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26.5.08

दलाल और घपलेबाज कालिया अविनाश, है तुम्हारे पास इन आरोपों का जवाब?

भाई,

अविनाश जी के बारे में हमारे पास भी दो जानकारियां हैं।

एक ये कि ये महोदय आज से करीब छह साल पहले भी दिल्ली आए थे। प्रभातखबर के संपादक हरिवंश जी के ओएसडी और स्टेनोग्राफर के तौर पर। तब उनका काम चंद्रशेखर की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर किताबें निकालने में मदद करनी थी। उस दौरान उन पर पैसों की हेराफेरी का आरोप लगा और प्रभात खबर से नौकरी जाती रही। हालांकि बाद में जुगाड़ से फिर नौकरी पा लिए।

जब चंद्रशेखर का काम ठप हुआ तो एक गांधीवादी बुद्धिजीवी की सिफारिश पर उन्हें पानीवाले राजेंद्र भाई के पास प्रकाशन काम का काम मिला। भैया अलवर पहुंचे और पैसे की हेराफेरी के बाद वहां से भी रफूचक्कर हो लिए। अब एनडीटीवी में सबको ब्लॉगिंग सिखाते हैं और मजे से नौकरी कर रहे हैं।

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(उपरोक्त तथ्य किसी साथी ने मुझे मेल से भेजे हैं। अगर आपके पास भी कालिया के बारे में कोई जानकारी हो तो उसे मेल करें yashwantdelhi@gmail.com पर। आपकी पहचान गुप्त रखी जाएगी।)
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1.5.08

.....राम-नाम सुंदर करतारी। छापो-छापो नंगी नारी।।

हमेशा की तरह इंटरनेट की उन गलियों में घुस जाता हूं जहां शराफ़त अली किस्म के लोग नहीं जाते। एक गली खोद रखी है अपने जे.पी. भइया ने और आज तो उस गली से मुझे कुछ दोहे-छंद वगैरह की आवाज आती सुनाई दी तो हमें लगा कि क्या हुआ भइया बीमार हो गये क्या जो रामायणनुमा कुछ बड़बड़ा रहे हैं; अंदर जाने पर पता चला कि रामायण नहीं बल्कि अखबारायण चल रही है। आप लोग को भी जरा पुण्य जैसा कुछ कमा लीजिये इन पवित्रता का रस टपकाते दोहों को ताकि अगर पत्रकारिता के पाप सता रहे हों तो इनके मनन-वाचन से धुल जाएं.........


......पत्तरकारों, हाय तुम्हारी यही कहानी!.......

1....
नचवावैं अखबार गोसाईं। नाचत नर मरकट की नाईं।।

2....
खबर बेंचते संता-बंता। हरि अनंत, हरि कथा अनंता।।

3....
सत्ता, श्वान, डॉन, अखबारी। सबहि ताड़ना के अधिकारी।

4.....
खबर-खबर खबराते बंदर। कूद पड़े लंका के अंदर।।

5.....
नाचो खूब, नचाओ रंभा। चोंथो-चोंथो चौथा खंभा।।

6....
सिया-राम मय सब जग जानी। पढ़ो-पढ़ाओ खबर पुरानी।।

7......
मंगल भवन, अमंगल हारी। नाम मीडिया, काम कहारी।।

8......
राम-नाम सुंदर करतारी। छापो-छापो नंगी नारी।।

9......
लिखते-लिखते खबर हुंआसी। मूड़ मूड़ाय भये संन्यासी।।

10.......
टेंशन में दिन-रात और आंखों में पानी। पत्तरकारों हाय तुम्हारी यही कहानी।।

(साभारः बेहया से)

26.4.08

पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप, टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!, बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!

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पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप


पत्रकारिता के लिए आज सबसे फिट और एकल संबोधन है...मीडिया मार्केट। कोई मिशन-फिशन नहीं रहा। शुद्ध धंधा। जैसी की पहली पोस्ट पर कुछ मित्रों की लिखित-मौखिक प्रतिक्रियाएं रहीं, उनके या अन्य किसी के अंदेशे का मैं यहां समन करने नहीं जा रहा, न ही सोदाहरण इस पर यहां कुछ लिखने-पढ़ने या भंडाफोड़ जैसी सनसनी परोसने की मेरी मंशा है। क्योंकि शीत-पीत पत्रकारिता के झंडाबरदार इस पर पहले ही काफी कुछ कागजी शेखियां बघार चुके हैं। यहां मैं अपनी बात क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस)काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखने जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जाएंगे....

.....घीसू-माधव एक ही अखबार में काम करते हैं। घीसू (आत्मा से) मर चुका है। माधव मर रहा है। दोनों ने तिल-तिल मौत का रिहर्सल और एहसास भी किया है।

....घीसू का बेटा शहर के सबसे महंगे कान्वेंट स्कूल में पढ़ रहा है। उसके पास एसी गाड़ी, शहर के सबसे पॉश इलाके में शानदार बंगला और पत्रकारिता की दुनिया में उसका क्या खूब बिकाऊ-टिकाऊ नाम है।

....माधव अभी पत्रकारिता के पराड़करी तर्पण में अस्तव्यस्त है। गर्मियां मटके के पानी में बीत जाती हैं, बच्चे गांव की पाठशाला में नाक पोंछ रहे हैं। पत्नी १८ की उमर में ३८ की हो चली है। बूझो तो जानें कि माधव की मौत और घीसू की जिंदगी के अर्थ क्या हैं?

......घीसू क्राइम रिपोर्टर है। माधव को दफ्तर में अपने बड़ों के पैर छूने नहीं आता। घीसू को मालूम है कि किस सर के घर शराब की पेटी पहुंचानी है, किस सर के खाने की टिफिन उनकी मेज पर लगानी है, किस सर के कपड़े प्रेस कराना है, किस सर का बच्चा जब जोर जोर से रोता है तो कौन सी टाफी खिलाने पर चुप हो जाता है।

.....एक बार घीसू अपने स्वामी के चेंबर में दबे पांव घुसा कई कुंतल विनम्रता ओढ़े हुए, पूरी आस्था से दांत निपोरे हुए। बोला, सर आपको देखकर मुझे अपने पिता की याद आती है। आप मेरे पिता समान है। स्वामी बोले, वो तो मेरे यहां नौकरी करने वाला हर कर्मचारी मुझे पापा कहता है। जब दूसरे अखबार में जाता है तो वहां के स्वामी उसके पापा हो जाते हैं। तुम जैसे कर्मचारियों के बीच मैं यूं ही टकलू नहीं हुआ हूं।

