । जीतने के बाद भी, हमें खेल भावना बरकरार रखनी चाहिए ।
 

"ये बात अलग है की  श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के कप्तान कुमार संगकारा , टॉस उछलने के बाद, तुरंत अपनी बात से मुकर गया और फिर से टॉस उछालना पड़ा..!!"
 

फिर भी इन्सानियत के खिलाफ दिए गये, तुम्हारे इस उत्तर की हम कड़ी निंदा करते हैं..!!
 

============
 

अब तुमने ये भी कहा," अच्छा हुआ, हम मैच जीत गए, वर्ना मुझे देशवासीओं को जवाब देना पड़ता की, अश्विन की जगह श्रीसंत क्यों और बल्लेबाजी के क्रम में, युवराज की जगह, मैं क्यों?"
 

माही, अगर तुम चाहो तो, हमारे देश में, आजकल सब के बाप होने का दावा करके बिंदास धूम रहे, कई पदासिन या पदभ्रष्ट (पथ भ्रष्ट?) गधों के नाम लेकर, मैं  अभी उनकी संख्या बता सकता हूँ..!! ऐसे नकली बाप को तो, किसी ने कुछ नहीं कहा?  फिर, तुम को ही क्यों कुछ कहते?
 

तुम ये भी तो कह सकते थे, "मैं मजबूर था, मेरे हाथ बंधे हुए थे..!! इतना ही नहीं, किसी बड़े नामधारी सिलेक्टर, मीडिया महिला या पुरुष पत्रकार  या फिर मेरी मर्ज़ी विरुद्ध, दूसरे किसी के दबाव में आकर श्रीसंत को टीम में सामिल करना पड़ा?"
 

रही,  युवराज से, आगे क्रम में खेलने की  बात..!! देश की आपत्ति के वक़्त, अपने कंधो पर सारी जिम्मेदारी लेकर, टीम की रहनुमाई करने जैसा, ग़लत उदाहरण कायम करके, तुमने आज की युवा पीढ़ी को गुमराह करने का, बहुत बड़ा पाप किया है..!! तुम्हें ये शोभा नहीं देता..!! 

 

माही, अब मैं तुमसे एक सवाल करता हूँ, ईमानदारी से उत्तर देना..!!
 

( भ्रष्ट नेताजी की तरह, ये मत पूछना, ईमानदारी किस चिड़िया का नाम है?)
 

*  रियलिटी शॉ, `राखी का इन्साफ़` पर कथित आरोप था की, किसी निर्दोष लक्ष्मण को, ` नामर्द- नपुंसक` कहा गया और उसे  उकसा कर, ख़ुदकुशी करने के लिए  मजबूर किया गया..!! उनको तो किसी ने कुछ नहीं कहा?  फिर, तुम्हें ही क्यों कुछ कहते?
 

(आज, कलयुग के रामराज्य का यह दुर्भाग्य है की, " हम लंका तो जीत लेते हैं, पर लक्ष्मण को `नामर्द` की गाली देकर, बे-मौत ही मार देते हैं ..!! हे  बजरंग बली, आप तो सदा अमर हैं, अब तो गदा धारण कीजिए?")
 

* रियलिटी के नाम पर, `बिग बॉस` में अली और सारा की, सुहाग रात `LIVE` दिखाने के आरोप चेनलवालों पर हुए थे..!!  हुए थे ना? तो फिर, उनको तो किसी ने कुछ नहीं कहा? तुम को ही क्यों कहते?
 

============  
मैच के बाद, साक्षात्कार में, तुमने यह भी कहा की," ये जीत हमारे कोच- गैरी कर्सटन से लेकर, सारी टीम के प्रयत्न का फल है । इस जीत में जिन्होंने अपना योगदान किया है, उन सब का मैं शुक्रिया अदा करता हूँ ।"
 

क्यों भाई,माही? ऐसा झूठ उगलने की क्या ज़रुरत थी? आज़ादी के `स्वर्ण जयंती महोत्सव` का जश्न मना कर अब हम `प्लॅटिनम ज्यूबिली` की ओर बढ़ रहे हैं ।  इतने बरसों में,हमारे देश में, इतनी सारी सरकारें सत्ता पर आसीन होकर, निष्ठापूर्वक अपना-अपना ( खुद का) `काम` करके चली भी गई..!!  आजतक, एक भी सरकार ने, अपनी किसी उपलब्धि या तो फिर कामयाबी का श्रेय, अपनी कैबिनेट टीम, या  देशवासीओं को दिया? नहीं ना? (ही..ही..ही..ही..!!)
 

सत्तासिन (नशाधिन?) उच्च पदाधिकारी,  पी.एम.से लेकर चपरासी तक, सभी लोग अच्छे-अच्छे कामों का श्रेय किसी आलतु-फालतु को नहीं देते और बुरे कामों में अपनी असहायता-मजबूरी का राग आलापते हैं? फिर क्या सोचकर, तुमने अपने जीत के जश्न में, सभी साझीदारों की वाहवाही की? ये ठीक नहीं किया..!!
 

श्रीसुभाषचंद्राजी की, ICL (इंडियन क्रिकेट लीग) को टूर्नामेंट आयोजित करने के लिए, BCCI के मना करने के बाद, Bihar Cricket Association (BCA-1935) के  प्रेसिडन्ट श्रीलालुप्रसादजीने, जब वह रेल मंत्री थे तब देश के  सारे रेलवे स्टेडियम की सुविधा ICL  को  देने की उदारता जताई थी ना? उनको तो किसी ने `थेंक्यु`  तक नहीं कहा..!!
 