....एक बार स्वामी को हंसते हुए देखकर माधव को हंसी आ गई। स्वामी का चौंकना स्वाभाविक था कि जब मेरे इर्द-गिर्द खड़े इतने बड़े-बड़े महानुभाव (दर चापलूस) मेरी हंसी के डर से घर तक पत्नी-बच्चों को डांट भगाते हैं, फिर इस ट्रेनीज कमीनगी के मायने क्या हो सकते हैं? माधव आज तक स्वामी की हंसी और अपने डिमोशन का अंतर नहीं समझ पाया।

....घीसू की बीवी एक कथित राष्ट्रीय दल की जब्बर दलैत है। बेटा थानों से चौथ वसूलता है। (पुत्र के परमानेंट होने के बाद से) पिता शहर के नामी समाजसेवी हैं। हर महीने, हर थाने से उनके नाम सफेद लिफाफा आता है। अखबार के फोटोग्राफर ने घीसू के बच्चों की अब तक आठ दर्जन से ज्यादा तस्वीरें खींचीं हैं। शहर के सिपाहियों के दबादले की सूची घीसू की माता जी बनाती हैं।

....माधव की मां तपेदिक से मर चुकी है। पिता गठिया का मरीज है। बाकी बीवी-बच्चों के बारे में हर किसी को पता है।

......घीसू के पास कई बीवियां हैं। कई दुकानों से उसके यहां शराब की पेटियां आती हैं। हर रिक्शे वाला उसके बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए लालायित रहता है। बीवियां थाने से नीलामी की गाड़ियां उठवाती हैं।

.....ड्यूटी से छूटने के बाद माधव शराब पीता है और गालियां देता है। कहता है, आज तक मुझे कभी जेल की सजा नहीं हुई। सोचता हूं, एक बार ३०७ में जेल हो आऊं!

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2-----------------
टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!


1. पत्रकारिता एक माल है, निजी संपत्ति जुटाने का खेल है, इसलिए युवतियों की नंगी फोटो छापो। नंगी फोटो छापना भी कोठे चलाने की एक विधा है। आज-कल संपादक लंपट सिंह इस काम में सबसे बोल्ड लीचड़ माने जाते हैं।

2. टीवी पत्रकारिता टीआरपी की भड़ैती में व्यस्त और मस्त-मस्त है। अब तो निर्वस्त्र दृश्यों से भी उनका काम नहीं चल रहा है, सो कोठेबाजी को आयुष्मान बनाए रखने के लिए हंसोड़ों की फौज लेफ्ट-राइट करने लगी है। ऐसे निर्लज्ज हंसोड़, जो अपनी मां-बहन को छोड़ पूरी दुनिया की औरतों के जिस्मानी चटखारे लेने का धंधा करने लगे हैं। गंदे जोक के नाम पर एंकरिंग की दुकान भी पूरी बेहयायी से कंडोम और चोली-घाघरा की तिजारत करने लगी है। ऐसे दो भड़ैत भड़भूज बुद्धू और चेंकर चुम्मन दांत चियारे, हाथ पसारे आजकल करोड़ों में खेल रहे हैं। तुर्रा यह कि दुनिया को हंसा रहे हैं। जरा अपनी मां-बहन को नंगा नचाकर दुनिया वालों को हंसाओ तो जानें।

3. लंपट सिंह कहते हैं कि सेठ जी की मौत की खबर तीन कालम में पेज के टॉप पर लगेगी। लू-ठंड और मुफ्लिसी की मिर्गी से मरने वालों को संक्षेप कॉलम में कहीं किनारे चेंप कर छुट्टी पाओ। समझे कि नहीं समझे! उठावनी के विज्ञापनों से अच्छी कमाई हो रही है। खबरें हटाकर उठावनी छापो, तभी तो तुम्हारी सेलरी का जुगाड़ होगा।

4. एक साहित्य संपादक भांड़ेन्द्र जी मुद्दत से स्री-विमर्श में तल्लीन हैं। ओक्का-बोक्का, तीन चलोक्का, लइया-लाची, चंदन काटी, इजयी-न-विजयी, पान-फूल ढोंड़वा पचक्क। अपने लीद-लेखों में वे अक्सर लिखा करते हैं कि स्त्री के पास एक देह ही तो ऐसी चीज है, दिखाने-भुनाने के लिए। उसकी लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार उसका देह है। वैसे संपादक जी की स्री-पटकथा से भला कौन वाकिफ नहीं।

5.चूंकि देश की राजधानी में रहते हैं, इसलिए टीरापी सिंह, भांड़ेन्द्र जी और लंपट सिंह रोजाना शाम सात-आठ बजे मुफ्त के तीन-चार पैग सूतने के बाद देश-दुनिया और अखबारी मालिकाने पर गंभीर चर्चाएं-मंत्रणाएं किया करते हैं। आखिरकार उनकी बैठकी यह सिद्धकर ही समाप्त होती है कि सेठ, सांसद और अफसरशाह महान हैं। भारत भुक्खड़ों का देश है।

6.लंपट सिंह पहले जहां काम करते थे, एक दिन स्वामि-भक्ति की पिनक में अखबार-मालिक को त्यागपत्र थमा बैठे। बदकिस्मती से स्वामिभक्ति गच्चा दे गई। इस्तीफा मंजूर हो गया। अगले दिन सिक्योर्टी ने जनाब को प्रेस में घुसने से रोक दिया तो पहुंच गए मालिक के बंगले पर। बर्फी और कॉफी से अगवानी के बाद मालिक सर बोलेः भाई रिजायन कर दिया है तो क्या हो गया, कभी कोई दिक्कत-परेशानी अकेले मत झेलना, मुझे खबर कर देना, मदद कर दिया करूंगा। अब नौकरी करके क्या करोगे। लंपट जी चक्कर खाकर गिर पड़े। वहीं खून की बोमेटिंग हुई। अब बेचारे सालों की बेरोजगारी के बाद उठावनी और अश्लील तस्वीरें छापने के नए आइडिया के साथ दिल्ली में नमूदार हुए हैं।

7. सभी न्यूज चैनलों को मालूम है कि टीआरपी सिंह देश का सबसे बड़ा आइडिया-चोर है। पूरा-का-पूरा पैकेज चुटकियों में टिपवाकर अपने यहां कर देता है...फ्लैश-फ्लैश!! चोखा-चटनी-घी-अचार के बावजूद बाकियों का जायका फिस्स। यानी टीआरपी खुश, बाकी फुस्स। इसे कहते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, समझे-कि-नहीं समझे!

8.लंपट सिंह बड़े विद्वान और बाल-साहित्य-विशेषज्ञ हैं। रोजाना जब तक दो-चार कर्मचारियों के बच्चों के पेट पर लात न मार लें, उनको खाना हजम नहीं होता है। अब तक छप्पन दर्जन लात मार चुके हैं। वैसे वह मारपीट और गाली-गलौज के सख्त खिलाफ हैं। सशस्त्र-वार्ता के बाद एक बार थाने में अनायास पसीने-पसीने हो गए थे।

9.टीआरपी सिंह लड़कियों के करारे शौकीन हैं। गीत-गजल अच्छी लिखते हैं। भंडाफोड़ होते ही बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने-रिरियाने लगते हैं। अपनी जिस्मानी लुच्चई के फेर में अब तक कई चैनल बदल चुके हैं। कई बार पिटे-पिटाये भी हैं। अब तरह की दैहिक समीक्षा के आदती हो चले हैं। दिल्ली में सब चलता है।

10.लंपट, टीआरपी, भाड़ेंद्र, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। नक्षत्र क्या, चांद-सूरज या सप्तऋषि-मंडल हैं। मंडली के आगे सरकार, पीछे कई पुश्तों का बैंक-बैलेंस है। पराड़कर जी ने इसीलिए तो बनारसी मालदार बाबू शिवप्रसाद गुप्त की चौखट पर मत्था टेक कर इस देश में पत्रकारिता के आदर्श रचे थे। जय हो! जय हो!!

-करतूतें सच्ची, नाम काल्पनिक।


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बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!


(यहां मैं चरित्रहीन मीडिया की बातें क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस) काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखता जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों ही नहीं, पूरे मीडिया-सिस्टम के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जा रहे हैं....लंपट दुबे, टीआरपी सिंह, भाड़ेंद्र जादो, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं....से आगे पढ़ें आज...पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पापःतीन.....बड़ा नाम करेगा चुगलू मादर......च्च्च्च्चो!)


1.बिगांडू महतो अभी साल-छह महीने से अखबार के पेशे में आया है। हक्का-बक्का है। चपड़दंती मुंह बाए दिन भर शहर के इस कोने से उस कोने तक ड्यूटी बजाता फिरता है। शाम को इकट्ठे पूरी रिपोर्ट मुंह जुबानी एडिटोरियल इंचार्ज को देनी होती है। ड्यूटी भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, खबर-सबर की नहीं, लिखने-पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं, सब साबुत-साबुत मुंह-जुबानी। ......कि हमारे अखबार का रिपोर्टर आज हमारे प्रतिद्वंद्वी अखबार के किन-किन रिपोर्टरों से मिला। ....कि किस रिपोर्टर ने आज हमारी कौन-सी खबर लीक की। ....कि फलां कार्यक्रम के इनोग्रेशन में फलां संपादक को क्यों बुलाया गया, हमें क्यों नहीं। .....कि पत्रकार संघ के चुनाव में हमारे अखबार का कंडीडेट विरोधी अखबार के कंडीडेट से क्यों हार गया, मतदान में कौन-कौन से हमारे-अपने विभीषण रहे?

2. फटीचर मंडल सर्कुलेशन इंचार्ज हैं। उनको आज-कल एक ही चिंता खाए जा रही है। एबीसी वाले शहर में डेरा डाल चुके हैं। अब क्या होगा। साल भर रिपोर्ट तो नंबर दो में बनी है। अब वे खंगालेंगे एक-एक रिकार्ड। बाहर रास्ते में अखबार के बंडल से लदी गाड़ियां चेक करेंगे। मंडल साहब एक बार फिर उसी आजमाये पुराने फार्मूले को भिड़ाने में जुटे हैं कि सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। चार-पांच जोड़ी जूते, चार-पांच दर्जन चूड़ियां और साड़ियां, दस किलो मिठाई, प्रति कंडीडेट दो-दो सेट कपड़े...। ऐं, ये क्या है? सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल से पूछिए!!

3. सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल की एक टेंशन हो तो झेल भी जाएं, रोज चार तरह के टेंशन। आज-कल एजेंटों का फिर माथा फिरा हुआ है। सवेरे अखबार के बंडल उठाने की बजाय सेंटर पर पहले मीटिंग करते हैं। नेतागीरी का शौक चढ़ा है। कहते हैं, आज हम अखबार नहीं उठाएंगे। पहले एक रुपया हमारा कमीशन बढ़ाओ। अब कमीशन कहां से बढ़ाएं। अखबार का रेट बढ़ाते ही ग्राहक बोलते हैं, ई कूड़ा-कबाड़ा हमे नहीं पढ़ना, कल से अखबार बंद कर दो। अब रेट बढ़ाएं तो सांसत, न बढ़ाएं तो। इसी चक्कर में रोजाना सर्कुलेशन गिर रहा है। लगता है कि इन पर भी वहीं पुराना फार्मूला एक बार फिर आजमाना पड़ेगा....दै डंडा, दै डंडा, पट्ट कर दो सबों को एक साथ। अभी क्राइम रिपोर्टर से तिग्गी भिड़ाता हूं कि पिटाई के समय कोई पुलिस वाला बीच में न आए।

4. मुच्छड़ दुबे पुराने गुंडे हैं। कालेज के दिनो के। बेचारे ने अखबार में नौकरी कर ली है। अब उसे रोज अपने संपादक को बताना है कि कौन, किसके कान में क्या फुसफुसा रहा था। किस रिपोर्टर की किससे ज्यादा पटती है, मुझसे किसकी ज्यादा फटती है। आज कल डेस्क वाले शाम को आने वाली मिठाइयों को क्यों दबा जा रहे हैं। खुद ही खा जा रहे हैं। चुनाव का मौसम है। फिल्ड से मिठाइयों के इतने पैकेट रोजाना आ रहे हैं, मेरी मेज तक एक भी नहीं पहुंचे। जरा पता तो लगाओ, इसके पीछे शरारत किसकी है, किसका दिमाग इतना तेज काम कर रहा है, अभी दुरुस्त करता हूं। आखिर मैं भी बाल-बच्चेदार हूं, दो-चार पैकेट मुझे भी तो घर के लिए चाहिए। आज-कल रिपोर्टरों को फिल्ड में खूब गिफ्ट भी मिल रहा, सो अलग से। सब दबाके बैठ जा रहे हैं, जरा कस के पता करो, बाकी सब काम-धाम छोड़ दो। ठीक-ठीक पता कर लिये तो इस बार प्रमोशन-इंक्रीमेंट डबल। इसी तरह लगे रहो, लंबी रेस का घोड़ा बनोगे, पत्रकारिता में आगे चल कर बड़ा नाम करोगे पट्ठे। और क्या, तुम कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े ही कर रहे हो दुबे जी। सबसे पक्का काम कर्मचारियों की जासूसी और इधर-उधर का लगाना यानी चुगलखोरी। तुम भी खुश, हम भी खुश। अखबार जाए चूल्हे भाड़ में।