( ये बात और है की, उस वक़्त, श्रीसुभाषचंद्राजी ने, रेलवे स्टेडियम पर, गाय-भैंस को, बचा कूचा हुआ चारा चरते हुए पाया था?)
 

सोचो अगर, रेलवे जैसी महा मुनाफ़ा करनेवाली सरकारी संस्था के पास, सुविधाओं के नाम पर, क्रिकेट स्टेडियम का ऐसा हाल है तब, दूसरे खेलों के स्टेडियम्स का, क्या हाल होगा, सब लोग जानते हैं..!!
 

शायद, सभी खेलों के लिए, देश में आधुनिक सुविधा मुहैया जब कराई जायेगी, उस समय तक, कई आशास्पद, उगते खिलाड़ीओं के बारे में, यही  कहने की नौबत आ जायेगी की,`गढ़ आला पर सिंह गेला..!!`
 

दोस्त माही,सच कहना, हिंदुस्तान की क्रिकेट टीम के कप्तान बनने से पहले, खुद तुम्हें खेलने के लिए कितनी सरकारी सुविधा मुहैया कराई गई थीं? शायद..०,०..!!
 

============
 

तुमने साक्षात्कार में ओर, यह भी कहा की," हमें लगातार प्रोत्साहित करने के लिए, मैं सारे देशवासीओं का शुक्रिया अदा करता हूँ ।"
 

माही, हमें मज़ाक पसंद नहीं है और ऐसे मज़ाकिया स्टेटमेन्ट्स कतई कबूल नहीं है..!!  हम विद्वान, गुणवान, कदरदान, नादान क्रिकेट प्रेमी ब्लॉगर्स, तुम्हारी ऐसी मज़ाक की घोर निंदा करते हैं, क्योंकि..!!
 

अगर, तुम्हारी सारी बातों के साथ हम सहमत हो गये तो, सभी देशवासीओं के `जश्न -ए- जुलूस` में  हमारे साथ, मलिन इरादे वाले कुछ गिने चूने भ्रष्ट गधे भी, `बाप` बन कर,अपने चारों पैरों को उछालते हुए, `होंची..होंची..होंची`, का बेसुरा राग छेड़ कर, सारा माहौल सरकारी-तरकारी मार्केट (संसद?) जैसा बना देंगे..!!
 

ठीक है..!! आज तक, हम ऐसे गधों को बरदाश्त कर रहे हैं, पर अब उनकी गद्धा-लातों से, ज़ख्मी होने के लिए हम तैयार नहीं है..!! 
 

माही, आइन्दा किसी से भी, अगले साक्षात्कार के समय, हम सब ब्लॉगर्स की यह अमूल्य नसीहत को ध्यान में रखना और कुछ अनाप-सनाप जवाब देने से पहले सौ बार सोचना, वर्ना..!!


हम `ऑल इंडिया` के सारे नसीहतबाज, उत्साहयुक्त ब्लॉगर्स, सभी क्रिकेटर्स  के ब्लॉग पर आकर,अपने मन की सारी भड़ास निकाल कर, ऐसी-ऐसी  टिप्पणियां करेंगे की, आप सब लोग  ब्लॉगिंग करना तो क्या, क्रिकेट खेलना  भी छोड़ देंगे..!!
 

अंत में,  हम सभी ब्लॉगर्स, देश के सभी, विद्वान और बुद्धिजीवी महानुभव से, यही कहना चाहते हैं की,
 

" एवमेतध्यथात्थ   त्वमात्मानं   परमेश्वर ।
  द्रष्टुमिच्छामि  ते रूपमैश्वरं पुरूषोत्तम ॥३॥"  

 

"विश्व रुप दर्शन योग-अध्याय-११- श्रीमद्भागवत  गीतापुराण "  
मित्र माही, हम जीत के आनंद को अपनी कटु वाणी से कलुषित करना नहीं चाहते थे,मगर क्या करें? कोई सुननेवाला नहीं है..!!



हम तो बस इतना ही चाहते हैं की, श्रीमद्भागवत  गीतापुराण में, धनुर्धर अर्जुन को विषाद योग से मुक्ति दिलाकर, भगवान श्रीकृष्णने जैसे अर्जुन को विजयपथ पर प्रेरित किया था, इसी तरह, किसी ग़रीब आदिवासी या समाज के पिछड़े दलित परिवार के संतान को, ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, वीर्य और तेज युक्त, साक्षात ईश्वर रुप रमतवीर के,`विश्व रुप` का हम दर्शन करना चाहते हैं ।
 

दोस्तों, अब क्या करें?


चलो, कोई दिक्क़त नहींजी..!!


अगले क्रिकेट वर्ल्ड कप के आने तक, प्रतीक्षा करें..!! ओर क्या?
 

============

`ANY COMMENT`


(ख़ास अनुरोध) "कृपया, हो सके तो टिप्पणी, मेरे ब्लोग MKTVFILMS या तो, E-Mail; mdave42@gmail.com  पर ही करें, अगर व्यंग समझ न आयें तो, कृपया टिप्पणी न करें..प्ली..ज़..!! मेरे मन को  गहरी ठेस पहुँचती है । बहुत-बहुत शुक्रिया ।) 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०३-०३-२०११.