5. चिंटू-पिंटू की ड्यूटी है कि सबके उसमे (.....) डंडा किए रहो। किस-किस के उसमें (.....) डंडा करना है सर? अरे!! ये भी कोई पूछने की बात है! दाढ़ी-मूंछ सफेद कर लिये प्रेस की नौकरी में, और ये तक पता नहीं कि किस-किसके उसमें (....) डंडा किये रहा जाता है? होटल वालों के, थाने वालों के, सिनेमा वालों के, मंडी वालों के, मिठाई वालों के, शो रूम वालों के, बिजली वालों के, पानी वालों के, मीट-मुर्गा वालों के, फल-सब्जी वालों के, ठेकेदारों के, नेताओं के, उठावनी के विज्ञापन देने वालों के.....। सर, तब तो पूरे शहर के उसमें (.....) डंडा करना पड़ेगा! हां, और क्या। तुम्हे रक्खा किसलिए गया है चिंटू-पिंटू। कुछ मालूम है, चूतिया कहीं के! मादर......च्च्च्च्चो।

6. तरकर जी बड़े सीनियर जर्नलिस्ट हैं। अब तक देश के उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम के दर्जन भर से ज्यादा अखबारों में नाम कमा चुके हैं। हर शहर में उनकी बस दो ही जरूरतें रहीं हैं, एक बीवी और एक मकान। इस तरह अब तक करोड़ों की नाजायज जायदाद और दर्जन से ज्यादा नाजायज औलाद के विधाता बन चुके हैं। तो भी तरकर की व्यथा-कथा अनंता। दर्दे-दिल ये कि सब कुछ अपने ही डकारते रहे, अपने ऊपर वालों से बेखबर। सो फ्रस्टेशन बढ़ता गया, बढ़ता गया। मुद्दत से सब-एडिटरी। यानी जिंदगी बीती जा रही, हाई स्कूल पास न हुए। जब जोरू-जायदाद खुद ही सब डकार जाओगे तो प्रमोशन-इंक्रीमेंट क्या खाक मिलेगा।

7. लुच्चा पंडित ने पत्रकारिता में कमाई-धमाई का अव्वल आइडिया अख्तियार कर रखा है। साल में सिर्फ दो प्रोग्राम कराते हैं और फूल कर लाल हो जाते हैं, जैसे अमेरिकी सुअर। उनकी एक जुगाड़ मुंबई है। उसके आशीर्वाद से समर सीजन में फिल्म वालों का प्रोग्राम। दूसरा दिल्ली-कलकत्ता में। उसका काम है खेल-खिलाड़ियों के साथ तिग्गी भिड़ाना। सो जाड़े में नेशनल टूर्नामेंट। बस। ना काहू की चुगली, ना काहू की दलाली। पंडी जी का यह डबल गेम उनके ऊपर वालों को लट्टू किए हुए है। कमाई में दस परसेंट ऊपर वालों के बाल-बच्चों के लिए। तुम भी खुश, हम भी खुश। यही सब तरकर जी को नहीं करने आया वरना आज एडिटर की कुर्सी पर होते।

8. सत्येंद्र नरवार तबादले की कौवा हंकनी से परेशान हैं, क्या ससुरा सिर पर पत्तरकारिता का भूत चढ़ा था, इस पेशे में चला आया। इतनी पढ़ाई-लिखाई सब व्यर्थ। लगता है लुच्चा पंडित वाला रास्ता ही धरना पड़ेगा, वरना हर छमाही तबादला। कहां तक झेलें। टाइम आफिस वाले कहते हैं, ऐसा सार्टिफिकेट लेकर अखबार में क्या करने चले आए। यहां तो चुगलुओं का राजपाट चलता है। अरे चोगद जी, बन जाओ चुगलू मादर...च्च्च्च्चो....तुम भी उसकी तरह मजे करोगे। फिर कभी न होगा तबादला। इंक्रीमेंट-प्रमोशन अलग से। समझे बच्चू सतेंदर नरवार!

9. एक जनाब मणिसाना वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने की बेकरारी में इतने सस्वर हो उठे कि आजकल रेलवे रोड पर चाय-पान का खोखा चला रहे हैं। मालिक को फूटी आंखों नहीं सुहा रहे थे। निकाल बाहर किया। तेरी ये हिमाकत। यहां लोग अट्ठारह-अट्ठारह घंटे मरा रहे हैं, चूं तक नहीं कर रहे और तू पत्रकार का चोद्दा, दस घंटे काम करके मणिसाना-मणिसाना चिल्ला रहा है....ऐं!!

10. एक और थे। भीतर-ही-भीतर यूनियनबाजी के पर्चे बांट रहे थे। मनीजर बाबू को किसी चुगलू से भनक लग गई। ऐसा संट किया कि आज कल दिल्ली में आईटीओ पर आटो चला रहे हैं। लेकिन हैं बड़ी मस्ती में। अखबार का नाम लेते ही एक सांस में सौ-सौ गालियां धाराप्रवाह ...... मादर.... च्च्चो .... फादर.... च्च्च्चो...... बाहन.... च्च्च्च्चो...... बेटी..... च्च्च्च्चो....

-(सभी नाम काल्पनिक, बाकी सब सही-सही)


(हिंदी पत्रकारिता के पाप का खुलासा करने का बीड़ा उठाया है जेपी नारायण ने। बेहया नामक अपने ब्लाग पर वे लगातार हिंदी पत्रकारिता पर लिख रहे हैं। उन्हीं के ब्लाग बेहया http://behaya.blogspot.com से उपरोक्त तीनों पोस्टें उठायी गई हैं। आप सभी भड़ासियों से अनुरोध है कि उपरोक्त तीनों पोस्टों को गंभीरता से पढ़ें और एक एक लाइन धैर्य के साथ पढ़ें। आपको जरूर लगेगा कि दरअसल ये प्रतीकात्मक कहानियां आपके आसपास की वो कड़वी सच्चाइयां ही हैं जिनसे आप रोजाना की जिंदगी में हमेशा दो-चार होते रहते हैं। जय भड़ास...यशवंत)

3.3.08

क्या लालू यादव से डायलागबाजी के चलते निकाले गए पुण्य प्रसून?

पुण्य प्रसून वाजपेयी की विदाई और लालू यादव-- इन दोनों में कोई योग संयोग या दुर्योग तो नहीं दिख रहा पर हुआ कुछ ऐसा ही। जानकारों का कहना है कि सहारा समय के सर्वेसर्वा पुण्य प्रसून जब रेल बजट के दौरान लालू यादव का इंटरव्यू करने पहुंचे तो लालू ने पूछ दिया की पंडी जी आप कब पहुंच गए सहारा समय? पुण्य प्रसून ने जो जवाब दिया उसका लब्बोलुवाब ये था कि सहारा समय को सुधारने के लिए चले आए हम। इसके जवाब में संभवतः लालू ने कहा कि सहारा ग्रुप को कोई सुधार पाया है जो आप सुधार पाएंगे? और जब ये सब बातें हो रही थी तो सब कुछ लाइव और आन एयर था। बताते हैं कि प्रसून जी के साथियों व अन्य लोगों ने सुझाव दिया कि इतना हिस्सा हटा देना चाहिए पर प्रसून जी ने इसे सहजता का संवाद बताकर चलने देने को कहा। और यही बात सहारा ग्रुप के मैनेजमेंट को नागवार गुजरी। तुरत फुरत निर्णय लिया गया और प्रसून जी को एंकरिंग करने से मना कर दिया गया। दो दिन अवकाश पर रहे और जब अगले दिन आफिस आए तो मैनेजमेंट निर्णय ले चुका था। बताते है कि थोड़ी नोंकझोंक के बाद प्रसून जी और उनकी पूरी टीम नारेबाजी करते हुए बाहर निकल गई और अंदर सहारा समय के बचे हुए स्टाफ ने जश्न मनाना शुरू कर दिया।

तो देखा आपने, लालू जी के डायलाग और प्रसून जी की सहजता के कारण यह सब इतना बड़ा कांड हो गया।

जानकारों का कहना है कि प्रसून जी ने अपने व्यवहार के चलते सहारा समय के ढेर सारे लोगों को अपने खिलाफ कर लिया था। सहारा की एक बड़ी लाबी प्रसून जी को लेकर लगातार अभियान चलाए हुए थी और उनकी विदाई की अफवाहें हर समय उड़ाया करती थी। प्रसून जी अति-आत्मविश्वास और स्ट्रेट फारवर्ड बिहैवियर के कारण कामकाज तो अच्छा करते कराते रहे पर लोगों में अलोकप्रिय होते गए। दरअसल एक लीडर के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह खुद अच्छा कार्यकर्ता हो, उसमें जरूरी गुण ये है कि वो कार्यकर्ताओं में अव्वल दर्जे का जोश ओ खरोश बनाए रखे और उन्हें बार बार शाबासी व दिशा देते रहे। पर कई बार हम कुछ लोग जो खुद काम में बहुत अच्छे होते हैं, टीम लीडर बनने के बाद खुद ही अच्छा कर दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं और बाकी लोगों से खुद द्वारा किए गए काम के स्तर के काम की अपेक्षा करने लगते है। इसके चलते दिन ब दिन खाई बढ़ती जाती है और आखिरकार एक दिन ऐसा होता है कि दो तिहाई टीम आपके खिलाफ खड़ी हो गई। और जिस संस्थान में दो तिहाई लोग किसी नेता के खिलाफ हो जाते हैं तो वहां काम का मौहाल नहीं रहता और कोई बेस्ट रिजल्ट नहीं दे सकता।

खैर, जो हुआ सो हुआ। आना जाना तो जीवन का एक बड़ा छोटा हिस्सा है लेकिन बौने टाइप के लोग इसे सबसे बड़ा कांड और सदी की सबसे बड़ी घटना के रूप में पेश करते हैं। दरअसल जो लोग हर साल दो साल में कुछ नया करते रहते हैं उनसे ही ज्यादा कुछ अपेक्षाएं होती हैं। वरना एक जगह रूका हुआ पानी तो सड़ ही जाता है।

नया सवाल ये उठ रहा है कि अब प्रसून जी अपनी टीम लेकर किस गली की ओर जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि उनके पास अब त्रिवेणी ग्रुप के आने वाले नए चैनल का आप्शन है जहां वो कुछ कम ज्यादा में बारगेन कर अपनी टीम सहित जा सकते हैं। और रामकृपाल सिंह को भी अभी तक किसी एक ऐसे चेहरे की तलाश है जो उनके नए चैनल की रीढ़ बने और एक विजन दे सके। तो राम मिलाये जोड़ी। उम्मीद है, जल्द ही प्रसून जी अपने लोगों के साथ किसी नई जगह पर झंडे गाड़ते नजर आएंगे। उन्हें भड़ास की तरफ से शुभकामनाएं। अगर कोई मीडियाकर्मी साथी यह बता सके कि प्रसून जी के साथ किस किस ने सहारा समय छोड़ा है, तो बड़ी कृपा होगी।

उपरोक्त जो बातें लिखी कही गई हैं, वो इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ वरिष्ठ साथियों द्वारा बताई गई बातों पर आधारित है और इसे कई जगहों से क्रास चेक भी किया गया है। अगर किसी को कोई आपत्ति हो या उपरोक्त बातों में कोई तथ्य गलत हो तो कृपया जरूर ध्यान आकृष्ट कराएं, नीचे कमेंट करके।

जय भड़ास
यशवंत

25.2.08

यशवंत जी डाक्टर जी के नाम एक खत

भैया जी
आप के आमंत्रण से अस्वीकृति कैसी ,ज्याइन कर ली भडास । अभी समझ नहीं पा रहा हूँ क....क...क्या....चल रही है मनीषा पर बहस क्यों
कीजिए खुलासा इधर ::> किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी !! गौर किया तब पता चला फाकिर साहब नहीं रहे...
यहाँ आनंद आ गया
एक अदद खूंटा चाहिए

11.2.08

शराब माफियाओं के गुर्गों ने किया डा. रुपेश पर हमला

सक्रिय भड़ासी और भड़ास के माडरेटर डा. रुपेश श्रीवास्तव पर मुंबई में शराब माफियाओं के गुर्गों ने हमला कर दिया। डाक्टर साहब अवैध शराब बिक्री के खिलाफ एक अलग तरीके से अभियान चलाए थे। उन्हें काफी चोटें आई हैं, वे अस्पताल में पड़े हैं। भड़ास शराब माफियाओं के इस कृत्य की निंदा करता है और डाक्टर साहब के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना के साथ उनके आंदोलन और उनकी मुहिम में हर क्षण साथ होने का ऐलान करता है। सभी भड़ासियों से अपील है कि वो डाक्टर साहब को नैतिक समर्थन दें। अगर लगे तो उन्हें फोन करके उनकी कुशल क्षेम पूछ लें।

डाक्टर साहब पर हुए हमले की जानकारी मुनव्वर सुल्ताना ने पहले ही अपनी एक पोस्ट में दे दी थी पर हम लोगों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। आज जब मैंने उस पोस्ट को पढ़ा और डाक्टर साहब से सुबह बात की तो मामले के बारे में पता चला। आप नीचे लिखी पोस्टों को क्लिक कर डाक्टर साहब की इस मुहिम व हमले की खबर को पढ़ सकते हैं। दूसरी पोस्ट डाक्टर साहब की सोच के बारे में है जो उन्होंने खुद ही लिखी है।

डा. रुपेश को मुनव्वर सुल्ताना का जय श्री राम
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कौन हैं ये डा. रुपेश? उनका गोबर भड़ास पर डाल रहा हूं

जय भड़ास
यशवंत

चूतियापा तो डालर में कनवर्ट हो रहा है !!

कभी आफत-बिपत तो कभी खुशियों की सौगात। ब्लागिंग में मेरा अनुभव इन्हीं दोनों छोरों के बीच घूमता रहता है। भड़ास रूपी चूतियापे की शुरुआत जिस तरीके से हुई और हाहाकार मचाकर बंदर कूद गया लंका के अंदर वाली स्टाइल में इस बंदर ने पूंछ हिला-हिला कर लंका में जिस तरह उपद्रव किया, उससे मुझे तो तकलीफ हुई ही, बंदर को भी कुछ समय के लिए अज्ञातवास में रहना पड़ा।

वो नुकासन उठाने के दिन थे। वो ब्लागर बनने से होने वाले नुकसान के दिन थे।

पर समय का पहिया चले रे साथी.....। समय बदला। चक्र घूमा। अब वही भड़ास, वही चूतियापा, वही बंदर, वही ब्लागर.....लेकिन यह सब खुशहाल। प्रसन्न। जबसे गूगल बाबा के यहां से पिन नंबर आने की सूचना मिली है और जब से अपने गूगल एडसेंस एकाउंट का खोया हुआ पासवर्ड दुबारा मांग लिया है, तबसे रोज सुबह सुबह लक्ष्मी मैया के दर्शन नेट पर ही कर लेता हूं और जल्द ही उनके घर आने की कामना करने लगता हूं।

हुआ यूं कि पिछले साल जब जून या जुलाई महीने में जब भड़ास शुरू किया तो सीखने के क्रम में गूगल एडसेंस का खाता भी खोल लिया। बाद में कई बार गूगल एडसेंस के विज्ञापन लगाए, हटाए, उड़ाए, फिर लगाए जैसे ढेरों प्रयोगों के बीच एक बार तो भड़ास ही डिलीट कर दिया। इस सब चक्कर में गूगल एडसेंस के खाता को पूरी तरह भूल गया। अब जब पिछले महीनों से दुबारा गूगल एडसेंस के खाते को खोजना शुरू किया तो पता चला कि मुझे पासवर्ड याद नहीं है। खैर, गूगल बाबा से लंबा पत्राचार हुआ और आखिरकार उन लोगों ने मेहनत करके मुझे मेरे खाते के दर्शन करा दिए।

अब रोज सुबह इस खाते को खोलता हूं तो पता चलता है कि आज की रिपोर्ट में कुछ डालर बन गए हैं और यह कुछ डालर वाकई अभी कुछ है...चलिए और बता देता हूं इकाई की भी प्राथमकि इकाई के बराबर है....फिर भी, अंदर से बड़ी खुशी होत है। भड़ास रूपी अपन लोगों का बच्चा तो अब कमाने लगा है।

मित्रों, इस कमाई से अब रोज नए नए आइडिया सूझ रहे हैं। सार यह है कि अगर हम कोई काम चूतियापे में करते हैं और उस चूतियापे को रुपया नहीं शिनाख्त कर पा रहा, सीधे डालर भैया सम्मानित कर रहे हैं तो फिर हम लोग ऐसे ढेरों चूतियापे क्यों नहीं प्लान कर सकते ताकि नौकरी वौकरी का चक्कर ही नहीं रहे और इतनी कमाई इसी सब से हो जाए कि हर महीने आराम से एक लाख या पचार हजार रुपये मिल जाएं। अगर आप में से भी कोई ऐसा करना चाहता है तो मुझे खुशी होगी। मुझे ऐसे साहसी और प्रयोगधर्मी लोग चाहिए जिनसे साथ मैं बतौर पार्टनर कुछ चूतियापे शुरू कर सकूं, बिलकुल बराबरी के आधार पर। हालांकि इस तरह की कोशिश पहले भी की थी मैंने पर उस वक्त कुछ वजहों से बात आगे नहीं बढ़ा सका।

देखते हैं, चूतियापे के डालर का चेक कब आता है? भड़ासियों की पार्टी ड्यू है...उस दिन का इंतजार करके आज से ही कहते रहिए....चीयर्स.....!!!

जय भड़ास
यशवंत

10.2.08

कौन हैं ये डाक्टर रुपेश? ...उनका गोबर भड़ास पर डाल रहा हूं

((डाग्डर साहब की निजी बातें सार्वजनिक कर रहा हूं....जो बातें वो बताने से टाल रहे थे, उसे एक निजी मेल के जरिए मुझे बताया। अपनी ज़िंदगी, बढ़ने, भटकने, पढ़ने, गुनने, सुनने, सोचने.....आदि के तरीके के बारे में....। उनसे अनुमति लेकर मैं निजी मेल को भड़ास पर डाल रहा हूं। और उससे पहले एक चैट, डाग्डर साहब के साथ, इस मेल के संबंध में। मुझे कई बार लगता है कि डाक्टर रुपेश कोई दैवीय ताकत तो नहीं हैं जो मानवीय शक्ल में यूं ही भटकने के लिए भटक-मटक रहे हैं। जो भी हो, डा. रुपेश जैसे बंदों से बड़ी उम्मीदें हैं, और इनसे मैं खुद भी प्रभावित हूं। पढ़िए, रुपेश जी का आत्मकथ्य...जय भड़ास, यशवंत))


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Chat with डा.रुपेश श्रीवास्तव
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16:01 डा.रुपेश: दादा, अपने बारे में कुछ अल्ल-बल्ल लिखा है पढ़ कर भूल जाईएगा
16:03 me: जरूर, अभी पढ़ता हूं

me: :) ये तो बहुत जोरदार है, इसे भड़ास पर डालने की अनुमति दीजिए......

16:07 डा.रुपेश: आप ये मेरा गोबर अगर भड़ास पर डालना चहते हैं तो डाल दीजिए..

me: इसे गोबर न कहें, मुझे गुस्सा आ रहा है......यह तो अद्भुत चीज है, जिसे लिख पाना करोड़ों अरबों में से किसी एक के वश की बात है

16:09 डा.रुपेश: अरे दादा आप को तो सांड के गोबर का महत्त्व पता है गुस्सा न करें और अगर आप ज्यादा खुश हो गए तो मैं तो इतना गोबर कर दूंगा कि गोबर गैस प्लांट लगाना पड़ेगा

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डा. रुपेश का आत्मकथ्य
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from rupesh shrivastava
to Yashwant Singh
date 9 Feb 2008 16:00
subject about me
mailed-by gmail.com

दादा

आपके कई बार कहने पर भी मैंने जो बातें टाल दीं थईं वो थीं मेरे परिचय और चित्र से संबंधित ;कल फिर आपने इसी विषय पर बात करी और मैंने कहा कि मैं आपको मेल कर दूंगा । आगे जो भी लिख रहा हूं उसे बस एक गल्प-कथा ही मानिएगा वरना साधारण तरीके से चलती जिन्दगी तमाम उत्तर तलाशने लगती है । जैसे कि आप जानते हैं कि माता-पिता ने रूपेश नाम रखा ,हमेशा से पता नहीं क्यों ऐसा लगता रहता था कि दुनिया में कुछ तो जरूर गड़बड़ है जो दिख रहा है वह पूरा नहीं है । जब से होश सम्हाला तबसे यही बात अन्दर घुमड़ती रही । कक्षा में औसत से कुछ ऊंचा प्राप्तांक रहता था लेकिन मेरी कक्षाध्यापिका को पता नहीं मुझमें क्या खा़स नजर आता था पांचवी से लेकर आठवीं कक्षा तक मेरे साथ बैठ कर ही लंच करा करती थीं और फिर पास-आउट के दिन उन्होंने मुझे कह दिया कि मैं संस्क्रत भाषा का अध्ययन करूं । मैंने अपना शिक्षा का माध्यम बदल कर हिन्दी ले लिया और फिर शुरू हुआ मेरा विद्यार्जन का सही सफ़र इससे पहले तो बस पढ़ रहा था । संस्क्रत भाषा सीखी और व्याकरण से लेकर जितना भी मिला चाहे उपनिषद हों या संहिताएं चाट कर रख दीं पर मेरे सवाल ज्यों के त्यॊं बने रहे कि दुनिया में क्या गड़बड़ है जो मुझे महसूस होती है पर उसका स्पष्ट रूप समझ नहीं आता है । दसवीं उत्तीर्ण करके नारायण दत्त श्रीमाली से मिलने के लिये घर से निकल भागा एक पत्र रख कर कि अब कुछ जान कर ही आउंगा । पिता हमेशा से ही मुझसे परेशान रहते थे क्योंकि उनके पास कभी मेरे सवालों के उत्तर नहीं रहे । जोधपुर में नारायण दत्त श्रीमाली से तो मुलाकात नहीं हुई पर पैसे खत्म होने पर चार दिन श्मशान में रहा और वहां के डोम से जिन्दगी से जुड़ी बातें जानी । फिर घर वापस आ गया पिटने से बचा रहा क्योंकि घर के लोगों को लगा कि फिर न भाग जाए । संगम के किनारे रहने वाले अघोरी ददई से मुलाकात हुई और सवालों की गहराई और बढ़ गई क्योंकि वो आदमी केमिस्ट्री से एम.एस.सी. था ,जादूगर नहीं था उसके बदन पर बस एक अंगौछा और कंधे पर एक लाल रंग का झोला टंगा रहता था जिसमें दो हड्डियां रहती थीं और कुछ नही ; ददई बड़े लोगों से बात ही नहीं करता था ,बच्चों के संग तो रेत में खेलता भी था और छोटे बच्चों के मांगने पर झोले से कुछ भी निकाल कर दे देता था आफ़-सीजन फल या १०-२० पैसे । लेकिन ददई के झोले की हड्डियां अब पता है कि हाथों की हड्डियां थी ,मैने खुद अपने हाथ से उन दोनो हड्डियो को संगम के पानी में कितनी बार फेंका था लेकिन अगले ही पल वह फिर झोले में होती थी । ददई का कहना था कि पदार्थ और ऊर्जा का संबंध जो मायाजाल में दिखता है वैसा नहीं है वस्तुतः ये दो नहीं हैं लेकिन उस समय मैं इस बात को समझने के लिये छोटा था । समय बीतता गया पिताजी की चाहत ने बी.ए.एम.एस. तक पहुंचा दिया । स्टीफ़न हाकिंग का सेमिनार स्ट्रिंग २००१ में गया वो व्यक्ति ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में शोध कर रहा है । जहां एक ओर ब्रह्माण्ड की विराटता का अध्ययन होता जा रहा है दूसरी ओर हम इलैक्ट्रान से क्वार्क और अब मल्टी डायमेंशनल स्ट्रिंग्स तक आ गए ।

मुझे लगता रहा कि कुछ गड़बड़ है और जिन्दगी चलती जा रही है । फिर एक सत्य पता चला कि हम जो मानते हैं वह ही सत्य होता है न कि हम सत्य को मानते हैं और यही मायाजाल जो कि विराटतम साफ़्टवेयर है जिसके अंदर हम सब संचालित हो रहे हैं हमे उलझाए रहता है ,हम है छोटे-छोटे बायो कम्प्यूटर्स जिनके लिये मायाजाल विन्डोज़ और लिनक्स की तरह से है । शायद मैं अपनी बात को शब्दों मे नहीं बांध पा रहा हूं पर मैं यह जानता हूं कि एक दिन हमारा हार्डवेयर रखा रह जाता है बाकी लोग इस हार्डवेयर्स को रि-सायकल करने के लिये जमीन में गाड़ कर ,जला कर पंचतत्त्वों में मिला देते हैं । क्या आप कह सकते हैं कि जिस दुनिया में हम हैं वह सत्य है स्वप्न नहीं । एक दिन मौत आकर सब बता देती है कि हम सब आटो डिलीट पर सेट किये प्रोग्राम्स हैं जो एक निश्चित अवधि के बाद डिलीट हो जाते हैं लेकिन अगर हम सत्य जान जाते हैं तो हम बूंद की तरह समुद्र में मिल कर खुद समुद्र बन जाते हैं लेकिन जो चमत्कारिक शक्तियां हममें आ जाती हैं वो भी मायाजाल का ही हिस्सा हैं । हम काम-क्रोध-लोभ में उलझे हुए जिए जाते हैं और एक दिन सब खत्म हो जाता है लेकिन गुरूशक्ति जब्बार ने बताया कि जैसे हम एक कम्प्यूटर का डाटा दूसरे पर ले जाते हैं वैसे ही सर्वात्मा "वात" के पांच विविध रूपों में से उनके पांच उपरूपों मे एक धनंजय यह डाटा अगले हार्डवेयर यानि शरीर में ले जाती है । मैं अब इस उठापटक से फ़्री हो चुका हूं अब तो बस मजे ले रहा हूं भावों को देखता हूं जो कि मायाजाल में खुद ही इस हार्डवेयर पर लोड रहते हैं और रचयिता से मजे लेता हूं मेरे और उसके बीच चल रही हुतुतू का । आज हमें सौ हजार अरब रुपए इल जाएं और खुशी से हार्ट फेल हो जाए और सिस्टम बंद............
क्या बटोरना है

? न नाम न पैसा न ही शान्ति ;बस होश कायम रखना है और खुद को जानबूझ कर सुअर बनाए इसी कीचड़ में थूथुन मारते लोटते रहना है जब तक ये हार्डवेयर न छूट जाए.........
करुणा भी एक उलझाव है बस थोड़ा मुलायम सा है बस बाकि सब काम जैसा ही तो है । जब आपने ब्लाग से धनोपार्जन की बात की थी तो मैंने कुछ नही बोला था अब कह्ता हूं धन आप रख लीजिए । मैं बस मस्ती कर रहा हूं एक बहुत बड़े प्लेटफ़ार्म पर मुझे किसी की कोई सहायता भी नहीं करना होता

,जब ईश्वर को खुजली होती है तो वह हम कठपुतलियों से कुछ भी मनचाहा करवाता रहता है । स्वामी ध्यान विस्तार से रुद्राक्षनाथ तक का सफ़र बकवास नही है......
इतना लिख कर भी शायद कुछ नहीं कह पाया बस समझने का जतन करिएगा

,नेति,नेति.....

आपका
डा.रुपेश

22.1.08

दिल्ली मे अश्लील पार्टिया .........खुलासा

क्या आपने दिल्ली की वो पार्टिया देखी है जहा पर लड़कियों के बीच एक लड़का अपने जिस्म के नुमाईश करता है .....जी हां ब्लोगों की दुनिया मे पहली बार दिल्ली का सच .....वो सच जो बेहद शर्मनाक है दिल्ली यानी बिंदास सबसे तेज़ .....इतनी तेज़ की मर्द और औरत ,परिवार ,बहन , सारे रिश्ते ना सिर्फ बदबू दार लगते है बल्कि ....??
दिल्ली ..दिल्ली बोले तो पूरे हिन्दुस्तान के परिभाषा अब बदल गई है ....कुछ दिन पहले एक सज्जन से मुलाक़ात हो गई ....दिल से बेहद खुश ..कारण पूछा ..........तो पता चला कि वो स्थरीपर पार्टी के लोग है ..हम आगे बडे इससे पहले आप बता दीजिए क्या आप ने bhee यह नाम पहली बार सुना है ?
ये पार्टिया ना तो आप और मेरे जैसे लोगो के लिए है और ना ही ही है उन लोगो के लिए जो अपनी सभ्यता को सीने से लगाए हुए है
इन पार्टियों मे लड़किया शराब और जिस्म का उपभोग करते है वो जब तक करती जब तक उनका स्त्रीपर यानी वो आदमी जो उनके लिया बुलाया गया है ....बुलाने का खर्चा कम से कम २५ हजार रूपए .... इसके लिए आपके पास होना चाहिए सिर्फ और सिर्फ एक शानदार जिस्म .
.जिसकी नुमाईश और प्यासों को ख़त्म करने की शक्ति आपके अन्दर होनी आवश्यक है ............
पार्टी की शुरुआत रात के तकरीबन १२-२ के आस
रात के तकरीबन २ बजे के आस पास नशे में धुत एक जबरदस्त ब्लू फिल्म का सीन ....और सामने तकरीबन ६०-७० महिलाये और साथ मे मौजूद सिर्फ एक लड़का
मजबूत कद -काठी वाला लड़का --- लेकिन शक्ल मानो कुछ होने वाला हो ? तभी सभी लड़किया एक के बाद उस लड़के पर टूट पड़ती है
आख़िर क्या है ये पार्टी ? क्या है इनका सच ?
सभी लड़किया कुछ देर बाद अपने कपडे उतार कर फेकने लगी और फिर हुआ एक नए खेल की शुरुआत ....लड़का बेहोशी के आलम मे था .... पार्टी रात भर इसी कदर चलती रही ...अमीरों की यह पार्टी आपको केसी लगी
आप हमें जरुर बताए .............क्योंकि दिल्ली मे बड़ी आग है ........

18.1.08

बड़ी खबर

अब तक की सबसे बडी खबर यही है की पायल सिंह वाली खबर चलाने वाले टीवी न्यूज चैनल के सभी लोगो को ये बता दिया गया है की पायल सिंह वाली न्यूज़ को ना चलाए।

गलती का पता तो चला ।

आखिरकार हमारा मकसद पूरा हो ही गया।

आप अपनी राय दें।

फिलहाल तो हार गया झूठ फैलाने वाला न्यूज चैनल।

सभी ब्लोगरो को मुबारकबाद।

शर्मसार हुआ मीडिया

क्या आप जानते है पायल सिंह, जो एक टीवी न्यूज चैनल की पत्रकार हैं, को मारने की घटना पूरी तरह से गलत है।
जब यह बात उस टीवी न्यूज चैनल को पता चली तो सभी लोगो को यह संदेश दिया गया कि पत्रकारिता पर हमला हुआ है / खैर लोगो को बेवकूफ बनाना उनका परम धर्म है जो वो करते रहते है..... आप से trp लेना उनका काम है और वो लोग अच्छी तरीके से ये काम कर रह्वे है -दुर्भाग्य देखिए। खबर बिल्कुल पक्की है वो सिर्फ एक एक्सीडेंट था ..टीवी न्यूज चैनल वाले पायल सिंह से नाराज है क्योंकि पायल इस मुद्दे पर शांत है।

क्या आप मेरी राय से एतेफाक रखते है......यह मेरी बात को भी साबित करता है ........और भी है खबरे पढ़ते रहे हिन्दी ब्लोग्स। में कोई भड़ास नही निकाल रहा बल्कि गणेश शंकर विधार्थी और प्रभाष सिंह में फर्क बता रहा हूं। अपनी राय मुझे दे।